नादिमार्ग नरसंहार, 2003
सुरक्षा के बीच हमला, वर्दी का छल, पलायन की नई लहर और दो दशक बाद पुनर्जीवित मुकदमा
सुरक्षा के बीच हमला, वर्दी का छल, पलायन की नई लहर और दो दशक बाद पुनर्जीवित मुकदमा
नादिमार्ग कहां है?
नादिमार्ग दक्षिण कश्मीर का एक छोटा गांव है, जो घटना के समय पुलवामा जिले के शोपियां उप-जिले में आता था। वर्ष 2007 में शोपियां अलग जिला बना, जिसके बाद नादिमार्ग उसका हिस्सा हो गया। गांव से शोपियां जिला मुख्यालय की दूरी लगभग 22 किलोमीटर है। सेब के बागानों और कृषि भूमि से घिरे इस गांव में पंडित तथा मुस्लिम परिवार लंबे समय से साथ रहते थे।
1989–90 से पहले नादिमार्ग में लगभग 40 से 50 कश्मीरी पंडित परिवार बताए जाते हैं। आतंकवाद, धमकियों और लक्षित हत्याओं के कारण इनमें से अधिकांश परिवार घाटी से चले गए। लेकिन 11 परिवारों के 52 सदस्य नादिमार्ग में ही टिके रहे। इन परिवारों के पास सीमित भूमि, छोटी सरकारी नौकरियां और स्थानीय आजीविका थी। आर्थिक परिस्थितियां, पुश्तैनी संपत्ति और पड़ोसियों से पुराने संबंध उनके रुकने के प्रमुख कारण थे।
इन परिवारों का नादिमार्ग में बने रहना राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण था। सरकार उन्हें इस प्रमाण के रूप में प्रस्तुत कर सकती थी कि घाटी में पंडितों की उपस्थिति समाप्त नहीं हुई और विस्थापित परिवारों की वापसी संभव है। यही कारण है कि उन पर हुआ हमला केवल एक गांव की घटना नहीं रहा; उसने पूरी पुनर्वास नीति पर प्रश्नचिह्न लगा दिया।
हमले की रात क्या हुआ?
23 मार्च 2003 की रात लगभग 11 बजे से मध्यरात्रि के बीच आठ से दस हथियारबंद लोग नादिमार्ग पहुंचे। उन्होंने भारतीय सेना जैसी लड़ाकू वर्दी पहन रखी थी। सैन्य वर्दी के कारण ग्रामीणों को आरंभ में लगा कि कोई तलाशी अथवा सुरक्षा जांच हो रही है।
समकालीन रिपोर्टों के अनुसार हमलावर पंडित परिवारों के घरों तक पहुंचे और लोगों को बाहर आने का आदेश दिया। कुछ परिवारों को लगा कि सुरक्षाबल गांव में आतंकवादियों की तलाश कर रहे हैं। पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को घरों से निकालकर मंदिर तथा एक पुराने चिनार के पास एकत्र किया गया।
इसके बाद 24 लोगों को पंक्ति में खड़ा करके बहुत करीब से स्वचालित हथियारों से गोलियां चलाई गईं। मृतकों में 11 पुरुष, 11 महिलाएं और दो छोटे बच्चे थे। सबसे बुजुर्ग पीड़ित की आयु लगभग 65 वर्ष और सबसे छोटे बच्चे की उम्र लगभग दो वर्ष थी।
समकालीन द गार्डियन रिपोर्ट में जीवित बचे रमेश कुमार का बयान दर्ज है। उन्होंने बताया कि वर्दीधारी लोगों ने दरवाजे खटखटाकर ग्रामीणों को बाहर निकाला। रमेश किसी तरह घर में छिप गए और एक छेद से लोगों को पंक्ति में खड़ा होते देखा। गोली चलने की आवाज आने पर उन्होंने आंखें बंद कर लीं। हमले में उनके माता-पिता मारे गए। कुछ ग्रामीण घरों में छिपकर अथवा पास के जंगल की ओर भागकर बचने में सफल रहे। द गार्डियन की 24 मार्च 2003 की समकालीन रिपोर्ट
हत्या के बाद हमलावर अंधेरे और आसपास के बागानों का लाभ उठाकर निकल गए। हमला इतने कम समय में और इतनी योजनाबद्ध तरीके से हुआ कि किसी प्रभावी प्रतिरोध की संभावना नहीं बची।
क्या कोई घायल हुआ?
नादिमार्ग मामले में प्रमुख स्रोत 24 लोगों की घटनास्थल पर मृत्यु दर्ज करते हैं। कुछ लोग हमलावरों से छिपकर या भागकर बचे, लेकिन अलग से घायलों की कोई सर्वमान्य संख्या उपलब्ध नहीं है।
हमले के समय नादिमार्ग में रह रहे 11 पंडित परिवारों की कुल संख्या 52 थी। इनमें से 24 की हत्या हुई और शेष 28 लोगों को घटना के बाद सुरक्षित स्थानों तथा जम्मू के शिविरों में भेजा गया। इसलिए शोध रिकॉर्ड में आंकड़े इस प्रकार लिखना अधिक उचित है:
24 मृतक; 28 अन्य ग्रामीण जीवित बचे और विस्थापित किए गए; घायलों की पृथक पुष्ट संख्या उपलब्ध नहीं।
पुलिस सुरक्षा के बावजूद हमला कैसे हुआ?
नादिमार्ग के पंडित परिवारों की सुरक्षा के लिए जम्मू-कश्मीर पुलिस के सात जवान तैनात थे। हमला होने के बाद पुलिस ने प्रारंभिक रूप से कहा कि आतंकवादियों ने सुरक्षाकर्मियों को काबू में करके उनके हथियार छीन लिए थे।
ग्रामीणों और पीड़ित परिवारों ने पुलिस दल की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए। उनका आरोप था कि सुरक्षाकर्मियों ने हमलावरों का प्रभावी प्रतिरोध नहीं किया। तत्कालीन अधिकारियों ने सातों पुलिसकर्मियों के आचरण की जांच शुरू की। बाद में उनके खिलाफ पुलिस कानून की धारा 30 के अंतर्गत कर्तव्य निर्वहन में लापरवाही के आरोप लगाए गए।
यहां तीन बातें अलग रखना आवश्यक है:
आतंकवादियों ने पुलिसकर्मियों को निहत्था किया—पुलिस का प्रारंभिक दावा;
पुलिसकर्मियों ने पर्याप्त प्रतिरोध नहीं किया—ग्रामीणों और अभियोजन का आरोप;
पुलिसकर्मी आतंकवादी साजिश का हिस्सा थे—इसका कोई अंतिम न्यायिक प्रमाण उपलब्ध नहीं।
सात पुलिसकर्मियों के खिलाफ आरोप कर्तव्य में लापरवाही के थे, नरसंहार की सक्रिय साजिश में शामिल होने के नहीं। फिर भी हथियारबंद हमलावरों का संरक्षित बस्ती में प्रवेश, सुरक्षाकर्मियों को निष्क्रिय करना और बिना प्रतिरोध निकल जाना एक गंभीर संस्थागत सुरक्षा विफलता थी।
सैन्य वर्दी का फिर इस्तेमाल
वंधामा और छत्तीसिंहपोरा की तरह नादिमार्ग में भी हमलावरों ने सैन्य वर्दी का इस्तेमाल किया। यह समानता लक्षित नरसंहारों की एक स्पष्ट पद्धति दर्शाती है।
सैन्य वर्दी से हमलावरों को कई लाभ मिले:
ग्रामीणों ने तत्काल दरवाजे खोल दिए;
सुरक्षा जांच के बहाने लोगों को एक स्थान पर एकत्र करना संभव हुआ;
हमलावरों को गांव में घूमते देखकर आरंभिक संदेह नहीं हुआ;
घटना के बाद हमलावरों की वास्तविक पहचान को लेकर भ्रम पैदा हुआ;
सुरक्षाबलों की विश्वसनीयता को मनोवैज्ञानिक नुकसान पहुंचा।
यह रणनीति बताती है कि हमलावरों ने केवल हथियारों पर भरोसा नहीं किया, बल्कि राज्य की वैध सुरक्षा पहचान को अपने अपराध का आवरण बनाया।
क्या हमलावरों को स्थानीय जानकारी मिली थी?
नादिमार्ग के पंडित परिवार एक अलग समूह में रहते थे। हमलावरों को उनके घरों, मंदिर, पुलिस चौकी, प्रवेश मार्गों और आसपास के बागानों की जानकारी थी। उन्होंने केवल पंडित घरों को निशाना बनाया और पुलिस सुरक्षा को पहले निष्क्रिय किया।
इससे हमले से पहले रेकी और स्थानीय स्तर की जानकारी की संभावना मजबूत होती है। यह सूचना निम्न स्रोतों से मिल सकती थी:
पहले से क्षेत्र में सक्रिय आतंकवादी;
स्थानीय ओवरग्राउंड नेटवर्क;
हमले से पहले गांव की गुप्त निगरानी;
आसपास के मार्गों से परिचित गाइड;
पूर्व में गांव आ चुके आतंकवादी।
लेकिन उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड किसी विशिष्ट स्थानीय व्यक्ति को सूचना देने, शरण उपलब्ध कराने या रास्ता दिखाने का दोषी सिद्ध नहीं करता। इसलिए “स्थानीय सहयोग की संभावना” और “स्थानीय सहयोग का प्रमाण”—दोनों में अंतर रखना आवश्यक है।
पूरे मुस्लिम गांव अथवा स्थानीय समुदाय को सामूहिक रूप से जिम्मेदार ठहराना न तथ्यसंगत है और न न्यायोचित। घटना के बाद स्थानीय मुस्लिम परिवारों ने भी हत्याओं की निंदा की। हमले में संलिप्त किसी संभावित स्थानीय नेटवर्क की पहचान करना पुलिस जांच का काम था, जो अंतिम न्यायिक निष्कर्ष तक नहीं पहुंच सका।
हमले का राजनीतिक समय
नादिमार्ग नरसंहार ऐसे समय हुआ जब जम्मू-कश्मीर की सुरक्षा स्थिति में सुधार के दावे किए जा रहे थे। वर्ष 2002 के विधानसभा चुनाव के बाद पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी और कांग्रेस की गठबंधन सरकार बनी थी। मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने “हीलिंग टच” नीति तथा विस्थापित कश्मीरी पंडितों की वापसी के प्रयासों पर जोर दिया था।
सरकार पंडितों की घाटी वापसी के लिए योजनाएं बना रही थी। नादिमार्ग में टिके परिवार इस संभावना का जीवित उदाहरण थे। नरसंहार ने निम्न संदेश दिए:
घाटी में बचे पंडित सुरक्षित नहीं हैं;
सरकारी सुरक्षा व्यवस्था पर भरोसा नहीं किया जा सकता;
वापस आने वाले परिवार भी भविष्य में निशाना बन सकते हैं;
स्थानीय सामंजस्य आतंकवादी हमले से कभी भी तोड़ा जा सकता है;
सामान्य स्थिति और पुनर्वास के सरकारी दावे चुनौतीपूर्ण हैं।
कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद ने घटना को पंडितों की वापसी के सरकारी प्रयासों के लिए गंभीर झटका बताया। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने शीर्ष सुरक्षा अधिकारियों की बैठक बुलाई। उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी और मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने घटनास्थल का दौरा किया।
किस संगठन को जिम्मेदार बताया गया?
घटना के तुरंत बाद किसी एक संगठन की भूमिका पूरी तरह स्पष्ट नहीं थी। स्थानीय पुलिस अधिकारी एम.ए. अंजुम ने समकालीन मीडिया से कहा था कि जांच अभी शुरू हुई है और हमलावर संगठन की पहचान के लिए सुराग तलाशे जा रहे हैं।
बाद में जम्मू-कश्मीर पुलिस ने हमले के लिए लश्कर-ए-तैयबा और उससे जुड़े आतंकवादियों को जिम्मेदार बताया। कुछ सरकारी विवरणों में हिजबुल मुजाहिदीन का नाम भी आया। पुलिस ने पाक-अधिकृत कश्मीर के रावलकोट निवासी जिया मुस्तफा को हमले का मुख्य योजनाकार और लश्कर का जिला कमांडर बताया।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त राष्ट्र महासचिव कोफी अन्नान, अमेरिकी विदेश मंत्री कॉलिन पॉवेल, ब्रिटेन के विदेश मंत्री जैक स्ट्रॉ और यूरोपीय संघ के प्रतिनिधियों ने हमले की निंदा की। अमेरिका और ब्रिटेन ने नियंत्रण रेखा पार से होने वाली घुसपैठ रोकने पर जोर दिया।
पाकिस्तान सरकार ने भी हत्याओं की निंदा की, लेकिन भारतीय आरोपों को स्वीकार नहीं किया। ब्रिटिश संसद में अप्रैल 2003 में प्रस्तुत एक प्रस्ताव ने दोनों सरकारों द्वारा अलग-अलग पक्षों पर आरोप लगाने का उल्लेख करते हुए स्वतंत्र जांच की आवश्यकता जताई थी। ब्रिटिश संसद का समकालीन प्रस्ताव
जिया मुस्तफा की गिरफ्तारी
जम्मू-कश्मीर पुलिस ने 10 अप्रैल 2003 को जिया मुस्तफा को गिरफ्तार किया। उस समय उसकी आयु लगभग 26 वर्ष बताई गई। पुलिस महानिदेशक ए.के. सूरी ने उसे लश्कर-ए-तैयबा का जिला कमांडर और नादिमार्ग नरसंहार का मुख्य आरोपी बताया।
पुलिस का दावा था कि गिरफ्तारी के समय उसके पास एक एके राइफल, गोला-बारूद और वायरलेस सेट मिला। पूछताछ में उसने कथित रूप से स्वीकार किया कि पाकिस्तान स्थित लश्कर नेतृत्व के निर्देश पर पंडितों की हत्या की गई थी।
पुलिस ने मुस्तफा के अतिरिक्त तीन अन्य आतंकवादियों को हमले में शामिल बताया। अधिकारियों के अनुसार ये तीनों अप्रैल 2003 में कुलगाम क्षेत्र में बीएसएफ के साथ मुठभेड़ में मारे गए। उनकी कथित संलिप्तता किसी पूर्ण आपराधिक मुकदमे में परखी नहीं जा सकी।
यहां महत्वपूर्ण अंतर है:
जिया मुस्तफा पर अदालत में आरोप तय हुए;
पुलिस ने उसे मुख्य आरोपी बताया;
लेकिन उसके विरुद्ध मुकदमा अंतिम फैसले तक नहीं पहुंचा;
इसलिए उसे न्यायिक रूप से दोषी सिद्ध व्यक्ति नहीं कहा जा सकता।
आरोपपत्र और मुकदमे की शुरुआत
9 जून 2003 को पुलिस ने आरोपपत्र दाखिल किया। 1 अक्टूबर 2003 को जिया मुस्तफा और सात पुलिसकर्मियों के विरुद्ध आरोप तय हुए। मुस्तफा को हत्या और आतंकवादी साजिश से जुड़े गंभीर आरोपों का सामना करना था, जबकि पुलिसकर्मियों पर मुख्यतः कर्तव्य निर्वहन में विफलता का आरोप था।
अभियोजन ने 38 गवाहों की सूची पेश की। लेकिन नरसंहार के बाद अधिकांश पंडित परिवार जम्मू चले गए थे। वे पुरखू, मुठी और मिश्रीवाला जैसे विस्थापित शिविरों में रह रहे थे। भय, आर्थिक कठिनाइयों, यात्रा की समस्या और सुरक्षा संबंधी चिंताओं के कारण बहुत से गवाह शोपियां की अदालत में उपस्थित नहीं हुए।
जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट के 2022 के आदेश के अनुसार 38 में से केवल 13 गवाहों के बयान दर्ज हो सके। अभियोजन ने मांग की कि शेष गवाहों के बयान “कमीशन” के माध्यम से जम्मू में अथवा वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से दर्ज किए जाएं।
निचली अदालत ने इस आवेदन को विलंब से दाखिल बताते हुए अस्वीकार कर दिया और 9 फरवरी 2011 को अभियोजन साक्ष्य बंद कर दिया। इससे मुकदमा व्यावहारिक रूप से ठहर गया।
न्याय व्यवस्था की संरचनात्मक विफलता
नादिमार्ग मुकदमे की गति दिखाती है कि हिंसा से विस्थापित गवाहों के लिए सामान्य न्यायिक प्रक्रिया कितनी अनुपयुक्त थी। जिन लोगों को डर के कारण गांव छोड़ना पड़ा, उनसे अपेक्षा की गई कि वे उसी क्षेत्र की अदालत में बार-बार उपस्थित हों जहां उनके परिवार की हत्या हुई थी।
मुख्य कमियां थीं:
गवाहों के लिए पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था नहीं;
जम्मू में बयान दर्ज कराने की समय पर व्यवस्था नहीं;
वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का प्रारंभिक उपयोग नहीं;
मुकदमे की सुनवाई में वर्षों का विलंब;
गवाहों से निरंतर संपर्क और विश्वास कायम रखने में विफलता;
मुख्य आरोपी के विरुद्ध साक्ष्य समय रहते पूर्ण न कर पाना।
यह केवल तकनीकी देरी नहीं थी। मुकदमे की संरचना ने स्वयं विस्थापन को न्याय के रास्ते की बाधा बना दिया।
जिया मुस्तफा की हिरासत के दौरान मृत्यु
जिया मुस्तफा लगभग 18 वर्ष तक जेल में रहा। वर्ष 2018 में उसे श्रीनगर से जम्मू की उच्च सुरक्षा वाली कोट भलवाल जेल स्थानांतरित किया गया।
अक्टूबर 2021 में पुंछ के भाटा धूरियां वन क्षेत्र में आतंकवादियों के विरुद्ध लंबा अभियान चल रहा था। पुलिस मुस्तफा को कथित आतंकवादी ठिकाने की पहचान कराने के लिए जेल से पुंछ ले गई। 24 अक्टूबर 2021 को उसे सुरक्षाबलों के साथ जंगल में ले जाया गया।
पुलिस के अनुसार ठिकाने के पास छिपे आतंकवादियों ने गोलीबारी कर दी। इस गोलीबारी में दो पुलिसकर्मी और एक सैनिक घायल हुए तथा मुस्तफा मारा गया। पुलिस ने उसकी मृत्यु को आतंकवादियों की गोलीबारी का परिणाम बताया।
मुस्तफा की मौत के साथ नरसंहार के मुख्य और एकमात्र जीवित आतंकवादी आरोपी के विरुद्ध मुकदमे की संभावना समाप्त हो गई। उसका पक्ष कभी अंतिम रूप से परखा नहीं गया, प्रत्यक्षदर्शियों से पूरी जिरह नहीं हुई और अदालत किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंची। जिया मुस्तफा की मृत्यु और मुकदमे पर प्रभाव
उसकी मौत को कुछ पंडित संगठनों ने आतंकवादी को मिला दंड माना, लेकिन कानूनी दृष्टि से इससे न्यायिक जवाबदेही पूरी नहीं हुई। किसी आरोपी की मृत्यु अपराध की पूरी साजिश, अन्य प्रतिभागियों और स्थानीय नेटवर्क की पहचान का विकल्प नहीं हो सकती।
हाईकोर्ट ने 2022 में मामला क्यों खोला?
29 अक्टूबर 2022 को जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति विनोद चटर्जी कौल ने निचली अदालत का आदेश रद्द करते हुए मुकदमा दोबारा शुरू करने का निर्देश दिया।
हाईकोर्ट ने कहा कि आपराधिक मुकदमे का उद्देश्य केवल प्रक्रियात्मक औपचारिकता पूरी करना नहीं, बल्कि सत्य तक पहुंचना है। यदि महत्वपूर्ण गवाह विस्थापन, भय, दूरी या खर्च के कारण अदालत नहीं पहुंच सकते तो उनके बयान कमीशन अथवा वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से दर्ज किए जा सकते हैं।
अदालत ने निर्देश दिया कि:
आवश्यक गवाहों की जांच सुनिश्चित की जाए;
जरूरत पड़ने पर कमीशन जारी किया जाए;
वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का प्रयोग किया जाए;
कार्यवाही शीघ्र पूरी की जाए;
मामले की सच्चाई सामने लाने के लिए उपलब्ध सभी कानूनी उपाय अपनाए जाएं।
हाईकोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय के उन निर्णयों का भी उल्लेख किया जिनमें वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग द्वारा बयान दर्ज करना वैध माना गया है। हाईकोर्ट का 29 अक्टूबर 2022 का आदेश
मामला खुला, लेकिन अब किसके विरुद्ध?
हाईकोर्ट के आदेश से गवाहों के बयान और मामले की शेष न्यायिक प्रक्रिया दोबारा शुरू हो सकती थी। परंतु तब तक मुख्य आरोपी जिया मुस्तफा की मृत्यु हो चुकी थी और अन्य तीन कथित आतंकवादी भी पुलिस के अनुसार 2003 में मारे जा चुके थे।
इसलिए शेष कार्यवाही मुख्यतः इन प्रश्नों पर केंद्रित रह सकती है:
सात पुलिसकर्मियों की कर्तव्य में कथित लापरवाही;
हमले की परिस्थितियों का न्यायिक रिकॉर्ड;
बचे हुए गवाहों के बयान;
अन्य अज्ञात आतंकवादियों अथवा सहयोगियों की संभावित भूमिका;
पुलिस जांच की गुणवत्ता और सुरक्षा व्यवस्था की विफलता।
अगस्त 2026 तक उपलब्ध सार्वजनिक स्रोत किसी अंतिम दोषसिद्धि अथवा समापन निर्णय की पुष्टि नहीं करते। अतः यह लिखना उचित होगा कि मामला न्यायिक रूप से पुनर्जीवित हुआ, लेकिन नरसंहार के किसी अपराधी को अंतिम रूप से सजा नहीं मिली।
पलायन की अंतिम लहर
नादिमार्ग में बचे 28 पंडितों को नरसंहार के तुरंत बाद जम्मू भेज दिया गया। वे पुरखू, मुठी और मिश्रीवाला जैसे शिविरों में रहने लगे। इसके साथ गांव की संगठित पंडित उपस्थिति लगभग समाप्त हो गई।
इस प्रकार हमले ने वह परिणाम हासिल किया जिसकी आशंका वंधामा के बाद से थी—घाटी में रह गए पंडित परिवारों का अंतिम विस्थापन। खाली और जर्जर होते मकानों ने नादिमार्ग के पंडित हिस्से को वर्षों तक लगभग भुतहा बस्ती में बदल दिया।
नादिमार्ग के बाद यह संदेश गया कि:
पुराने पड़ोसी संबंध सुरक्षा की गारंटी नहीं;
पुलिस चौकी की मौजूदगी पर्याप्त नहीं;
सरकार की वापसी नीति के बीच भी सामूहिक हमला संभव;
परिवारों के साथ रहने वाले बच्चे और महिलाएं भी सुरक्षित नहीं;
न्याय मिलने में दशकों लग सकते हैं।
क्या उद्देश्य पंडितों की वापसी रोकना था?
प्रत्यक्ष आदेश या आतंकवादी संगठन के सार्वजनिक दस्तावेज के अभाव में किसी एक उद्देश्य को निर्णायक नहीं कहा जा सकता। फिर भी लक्ष्य, समय और परिणाम का संयुक्त विश्लेषण तीन संभावित उद्देश्यों की ओर संकेत करता है।
1. बचे हुए पंडितों को निकालना
नादिमार्ग में ऐसे परिवार निशाना बने जिन्होंने 13 वर्ष के आतंकवाद के बावजूद घाटी नहीं छोड़ी था। हत्या के बाद शेष सभी परिवार चले गए।
2. पुनर्वास योजना को विफल करना
नई राज्य सरकार पंडितों की वापसी और “हीलिंग टच” की बात कर रही थी। हमला इस नीति की विश्वसनीयता पर प्रत्यक्ष प्रहार था।
3. सांप्रदायिक विभाजन बढ़ाना
महिलाओं और बच्चों सहित पूरे समुदाय को निशाना बनाकर व्यापक आक्रोश उत्पन्न किया गया। ऐसी प्रतिक्रिया आतंकवादी संगठनों के लिए सामाजिक ध्रुवीकरण और राज्य-विरोधी संघर्ष को सांप्रदायिक रूप देने में सहायक हो सकती थी।
वंधामा और नादिमार्ग में समानताएं
यह समानता बताती है कि नादिमार्ग कोई अचानक हुई अनियोजित गोलीबारी नहीं थी। वह पहले इस्तेमाल की जा चुकी सामूहिक लक्षित हत्या की पद्धति का परिष्कृत रूप था।
शोध निष्कर्ष
नादिमार्ग नरसंहार के संबंध में तथ्यों को तीन श्रेणियों में रखा जाना चाहिए।
व्यापक रूप से स्थापित तथ्य: 23–24 मार्च 2003 की रात सैन्य वर्दी पहने हथियारबंद लोगों ने नादिमार्ग में 24 कश्मीरी पंडितों—11 पुरुषों, 11 महिलाओं और दो बच्चों—को घरों से निकालकर गोली मार दी। सुरक्षा के लिए सात पुलिसकर्मी तैनात थे, लेकिन हमला नहीं रोका जा सका। नरसंहार के बाद सभी जीवित पंडित परिवार गांव से चले गए।
पुलिस एवं सरकारी आरोप: हमले के लिए लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े आतंकवादियों को जिम्मेदार बताया गया। जिया मुस्तफा को मुख्य योजनाकार और लश्कर का पाकिस्तानी कमांडर बताकर गिरफ्तार किया गया। तीन अन्य कथित आतंकवादी बाद में मुठभेड़ों में मारे जाने का दावा किया गया।
न्यायिक स्थिति: जिया मुस्तफा पर आरोप तय हुए, लेकिन मुकदमा पूरा होने से पहले 2021 में उसकी मृत्यु हो गई। उसके विरुद्ध अपराध सिद्ध या असिद्ध करने वाला अंतिम फैसला नहीं हुआ। सात पुलिसकर्मियों के खिलाफ लापरवाही का मामला शेष रहा। हाईकोर्ट ने 2022 में बंद साक्ष्य दोबारा खोलकर गवाहों के बयान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग अथवा कमीशन से दर्ज करने का निर्देश दिया। अब तक किसी को नरसंहार के लिए अंतिम सजा नहीं मिली।
नादिमार्ग इस बात का प्रमाण है कि टारगेट किलिंग का प्रभाव मृतकों की संख्या तक सीमित नहीं रहता। 24 लोगों की हत्या ने 28 जीवित लोगों को विस्थापित किया, एक गांव की सदियों पुरानी जनसांख्यिकीय संरचना बदल दी, पंडितों की वापसी योजना को गंभीर आघात पहुंचाया और न्याय प्रणाली को दो दशकों तक उलझाए रखा।
इस मामले में सबसे बड़ी विफलता केवल यह नहीं कि हमला नहीं रोका गया। उससे बड़ी विफलता यह है कि जीवित मुख्य आरोपी 18 वर्ष तक हिरासत में रहने के बावजूद मुकदमे के अंतिम निर्णय तक नहीं पहुंचा। नादिमार्ग इसलिए आतंकवाद, सुरक्षा चूक, विस्थापन और विलंबित न्याय—चारों का संयुक्त अध्ययन है।