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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–011 · अध्याय 19

पहलगाम–बैसरन हमला, 2025

पर्यटकों की पहचान-आधारित सामूहिक हत्या, सुरक्षा शून्य, जांच और सैन्य परिणाम

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskसंरचना संशोधित · 2 अगस्त 2026

पर्यटकों की पहचान-आधारित सामूहिक हत्या, सुरक्षा शून्य, जांच और सैन्य परिणाम

22 अप्रैल 2025 की दोपहर दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग जिले में स्थित बैसरन घाटी में तीन हथियारबंद आतंकवादियों ने पर्यटकों को उनकी धार्मिक पहचान के आधार पर अलग किया और नजदीक से गोलियां मारकर उनकी हत्या कर दी। हमले में 26 लोगों की मृत्यु हुई—24 भारतीय पर्यटक, एक नेपाली नागरिक और एक स्थानीय कश्मीरी पोनी संचालक। कम-से-कम 17 लोग घायल हुए; कुछ बाद के स्रोतों में यह संख्या 20 तक बताई गई।

मृतकों में भारतीय नौसेना का अधिकारी, वायुसेना का कॉरपोरल, इंटेलिजेंस ब्यूरो का अधिकारी, सरकारी कर्मचारी, कारोबारी, इंजीनियर और परिवारों के साथ छुट्टियां मनाने आए नागरिक शामिल थे। स्थानीय कश्मीरी पोनी संचालक सैयद आदिल हुसैन शाह भी मारा गया, जिसने कथित रूप से आतंकवादियों का विरोध कर पर्यटकों को बचाने का प्रयास किया था।

यह हमला केवल सामूहिक गोलीबारी नहीं था। NIA के दिसंबर 2025 के आरोपपत्र के अनुसार, आतंकवादियों ने पीड़ितों की धार्मिक पहचान की व्यवस्थित जांच की। जो कलमा नहीं पढ़ पाए अथवा जिन्होंने स्वयं को गैर-मुस्लिम बताया, उन्हें नजदीक से गोली मारी गई। आतंकवादियों ने महिलाओं और बच्चों के सामने पुरुषों की हत्या की और कुछ जीवित बचे लोगों से कहा कि वे भारत सरकार को जाकर बताएं कि वहां क्या हुआ।

पहलगाम हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान के साथ सिंधु जल संधि को स्थगित रखने, अटारी सीमा चौकी बंद करने और पाकिस्तानी नागरिकों की वीजा सुविधा समाप्त करने जैसे कदम उठाए। 7 मई 2025 को भारत ने पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में स्थित नौ आतंकी ठिकानों के विरुद्ध ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया। इसके लगभग तीन महीने बाद ऑपरेशन महादेव में बैसरन के तीनों प्रत्यक्ष हमलावर मारे गए।

जुलाई 2026 तक NIA लश्कर प्रमुख हाफिज सईद, पाकिस्तान स्थित हैंडलर सज्जाद जट्ट, तीन मारे गए आतंकवादियों, दो स्थानीय मददगारों तथा लश्कर-ए-तैयबा और TRF को आरोपित कर चुकी थी।

घटना के प्रमुख तथ्य

बैसरन घाटी: सुंदरता के बीच सुरक्षा का शून्य

बैसरन पहलगाम शहर से लगभग पांच से सात किलोमीटर दूर पहाड़ों और घने देवदार के जंगलों से घिरा घास का मैदान है। पर्यटकों के बीच यह स्थान “मिनी स्विट्जरलैंड” के नाम से लोकप्रिय था। यहां सीधे सड़क नहीं पहुंचती। पर्यटकों को पैदल, पोनी या स्थानीय साधनों से वहां जाना पड़ता था।

घाटी की भौगोलिक स्थिति आतंकवादियों के लिए अनुकूल थी:

चारों तरफ घना जंगल;

सड़क संपर्क का अभाव;

पैदल और पोनी से ही पहुंच;

मोबाइल और संचार की सीमित सुविधा;

पर्यटकों की बड़ी भीड़;

सुरक्षा बलों की स्थायी तैनाती नहीं;

प्रवेश और निकास के सीमित रास्ते;

हमले के बाद जंगल में छिपने की सुविधा।

पर्यटन सीजन के कारण 22 अप्रैल को वहां बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे। लेकिन घटनास्थल पर पुलिस, CRPF या अन्य सुरक्षा बल की कोई स्थायी सशस्त्र टुकड़ी नहीं थी।

एक दिन पहले स्थानीय ढोक में पहुंचे आतंकवादी

NIA के आरोपपत्र के अनुसार, तीनों आतंकवादी 21 अप्रैल 2025 की शाम बैसरन के पास परवेज अहमद की ढोक—पहाड़ी झोपड़ी—के निकट पहुंचे थे।

दो स्थानीय लोगों परवेज अहमद और उसके रिश्तेदार बशीर अहमद जोठर पर आरोप है कि उन्होंने आतंकवादियों को:

झोपड़ी में आश्रय दिया;

भोजन और रोटियां उपलब्ध कराईं;

हथियार छिपाने में सहायता की;

कंबल, तिरपाल, बर्तन और मसाले दिए;

आसपास के सुरक्षा शिविरों की जानकारी दी;

अमरनाथ यात्रा और सुरक्षा बलों की आवाजाही से जुड़े प्रश्नों का उत्तर दिया।

आरोपपत्र के अनुसार, आतंकवादियों ने परवेज को तीन हजार रुपये भी दिए। वे कई घंटे वहां रुके और लगभग रात 10 बजे आगे निकल गए।

NIA ने आरोप लगाया कि परवेज और बशीर ने आतंकवादियों को पहचान लेने के बावजूद पुलिस अथवा सुरक्षा बलों को सूचना नहीं दी। अगले दिन दोनों ने बैसरन के आसपास आतंकवादियों को देखा, फिर भी पर्यटकों या स्थानीय पोनी संचालकों को सचेत नहीं किया।

ये आरोप न्यायालय में विचाराधीन हैं। दोनों आरोपियों को दोषी मानने का अंतिम अधिकार अदालत का है।

22 अप्रैल की सुबह: हमले से पहले रेकी

NIA की जांच के अनुसार, 22 अप्रैल की सुबह तीनों आतंकवादी बैसरन पार्क के बाहर पहुंचे। उन्होंने:

पेड़ के नीचे बैठकर भोजन किया;

पर्यटकों की संख्या और आवाजाही देखी;

मैदान के प्रवेश और निकास मार्गों का निरीक्षण किया;

कंबलों की सहायता से अपनी गतिविधियां छिपाईं;

तीन अलग-अलग स्थानों पर मोर्चा लिया;

ऐसे फायरिंग क्षेत्र बनाए जिनसे पर्यटक बीच के खुले मैदान में फंस जाएं।

NIA ने इसे एक प्रकार का “एनक्लोज्ड किल जोन” बताया—ऐसा घिरा हुआ क्षेत्र जिसमें लोग आसानी से भाग न सकें।

सुलेमान के पास M4 कार्बाइन और सिर पर लगा GoPro कैमरा था। अन्य दो आतंकवादियों के पास AK श्रेणी की राइफलें थीं। जांच में मिले डिजिटल और बैलिस्टिक साक्ष्यों के अनुसार, वे पाकिस्तान स्थित हैंडलर सज्जाद जट्ट के संपर्क में थे।

दोपहर 2:23 बजे: हत्या का क्रम शुरू

NIA के दिसंबर 2025 के आरोपपत्र के अनुसार, हमला लगभग दोपहर 2:23 बजे शुरू हुआ। तीनों आतंकवादियों ने मैदान में अलग-अलग स्थानों से पर्यटकों को घेर लिया।

प्रारंभिक गोलीबारी के बाद लोग भागने लगे। कुछ पर्यटक प्रवेश द्वार की तरफ दौड़े, कुछ पेड़ों और अस्थायी दुकानों के पीछे छिपे। आतंकवादियों ने भागते लोगों को रोककर उनके नाम और धर्म पूछे।

प्रत्यक्षदर्शियों और NIA के अनुसार:

पुरुष पर्यटकों को महिलाओं और बच्चों से अलग किया गया;

कुछ से कलमा पढ़ने को कहा गया;

कई लोगों से नाम और धर्म पूछा गया;

गैर-मुस्लिम पाए गए पुरुषों को घुटनों के बल बैठाया गया;

उन्हें पत्नी और बच्चों के सामने गोली मारी गई;

भागकर पेड़ों के पीछे छिपे लोगों को खोजकर गोली मारी गई;

हमलावरों ने निकलते समय भी गोलियां चलाईं;

जंगल की ओर जाते हुए कथित रूप से हवाई अथवा “उत्सवपूर्ण” फायरिंग की।

धर्म पहचानने के लिए कपड़े उतरवाने अथवा खतना जांचने की बात भी कुछ प्रत्यक्षदर्शी और मीडिया रिपोर्टों में सामने आई। लेकिन प्रत्येक पीड़ित के मामले में यह तरीका अपनाया गया था, इसकी स्वतंत्र और समान पुष्टि नहीं है। अतः इसे सभी मृतकों पर लागू निश्चित तथ्य के बजाय कुछ गवाहियों में वर्णित क्रूरता के रूप में दर्ज किया जाना चाहिए।

महिलाओं को जीवित छोड़कर संदेश देने की रणनीति

कई प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि आतंकवादियों ने महिलाओं को यह कहते हुए नहीं मारा कि वे भारत सरकार अथवा प्रधानमंत्री को जाकर बताएं कि उनके पतियों के साथ क्या किया गया।

ऐसा व्यवहार यह दिखाता है कि हमले का उद्देश्य केवल हत्या नहीं था। आतंकवादी चाहते थे कि:

जीवित गवाह पूरे देश को धार्मिक चयन की कहानी बताएं;

परिवारों के व्यक्तिगत दुख को राष्ट्रीय मनोवैज्ञानिक आघात बनाया जाए;

पर्यटकों में भय उत्पन्न हो;

सांप्रदायिक प्रतिक्रिया भड़के;

सरकार की जम्मू-कश्मीर में सामान्य स्थिति की छवि को नुकसान पहुंचे।

इस प्रकार महिलाओं और बच्चों को छोड़ना दया नहीं, बल्कि आतंक की कहानी को फैलाने की सुनियोजित रणनीति थी।

मारे गए 26 लोगों की नामवार सूची

नीचे दी गई सूची प्रशासनिक अभिलेखों, संसदीय उल्लेखों और पीड़ित परिवारों की पुष्टि पर आधारित है। कुछ शुरुआती सूचियों में राज्य, आयु और नाम की वर्तनी को लेकर अंतर था।

पीड़ितों के नाम और जीवन परिचय का विस्तृत संकलन हिंदुस्तान टाइम्स के स्मृति दस्तावेज में उपलब्ध है।

लेफ्टिनेंट विनय नरवाल: विवाह के छह दिन बाद हत्या

भारतीय नौसेना अधिकारी लेफ्टिनेंट विनय नरवाल ने 16 अप्रैल 2025 को हिमांशी से विवाह किया था। शादी के कुछ दिन बाद दोनों कश्मीर गए। बैसरन में आतंकवादी ने विनय की धार्मिक पहचान पूछकर पत्नी के सामने गोली मार दी।

घटनास्थल पर पति के शव के निकट बैठी हिमांशी की तस्वीर इस हमले की सबसे मार्मिक छवियों में शामिल हुई। बाद में उन्होंने लोगों से अपील की कि इस हमले के कारण देश के मुसलमानों या सामान्य कश्मीरी नागरिकों के प्रति घृणा न फैलाई जाए।

उनकी अपील महत्वपूर्ण थी, क्योंकि आतंकवादियों का एक उद्देश्य धार्मिक हिंसा और प्रतिशोध की श्रृंखला शुरू कराना भी था।

शुभम द्विवेदी: दो महीने पहले हुआ था विवाह

कानपुर निवासी शुभम द्विवेदी का विवाह फरवरी 2025 में हुआ था। वह पत्नी ऐशान्या और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ कश्मीर घूमने गए थे।

ऐशान्या के अनुसार, आतंकवादियों ने पूछा कि वे हिंदू हैं या मुसलमान। जवाब मिलने के बाद शुभम को नजदीक से गोली मार दी गई। आतंकवादी ने उनकी पत्नी को जीवित छोड़ते हुए सरकार को संदेश देने की बात कही।

यह मामला दर्शाता है कि हत्या का चयन आकस्मिक नहीं, धार्मिक पहचान की पुष्टि के बाद किया गया था।

सुशील नथानिएल: ईसाई बताने पर भी गोली

मध्य प्रदेश निवासी सुशील नथानिएल भारतीय जीवन बीमा निगम से जुड़े अधिकारी थे। उनके परिजनों के अनुसार, आतंकवादियों ने उनसे कलमा पढ़ने को कहा। उन्होंने बताया कि वह ईसाई हैं, जिसके बाद उन्हें गोली मार दी गई।

उनकी बेटी पिता को बचाने के प्रयास में घायल हुई। इससे यह स्पष्ट होता है कि हमले में हिंदुओं के साथ एक ईसाई पर्यटक को भी उसकी गैर-मुस्लिम धार्मिक पहचान के कारण निशाना बनाया गया।

सैयद आदिल हुसैन शाह: पर्यटकों को बचाते हुए मारा गया स्थानीय युवक

28 वर्षीय सैयद आदिल हुसैन शाह स्थानीय पोनी संचालक और अपने परिवार का मुख्य कमाने वाला सदस्य था। जीवित बचे लोगों और स्थानीय प्रशासन के अनुसार, आदिल ने आतंकवादियों का विरोध किया और एक हमलावर से हथियार छीनने का प्रयास किया।

आतंकवादियों ने उसे गोली मार दी। वह मृतकों में अकेला स्थानीय कश्मीरी मुसलमान था।

आदिल की भूमिका तीन बातें स्पष्ट करती है:

आतंकवादियों का प्रतिनिधित्व सामान्य कश्मीरी समाज नहीं करता;

स्थानीय लोग भी पर्यटकों को बचाने के लिए अपनी जान जोखिम में डाल रहे थे;

धार्मिक रूप से मुसलमान होने के बावजूद आतंकवादियों का विरोध करने पर किसी को नहीं छोड़ा गया।

स्थानीय लोगों ने घायलों को बचाया

हमले के बाद स्थानीय पोनी संचालकों, गाइडों, दुकानदारों और ग्रामीणों ने घायलों को मैदान से नीचे पहुंचाने में सहायता की। सड़क न होने के कारण:

घायलों को पोनी पर लादा गया;

अस्थायी स्ट्रेचर बनाए गए;

लोगों को पैदल नीचे लाया गया;

स्थानीय वाहनों से अस्पताल भेजा गया;

कुछ परिवारों को स्थानीय लोगों ने अपने घरों में शरण दी।

स्थानीय गाइड नजाकत अहमद अली शाह सहित कई लोगों ने बच्चों और घायल पर्यटकों को सुरक्षित निकालने में सहायता की। यह तथ्य आतंकवादियों के सांप्रदायिक विभाजन के उद्देश्य और कश्मीरी नागरिकों के वास्तविक व्यवहार के बीच महत्वपूर्ण अंतर दिखाता है।

सुरक्षा बल समय पर क्यों नहीं पहुंच पाए?

बैसरन में सीधा सड़क संपर्क नहीं था। निकटतम सुरक्षा ठिकाना लगभग चार से पांच किलोमीटर दूर था। रास्ता पहाड़ी, कीचड़युक्त और पैदल चलने योग्य था। प्रारंभिक सूचना स्थानीय पोनी संचालकों के माध्यम से सुरक्षा बलों तक पहुंची।

जब तक पुलिस और CRPF घटनास्थल पर पहुंची:

हमला समाप्त हो चुका था;

आतंकवादी जंगल में भाग चुके थे;

अनेक लोगों की मृत्यु हो चुकी थी;

स्थानीय लोग बचाव कार्य शुरू कर चुके थे।

संचार, सड़क और स्थायी तैनाती का अभाव हमले के घातक प्रभाव को बढ़ाने वाला महत्वपूर्ण कारक बना।

क्या यह सुरक्षा विफलता थी?

जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने जुलाई 2025 में सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि पहलगाम हमला सुरक्षा विफलता था और उन्होंने इसकी पूरी जिम्मेदारी ली। उपराज्यपाल के वक्तव्य संबंधी रिपोर्ट में यह स्वीकारोक्ति दर्ज है।

मुख्य सुरक्षा प्रश्न थे:

  • अत्यधिक लोकप्रिय पर्यटन स्थल पर कोई स्थायी सशस्त्र सुरक्षा क्यों नहीं थी?
  • बैसरन को पर्यटकों के लिए खोलने से पहले सुरक्षा समीक्षा हुई थी या नहीं?
  • पर्यटकों की संख्या और प्रवेश का रिकॉर्ड कौन रख रहा था?
  • सुरक्षा बलों के लिए तत्काल सड़क अथवा वैकल्पिक पहुंच मार्ग क्यों नहीं था?
  • जंगल और ऊंचाई वाले हिस्सों की क्षेत्रीय निगरानी क्यों नहीं हुई?
  • आतंकवादियों ने एक दिन पहले क्षेत्र में आश्रय लिया, लेकिन स्थानीय खुफिया नेटवर्क को खबर क्यों नहीं लगी?
  • क्या गैर-स्थानीय लोगों पर संभावित हमले की सामान्य खुफिया चेतावनी मौजूद थी?
  • घटनास्थल पर आपातकालीन संचार और अलार्म व्यवस्था क्यों नहीं थी?
  • पर्यटक स्थल पर CCTV अथवा ड्रोन निगरानी क्यों नहीं की गई?
  • हमलावरों को हमले के बाद कई सप्ताह तक जंगलों में सहायता कैसे मिलती रही?

उपराज्यपाल की स्वीकारोक्ति महत्वपूर्ण है, लेकिन सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट नहीं किया गया कि संस्थागत अथवा व्यक्तिगत स्तर पर किस अधिकारी की क्या जिम्मेदारी निर्धारित हुई।

TRF ने दावा किया, फिर पीछे क्यों हटा?

हमले के लगभग ढाई घंटे बाद द रेजिस्टेंस फ्रंट—TRF से जुड़े एक Mastodon खाते ने जिम्मेदारी लेने वाला संदेश जारी किया। इसमें गैर-स्थानीय लोगों के बसने और कथित जनसांख्यिकीय परिवर्तन का उल्लेख किया गया।

तीन दिन बाद TRF ने Telegram के माध्यम से हमले में अपनी भूमिका से इनकार कर दिया।

NIA की डिजिटल जांच के अनुसार:

जिम्मेदारी लेने वाला IP पता पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा क्षेत्र से जुड़ा था;

बाद में इनकार जारी करने वाला खाता रावलपिंडी से संबंधित था;

Telegram खाता पाकिस्तानी मोबाइल नंबर से पंजीकृत था;

दावा और इनकार दोनों TRF से जुड़े प्रचार तंत्र से आए;

इनकार अंतरराष्ट्रीय आलोचना के बाद विश्वसनीय दूरी बनाने का प्रयास था।

इसका विवरण NIA आरोपपत्र पर आधारित जून 2026 की जांच रिपोर्ट में सामने आया।

प्रत्यक्ष हमलावर कौन थे?

NIA ने तीन पाकिस्तानी आतंकवादियों को प्रत्यक्ष हमलावर बताया:

सुलेमान को गगनगीर सुरंग कर्मचारी हमले में भी शामिल बताया गया। NIA के अनुसार, गगनगीर और पहलगाम दोनों हमलों में एक ही M4 कार्बाइन और GoPro कैमरे का संबंध सामने आया।

इससे पता चलता है कि पहलगाम हमला अचानक तैयार किया गया एक अलग ऑपरेशन नहीं था। वही आतंकी नेटवर्क पहले सामरिक परियोजना के कर्मचारियों और बाद में पर्यटकों पर हमला कर रहा था।

पाकिस्तान स्थित हैंडलर सज्जाद जट्ट

NIA ने पाकिस्तान के कसूर क्षेत्र में मौजूद सज्जाद सैफुल्लाह जट्ट उर्फ अली भाई को हमले का प्रमुख हैंडलर बताया।

आरोपपत्र के अनुसार:

उसने हमलावरों को बैसरन के सटीक निर्देशांक भेजे;

आतंकवादियों से एन्क्रिप्टेड संपर्क रखा;

हमले से लगभग एक सप्ताह पहले लक्ष्य की जानकारी दी;

डिजिटल नक्शों और Alpine Quest जैसे नेविगेशन माध्यमों का प्रयोग कराया;

हथियार और परिचालन निर्देश उपलब्ध कराने वाले नेटवर्क का संचालन किया;

TRF और लश्कर संरचना के बीच संपर्क की भूमिका निभाई।

आतंकवादियों से बरामद मोबाइल फोन पाकिस्तान में बेचे जाने की पुष्टि होने का दावा भी NIA ने किया।

स्थानीय सहयोग: परवेज और बशीर

22 जून 2025 को NIA ने परवेज अहमद और बशीर अहमद जोठर को गिरफ्तार किया। दोनों पर तीन पाकिस्तानी आतंकवादियों को हमले से एक रात पहले आश्रय और भोजन देने का आरोप है।

NIA ने दिसंबर 2025 के आरोपपत्र में दोनों पर:

हत्या की साजिश;

आतंकवादी को आश्रय;

भारत के विरुद्ध युद्ध छेड़ने में सहायता;

UAPA के अंतर्गत आतंकी गतिविधियों में सहयोग;

महत्वपूर्ण सूचना छिपाने

से संबंधित धाराएं लगाईं।

यहां दो कानूनी स्थितियां अलग हैं:

उनका गिरफ्तार और आरोपित होना स्थापित तथ्य है।

आरोपों का अंतिम प्रमाण और दोषसिद्धि न्यायालय में होनी शेष है।

ऑपरेशन महादेव: तीनों हमलावर मारे गए

हमले के बाद सुरक्षा एजेंसियों ने आतंकवादियों को पाकिस्तान लौटने से रोकने के लिए जंगलों और घुसपैठ मार्गों की निगरानी शुरू की।

केंद्रीय गृह मंत्री द्वारा संसद में दी गई जानकारी के अनुसार:

22 मई 2025 को दाचीगाम क्षेत्र में आतंकवादियों की मौजूदगी का मानवीय खुफिया संकेत मिला;

लगभग दो महीने तक इलेक्ट्रॉनिक और मानवीय निगरानी की गई;

22 जुलाई को सेंसर और संचार संकेतों से उनकी उपस्थिति की पुष्टि हुई;

सेना की 4 पैरा इकाई, CRPF और जम्मू-कश्मीर पुलिस ने क्षेत्र को घेरा;

28 जुलाई 2025 को तीनों आतंकवादी मारे गए।

बरामद हथियारों में दो AK राइफल और एक M4 कार्बाइन शामिल थी। घटनास्थल से मिली गोलियों और मुठभेड़ में बरामद राइफलों की बैलिस्टिक जांच कराई गई। सरकार के अनुसार, फोरेंसिक मिलान से पुष्टि हुई कि इन्हीं हथियारों का प्रयोग बैसरन में हुआ था।

लोकसभा में गृह मंत्री के आधिकारिक वक्तव्य के अनुसार, आश्रय देने वाले गवाहों ने भी शवों की पहचान की।

ऑपरेशन सिंदूर: हमले का सैन्य परिणाम

पहलगाम हमले के बाद भारत सरकार ने 23 अप्रैल को पाकिस्तान के विरुद्ध कूटनीतिक कदम घोषित किए:

सिंधु जल संधि को स्थगित रखने का निर्णय;

अटारी एकीकृत जांच चौकी बंद;

SAARC वीजा छूट योजना समाप्त;

पाकिस्तानी नागरिकों के वीजा निरस्त;

पाकिस्तानी सैन्य सलाहकारों को निष्कासित करना;

उच्चायोगों की कर्मचारी संख्या घटाना।

7 मई 2025 की रात भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के अंतर्गत पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में नौ आतंकी ठिकानों पर हमले किए। भारत का आधिकारिक दावा था कि कार्रवाई लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी ढांचे के विरुद्ध थी, न कि पाकिस्तानी नागरिकों या सामान्य सैन्य प्रतिष्ठानों के विरुद्ध।

पाकिस्तान ने जवाबी ड्रोन, मिसाइल और गोलाबारी की कार्रवाई की। भारत ने पाकिस्तानी सैन्य ठिकानों और एयरबेस को निशाना बनाकर जवाब दिया। 10 मई को दोनों देशों के सैन्य संचालन महानिदेशकों के बीच बनी समझ के बाद प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई रुकी।

इस प्रकार बैसरन में हुई 26 नागरिकों की हत्या भारत-पाकिस्तान के बीच कई दशकों की सबसे गंभीर सैन्य तनातनी का कारण बनी।

NIA का 1,597 पृष्ठ का आरोपपत्र

15 दिसंबर 2025 को NIA ने जम्मू की विशेष अदालत में 1,597 पृष्ठ का आरोपपत्र दाखिल किया। इसमें लश्कर-ए-तैयबा और TRF को संगठनों के रूप में तथा छह व्यक्तियों को आरोपी बनाया गया:

सज्जाद सैफुल्लाह जट्ट—पाकिस्तान स्थित हैंडलर

फैसल जट्ट उर्फ सुलेमान

हबीब ताहिर उर्फ जिब्रान

हमजा अफगानी

परवेज अहमद

बशीर अहमद जोठर

आरोपों में भारतीय न्याय संहिता, UAPA और शस्त्र अधिनियम के अंतर्गत हत्या, आतंकवादी कार्रवाई, आपराधिक साजिश और भारत के विरुद्ध युद्ध छेड़ने से संबंधित प्रावधान शामिल हैं। NIA का आधिकारिक आरोपपत्र रिकॉर्ड दिसंबर 2025 में प्रकाशित हुआ।

जुलाई 2026: हाफिज सईद भी आरोपी

6 जुलाई 2026 को NIA ने पूरक आरोपपत्र दाखिल कर पाकिस्तान स्थित लश्कर प्रमुख हाफिज सईद को पहलगाम हमले की व्यापक साजिश का आरोपी बनाया।

NIA ने उसे:

व्यक्तिगत क्षमता में;

लश्कर-ए-तैयबा के प्रमुख के रूप में;

TRF के नियंत्रण से जुड़ी भूमिका में;

सीमा पार साजिश के प्रमुख संचालक के रूप में

आरोपित किया।

8 जुलाई 2026 को जम्मू की विशेष NIA अदालत ने हाफिज सईद के विरुद्ध खुली अवधि वाला गैर-जमानती वारंट जारी किया। NIA के आधिकारिक पूरक आरोपपत्र और विशेष अदालत के आदेश संबंधी रिपोर्ट के अनुसार, उसकी गिरफ्तारी और हिरासत में पूछताछ को जांच के लिए आवश्यक बताया गया।

इस चरण तक प्रत्यक्ष हमलावर मारे जा चुके थे, दो स्थानीय आरोपी हिरासत में थे और पाकिस्तान स्थित शीर्ष आरोपियों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई जारी थी।

स्थापित तथ्य, जांच एजेंसी के आरोप और बाकी प्रश्न

स्थापित तथ्य

बैसरन में 26 लोगों की हत्या हुई।

हमले का लक्ष्य मुख्यतः गैर-मुस्लिम पर्यटक थे।

मृतकों में 25 भारतीय और एक नेपाली नागरिक था।

सैयद आदिल हुसैन शाह अकेला स्थानीय मृतक था।

तीन आतंकवादियों ने M4 और AK राइफलों से हमला किया।

TRF ने जिम्मेदारी ली और बाद में इनकार किया।

तीनों हमलावर ऑपरेशन महादेव में मारे गए।

दो स्थानीय लोगों को गिरफ्तार किया गया।

NIA ने मुख्य और पूरक आरोपपत्र दाखिल किए।

हाफिज सईद के विरुद्ध गैर-जमानती वारंट जारी हुआ।

NIA के आरोप

हमला पाकिस्तान स्थित लश्कर/TRF संरचना ने कराया।

सज्जाद जट्ट ने लक्ष्य, निर्देश और डिजिटल समन्वय उपलब्ध कराया।

परवेज और बशीर ने आश्रय एवं भोजन दिया।

आतंकवादियों ने धार्मिक पहचान की पुष्टि कर हत्या की।

TRF का दावा और इनकार दोनों पाकिस्तान से संचालित हुए।

हाफिज सईद व्यापक साजिश का प्रमुख संचालक था।

गगनगीर और पहलगाम हमले के बीच समान आतंकवादी, हथियार और कैमरे का संबंध था।

अनसुलझे प्रश्न

  • आतंकवादी मूलतः किस सीमा मार्ग से भारत में घुसे?
  • वे कितने समय से कश्मीर में सक्रिय थे?
  • परवेज और बशीर के अतिरिक्त कितने स्थानीय सहयोगी थे?
  • क्या बैसरन की पहले भी रेकी की गई थी?
  • पर्यटन स्थल खोले जाने और सुरक्षा तैनाती के बीच समन्वय क्यों नहीं हुआ?
  • खुफिया चेतावनी होने पर भी पर्यटक क्षेत्रों की सुरक्षा क्यों नहीं बढ़ी?
  • जिम्मेदारी निर्धारण के बाद किसी अधिकारी के विरुद्ध कार्रवाई हुई या नहीं?
  • पाकिस्तान स्थित सज्जाद जट्ट और हाफिज सईद को न्यायालय के सामने कैसे लाया जाएगा?
  • बरामद डिजिटल कैमरे में हमले का कितना रिकॉर्ड मौजूद था?
  • क्या आतंकवादी हमले को प्रचार वीडियो के रूप में जारी करने वाले थे?
  • पूरी साजिश में धन, हथियार और संचार का मार्ग क्या था?

निष्कर्ष: पहलगाम ने टारगेट किलिंग को सांप्रदायिक सामूहिक हत्या में बदल दिया

पहलगाम हमला जम्मू-कश्मीर में लक्षित आतंक के इतिहास की निर्णायक घटना था। इससे पहले कश्मीरी पंडितों, अल्पसंख्यकों, प्रवासी मजदूरों, बैंक कर्मचारियों, शिक्षकों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को अलग-अलग निशाना बनाया जाता रहा। बैसरन में आतंकवादियों ने पहली बार एक बड़े पर्यटन स्थल को धार्मिक पहचान आधारित सामूहिक हत्या के मंच में बदल दिया।

हमलावरों ने पुरुषों से नाम और धर्म पूछा, कलमा पढ़ने को कहा और गैर-मुस्लिम होने की पुष्टि के बाद उन्हें परिवारों के सामने गोली मारी। महिलाओं को जीवित छोड़कर संदेश फैलाने की कोशिश की गई। यह केवल शारीरिक हत्या नहीं, बल्कि पूरे देश को मनोवैज्ञानिक रूप से घायल करने का प्रयास था।

साथ ही, सैयद आदिल हुसैन शाह का बलिदान और स्थानीय कश्मीरियों द्वारा घायलों की सहायता यह बताती है कि आतंकवाद और कश्मीरी समाज को एक मान लेना गंभीर भूल होगी। आतंकवादियों ने धर्म के आधार पर हत्या की, लेकिन एक कश्मीरी मुसलमान पर्यटकों की रक्षा करते हुए मारा गया।

सुरक्षा के स्तर पर पहलगाम गंभीर विफलता थी। हजारों पर्यटकों वाले दुर्गम मैदान में स्थायी सशस्त्र सुरक्षा, सड़क, त्वरित प्रतिक्रिया और पर्याप्त निगरानी का न होना आतंकवादियों के लिए अवसर बना। उपराज्यपाल द्वारा जिम्मेदारी स्वीकार करना महत्वपूर्ण था, लेकिन भविष्य के लिए वास्तविक सुधार तभी माना जाएगा जब जवाबदेही, मार्ग सुरक्षा, स्थानीय खुफिया तंत्र और पर्यटक स्थलों की जोखिम श्रेणी स्पष्ट की जाए।

ऑपरेशन सिंदूर ने सीमा पार आतंकी ढांचे को सैन्य उत्तर दिया और ऑपरेशन महादेव ने तीनों प्रत्यक्ष हमलावरों को समाप्त किया। इसके बाद NIA के आरोपपत्र ने प्रत्यक्ष हत्यारों से लेकर स्थानीय मददगार, पाकिस्तान स्थित हैंडलर, TRF, लश्कर और हाफिज सईद तक कथित साजिश की श्रृंखला तैयार की।

लेकिन पूर्ण न्याय केवल प्रत्यक्ष हमलावरों की मृत्यु से पूरा नहीं होता। पूर्ण न्याय में स्थानीय सहायता नेटवर्क का खुलासा, सुरक्षा विफलता की जवाबदेही, पाकिस्तान स्थित आरोपियों के विरुद्ध प्रभावी अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई और पीड़ित परिवारों को दीर्घकालीन सहायता भी शामिल है। पहलगाम की सबसे बड़ी सीख यही है कि आतंकवाद एक साथ सीमा पार से आने वाली हिंसा, स्थानीय लॉजिस्टिक नेटवर्क, डिजिटल प्रचार और सुरक्षा की छोटी-बड़ी चूकों का उपयोग करता है—इसलिए उसका उत्तर भी उतना ही व्यापक होना चाहिए।