omkarchaudhary.comJOURNALIST · AUTHOR · RESEARCHEROCN Research Desk
दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–011 · अध्याय 02

1989–90: लक्षित आतंक और कश्मीरी पंडितों का पलायन

पृष्ठभूमि, चुनिंदा हत्याएं, 19 जनवरी और विस्थापन का क्रमबद्ध पुनर्निर्माण

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskप्रथम संस्करण · 1 अगस्त 2026

पृष्ठभूमि, चुनिंदा हत्याएं, 19 जनवरी और विस्थापन का क्रमबद्ध पुनर्निर्माण

2.1 प्रस्तावना

जम्मू-कश्मीर में सशस्त्र आतंकवाद का संगठित विस्तार 1988–89 में हुआ, लेकिन इसका प्रभाव केवल सुरक्षा प्रतिष्ठानों तक सीमित नहीं रहा। आतंकियों ने शीघ्र ही ऐसे नागरिकों को चुनना शुरू कर दिया जिनकी हत्या से पूरे समाज में भय उत्पन्न किया जा सकता था। इस रणनीति के शुरुआती और सबसे गंभीर शिकार कश्मीरी पंडित बने।

वकील, न्यायाधीश, सरकारी अधिकारी, पत्रकार, शिक्षक, कवि, सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिक नेता चुनकर मारे गए। हत्याओं के साथ धमकियां, पोस्टर, घोषणाएं, अफवाहें और सार्वजनिक प्रदर्शन जुड़ते गए। अल्पसंख्यक समुदाय को यह विश्वास नहीं रहा कि राज्य उसे पर्याप्त सुरक्षा दे पाएगा। परिणामस्वरूप जनवरी 1990 से घाटी से कश्मीरी पंडितों का बड़े स्तर पर पलायन प्रारंभ हुआ।

पलायन के बाद भी घाटी में रह गए पंडित सुरक्षित नहीं रहे। संग्रामपोरा, वंधामा और नादिमार्ग में हुए सामूहिक हत्याकांडों ने यह संदेश दिया कि आतंकियों की रणनीति केवल प्रभावशाली व्यक्तियों की हत्या नहीं, बल्कि घाटी में बची हुई अल्पसंख्यक उपस्थिति को भी समाप्त करना थी।

2.2 1989 से पहले की पृष्ठभूमि

कश्मीर में 1989 का आतंकवाद अचानक पैदा नहीं हुआ था। इसके पीछे कई दशकों का भारत-पाकिस्तान विवाद, अलगाववादी राजनीति, पाकिस्तान की रणनीति, प्रशासनिक असंतोष और स्थानीय राजनीतिक संकट था।

1980 के दशक में निम्न घटनाक्रम महत्वपूर्ण रहे—

जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट—JKLF की गतिविधियों में विस्तार।

पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत क्षेत्र में हथियार तथा प्रशिक्षण प्राप्त करने के आरोप।

1984 में JKLF संस्थापक मकबूल भट को फांसी।

फरवरी–मार्च 1986 में दक्षिण कश्मीर में सांप्रदायिक तनाव, मंदिरों और पंडितों की संपत्तियों पर हमले।

1987 के विधानसभा चुनावों में धांधली के आरोप।

मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट से जुड़े युवाओं के एक हिस्से का भूमिगत होना।

अफगान युद्ध समाप्त होने के बाद क्षेत्र में प्रशिक्षित लड़ाकों, हथियारों और जिहादी नेटवर्क की उपलब्धता।

जुलाई 1988 से बम विस्फोटों और सशस्त्र गतिविधियों में वृद्धि।

1987 के चुनावों को लेकर उत्पन्न असंतोष आतंकवाद के उभार का एक कारक था, लेकिन वह निहत्थे नागरिकों की हत्या का औचित्य नहीं हो सकता। राजनीतिक असंतोष और नागरिकों को चुनकर मारने के बीच स्पष्ट नैतिक तथा कानूनी अंतर है।

2.3 कश्मीरी पंडित आसान लक्ष्य क्यों बने?

कश्मीरी पंडित घाटी की कुल आबादी में बहुत छोटा अल्पसंख्यक समुदाय थे। उनका कोई सशस्त्र संगठन नहीं था और वे पूरे कश्मीर में बिखरी छोटी बस्तियों तथा मिश्रित मोहल्लों में रहते थे। उनकी प्रमुख उपस्थिति शिक्षा, प्रशासन, न्यायपालिका, चिकित्सा, संचार, प्रसारण और अन्य सरकारी सेवाओं में थी।

आतंकी संगठनों की दृष्टि में कुछ पंडितों को निम्न कारणों से निशाना बनाया गया—

भारत समर्थक राजनीतिक विचार।

सरकारी संस्थानों में भूमिका।

न्यायपालिका अथवा पुलिस से संबंध।

दूरदर्शन और सरकारी संचार व्यवस्था में काम।

आतंकवाद या अलगाववाद का सार्वजनिक विरोध।

मुखबिरी अथवा सुरक्षा बलों की सहायता का आरोप।

अल्पसंख्यक पहचान के माध्यम से व्यापक भय पैदा करने की क्षमता।

यहां महत्वपूर्ण अंतर है: कुछ पीड़ितों पर आतंकियों ने “सरकारी एजेंट” अथवा “मुखबिर” होने का आरोप लगाया, लेकिन आरोप को प्रमाणित करने की कोई न्यायिक प्रक्रिया नहीं थी। ऐसी हत्याएं किसी वैध दंड प्रक्रिया का हिस्सा नहीं, बल्कि आतंकियों द्वारा स्वयं अभियोग, निर्णय और मृत्युदंड देने की कार्रवाई थीं।

2.4 वर्ष 1989—चुनिंदा हत्याओं की शुरुआत

वर्ष 1989 में आतंकियों ने उन व्यक्तियों को प्राथमिकता से निशाना बनाया जिनकी हत्या का प्रभाव उनके परिवार से आगे पूरे कश्मीरी पंडित समुदाय और राज्य की संस्थाओं तक पहुंच सकता था। राजनीतिक, न्यायिक और सामाजिक क्षेत्र के प्रमुख चेहरों पर हुए शुरुआती हमलों ने व्यापक भय की पृष्ठभूमि तैयार की।

14 मार्च 1989—प्रभावती की हत्या

जम्मू-कश्मीर पुलिस के पुराने अभिलेखों पर आधारित विवरणों के अनुसार बडगाम के चाडूरा क्षेत्र की कश्मीरी पंडित महिला प्रभावती को श्रीनगर के हरि सिंह हाई स्ट्रीट क्षेत्र में गोली मार दी गई। हत्यारे गिरफ्तार नहीं हुए।

यह हत्या सितंबर 1989 में टीका लाल टपलू की हत्या से भी पहले हुई थी। इस कारण इसे आतंकवाद के शुरुआती दौर में किसी कश्मीरी पंडित की पहली दर्ज लक्षित हत्याओं में गिना जाता है। प्रमुख शुरुआती हत्याओं का विवरण

14 सितंबर 1989—टीका लाल टपलू

टीका लाल टपलू वरिष्ठ अधिवक्ता, भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य और कश्मीर में पार्टी के प्रमुख चेहरों में से एक थे। तीन नकाबपोश हमलावरों ने श्रीनगर के हब्बा कदल क्षेत्र में उनकी गोली मारकर हत्या कर दी।

टपलू को पहले भी धमकियां मिली थीं। उनके परिवार के अनुसार उन्हें घाटी छोड़ने की चेतावनी दी गई थी। परिवार को बाहर भेजने के बाद वे स्वयं श्रीनगर लौट आए थे। उनकी हत्या इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि—

वे सार्वजनिक रूप से पहचाने जाने वाले राजनीतिक नेता थे।

हिंदू होने के साथ भारत समर्थक राजनीति से जुड़े थे।

हत्या दिनदहाड़े और आबादी वाले क्षेत्र में हुई।

हत्यारे तत्काल पकड़ में नहीं आए।

उनकी अंतिम यात्रा में हिंदू और मुस्लिम—दोनों समुदायों के लोग शामिल हुए। यह तथ्य बताता है कि आतंकियों की हिंसा को पूरी स्थानीय मुस्लिम आबादी का समर्थन मान लेना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं होगा।

4 नवंबर 1989—न्यायमूर्ति नीलकंठ गंजू

सेवानिवृत्त न्यायाधीश नीलकंठ गंजू की श्रीनगर के हरि सिंह हाई स्ट्रीट क्षेत्र में गोली मारकर हत्या की गई। गंजू ने 1968 में पुलिस इंस्पेक्टर अमर चंद की हत्या के मामले में JKLF संस्थापक मकबूल भट को मृत्युदंड सुनाया था। बाद में यह निर्णय उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय से भी कायम रहा।

2023 में जम्मू-कश्मीर पुलिस की State Investigation Agency—SIA ने मामले की व्यापक साजिश की जांच के लिए इसे फिर से खोला। तीन दशक से अधिक समय बाद जांच दोबारा शुरू होना यह भी दर्शाता है कि शुरुआती मामलों में न्यायिक परिणति कितनी सीमित रही।

27 दिसंबर 1989—प्रेमनाथ भट

अनंतनाग के अधिवक्ता, लेखक, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता प्रेमनाथ भट की 27 दिसंबर 1989 को गोली मारकर हत्या कर दी गई। उनकी सार्वजनिक पहचान और सामाजिक प्रभाव के कारण इस हत्या ने दक्षिण कश्मीर के पंडित परिवारों में भय बढ़ाया।

इस मामले में तीन लोगों को गिरफ्तार कर TADA अदालत में मुकदमा चलाया गया, लेकिन वे साक्ष्य के अभाव में बरी हो गए। यह मामला शुरुआती हत्याओं की एक बड़ी समस्या सामने रखता है—घटना व्यापक रूप से आतंकी हत्या मानी गई, लेकिन अदालत में विशिष्ट अभियुक्तों के विरुद्ध अपराध सिद्ध नहीं हो सका।

2.5 रुबैया सईद अपहरण—आतंकियों का मनोबल बढ़ाने वाला मोड़

8 दिसंबर 1989 को तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी और चिकित्सक रुबैया सईद का श्रीनगर में JKLF आतंकियों ने अपहरण कर लिया। बदले में जेल में बंद पांच आतंकियों की रिहाई मांगी गई।

सरकार ने मांग स्वीकार की और 13 दिसंबर 1989 को पांचों को रिहा कर दिया गया। इसके बाद रुबैया सईद को छोड़ दिया गया। रिहा आतंकियों के समर्थन में सड़कों पर भीड़ और जुलूस निकले।

इस घटना का मनोवैज्ञानिक प्रभाव बहुत व्यापक था—

आतंकियों को लगा कि अपहरण से सरकार को झुकाया जा सकता है।

राज्य की शक्ति और दृढ़ता पर प्रश्न उठा।

आतंकियों के प्रति भय के साथ आकर्षण और विजय की धारणा बनी।

हथियारबंद समूहों की भर्ती तथा प्रचार को प्रोत्साहन मिला।

कश्मीरी पंडितों और दूसरे भारत समर्थक नागरिकों में असुरक्षा बढ़ी।

रुबैया सईद ने जुलाई 2022 में अदालत में यासीन मलिक की पहचान अपने अपहरणकर्ताओं में से एक के रूप में की। मामला कई दशकों तक लंबित रहा और बाद में भी इसमें कानूनी कार्रवाई जारी रही।

2.6 जनवरी 1990—राज्य व्यवस्था का संकट

1989 के अंतिम महीनों तक प्रशासनिक नियंत्रण कमजोर हो चुका था। हड़ताल, प्रदर्शन, हथियारबंद गतिविधियां, धमकियां और पुलिस पर हमले बढ़ रहे थे। राजनीतिक नेतृत्व तथा केंद्र के बीच मतभेद भी गहरा गया।

प्रमुख घटनाक्रम था—

18 जनवरी 1990: मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने इस्तीफा दिया।

19 जनवरी 1990: जगमोहन ने राज्यपाल के रूप में कार्यभार संभाला।

राज्य में राज्यपाल शासन लागू हुआ।

उसी अवधि में श्रीनगर और अन्य क्षेत्रों में बड़े प्रदर्शन तथा नारेबाजी हुई।

21 जनवरी: गॉवकदल में सुरक्षा बलों की गोलीबारी में बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों की मृत्यु हुई।

गॉवकदल की घटना पंडितों की लक्षित हत्या नहीं थी, लेकिन इसे उस समय की समग्र अराजकता और राज्य-जनता के बीच बढ़ते अविश्वास को समझने के लिए शामिल करना आवश्यक है। कश्मीर के मुस्लिम समाज के लिए यह सुरक्षा बलों की हिंसा का प्रतीक बना, जबकि पंडित समुदाय के लिए उसी समय आतंकी धमकियां और प्रशासनिक विघटन भय का कारण बन रहे थे।

दोनों समुदाय अलग-अलग प्रकार की हिंसा और असुरक्षा अनुभव कर रहे थे। एक समुदाय की पीड़ा को स्वीकार करने के लिए दूसरे की पीड़ा को नकारना आवश्यक नहीं है।

2.7 19 जनवरी 1990 की रात

कश्मीरी पंडित समुदाय 19 जनवरी को “निर्वासन दिवस” के रूप में याद करता है। पंडित परिवारों के अनेक मौखिक तथा लिखित विवरणों में कहा गया है कि उस रात मस्जिदों के लाउडस्पीकरों, सड़कों और जुलूसों से आजादी, पाकिस्तान तथा धार्मिक वर्चस्व से जुड़े नारे सुनाई दिए। कुछ स्थानों पर पंडितों के विरुद्ध धमकी भरे नारे और घोषणाएं किए जाने का भी आरोप है।

इन विवरणों के तीन स्तर हैं—

व्यापक रूप से स्थापित तथ्य

19 जनवरी की रात घाटी में बड़े प्रदर्शन और नारेबाजी हुई।

प्रशासनिक नियंत्रण कमजोर था।

आतंकियों की लक्षित हत्याएं पहले ही शुरू हो चुकी थीं।

पंडित परिवारों में अत्यधिक भय व्याप्त था।

जनवरी से मार्च के बीच पलायन तेजी से बढ़ा।

पीड़ित परिवारों के सुसंगत विवरण

रातभर लाउडस्पीकरों से घोषणाएं।

घरों पर निगरानी रखे जाने का भय।

महिलाओं की सुरक्षा को लेकर गंभीर आशंका।

धमकी भरे पत्र, पोस्टर अथवा अखबारी घोषणाएं।

पड़ोस में हथियारबंद व्यक्तियों की आवाजाही।

जिन तथ्यों की घटना-विशिष्ट पुष्टि कठिन है

प्रत्येक मस्जिद से एक जैसा संदेश दिया गया।

पूरे मुस्लिम समाज ने धमकियों में भाग लिया।

सभी पंडितों को एक ही संगठन ने लिखित आदेश देकर निकाला।

किसी एक तारीख को सभी परिवारों ने घाटी छोड़ दी।

इसलिए 19 जनवरी को एक अकेली आदेशात्मक घटना के बजाय उस बिंदु के रूप में देखना अधिक उचित है जब पहले से चल रही हत्याएं, धमकियां, प्रदर्शन, प्रशासनिक विघटन और सामूहिक भय एक साथ सामने आए।

2.8 वर्ष 1990 की प्रमुख लक्षित हत्याएं

1989 के अंत तक चुनिंदा प्रभावशाली व्यक्तियों की हत्या शुरू हो चुकी थी। 1990 में इसका विस्तार दूसरे पेशों और सामान्य नागरिकों तक हुआ।

यह सूची संपूर्ण नहीं है। इस दौरान कई शिक्षक, कर्मचारी, कारोबारी और ग्रामीण भी मारे गए, लेकिन पुराने पुलिस अभिलेखों, समाचार रिपोर्टों और सामुदायिक सूचियों में नाम तथा तारीखों को लेकर अंतर मिलता है।

सरला भट मामले में 2026 का घटनाक्रम

सरला भट हत्याकांड दशकों तक लगभग निष्क्रिय पड़ा रहा। 2025 में SIA ने जांच पुनः शुरू की। जून 2026 में SIA ने विशेष अदालत में 737 पृष्ठ का आरोपपत्र दाखिल किया, जिसमें प्रतिबंधित JKLF के तत्कालीन प्रमुख कमांडर मोहम्मद यासीन मलिक और चार सहयोगियों को मुख्य साजिशकर्ताओं के रूप में नामित किया गया।

2.9 पलायन—एक दिन नहीं, कई महीनों की प्रक्रिया

कश्मीरी पंडितों का पलायन किसी एक रात में पूरा नहीं हुआ। इसे मोटे तौर पर तीन चरणों में समझा जा सकता है।

पहला चरण: सितंबर–दिसंबर 1989

प्रभावशाली व्यक्तियों की हत्या और रुबैया सईद अपहरण के बाद कुछ परिवारों ने महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को जम्मू अथवा दिल्ली भेजना शुरू किया।

दूसरा चरण: जनवरी–मार्च 1990

यह सबसे बड़ा चरण था। 19 जनवरी की घटनाओं, प्रशासनिक विघटन, लगातार धमकियों और नई हत्याओं के बीच परिवार बसों, ट्रकों और निजी वाहनों से जम्मू जाने लगे।

अधिकांश लोगों को विश्वास था कि वे कुछ सप्ताह अथवा महीने बाद लौट आएंगे। इसलिए कई परिवार—

घरों में सामान छोड़ गए।

पड़ोसियों को चाबियां सौंप गए।

सरकारी नौकरी से औपचारिक इस्तीफा नहीं दिया।

खेत, दुकान और संपत्ति बेचने की तैयारी नहीं की।

केवल जरूरी कपड़े और दस्तावेज लेकर निकले।

तीसरा चरण: अप्रैल 1990 और उसके बाद

लासा कौल, बी.के. गंजू, सरला भट और सर्वानंद कौल प्रेमी की हत्याओं के बाद बचे हुए परिवारों का पलायन जारी रहा। ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ परिवार लंबे समय तक टिके रहे, लेकिन बाद की सामूहिक हत्याओं ने उनमें भी भय उत्पन्न किया।

2.10 कितने कश्मीरी पंडित विस्थापित हुए?

इस प्रश्न का एक ही निर्विवाद उत्तर उपलब्ध नहीं है, क्योंकि परिवारों और व्यक्तियों की गणना अलग-अलग हुई।

जम्मू-कश्मीर सरकार के Relief Office के अनुसार—

घाटी से विस्थापित 44,167 कश्मीरी प्रवासी परिवार पंजीकृत थे।

इनमें 39,782 हिंदू प्रवासी परिवार थे।

शेष में कुछ मुस्लिम और सिख परिवार भी शामिल थे।

2015 का सरकारी आंकड़ा

एक अन्य सरकारी उत्तर में लगभग 62,000 पंजीकृत कश्मीरी प्रवासी परिवार बताए गए थे—

लगभग 40,668 जम्मू में।

लगभग 19,338 दिल्ली में।

करीब 2,000 अन्य राज्यों में।

दोनों सरकारी आंकड़ों का दायरा और पंजीकरण आधार समान नहीं है। संभवतः एक सूची जम्मू-कश्मीर राहत कार्यालय के अंतर्गत दर्ज परिवारों की है, जबकि दूसरी जम्मू, दिल्ली और अन्य राज्यों की विभिन्न पंजीकरण श्रेणियों को जोड़ती है। इसलिए इन्हें परस्पर विरोधी मानने से पहले गणना-पद्धति देखना आवश्यक है।

अकादमिक अनुमान

राजनीतिक वैज्ञानिक अलेक्जेंडर इवांस ने कश्मीरी पंडित समुदाय की तत्कालीन आबादी लगभग 1.60–1.70 लाख मानते हुए लगभग 95 प्रतिशत लोगों के घाटी छोड़ने का अनुमान दिया। अन्य अध्ययनों में संख्या 90 हजार से 1.50 लाख और कुछ सामुदायिक स्रोतों में इससे अधिक बताई गई है। अलेक्जेंडर इवांस का अध्ययन

इस शोध में परिवार और व्यक्ति की संख्या अलग-अलग दी जाएगी। पंजीकृत परिवारों को निश्चित औसत परिवार आकार से गुणा करके मनमाना कुल नहीं निकाला जाएगा।

2.11 कितने कश्मीरी पंडित मारे गए?

मृतकों की संख्या भी अत्यंत विवादित है।

संख्या में अंतर के प्रमुख कारण हैं—

“पंडित” और “सभी कश्मीरी हिंदू” की अलग परिभाषा।

आतंकवाद, व्यक्तिगत अपराध और गुमशुदगी का वर्गीकरण।

1989–90 अथवा 1989–2004 जैसी अलग समयावधि।

पलायन के दौरान बीमारी या दुर्घटना से हुई मृत्यु को जोड़ना अथवा न जोड़ना।

पुराने FIR और पुलिस रिकॉर्ड का अधूरा डिजिटलीकरण।

नामों की अलग वर्तनी और दोहरी प्रविष्टियां।

अनेक मामलों में शव, FIR अथवा अंतिम जांच निष्कर्ष उपलब्ध न होना।

OCN Research की अंतिम नामवार सूची में केवल सत्यापित पीड़ित जोड़े जाएंगे। 219, 399 और 650 को एक ही स्तर के “स्थापित आंकड़े” के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाएगा।

2.12 पलायन के बाद भी नहीं रुकीं हत्याएं

घाटी में कुछ हजार कश्मीरी पंडित बने रहे। कुछ परिवारों ने पड़ोसियों पर विश्वास, भूमि और घर से लगाव, सरकारी नौकरी, आर्थिक विवशता अथवा वापसी की आशा में अपना गांव नहीं छोड़ा। बाद के नरसंहारों ने इन्हीं बचे हुए परिवारों को निशाना बनाया।

21 मार्च 1997—संग्रामपोरा

बडगाम जिले के संग्रामपोरा गांव में सात कश्मीरी पंडितों की गोली मारकर हत्या की गई। हमलावरों की अंतिम पहचान स्थापित नहीं हो सकी और पुलिस ने बाद में मामला untraced के रूप में बंद कर दिया।

घटना के बाद स्थानीय मुसलमानों ने हत्या का विरोध किया और अंतिम संस्कार में सहायता की। यह तथ्य फिर साबित करता है कि आतंकी हमलावरों और पूरी स्थानीय आबादी को एक नहीं माना जा सकता।

25 जनवरी 1998—वंधामा

गांदरबल के वंधामा गांव में आतंकियों ने 23 कश्मीरी पंडितों की हत्या की। मृतकों में महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे। हमलावर कथित रूप से सैन्य वर्दी में आए और ग्रामीणों का विश्वास जीतने के बाद गोलीबारी की।

अमेरिकी विदेश विभाग ने भी 23 कश्मीरी पंडितों की हत्या की निंदा की थी। इस हमले का संभावित उद्देश्य घाटी में रह गए पंडित परिवारों और वापसी की सोच रहे विस्थापितों को भयभीत करना था।

23 मार्च 2003—नादिमार्ग

तत्कालीन पुलवामा, अब शोपियां क्षेत्र के नादिमार्ग गांव में सैन्य वर्दी पहने हथियारबंद लोगों ने पंडित परिवारों को घरों से बाहर निकाला और 24 लोगों की हत्या कर दी—

11 पुरुष

11 महिलाएं

दो बच्चे

गांव की सुरक्षा के लिए तैनात पुलिसकर्मियों की भूमिका और अनुपस्थिति पर गंभीर प्रश्न उठे। सात पुलिसकर्मियों के आचरण की जांच की गई। नादिमार्ग की समकालीन रिपोर्ट

यह हमला उस समय हुआ जब सरकार पंडितों की वापसी की संभावनाओं पर बात कर रही थी। इसलिए इसे वापसी प्रक्रिया को विफल करने वाली रणनीतिक हत्या के रूप में भी देखा गया।

2.13 क्या स्थानीय सहयोग मिला था?

अनेक लक्षित हत्याओं में हमलावरों को पीड़ित का नाम, घर, नौकरी और दिनचर्या मालूम थी। इससे किसी स्तर की स्थानीय जानकारी मिलने की संभावना बनती है। लेकिन प्रत्येक मामले में स्थानीय सहयोग न्यायिक रूप से सिद्ध नहीं हुआ।

स्थानीय समाज की भूमिका तीन अलग रूपों में दिखाई देती है—

आतंकियों की सहायता

भय के कारण मौन

आतंकियों का विरोध करने पर स्वयं मारे जाने का भय भी था। इसलिए किसी क्षेत्र का मौन हमेशा सक्रिय समर्थन का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

पंडितों की रक्षा

कई मुस्लिम परिवारों ने पंडित पड़ोसियों को घरों में छिपाया, उनकी संपत्ति की देखभाल की, बाहर जाने में सहायता की अथवा अंतिम संस्कार में भाग लिया। कुछ लोगों ने आतंकियों का विरोध करके अपना जीवन भी जोखिम में डाला।

संपूर्ण मुस्लिम समुदाय को दोषी मानना उतना ही असत्य होगा जितना पंडितों के विरुद्ध आतंक और भय को नकारना।

2.14 जगमोहन की भूमिका—आरोप और उपलब्ध तथ्य

एक प्रचलित आरोप है कि राज्यपाल जगमोहन ने कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़ने के लिए कहा, ताकि सुरक्षा बलों को आतंकवाद-विरोधी अभियान चलाने की खुली छूट मिल सके। यह आरोप कई अलगाववादी नेताओं, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और कुछ लेखकों ने लगाया है।

दूसरा पक्ष कहता है—

लक्षित हत्याएं जगमोहन के राज्यपाल बनने से कई महीने पहले शुरू हो चुकी थीं।

टीका लाल टपलू, नीलकंठ गंजू और प्रेमनाथ भट की हत्या 1989 में हो चुकी थी।

आतंकियों की धमकियां और रुबैया प्रकरण भी जगमोहन की नियुक्ति से पहले के थे।

पंडितों के पलायन की प्रारंभिक प्रक्रिया पहले शुरू हो चुकी थी।

कोई सार्वजनिक सरकारी आदेश उपलब्ध नहीं है जिसमें समस्त पंडित समुदाय को घाटी छोड़ने को कहा गया हो।

जगमोहन ने आरोपों से इनकार किया था। उपलब्ध अभिलेख यह स्थापित नहीं करते कि उन्होंने पूरे समुदाय के निष्कासन की कोई औपचारिक योजना बनाई थी। हालांकि राज्य प्रशासन पंडितों को सुरक्षा और विश्वास देने में विफल रहा तथा कई परिवारों को बाहर जाने के लिए परिवहन और राहत उपलब्ध कराई गई। इसे किसी षड्यंत्र का निर्णायक प्रमाण मानना ऐतिहासिक रूप से पर्याप्त नहीं है।

OCN Research में निष्कर्ष यह रहेगा: आतंकी हिंसा और राज्य की सुरक्षा-विफलता पलायन के प्रमाणित प्रमुख कारण हैं; जगमोहन द्वारा संगठित निष्कासन का दावा विवादित है और उसके समर्थन में निर्णायक न्यायिक अथवा दस्तावेजी प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

2.15 नरसंहार, जातीय सफाया या जबरन पलायन?

कश्मीरी पंडित संगठन इन घटनाओं को “नरसंहार” और “जातीय सफाया” कहते हैं। इसका आधार है—

समुदाय के प्रभावशाली सदस्यों की चुनिंदा हत्या।

धार्मिक तथा राजनीतिक धमकियां।

महिलाओं के विरुद्ध हिंसा की आशंका और कुछ दर्ज मामले।

लगभग पूरे समुदाय का अपनी ऐतिहासिक भूमि से विस्थापन।

संपत्तियों पर कब्जा, आगजनी और distress sale।

वापसी करने वालों तथा घाटी में रुके लोगों पर बाद के नरसंहार।

कानूनी दृष्टि से “genocide” स्थापित करने के लिए किसी राष्ट्रीय, जातीय, नस्लीय या धार्मिक समूह को पूर्णतः अथवा आंशिक रूप से नष्ट करने की विशिष्ट मंशा प्रमाणित करनी होती है। अभी तक किसी भारतीय अथवा अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने कश्मीरी पंडित घटनाक्रम पर अंतिम genocide determination नहीं दिया है।

इसलिए शोध में तीनों स्तर स्पष्ट रहेंगे—

पीड़ित समुदाय का वर्णन: नरसंहार/जातीय सफाया।

ऐतिहासिक तथ्य: लक्षित हत्याएं, धमकियां और बड़े पैमाने पर जबरन विस्थापन।

न्यायिक स्थिति: genocide का अंतिम अदालती निर्धारण उपलब्ध नहीं।

कानूनी निर्णय की अनुपस्थिति पीड़ित समुदाय की त्रासदी को छोटा नहीं करती, लेकिन शोध में भावनात्मक, राजनीतिक और न्यायिक शब्दावली को अलग रखना आवश्यक है।

2.16 न्याय क्यों नहीं मिल सका?

अधिकांश शुरुआती मामलों में जांच और अभियोजन कमजोर रहा। प्रमुख कारण थे—

प्रशासनिक ढांचे का विघटन।

आतंकियों का प्रभाव और गवाहों में भय।

पुलिसकर्मियों तथा न्यायिक अधिकारियों पर हमले।

परिवारों का घाटी से विस्थापन।

घटना-स्थलों का अपर्याप्त संरक्षण।

पुराने साक्ष्यों का नष्ट अथवा अनुपलब्ध होना।

गवाहों और अभियुक्तों की मृत्यु।

जांच एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी।

राजनीतिक प्राथमिकताओं में परिवर्तन।

मुकदमों का दशकों तक लंबित रहना।

नीलकंठ गंजू और सरला भट जैसे मामलों का तीन दशक बाद फिर खुलना न्याय की संभावना तो पैदा करता है, लेकिन साथ ही प्रारंभिक व्यवस्था की विफलता का प्रमाण भी है।

2.17 ऐतिहासिक प्रभाव

कश्मीरी पंडितों की हत्याओं और पलायन ने जम्मू-कश्मीर को कई स्तरों पर बदल दिया—

घाटी की सदियों पुरानी बहुधार्मिक सामाजिक संरचना कमजोर हुई।

प्रशासन, शिक्षा, भाषा, साहित्य और सांस्कृतिक जीवन से एक समुदाय लगभग अनुपस्थित हो गया।

हिंदू-मुस्लिम अविश्वास बढ़ा।

विस्थापन की एक स्थायी राजनीतिक समस्या पैदा हुई।

संपत्ति, रोजगार, मंदिर और सांस्कृतिक विरासत के प्रश्न उत्पन्न हुए।

राहत शिविरों में एक नई विस्थापित पीढ़ी बड़ी हुई।

आतंकवाद को कम संसाधन में बड़े जनसांख्यिकीय परिणाम प्राप्त हुए।

वापसी का हर प्रयास सुरक्षा स्थिति से जुड़ गया।

कश्मीर का प्रश्न पूरे देश में अधिक सांप्रदायिक और भावनात्मक बन गया।

यह लक्षित आतंक की सबसे बड़ी सफलता थी—कुछ सौ हत्याओं और व्यापक धमकी के माध्यम से लगभग पूरे समुदाय को उसकी ऐतिहासिक भूमि से विस्थापित कर देना।

2.18 निष्कर्ष

1989 में शुरू हुई कश्मीरी पंडितों की लक्षित हत्याएं अलग-अलग असंबद्ध अपराध नहीं थीं। इनके लक्ष्य सावधानीपूर्वक चुने गए—राजनीतिक नेता, न्यायाधीश, अधिवक्ता, प्रसारण अधिकारी, लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता, सरकारी कर्मचारी और सामान्य परिवार। हत्या का वास्तविक संदेश जीवित बचे लोगों के लिए था।

राज्य व्यवस्था इस मनोवैज्ञानिक युद्ध को समय रहते समझने, अपराधियों को दंडित करने और अल्पसंख्यक समुदाय में सुरक्षा का विश्वास पैदा करने में विफल रही। परिणामस्वरूप जनवरी 1990 से शुरू हुआ पलायन स्थायी निर्वासन में बदल गया।

पलायन के बाद संग्रामपोरा, वंधामा और नादिमार्ग की हत्याओं ने वापसी की संभावना को और कमजोर किया। इस प्रकार कश्मीरी पंडितों का विस्थापन केवल 19 जनवरी 1990 की एक रात की घटना नहीं, बल्कि 1989 से 2003 तक फैली लक्षित हिंसा, प्रशासनिक विफलता और लंबे समय तक चले भय का परिणाम था।