अक्टूबर 2021: लक्षित हत्याओं की श्रृंखला
अल्पसंख्यक नागरिक, शिक्षक, कारोबारी और प्रवासी श्रमिक—सत्रह दिनों की हिंसा का विश्लेषण
अल्पसंख्यक नागरिक, शिक्षक, कारोबारी और प्रवासी श्रमिक—सत्रह दिनों की हिंसा का विश्लेषण
अक्टूबर 2021 में कश्मीर घाटी ने लक्षित आतंकवाद का एक नया और अत्यंत भयावह स्वरूप देखा। केवल 16 दिनों—2 से 17 अक्टूबर—के भीतर आतंकवादियों ने 11 नागरिकों की हत्या कर दी। इनमें कश्मीरी पंडित, सिख, स्थानीय मुस्लिम, जम्मू क्षेत्र का हिंदू शिक्षक और बिहार तथा उत्तर प्रदेश से आए पांच श्रमिक शामिल थे। एक अन्य प्रवासी मजदूर गंभीर रूप से घायल हुआ।
इन घटनाओं की विशेषता यह थी कि इनमें बड़े विस्फोटकों, आत्मघाती दस्तों या सैन्य प्रतिष्ठानों पर हमलों के बजाय पिस्तौलधारी आतंकवादियों ने असुरक्षित नागरिकों को नजदीक से गोली मारी। हमला करने वाले बाजार, सड़क, घर, दुकान और विद्यालय जैसे सामान्य नागरिक स्थानों में पहुंचे तथा वारदात के बाद भीड़ में गायब हो गए।
यह श्रृंखला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें दो समानांतर संदेश दिखाई देते हैं:
हिंदू और सिख अल्पसंख्यकों में भय पैदा करना।
प्रवासी श्रमिकों को घाटी छोड़ने के लिए मजबूर करना।
स्थानीय मुस्लिम नागरिकों को “मुखबिर” या “सरकार का सहयोगी” बताकर दंडित करना।
सरकार के सामान्य स्थिति बहाल होने के दावे को चुनौती देना।
कश्मीरी पंडितों की वापसी और पुनर्वास प्रक्रिया को बाधित करना।
संक्षिप्त आंकड़े
2 से 17 अक्टूबर 2021 की प्रमुख लक्षित हत्याओं में:
कुल मृतक: 11 नागरिक
घायल: कम-से-कम एक नागरिक
अंतरराज्यीय प्रवासी श्रमिक: पांच मृत
कश्मीर घाटी के स्थानीय निवासी: पांच मृत
जम्मू क्षेत्र का निवासी: एक मृत
धार्मिक पहचान के अनुसार: छह हिंदू, चार मुस्लिम और एक सिख
प्रमुख जिले: श्रीनगर, बांदीपोरा, पुलवामा और कुलगाम
कुछ व्यापक आतंकवाद-संबंधी डेटाबेस अक्टूबर 2021 में नागरिक मौतों की संख्या 12 या 13 बताते हैं। उनमें मुठभेड़ों, नाकों अथवा अन्य परिस्थितियों में हुई नागरिक मौतें भी शामिल हैं। यहां दिया गया 11 का आंकड़ा विशेष रूप से 2 से 17 अक्टूबर के बीच हुई व्यापक रूप से दर्ज लक्षित हत्याओं का है।
तारीखवार घटनाक्रम
2 अक्टूबर: स्थानीय मुस्लिम नागरिकों से शुरू हुई श्रृंखला
माजिद अहमद गोजरी की हत्या
2 अक्टूबर की शाम श्रीनगर के करण नगर स्थित मदीना कॉम्प्लेक्स के पास चट्टाबल निवासी लगभग 25 वर्षीय माजिद अहमद गोजरी को नजदीक से गोली मारी गई। गंभीर रूप से घायल गोजरी को एसएमएचएस अस्पताल ले जाया गया, जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया।
माजिद श्रीनगर के पुराने शहर में जाना-पहचाना चेहरा थे। द रेजिस्टेंस फ्रंट—TRF—ने कथित रूप से हत्या की जिम्मेदारी लेते हुए उन पर पुलिस का मुखबिर होने का आरोप लगाया। लेकिन यह आरोप आतंकवादी संगठन का एकतरफा दावा था। किसी स्वतंत्र जांच या न्यायिक प्रक्रिया में माजिद के कथित मुखबिर होने की पुष्टि नहीं हुई।
2022 में जम्मू-कश्मीर की स्टेट इन्वेस्टिगेशन एजेंसी ने इस मामले में एक नाबालिग सहित TRF से जुड़े बताए गए मेहरान शल्ला और बासित राशिद डार के विरुद्ध मामला तैयार किया। किशोर न्याय बोर्ड ने नाबालिग के खिलाफ आरोप तय किए। इससे हत्या की साजिश में स्थानीय मॉड्यूल की संभावित भूमिका का संकेत मिला, लेकिन अंतिम दोषसिद्धि और प्रत्येक आरोपी की व्यक्तिगत भूमिका न्यायिक परीक्षण का विषय रही। कश्मीर लाइफ
मोहम्मद शफी डार की हत्या
उसी दिन लगभग दो घंटे बाद बटमालू की एसडी कॉलोनी में लगभग 45-50 वर्षीय मोहम्मद शफी डार पर उनके घर के पास गोलियां चलाई गईं। वह जम्मू-कश्मीर के बिजली विकास विभाग में कर्मचारी थे। अस्पताल ले जाने के बाद उनकी मृत्यु हो गई।
TRF ने डार पर भारतीय खुफिया एजेंसी के लिए काम करने का आरोप लगाया। परिवार ने इस दावे को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि वह एक साधारण सरकारी कर्मचारी थे और उनका किसी सुरक्षा एजेंसी से संबंध नहीं था।
इस प्रकार अक्टूबर की श्रृंखला की शुरुआत हिंदू या सिख नागरिकों से नहीं, बल्कि दो स्थानीय मुस्लिम नागरिकों की हत्या से हुई। दोनों को आतंकवादी प्रचार तंत्र ने बिना किसी न्यायिक प्रमाण के “मुखबिर” अथवा “सहयोगी” घोषित कर दिया। वीओए की विस्तृत रिपोर्ट
5 अक्टूबर: दो घंटे में तीन हत्याएं
5 अक्टूबर की शाम कश्मीर में तीन अलग-अलग स्थानों पर तीन नागरिकों की हत्या की गई। पीड़ितों की सामाजिक और धार्मिक पहचान अलग थी, लेकिन तीनों हत्याओं ने मिलकर पूरे प्रदेश में भय पैदा कर दिया।
माखन लाल बिंदरू: कश्मीर में डटे रहने वाले पंडित की हत्या
लगभग 65 वर्षीय माखन लाल बिंदरू श्रीनगर के प्रतिष्ठित दवा कारोबारी और बिंदरू मेडिकेट के मालिक थे। आतंकवाद के सबसे खराब दौर में जब बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़नी पड़ी, तब बिंदरू परिवार ने श्रीनगर में ही रहने का निर्णय लिया था।
5 अक्टूबर की शाम आतंकवादी श्रीनगर के इकबाल पार्क के पास उनकी दुकान में घुसे और उन्हें नजदीक से गोली मार दी। अस्पताल पहुंचाए जाने के बाद उनकी मृत्यु हो गई।
बिंदरू केवल एक कारोबारी नहीं थे। दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने और संकट के समय लोगों की मदद करने के कारण विभिन्न समुदायों में उनका सम्मान था। उनकी हत्या को इसलिए “विश्वास की हत्या” भी कहा गया, क्योंकि उन्होंने तीन दशकों की हिंसा के बावजूद अपने मुस्लिम पड़ोसियों और श्रीनगर शहर को नहीं छोड़ा था।
TRF ने कथित रूप से हत्या की जिम्मेदारी लेते हुए उन पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े होने का आरोप लगाया। परिवार और परिचितों ने इस आरोप को आतंकवादी प्रचार बताया। किसी न्यायालय ने बिंदरू के विरुद्ध ऐसे किसी आरोप की पुष्टि नहीं की थी। आतंकवादी संगठन द्वारा जारी बयान वास्तव में हत्या के बाद पीड़ित को बदनाम करके अपराध को वैचारिक औचित्य देने का प्रयास था। स्क्रॉल, वीओए
वीरेंद्र पासवान: सड़क किनारे रोजगार करने वाला गरीब प्रवासी
बिंदरू की हत्या के कुछ समय बाद बिहार के भागलपुर निवासी वीरेंद्र पासवान को श्रीनगर के हवाल या लाल बाजार क्षेत्र में गोली मार दी गई। वह सड़क किनारे गोलगप्पे और भेलपुरी बेचकर पत्नी तथा छह बच्चों का पालन-पोषण करते थे।
पासवान का न तो राजनीति से संबंध था और न सुरक्षा व्यवस्था से। वह उन हजारों प्रवासियों में शामिल थे, जो मामूली कमाई के लिए कश्मीर आते हैं। उनका शव तत्काल परिवार तक नहीं पहुंच सका और उनका अंतिम संस्कार श्रीनगर में ही किया गया।
पासवान की हत्या की जिम्मेदारी के संबंध में अलग-अलग संगठनों के कथित दावे सामने आए। कुछ रिपोर्टों में इस्लामिक स्टेट विलायत-ए-हिंद का नाम आया, जबकि पुलिस ने व्यापक घटनाक्रम को TRF और लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े नेटवर्क की रणनीति माना। सार्वजनिक दावों की प्रामाणिकता और वास्तविक शूटर की पहचान को अलग-अलग देखना आवश्यक है।
मोहम्मद शफी लोन: स्थानीय टैक्सी यूनियन अध्यक्ष
तीसरी घटना उत्तरी कश्मीर के बांदीपोरा जिले के शाहगुंड-नायदखाई क्षेत्र में हुई। यहां मोहम्मद शफी लोन उर्फ सोनू की गोली मारकर हत्या कर दी गई। वह स्थानीय टैक्सी स्टैंड या टैक्सी यूनियन के अध्यक्ष थे।
TRF ने कथित रूप से उनकी हत्या की जिम्मेदारी लेते हुए उन पर सुरक्षा एजेंसियों से संबंध रखने का आरोप लगाया। पुलिस ने बाद में कहा कि लोन की हत्या में शामिल आतंकवादी इम्तियाज अहमद डार को 11 अक्टूबर को बांदीपोरा में हुई मुठभेड़ में मार दिया गया।
फिर भी पुलिस का मुठभेड़ के बाद दिया गया निष्कर्ष न्यायालय में हुई दोषसिद्धि के समान नहीं माना जा सकता। लोन के विरुद्ध लगाया गया “सहयोगी” होने का आरोप भी आतंकवादी संगठन का दावा था, प्रमाणित तथ्य नहीं।
7 अक्टूबर: स्कूल के अंदर धार्मिक पहचान के आधार पर हत्या
5 अक्टूबर की हत्याओं के केवल दो दिन बाद आतंकवादी श्रीनगर के संगम ईदगाह स्थित गवर्नमेंट बॉयज हायर सेकेंडरी स्कूल में घुस गए। विद्यालय में उस समय छात्र उपस्थित नहीं थे, लेकिन शिक्षक मौजूद थे।
प्रत्यक्षदर्शी शिक्षकों के अनुसार हमलावरों ने कर्मचारियों को एक जगह एकत्र किया और उनकी पहचान पूछी। मुस्लिम कर्मचारियों को जाने दिया गया, जबकि सिख प्रधानाचार्य सुपिंदर कौर और जम्मू निवासी हिंदू शिक्षक दीपक चंद को रोक लिया गया। दोनों को स्कूल परिसर में नजदीक से गोली मार दी गई।
इस घटना में लक्ष्य चयन स्पष्ट रूप से धार्मिक पहचान के आधार पर किया गया प्रतीत होता है। यह अक्टूबर की पूरी श्रृंखला की सबसे प्रत्यक्ष सांप्रदायिक चयन वाली घटना थी। द गार्जियन
सुपिंदर कौर
लगभग 46 वर्षीय सुपिंदर कौर श्रीनगर की निवासी और विद्यालय की प्रधानाचार्य थीं। सहकर्मियों और विद्यार्थियों में उनकी छवि अनुशासित तथा संवेदनशील शिक्षिका की थी। उनकी हत्या के बाद सिख समुदाय ने श्रीनगर में प्रदर्शन किया और सुरक्षा की मांग उठाई।
दीपक चंद
दीपक चंद जम्मू क्षेत्र के निवासी हिंदू शिक्षक थे। कुछ रिपोर्टों में उन्हें कश्मीरी पंडित कहा गया, जबकि अधिक विश्वसनीय समकालीन रिपोर्टों में उनकी पहचान जम्मू निवासी हिंदू शिक्षक के रूप में दर्ज है। इसलिए शोध की दृष्टि से उन्हें बिना अतिरिक्त प्रमाण के कश्मीरी पंडित कहना उचित नहीं होगा।
TRF ने दोनों शिक्षकों की हत्या की कथित जिम्मेदारी ली। संगठन ने अपने प्रचार में सरकारी संस्थानों तथा स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रमों में भागीदारी जैसे आरोप लगाए। लेकिन स्कूल में कार्य करना अथवा सरकारी कार्यक्रम में शामिल होना किसी नागरिक की हत्या का औचित्य नहीं हो सकता।
इस घटना ने 1989-90 के दौर की स्मृतियों को फिर जीवित कर दिया। कश्मीरी पंडित और सिख समुदायों में आशंका पैदा हुई कि चुनिंदा हत्याओं के माध्यम से एक बार फिर अल्पसंख्यकों को पलायन के लिए विवश किया जा रहा है। ह्यूमन राइट्स वॉच
16 अक्टूबर: प्रवासी श्रमिकों पर दो अलग हमले
अरविंद कुमार शाह की हत्या
16 अक्टूबर को श्रीनगर के ईदगाह क्षेत्र में बिहार के बांका जिले के निवासी अरविंद कुमार शाह को गोली मार दी गई। वह सड़क किनारे गोलगप्पे अथवा अन्य खाद्य सामग्री बेचते थे।
हमले का स्थान विशेष रूप से महत्वपूर्ण था। इसी ईदगाह क्षेत्र के विद्यालय में नौ दिन पहले सुपिंदर कौर और दीपक चंद की हत्या हुई थी। इससे पता चलता है कि आतंकवादी छोटे हथियारों और स्थानीय भौगोलिक जानकारी के सहारे राजधानी के शहरी क्षेत्रों में बार-बार वारदात करने में सक्षम थे।
सगीर अहमद की हत्या
अरविंद की हत्या के लगभग एक घंटे बाद पुलवामा जिले के लिटर क्षेत्र में उत्तर प्रदेश के सहारनपुर निवासी सगीर अहमद को गोली मार दी गई। वह बढ़ई का काम करते थे और लगभग एक वर्ष से कश्मीर में रहकर परिवार के लिए कमाई कर रहे थे। उनके परिवार में पत्नी और चार बेटियां बताई गईं।
सगीर मुस्लिम थे। उनकी हत्या यह दिखाती है कि प्रवासी श्रमिकों को लक्ष्य बनाते समय आतंकवादी केवल धर्म नहीं, बल्कि “बाहरी” होने की पहचान भी देख रहे थे। कथित रूप से यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट—ULF—ने प्रवासी श्रमिकों पर इन हमलों की जिम्मेदारी ली। सुरक्षा एजेंसियों ने ULF को भी पाकिस्तान-समर्थित पुराने आतंकवादी तंत्र का छद्म नाम माना।
पुलिस ने 20 अक्टूबर को शोपियां की मुठभेड़ में मारे गए आदिल वानी पर सगीर अहमद की हत्या में शामिल होने का आरोप लगाया। यह पुलिस का अभियानोत्तर निष्कर्ष था; इसका स्वतंत्र न्यायिक परीक्षण सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं है।
17 अक्टूबर: मजदूरों के किराये के कमरे में घुसकर हमला
16 अक्टूबर की दो हत्याओं के अगले दिन आतंकवादी कुलगाम जिले के वानपोह में बिहार के मजदूरों के किराये के कमरे में घुस गए। हमलावरों ने अंदर मौजूद तीन श्रमिकों पर गोली चला दी।
राजा ऋषिदेव और जोगिंदर ऋषिदेव की मृत्यु हो गई, जबकि चुनचुन ऋषिदेव गंभीर रूप से घायल हुए। तीनों बिहार के गरीब श्रमिक परिवारों से थे।
इस घटना में पीड़ित किसी सार्वजनिक स्थान पर अचानक मिले व्यक्ति नहीं थे। हमलावर उनके रहने के ठिकाने तक पहुंचे थे। इससे संकेत मिलता है कि आतंकवादियों को मजदूरों के निवास और दिनचर्या की जानकारी थी। यह जानकारी निगरानी, स्थानीय मुखबिरी अथवा ओवर ग्राउंड वर्कर नेटवर्क से प्राप्त हुई हो सकती थी। हालांकि किसी पूरे गांव या स्थानीय समुदाय को सहयोगी मानना तथ्यात्मक रूप से अनुचित होगा।
पुलिस ने 20 अक्टूबर को कुलगाम में लश्कर-ए-तैयबा के कथित जिला कमांडर गुलजार अहमद रेशी और उसके एक सहयोगी को मुठभेड़ में मारने के बाद दावा किया कि दोनों वानपोह में मजदूरों की हत्या में शामिल थे। एसएटीपी घटना विवरण
लक्ष्य चयन की रणनीति
अक्टूबर 2021 के पीड़ितों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है।
अल्पसंख्यक और प्रतीकात्मक व्यक्तित्व
माखन लाल बिंदरू, सुपिंदर कौर और दीपक चंद की हत्या के माध्यम से हिंदू तथा सिख समुदायों को संदेश दिया गया कि प्रतिष्ठा, स्थानीय स्वीकार्यता अथवा सरकारी नौकरी उन्हें सुरक्षित नहीं रख सकती।
बिंदरू का परिवार 1990 में घाटी छोड़कर नहीं गया था। इसलिए उनकी हत्या कश्मीरी पंडितों की वापसी की संभावना पर मनोवैज्ञानिक हमला थी।
स्थानीय मुस्लिम नागरिक
माजिद गोजरी, मोहम्मद शफी डार और मोहम्मद शफी लोन को आतंकवादी संगठनों ने कथित रूप से “मुखबिर” या “सहयोगी” बताया। आतंकवादी तंत्र में ऐसे आरोपों के लिए कोई पारदर्शी प्रमाण या निष्पक्ष सुनवाई नहीं होती। आरोप, फैसला और हत्या—तीनों आतंकवादी संगठन स्वयं करता है।
स्थानीय मुसलमानों की हत्या का उद्देश्य समाज में मौन और भय कायम करना भी था। संदेश यह था कि पुलिस, प्रशासन अथवा सामान्य सरकारी व्यवस्था से सहयोग करने का संदेह भी जानलेवा हो सकता है।
प्रवासी और असंगठित श्रमिक
वीरेंद्र पासवान, अरविंद कुमार शाह, सगीर अहमद, राजा ऋषिदेव और जोगिंदर ऋषिदेव गरीब प्रवासी श्रमिक थे। उनके पास सुरक्षा नहीं थी, वे अस्थायी कमरों में रहते थे और उनकी दिनचर्या आसानी से पहचानी जा सकती थी।
इन लोगों की हत्या से आतंकवादियों को कम संसाधनों में व्यापक प्रभाव मिला। कुछ श्रमिकों की हत्या के बाद हजारों प्रवासियों में भय फैल गया और बड़ी संख्या में लोग रेलवे तथा बस स्टेशनों की तरफ निकल पड़े।
TRF, ULF और छद्म संगठनों की भूमिका
अक्टूबर 2021 की अनेक हत्याओं की जिम्मेदारी द रेजिस्टेंस फ्रंट—TRF—ने कथित रूप से ली। भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने TRF को पाकिस्तान स्थित लश्कर-ए-तैयबा का छद्म अथवा फ्रंट संगठन बताया।
TRF जैसे नाम के उपयोग के पीछे एक संचार रणनीति भी दिखाई देती है। “लश्कर-ए-तैयबा” जैसे स्पष्ट धार्मिक नाम के बजाय “रेजिस्टेंस फ्रंट” नाम आतंकवाद को स्थानीय और राजनीतिक प्रतिरोध के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास था।
कुछ प्रवासी श्रमिकों की हत्याओं के दावे यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट—ULF—के नाम से सामने आए। विभिन्न नामों का उपयोग निम्न उद्देश्यों से किया जा सकता था:
पाकिस्तान आधारित पुराने संगठनों से प्रत्यक्ष संबंध छिपाना।
हमलों को स्थानीय असंतोष की स्वाभाविक प्रतिक्रिया बताना।
जांच एजेंसियों को भ्रमित करना।
सोशल मीडिया पर अलग-अलग संगठनों की मौजूदगी का आभास पैदा करना।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धार्मिक आतंकवाद की पहचान से बचना।
फिर भी प्रत्येक ऑनलाइन दावे को स्वतः प्रमाणित जिम्मेदारी नहीं माना जा सकता। संगठन का दावा, पुलिस की जांच और न्यायालय का निष्कर्ष तीन अलग स्तर हैं।
हाइब्रिड आतंकवादी मॉडल
2021 की घटनाओं ने “हाइब्रिड आतंकी” शब्द को सुरक्षा विमर्श के केंद्र में ला दिया। इससे आशय ऐसे व्यक्ति से है जो किसी आतंकवादी संगठन के नियमित और घोषित सदस्य के रूप में पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज नहीं होता, लेकिन विशेष निर्देश मिलने पर पिस्तौल से हमला करता है और फिर सामान्य नागरिक जीवन में लौट जाता है।
इस मॉडल की प्रमुख विशेषताएं थीं:
छोटे हथियार, विशेषकर पिस्तौल का उपयोग।
एक या दो हमलावरों द्वारा नजदीक से गोलीबारी।
लक्ष्य की पहले से निगरानी।
सीसीटीवी से बचने के लिए संकरी गलियों या भीड़भाड़ वाले क्षेत्र का चयन।
सीमित अवधि के लिए हथियार उपलब्ध कराना।
हमले के बाद हथियार किसी दूसरे व्यक्ति को सौंप देना।
सोशल मीडिया चैनलों पर पीड़ित को “मुखबिर” या “एजेंट” घोषित करना।
इस व्यवस्था में स्थानीय लॉजिस्टिक नेटवर्क की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। किसी को लक्ष्य की पहचान करनी होती है, किसी को हथियार पहुंचाना और किसी को भागने का रास्ता उपलब्ध कराना होता है। लेकिन प्रत्येक मामले में इस पूरी श्रृंखला का सार्वजनिक और न्यायिक रूप से स्थापित विवरण उपलब्ध नहीं है।
प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों की प्रतिक्रिया
हत्याओं के बाद जम्मू-कश्मीर पुलिस, सेना, सीआरपीएफ, एसआईए और एनआईए ने व्यापक अभियान चलाया। सैकड़ों लोगों को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया गया। कुछ रिपोर्टों में यह संख्या 700 से अधिक और कुछ में लगभग 900 बताई गई।
राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने व्यापक आतंकी साजिश से जुड़े मामलों में छापे मारे और TRF सहित विभिन्न छद्म संगठनों के संदिग्ध सहयोगियों की जांच की। बिंदरू, वीरेंद्र पासवान, सुपिंदर कौर, दीपक चंद और बिहार के मजदूरों की हत्याओं के पीछे की बड़ी साजिश की जांच राष्ट्रीय स्तर की एजेंसियों तक पहुंची।
पुलिस और सुरक्षाबलों ने कई मुठभेड़ों में ऐसे आतंकवादियों को मारने का दावा किया, जो इन हत्याओं में शामिल थे। इनमें इम्तियाज अहमद डार, आदिल वानी, गुलजार अहमद रेशी और बाद में मेहरान शल्ला जैसे नाम शामिल किए गए। लेकिन प्रत्येक मामले में अंतिम न्यायिक निष्कर्ष समान रूप से सार्वजनिक नहीं है।
17 अक्टूबर के वानपोह हमले के बाद हजारों प्रवासी मजदूरों को पुलिस और सुरक्षा शिविरों अथवा अन्य सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया। सैकड़ों मजदूर घाटी छोड़कर अपने राज्यों के लिए रवाना हो गए। वीओए/रॉयटर्स
लगभग चार हजार कश्मीरी पंडित तथा हिंदू कर्मचारियों को छुट्टी या सुरक्षित स्थानों पर रहने की सुविधा दिए जाने की खबरें भी सामने आईं। इससे स्पष्ट हुआ कि हत्याओं ने कश्मीरी पंडित पुनर्वास कार्यक्रम की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रभाव डाला।
सुरक्षा व्यवस्था की कमियां
अक्टूबर की घटनाओं ने कई कमजोरियां उजागर कीं:
आतंकवादी श्रीनगर जैसे अत्यधिक सुरक्षित माने जाने वाले शहर में बार-बार हमला करने में सफल रहे।
स्कूल के भीतर धार्मिक पहचान पूछकर हत्या किए जाने से संस्थागत सुरक्षा की कमी सामने आई।
प्रवासी श्रमिकों के आवास और संख्या का कोई समुचित सुरक्षा डेटाबेस नहीं था।
छोटे हथियार और सीमित सदस्य वाले मॉड्यूल पारंपरिक आतंकवाद-रोधी निगरानी से बच रहे थे।
सोशल मीडिया पर हत्या की जिम्मेदारी और धमकी संबंधी सामग्री तेजी से प्रसारित हुई।
पुलिस के पास घोषित आतंकवादियों की सूची थी, लेकिन बिना पुराने रिकॉर्ड वाले हाइब्रिड हमलावरों की पहचान कठिन थी।
कमजोर नागरिकों की सुरक्षा के लिए कार्रवाई अधिकतर हत्याओं के बाद हुई।
दूसरी ओर, पूरे कश्मीर में प्रत्येक दुकान, विद्यालय, रेहड़ी और मजदूर के कमरे पर स्थायी सुरक्षा उपलब्ध कराना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं था। इसलिए समाधान केवल सुरक्षाकर्मी बढ़ाना नहीं, बल्कि स्थानीय खुफिया तंत्र, हथियार आपूर्ति नेटवर्क और डिजिटल प्रचार व्यवस्था को तोड़ना भी था।
राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया
जम्मू-कश्मीर के लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने हत्याओं की निंदा की। नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीडीपी, भाजपा, कांग्रेस और अन्य दलों ने नागरिकों की हत्या को कश्मीर के हितों के विरुद्ध बताया।
सरकार समर्थक पक्ष ने कहा कि आतंकवादी अनुच्छेद 370 हटने के बाद विकास, निवेश और सामान्य स्थिति की वापसी को रोकना चाहते थे। आलोचकों ने प्रश्न उठाया कि भारी सुरक्षा उपस्थिति के बावजूद निहत्थे नागरिकों की सुरक्षा क्यों नहीं हो सकी।
सिख समुदाय ने सुपिंदर कौर की हत्या के बाद प्रदर्शन किए। कश्मीरी पंडित संगठनों ने सुरक्षित आवास और घाटी से बाहर तैनाती की मांग उठाई। प्रवासी मजदूरों के पलायन से स्थानीय निर्माण, कृषि, फल कारोबार और छोटे व्यवसाय प्रभावित हुए।
महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि स्थानीय कश्मीरी समाज के बड़े हिस्से और विभिन्न धार्मिक-राजनीतिक संगठनों ने हत्याओं की सार्वजनिक निंदा की। आतंकवादियों को मिलने वाले संभावित स्थानीय लॉजिस्टिक सहयोग को पूरी कश्मीरी आबादी की मानसिकता मानना तथ्यहीन और सामाजिक रूप से खतरनाक होगा।
स्थापित तथ्य और विवादित दावे
व्यापक रूप से स्थापित तथ्य
2 से 17 अक्टूबर के बीच 11 नागरिक लक्षित हमलों में मारे गए।
पीड़ितों में हिंदू, मुस्लिम और सिख तीनों समुदायों के लोग थे।
पांच अंतरराज्यीय प्रवासी श्रमिकों की हत्या हुई।
स्कूल में सुपिंदर कौर और दीपक चंद को पहचान के आधार पर अलग किया गया।
अधिकांश हमलों में पिस्तौल और नजदीक से गोलीबारी की पद्धति अपनाई गई।
हत्याओं के बाद प्रवासी मजदूरों और अल्पसंख्यक कर्मचारियों में पलायन का भय पैदा हुआ।
TRF ने कई घटनाओं की कथित जिम्मेदारी ली।
सुरक्षा एजेंसियों के आरोप
TRF लश्कर-ए-तैयबा का छद्म संगठन था।
कुछ हत्याओं में हाइब्रिड आतंकवादियों का इस्तेमाल किया गया।
स्थानीय मॉड्यूल ने लक्ष्यों की पहचान और हथियार उपलब्ध कराने में मदद की।
मारे गए कुछ आतंकवादी अक्टूबर की नागरिक हत्याओं में शामिल थे।
हमलों का उद्देश्य सामान्य स्थिति, पुनर्वास और आर्थिक गतिविधियों को बाधित करना था।
जिन बिंदुओं पर सावधानी आवश्यक है
आतंकवादी संगठनों द्वारा पीड़ितों को “मुखबिर” बताना प्रमाणित तथ्य नहीं है।
ऑनलाइन जिम्मेदारी का दावा वास्तविक शूटर की पहचान का अंतिम प्रमाण नहीं होता।
मुठभेड़ में मारे गए व्यक्ति पर पुलिस का आरोप न्यायालय की दोषसिद्धि के बराबर नहीं है।
प्रत्येक हमले में पाकिस्तान स्थित हैंडलर अथवा स्थानीय OGW की विशिष्ट भूमिका सार्वजनिक रूप से सिद्ध नहीं हुई।
पूरी स्थानीय आबादी को आतंकवादियों का समर्थक बताना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा।
निष्कर्ष
अक्टूबर 2021 की हत्याओं की श्रृंखला जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद की रणनीतिक दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत थी। बड़े सैन्य हमलों के बजाय पिस्तौलधारी छोटे मॉड्यूलों ने ऐसे नागरिक चुने जिनकी हत्या का मनोवैज्ञानिक प्रभाव उनकी संख्या से कहीं अधिक हो सकता था।
माखन लाल बिंदरू की हत्या ने घाटी में रह गए कश्मीरी पंडितों को भयभीत किया। सुपिंदर कौर और दीपक चंद की स्कूल में हत्या ने धार्मिक पहचान को लक्ष्य बनाया। वीरेंद्र पासवान, अरविंद शाह, सगीर अहमद, राजा ऋषिदेव और जोगिंदर ऋषिदेव की हत्याओं ने प्रवासी श्रमिकों को संदेश दिया कि हिंदू या मुस्लिम होना नहीं, “बाहरी” होना ही उन्हें निशाना बनाने के लिए पर्याप्त है। माजिद गोजरी, मोहम्मद शफी डार और मोहम्मद शफी लोन की हत्या के माध्यम से स्थानीय मुसलमानों को भी आतंकवादी आदेशों से विचलित न होने की चेतावनी दी गई।
इस प्रकार अक्टूबर 2021 का आतंक केवल सांप्रदायिक हिंसा, केवल प्रवासी-विरोध या केवल कथित मुखबिरों की हत्या नहीं था। यह इन तीनों रणनीतियों का संयोजन था—अल्पसंख्यकों में पलायन का भय, प्रवासी श्रम व्यवस्था में भगदड़ और स्थानीय समाज में आतंकवादी अनुशासन कायम करना।
इन घटनाओं ने यह भी सिद्ध किया कि लक्षित आतंकवाद में मृतकों की संख्या अकेला पैमाना नहीं होती। ग्यारह नागरिकों की हत्या ने हजारों कर्मचारियों, मजदूरों, कारोबारियों और परिवारों के जीवन तथा निर्णयों को प्रभावित किया। आतंकवाद का वास्तविक उद्देश्य भी यही था—कुछ लोगों की हत्या करके पूरे समाज के व्यवहार को नियंत्रित करना।