1989–2025: पूर्ण तारीखवार घटनाक्रम
प्रमुख पुष्ट लक्षित हत्याएं और चयनित सामूहिक हमले
प्रमुख पुष्ट लक्षित हत्याएं और चयनित सामूहिक हमले
1989 से 2025 तक प्रमुख पुष्ट घटनाएं
यह समयरेखा उपलब्ध पुलिस, जांच एजेंसी, सरकारी, न्यायिक और विश्वसनीय समकालीन विवरणों के आधार पर तैयार की गई है। प्रत्येक वर्ष की सभी नागरिक मौतों को टारगेट किलिंग नहीं माना गया; केवल वे घटनाएं रखी गई हैं जिनमें लक्ष्य-चयन का स्पष्ट धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक, पेशागत अथवा आतंकी आधार दिखाई देता है।
शोध और वर्गीकरण संबंधी आवश्यक टिप्पणी
जम्मू-कश्मीर में 1989 से अब तक हुई प्रत्येक लक्षित हत्या की एक समान, नामवार और सार्वजनिक सरकारी सूची उपलब्ध नहीं है। अलग-अलग स्रोतों में “आतंकवाद में मारे गए नागरिक”, “अल्पसंख्यकों की हत्या”, “राजनीतिक हत्या”, “सुरक्षाकर्मी की हत्या” और “टारगेट किलिंग” को अलग-अलग ढंग से वर्गीकृत किया गया है।
- इस समयरेखा में मुख्यतः निम्न घटनाएं शामिल की गई हैं
- पहचान के आधार पर की गई व्यक्तिगत हत्या
- घर, दुकान अथवा कार्यस्थल में घुसकर की गई हत्या
- अगवा करने के बाद हत्या
- धर्म, समुदाय या पेशा देखकर लोगों को अलग करके मारना
- किसी चुने हुए परिवार, गांव या श्रमिक समूह का नरसंहार
निहत्थे अथवा छुट्टी पर मौजूद पुलिस और सैन्यकर्मियों की हत्या।
सामान्य मुठभेड़, नियंत्रण रेखा पर गोलीबारी, सुरक्षा बलों के काफिले पर युद्धक हमला और ऐसे बम विस्फोट जिनमें लक्ष्य स्पष्ट नहीं था—इस सूची के मुख्य वर्ग में शामिल नहीं किए गए हैं। कुछ बड़े सामूहिक हमले संदर्भ के लिए अलग रूप में दर्ज हैं।
चरण–1: लक्षित आतंक की शुरुआत और पलायन
1989–1990
14 सितंबर 1989—टीका लाल टपलू की हत्या
श्रीनगर में वरिष्ठ अधिवक्ता और जम्मू-कश्मीर भाजपा के तत्कालीन प्रमुख टीका लाल टपलू को उनके घर के निकट गोली मार दी गई। इसे कश्मीरी पंडितों के विरुद्ध संगठित लक्षित हत्याओं की शुरुआत करने वाली प्रमुख घटनाओं में गिना जाता है।
4 नवंबर 1989—न्यायमूर्ति नीलकंठ गंजू की हत्या
जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश नीलकंठ गंजू को श्रीनगर के हरि सिंह स्ट्रीट बाजार में गोली मारी गई। उन्होंने 1968 में जेकेएलएफ के संस्थापक मकबूल बट को एक पुलिस अधिकारी की हत्या के मामले में मृत्युदंड सुनाया था।
27 दिसंबर 1989—प्रेमनाथ भट की हत्या
अनंतनाग में अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता प्रेमनाथ भट की गोली मारकर हत्या की गई। उनकी हत्या ने दक्षिण कश्मीर में रह रहे पंडित परिवारों के बीच भय और अधिक बढ़ा दिया।
25 जनवरी 1990—निहत्थे वायुसेना कर्मियों पर हमला
श्रीनगर के रावलपोरा में वायुसेना की बस की प्रतीक्षा कर रहे निहत्थे कर्मियों पर गोलीबारी हुई। चार वायुसेनाकर्मी मारे गए और 22 घायल हुए। मामला न्यायालय में लंबित रहा और गवाहों की पहचान संबंधी कार्यवाही कई दशक बाद भी चलती रही।
यह सैनिक प्रतिष्ठान पर हमला नहीं, बल्कि दैनिक आवागमन के दौरान चुने गए निहत्थे वायुसेना कर्मियों पर हमला था।
13 फरवरी 1990—दूरदर्शन निदेशक लस्सा कौल की हत्या
दूरदर्शन केंद्र श्रीनगर के निदेशक लस्सा कौल को उनके माता-पिता के घर के बाहर गोली मार दी गई। वे सरकारी प्रसारण व्यवस्था का प्रमुख चेहरा थे। इसलिए हत्या को पंडित समुदाय के साथ सरकारी संचार व्यवस्था को भयभीत करने का प्रयास भी माना गया।
15–19 अप्रैल 1990—नर्स सरला भट का अपहरण और हत्या
SKIMS, श्रीनगर में कार्यरत 27 वर्षीय नर्स सरला भट को 15 अप्रैल को उनके छात्रावास से अगवा किया गया। 19 अप्रैल को उनका शव मिला। हमलावरों की ओर से उन पर मुखबिरी का आरोप लगाया गया था, जिसे बाद में पुलिस ने निराधार बताया।
मामला वर्षों तक निष्क्रिय रहा। 2025 में जम्मू-कश्मीर की SIA ने जांच दोबारा शुरू की। अपहरण, यौन हिंसा और यातना संबंधी विवरण विभिन्न स्रोतों में अलग-अलग हैं; इसलिए वेबसाइट पर पुलिस जांच में पुष्ट तथ्य और बाद के पारिवारिक दावों को पृथक लिखा जाना चाहिए।
29 अप्रैल–1 मई 1990—सर्वानंद कौल प्रेमी और बेटे वीरेंद्र की हत्या
कवि, स्वतंत्रता सेनानी और समाजसेवी सर्वानंद कौल प्रेमी तथा उनके पुत्र वीरेंद्र को घर से अगवा किया गया। 1 मई को दोनों के शव मिले। प्रेमी कश्मीरी भाषा में भगवद्गीता के अनुवाद और सांप्रदायिक सद्भाव के प्रयासों के लिए जाने जाते थे।
21 मई 1990—मीरवाइज मौलवी मोहम्मद फारूक की हत्या
श्रीनगर में प्रमुख धार्मिक और राजनीतिक नेता मीरवाइज मौलवी मोहम्मद फारूक को उनके निवास पर गोली मार दी गई। जम्मू-कश्मीर पुलिस के अनुसार हत्या में हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकवादी शामिल थे और उन्हें “भारत का एजेंट” अथवा शांतिवार्ता समर्थक समझा गया था। इस मामले में एक अभियुक्त को सजा हुई तथा दो अन्य संदिग्धों को 2023 में गिरफ्तार किया गया। मीरवाइज हत्या मामले पर रिपोर्ट
यह घटना दिखाती है कि आतंकियों ने प्रभावशाली स्थानीय मुस्लिम धार्मिक नेताओं को भी नहीं छोड़ा।
25 जून 1990—गिरिजा टिक्कू की हत्या
बांदीपोरा क्षेत्र के सरकारी विद्यालय में कार्यरत गिरिजा टिक्कू पलायन के बाद अपना वेतन लेने घाटी लौटी थीं। उन्हें अगवा कर मार दिया गया। घटना से जुड़े यातना और यौन हिंसा के विवरण व्यापक रूप से प्रकाशित हुए, हालांकि प्रारंभिक पुलिस अभिलेख सार्वजनिक रूप से पूर्ण उपलब्ध नहीं हैं।
1990 के शेष महीने—व्यापक व्यक्तिगत हत्याएं
इस दौरान अनेक पंडित शिक्षकों, कर्मचारियों, दुकानदारों, अधिकारियों और स्थानीय नागरिकों की अलग-अलग स्थानों पर हत्या हुई। इन मामलों की तारीखों और नामों को लेकर सरकारी सूची, सामुदायिक संगठनों की सूची तथा समाचार अभिलेखों में अंतर है।
यही कारण है कि शोध में “प्रत्येक नाम की अंतिम सूची” घोषित करने से पहले FIR, पुलिस रिकॉर्ड और जिला प्रशासन के विवरण का मिलान आवश्यक है। गृह मंत्रालय ने स्वीकार किया है कि शुरुआती लक्षित हमलों के बाद अधिकांश पंडितों, बड़ी संख्या में सिखों तथा कुछ मुस्लिम परिवारों को भी घाटी छोड़नी पड़ी। गृह मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट 2004-05
चरण–2: पलायन के बाद घाटी में बचे अल्पसंख्यकों पर हमले
1991–1996
इन वर्षों में नागरिकों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं, पुलिसकर्मियों, कथित मुखबिरों, आत्मसमर्पण कर चुके आतंकियों तथा अल्पसंख्यक परिवारों की व्यक्तिगत हत्याएं जारी रहीं। लेकिन उपलब्ध सरकारी रिपोर्टों में अधिकांश घटनाएं “आतंकवाद संबंधी नागरिक मृत्यु” के व्यापक आंकड़े में दर्ज हैं, अलग “टारगेट किलिंग” श्रेणी में नहीं।
इसी अवधि में रणनीति में परिवर्तन आया। आतंकियों ने केवल घाटी के शहरी पंडितों के बजाय जम्मू संभाग के डोडा, किश्तवाड़, उधमपुर, राजौरी और पुंछ के दूरस्थ हिंदू गांवों, ग्राम रक्षा समिति सदस्यों तथा राजनीतिक कार्यकर्ताओं को निशाना बनाना शुरू किया।
चरण–3: परिवार और गांव चुनकर किए गए नरसंहार
1997–2006
21 मार्च 1997—संग्रामपोरा नरसंहार
बडगाम जिले के संग्रामपोरा गांव में बंदूकधारियों ने कश्मीरी पंडितों को घरों से निकालकर गोली मारी। सात लोगों की मृत्यु हुई और कई घायल हुए। पुलिस ने बाद में मामला “अनट्रेस्ड” बंद कर दिया।
इस हमले का संभावित उद्देश्य घाटी में बचे पंडित परिवारों को डराना और विस्थापित समुदाय की वापसी की संभावना रोकना था।
25 जनवरी 1998—वंधामा नरसंहार
गांदरबल के वंधामा गांव में 23 कश्मीरी पंडितों की हत्या की गई। हमलावर कथित रूप से सैन्य वर्दी में आए, परिवारों का विश्वास प्राप्त किया और फिर उन पर गोलीबारी की।
इस नरसंहार में महिलाओं और बच्चों को भी नहीं छोड़ा गया। अमेरिकी विदेश विभाग ने उस समय 23 कश्मीरी पंडितों की उनके घरों में हत्या किए जाने की पुष्टि की थी। अमेरिकी विदेश विभाग का वक्तव्य
17 अप्रैल 1998—प्रानकोट-दकिकोट हत्याकांड
तत्कालीन उधमपुर और वर्तमान रियासी जिले के प्रानकोट तथा दकिकोट गांवों में 29 हिंदू नागरिकों की हत्या की गई। मृतकों में महिलाएं और बच्चे शामिल थे। घटना के बाद आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में लोग पलायन कर गए।
19 जून 1998—चपनारी नरसंहार
डोडा जिले के चपनारी में विवाह समारोहों से जुड़े दो समूहों पर हमला किया गया। 26 हिंदू नागरिक मारे गए। पीड़ित विवाह में शामिल होने जा रहे थे और उनके पास किसी प्रकार की सुरक्षा नहीं थी।
20 मार्च 2000—छत्तीसिंहपोरा सिख नरसंहार
अनंतनाग जिले के छत्तीसिंहपोरा में 35 अथवा 36 सिख पुरुषों को घरों से बुलाकर गुरुद्वारों के पास पंक्तिबद्ध किया गया और गोली मार दी गई। हमला तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की भारत यात्रा से ठीक पहले हुआ।
भारत सरकार ने पाकिस्तान-आधारित आतंकियों पर आरोप लगाया, लेकिन हमलावरों की पहचान तथा बाद की जांच को लेकर विवाद बने रहे। इसलिए शोध में सरकार के आरोप और स्वतंत्र रूप से सिद्ध न्यायिक निष्कर्ष के बीच अंतर रखा जाना चाहिए। भारतीय दूतावास का समकालीन वक्तव्य
1 अगस्त 2000—अमरनाथ यात्रियों और नागरिकों पर हमले
पहलगाम के अमरनाथ यात्रा आधार शिविर सहित अलग-अलग स्थानों पर हमलों में 30 से अधिक लोग मारे गए। इनमें तीर्थयात्री, स्थानीय नागरिक और सुरक्षाकर्मी शामिल थे। यह व्यक्तिगत टारगेट किलिंग नहीं, बल्कि धार्मिक यात्रा को चुनकर किया गया सामूहिक हमला था।
21 मई 2002—अब्दुल गनी लोन की हत्या
हुर्रियत नेता अब्दुल गनी लोन की श्रीनगर में मीरवाइज मौलवी फारूक की बरसी पर आयोजित कार्यक्रम के दौरान गोली मारकर हत्या की गई। हमले की जिम्मेदारी और साजिश को लेकर विभिन्न आरोप सामने आए, लेकिन न्यायिक रूप से सभी पहलुओं का अंतिम निर्धारण नहीं हुआ।
14 मई 2002—कालूचक हमला
आतंकियों ने जम्मू के कालूचक में पहले एक बस और फिर सैन्य आवासीय परिसर पर हमला किया। सैनिकों के साथ बड़ी संख्या में महिलाओं और बच्चों को जानबूझकर निशाना बनाया गया। कुल 30 से अधिक लोग मारे गए।
चूंकि सैन्य परिवारों के आवासों में घुसकर महिलाओं और बच्चों को चुना गया, इसलिए इसका नागरिक हिस्सा लक्षित सामूहिक हत्या की श्रेणी में आता है।
13 जुलाई 2002—कासिम नगर नरसंहार
जम्मू के बाहरी क्षेत्र कासिम नगर की झुग्गी बस्ती में रहने वाले गरीब हिंदू मजदूरों पर ग्रेनेड और स्वचालित हथियारों से हमला किया गया। 27 से 29 नागरिक मारे गए और लगभग 30 घायल हुए।
अलग स्रोत मृत्यु-संख्या 27 और 29 बताते हैं। पीड़ितों में महिलाएं, एक बच्चा, श्रमिक और दृष्टिबाधित भिखारी भी शामिल थे। ह्यूमन राइट्स वॉच
23 मार्च 2003—नादिमार्ग नरसंहार
पुलवामा के नादिमार्ग में सैन्य वर्दी पहने आतंकियों ने कश्मीरी पंडित परिवारों को घरों से बाहर निकाला और पंक्ति में खड़ा करके गोली मार दी। 24 लोग मारे गए, जिनमें महिलाएं और बच्चे शामिल थे।
इस घटना के बाद गांव में बचे अधिकांश पंडितों ने घाटी छोड़ दी। यह वापसी और पुनर्वास की संभावनाओं पर सीधा प्रहार था।
30 अप्रैल 2006—डोडा-उधमपुर की सिलसिलेवार हत्याएं
डोडा के कुलहंड और उधमपुर के बसंतगढ़ क्षेत्र में हिंदू ग्रामीणों को पहचान के आधार पर अलग करके गोली मारी गई। अलग-अलग स्रोतों में कुल मृतकों की संख्या 34 से 35 तथा कुछ संकलनों में इससे अधिक बताई गई है। कुलहंड में लगभग 22 लोगों की हत्या की पुष्टि व्यापक रूप से हुई।
यह जम्मू के पर्वतीय क्षेत्रों में धार्मिक पहचान देखकर गांवों को निशाना बनाने की सबसे गंभीर घटनाओं में से एक थी। समकालीन मानवीय रिपोर्ट
चरण–4: निर्वाचित प्रतिनिधि, पुलिसकर्मी और सार्वजनिक आवाजें
2007–2020
9–10 मई 2017—लेफ्टिनेंट उमर फैयाज की हत्या
छुट्टी पर आए निहत्थे सैन्य अधिकारी लेफ्टिनेंट उमर फैयाज को शोपियां में एक पारिवारिक विवाह समारोह से अगवा किया गया। अगले दिन उनका गोलियों से छलनी शव मिला।
वे स्थानीय कश्मीरी मुस्लिम परिवार से थे। हत्या का उद्देश्य कश्मीरी युवाओं को सेना में भर्ती होने से डराना माना गया।
14 जून 2018—पत्रकार शुजात बुखारी की हत्या
वरिष्ठ पत्रकार और राइजिंग कश्मीर के संपादक शुजात बुखारी को श्रीनगर प्रेस एन्क्लेव में गोली मारी गई। उनके दो सुरक्षाकर्मी भी मारे गए। हत्या ने पत्रकारों, संवाद समर्थकों और सार्वजनिक विमर्श में सक्रिय लोगों को गहरा संदेश दिया।
14 जून 2018—सैनिक औरंगजेब का अपहरण और हत्या
पुंछ निवासी सेना के जवान औरंगजेब को छुट्टी पर घर जाते समय पुलवामा से अगवा किया गया और बाद में मार दिया गया। वे आतंकवाद-रोधी अभियान में तैनात रहे थे।
29 अक्टूबर 2019—कुलगाम में बंगाली श्रमिकों की हत्या
पश्चिम बंगाल से आए श्रमिकों को कुलगाम में उनके ठिकाने से बाहर निकालकर गोली मारी गई। पांच श्रमिक घटनास्थल पर मारे गए; बाद के विवरणों में कुल मृतकों की संख्या को लेकर अंतर मिलता है। जम्मू-कश्मीर पुलिस ने हिजबुल मुजाहिदीन के एक मॉड्यूल पर आरोप लगाया।
8 जून 2020—सरपंच अजय पंडिता की हत्या
अनंतनाग में कांग्रेस से जुड़े सरपंच अजय पंडिता ‘भारती’ को गोली मार दी गई। वे कश्मीरी पंडित समुदाय से थे और निर्वाचित पंचायत प्रतिनिधि के रूप में सक्रिय थे।
8 जुलाई 2020—वसीम बारी और परिवार की हत्या
बांदीपोरा में भाजपा नेता शेख वसीम बारी, उनके पिता बशीर अहमद और भाई उमर सुल्तान को दुकान के बाहर गोली मारी गई। तीनों स्थानीय मुसलमान थे।
29 अक्टूबर 2020—कुलगाम में तीन भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या
कुलगाम के वाई.के. पोरा क्षेत्र में भाजपा कार्यकर्ता फिदा हुसैन यातू, उमर राशिद बेग और उमर रमजान हाजम को गोली मार दी गई।
चरण–5: हाइब्रिड आतंक और पिस्तौल आधारित हत्याओं की नई लहर
2021
17 फरवरी 2021—आकाश मेहरा पर हमला
श्रीनगर के कृष्णा ढाबा में मालिक के पुत्र आकाश मेहरा को नजदीक से गोली मारी गई। 28 फरवरी को उनकी मृत्यु हुई। हमला एक विदेशी प्रतिनिधिमंडल की कश्मीर यात्रा के दौरान हुआ था।
29 मार्च 2021—सोपोर में पार्षद और पुलिसकर्मी की हत्या
सोपोर में नगरपालिका पार्षदों की बैठक पर हमला हुआ। पार्षद रियाज अहमद और SPO शफाकत अहमद मारे गए।
2 जून 2021—राकेश पंडिता की हत्या
भाजपा पार्षद राकेश पंडिता को त्राल में एक परिचित के घर जाते समय गोली मार दी गई।
22 जून 2021—पुलिस निरीक्षक परवेज अहमद डार की हत्या
श्रीनगर में मस्जिद से घर लौट रहे पुलिस निरीक्षक परवेज अहमद डार को गोली मारी गई।
27 जून 2021—SPO फैयाज अहमद और परिवार पर हमला
पुलवामा के हरिपरिगाम में विशेष पुलिस अधिकारी फैयाज अहमद के घर में घुसकर गोलीबारी की गई। फैयाज अहमद, उनकी पत्नी राजा बेगम और बेटी रफिया मारे गए।
9 अगस्त 2021—सरपंच गुलाम रसूल डार और पत्नी की हत्या
अनंतनाग में भाजपा से जुड़े सरपंच गुलाम रसूल डार और उनकी पत्नी जवाहिरा बेगम को गोली मार दी गई।
17 अगस्त 2021—जावेद अहमद डार की हत्या
कुलगाम में भाजपा कार्यकर्ता जावेद अहमद डार की घर के पास हत्या कर दी गई।
19 अगस्त 2021—गुलाम हसन लोन की हत्या
कुलगाम में अपनी पार्टी से जुड़े राजनीतिक कार्यकर्ता गुलाम हसन लोन को घर के पास गोली मारी गई।
2 अक्टूबर 2021—माजिद अहमद गोजरी और मोहम्मद शफी डार की हत्या
श्रीनगर में अलग-अलग हमलों में दो स्थानीय मुस्लिम नागरिकों की हत्या हुई।
5 अक्टूबर 2021—एक दिन में तीन नागरिकों की हत्या
- श्रीनगर में फार्मासिस्ट माखन लाल बिंदरू
- श्रीनगर में बिहार निवासी रेहड़ी विक्रेता वीरेंद्र पासवान
बांदीपोरा में टैक्सी चालक मोहम्मद शफी लोन।
तीनों अलग समुदाय और पेशे से थे, लेकिन सभी आसान नागरिक लक्ष्य थे।
7 अक्टूबर 2021—विद्यालय के भीतर दो शिक्षकों की हत्या
ईदगाह, श्रीनगर के सरकारी विद्यालय में प्रधानाचार्या सुपिंदर कौर और शिक्षक दीपक चंद को दूसरे कर्मचारियों से अलग करके गोली मारी गई।
16 अक्टूबर 2021—दो गैर-स्थानीय कामगारों की हत्या
श्रीनगर में बिहार निवासी रेहड़ी विक्रेता अरविंद कुमार शाह और पुलवामा में उत्तर प्रदेश के बढ़ई सगीर अहमद की हत्या की गई।
17 अक्टूबर 2021—कुलगाम में बिहार के श्रमिकों पर हमला
वानपोह, कुलगाम में किराये के कमरे में घुसकर बिहार निवासी राजा ऋषिदेव और जोगिंदर ऋषिदेव की हत्या की गई। चुनचुन ऋषिदेव घायल हुए।
अक्टूबर के केवल दो सप्ताह में 11 नागरिक मारे गए। 2021 की अक्टूबर समयरेखा
चरण–6: सरकारी कर्मचारियों और अल्पसंख्यकों पर केंद्रित हमले
2022
9 मार्च 2022—सरपंच समीर अहमद भट की हत्या
श्रीनगर के बाहरी क्षेत्र खानमोह में निर्दलीय सरपंच समीर अहमद भट को घर में घुसकर गोली मारी गई।
13 अप्रैल 2022—सतीश कुमार सिंह की हत्या
कुलगाम के काकरान गांव में स्थानीय राजपूत समुदाय के सतीश कुमार सिंह को गोली मारी गई। अगले दिन उनकी मृत्यु हुई।
12 मई 2022—राहुल भट की कार्यालय में हत्या
प्रधानमंत्री पुनर्वास पैकेज के अंतर्गत कार्यरत कश्मीरी पंडित कर्मचारी राहुल भट को चाडूरा तहसील कार्यालय में घुसकर गोली मारी गई।
13 मई 2022—पुलिसकर्मी रियाज अहमद ठोकर की हत्या
पुलवामा में छुट्टी पर घर आए पुलिसकर्मी रियाज अहमद ठोकर को उनके निवास पर गोली मारी गई।
24 मई 2022—पुलिसकर्मी सैफुल्लाह कादरी की हत्या
श्रीनगर में घर के निकट सैफुल्लाह कादरी पर हमला हुआ। उनकी बेटी भी गोली लगने से घायल हुई।
25 मई 2022—कलाकार अमरीन भट की हत्या
बडगाम में टीवी कलाकार अमरीन भट को घर के बाहर गोली मारी गई। उनका नाबालिग भतीजा घायल हुआ।
31 मई 2022—शिक्षिका रजनी बाला की हत्या
2 जून 2022—बैंक प्रबंधक विजय कुमार की हत्या
राजस्थान निवासी विजय कुमार को कुलगाम की बैंक शाखा के भीतर गोली मार दी गई।
2 जून 2022—दिलखुश कुमार की हत्या
उसी दिन बडगाम में बिहार निवासी ईंट-भट्ठा मजदूर दिलखुश कुमार और पंजाब के एक श्रमिक पर हमला हुआ। दिलखुश की मृत्यु हो गई।
12 अगस्त 2022—मोहम्मद अमरेज की हत्या
बांदीपोरा में बिहार निवासी श्रमिक मोहम्मद अमरेज को किराये के ठिकाने पर गोली मारी गई।
16 अगस्त 2022—सुनील कुमार भट की हत्या
शोपियां के चोटीगाम में सेब के बाग में सुनील कुमार भट को गोली मार दी गई। उनके रिश्तेदार पितांबरनाथ भट घायल हुए।
15 अक्टूबर 2022—पूरन कृष्ण भट की हत्या
शोपियां के चौधरीगुंड में कश्मीरी पंडित पूरन कृष्ण भट को उनके घर के बाहर गोली मारी गई।
18 अक्टूबर 2022—मनीष कुमार और रामसागर की हत्या
उत्तर प्रदेश के कन्नौज निवासी दोनों श्रमिकों के किराये के कमरे पर ग्रेनेड फेंका गया। दोनों सो रहे थे। पुलिस ने इसे हाइब्रिड आतंकी द्वारा किया गया लक्षित हमला बताया। घटना का विवरण
चरण–7: राजौरी से पुलवामा तक
2023
1–2 जनवरी 2023—डांगरी, राजौरी हमला
1 जनवरी को बंदूकधारियों ने हिंदू परिवारों के घरों को चुनकर गोलीबारी की। अगले दिन घटनास्थल पर रखा IED फट गया। दोनों घटनाओं में सात लोगों की मृत्यु हुई तथा लगभग 12 लोग घायल हुए।
26 फरवरी 2023—संजय शर्मा की हत्या
पुलवामा के अचन गांव में कश्मीरी पंडित और बैंक सुरक्षा गार्ड संजय शर्मा को घर से कुछ दूरी पर गोली मार दी गई। SIA ने बाद में कहा कि जांच में सीमा पार से उत्पन्न साजिश सामने आई और हत्या का उद्देश्य सांप्रदायिक सद्भाव तथा शांति को बाधित करना था। SIA आरोपपत्र संबंधी रिपोर्ट
29 मई 2023—दीपू कुमार की हत्या
उधमपुर निवासी दीपू कुमार को अनंतनाग में उस मनोरंजन परिसर के पास गोली मारी गई, जहां वे काम करते थे।
29 अक्टूबर 2023—निरीक्षक मसरूर अहमद वानी पर हमला
श्रीनगर में क्रिकेट खेल रहे पुलिस निरीक्षक मसरूर अहमद वानी को गोली मारी गई। गंभीर रूप से घायल वानी की 7 दिसंबर 2023 को दिल्ली में उपचार के दौरान मृत्यु हुई।
30 अक्टूबर 2023—मुकेश कुमार की हत्या
पुलवामा में उत्तर प्रदेश निवासी श्रमिक मुकेश कुमार को गोली मार दी गई।
चरण–8: मजदूर, राजनीतिक कार्यकर्ता, तीर्थयात्री और परियोजना कर्मचारी
2024
7–8 फरवरी 2024—पंजाब के दो श्रमिकों पर हमला
श्रीनगर में पंजाब निवासी अमृतपाल सिंह और रोहित मसीह को गोली मारी गई। अमृतपाल की मौके पर मृत्यु हुई; रोहित ने अगले दिन दम तोड़ दिया।
17 अप्रैल 2024—राजा शाह की हत्या
बिहार निवासी श्रमिक राजा शाह को अनंतनाग के बिजबिहाड़ा क्षेत्र में गोली मार दी गई।
18 मई 2024—ऐजाज अहमद शेख की हत्या
शोपियां में पूर्व सरपंच और भाजपा कार्यकर्ता ऐजाज अहमद शेख को गोली मार दी गई।
18 मई 2024—पर्यटक दंपती पर हमला
उसी दिन अनंतनाग के यन्नार क्षेत्र में जयपुर निवासी तबरेज खान और फरहा खान पर गोलीबारी हुई। दोनों घायल हुए। यह पर्यटन उद्योग को निशाना बनाने वाला चयनित हमला था।
9 जून 2024—रियासी तीर्थयात्री बस हमला
शिवखोड़ी से लौट रही तीर्थयात्रियों की बस पर गोलीबारी की गई। बस खाई में गिर गई। नौ लोगों की मृत्यु हुई और 33 से अधिक घायल हुए।
यह व्यक्तिगत टारगेट किलिंग नहीं, बल्कि धार्मिक यात्रियों को चुनकर किया गया सामूहिक आतंकी हमला था।
18 अक्टूबर 2024—अशोक चौहान की हत्या
बिहार निवासी श्रमिक अशोक चौहान का शव शोपियां में मिला। उन्हें गोली मारी गई थी।
20 अक्टूबर 2024—गगनगीर सुरंग परियोजना हमला
गांदरबल के गगनगीर में सुरंग परियोजना से जुड़े कर्मचारियों के शिविर पर हमला किया गया। स्थानीय डॉक्टर शाहनवाज अहमद डार सहित सात लोगों की हत्या हुई और कम से कम पांच घायल हुए।
7 नवंबर 2024—ग्राम रक्षा समूह के दो सदस्यों की हत्या
किश्तवाड़ में Village Defence Guard से जुड़े नजीर अहमद और कुलदीप कुमार को अगवा कर मार दिया गया। इस तरह आतंकियों ने जम्मू संभाग में स्थानीय ग्रामीण सुरक्षा ढांचे को भयभीत करने का प्रयास किया।
चरण–9: पर्यटन को निशाना बनाकर धार्मिक पहचान के आधार पर हत्याएं
2025
22 अप्रैल 2025—पहलगाम-बैसरन नरसंहार
पहलगाम के निकट बैसरन घाटी में आतंकियों ने पर्यटकों पर नजदीक से गोलीबारी की। 25 पर्यटकों और एक स्थानीय नागरिक सहित 26 लोग मारे गए।
भारत सरकार के अनुसार हमलावरों ने पीड़ितों की धार्मिक पहचान के आधार पर उन्हें चुना। मृतकों में नौसेना और वायुसेना अधिकारी, सरकारी कर्मचारी, कारोबारी, इंजीनियर और परिवारों के साथ छुट्टी मनाने आए नागरिक शामिल थे। स्थानीय मुस्लिम पोनी संचालक सैयद आदिल हुसैन शाह भी मारे गए।
रक्षा मंत्रालय ने जून 2025 में कहा कि TRF ने हमले की जिम्मेदारी ली थी और उसका पैटर्न लश्कर-ए-तैयबा के पुराने हमलों से मेल खाता था। जुलाई 2025 में गृह मंत्री ने संसद को बताया कि गगनगीर और पहलगाम हमलों में शामिल तीन आतंकियों को ऑपरेशन महादेव में मार दिया गया। रक्षा मंत्रालय, गृह मंत्रालय/संसदीय वक्तव्य
यह घटना सामान्य व्यक्तिगत टारगेट किलिंग से बड़ी थी। इसका अधिक सटीक वर्गीकरण होगा—धार्मिक पहचान के आधार पर किया गया लक्षित सामूहिक नरसंहार।
समग्र कालखंड का निष्कर्ष
1989 से 2025 तक टारगेट किलिंग की रणनीति को मोटे तौर पर छह चरणों में बांटा जा सकता है:
इस समयरेखा से स्पष्ट है कि हमलों का रूप बदलता रहा, लेकिन मूल सिद्धांत समान रहा—ऐसे व्यक्ति या छोटे समूह को चुनना जिसकी हत्या का मनोवैज्ञानिक प्रभाव उसके वास्तविक आकार से कई गुना अधिक हो। आतंकियों का लक्ष्य केवल हत्या करना नहीं, बल्कि पलायन, सांप्रदायिक तनाव, प्रशासनिक निष्क्रियता और व्यापक भय पैदा करना था।