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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–011 · अध्याय 10

वंधामा नरसंहार, 1998

तारीख और मृतक संख्या के अंतर से लेकर हमले की तैयारी, जांच और रणनीतिक प्रभाव तक

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskसंरचना संशोधित · 2 अगस्त 2026

तारीख और मृतक संख्या के अंतर से लेकर हमले की तैयारी, जांच और रणनीतिक प्रभाव तक

25 जनवरी या 26 जनवरी—सही तारीख क्या है?

वंधामा हत्याकांड को कुछ अभिलेख 25 जनवरी 1998 की घटना बताते हैं, जबकि ह्यूमन राइट्स वॉच सहित अनेक अंतरराष्ट्रीय स्रोत इसकी तारीख 26 जनवरी लिखते हैं। इसका कारण यह है कि हमला 25 और 26 जनवरी की मध्यरात्रि के आसपास हुआ था। इसलिए शोध की दृष्टि से सबसे सटीक उल्लेख “25–26 जनवरी 1998 की मध्यरात्रि” है।

जम्मू-कश्मीर पुलिस के बाद के अभिलेख में 23 पंडितों की हत्या 25 जनवरी को दर्ज है। ह्यूमन राइट्स वॉच ने इसे 26 जनवरी अर्थात गणतंत्र दिवस की घटना बताया। समकालीन अमेरिकी विदेश विभाग के बयान में भी वंधामा के 23 कश्मीरी पंडितों की उनके घरों में हत्या की पुष्टि की गई थी। अमेरिकी विदेश विभाग का समकालीन बयान, ह्यूमन राइट्स वॉच रिपोर्ट

वंधामा का सामाजिक संदर्भ

वंधामा श्रीनगर से लगभग 25–27 किलोमीटर दूर स्थित एक गांव था, जो उस समय मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला के गांदरबल निर्वाचन क्षेत्र में आता था। 1990 के बड़े पलायन के बावजूद कुछ कश्मीरी पंडित परिवारों ने गांव नहीं छोड़ा था। वे अपने मुस्लिम पड़ोसियों के बीच रहते रहे और स्थानीय जीवन तथा अर्थव्यवस्था का हिस्सा बने रहे।

इसलिए वंधामा केवल 23 व्यक्तियों की हत्या नहीं थी। हमले का व्यापक संदेश उन कश्मीरी पंडितों तक भी पहुंचा जो आतंक, धमकियों और पलायन के बावजूद घाटी में टिके हुए थे। इसने यह धारणा तोड़ दी कि दूरदराज के गांवों में रह रहे पुराने स्थानीय परिवार अपने सामाजिक संबंधों के कारण सुरक्षित रह सकते हैं।

वंधामा हमला ऐसे समय हुआ जब विस्थापित पंडितों की घाटी वापसी की संभावनाओं पर राजनीतिक चर्चा प्रारंभ हो रही थी। घटना पर प्रकाशित एक समकालीन रिपोर्ट ने इसे पंडितों की वापसी की उम्मीदों पर गंभीर आघात बताया था। इंडिया टुडे की फरवरी 1998 की रिपोर्ट

हमले की रात क्या हुआ?

जीवित बचे विनोद कुमार धर के बयान के अनुसार हथियारबंद लोग भारतीय सेना जैसी वर्दी पहनकर गांव में आए। सैन्य वर्दी का इस्तेमाल अत्यंत सुनियोजित मनोवैज्ञानिक हथकंडा था। सुरक्षा बलों की वर्दी देखकर परिवारों ने तत्काल खतरे का अनुमान नहीं लगाया और हमलावरों को घरों तक पहुंचने का अवसर मिल गया।

विनोद के विवरण के आधार पर प्रकाशित रिपोर्टों में कहा गया कि बंदूकधारियों ने परिवार के लोगों से बातचीत की और उनके साथ चाय भी पी। वे कथित रूप से वायरलेस या रेडियो संदेश की प्रतीक्षा करते रहे, जिससे संकेत मिला कि दूसरे पंडित परिवारों को भी एक साथ घेर लिया गया है। इसके बाद चार पंडित परिवारों के लोगों को इकट्ठा कर स्वचालित हथियारों से गोलियां चलाई गईं। ग्रेटर कश्मीर में दर्ज प्रत्यक्षदर्शी विवरण

समकालीन इंडिया टुडे रिपोर्ट के अनुसार हमलावरों की संख्या लगभग 28 बताई गई थी। यह संख्या विनोद के प्रत्यक्षदर्शी विवरण पर आधारित थी, कोई न्यायिक रूप से स्थापित तथ्य नहीं। इसी रिपोर्ट में मृतकों का विभाजन नौ महिलाओं, चार बच्चों और दस पुरुषों के रूप में किया गया। विनोद के माता-पिता, दो बहनें और दोनों भाई भी मारे गए थे।

ह्यूमन राइट्स वॉच ने हमले के बाद एक हिंदू मंदिर और एक मकान को आग लगाए जाने की भी पुष्टि की। धार्मिक स्थल को जलाना बताता है कि उद्देश्य केवल व्यक्तियों की हत्या करना नहीं, बल्कि गांव में समुदाय की सांस्कृतिक उपस्थिति और भविष्य में वापसी की संभावना पर भी प्रहार करना था।

अकेला जीवित प्रत्यक्षदर्शी

विनोद कुमार धर उस समय लगभग 14 वर्ष के थे। प्रकाशित विवरणों के अनुसार वह किसी तरह गोलीबारी से बचकर निकल गए और छिप गए। घटना में उनके परिवार के छह सदस्य मारे गए। उनके बयान ने हमलावरों के कपड़ों, संख्या, घर में प्रवेश करने की पद्धति और परिवारों को एक साथ निशाना बनाए जाने के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दी।

इस मामले में अलग से किसी गंभीर रूप से घायल व्यक्ति की विश्वसनीय संख्या उपलब्ध नहीं है। इसलिए घटना के आंकड़ों में 23 मृतक और एक जीवित प्रत्यक्षदर्शी लिखना अधिक उचित है। विनोद को “घायल” बताने के बजाय “एकमात्र जीवित प्रत्यक्षदर्शी” कहना उपलब्ध स्रोतों के अधिक अनुरूप है।

23 या 24 मृतक?

पुलिस अभिलेख, अमेरिकी विदेश विभाग, ह्यूमन राइट्स वॉच और अधिकांश समकालीन रिपोर्टें 23 कश्मीरी पंडितों की हत्या दर्ज करती हैं। कुछ बहुत बाद की स्थानीय रिपोर्टों में 23 पंडितों के अतिरिक्त एक कश्मीरी मुस्लिम के मारे जाने का उल्लेख मिलता है, जिससे संख्या 24 बताई जाती है।

यह अतिरिक्त मृत्यु समकालीन आधिकारिक और अंतरराष्ट्रीय अभिलेखों में समान रूप से दर्ज नहीं है। इसलिए शोध डेटाबेस में मुख्य संख्या 23 पुष्ट पंडित मृतक रखी जानी चाहिए। “कुल 24” को केवल एक वैकल्पिक स्थानीय विवरण के रूप में नोट किया जा सकता है, पुष्ट आंकड़े के रूप में नहीं।

हमला इतना सुनियोजित कैसे था?

घटना के विवरण कम-से-कम चार स्तरों की तैयारी की ओर संकेत करते हैं:

हमलावरों को गांव में पंडित परिवारों के घरों की जानकारी थी।

वे अलग-अलग घरों तक लगभग एक साथ पहुंचे।

उन्होंने सैन्य वर्दी का इस्तेमाल कर परिवारों का विश्वास जीता।

हमलावर सुरक्षित रास्ते से आए और हत्या के बाद निकलने में सफल रहे।

कुछ रिपोर्टों में विनोद के हवाले से यह भी कहा गया कि उसने हमलावरों में से कुछ चेहरों को पहले परिवार के घर आते देखा था। यदि यह विवरण सही है तो हमले से पहले निगरानी, संपर्क अथवा क्षेत्र की टोह लिए जाने की संभावना बनती है।

फिर भी इससे पूरे गांव या किसी समुदाय को स्थानीय सहयोगी मान लेना तथ्यात्मक रूप से अनुचित होगा। किसी न्यायालय ने किसी स्थानीय व्यक्ति को साजिश, सूचना देने या शरण उपलब्ध कराने का दोषी नहीं ठहराया। उपलब्ध सामग्री केवल यह दिखाती है कि हमलावरों के पास विस्तृत स्थानीय जानकारी थी; यह जानकारी उन्हें किस व्यक्ति या नेटवर्क से मिली, जांच स्थापित नहीं कर सकी।

समय का चयन—गणतंत्र दिवस और शब-ए-कद्र

हमला गणतंत्र दिवस से ठीक पहले किया गया। इस समय सुरक्षा व्यवस्था सामान्यतः अधिक कड़ी रहती है और राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय मीडिया का ध्यान कश्मीर पर होता है। इसलिए 25–26 जनवरी का चयन प्रचारात्मक प्रभाव बढ़ाने की रणनीति हो सकता है।

उसी रात रमजान की शब-ए-कद्र होने की बात भी स्थानीय विवरणों में आती है। गांव के अनेक मुस्लिम निवासी धार्मिक प्रार्थनाओं में व्यस्त थे। कुछ स्थानीय लोगों ने बाद में कहा कि उन्होंने गोलियों की आवाज सुनी, लेकिन डर और भ्रम के कारण तत्काल बाहर नहीं निकल सके। हमलावरों ने धार्मिक गतिविधियों, रात के अंधेरे और गणतंत्र दिवस की सुरक्षा संबंधी हलचल—तीनों परिस्थितियों का लाभ उठाया हो सकता है।

लेकिन हमले की तारीख से कोई विशिष्ट धार्मिक उद्देश्य स्वतः प्रमाणित नहीं होता। पुष्ट तथ्य यह है कि पीड़ितों का चयन उनकी कश्मीरी पंडित पहचान के आधार पर किया गया और हमला ऐसे समय किया गया जब उसका राजनीतिक तथा मनोवैज्ञानिक प्रभाव बहुत व्यापक हो सकता था।

किस संगठन ने हमला किया?

वंधामा मामले में तथ्य और आरोप अलग रखना आवश्यक है।

घटना के तत्काल बाद अमेरिकी विदेश विभाग ने हमलावरों को “अज्ञात आतंकवादी” कहा। ह्यूमन राइट्स वॉच ने घटना को आतंकवादी अथवा उग्रवादी हिंसा की श्रेणी में रखा, पर किसी एक संगठन का निर्णायक नाम नहीं दिया।

अलग-अलग समय पर हिजबुल मुजाहिदीन, लश्कर-ए-तैयबा और हरकत-उल-अंसार का नाम इस घटना से जोड़ा गया। कुछ सुरक्षा संबंधी विवरणों में हिजबुल कमांडर अब्दुल हमीद गडा को जिम्मेदार बताया गया, जबकि पुलिस के एक कथित प्रारंभिक संस्करण में हरकत-उल-अंसार के 21 आतंकवादियों की संलिप्तता का दावा किया गया।

कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति ने इन दावों पर प्रश्न उठाए। संगठन के अनुसार पुलिस ने फरवरी 1998 में एक घायल आतंकवादी से मिली कथित जानकारी के आधार पर हरकत-उल-अंसार के सदस्यों को जिम्मेदार बताया और बाद में दावा किया कि उनमें से अधिकांश अलग-अलग मुठभेड़ों में मारे गए। समिति ने सूचना के अधिकार से प्राप्त जानकारियों के आधार पर पुलिस के कुछ मुठभेड़ संबंधी दावों में विसंगतियां बताईं और दोबारा जांच की मांग की। जांच पर कश्मीरी पंडित संगठन के सवाल

इन दावों की किसी आपराधिक मुकदमे में न्यायिक परीक्षा नहीं हुई। अतः शोध में यह नहीं लिखा जाना चाहिए कि किसी एक संगठन का अपराध “सिद्ध” हो चुका है। सटीक निष्कर्ष यह है:

सुरक्षा एजेंसियों और विभिन्न रिपोर्टों ने हरकत-उल-अंसार, हिजबुल मुजाहिदीन तथा लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े आतंकवादियों पर संदेह व्यक्त किया, लेकिन पुलिस अपराधियों को न्यायिक रूप से पहचानने और दोषसिद्ध कराने में विफल रही।

एफआईआर और जांच की विफलता

कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति के अनुसार 26 जनवरी 1998 को गांदरबल पुलिस स्टेशन में एफआईआर संख्या 22/1998 दर्ज की गई थी। इसमें हत्या, आगजनी, धार्मिक स्थल को नुकसान पहुंचाने और शस्त्र कानून की धाराएं लगाई गईं। समिति का दावा है कि मामला लगभग पांच महीने बाद, 15 जून 1998 को, “अनट्रेस्ड” बताकर बंद कर दिया गया।

जम्मू-कश्मीर पुलिस के 2008 के सर्वेक्षण से संबंधित प्रकाशित विवरण भी पुष्टि करता है कि वंधामा हत्याकांड के अपराधी खोजे नहीं जा सके। इसी सर्वेक्षण में कहा गया था कि 1989 के बाद पंडितों की हत्याओं से जुड़े 140 मामलों में केवल 24 में आरोपपत्र दाखिल हुए और 115 मामलों में आरोपी पहचाने नहीं जा सके। वंधामा इन्हीं अनसुलझे मामलों में शामिल था। इंडियन एक्सप्रेस—पुलिस रिकॉर्ड और अनसुलझी जांच

जांच की सबसे बड़ी कमी यह रही कि:

हमलावरों की निश्चित पहचान नहीं हो सकी;

कथित जीवित या मृत आतंकवादियों को घटना से जोड़ने वाले फॉरेंसिक प्रमाण सार्वजनिक नहीं हुए;

स्थानीय टोह और लॉजिस्टिक सहायता का नेटवर्क स्थापित नहीं किया गया;

प्रत्यक्षदर्शी के बयान से आगे बढ़कर न्यायालय में परीक्षण योग्य साक्ष्य प्रस्तुत नहीं हुए;

किसी आरोपी के विरुद्ध मुकदमा और दोषसिद्धि नहीं हुई।

इस कारण वंधामा प्रशासनिक रूप से दर्ज, राजनीतिक रूप से चर्चित, लेकिन न्यायिक रूप से अनसुलझा नरसंहार बना रहा।

सुरक्षा व्यवस्था पर प्रश्न

इतनी बड़ी संख्या में हथियारबंद लोगों का सैन्य वर्दी पहनकर गांव पहुंचना, चार घरों में जाना, लोगों को इकट्ठा करना, गोलीबारी और आगजनी करना तथा फिर निकल जाना गंभीर सुरक्षा प्रश्न पैदा करता है। घटना गणतंत्र दिवस की पूर्वसंध्या पर हुई, जब पूरे क्षेत्र में सामान्य दिनों की तुलना में अधिक सुरक्षा सतर्कता अपेक्षित थी।

मुख्य प्रश्न आज भी अनुत्तरित हैं:

  • हमलावर किस रास्ते से गांव पहुंचे और वापस गए?
  • सैन्य वर्दियां और संचार उपकरण कहां से आए?
  • उन्हें सभी पंडित परिवारों की सटीक जानकारी किसने दी?
  • क्या हमले से पहले परिवारों और गांव की निगरानी हुई थी?
  • क्या स्थानीय स्तर पर कोई ओवरग्राउंड सहायता उपलब्ध थी?
  • सुरक्षा एजेंसियों को इतने बड़े सशस्त्र समूह की गतिविधि का पता क्यों नहीं चला?

इन प्रश्नों का उठना उचित है, लेकिन प्रमाण के अभाव में सुरक्षा बलों अथवा स्थानीय निवासियों की मिलीभगत को स्थापित तथ्य नहीं कहा जा सकता। यह जांच की असफलता से पैदा हुआ संदेह है, न्यायिक निष्कर्ष नहीं।

पलायन और वापसी की संभावनाओं पर प्रभाव

वंधामा ने घाटी में बचे पंडितों को अत्यंत भयावह संदेश दिया—न पलायन से बचने का निर्णय सुरक्षा की गारंटी था और न पुराने सामाजिक संबंध। हमले के बाद कई गैर-प्रवासी पंडित परिवारों ने अपनी सुरक्षा पर पुनर्विचार किया। विस्थापित परिवारों में यह धारणा मजबूत हुई कि पर्याप्त सुरक्षा और न्याय के बिना घाटी वापसी संभव नहीं है।

हत्याकांड के बाद दिल्ली और जम्मू में विरोध प्रदर्शन हुए। दिल्ली में प्रदर्शनकारी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तक पहुंचने का प्रयास करते हुए पुलिस से भिड़े और कम-से-कम 11 लोग घायल हुए। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल 28 जनवरी को वंधामा पहुंचे। उनके साथ राज्यपाल के.वी. कृष्णराव, मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला और केंद्रीय मंत्री सैफुद्दीन सोज भी थे। राष्ट्रीय शोक और सरकारी आश्वासनों के बावजूद पीड़ित परिवारों को आपराधिक न्याय नहीं मिल सका।

वंधामा का रणनीतिक अर्थ

टारगेट किलिंग के अध्ययन में वंधामा पांच कारणों से महत्वपूर्ण है:

यह व्यक्तिगत हत्या नहीं, पहचान के आधार पर किया गया सामूहिक हमला था।

निशाना वे पंडित बने जिन्होंने 1990 में घाटी नहीं छोड़ी थी।

सैन्य वर्दी का इस्तेमाल कर सुरक्षा और विश्वास—दोनों को हथियार बनाया गया।

महिलाओं और बच्चों सहित पूरे परिवारों की हत्या ने समुदाय की भावी पीढ़ी को भी निशाना बनाया।

हमले ने पंडितों की वापसी तथा सामाजिक पुनर्मिलन की संभावनाओं को प्रत्यक्ष नुकसान पहुंचाया।

इसका उद्देश्य केवल 23 लोगों की जान लेना नहीं था। यह गांव में बची अल्पसंख्यक उपस्थिति को समाप्त करने, विस्थापित लोगों की वापसी रोकने और कश्मीर के सामाजिक ताने-बाने में भय तथा अविश्वास स्थायी करने वाला हमला था।

शोध निष्कर्ष

वंधामा नरसंहार के बारे में तीन स्तरों पर निष्कर्ष निकाले जाने चाहिए।

स्थापित तथ्य: 25–26 जनवरी 1998 की रात सैन्य वर्दी पहने हथियारबंद लोगों ने वंधामा में 23 कश्मीरी पंडितों—10 पुरुषों, 9 महिलाओं और 4 बच्चों—की हत्या की। मंदिर और एक मकान को आग लगाई गई। विनोद कुमार धर एकमात्र प्रमुख जीवित प्रत्यक्षदर्शी थे।

एजेंसी एवं मीडिया दावे: अलग-अलग विवरणों में हरकत-उल-अंसार, हिजबुल मुजाहिदीन, लश्कर-ए-तैयबा और अब्दुल हमीद गडा का नाम आया। हमले के लिए स्थानीय जानकारी और लॉजिस्टिक सहायता की संभावना भी व्यक्त की गई।

न्यायिक स्थिति: किसी संगठन, कमांडर या स्थानीय सहयोगी की जिम्मेदारी अदालत में सिद्ध नहीं हुई। पुलिस ने अपराधियों को “अनट्रेस्ड” माना और कोई अंतिम दोषसिद्धि नहीं हुई।

यही वंधामा की सबसे कटु विरासत है—घटना और पीड़ितों की पहचान निर्विवाद है, लेकिन हमलावरों की अंतिम कानूनी पहचान, साजिश की पूरी शृंखला और जवाबदेही आज भी स्थापित नहीं हो सकी। इसीलिए वंधामा केवल आतंकवाद का मामला नहीं, बल्कि दशकों से लंबित न्याय का भी मामला है।