डांगरी हमला, 2023
पहचान देखकर गोलीबारी, अगले दिन IED विस्फोट और जम्मू क्षेत्र में बदलता आतंकी भूगोल
पहचान देखकर गोलीबारी, अगले दिन IED विस्फोट और जम्मू क्षेत्र में बदलता आतंकी भूगोल
जम्मू-कश्मीर के राजौरी जिले के अपर डांगरी गांव में 1 और 2 जनवरी 2023 को हुए दोहरे आतंकवादी हमले ने लक्षित हिंसा की भौगोलिक और रणनीतिक दिशा बदल दी। इससे पहले 2021 और 2022 की प्रमुख लक्षित हत्याएं मुख्यतः कश्मीर घाटी के श्रीनगर, बडगाम, कुलगाम और पुलवामा जैसे जिलों में हुई थीं। डांगरी हमले ने संकेत दिया कि आतंकवादी नेटवर्क जम्मू संभाग के राजौरी-पुंछ क्षेत्र में भी अल्पसंख्यक बस्तियों को बड़े हमलों का लक्ष्य बना रहा था।
1 जनवरी की शाम दो हथियारबंद आतंकवादियों ने हिंदू परिवारों के घरों में घुसकर गोलीबारी की। चार लोगों की उसी दिन मृत्यु हो गई और कई अन्य घायल हुए। आतंकवादी जाते समय एक मकान के पास शक्तिशाली इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस—IED—छोड़ गए। अगले दिन जब पीड़ित परिवारों, स्थानीय लोगों और सुरक्षा अधिकारियों की आवाजाही जारी थी, IED फट गया। विस्फोट में दो बच्चों की जान चली गई। गोलीबारी में घायल प्रिंस शर्मा ने 8 जनवरी को अस्पताल में दम तोड़ दिया।
इस प्रकार दोनों हमलों में कुल सात नागरिक मारे गए। मृतकों में दो बच्चे, दो सगे भाई और एक पिता-पुत्र शामिल थे।
डांगरी हमला केवल सात लोगों की हत्या नहीं था। यह एक नियोजित दो-स्तरीय आतंकवादी ऑपरेशन था—पहले चुनिंदा घरों में गोलीबारी और उसके बाद उसी स्थान पर छिपाए गए विस्फोटक से पीड़ित परिवारों, बचावकर्मियों तथा सुरक्षा बलों को दोबारा निशाना बनाने की कोशिश।
डांगरी कहां स्थित है?
डांगरी राजौरी शहर से लगभग आठ किलोमीटर दूर स्थित गांव है। यह राजौरी-पुंछ के उस पहाड़ी क्षेत्र का हिस्सा है जहां घने जंगल, पर्वतीय रास्ते, प्राकृतिक गुफाएं और नियंत्रण रेखा की निकटता आतंकवादियों को आवाजाही तथा छिपने में सहायता कर सकती है।
डांगरी की आबादी मिश्रित क्षेत्र के बीच स्थित मुख्यतः हिंदू बहुल बस्ती थी। 1990 के दशक में राजौरी, पुंछ और डोडा क्षेत्र के अनेक गांव आतंकवादी हमलों का सामना कर चुके थे। बाद के वर्षों में हिंसा घटने से स्थानीय लोगों में अपेक्षाकृत सुरक्षा की भावना विकसित हुई थी।
डांगरी हमला इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण था कि राजौरी जिले में लगभग डेढ़ दशक बाद नागरिकों को उनके घरों में घुसकर इस स्तर पर निशाना बनाया गया।
घटनाओं का संक्षिप्त विवरण
घायलों की संख्या अलग-अलग स्रोतों में 11 से 15 तक बताई गई। पीटीआई आधारित रिपोर्टों के अनुसार गोलीबारी में छह और IED विस्फोट में नौ लोग घायल हुए थे। इनमें गोलीबारी में घायल प्रिंस शर्मा की बाद में मृत्यु हो गई। इस गणना के अनुसार अंतिम परिणाम सात मृतक और लगभग 14 जीवित घायल बनता है। कुछ सरकारी तथा मीडिया रिपोर्टों ने केवल अस्पताल में उपचाररत गंभीर घायलों को गिनने के कारण कम संख्या दी।
1 जनवरी 2023: पहचान देखने के बाद घरों में गोलीबारी
हमले का समय और पद्धति
नए वर्ष के पहले दिन शाम लगभग सात बजे दो हथियारबंद आतंकवादी अपर डांगरी गांव पहुंचे। उन्होंने थोड़ी दूरी पर स्थित तीन घरों को निशाना बनाया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार आतंकवादी घरों में दाखिल हुए, परिवार के सदस्यों से उनकी पहचान पूछी और कुछ लोगों के आधार कार्ड भी देखे।
इसके बाद उन्होंने स्वचालित हथियारों से नजदीक से गोलीबारी की। प्रारंभिक हमले में चार लोग मारे गए और छह लोग घायल हुए। एक घायल, प्रिंस शर्मा, ने सात दिन बाद अस्पताल में दम तोड़ दिया।
पीड़ित सभी हिंदू परिवारों से थे। हमला जिन घरों पर हुआ, उनके बीच बहुत अधिक दूरी नहीं थी। इससे यह संकेत मिला कि आतंकवादियों ने लक्ष्य और रास्ता पहले से चुना था।
गोलीबारी में मारे गए नागरिक
दीपक शर्मा
लगभग 23-24 वर्षीय दीपक शर्मा की गोलीबारी में मृत्यु हुई। उनके छोटे भाई प्रिंस शर्मा भी गंभीर रूप से घायल हुए थे। प्रिंस ने 8 जनवरी को जम्मू के सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में दम तोड़ दिया।
एक ही परिवार के दोनों बेटों की मृत्यु ने हमले की मानवीय त्रासदी को और गहरा कर दिया। उनकी मां ने कुछ ही दिनों में अपने दोनों पुत्र खो दिए।
प्रिंस शर्मा
लगभग 21 वर्षीय प्रिंस गोलीबारी में गंभीर रूप से घायल हुए। उन्हें विशेष उपचार के लिए जम्मू ले जाया गया। एक सप्ताह तक जीवन के लिए संघर्ष करने के बाद 8 जनवरी को उनकी मृत्यु हुई। उनकी मृत्यु के साथ डांगरी हमले का आधिकारिक मृतक आंकड़ा सात हो गया। एनडीटीवी
प्रीतम लाल
लगभग 57 वर्षीय प्रीतम लाल की उनके घर में गोली मारकर हत्या कर दी गई। आतंकवादियों ने इसी परिवार के मकान के पास IED भी छिपाया था, जो अगली सुबह फटा।
शिशुपाल शर्मा
लगभग 32 वर्षीय शिशुपाल, प्रीतम लाल के पुत्र थे। गोलीबारी में उन्हें गंभीर चोट लगी और बाद में उनकी मृत्यु हो गई। उनकी पत्नी के अनुसार हमलावर ने घर में प्रवेश करने के बाद पहचान पत्र मांगे और फिर परिवार के पुरुष सदस्यों पर गोली चला दी।
सतीश कुमार
लगभग 45 वर्षीय सतीश कुमार पूर्व सैनिक बताए गए। वह भी आतंकवादी गोलीबारी में मारे गए। पूर्व सैन्य सेवा के बावजूद उस समय उनके पास हमले का प्रभावी प्रतिरोध करने का अवसर नहीं था।
आधार कार्ड देखने का क्या अर्थ था?
प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि आतंकवादियों ने गोली चलाने से पहले पहचान पत्र देखे। यदि यह विवरण सही है, तो इससे तीन बातें सामने आती हैं:
- हमला किसी एक व्यक्ति से निजी दुश्मनी के कारण नहीं था
- पीड़ितों की धार्मिक और सामुदायिक पहचान लक्ष्य चयन का आधार थी
- आतंकवादियों का उद्देश्य गांव की हिंदू आबादी में सामूहिक भय पैदा करना था
राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने भी बाद में आरोपपत्र में कहा कि पाकिस्तान स्थित लश्कर हैंडलरों का उद्देश्य जम्मू-कश्मीर में विशेष रूप से अल्पसंख्यक समुदाय के नागरिकों और सुरक्षाबलों को निशाना बनाना था।
हालांकि प्रत्येक घर में आधार कार्ड देखे जाने का विवरण मुख्यतः प्रत्यक्षदर्शी बयानों पर आधारित है। इसे उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड के अंतिम निष्कर्ष के रूप में नहीं, बल्कि अनेक समकालीन रिपोर्टों में दर्ज साक्ष्य के रूप में देखा जाना चाहिए।
क्या गांव के व्यक्ति ने आतंकवादियों पर गोली चलाई?
डांगरी के विलेज डिफेंस गार्ड—VDG—सदस्य बाल कृष्ण ने अपने पुराने हथियार से आतंकवादियों की दिशा में गोली चलाई। स्थानीय लोगों का दावा है कि जवाबी गोलीबारी के कारण आतंकवादी आगे के घरों तक नहीं पहुंच सके और जंगल की ओर भाग गए।
यदि यह प्रतिरोध नहीं होता तो मृतकों की संख्या अधिक हो सकती थी। इस घटना ने बाद में पूरे जम्मू क्षेत्र में विलेज डिफेंस गार्ड व्यवस्था को मजबूत करने की मांग को जन्म दिया।
2 जनवरी 2023: घटनास्थल पर छोड़ा गया IED फटा
गोलीबारी के लगभग 12 घंटे बाद 2 जनवरी की सुबह उसी क्षेत्र में एक शक्तिशाली IED विस्फोट हुआ। विस्फोट प्रीतम लाल के घर के निकट हुआ, जिसे पिछली शाम आतंकवादियों ने निशाना बनाया था।
हमले के बाद गांव में पीड़ित परिवारों, रिश्तेदारों, स्थानीय लोगों, पुलिसकर्मियों और अन्य अधिकारियों की आवाजाही थी। इसी दौरान एक बैग या सामान के नीचे छिपाया गया विस्फोटक फट गया।
विस्फोट में मारे गए बच्चे
विहान शर्मा
चार वर्षीय विहान शर्मा की विस्फोट में घटनास्थल पर ही मृत्यु हो गई। वह हमले में मारे गए परिवारों से संबंधित था और अन्य लोगों के साथ घटनास्थल के पास मौजूद था।
समीक्षा शर्मा
किशोर आयु की समीक्षा शर्मा विस्फोट में गंभीर रूप से घायल हुई। अलग-अलग रिपोर्टों में उनकी आयु 13, 14 अथवा 16 वर्ष लिखी गई। अस्पताल में उपचार के दौरान उनकी मृत्यु हुई। विहान और समीक्षा रिश्ते में चचेरे भाई-बहन बताए गए।
विस्फोट में अधिकांश घायल महिलाएं और बच्चे थे। घायलों में सात से 20 वर्ष तक के कई बच्चे और युवा शामिल थे। टाइम्स ऑफ इंडिया की समकालीन रिपोर्ट
क्या दूसरा IED भी मिला था?
सुरक्षा एजेंसियों को बाद में एक अन्य संदिग्ध विस्फोटक भी मिला, जिसे निष्क्रिय किया गया। इससे जांचकर्ताओं को आशंका हुई कि आतंकवादी एक से अधिक विस्फोटक छोड़कर गए थे।
इसका संभावित उद्देश्य गोलीबारी के बाद मौके पर पहुंचने वाले लोगों और सुरक्षा बलों को निशाना बनाना था। इस रणनीति को “सेकेंडरी डिवाइस” अथवा द्वितीयक विस्फोटक हमला कहा जाता है।
पहला हमला भीड़, पुलिस और बचावकर्मियों को एक स्थान पर एकत्र करता है। इसके बाद छिपाया गया विस्फोटक अधिक जनहानि कर सकता है। इस दृष्टि से डांगरी हमला सामान्य गोलीबारी से कहीं अधिक सुनियोजित था।
घटनास्थल की जांच में गंभीर सुरक्षा चूक
गोलीबारी के बाद पुलिस और सुरक्षाबलों ने क्षेत्र को घेरा था। इसके बावजूद आतंकवादियों द्वारा छोड़ा गया IED अगली सुबह तक नहीं खोजा जा सका। घटनास्थल पूरी तरह सुरक्षित घोषित किए जाने से पहले स्थानीय लोगों को वहां एकत्र होने दिया गया।
इससे कई प्रश्न उठे:
- गोलीबारी के बाद बम निरोधक दस्ते ने प्रत्येक मकान और आसपास के क्षेत्र की जांच क्यों नहीं की?
- जिस घर में आतंकवादी घुसे थे, उसके बाहर रखी संदिग्ध वस्तु पर ध्यान क्यों नहीं गया?
- रात में प्रकाश और तलाशी की पर्याप्त व्यवस्था थी या नहीं?
- घटनास्थल पर स्थानीय लोगों का प्रवेश प्रतिबंधित क्यों नहीं किया गया?
- क्या सुरक्षा एजेंसियों ने द्वितीयक IED की संभावना पर विचार नहीं किया?
- पुलिस और सेना के बीच घटनास्थल की जिम्मेदारी स्पष्ट थी या नहीं?
- उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने संभावित सुरक्षा चूक की जांच कराने का आश्वासन दिया। लेकिन इस जांच की पूर्ण रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है
आतंकवादियों द्वारा IED छोड़ना एक अपराध था, लेकिन उसका अगली सुबह तक न मिलना सुरक्षा तंत्र की गंभीर परिचालन विफलता भी था। इस चूक के कारण दो बच्चों की मृत्यु हुई और नौ लोग घायल हुए।
हमले के पीछे कौन था?
प्रारंभिक स्थिति
हमले के तुरंत बाद किसी बड़े संगठन ने विश्वसनीय सार्वजनिक रूप से जिम्मेदारी नहीं ली। पुलिस ने इसे आतंकवादी हमला घोषित किया, लेकिन प्रारंभिक दिनों में हमलावरों की पहचान और संगठन को लेकर निश्चित जानकारी नहीं दी गई।
जम्मू-कश्मीर पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों ने संदेह जताया कि हमलावर विदेशी, संभवतः पाकिस्तानी आतंकवादी थे और राजौरी-पुंछ के जंगलों में सक्रिय लश्कर-ए-तैयबा नेटवर्क से जुड़े थे।
एनआईए जांच
राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने जनवरी 2023 में मामला अपने हाथ में लिया। जांच के दौरान एनआईए ने पाकिस्तान स्थित लश्कर हैंडलरों, स्थानीय आश्रयदाताओं और आतंकवादियों की आवाजाही के बीच संबंध स्थापित करने का दावा किया।
31 अगस्त 2023 को एनआईए ने दो लोगों को गिरफ्तार किया:
निसार अहमद उर्फ हाजी निसार
मुश्ताक हुसैन उर्फ चाचा
दोनों पुंछ जिले के मेंढर क्षेत्र के गुरसाई गांव से संबंधित बताए गए। एनआईए का आरोप है कि उन्होंने हमलावर आतंकवादियों को दो महीने से अधिक समय तक अपने बनाए हुए गुप्त ठिकाने में आश्रय दिया, भोजन उपलब्ध कराया और जंगल तथा गांवों के रास्तों पर मार्गदर्शक की भूमिका निभाई।
जनवरी 2024 में एनआईए ने एक किशोर को भी हिरासत में लिया। एजेंसी के अनुसार किशोर का उपयोग आतंकवादियों को आश्रय तथा अन्य सहायता देने में किया गया था। इंडियन एक्सप्रेस
एनआईए का आरोपपत्र
फरवरी 2024 में एनआईए ने पांच लोगों के विरुद्ध आरोपपत्र दाखिल किया। इनमें तीन पाकिस्तान स्थित कथित लश्कर हैंडलर थे:
- सैफुल्लाह उर्फ साजिद जट्ट
- मोहम्मद कासिम
- अबू कताल उर्फ कताल सिंधी
दो स्थानीय आरोपी थे:
निसार अहमद उर्फ हाजी निसार
मुश्ताक हुसैन उर्फ चाचा
एनआईए का आरोप है कि पाकिस्तान स्थित इन हैंडलरों ने आतंकवादियों की भर्ती, प्रशिक्षण और जम्मू-कश्मीर में घुसपैठ की व्यवस्था की। उनका उद्देश्य अल्पसंख्यक समुदाय के नागरिकों तथा सुरक्षा बलों पर हमले कराना था।
एजेंसी के अनुसार सैफुल्लाह ने पाकिस्तान से समग्र साजिश का संचालन किया। मोहम्मद कासिम पहले जम्मू-कश्मीर का निवासी था और लगभग 2002 में पाकिस्तान चला गया था। अबू कताल राजौरी-पुंछ क्षेत्र में सक्रिय लश्कर आतंकवादियों का प्रमुख संचालक और मार्गदर्शक बताया गया। एनडीटीवी
इन सभी को आरोपपत्र में नामित किया जाना दोषसिद्धि के समान नहीं है। तीन पाकिस्तान स्थित आरोपी फरार बताए गए, जबकि स्थानीय आरोपियों पर अदालत में मुकदमा चलाया जाना था।
जुलाई 2025 तक न्यायिक स्थिति
जुलाई 2025 में जम्मू की विशेष एनआईए अदालत ने निसार अहमद और मुश्ताक हुसैन के विरुद्ध आरोप तय किए। अदालत ने प्रारंभिक रूप से यह मानने योग्य सामग्री पाई कि दोनों ने:
आतंकवादियों को भोजन और आश्रय दिया।
उनके लिए छिपने का स्थान उपलब्ध कराया।
जंगल और स्थानीय रास्तों में मार्गदर्शक की भूमिका निभाई।
एक नाबालिग की सेवाओं का गैर-कानूनी गतिविधियों में उपयोग किया।
दोनों आरोपी रहे; अदालत द्वारा आरोप तय किया जाना अंतिम दोषसिद्धि नहीं है। उन्हें अपना बचाव प्रस्तुत करने और अभियोजन के साक्ष्यों को चुनौती देने का अधिकार है। इंडियन एक्सप्रेस
रिपोर्टों के अनुसार आरोपपत्र में नामित अबू कताल मार्च 2025 में पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में अज्ञात बंदूकधारियों की गोलीबारी में मारा गया। लेकिन इस घटना की परिस्थितियां और उसकी पहचान मुख्यतः सुरक्षा-स्रोत तथा मीडिया रिपोर्टों पर आधारित रहीं।
सीमा पार घुसपैठ और स्थानीय लॉजिस्टिक नेटवर्क
डांगरी हमला बताता है कि सीमा पार से आया आतंकवादी केवल नियंत्रण रेखा पार करके सीधे हमला नहीं कर सकता। उसे लंबे समय तक टिके रहने के लिए बहुस्तरीय सहायता की आवश्यकता होती है।
इस नेटवर्क में संभावित रूप से शामिल होते हैं:
घुसपैठ के लिए सीमा और जंगल का मार्ग।
आतंकवादियों को एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक ले जाने वाला गाइड।
भोजन, पानी और कपड़े उपलब्ध कराने वाले सहयोगी।
जंगल में निर्मित अथवा प्राकृतिक ठिकाने।
हथियार और गोला-बारूद छिपाने की जगह।
स्थानीय फोन, संदेशवाहक या ऑफलाइन संचार व्यवस्था।
गांव और सुरक्षा बलों की गतिविधियों की सूचना।
लक्ष्य की धार्मिक पहचान और घरों का स्थान।
हमला करने के बाद सुरक्षित वापसी का मार्ग।
एनआईए के आरोपों के अनुसार हमलावर आतंकवादियों को दो महीने से अधिक समय तक आश्रय दिया गया था। यदि यह आरोप न्यायालय में सिद्ध होता है, तो इससे स्पष्ट होगा कि हमला अचानक आए घुसपैठियों की कार्रवाई नहीं, बल्कि पहले से स्थापित सीमा-पार और स्थानीय लॉजिस्टिक नेटवर्क का परिणाम था।
आतंकवाद का भूगोल कश्मीर से जम्मू की ओर क्यों बढ़ा?
डांगरी हमला जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के भूगोल में बदलाव का महत्वपूर्ण संकेत था। कश्मीर घाटी में सुरक्षा दबाव बढ़ने के बाद आतंकवादी संगठनों ने राजौरी-पुंछ के जंगलों और पहाड़ी मार्गों का अधिक उपयोग शुरू किया।
इस क्षेत्र को चुनने के संभावित कारण थे:
घना जंगल और कठिन पर्वतीय भूगोल।
नियंत्रण रेखा से संभावित घुसपैठ मार्ग।
सीमित सड़क संपर्क वाले गांव।
छोटे आतंकवादी दलों को छिपने की सुविधा।
सेना की परिचालन सीमाओं के बीच आवाजाही की संभावना।
लंबे समय से शांत क्षेत्रों में स्थानीय सुरक्षा सतर्कता का कम होना।
हिंदू और अल्पसंख्यक बस्तियों पर हमला करके सांप्रदायिक तनाव पैदा करना।
सुरक्षा बलों को कश्मीर घाटी से जम्मू के विस्तृत क्षेत्र में फैलने के लिए मजबूर करना।
डांगरी के बाद राजौरी-पुंछ क्षेत्र में सुरक्षाबलों पर कई घातक घात लगाकर हमले और लंबे जंगल अभियान सामने आए। इससे यह आकलन मजबूत हुआ कि पाकिस्तान स्थित संगठनों ने पीर पंजाल के दक्षिणी क्षेत्र को नया सक्रिय मोर्चा बनाने की कोशिश की।
विलेज डिफेंस गार्ड की वापसी
हमले के बाद डांगरी और आसपास के गांवों में विलेज डिफेंस गार्ड व्यवस्था को पुनर्जीवित किया गया। पहले इन समूहों को विलेज डिफेंस कमेटी—VDC—कहा जाता था।
प्रशासन ने कई स्वयंसेवकों को पुराने .303 हथियारों के स्थान पर सेल्फ लोडिंग राइफल—SLR—उपलब्ध कराईं। सीआरपीएफ को ग्रामीण स्वयंसेवकों को हथियार चलाने और आपात स्थिति में प्रतिक्रिया देने का प्रशिक्षण देने की जिम्मेदारी दी गई।
पूर्व सैनिकों और अर्धसैनिक बलों से सेवानिवृत्त लोगों को भी इस व्यवस्था में शामिल किया गया। डांगरी में बाल कृष्ण द्वारा आतंकवादियों पर जवाबी गोली चलाने की घटना को इस व्यवस्था की उपयोगिता के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया गया।
डांगरी और आसपास के क्षेत्र में सीआरपीएफ की अतिरिक्त कंपनी तैनात की गई। राजौरी-पुंछ सुरक्षा ग्रिड मजबूत करने के लिए लगभग 1,800 अतिरिक्त सीआरपीएफ जवानों वाली 18 कंपनियां भेजने का निर्णय भी हुआ। हिंदुस्तान टाइम्स
नागरिकों को हथियार देने पर बहस
विलेज डिफेंस गार्ड व्यवस्था के समर्थकों का तर्क था कि दूरस्थ गांवों में पुलिस या सेना के पहुंचने तक प्रशिक्षित ग्रामीण आतंकवादियों को रोक सकते हैं।
आलोचकों ने कई जोखिम बताए:
हथियारों का व्यक्तिगत विवादों में दुरुपयोग।
अपर्याप्त प्रशिक्षण से दुर्घटना।
किसी एक समुदाय को हथियार मिलने से सामाजिक तनाव।
आतंकवादियों द्वारा VDG सदस्यों को विशेष लक्ष्य बनाना।
राज्य की सुरक्षा जिम्मेदारी का नागरिकों पर स्थानांतरण।
हथियारों की चोरी या आतंकवादी नेटवर्क तक पहुंच।
इसलिए VDG व्यवस्था की उपयोगिता प्रशिक्षण, निगरानी, हथियारों के सुरक्षित रख-रखाव और पुलिस के साथ स्पष्ट कमांड प्रणाली पर निर्भर करती है।
सरकार और स्थानीय समाज की प्रतिक्रिया
हमले के बाद डांगरी तथा राजौरी में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए। ग्रामीणों ने मृतकों के शवों का अंतिम संस्कार करने से पहले उपराज्यपाल के गांव आने, सुरक्षा चूक की जांच और स्थायी सुरक्षा व्यवस्था की मांग की।
उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने डांगरी पहुंचकर पीड़ित परिवारों से मुलाकात की। सरकार ने प्रत्येक मृतक के निकटतम परिजन के लिए दस लाख रुपये की अनुग्रह राशि और एक सरकारी नौकरी की घोषणा की। गंभीर घायलों के लिए एक लाख रुपये की सहायता घोषित की गई। बाद में पीड़ित परिवारों को नियुक्ति पत्र भी दिए गए। आउटलुक
भाजपा नेताओं ने हमले के लिए पाकिस्तान-समर्थित आतंकवादी नेटवर्क को जिम्मेदार ठहराया। नेशनल कॉन्फ्रेंस, कांग्रेस, पीडीपी और अन्य विपक्षी दलों ने हत्या की निंदा करते हुए खुफिया तथा सुरक्षा चूक पर सवाल उठाए।
डांगरी हमला सामान्य टारगेट किलिंग से कैसे अलग था?
डांगरी हमला लक्षित आतंकवाद का हिस्सा था, लेकिन इसकी संरचना 2021-22 की पिस्तौल आधारित हत्याओं से अलग थी।
इसलिए डांगरी को केवल “टारगेट किलिंग” कहना पर्याप्त नहीं है। यह चयनित सामुदायिक घरों पर किया गया छोटा नरसंहार और द्वितीयक विस्फोटक हमला था।
स्थापित तथ्य, जांच एजेंसी के आरोप और अनसुलझे प्रश्न
व्यापक रूप से स्थापित तथ्य
1 जनवरी को आतंकवादियों ने डांगरी के तीन घरों में गोलीबारी की।
पीड़ित सभी हिंदू समुदाय से थे।
पांच लोगों की मृत्यु गोलीबारी के कारण हुई—चार तत्काल और प्रिंस शर्मा की 8 जनवरी को।
2 जनवरी को आतंकवादियों द्वारा छोड़ा गया IED फटा।
विस्फोट में विहान और समीक्षा शर्मा की मृत्यु हुई।
कुल सात नागरिक मारे गए।
मृतकों में दो बच्चे शामिल थे।
घटनास्थल से एक अन्य संदिग्ध IED भी मिला।
गोलीबारी के बाद घटनास्थल की तलाशी में विस्फोटक का न मिलना गंभीर सुरक्षा प्रश्न बना।
एनआईए के आरोप
हमला लश्कर-ए-तैयबा के पाकिस्तान स्थित हैंडलरों ने निर्देशित किया।
सैफुल्लाह, मोहम्मद कासिम और अबू कताल साजिश में शामिल थे।
स्थानीय आरोपियों ने आतंकवादियों को दो महीने से अधिक समय तक आश्रय दिया।
आतंकवादियों को भोजन, ठिकाना और मार्गदर्शन उपलब्ध कराया गया।
हमले का उद्देश्य अल्पसंख्यक समुदाय में भय उत्पन्न करना था।
सीमा पार से भेजे गए आतंकवादियों ने गोलीबारी और IED हमला किया।
न्यायिक स्थिति
एनआईए ने पांच आरोपियों के विरुद्ध आरोपपत्र दाखिल किया।
दो स्थानीय आरोपी गिरफ्तार हुए।
एक किशोर को भी कथित सहायता के मामले में पकड़ा गया।
जुलाई 2025 में विशेष एनआईए अदालत ने दो स्थानीय आरोपियों के विरुद्ध आरोप तय किए।
मुकदमे का अंतिम निर्णय और दोषसिद्धि अभी आरोपों से अलग न्यायिक चरण है।
अनसुलझे प्रश्न
- घरों की पहचान और परिवारों की धार्मिक जानकारी हमलावरों को किसने दी?
- वास्तविक शूटर कौन थे और उनकी अंतिम स्थिति क्या है?
- गोलीबारी के बाद IED क्यों नहीं खोजा जा सका?
- हमलावर नियंत्रण रेखा के किस मार्ग से आए?
- आतंकवादी दो महीने तक क्षेत्र में रहे तो खुफिया तंत्र उन्हें क्यों नहीं पकड़ सका?
- क्या उन्हें अन्य स्थानीय सहयोगियों से भी सहायता मिली?
- दूसरे IED का वास्तविक लक्ष्य कौन था?
- संभावित सुरक्षा चूक की प्रशासनिक जांच में किसे उत्तरदायी पाया गया?
- पाकिस्तान स्थित हैंडलरों को भारतीय न्यायिक प्रक्रिया के सामने लाने की व्यावहारिक संभावना क्या है?
निष्कर्ष
डांगरी हमला जम्मू-कश्मीर के लक्षित आतंकवाद में तीन कारणों से निर्णायक घटना था।
पहला, इसने आतंकवाद की सक्रियता को कश्मीर घाटी से आगे राजौरी-पुंछ के हिंदू बहुल ग्रामीण क्षेत्रों तक फैलते हुए दिखाया। दूसरा, इसमें धार्मिक पहचान के आधार पर घरों का चयन कर पूरे समुदाय को भयभीत करने की कोशिश हुई। तीसरा, गोलीबारी के बाद छोड़े गए IED ने यह सिद्ध किया कि आतंकवादी केवल तत्काल हत्या नहीं, बल्कि बचाव और शोक के लिए जुटने वाले लोगों को भी मारना चाहते थे।
हमला सीमा पार लश्कर नेटवर्क, स्थानीय आश्रय और कठिन जंगल भूगोल के संयोजन का उदाहरण भी बना। एनआईए जांच के अनुसार पाकिस्तान स्थित हैंडलरों ने आतंकवादियों को भेजा और स्थानीय आरोपियों ने उन्हें लंबे समय तक आश्रय तथा मार्गदर्शन दिया। इन आरोपों का अंतिम परीक्षण न्यायालय में होना शेष था।
सबसे गंभीर सुरक्षा विफलता IED का अगली सुबह तक न मिलना थी। गोलीबारी के बाद यदि घटनास्थल की व्यवस्थित बम-जांच होती और लोगों को वहां एकत्र न होने दिया जाता, तो संभवतः दो बच्चों की जान बचाई जा सकती थी।
डांगरी ने यह संदेश दिया कि जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद का मुकाबला केवल नियंत्रण रेखा पर घुसपैठ रोककर नहीं किया जा सकता। इसके लिए जंगल आधारित आतंकवादी ठिकानों, स्थानीय लॉजिस्टिक नेटवर्क, संवेदनशील बस्तियों की सुरक्षा, आधुनिक विस्फोटक जांच और ग्रामीण खुफिया व्यवस्था को एक साथ मजबूत करना आवश्यक है।
यह घटना इस बात का भी प्रमाण है कि “टारगेट किलिंग” कभी-कभी एक व्यक्ति की हत्या से आगे बढ़कर पूरे परिवार, बस्ती और समुदाय को लक्ष्य बनाने वाले सीमित नरसंहार का रूप ले सकती है।