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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–011 · अध्याय 18

गगनगीर सुरंग कर्मचारी हमला, 2024

श्रमिक शिविर, स्थानीय डॉक्टर और Z-Morh सुरंग परियोजना पर बहुस्तरीय प्रहार

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskसंरचना संशोधित · 2 अगस्त 2026

श्रमिक शिविर, स्थानीय डॉक्टर और Z-Morh सुरंग परियोजना पर बहुस्तरीय प्रहार

20 अक्टूबर 2024 की शाम मध्य कश्मीर के गांदरबल जिले में आतंकवादियों ने जेड-मोड़—Z-Morh सुरंग परियोजना से जुड़े कर्मचारियों के शिविर पर हमला कर दिया। स्वचालित हथियारों से की गई अंधाधुंध गोलीबारी में परियोजना के डॉक्टर सहित सात कर्मचारियों की मृत्यु हुई और कम-से-कम पांच लोग घायल हुए।

यह हमला केवल प्रवासी मजदूरों की टारगेट किलिंग नहीं था। मृतकों में कश्मीर के एक स्थानीय डॉक्टर, जम्मू के सुरंग डिजाइनर, इंजीनियर, सुरक्षा प्रबंधक और बिहार, पंजाब तथा मध्य प्रदेश से आए कर्मचारी शामिल थे। हमले का लक्ष्य उस मानवीय कार्यबल को भयभीत करना था जो श्रीनगर-सोनमर्ग मार्ग पर सामरिक और आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण सुरंग तैयार कर रहा था।

जांच और बाद की सुरक्षा कार्रवाइयों में जम्मू-कश्मीर पुलिस ने दो लश्कर आतंकवादियों—जुनैद अहमद भट और सुलेमान—को इस हमले से जोड़ा। दोनों अलग-अलग मुठभेड़ों में मारे गए। फिर भी हमले की पूरी साजिश, स्थानीय रेकी और आतंकवादियों को आश्रय देने वाले नेटवर्क से जुड़े कई प्रश्न सार्वजनिक रिकॉर्ड में अनुत्तरित हैं।

घटना के प्रमुख तथ्य

हमले से पहले क्या हुआ?

रविवार, 20 अक्टूबर को परियोजना में काम करने वाले कर्मचारी दिनभर का कार्य समाप्त करके गगनगीर स्थित अपने शिविर में लौटे थे। शिविर में मजदूरों के रहने के कमरे, भोजनालय, अधिकारियों और तकनीकी कर्मचारियों के आवास तथा कंपनी के वाहन मौजूद थे।

उपलब्ध CCTV फुटेज और जांच से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, दो आतंकवादी अंधेरा होने के बाद शिविर में दाखिल हुए। उनके पास आधुनिक स्वचालित हथियार थे। इंडियन एक्सप्रेस की CCTV आधारित रिपोर्ट के अनुसार, एक हमलावर के पास अमेरिकी निर्मित M4 कार्बाइन और दूसरे के पास AK-47 जैसी असॉल्ट राइफल थी।

आतंकवादी लगभग सात मिनट तक शिविर के भीतर रहे। इतने कम समय में उन्होंने:

शिविर के विभिन्न हिस्सों में गोलीबारी की;

भोजनालय और कर्मचारी आवास को निशाना बनाया;

भागने का प्रयास कर रहे लोगों पर गोलियां चलाईं;

कंपनी के वाहनों को क्षतिग्रस्त या आग के हवाले किया;

पास के जंगल और पहाड़ी क्षेत्र की तरफ भाग निकले।

कुछ प्रत्यक्षदर्शियों ने गोलीबारी लगभग 15 मिनट तक सुनाई देने की बात कही। समय में यह अंतर संभवतः शिविर के अलग-अलग हिस्सों में मौजूद कर्मचारियों के अनुभव के कारण है। CCTV में हमलावरों की सक्रिय उपस्थिति लगभग सात मिनट बताई गई, जबकि दूर से सुनी गई गोलियों की कुल अवधि अधिक हो सकती है।

शिविर की बिजली काटने का दावा

प्रारंभिक रिपोर्टों में कहा गया कि हमले से पहले शिविर की बिजली काट दी गई थी। कर्मचारियों के भोजन करने के दौरान अंधेरे का लाभ उठाकर गोलीबारी शुरू की गई। हालांकि यह स्पष्ट नहीं हुआ कि बिजली आतंकवादियों ने जानबूझकर काटी, किसी स्थानीय सहयोगी ने ऐसा किया अथवा गोलीबारी में बिजली व्यवस्था प्रभावित हुई।

यदि यह प्रमाणित होता है कि बिजली पहले से काटी गई थी, तो इससे निम्न संकेत मिलते हैं:

हमलावरों ने शिविर की विद्युत व्यवस्था की रेकी की थी।

उन्हें कर्मचारियों के भोजन और लौटने के समय की जानकारी थी।

शिविर की आंतरिक संरचना से परिचित किसी व्यक्ति ने मदद की हो सकती है।

हमला आकस्मिक लक्ष्य चुनकर नहीं, बल्कि पहले से तैयार योजना के अनुसार किया गया।

इस दावे को अंतिम तथ्य के बजाय जांच के एक महत्वपूर्ण बिंदु के रूप में दर्ज किया जाना चाहिए।

हमले में मारे गए सात कर्मचारी

पीड़ितों की यह सूची विभिन्न प्रशासनिक और मीडिया रिकॉर्ड में समान रूप से सामने आई। कुछ रिपोर्टों में नामों की वर्तनी—फहीम नासिर/नजीर, हनीफ/हनीफ और कलीम/अब्दुल कलीम—में मामूली अंतर है। विस्तृत नामावली गगनगीर जांच संबंधी रिपोर्ट में दर्ज है।

डॉ. शाहनवाज: स्थानीय कश्मीरी भी बने निशाना

डॉ. शाहनवाज अहमद डार मध्य कश्मीर के बडगाम जिले के नायदगाम गांव के निवासी थे। वह परियोजना में कार्यरत कर्मचारियों को चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराते थे। आतंकवादियों ने उन्हें भी अन्य कर्मचारियों के साथ गोली मार दी।

उनकी हत्या इस दावे को गलत साबित करती है कि हमला केवल “बाहरी लोगों” पर किया गया था। लक्ष्य परियोजना का पूरा कार्यबल था—चाहे कर्मचारी कश्मीर का निवासी हो, जम्मू का या देश के किसी दूसरे राज्य का।

डॉ. शाहनवाज की अंतिम यात्रा में बड़ी संख्या में स्थानीय लोग शामिल हुए। इसने यह भी दिखाया कि आतंकवादियों की हिंसा के विरुद्ध कश्मीरी समाज के भीतर व्यापक शोक और आक्रोश था। उनके अंतिम संस्कार की तस्वीरों तथा ग्रामीणों की प्रतिक्रिया को एसोसिएटेड प्रेस की रिपोर्ट में दर्ज किया गया।

तकनीकी विशेषज्ञों को भी बनाया गया निशाना

हमले में मारे गए लोग केवल दिहाड़ी मजदूर नहीं थे। उनमें सुरंग डिजाइनर, मैकेनिकल मैनेजर और सुरक्षा प्रबंधक जैसे विशेषज्ञ शामिल थे।

शशि भूषण अबरोल

जम्मू निवासी शशि भूषण अबरोल परियोजना में डिजाइन संबंधी जिम्मेदारी संभाल रहे थे। उनका परिवार दीपावली पर घर लौटने की प्रतीक्षा कर रहा था। हमले ने एक अनुभवी तकनीकी कर्मचारी और परिवार के कमाने वाले सदस्य की जान ले ली।

अनिल कुमार शुक्ला

मध्य प्रदेश निवासी अनिल कुमार शुक्ला मैकेनिकल मैनेजर बताए गए। सुरंग निर्माण में वेंटिलेशन, भारी मशीनरी, ड्रिलिंग और विद्युत-यांत्रिक प्रणालियों का संचालन मैकेनिकल टीम की जिम्मेदारी होती है।

फहीम नासिर

बिहार निवासी फहीम नासिर परियोजना में सुरक्षा प्रबंधक थे। निर्माण स्थल पर दुर्घटना-रोधी व्यवस्था, सुरक्षा उपकरण और कार्यस्थल प्रोटोकॉल की निगरानी उनकी जिम्मेदारी थी। आतंकी हमला उस सामान्य औद्योगिक सुरक्षा सीमा से बाहर था जिसके लिए परियोजना की सुरक्षा टीम तैयार रहती है।

इससे स्पष्ट है कि आतंकवादी केवल कुछ मजदूरों को मारकर भागने नहीं आए थे। उन्होंने परियोजना की संचालन क्षमता से जुड़े विभिन्न स्तरों के कर्मचारियों को निशाना बनाया।

घायल कर्मचारी

प्रारंभिक रिपोर्टों में घायलों की संख्या चार, पांच और छह तक बताई गई। बाद में अधिकांश आधिकारिक और विश्वसनीय समाचार रिपोर्टों में कम-से-कम पांच घायलों की पुष्टि हुई। गंभीर घायलों को श्रीनगर के शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज—SKIMS भेजा गया।

मृतक और घायल कर्मचारियों की संख्या में प्रारंभिक अंतर का कारण यह था कि:

दो कर्मचारियों की घटनास्थल पर मृत्यु हुई;

कुछ ने अस्पताल ले जाते समय दम तोड़ा;

डॉ. शाहनवाज सहित गंभीर घायलों की बाद में मृत्यु हुई;

दूरस्थ क्षेत्र होने के कारण शुरुआती सूचनाएं अधूरी थीं।

अंतिम मृतक संख्या सात पर स्थिर हुई।

क्या यह प्रवासी मजदूरों की टारगेट किलिंग थी?

यह हमला प्रवासी और गैर-कश्मीरी कर्मचारियों को निशाना बनाने की व्यापक आतंकवादी रणनीति का हिस्सा था, लेकिन इसे केवल “प्रवासी मजदूर हमला” कहना अधूरा होगा।

हमले की तीन अलग-अलग लक्षित परतें थीं:

1. गैर-स्थानीय कर्मचारी

बिहार, पंजाब और मध्य प्रदेश के कर्मचारियों की हत्या करके आतंकवादी बाहरी श्रमिकों में भय पैदा करना चाहते थे। आतंकवादी संगठनों को पता है कि कश्मीर की अनेक निर्माण, कृषि, ईंट-भट्ठा और औद्योगिक गतिविधियां प्रवासी मजदूरों पर निर्भर हैं।

2. स्थानीय कश्मीरी कर्मचारी

डॉ. शाहनवाज की हत्या यह संदेश देने का प्रयास थी कि राष्ट्रीय बुनियादी ढांचा परियोजनाओं से जुड़ने वाला स्थानीय व्यक्ति भी सुरक्षित नहीं है।

3. सामरिक परियोजना

सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य Z-Morh सुरंग थी। कर्मचारियों की हत्या करके आतंकवादी परियोजना को धीमा करना, श्रमिकों को काम छोड़ने पर मजबूर करना और निर्माण कंपनियों की लागत तथा सुरक्षा संबंधी चिंता बढ़ाना चाहते थे।

इसलिए गगनगीर को “रणनीतिक परियोजना के कार्यबल पर लक्षित सामूहिक आतंकी हमला” कहना अधिक उपयुक्त है।

Z-Morh सुरंग इतनी महत्वपूर्ण क्यों थी?

गगनगीर और सोनमर्ग के बीच बनी सुरंग को प्रारंभ में Z-Morh Tunnel और उद्घाटन के समय सोनमर्ग टनल कहा गया। यह श्रीनगर-लेह राष्ट्रीय राजमार्ग पर लगभग 8,650 फुट की ऊंचाई पर स्थित है।

परियोजना की प्रमुख विशेषताएं:

मुख्य सुरंग की लंबाई लगभग 6.4 किलोमीटर;

निकास सुरंग और संपर्क मार्गों सहित परियोजना लगभग 12 किलोमीटर;

लागत 2,700 करोड़ रुपये से अधिक;

हिमस्खलन और भूस्खलन वाले मार्ग को बाईपास करना;

श्रीनगर और सोनमर्ग के बीच सालभर संपर्क;

सोनमर्ग को शीतकालीन पर्यटन के लिए खोलना;

स्थानीय रोजगार और व्यापार को बढ़ावा;

भविष्य में जोजिला सुरंग के साथ लद्दाख तक बेहतर संपर्क;

सेना और सुरक्षा बलों की रसद व्यवस्था को सहायता।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 13 जनवरी 2025 को इस सुरंग का उद्घाटन किया। प्रधानमंत्री कार्यालय के परियोजना विवरण के अनुसार, सोनमर्ग सुरंग और निर्माणाधीन जोजिला सुरंग मिलकर श्रीनगर घाटी से लद्दाख की सड़क कनेक्टिविटी तथा रक्षा रसद को बेहतर करेंगी।

यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि अकेली Z-Morh सुरंग पूरे श्रीनगर-लेह मार्ग को सालभर खुला नहीं करती। इस उद्देश्य की पूर्णता जोजिला सुरंग के निर्माण के बाद ही संभव होगी। फिर भी सोनमर्ग तक निर्बाध पहुंच की दृष्टि से यह महत्वपूर्ण चरण है।

सुरंग के कर्मचारी आतंकवादियों के लिए प्रतीकात्मक लक्ष्य क्यों बने?

बुनियादी ढांचा परियोजनाएं आतंकवादी संगठनों के लिए कई कारणों से प्रतीकात्मक लक्ष्य होती हैं।

राज्य की स्थायी मौजूदगी

सड़क, सुरंग, रेल और संचार परियोजनाएं दूरस्थ क्षेत्रों को स्थायी रूप से प्रशासन और अर्थव्यवस्था से जोड़ती हैं। यह आतंकवादियों की अलगाव और अस्थिरता बनाए रखने की रणनीति के विपरीत है।

सेना की रसद क्षमता

श्रीनगर-लेह मार्ग लद्दाख और सीमावर्ती क्षेत्रों की दृष्टि से सामरिक महत्व रखता है। बेहतर संपर्क से सैनिकों, हथियारों, खाद्य सामग्री और अन्य आवश्यक संसाधनों का परिवहन सुगम होता है।

आर्थिक सामान्य स्थिति

सोनमर्ग को सालभर खुला रखने का अर्थ है अधिक पर्यटक, होटल, परिवहन, रोजगार और स्थानीय व्यापार। आतंकवाद का तंत्र आर्थिक सामान्य स्थिति और नागरिक आवाजाही को अपने प्रभाव के लिए चुनौती मानता है।

गैर-स्थानीय कार्यबल

देश के अलग-अलग राज्यों के लोगों का कश्मीर में काम करना राष्ट्रीय आर्थिक एकीकरण का प्रतीक है। आतंकवादी इन लोगों की हत्या करके श्रमिकों और कंपनियों को घाटी छोड़ने के लिए डराना चाहते हैं।

हमलावरों की पहचान: CCTV ने दिया पहला सुराग

शिविर में लगे CCTV कैमरों में दो आतंकवादी कैद हुए। फुटेज में वे हथियार लेकर परिसर में घूमते दिखाई दिए। जांचकर्ताओं का अनुमान था कि हमलावरों को:

शिविर के प्रवेश और निकास मार्गों की जानकारी थी;

कर्मचारियों के भोजन के समय का पता था;

भवनों और आवासीय हिस्सों की स्थिति मालूम थी;

निकटवर्ती जंगल में भागने का सुरक्षित मार्ग पता था।

पुलिस ने प्रारंभ में दोनों को विदेशी आतंकवादी बताया था। बाद की जांच और अभियानों में एक स्थानीय लश्कर आतंकवादी जुनैद अहमद भट तथा पाकिस्तान से आए सुलेमान को घटना से जोड़ा गया। इस कारण प्रारंभिक “दो विदेशी आतंकवादियों” वाली सूचना को अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए।

जुनैद अहमद भट कौन था?

जम्मू-कश्मीर पुलिस के अनुसार, जुनैद अहमद भट लश्कर-ए-तैयबा से जुड़ा ‘A श्रेणी’ का आतंकवादी था। वह दक्षिण कश्मीर के कुलगाम क्षेत्र का निवासी बताया गया। CCTV फुटेज और अन्य खुफिया सूचनाओं के आधार पर पुलिस ने उसे गगनगीर हमले में शामिल आतंकवादी के रूप में चिह्नित किया।

3 दिसंबर 2024 को श्रीनगर के बाहरी हिस्से में स्थित दाचीगाम-हरवान वन क्षेत्र में पुलिस और सुरक्षा बलों ने तलाशी अभियान चलाया। मुठभेड़ में जुनैद भट मारा गया।

कश्मीर पुलिस ने सार्वजनिक रूप से कहा कि वह गगनगीर में नागरिकों की हत्या और अन्य आतंकी घटनाओं में शामिल था। उसके मारे जाने का विवरण पुलिस सूचना पर आधारित रिपोर्ट में मिलता है।

हालांकि मुठभेड़ में मृत्यु के कारण उसके विरुद्ध न्यायालय में मुकदमा नहीं चल सका। इसलिए उसकी भूमिका पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों के निष्कर्ष के रूप में दर्ज की जानी चाहिए, न कि न्यायिक दोषसिद्धि के रूप में।

दूसरा नाम: सुलेमान

जुलाई 2025 में गगनगीर हमले से जुड़ी एक और महत्वपूर्ण जानकारी सार्वजनिक हुई। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में बताया कि लश्कर का ‘A श्रेणी’ कमांडर सुलेमान गगनगीर और अप्रैल 2025 के पहलगाम हमले में शामिल था।

सुलेमान को 28 जुलाई 2025 को दाचीगाम के महादेव क्षेत्र में चलाए गए संयुक्त अभियान—ऑपरेशन महादेव—में मारा गया। उसके साथ हमजा अफगानी और जिब्रान नामक दो अन्य लश्कर आतंकवादी भी मारे गए।

गृह मंत्री द्वारा संसद में दी गई जानकारी के अनुसार:

सुलेमान लश्कर-ए-तैयबा का कमांडर था;

वह गगनगीर हमले में शामिल था;

बाद में उसने पहलगाम के बैसरन में हुए नरसंहार में भी भूमिका निभाई;

ऑपरेशन महादेव में सेना, CRPF और जम्मू-कश्मीर पुलिस ने उसे मार गिराया।

इस संबंध में पत्र सूचना कार्यालय के आधिकारिक संसदीय विवरण को सबसे ठोस सार्वजनिक सरकारी स्रोत माना जा सकता है।

इससे यह संकेत मिलता है कि गगनगीर हमला किसी एक स्थानीय मॉड्यूल की स्वतंत्र कार्रवाई नहीं, बल्कि लश्कर के स्थानीय और सीमा पार से आए आतंकवादियों के संयुक्त नेटवर्क का हिस्सा था।

लश्कर और TRF का संबंध

हमले की जिम्मेदारी द रेजिस्टेंस फ्रंट—TRF के नाम से सामने आने की खबरें आईं। भारतीय सुरक्षा एजेंसियां TRF को पाकिस्तान स्थित लश्कर-ए-तैयबा का छद्म संगठन मानती हैं।

TRF जैसे नामों का उपयोग निम्न कारणों से किया जाता है:

लश्कर की प्रत्यक्ष पहचान छिपाना;

पाकिस्तान से संबंधों को अस्पष्ट करना;

आतंकवाद को स्थानीय आंदोलन के रूप में प्रस्तुत करना;

शिक्षित स्थानीय युवाओं की भर्ती आसान बनाना;

सोशल मीडिया पर अपेक्षाकृत आधुनिक राजनीतिक भाषा का प्रयोग करना;

अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और वित्तीय निगरानी से बचना।

गगनगीर हमले में जुनैद भट और सुलेमान को लश्कर से जोड़ने वाली पुलिस तथा संसदीय जानकारी TRF-लश्कर संबंध वाली जांच-थ्योरी को मजबूत करती है। फिर भी सोशल मीडिया पर जिम्मेदारी लेने वाला संदेश अपने आप में न्यायिक प्रमाण नहीं है।

क्या स्थानीय रेकी और सहयोग के बिना हमला संभव था?

हमलावरों का शिविर में प्रवेश, सात मिनट में अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचना और सुरक्षित जंगल की ओर भाग जाना बताता है कि उन्हें स्थल की जानकारी थी।

जांच की दृष्टि से संभावित स्थानीय सहयोग के प्रश्न हैं:

  • कर्मचारियों के शिविर लौटने का समय किसने बताया?
  • भोजनालय और अधिकारियों के आवास की जानकारी कैसे मिली?
  • क्या हमलावर पहले मजदूर या स्थानीय निवासी बनकर परिसर के आसपास आए थे?
  • निकटवर्ती जंगल में उनका ठिकाना कहां था?
  • उन्हें भोजन, कपड़े और संचार उपकरण किसने दिए?
  • क्या किसी स्थानीय OGW ने बिजली और सुरक्षा व्यवस्था की जानकारी दी?
  • क्या परियोजना से जुड़े किसी अस्थायी कर्मचारी की पहचान का दुरुपयोग हुआ?
  • हमलावरों ने क्षेत्र से निकलने के लिए कौन-सा मार्ग अपनाया?

हमले के बाद पुलिस ने 40 से अधिक संदिग्धों से पूछताछ की। NIA की टीम ने भी घटनास्थल का निरीक्षण कर साक्ष्य जुटाने में सहायता की। लेकिन सार्वजनिक रिकॉर्ड में गगनगीर साजिश के स्थानीय मददगारों के विरुद्ध रियासी हमले जैसी स्पष्ट गिरफ्तारी और आरोपपत्र की जानकारी उपलब्ध नहीं है।

यही इस मामले की जांच का सबसे बड़ा अधूरा पक्ष है।

सुरक्षा में चूक कहां हुई?

एक रणनीतिक परियोजना के कर्मचारी शिविर में आतंकवादियों का प्रवेश गंभीर सुरक्षा प्रश्न खड़े करता है।

परिधि सुरक्षा

यदि CCTV कैमरे हमलावरों को रिकॉर्ड कर सकते थे, तो उनकी गतिविधि देखकर तत्काल अलार्म क्यों नहीं बजा? क्या कैमरों की लाइव निगरानी हो रही थी या वे केवल रिकॉर्डिंग कर रहे थे?

सशस्त्र सुरक्षा

सामरिक परियोजना होने के बावजूद शिविर में पर्याप्त सशस्त्र सुरक्षा क्यों नहीं थी? निर्माण कंपनी की औद्योगिक सुरक्षा और आतंकवाद-रोधी सुरक्षा दो अलग व्यवस्थाएं हैं।

श्रमिकों की पहचान

शिविर में स्थानीय और गैर-स्थानीय कर्मचारियों का आवागमन रहता था। क्या आगंतुकों, आपूर्तिकर्ताओं और अस्थायी मजदूरों का सत्यापन पर्याप्त था?

खुफिया सूचना

क्या गांदरबल और सोनमर्ग क्षेत्र में आतंकवादियों की मौजूदगी से संबंधित कोई पूर्व सूचना थी? यदि थी, तो परियोजना सुरक्षा को किस स्तर तक सतर्क किया गया?

प्रतिक्रिया का समय

कुछ कर्मचारियों ने दावा किया कि सुरक्षा बलों को शिविर तक पहुंचने में काफी समय लगा। दुर्गम भौगोलिक स्थिति को देखते हुए आसपास स्थायी त्वरित प्रतिक्रिया दल की आवश्यकता थी।

सुरक्षित कमरे

उच्च जोखिम वाले निर्माण शिविरों में बंकर या सुरक्षित आश्रय की व्यवस्था क्यों नहीं थी? गोलीबारी की स्थिति में कर्मचारियों के पास छिपने का कोई निर्धारित स्थान नहीं था।

हमले का राजनीतिक संदर्भ

गगनगीर हमला जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव के बाद नई निर्वाचित सरकार के गठन के तुरंत बाद हुआ। उमर अब्दुल्ला ने 16 अक्टूबर 2024 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी और चार दिन बाद यह हमला हो गया।

समय के कारण कई राजनीतिक व्याख्याएं सामने आईं:

आतंकवादी नई सरकार के सामने सुरक्षा चुनौती खड़ी करना चाहते थे;

चुनाव में लोगों की भागीदारी और राजनीतिक प्रक्रिया को कमजोर करना उद्देश्य था;

केंद्र और निर्वाचित प्रदेश सरकार के बीच सुरक्षा जिम्मेदारी को लेकर भ्रम पैदा करना था;

विकास और सामान्य स्थिति के दावों पर हमला करना था।

इन व्याख्याओं में तर्क है, लेकिन किसी एक राजनीतिक घटना को हमले का निर्णायक कारण मानने के लिए सार्वजनिक जांच रिकॉर्ड में पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।

व्यापक निंदा: सांप्रदायिक विभाजन का प्रयास विफल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी, उपराज्यपाल मनोज सिन्हा और मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला सहित विभिन्न दलों के नेताओं ने हमले की निंदा की।

कश्मीर के अनेक क्षेत्रों में स्थानीय लोगों, व्यापारिक संगठनों और नागरिक समूहों ने प्रदर्शन और कैंडल मार्च किए। डॉ. शाहनवाज की हत्या ने विशेष रूप से स्थानीय समाज को झकझोरा।

यह प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण थी क्योंकि आतंकवादी रणनीति का एक उद्देश्य स्थानीय और गैर-स्थानीय लोगों के बीच अविश्वास उत्पन्न करना था। जब कश्मीरी समाज ने मृत प्रवासी कर्मचारियों के प्रति एकजुटता दिखाई, तो आतंकवादियों का सांप्रदायिक और क्षेत्रीय विभाजन का उद्देश्य काफी हद तक विफल हुआ।

मुआवजा और पीड़ित परिवारों की सहायता

जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने प्रत्येक मृतक के निकट संबंधी को सुरक्षा संबंधी व्यय—SRE योजना के अंतर्गत छह लाख रुपये देने का निर्णय किया। APCO Infratech को प्रत्येक मृत कर्मचारी के परिवार को तत्काल 15 लाख रुपये देने के निर्देश दिए गए।

इसके अतिरिक्त:

घायलों को दो-दो लाख रुपये की अनुग्रह सहायता;

कंपनी की कॉरपोरेट व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा योजना के अंतर्गत भुगतान;

नियमित कर्मचारियों के परिवारों को पांच वर्ष के सकल वेतन के बराबर बीमा सहायता;

संविदा और तीसरे पक्ष के कर्मचारियों को कर्मचारी क्षतिपूर्ति योजना का लाभ

देने की घोषणा की गई। इसका विवरण प्रशासनिक सहायता संबंधी रिपोर्ट में उपलब्ध है।

घोषित राशि और वास्तव में प्रत्येक परिवार को प्राप्त अंतिम भुगतान अलग विषय हैं। इसका सत्यापन पीड़ित परिवारों, कंपनी और राज्य प्रशासन के अभिलेखों से किया जाना आवश्यक है।

क्या आतंकवादी परियोजना रोक पाए?

नहीं। हमले के बाद कुछ समय के लिए भय और सुरक्षा संबंधी अनिश्चितता अवश्य रही। कई कर्मचारियों ने परियोजना छोड़ने पर विचार किया, लेकिन निर्माण पूरी तरह बंद नहीं हुआ।

13 जनवरी 2025 को, हमले के लगभग तीन महीने बाद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोनमर्ग सुरंग का उद्घाटन किया। उन्होंने निर्माण कर्मचारियों से मुलाकात भी की।

सुरंग का उद्घाटन तीन कारणों से महत्वपूर्ण था:

आतंकवादी हमला परियोजना को स्थायी रूप से रोक नहीं पाया।

मृत कर्मचारियों के अधूरे काम को उनके सहयोगियों ने पूरा किया।

जिस परियोजना को भय का प्रतीक बनाने का प्रयास हुआ था, वह संपर्क और विकास का प्रतीक बन गई।

फिर भी परियोजना पूरी होना सुरक्षा संबंधी विफलताओं को समाप्त नहीं करता। कर्मचारियों की हत्या की जिम्मेदारी तय करना और पूरे समर्थन नेटवर्क का खुलासा करना उतना ही आवश्यक है।

स्थापित तथ्य, एजेंसियों के दावे और अनसुलझे प्रश्न

व्यापक रूप से स्थापित तथ्य

20 अक्टूबर 2024 को गगनगीर कर्मचारी शिविर पर हमला हुआ।

हमले में सात कर्मचारी मारे गए और कम-से-कम पांच घायल हुए।

मृतकों में एक स्थानीय कश्मीरी डॉक्टर और छह अन्य कर्मचारी थे।

CCTV में दो हथियारबंद हमलावर दिखाई दिए।

M4 कार्बाइन और AK श्रेणी के हथियार इस्तेमाल किए गए।

लक्ष्य Z-Morh सुरंग परियोजना का कार्यबल था।

परियोजना पूरी हुई और जनवरी 2025 में सुरंग का उद्घाटन हुआ।

पुलिस और सरकार के निष्कर्ष

जुनैद अहमद भट गगनगीर हमले में शामिल था।

वह लश्कर-ए-तैयबा का ‘A श्रेणी’ आतंकवादी था।

जुनैद 3 दिसंबर 2024 को दाचीगाम मुठभेड़ में मारा गया।

लश्कर कमांडर सुलेमान भी गगनगीर हमले में शामिल था।

सुलेमान 28 जुलाई 2025 को ऑपरेशन महादेव में मारा गया।

TRF लश्कर के छद्म नेटवर्क के रूप में काम करता था।

अनसुलझे अथवा अधूरे प्रश्न

  • हमले की अंतिम योजना किसने बनाई?
  • क्या जुनैद और सुलेमान ही CCTV में दिखाई देने वाले दोनों हमलावर थे?
  • शिविर की बिजली किसने और कैसे काटी?
  • कर्मचारियों की दिनचर्या की जानकारी आतंकवादियों तक किसने पहुंचाई?
  • हमलावरों को स्थानीय स्तर पर भोजन और आश्रय किसने दिया?
  • क्या परियोजना के भीतर से कोई संवेदनशील सूचना लीक हुई?
  • 40 से अधिक लोगों से हुई पूछताछ का अंतिम परिणाम क्या निकला?
  • क्या किसी OGW के विरुद्ध आरोपपत्र दाखिल हुआ?
  • हमले में पाकिस्तान स्थित किस हैंडलर की भूमिका थी?
  • पुलिस जांच की अंतिम रिपोर्ट में कितने लोगों या संगठनों को आरोपी बनाया गया?
  • प्रत्यक्ष हमलावरों के मारे जाने के बाद आपराधिक साजिश के मुकदमे की वर्तमान स्थिति क्या है?

निष्कर्ष: मजदूरों की हत्या के पीछे विकास और संपर्क रोकने की रणनीति

गगनगीर हमला जम्मू-कश्मीर में टारगेट किलिंग के दायरे को विस्तार देने वाली घटना थी। इसमें व्यक्ति की धार्मिक पहचान से अधिक उसका पेशा, परियोजना और राष्ट्रीय बुनियादी ढांचे से संबंध लक्ष्य बना।

आतंकवादियों ने उन लोगों की हत्या की जो पहाड़ काटकर सुरंग बना रहे थे—डॉक्टर, डिजाइनर, इंजीनियर, सुरक्षा प्रबंधक और साधारण कर्मचारी। इनमें कश्मीरी मुसलमान भी था, जम्मू का हिंदू भी, पंजाब का सिख भी और बिहार तथा मध्य प्रदेश से आए कर्मचारी भी। यह तथ्य बताता है कि आतंकवाद का वास्तविक विभाजन धर्म या क्षेत्र का नहीं, बल्कि हिंसा और नागरिक जीवन के बीच था।

Z-Morh सुरंग का उद्देश्य हिमस्खलन प्रभावित मार्ग को बाईपास करना, सोनमर्ग को सालभर जोड़ना और भविष्य में लद्दाख तक संपर्क तथा रक्षा रसद को मजबूत करना था। कर्मचारियों की सामूहिक हत्या के माध्यम से आतंकवादियों ने तीन संदेश देने की कोशिश की—बाहरी लोग कश्मीर में काम न करें, स्थानीय लोग राष्ट्रीय परियोजनाओं से न जुड़ें और निर्माण कंपनियां रणनीतिक क्षेत्रों से पीछे हट जाएं।

जुनैद अहमद भट और सुलेमान का सुरक्षा अभियानों में मारा जाना प्रत्यक्ष हमलावरों के विरुद्ध महत्वपूर्ण कार्रवाई थी। लेकिन आतंकवाद के नेटवर्क का मूल्यांकन केवल बंदूक चलाने वालों तक सीमित नहीं हो सकता। गगनगीर जैसे हमले के लिए लक्ष्य की पहचान, शिविर की रेकी, कर्मचारियों की दिनचर्या, जंगल में आश्रय, भोजन, हथियार और सुरक्षित निकास की व्यवस्था आवश्यक थी।

गगनगीर मामले की पूरी सच्चाई तभी सामने आएगी जब इस अदृश्य लॉजिस्टिक नेटवर्क और सीमा पार कमान की प्रत्येक कड़ी सार्वजनिक एवं न्यायिक रूप से स्थापित होगी। सुरंग बन जाना आतंकवाद की हार का प्रतीक है, लेकिन मारे गए सात कर्मचारियों के लिए पूर्ण न्याय साजिश की हर परत उजागर होने पर ही माना जा सकेगा।