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OCN Research Dossier–011 · अध्याय 01

टारगेट किलिंग—परिभाषा, स्वरूप और अध्ययन की सीमाएं

परिभाषा, कानून, वर्गीकरण, गणना और प्रमाण-पद्धति

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskप्रथम संस्करण · 1 अगस्त 2026

परिभाषा, कानून, वर्गीकरण, गणना और प्रमाण-पद्धति

1.1 प्रस्तावना

जम्मू-कश्मीर में “टारगेट किलिंग” शब्द विशेष रूप से उन हत्याओं के लिए प्रचलित हुआ जिनमें आतंकियों ने किसी व्यक्ति को उसकी धार्मिक पहचान, मूल निवास, पेशे, राजनीतिक संबंध, सरकारी सेवा अथवा सार्वजनिक भूमिका के कारण चुनकर मारा। ऐसी घटनाओं में लक्ष्य प्रायः निहत्था नागरिक, प्रवासी मजदूर, शिक्षक, कारोबारी, जनप्रतिनिधि, राजनीतिक कार्यकर्ता या छुट्टी पर आया पुलिसकर्मी होता है।

यह आतंकवाद का कम लागत लेकिन अत्यधिक मनोवैज्ञानिक प्रभाव वाला तरीका है। हमलावर को किसी बड़े सैन्य प्रतिष्ठान पर हमला करने अथवा लंबे समय तक सुरक्षा बलों से लड़ने की आवश्यकता नहीं होती। एक पिस्तौल, लक्ष्य की सामान्य जानकारी और भागने की पूर्व योजना से ऐसी हत्या की जा सकती है। इसके विपरीत सामाजिक प्रभाव कई गुना बड़ा होता है—भय, पलायन, सांप्रदायिक तनाव, आर्थिक नुकसान और सरकार की सुरक्षा व्यवस्था पर अविश्वास।

इसलिए टारगेट किलिंग को केवल हत्या के एक आपराधिक मामले के रूप में नहीं देखा जा सकता। जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में यह आतंकवाद, अलगाववाद, सीमा-पार नेटवर्क, स्थानीय सहायता और मनोवैज्ञानिक युद्ध का संयुक्त उपकरण रही है।

1.2 टारगेट किलिंग की सामान्य परिभाषा

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी एक सर्वमान्य कानूनी परिभाषा नहीं है। इंटरनेशनल कमेटी ऑफ द रेड क्रॉस—ICRC के अनुसार targeted killing का सामान्य अर्थ है—

किसी राज्य अथवा संगठित सशस्त्र समूह द्वारा किसी विशिष्ट व्यक्ति के विरुद्ध, उसे हिरासत में लिए बिना, जानबूझकर और पहले से नियोजित घातक बल का प्रयोग।

ICRC की परिभाषा मुख्यतः राज्य, युद्ध और अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के संदर्भ में तैयार की गई है। जम्मू-कश्मीर के आतंकी परिदृश्य में इस शब्द का उपयोग कुछ अलग और अधिक सीमित अर्थ में होता है—आतंकी संगठन द्वारा किसी पहचाने गए नागरिक अथवा नागरिकों के वर्ग को चुनकर मारना।

  • इस शोध के लिए टारगेट किलिंग की कार्यकारी परिभाषा होगी

“किसी व्यक्ति अथवा सीमित नागरिक समूह की पहचान, धर्म, मूल स्थान, पेशे, सरकारी दायित्व, राजनीतिक संबंध या आतंकवाद-विरोधी भूमिका के कारण, भय अथवा राजनीतिक-सामाजिक संदेश उत्पन्न करने के उद्देश्य से की गई पूर्वनियोजित हत्या।”

इस परिभाषा के पांच आवश्यक तत्व हैं—

लक्ष्य का पहले से चयन।

पीड़ित की पहचान अथवा दिनचर्या की जानकारी।

हत्या का सामान्य अपराध से अलग राजनीतिक, आतंकी या सांप्रदायिक उद्देश्य।

निहत्थे अथवा तत्काल युद्ध में भाग न ले रहे व्यक्ति पर हमला।

हत्या के माध्यम से व्यापक समुदाय को संदेश अथवा चेतावनी देना।

1.3 भारतीय कानून में स्थिति

भारतीय कानून में “टारगेट किलिंग” नाम से कोई अलग स्वतंत्र अपराध परिभाषित नहीं है। घटना की प्रकृति के अनुसार आरोप लगाए जाते हैं।

प्रमुख कानूनी प्रावधान हैं—

भारतीय न्याय संहिता की धारा 103—हत्या।

धारा 109—हत्या का प्रयास।

धारा 113—आतंकवादी कृत्य।

विधिविरुद्ध क्रिया-कलाप (निवारण) अधिनियम—UAPA की धारा 15—आतंकवादी कृत्य।

UAPA की धारा 16—आतंकवादी कृत्य का दंड।

धारा 17—आतंकी गतिविधि के लिए धन जुटाना।

धारा 18—षड्यंत्र, प्रयास, सहायता अथवा सुविधा उपलब्ध कराना।

धारा 19—आतंकी को शरण देना।

धारा 20—आतंकी गिरोह अथवा संगठन की सदस्यता।

हथियार, विस्फोटक, आपराधिक षड्यंत्र और आतंकी वित्त से संबंधित अन्य कानून।

भारतीय न्याय संहिता की धारा 113 में किसी व्यक्ति की मृत्यु कराने वाले आतंकवादी कृत्य के लिए मृत्युदंड अथवा आजीवन कारावास तक का प्रावधान है। भारतीय न्याय संहिता का आधिकारिक पाठ और UAPA का आधिकारिक पाठ इस कानूनी आधार को स्पष्ट करते हैं।

अदालत में किसी घटना को टारगेट किलिंग कह देना अपने आप पर्याप्त नहीं है। अभियोजन को हत्या, पूर्वनियोजन, आतंकवादी उद्देश्य, संगठन से संबंध और सहयोगी नेटवर्क को साक्ष्यों से स्थापित करना पड़ता है।

1.4 सामान्य हत्या और टारगेट किलिंग में अंतर

यदि किसी प्रवासी मजदूर की मजदूरी अथवा व्यक्तिगत विवाद में हत्या हो, तो वह स्वतः टारगेट किलिंग नहीं होगी। लेकिन उसे केवल गैर-स्थानीय होने के कारण चुनकर मारा जाए और उद्देश्य अन्य प्रवासी मजदूरों में भय पैदा करना हो, तो वह इस अध्ययन में शामिल होगी।

1.5 जम्मू-कश्मीर में टारगेट किलिंग के प्रमुख स्वरूप

जम्मू-कश्मीर में लक्ष्य चुनने का आधार समय और आतंकी रणनीति के साथ बदलता रहा। कभी धार्मिक पहचान निर्णायक रही, कभी सरकारी सेवा, राजनीतिक भूमिका, मूल निवास अथवा सुरक्षा बलों से संबंध। नीचे दिए गए स्वरूप एक-दूसरे से पूरी तरह अलग श्रेणियां नहीं हैं; अनेक घटनाओं में पीड़ित की पहचान और पेशा—दोनों हमले का कारण बने।

1.5.1 धार्मिक पहचान के आधार पर हत्या

कश्मीरी पंडितों, सिखों तथा जम्मू संभाग के हिंदू ग्रामीणों पर हुए हमले इस श्रेणी में आते हैं। 1989–90 में अधिवक्ताओं, सरकारी अधिकारियों, न्यायाधीशों, बुद्धिजीवियों और सामाजिक नेताओं की हत्या ने कश्मीरी पंडित समुदाय में व्यापक भय उत्पन्न किया।

बाद में संग्रामपोरा, वंधामा और नादिमार्ग जैसी घटनाओं में पूरे परिवार अथवा गांव को निशाना बनाया गया। इन घटनाओं को व्यक्तिगत हत्या से आगे बढ़कर “सामूहिक लक्षित हमला” माना जाएगा।

1.5.2 प्रवासी मजदूर और बाहरी कारोबारी

बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ से आए मजदूर, बढ़ई, रेहड़ी विक्रेता, ट्रक चालक तथा फल कारोबारी आसान लक्ष्य रहे हैं। इनके पास प्रायः निजी सुरक्षा नहीं होती और वे खुले कार्यस्थलों अथवा किराये के साधारण मकानों में रहते हैं।

ऐसी हत्या के पीछे संभावित संदेश होता है—“बाहरी लोग घाटी छोड़ दें।” इससे श्रम उपलब्धता, निर्माण, बागवानी, परिवहन और स्थानीय अर्थव्यवस्था भी प्रभावित होती है।

1.5.3 सरकारी कर्मचारी और शिक्षक

स्कूल, बैंक, तहसील कार्यालय और अन्य सार्वजनिक संस्थानों में काम करने वाले कर्मचारियों की हत्या दोहरा संदेश देती है—

लक्षित समुदाय में भय उत्पन्न करना।

राज्य की प्रशासनिक उपस्थिति को चुनौती देना।

राहुल भट, रजनी बाला, सुपिंदर कौर, दीपक चंद और बैंक प्रबंधक विजय कुमार की हत्याएं इसी प्रवृत्ति के प्रमुख उदाहरण हैं।

1.5.4 निर्वाचित जनप्रतिनिधि और राजनीतिक कार्यकर्ता

पंच, सरपंच, पार्षद और राजनीतिक दलों के स्थानीय कार्यकर्ता लोकतांत्रिक प्रक्रिया की सबसे निचली लेकिन प्रत्यक्ष इकाई होते हैं। उनकी हत्या का उद्देश्य चुनावी भागीदारी रोकना, स्थानीय प्रशासन को कमजोर करना और जनता को राजनीतिक दलों से दूर रखना हो सकता है।

गृह मंत्रालय की 2004–05 की वार्षिक रिपोर्ट में भी राजनीतिक कार्यकर्ताओं की लक्षित हत्याओं को प्रमुख आतंकी प्रवृत्ति बताया गया था। उस वर्ष 62 राजनीतिक कार्यकर्ताओं के मारे जाने की जानकारी दी गई थी। इससे स्पष्ट होता है कि जनप्रतिनिधियों को निशाना बनाना केवल 2019 के बाद उत्पन्न हुई रणनीति नहीं है। गृह मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट 2004–05

1.5.5 पुलिसकर्मी और पूर्व सैनिक

वर्दी में अभियान चला रहे सुरक्षा कर्मियों पर हमला सामान्यतः सुरक्षा बलों पर आतंकी हमला माना जाएगा। लेकिन निम्न परिस्थितियों में घटना को लक्षित हत्या की श्रेणी में रखा जा सकता है—

पुलिसकर्मी छुट्टी पर हो।

मस्जिद, बाजार, खेल मैदान अथवा घर के बाहर निहत्था हो।

उसके परिवार के सामने पहचानकर मारा जाए।

पूर्व सैनिक को उसके घर अथवा गांव में निशाना बनाया जाए।

इस अध्ययन में ऐसे मामलों को “व्यक्तिगत रूप से लक्षित सुरक्षाकर्मी” नामक अलग उपश्रेणी में रखा जाएगा।

1.5.6 आतंकवाद का विरोध करने वाले स्थानीय नागरिक

मुखबिर होने के संदेह, सुरक्षाबलों की सहायता, आतंकियों को शरण देने से इनकार अथवा अलगाववादी फरमान न मानने के कारण भी स्थानीय मुसलमानों की हत्या की गई है। surrendered militants, राजनीतिक कार्यकर्ता और ग्रामीण प्रतिनिधि भी निशाना बने हैं।

इस श्रेणी को शामिल करना आवश्यक है, क्योंकि टारगेट किलिंग को केवल “अल्पसंख्यक बनाम बहुसंख्यक” ढांचे में देखने से जम्मू-कश्मीर के आतंकवाद की पूरी तस्वीर सामने नहीं आती।

1.5.7 पर्यटक और तीर्थयात्री

सामान्यतः पर्यटन को स्थानीय अर्थव्यवस्था से जुड़े होने के कारण लंबे समय तक प्रत्यक्ष हमलों से बचाया गया। इसके बावजूद अमरनाथ यात्रियों, रियासी के तीर्थयात्रियों और अप्रैल 2025 में पहलगाम के पर्यटकों पर हुए हमलों ने इस सीमा को तोड़ दिया।

पर्यटकों को धर्म अथवा पहचान पूछकर चुनकर मारना “सामूहिक लक्षित आतंकवादी हमला” है। बस पर अंधाधुंध गोलीबारी, जिसमें यात्रियों की मृत्यु गोली अथवा वाहन दुर्घटना दोनों से हुई हो, एक अलग परिचालन श्रेणी में दर्ज होगी।

1.5.8 विकास परियोजनाओं के कर्मचारी

सड़क, सुरंग, रेलवे, बिजली अथवा अन्य रणनीतिक परियोजना पर काम करने वाले कर्मचारियों पर हमला विकास और संपर्क परियोजनाओं को रोकने का प्रयास भी हो सकता है। अक्टूबर 2024 का गगनगीर हमला इसका प्रमुख उदाहरण है।

1.6 व्यक्तिगत और सामूहिक टारगेट किलिंग

शोध में दो स्तर बनाए जाएंगे।

  • व्यक्तिगत लक्षित हत्या

एक या कुछ व्यक्तियों को पहले से पहचानकर घर, दुकान, कार्यालय, खेत अथवा सड़क पर मारना।

उदाहरण—

दुकान में घुसकर व्यापारी की हत्या।

स्कूल में पहचान के आधार पर शिक्षकों को अलग करना।

घर के बाहर सरपंच को गोली मारना।

कार्यस्थल पर गैर-स्थानीय मजदूर को निशाना बनाना।

  • सामूहिक लक्षित हमला

किसी समुदाय अथवा पहचाने गए समूह के लोगों को एक स्थान पर चुनकर मारना।

किसी अल्पसंख्यक गांव पर हमला।

यात्रियों की धार्मिक पहचान देखकर गोलीबारी।

किसी परियोजना के मजदूर शिविर पर हमला।

प्रवासी मजदूरों को एकत्र कर हत्या।

अध्ययन में पांच या अधिक मृतकों वाले हमले को सांख्यिकीय सुविधा के लिए “बड़े सामूहिक लक्षित हमले” की उपश्रेणी में रखा जा सकता है। यह कोई भारतीय कानूनी परिभाषा नहीं, बल्कि शोध की कार्यपद्धति होगी।

1.7 हाइब्रिड आतंकी और टारगेट किलिंग

हाल के दौर में “हाइब्रिड आतंकी” शब्द का प्रयोग ऐसे व्यक्ति के लिए किया गया जो सुरक्षा एजेंसियों की घोषित आतंकी सूची में नहीं होता, सामान्य नागरिक की तरह रहता है, लेकिन किसी विशेष हमले के लिए सक्रिय किया जाता है।

उसकी विशेषताएं हो सकती हैं—

किसी संगठन का सार्वजनिक सदस्य न होना।

सीमित प्रशिक्षण।

पिस्तौल अथवा ग्रेनेड से एक हमला।

हमले के बाद सामान्य जीवन में लौट जाना।

स्थानीय क्षेत्र और लक्ष्य की जानकारी।

डिजिटल माध्यम से हैंडलर से संपर्क।

हथियार किसी अन्य व्यक्ति से प्राप्त करना।

संसद से जुड़े एक अध्ययन में हाइब्रिड आतंकियों को श्रीनगर और आसपास की हाल की लक्षित हत्याओं के लिए प्रमुख चुनौती बताया गया था। संसदीय शोध—Counter-Terrorism Scenario in J&K

लेकिन किसी आरोपी को पुलिस द्वारा “हाइब्रिड आतंकी” बताया जाना और अदालत द्वारा अपराध सिद्ध किया जाना अलग अवस्थाएं हैं। शोध में दोनों को एक समान नहीं लिखा जाएगा।

1.8 किन घटनाओं को शामिल किया जाएगा?

इस अध्ययन में घटना शामिल करने के लिए निम्न में से कम-से-कम एक विश्वसनीय आधार आवश्यक होगा—

पुलिस या जांच एजेंसी ने इसे आतंकी हमला बताया हो।

किसी आतंकी संगठन ने जिम्मेदारी ली हो और जांच में संबंध के संकेत मिले हों।

पीड़ित को स्पष्ट रूप से पहचान, समुदाय, पेशे या राजनीतिक भूमिका के आधार पर चुना गया हो।

दो या अधिक विश्वसनीय समकालीन स्रोत इसे targeted killing बताते हों।

संगठन का दावा अकेले अंतिम प्रमाण नहीं माना जाएगा। कई बार संगठन प्रचार, भ्रम या अपनी क्षमता बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने के लिए भी जिम्मेदारी लेते हैं।

1.9 किन घटनाओं को शामिल नहीं किया जाएगा?

मुख्य टारगेट किलिंग डेटाबेस से निम्न घटनाएं अलग रहेंगी—

नियंत्रण रेखा पर गोलीबारी से हुई मौत।

सुरक्षा बलों और आतंकियों के बीच मुठभेड़।

सक्रिय सैन्य अभियान में मारे गए सुरक्षाकर्मी।

भीड़ नियंत्रण और कानून-व्यवस्था की घटनाएं।

व्यक्तिगत, पारिवारिक, व्यावसायिक या भूमि विवाद की हत्या।

ऐसी गुमशुदगी जिसमें हत्या और आतंकी उद्देश्य प्रमाणित न हो।

अज्ञात शव जिसकी पहचान या घटनाक्रम निश्चित न हो।

दुर्घटना अथवा हमले के बीच संबंध स्पष्ट न हो।

सोशल मीडिया पर प्रसारित लेकिन स्वतंत्र रूप से अपुष्ट दावा।

सामूहिक आतंकी हमले अलग परिशिष्ट में दर्ज होंगे, ताकि उन्हें व्यक्तिगत टारगेट किलिंग के साथ मिलाकर भ्रामक संख्या न बनाई जाए।

1.10 मृतक और घायलों की गणना

गृह मंत्रालय की वर्षवार संख्या सभी आतंकवादी घटनाओं में मारे गए नागरिकों को बताती है। उदाहरणतः 2019 में 44, 2020 में 38, 2021 में 41 और 2022 में 31 नागरिकों की मृत्यु दर्ज की गई। ये सभी टारगेट किलिंग नहीं थीं। गृह मंत्रालय का संसदीय उत्तर

इस शोध में चार अलग आंकड़े होंगे—

व्यक्तिगत लक्षित हत्याओं में मृतक।

व्यक्तिगत लक्षित हमलों में घायल।

सामूहिक लक्षित हमलों में मृतक और घायल।

सभी आतंकी घटनाओं के सरकारी समग्र आंकड़े।

गणना के नियम होंगे—

घटनास्थल पर घायल और बाद में अस्पताल में मृत व्यक्ति को केवल मृतकों में गिना जाएगा।

प्रारंभिक और अंतिम मृत्यु संख्या अलग दर्ज होगी।

दोहरी वर्तनी वाले नामों का सत्यापन किया जाएगा।

मृतक और घायल सुरक्षा कर्मियों को अलग कॉलम मिलेगा।

हमले के बाद बस खाई में गिरने जैसी घटना में गोली और दुर्घटना से हुई मौतों का उपलब्ध अभिलेख के आधार पर उल्लेख होगा।

“कई घायल” जैसी अस्पष्ट सूचना को पक्की संख्या में परिवर्तित नहीं किया जाएगा।

संशोधित सरकारी संख्या आने पर पुरानी संख्या मिटाई नहीं जाएगी; revision note जोड़ा जाएगा।

1.11 अध्ययन की प्रमुख सीमाएं

परिभाषा की समस्या

भारत सरकार की सभी रिपोर्टें targeted killing को अलग सांख्यिकीय श्रेणी नहीं मानतीं। इसलिए अलग-अलग स्रोतों की संख्या में अंतर मिलता है।

नाम और वर्तनी

कश्मीरी, उर्दू तथा अन्य भारतीय भाषाओं के नाम अंग्रेजी में अलग-अलग लिखे जाते हैं। उदाहरणतः वागे/वागेह, चौहान/चव्हाण अथवा मोहम्मद/मुहम्मद। इससे दोहरी प्रविष्टि का खतरा रहता है।

घायल व्यक्ति की बाद में मृत्यु

कई समाचारों में व्यक्ति को पहले घायल बताया जाता है, लेकिन कुछ दिन या महीने बाद उसकी मृत्यु हो जाती है। केवल शुरुआती रिपोर्ट लेने पर मृतक संख्या कम रह सकती है।

संगठन के दावे की विश्वसनीयता

TRF, PAFF अथवा अन्य संगठन जिम्मेदारी ले सकते हैं; पुलिस किसी दूसरे मूल संगठन से संबंध बता सकती है। जांच और अदालत का निष्कर्ष इससे अलग हो सकता है।

स्थानीय सहयोग का प्रश्न

हर हमले में स्थानीय सहायता आवश्यक रूप से प्रमाणित नहीं होती। गिरफ्तारी को दोषसिद्धि नहीं माना जा सकता। “स्थानीय समर्थन” शब्द का प्रयोग पूरे गांव अथवा समुदाय के लिए नहीं, बल्कि प्रमाणित व्यक्तियों और नेटवर्क के लिए किया जाएगा।

आधिकारिक और स्वतंत्र आंकड़ों में अंतर

भौगोलिक सीमा

यह शोध वर्तमान भारतीय प्रशासन वाले केंद्रशासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर तक सीमित रहेगा। लद्दाख, पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर तथा पाकिस्तान के भीतर हुई आतंकी घटनाएं मुख्य गणना में शामिल नहीं होंगी। सीमा पार स्थित प्रशिक्षण शिविर और संचालक केवल षड्यंत्र तथा संगठनात्मक संरचना के संदर्भ में आएंगे।

समय सीमा

मुख्य अध्ययन 1989 में बड़े पैमाने पर आतंकवाद के आरंभ से 1 अगस्त 2026 तक रहेगा। इससे पहले की चुनिंदा राजनीतिक हत्याएं केवल ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में शामिल की जा सकती हैं।

1.12 शोध की प्रमाण-श्रेणियां

मुख्य टाइमलाइन में A+, A और पर्याप्त रूप से पुष्ट B श्रेणी की घटनाएं रहेंगी। C और D श्रेणी की सामग्री को “विवादित अथवा अपुष्ट दावे” वाले परिशिष्ट में रखा जाएगा।

1.13 निष्कर्ष

जम्मू-कश्मीर में टारगेट किलिंग सामान्य हत्या से अलग एक योजनाबद्ध आतंकी रणनीति है। इसमें गोली का निशाना एक व्यक्ति होता है, लेकिन वास्तविक लक्ष्य उससे जुड़ा पूरा समुदाय, आर्थिक गतिविधि, लोकतांत्रिक व्यवस्था अथवा सामान्य स्थिति की भावना होती है।

इसके स्वरूप समय के साथ बदले हैं। शुरुआती दौर में कश्मीरी पंडित बुद्धिजीवी, अधिकारी और सामाजिक नेता प्रमुख लक्ष्य बने। बाद के वर्षों में ग्रामीण अल्पसंख्यक, सिख, राजनीतिक कार्यकर्ता, आत्मसमर्पण कर चुके आतंकी और सुरक्षा बलों के सहयोगी निशाने पर आए। 2019 के बाद प्रवासी मजदूरों, शिक्षकों, सरकारी कर्मचारियों, स्थानीय जनप्रतिनिधियों, पर्यटकों और विकास परियोजनाओं के कर्मचारियों को चुनकर मारने की प्रवृत्ति प्रमुखता से सामने आई।

इसलिए इस शोध में केवल यह नहीं पूछा जाएगा कि “कितने लोग मारे गए?” इससे आगे तीन प्रश्नों की जांच होगी—

उन्हें किस पहचान अथवा भूमिका के कारण चुना गया?

हत्या को संभव बनाने वाला संगठनात्मक और स्थानीय तंत्र क्या था?

हत्या के माध्यम से किस समुदाय, सरकार या व्यवस्था को संदेश दिया गया?

इन्हीं प्रश्नों के आधार पर अगले अध्यायों में जम्मू-कश्मीर की लक्षित हत्याओं का इतिहास, षड्यंत्र, सीमा-पार नेटवर्क और मानव कीमत सामने रखी जाएगी।