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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–011 · अध्याय 05

सीमा पार से लक्ष्य तक: घुसपैठ और लॉजिस्टिक नेटवर्क

मार्ग, हथियार, ड्रोन, हैंडलर, गाइड, रिसीवर, वित्त, संचार और रेकी

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskप्रथम संस्करण · 1 अगस्त 2026

मार्ग, हथियार, ड्रोन, हैंडलर, गाइड, रिसीवर, वित्त, संचार और रेकी

प्रस्तावना: सीमा पार करना केवल पहला चरण

जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद की निरंतरता को समझने के लिए “घुसपैठ” को केवल नियंत्रण रेखा पार कर किसी आतंकवादी के भारतीय क्षेत्र में प्रवेश करने तक सीमित नहीं समझना चाहिए। वास्तविकता में यह एक लंबी आपूर्ति और सहायता श्रृंखला है। इसमें पाकिस्तान या पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर स्थित प्रशिक्षण केंद्र और लॉन्च-पैड, सीमा पार कराने वाले गाइड, हथियारों की खेप, संचार उपकरण, स्थानीय ओवरग्राउंड वर्कर, सुरक्षित ठिकाने, वाहन, धन और लक्ष्य की पहचान करने वाले संपर्क शामिल होते हैं।

कोई आतंकवादी सीमा पार करने में सफल हो जाए, लेकिन उसे स्थानीय स्तर पर भोजन, आश्रय, हथियार और सूचना न मिले, तो उसकी सक्रियता सीमित रह सकती है। इसके विपरीत ड्रोन अथवा तस्करी के माध्यम से भेजा गया एक छोटा हथियार भी स्थानीय “हाइब्रिड आतंकी” के हाथ में पहुंचकर टारगेट किलिंग में इस्तेमाल हो सकता है। इसीलिए सीमा पार घुसपैठ और स्थानीय लॉजिस्टिक नेटवर्क को एक संयुक्त तंत्र के रूप में देखना आवश्यक है।

1. नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय सीमा में अंतर

  • जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान की ओर से प्रवेश के दो प्रमुख भौगोलिक क्षेत्र हैं

नियंत्रण रेखा—Line of Control या LoC: यह भारत और पाकिस्तान के नियंत्रण वाले जम्मू-कश्मीर क्षेत्रों को अलग करती है। इसका बड़ा हिस्सा ऊंचे पर्वतों, घने जंगलों, गहरी घाटियों, नदियों और बर्फीले दर्रों से होकर गुजरता है। यहां भारतीय सेना मुख्य सुरक्षा दायित्व संभालती है।

अंतरराष्ट्रीय सीमा—International Border या IB: जम्मू, सांबा और कठुआ क्षेत्र में भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा का अपेक्षाकृत समतल, कृषि प्रधान और कुछ स्थानों पर नदी-नालों वाला भूभाग है। यहां सीमा सुरक्षा बल—BSF—प्रमुख भूमिका निभाता है।

आतंकवादी संगठन परिस्थितियों के अनुसार दोनों क्षेत्रों का उपयोग करते रहे हैं। जब घाटी की ओर जाने वाले LoC मार्गों पर दबाव बढ़ा, तब जम्मू क्षेत्र, भूमिगत सुरंगों, नदी-नालों तथा ड्रोन के माध्यम से घुसपैठ और हथियार भेजने की कोशिशें बढ़ीं।

2. सार्वजनिक जानकारी में प्रमुख घुसपैठ क्षेत्र

सुरक्षा कारणों से घुसपैठ के सटीक रास्ते, चौकियां, दर्रे और निगरानी की कमजोरियां सार्वजनिक नहीं की जातीं। फिर भी अनेक मुठभेड़ों और आधिकारिक बयानों से कुछ व्यापक सेक्टर सामने आते हैं।

2.1 उत्तर कश्मीर का पर्वतीय क्षेत्र

उत्तर कश्मीर में कुपवाड़ा, बांदीपोरा और बारामूला की ओर आने वाले व्यापक सेक्टर परंपरागत घुसपैठ क्षेत्र रहे हैं। सार्वजनिक रिपोर्टों में सामान्यतः इन क्षेत्रों का उल्लेख मिलता है:

  • गुरेज और तुलैल क्षेत्र
  • केरन सेक्टर
  • माछिल सेक्टर
  • तंगधार क्षेत्र
  • नौगाम और उड़ी सेक्टर

शमशाबरी पर्वत शृंखला के आसपास का इलाका।

यह क्षेत्र अत्यंत ऊंचा, दुर्गम और घने जंगलों वाला है। गर्मियों में बर्फ पिघलने के बाद पर्वतीय रास्ते कुछ समय के लिए खुल जाते हैं। खराब मौसम, बादल, कोहरा और भारी बर्फबारी निगरानी को कठिन बना सकते हैं। दूसरी ओर बर्फ पर बने पैरों के निशान, थर्मल निगरानी और ऊंची चौकियों से मिलने वाली दृश्यता घुसपैठियों के लिए जोखिम भी बढ़ाती है।

इन क्षेत्रों से प्रवेश करने वाले आतंकवादियों का उद्देश्य प्रायः कुपवाड़ा-बांदीपोरा के जंगलों में अस्थायी ठिकाना बनाकर बाद में घाटी के भीतरी जिलों तक पहुंचना रहा है।

2.2 उड़ी और झेलम घाटी वाला क्षेत्र

उड़ी सेक्टर भौगोलिक रूप से कश्मीर घाटी की ओर आने वाला महत्वपूर्ण क्षेत्र है। सड़क, नदी और पहाड़ी ढलानों के कारण इसकी सामरिक महत्ता अधिक है। यहां नियंत्रण रेखा पर सैन्य उपस्थिति और निगरानी अत्यंत मजबूत है, फिर भी अलग-अलग समय पर घुसपैठ के प्रयास दर्ज हुए हैं।

यह क्षेत्र केवल आतंकवादियों के प्रवेश के लिए नहीं, बल्कि हथियार, संचार उपकरण और छोटी खेप पहुंचाने के प्रयासों के संदर्भ में भी संवेदनशील रहा है।

2.3 पुंछ–राजौरी और पीर पंजाल के दक्षिण का क्षेत्र

पुंछ, मेंढर, कृष्णा घाटी, भिंबर गली, नौशेरा और राजौरी के विस्तृत पहाड़ी क्षेत्र लंबे समय से घुसपैठ के प्रयासों से प्रभावित रहे हैं। यहां LoC के बाद घने वन, पहाड़ी ढलान और आबादी के बीच फैले दूरस्थ रास्ते मौजूद हैं।

2021 के बाद राजौरी-पुंछ क्षेत्र में विदेशी आतंकवादियों और छोटे मॉड्यूलों की उपस्थिति फिर अधिक दिखाई दी। बाद के वर्षों में सुरक्षा एजेंसियों का ध्यान रियासी, कठुआ, डोडा और किश्तवाड़ के जंगलों की ओर भी बढ़ा। रक्षा मंत्रालय की 2025 की समीक्षा में कहा गया कि पाकिस्तान की ओर से LoC और अंतरराष्ट्रीय सीमा—दोनों से गुप्त रूप से घुसपैठ कराने के प्रयास जारी रहे तथा पुंछ-राजौरी क्षेत्र को 2023-24 के दौरान दोबारा आतंकवादी गतिविधियों का केंद्र बनाने की कोशिश की गई। रक्षा मंत्रालय की वर्षांत समीक्षा–2025

  • पीर पंजाल के दक्षिण का क्षेत्र आतंकवादी संगठनों को तीन प्रकार के लाभ दे सकता है
  • लंबे समय तक छिपने के लिए घना जंगल
  • दूर-दूर बसी आबादी और सीमित सड़क संपर्क

कश्मीर घाटी के मुकाबले पहले अपेक्षाकृत कम केंद्रित आतंकवाद-विरोधी ग्रिड।

इसका अर्थ यह नहीं कि पूरा क्षेत्र या उसकी आबादी आतंकवाद का समर्थन करती है। स्थानीय नागरिकों और ग्राम रक्षा समूहों ने अनेक अवसरों पर संदिग्ध गतिविधियों की सूचना भी दी है।

2.4 जम्मू–सांबा–कठुआ अंतरराष्ट्रीय सीमा

अंतरराष्ट्रीय सीमा वाला जम्मू क्षेत्र पर्वतीय LoC से अलग प्रकृति का है। यहां खेत, नदी-नाले, झाड़ियां और आबादी के निकट सीमावर्ती क्षेत्र हैं। कठुआ के हीरानगर, सांबा तथा जम्मू के आरएस पुरा और अखनूर से जुड़े व्यापक सेक्टरों में समय-समय पर घुसपैठ, सुरंग और ड्रोन गतिविधियों की घटनाएं सामने आई हैं।

  • सीमा पर बाड़ और निगरानी के कारण सीधे प्रवेश की कठिनाई बढ़ने पर निम्न तरीके अपनाए गए
  • नदी या बरसाती नाले वाले क्षेत्र
  • घने कोहरे और खराब मौसम का उपयोग
  • सीमा पार से गोलीबारी की आड़
  • भूमिगत सुरंग
  • ड्रोन से हथियार गिराकर स्थानीय व्यक्ति से उठवाना

सीमापार तस्करी नेटवर्क।

रक्षा मंत्रालय ने 2025 में कहा कि अंतरराष्ट्रीय सीमा क्षेत्र का इस्तेमाल हथियार और मादक पदार्थ भेजने के साथ बड़ी संख्या में आतंकवादियों की घुसपैठ कराने के लिए करने के प्रयास देखे गए। यह सरकार और सुरक्षा एजेंसियों का आधिकारिक आकलन है; हर संदिग्ध प्रवेश न्यायिक रूप से प्रमाणित घुसपैठ नहीं होता।

3. घुसपैठ की ऐतिहासिक प्रवृत्ति और सरकारी आंकड़े

घुसपैठ के आंकड़े पूर्ण गणना नहीं, बल्कि सुरक्षा एजेंसियों द्वारा उपलब्ध सूचनाओं, पकड़े या मारे गए आतंकवादियों, सीमा पर हुई मुठभेड़ों और खुफिया आकलन पर आधारित अनुमान होते हैं। सफलतापूर्वक प्रवेश कर चुके प्रत्येक व्यक्ति की जानकारी उसी समय मिल जाए, यह आवश्यक नहीं।

  • गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार 2013 से 2016 तक स्थिति इस प्रकार थी
  • लोकसभा में 25 जुलाई 2023 को दिए गए गृह मंत्रालय के उत्तर में बाद की अवधि के अनुमान प्रस्तुत किए गए

इन आंकड़ों से 2019 के बाद उल्लेखनीय गिरावट दिखाई देती है। लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए कि सीमा पार तंत्र समाप्त हो गया। कम संख्या में प्रशिक्षित विदेशी आतंकवादी, स्थानीय हाइब्रिड मॉड्यूल और ड्रोन से आए हथियार भी गंभीर हमले कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त सरकार बाद के वर्षों के सभी परिचालन आंकड़े सार्वजनिक नहीं करती।

विभिन्न सरकारी वक्तव्यों में एक ही वर्ष के प्रारंभिक और संशोधित आंकड़ों में थोड़ा अंतर भी मिल सकता है। उदाहरण के लिए 2021 का प्रारंभिक आंकड़ा अक्टूबर तक 28 था, जबकि पूरे वर्ष का बाद का आंकड़ा 34 बताया गया। इसलिए शोध में आंकड़े के साथ उसकी कट-ऑफ तारीख देना आवश्यक है।

4. लॉन्च-पैड से सीमा तक पहुंचने की कथित श्रृंखला

  • भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार नियंत्रण रेखा पार कराने की प्रक्रिया प्रायः कई चरणों में चलती है

आतंकवादी संगठन पाकिस्तान अथवा पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में युवाओं की भर्ती करते हैं।

उन्हें हथियार चलाने, जंगल में रहने, नक्शा पढ़ने, संचार और विस्फोटक से संबंधित प्रशिक्षण दिया जाता है।

प्रशिक्षण के बाद उन्हें सीमा के निकट अस्थायी लॉन्च-पैड तक पहुंचाया जाता है।

इलाके से परिचित गाइड छोटे समूहों को LoC के निकट लाते हैं।

प्रवेश के बाद भारतीय क्षेत्र में दूसरा संपर्क या स्थानीय सहयोगी उन्हें सुरक्षित स्थान तक पहुंचाता है।

बाद में हथियार, धन, मोबाइल उपकरण और लक्ष्य संबंधी निर्देश अलग चैनलों से दिए जा सकते हैं।

इस मॉडल के प्रत्येक चरण की स्वतंत्र पुष्टि हर मामले में नहीं होती। “लॉन्च-पैड”, “हैंडलर” या किसी संस्था की मदद जैसे निष्कर्ष प्रायः खुफिया जानकारी, गिरफ्तार आरोपियों के बयान, संचार रिकॉर्ड, बरामद उपकरण और जांच एजेंसियों के आरोपपत्रों पर आधारित होते हैं।

5. हथियारों का बदलता स्वरूप

1989 के बाद जम्मू-कश्मीर के आतंकवाद में AK-47 और AK-56 प्रकार की असॉल्ट राइफलें प्रमुख हथियार बन गईं। इनके साथ पिस्तौल, हथगोले, डेटोनेटर, वायरलेस सेट और विस्फोटक लाए गए।

AK श्रेणी की राइफल को पहाड़ी और जंगल क्षेत्र में ले जाना अपेक्षाकृत आसान था। इसकी विश्वसनीयता और गोलियों की उपलब्धता ने इसे आतंकवादी संगठनों का मुख्य हथियार बनाया।

1990 के दशक के अंतिम वर्षों और 2000 के दशक में निम्न हथियार तथा तकनीक अधिक दिखाई दिए:

  • RDX और दूसरे सैन्य स्तर के विस्फोटक
  • इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस—IED
  • आत्मघाती जैकेट और वाहन आधारित विस्फोट
  • अंडर बैरल ग्रेनेड लॉन्चर—UBGL
  • रॉकेट और ग्रेनेड

सैटेलाइट फोन, GPS तथा बेहतर रेडियो उपकरण।

यह परिवर्तन लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद के फिदायीन अभियान से जुड़ा रहा। टारगेट किलिंग में बड़े विस्फोटक की आवश्यकता नहीं होती, लेकिन इन्हीं आपूर्ति नेटवर्कों से पिस्तौल, ग्रेनेड और छोटे हथियार भी स्थानीय मॉड्यूलों तक पहुंचे।

हाल के वर्षों की मुठभेड़ों और बरामदगियों में सुरक्षा एजेंसियों ने AK श्रृंखला की राइफलों के साथ M4 प्रकार की कार्बाइन, अत्याधुनिक दूरबीन, नाइट-विजन उपकरण, पिस्तौल और विशेष संचार उपकरण मिलने की जानकारी दी है।

किसी हथियार का मॉडल देखकर अकेले यह निर्धारित नहीं किया जा सकता कि उसे किस देश या संस्था ने भेजा। इसके लिए सीरियल नंबर, निर्माण चिह्न, बैलिस्टिक जांच, गोला-बारूद और उसकी बरामदगी की परिस्थितियों का फॉरेंसिक अध्ययन आवश्यक है।

  • छोटी पिस्तौल टारगेट किलिंग के लिए विशेष रूप से उपयोगी होती है क्योंकि
  • उसे कपड़ों में छिपाया जा सकता है
  • हमला करने वाला सामान्य नागरिक जैसा दिखाई दे सकता है
  • भीड़भाड़ वाले बाजार या गली में बड़ी राइफल की तुलना में संदेह कम होता है
  • हमले के बाद हथियार दूसरे व्यक्ति को दिया या किसी ठिकाने पर छिपाया जा सकता है

एक ही पिस्तौल का अलग-अलग घटनाओं में उपयोग हो सकता है।

फॉरेंसिक बैलिस्टिक जांच से कभी-कभी यह पता चलता है कि एक हथियार पहले भी किसी हत्या में इस्तेमाल हुआ था। इससे अलग-अलग घटनाओं के बीच संगठनात्मक संबंध स्थापित करने में सहायता मिल सकती है।

हाल के वर्षों में सुरक्षा एजेंसियों ने “स्टिकी बम” या चुंबकीय IED की बरामदगी की जानकारी दी है। इन्हें किसी वाहन से चिपकाया जा सकता है और टाइमर अथवा दूरस्थ संकेत से विस्फोट किया जा सकता है।

6. ड्रोन: सीमा पार आपूर्ति का नया माध्यम

ड्रोन की आवश्यकता क्यों पड़ी?

सीमा पर बाड़, थर्मल सेंसर, नाइट-विजन कैमरे और बहुस्तरीय सैन्य तैनाती बढ़ने के बाद किसी व्यक्ति के माध्यम से प्रत्येक हथियार भेजना कठिन और जोखिमपूर्ण हुआ। छोटे व्यावसायिक ड्रोन ने इस समस्या का आंशिक समाधान उपलब्ध कराया।

  • ड्रोन के माध्यम से सीमित वजन की खेप भेजी जा सकती है
  • पिस्तौल और मैगजीन
  • ग्रेनेड
  • डेटोनेटर तथा विस्फोटक सामग्री
  • छोटे IED या चुंबकीय बम
  • नकदी
  • मोबाइल अथवा संचार उपकरण

मादक पदार्थ।

ड्रोन का सबसे बड़ा लाभ यह है कि सीमा पार भेजने वाले व्यक्ति को स्वयं सीमा के पास आने या भारतीय क्षेत्र में प्रवेश करने की आवश्यकता नहीं होती। दूसरी ओर उसे खेप उठाने के लिए भारतीय क्षेत्र में स्थानीय सहयोगी अनिवार्य रूप से चाहिए।

कठुआ ड्रोन प्रकरण

मई 2022 में कठुआ के ढल्ली क्षेत्र में पुलिस ने पाकिस्तान की दिशा से आए एक हेक्साकॉप्टर पर गोली चलाई थी। उसके साथ UBGL ग्रेनेड और चुंबकीय बमों की खेप बरामद होने का मामला दर्ज हुआ। NIA ने इसे RC-06/2022/NIA/JMU के रूप में अपने हाथ में लिया। एजेंसी ने इस केस का आधिकारिक शीर्षक “Drone with Payload coming from Pakistan side” रखा। NIA का कठुआ ड्रोन केस

नवंबर 2023 में NIA ने इस मामले में आठवें ओवरग्राउंड वर्कर को गिरफ्तार करने की जानकारी दी। एजेंसी के अनुसार आरोपियों की भूमिका ड्रोन से भेजे गए हथियार प्राप्त करके घाटी में सक्रिय आतंकवादियों तक पहुंचाने में थी। ये जांच एजेंसी के निष्कर्ष और आरोप हैं; अंतिम आपराधिक जिम्मेदारी अदालत के निर्णय से तय होती है।

ड्रोन और मादक पदार्थों का संबंध

ड्रोन की खेप में हथियार और मादक पदार्थ कभी-कभी एक ही तस्करी तंत्र से भेजे जाते हैं। इस मॉडल में नशीले पदार्थों की बिक्री से प्राप्त धन का एक हिस्सा आतंकवादी गतिविधियों, हथियार खरीदने या स्थानीय सहयोगियों को भुगतान करने में इस्तेमाल होने का आरोप है।

  • इस “नार्को-टेरर” मॉडल के तीन लाभ होते हैं

आतंकवादी नेटवर्क को अलग से बड़ी रकम भेजने की आवश्यकता कम होती है।

सामान्य तस्करी और आतंक वित्तपोषण के बीच अंतर धुंधला हो जाता है।

आपराधिक तस्कर बिना वैचारिक प्रतिबद्धता के भी धन के लिए नेटवर्क का हिस्सा बन सकते हैं।

हर मादक पदार्थ बरामदगी को आतंकवाद से जोड़ना उचित नहीं है। ऐसा संबंध तभी माना जाना चाहिए जब संचार रिकॉर्ड, धन का प्रवाह, संबंधित व्यक्ति या जांच के दूसरे प्रमाण उपलब्ध हों।

7. भूमिगत सुरंगें

जम्मू की अंतरराष्ट्रीय सीमा पर समय-समय पर ऐसी सुरंगें मिली हैं जिनके बारे में BSF ने पाकिस्तान की ओर से निर्मित होने का दावा किया। नवंबर 2020 में सांबा क्षेत्र में एक सुरंग मिलने की जानकारी सार्वजनिक की गई थी।

  • सुरंग का उपयोग निम्न उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है
  • सीमा की बाड़ और निगरानी को नीचे से पार करना
  • छोटे आतंकवादी समूहों की घुसपैठ
  • हथियार अथवा मादक पदार्थ भेजना

प्रवेश के निशान को कुछ समय तक छिपाए रखना।

सुरंग बनाना समय और संसाधन मांगता है। इसलिए प्रत्येक सीमा उल्लंघन में सुरंग का उपयोग संभव नहीं। इसके विरुद्ध भूगर्भीय सेंसर, ग्राउंड-पेनेट्रेटिंग तकनीक और स्थानीय निरीक्षण का प्रयोग किया जाता है।

अप्रैल 2025 में केंद्रीय गृह मंत्री ने बताया कि घुसपैठ, भूमिगत सुरंग और ड्रोन पहचानने के लिए 26 से अधिक तकनीकी प्रयोग चल रहे हैं। इनमें टनल डिटेक्शन, इलेक्ट्रॉनिक निगरानी और स्वदेशी एंटी-ड्रोन प्रणालियां शामिल हैं। सीमा सुरक्षा तकनीक पर गृह मंत्रालय का वक्तव्य

12. भारत का बहुस्तरीय प्रतिघुसपैठ तंत्र

  • गृह मंत्रालय के अनुसार सीमा पार घुसपैठ रोकने की रणनीति में निम्न उपाय शामिल हैं
  • LoC और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर रणनीतिक सैन्य तैनाती
  • बहुस्तरीय प्रतिघुसपैठ ग्रिड
  • सीमा पर बाड़ और प्रकाश व्यवस्था
  • निगरानी और नाइट-विजन कैमरे
  • थर्मल तथा हीट-सेंसिंग उपकरण
  • खुफिया कर्मियों से लक्ष्य-आधारित जानकारी
  • सेना और BSF की गश्त एवं घात
  • स्थानीय सूचना के लिए बॉर्डर पुलिस पोस्ट

प्रवेश के बाद भीतरी क्षेत्रों में आतंकवाद-विरोधी अभियान।

CIBMS और स्मार्ट फेंसिंग

सितंबर 2018 में जम्मू की अंतरराष्ट्रीय सीमा पर Comprehensive Integrated Border Management System—CIBMS—के दो प्रायोगिक स्मार्ट फेंसिंग प्रोजेक्ट शुरू किए गए। इसमें थर्मल इमेजर, भूमिगत सेंसर, फाइबर ऑप्टिकल सेंसर, रडार और दूसरी प्रणालियों से मिलने वाले संकेतों को एकीकृत नियंत्रण केंद्र तक पहुंचाने की व्यवस्था बनाई गई। जम्मू में CIBMS स्मार्ट फेंसिंग परियोजना

एंटी-ड्रोन व्यवस्था

  • ड्रोन के विरुद्ध कई स्तरों पर कार्रवाई आवश्यक है
  • रडार अथवा रेडियो फ्रीक्वेंसी से ड्रोन पहचान
  • कैमरा और थर्मल ट्रैकिंग
  • संचार लिंक को जाम करना
  • नेविगेशन संकेत को भ्रमित करना
  • उपयुक्त स्थिति में ड्रोन को मार गिराना
  • ड्रॉप जोन पर स्थानीय रिसीवर की पहचान

बरामद ड्रोन के इलेक्ट्रॉनिक और फॉरेंसिक डेटा की जांच।

सिर्फ ड्रोन को गिरा देना पर्याप्त नहीं है। उसे भेजने वाले, भारतीय क्षेत्र में खेप उठाने वाले और अंतिम उपयोगकर्ता तक पूरी श्रृंखला का पता लगाना आवश्यक है।

13. प्रतिघुसपैठ तंत्र की सीमाएं

  • किसी भी सीमा को पूरी तरह अभेद्य मानना व्यावहारिक नहीं है। जम्मू-कश्मीर में विशेष चुनौतियां हैं
  • ऊंचे पर्वत और घने जंगल
  • बर्फ, कोहरा, बारिश और भूस्खलन
  • सीमा के निकट गांव और कृषि गतिविधियां
  • नदी-नाले तथा बदलता जल प्रवाह
  • छोटे और सस्ते व्यावसायिक ड्रोन
  • सेंसर के सामने वन्यजीव या मौसम से उत्पन्न गलत संकेत
  • स्थानीय कूरियर की पहले से कोई आपराधिक पहचान न होना
  • एन्क्रिप्टेड अथवा इंटरनेट आधारित संचार

हथियार और मादक पदार्थ तस्करी का मिश्रित नेटवर्क।

तकनीक सैनिक और पुलिसकर्मी का स्थान नहीं लेती। वह निगरानी, प्रतिक्रिया और खुफिया विश्लेषण को बेहतर बनाती है। अंतिम सफलता सेना, BSF, जम्मू-कश्मीर पुलिस, केंद्रीय एजेंसियों और स्थानीय नागरिकों के बीच समन्वय पर निर्भर करती है।

14. शोध के लिए प्रमाण का वर्गीकरण

  • प्रत्येक घुसपैठ या हथियार-आपूर्ति मामले को निम्न श्रेणियों में दर्ज किया जाना चाहिए

जम्मू-कश्मीर में सीमा पार आतंकवाद का स्वरूप लगातार बदला है। पहले बड़ी संख्या में प्रशिक्षित आतंकवादी AK राइफलों के साथ पर्वतीय मार्गों से प्रवेश करते थे। सीमा पर बाड़, निगरानी और प्रतिघुसपैठ ग्रिड मजबूत होने के बाद छोटे मॉड्यूल, अंतरराष्ट्रीय सीमा, सुरंग, ड्रोन, पिस्तौल, चुंबकीय बम और स्थानीय हाइब्रिड आतंकियों का महत्व बढ़ा।

इस व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा स्थानीय लॉजिस्टिक नेटवर्क है। सीमा पार भेजा गया आतंकवादी या हथियार तभी प्रभावी बनता है, जब उसे भारतीय क्षेत्र में उठाने, छिपाने, पहुंचाने और इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति उपलब्ध हो। इसी बिंदु पर घुसपैठ, संगठित अपराध, नार्को-तस्करी, कट्टरता और टारगेट किलिंग का नेटवर्क आपस में जुड़ता है।

सुरक्षा नीति के लिए इसलिए दोहरी रणनीति आवश्यक है—सीमा पर व्यक्ति, हथियार और ड्रोन को रोकना तथा भीतर उस नेटवर्क को निष्क्रिय करना जो आश्रय, सूचना, धन, परिवहन और लक्ष्य की रेकी उपलब्ध कराता है। केवल मुठभेड़ में आतंकवादी को मार देना पर्याप्त नहीं; उसकी पूरी आपूर्ति और आदेश श्रृंखला तक पहुंचना स्थायी समाधान की अनिवार्य शर्त है।

जम्मू-कश्मीर में सीमा पार घुसपैठ किसी एक व्यक्ति के नियंत्रण रेखा पार करने की सामान्य घटना नहीं, बल्कि अनेक स्तरों पर चलने वाला संगठित नेटवर्क है। इसमें आतंकवादी संगठनों का नेतृत्व, भर्ती करने वाले प्रचारक, प्रशिक्षण केंद्र, सीमा के निकट लॉन्च-पैड, घुसपैठ कराने वाले गाइड, हथियारों के आपूर्तिकर्ता, पाकिस्तान स्थित हैंडलर और भारतीय क्षेत्र में मौजूद स्थानीय सहयोगी शामिल हो सकते हैं।

इस नेटवर्क का अंतिम उद्देश्य केवल आतंकवादियों को भारतीय क्षेत्र में पहुंचाना नहीं होता। उन्हें लंबे समय तक सक्रिय रखने, हथियार उपलब्ध कराने, सुरक्षित ठिकाने तक ले जाने और उपयुक्त लक्ष्य की जानकारी देने की व्यवस्था भी इसी का हिस्सा होती है।

  • व्यापक रूप से इस श्रृंखला को इस प्रकार समझा जा सकता है

भर्ती और कट्टरता → प्रशिक्षण → लॉन्च-पैड → सीमा पार कराने वाला गाइड → भारतीय क्षेत्र में रिसीवर → सुरक्षित ठिकाना → हथियार और धन → लक्ष्य की रेकी → हमला → प्रचार और जिम्मेदारी का दावा

इस श्रृंखला के प्रत्येक चरण में अलग व्यक्ति सक्रिय हो सकता है। इससे पूरे नेटवर्क को एक साथ पकड़ना कठिन हो जाता है। एक स्थानीय कूरियर को संभवतः सीमा पार बैठे शीर्ष कमांडर का वास्तविक नाम भी पता नहीं होता। इसी प्रकार हमलावर को हथियार उपलब्ध कराने वाला व्यक्ति लक्ष्य निर्धारित करने वाली साजिश से अनजान होने का दावा कर सकता है।

1. पाकिस्तान स्थित शीर्ष नेतृत्व और हैंडलर

भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार सीमा पार घुसपैठ नेटवर्क के शीर्ष पर लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिजबुल मुजाहिदीन जैसे संगठनों का पाकिस्तान या पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर स्थित नेतृत्व रहता है। यही नेतृत्व व्यापक रणनीतिक लक्ष्य निर्धारित करता है:

  • किस क्षेत्र में आतंकवादी गतिविधि बढ़ानी है
  • किस संगठन या छद्म नाम से हमला कराया जाएगा
  • स्थानीय नागरिक, अल्पसंख्यक, राजनीतिक कार्यकर्ता या सुरक्षाबल—किस श्रेणी को निशाना बनाना है
  • विदेशी आतंकवादी भेजे जाएंगे या स्थानीय युवाओं का उपयोग होगा

हथियार आतंकवादी के साथ भेजने हैं या ड्रोन एवं कूरियर के माध्यम से अलग पहुंचाने हैं।

इन संगठनों का शीर्ष नेतृत्व प्रायः सीधे प्रत्येक स्थानीय सदस्य से बात नहीं करता। इसके लिए मध्यवर्ती “हैंडलर” नियुक्त होते हैं। ये इंटरनेट आधारित कॉल, एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप, सोशल मीडिया खाते, वर्चुअल नंबर या दूसरे गुप्त संचार माध्यमों से स्थानीय मॉड्यूल को निर्देश दे सकते हैं।

हैंडलर की जिम्मेदारी भर्ती, धन, हथियार, लक्ष्य और प्रचार—किसी एक क्षेत्र तक सीमित हो सकती है। इस विभाजन से किसी एक व्यक्ति की गिरफ्तारी के बाद भी पूरा नेटवर्क सामने नहीं आता।

2. भर्ती और वैचारिक प्रशिक्षण

घुसपैठ करने वाले सभी आतंकवादी पाकिस्तानी नागरिक हों, यह आवश्यक नहीं। अलग-अलग समय में जम्मू-कश्मीर के स्थानीय युवाओं को भी सीमा पार ले जाकर प्रशिक्षण देने के मामले सामने आए हैं। शुरुआती दशकों में कुछ युवक नियंत्रण रेखा पार करके पाकिस्तान प्रशासित क्षेत्र में पहुंचे, जहां उन्हें हथियार और विस्फोटक चलाने का प्रशिक्षण मिला।

  • भर्ती के संभावित माध्यमों में शामिल रहे हैं
  • आतंकवादी संगठनों के स्थानीय संपर्क
  • धार्मिक अथवा राजनीतिक कट्टर प्रचार
  • जेल या हिरासत के दौरान बने संबंध
  • सोशल मीडिया और वीडियो
  • मारे गए आतंकवादियों का महिमामंडन
  • निजी अन्याय या उत्पीड़न की भावना का इस्तेमाल

धन और परिवार की देखभाल का आश्वासन।

वर्तमान दौर में प्रत्येक भर्ती को सीमा पार प्रशिक्षण के लिए भेजना आवश्यक नहीं है। स्थानीय युवक को इंटरनेट के माध्यम से कट्टर बनाकर केवल हथियार उठाने, संदेश पहुंचाने या एक लक्ष्य पर गोली चलाने का निर्देश भी दिया जा सकता है। यह हाइब्रिड मॉडल पारंपरिक घुसपैठ नेटवर्क का परिवर्तित रूप है।

3. प्रशिक्षण केंद्र और लॉन्च-पैड

प्रशिक्षण और लॉन्च-पैड एक ही चीज नहीं हैं। प्रशिक्षण केंद्र में भर्ती व्यक्ति को हथियार, विस्फोटक, संचार, जंगल में जीवित रहने और सुरक्षा बलों से बचने जैसी शिक्षा दिए जाने के आरोप हैं। लॉन्च-पैड सीमा के अपेक्षाकृत निकट ऐसा अस्थायी ठिकाना होता है, जहां प्रशिक्षित आतंकवादी घुसपैठ का अवसर मिलने तक प्रतीक्षा करते हैं।

भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार लॉन्च-पैडों पर आतंकवादियों को छोटे समूहों में विभाजित किया जाता है। उनके पास नक्शे, हथियार, भोजन, संचार उपकरण और भारतीय क्षेत्र में संपर्क की जानकारी हो सकती है। प्रवेश के लिए मौसम, सीमा पर तैनाती और निगरानी की स्थिति का आकलन किया जाता है।

4. सीमा पार कराने वाले गाइड

घुसपैठ का मार्ग सामान्य नक्शे से तय करना संभव नहीं होता। पर्वत, जंगल, नदी, हिमपात, सैन्य चौकियां और सीमा की बाड़ लगातार चुनौती उत्पन्न करते हैं। इसलिए क्षेत्र की जानकारी रखने वाले गाइड की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।

  • गाइड की कथित जिम्मेदारियां हो सकती हैं
  • लॉन्च-पैड से आतंकवादी समूह को सीमा के निकट लाना
  • मौसम और भौगोलिक स्थिति की जानकारी देना
  • नियंत्रण रेखा पार होने तक समूह का मार्गदर्शन करना
  • भारतीय क्षेत्र में किसी निर्धारित संपर्क-बिंदु तक पहुंचाना

प्रवेश विफल होने पर समूह को वापस ले जाना।

हर घुसपैठ में एक ही गाइड पूरी दूरी तय नहीं करता। सीमा के दोनों ओर अलग-अलग संपर्क हो सकते हैं। कभी गाइड केवल सीमित क्षेत्र की जानकारी देता है और उसके बाद आतंकवादी GPS, नक्शे या पहले से निर्धारित संकेतों के आधार पर आगे बढ़ते हैं।

5. प्रवेश के प्रमुख व्यापक क्षेत्र

  • सुरक्षा कारणों से वास्तविक मार्ग सार्वजनिक नहीं किए जाते। उपलब्ध सरकारी और सार्वजनिक सूचनाओं में घुसपैठ के तीन व्यापक भौगोलिक क्षेत्र दिखाई देते हैं

परंपरागत रूप से कश्मीर घाटी पहुंचने के लिए उत्तर कश्मीर के मार्गों का उपयोग अधिक हुआ। सुरक्षा ग्रिड मजबूत होने के बाद पुंछ-राजौरी और जम्मू की अंतरराष्ट्रीय सीमा पर दबाव बढ़ाने के प्रयास सामने आए। यह बदलाव स्थायी नहीं; आतंकवादी संगठन सुरक्षा व्यवस्था के अनुसार क्षेत्र बदल सकते हैं।

6. सीमा पार गोलीबारी और घुसपैठ

अतीत में भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने आरोप लगाया कि नियंत्रण रेखा पर गोलीबारी का उपयोग कभी-कभी घुसपैठियों को सीमा पार कराने के लिए किया गया। गोलीबारी से सैनिकों का ध्यान बंट सकता है और आवाज के कारण घुसपैठियों की गतिविधि छिप सकती है।

फरवरी 2021 में भारत और पाकिस्तान के सैन्य संचालन महानिदेशकों ने 2003 के संघर्ष-विराम समझौते का पालन दोबारा सुनिश्चित करने की घोषणा की। इसके बाद सीमा पर गोलीबारी की घटनाओं में कमी आई। इससे परंपरागत रूप से गोलीबारी की आड़ में होने वाली घुसपैठ कठिन हुई, लेकिन इसके बाद ड्रोन और अधिक गुप्त प्रवेश प्रयासों की चुनौती बढ़ी।

प्रत्येक संघर्ष-विराम उल्लंघन को घुसपैठ से जोड़ना सही नहीं है। ऐसा संबंध तभी माना जाना चाहिए जब उसी समय संदिग्ध गतिविधि, मुठभेड़, हथियार बरामदगी या तकनीकी साक्ष्य सामने आए हों।

7. भारतीय क्षेत्र में पहला रिसीवर

आतंकवादी के नियंत्रण रेखा पार करने के बाद नेटवर्क का सबसे संवेदनशील चरण शुरू होता है। उसे ऐसी जगह पहुंचना होता है जहां वह आराम कर सके, कपड़े बदल सके, भोजन प्राप्त कर सके और आगे के निर्देशों की प्रतीक्षा कर सके।

  • इस काम के लिए स्थानीय “रिसीवर” या ओवरग्राउंड वर्कर का इस्तेमाल किया जा सकता है। उसकी भूमिका निम्न हो सकती है
  • निर्धारित स्थान से आतंकवादी को लेना
  • सामान्य नागरिक जैसे कपड़े उपलब्ध कराना
  • शुरुआती सुरक्षित ठिकाने तक पहुंचाना
  • हथियार छिपाना अथवा अलग ले जाना
  • स्थानीय पुलिस और सुरक्षाबलों की स्थिति बताना

दूसरे कूरियर से संपर्क स्थापित करना।

सीमा के निकट रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति संदेह के दायरे में नहीं आता। सीमावर्ती नागरिकों ने बड़ी संख्या में संदिग्ध गतिविधियों की सूचना देकर घुसपैठ रोकने में सहायता भी की है। किसी व्यक्ति को रिसीवर सिद्ध करने के लिए उसके संपर्क, आवाजाही, बरामद सामग्री और आपराधिक मंशा के प्रमाण आवश्यक हैं।

8. सुरक्षित ठिकानों की श्रृंखला

घुसपैठ करने वाला आतंकवादी सीधे अपने अंतिम परिचालन क्षेत्र तक न जाकर कई सुरक्षित ठिकानों से गुजर सकता है। इससे उसका पीछा करना कठिन होता है और नेटवर्क की अलग-अलग परतें एक-दूसरे से सुरक्षित रहती हैं।

  • सुरक्षित ठिकाने निम्न स्वरूपों में हो सकते हैं
  • किसी घर का अलग कमरा
  • जंगल में बनाया गया अस्थायी आश्रय
  • चरवाहों की झोपड़ी या निर्जन ढांचा
  • खेत, बाग या पशुशाला
  • किराये का कमरा
  • हथियार छिपाने का भूमिगत स्थान

प्राकृतिक गुफा अथवा जंगल का ठिकाना।

आश्रय देने वाला व्यक्ति स्वेच्छा, वैचारिक समर्थन, रिश्तेदारी, धन अथवा धमकी—किस कारण से मदद कर रहा था, यह कानूनी जांच का विषय है। भय के कारण एक रात भोजन देने वाले नागरिक और लगातार हथियार तथा सूचनाएं उपलब्ध कराने वाले सक्रिय OGW की भूमिका समान नहीं मानी जा सकती।

9. परिवहन नेटवर्क

विदेशी आतंकवादी के लिए सार्वजनिक सड़क पर हथियार के साथ लंबी यात्रा करना जोखिमपूर्ण होता है। इसलिए वाहन और यात्रा को भी अलग-अलग चरणों में व्यवस्थित किया जा सकता है।

  • स्थानीय सहयोगी निम्न साधनों का उपयोग कर सकते हैं
  • निजी कार या टैक्सी
  • दोपहिया वाहन
  • मालवाहक गाड़ी
  • कृषि अथवा पशुपालन से जुड़ा वाहन
  • सार्वजनिक परिवहन के अलग-अलग चरण

जंगल और गांवों के बीच पैदल आवागमन।

परिवहन उपलब्ध कराने वाला व्यक्ति कभी पूरे षड्यंत्र से परिचित हो सकता है और कभी उसे केवल यात्री या सामान पहुंचाने के लिए कहा गया हो सकता है। इसलिए वाहन में यात्रा या मोबाइल लोकेशन अकेले आतंकवादी भागीदारी का निर्णायक प्रमाण नहीं है।

10. हथियार आतंकवादी के साथ या अलग रास्ते से

पहले घुसपैठ करने वाले आतंकवादी प्रायः अपने साथ राइफल, गोलियां और ग्रेनेड लेकर आते थे। इससे सीमा पार करते समय उनका बोझ और पकड़े जाने का जोखिम बढ़ता था। नई रणनीति में व्यक्ति और हथियार अलग-अलग भेजे जा सकते हैं।

  • हथियार पहुंचाने के प्रमुख कथित माध्यम हैं
  • आतंकवादी द्वारा अपने साथ लाया गया हथियार
  • नियंत्रण रेखा से सीमित खेप की तस्करी
  • अंतरराष्ट्रीय सीमा से कूरियर
  • ड्रोन से गिराई गई खेप
  • पहले से भारतीय क्षेत्र में छिपाया गया हथियार

किसी मारे गए या गिरफ्तार आतंकवादी का हथियार दूसरे मॉड्यूल को सौंपना।

ड्रोन से गिराई खेप में पिस्तौल, ग्रेनेड, गोलियां, चुंबकीय बम और नकदी भेजे जाने के मामले दर्ज हुए हैं। कठुआ में 2022 के ड्रोन प्रकरण की NIA जांच में भारतीय क्षेत्र में हथियार उठाने वाले ओवरग्राउंड वर्करों की कथित भूमिका सामने आई। NIA का ड्रोन और पेलोड केस

11. धन और नार्को-तस्करी

घुसपैठ नेटवर्क को केवल हथियार नहीं, धन भी चाहिए। इसका उपयोग वाहन, मोबाइल फोन, सुरक्षित ठिकाना, कूरियर, भोजन और हमले की तैयारी के लिए किया जाता है।

  • धन पहुंचाने के कथित माध्यमों में शामिल हैं
  • हवाला
  • नकद कूरियर
  • वैध व्यापार की आड़
  • विदेश से छोटे लेनदेन
  • क्रिप्टो या डिजिटल माध्यम
  • मादक पदार्थों की तस्करी

स्थानीय वसूली और धमकी।

हथियार और मादक पदार्थ एक साथ भेजने से आतंकवादी संगठनों को दोहरा लाभ मिलता है—स्थानीय आपूर्ति और वित्तपोषण। लेकिन प्रत्येक ड्रग तस्करी केस को आतंकवाद से जोड़ना उचित नहीं। आतंकवादी संबंध स्थापित करने के लिए धन का प्रवाह, संचार रिकॉर्ड या संबंधित संगठन के साथ संपर्क प्रमाणित होना चाहिए।

12. संचार नेटवर्क

घुसपैठ नेटवर्क का नियंत्रण आधुनिक संचार पर निर्भर है। पहले वायरलेस सेट और सैटेलाइट फोन का इस्तेमाल अधिक होता था। अब इंटरनेट आधारित कॉल, एन्क्रिप्टेड ऐप, वर्चुअल नंबर, सोशल मीडिया के बंद समूह और अस्थायी खाते इस्तेमाल किए जा सकते हैं।

  • सुरक्षा एजेंसियां निम्न डिजिटल प्रमाणों का अध्ययन करती हैं
  • कॉल और इंटरनेट संपर्क
  • मोबाइल की लोकेशन
  • एन्क्रिप्टेड चैट से प्राप्त डेटा
  • सोशल मीडिया खाते
  • फोन में मिले नक्शे और तस्वीरें
  • ड्रोन का इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड
  • विदेशी नंबरों या हैंडलरों से संपर्क

डिजिटल भुगतान और बैंक लेनदेन।

सिर्फ विदेशी नंबर से फोन आने या किसी संदिग्ध खाते को देखने से अपराध सिद्ध नहीं होता। संपर्क की प्रकृति, अवधि, सामग्री और उसके बाद हुए कृत्य का संबंध स्थापित करना जरूरी है।

13. लक्ष्य की पहचान और स्थानीय रेकी

सीमा पार बैठा हैंडलर किसी क्षेत्र में हत्या कराने का आदेश दे सकता है, लेकिन उसे स्थानीय लक्ष्य की दिनचर्या का ज्ञान प्रायः नहीं होता। यह सूचना स्थानीय नेटवर्क से आती है।

  • रेकी करने वाला व्यक्ति निम्न जानकारी जुटा सकता है
  • लक्ष्य कहां काम करता है
  • घर से निकलने और लौटने का समय
  • वह अकेला कब होता है
  • आसपास CCTV या पुलिस की उपस्थिति
  • कौन-सा मार्ग नियमित रूप से इस्तेमाल करता है

हमले के बाद निकलने का संभावित सामान्य रास्ता।

टारगेट किलिंग में स्थानीय रेकी अक्सर हथियार से अधिक महत्वपूर्ण होती है। विदेशी आतंकवादी इलाके से अपरिचित हो सकता है, लेकिन स्थानीय सहयोगी किसी शिक्षक, दुकानदार, पुलिसकर्मी या राजनीतिक कार्यकर्ता की दिनचर्या आसानी से जान सकता है।

14. हमले के बाद की व्यवस्था

  • नेटवर्क का काम हत्या के साथ समाप्त नहीं होता। हमले के बाद उसे
  • हमलावर को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाना
  • हथियार छिपाना या दूसरे व्यक्ति को देना
  • इस्तेमाल किए गए वाहन को बदलना
  • कपड़े अथवा मोबाइल नष्ट करना
  • घायल आतंकवादी का उपचार कराना
  • संगठन के नाम से जिम्मेदारी का दावा जारी करना

पुलिस जांच को भ्रमित करने के लिए गलत सूचना फैलाना पड़ सकता है।

यदि हमला किसी हाइब्रिड आतंकी से कराया गया हो तो उसे सामान्य जीवन में लौटने का निर्देश दिया जा सकता है। यही कारण है कि कभी-कभी घटना के तुरंत बाद हमलावर किसी पारंपरिक आतंकवादी ठिकाने पर नहीं मिलता।

15. नेटवर्क का “सेल मॉडल”

आधुनिक आतंकवादी नेटवर्क छोटे सेल या मॉड्यूल के रूप में काम कर सकता है। प्रत्येक सेल को केवल उतनी ही जानकारी दी जाती है जितनी उसके कार्य के लिए आवश्यक है।

सेल मॉडल में रेकी करने वाला व्यक्ति हमलावर को व्यक्तिगत रूप से न जानता हो सकता है। हथियार उठाने वाला कूरियर भी अंतिम लक्ष्य से अनजान रह सकता है। इससे जांच एजेंसियों के लिए केवल एक गिरफ्तारी के आधार पर पूरी साजिश तक पहुंचना कठिन हो जाता है।

16. नेटवर्क तोड़ने की भारतीय रणनीति

  • घुसपैठ का मुकाबला केवल सीमा पर गोलीबारी से नहीं किया जा सकता। इसके लिए पूरी श्रृंखला पर कार्रवाई जरूरी है
  • लॉन्च-पैड और संभावित घुसपैठ पर अग्रिम खुफिया सूचना
  • LoC और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर बहुस्तरीय तैनाती
  • थर्मल कैमरे, रडार, नाइट-विजन और भूमिगत सेंसर
  • ड्रोन और रेडियो फ्रीक्वेंसी की निगरानी
  • सीमा पुलिस चौकियों से स्थानीय सूचना
  • हथियार और नार्को-तस्करी के वित्तीय नेटवर्क की जांच
  • OGW और सुरक्षित ठिकानों की पहचान
  • डिजिटल फॉरेंसिक और विदेशी हैंडलर की पहचान
  • सीमा के बाद भीतरी क्षेत्रों में संयुक्त अभियान

नागरिकों और ग्राम रक्षा समूहों से संवाद।

लोकसभा में गृह मंत्रालय ने बताया था कि इस बहुस्तरीय रणनीति के बाद अनुमानित शुद्ध घुसपैठ 2019 के 141 से घटकर 2022 में 14 रह गई। जून 2023 तक कोई शुद्ध घुसपैठ दर्ज नहीं की गई थी। ये एजेंसियों के अनुमान हैं, पूर्ण और स्वतंत्र गणना नहीं। गृह मंत्रालय का 25 जुलाई 2023 का संसदीय उत्तर

निष्कर्ष

सीमा पार घुसपैठ का नेटवर्क किसी सीधी कमांड-लाइन के बजाय कई छोटे और परस्पर जुड़े मॉड्यूलों से संचालित हो सकता है। पाकिस्तान स्थित आतंकवादी नेतृत्व, सीमा के निकट लॉन्च-पैड, गाइड, ड्रोन, हथियार तस्कर, स्थानीय OGW, सुरक्षित ठिकाने और हाइब्रिड हमलावर—इनमें से प्रत्येक कड़ी महत्वपूर्ण है।

एक विदेशी आतंकवादी को मार गिराने से तत्काल खतरा समाप्त हो सकता है, लेकिन यदि उसका हथियार आपूर्तिकर्ता, स्थानीय रिसीवर, वित्तीय चैनल और सीमा पार हैंडलर सक्रिय रह जाए तो संगठन नया व्यक्ति भेज सकता है। इसी प्रकार किसी स्थानीय युवक की गिरफ्तारी पर्याप्त नहीं, जब तक यह पता न चले कि उसे हथियार किसने दिया, लक्ष्य किसने बताया और हमले की जिम्मेदारी किस नेटवर्क ने प्रचारित की।

इसलिए स्थायी आतंकवाद-विरोधी नीति का लक्ष्य केवल घुसपैठिए को रोकना नहीं, बल्कि भर्ती से हमले और प्रचार तक फैली पूरी संगठनात्मक श्रृंखला को तोड़ना होना चाहिए।