2019: प्रवासी मजदूरों और कारोबारियों पर हमले
सेब कारोबार, ट्रक चालकों और गैर-स्थानीय श्रमिकों को निशाना बनाने वाली अक्टूबर श्रृंखला
सेब कारोबार, ट्रक चालकों और गैर-स्थानीय श्रमिकों को निशाना बनाने वाली अक्टूबर श्रृंखला
वर्ष 2019 में जम्मू-कश्मीर के घटनाक्रम को केवल अनुच्छेद 370 और 35ए में हुए संवैधानिक परिवर्तन तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। इसी वर्ष आतंकवाद ने एक ऐसा रूप ग्रहण किया, जिसमें बंदूक का निशाना सुरक्षाबलों के साथ-साथ उन निहत्थे लोगों की तरफ मोड़ दिया गया, जो कश्मीर की रोजमर्रा की अर्थव्यवस्था को चलाने में मदद कर रहे थे। इनमें दूसरे राज्यों से आए मजदूर, सेब व्यापारी, ट्रक चालक और माल लोड करने वाले श्रमिक शामिल थे।
विशेष रूप से अक्टूबर 2019 में दक्षिण कश्मीर के शोपियां, पुलवामा, अनंतनाग और कुलगाम जिलों में गैर-स्थानीय नागरिकों पर सिलसिलेवार हमले हुए। उपलब्ध समकालीन समाचार रिपोर्टों के आधार पर 14 से 29 अक्टूबर के बीच कम-से-कम छह अलग-अलग हमलों में 11 लोग मारे गए। कम-से-कम तीन लोग गोली लगने से घायल हुए और एक स्थानीय बाग मालिक की पिटाई की गई।
इन हमलों का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत हत्या करना नहीं था। घटनास्थल, पीड़ितों के पेशे और हमलों के समय को एक साथ रखकर देखने पर एक व्यापक रणनीति दिखाई देती है—कश्मीर के सेब कारोबार, परिवहन व्यवस्था और असंगठित श्रम बाजार को भयभीत करना तथा सामान्य आर्थिक गतिविधियों को रोकना।
संवैधानिक परिवर्तन के बाद की पृष्ठभूमि
5 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर के विशेष संवैधानिक प्रावधानों में बदलाव किया। इसके बाद घाटी में व्यापक सुरक्षा प्रतिबंध, संचार बंदी और राजनीतिक गतिविधियों पर नियंत्रण लगाया गया। सरकार की कोशिश धीरे-धीरे प्रशासन, संचार और कारोबारी गतिविधियों को सामान्य बनाने की थी।
दूसरी ओर, आतंकवादी और अलगाववादी तंत्र से जुड़ी शक्तियां बंद तथा आर्थिक असहयोग बनाए रखना चाहती थीं। दुकानों का खुलना, सार्वजनिक परिवहन का चलना और सेब की फसल का देश की मंडियों तक पहुंचना सामान्य स्थिति लौटने के संकेत माने जा रहे थे।
कश्मीर का सेब उद्योग लगभग दो अरब डॉलर मूल्य की अर्थव्यवस्था बताया गया था। इसलिए सेब खरीदने वाले व्यापारी, फसल ढोने वाले चालक और बागों में काम करने वाले मजदूर आतंकवादियों के लिए आसान लक्ष्य होने के साथ-साथ आर्थिक दृष्टि से प्रतीकात्मक लक्ष्य भी बन गए। समकालीन रिपोर्टों में अधिकारियों ने आकलन किया कि जब स्थानीय बाग मालिकों को धमकाकर व्यापार पूरी तरह नहीं रोका जा सका, तब बाहरी ट्रक चालकों और व्यापारियों को निशाना बनाया गया। द क्विंट की समकालीन रिपोर्ट
तारीखवार घटनाक्रम
कुछ प्रारंभिक रिपोर्टों में शोपियां की घटना की तारीख 23 अक्टूबर की रात तथा दूसरी रिपोर्टों में 24 अक्टूबर दर्ज है। इसी प्रकार अनेक पीड़ितों के नामों की अंग्रेजी और हिंदी वर्तनी अलग-अलग प्रकाशित हुई। इस अध्याय में उन नामों और तारीखों को प्राथमिकता दी गई है जिनका अनेक समकालीन स्रोतों में समर्थन मिलता है।
14 अक्टूबर: राजस्थान के ट्रक चालक की हत्या
14 अक्टूबर को शोपियां जिले के शिरमाल गांव में राजस्थान के भरतपुर निवासी लगभग 40 वर्षीय ट्रक चालक शरीफ अकरम खान की गोली मारकर हत्या कर दी गई। वह अपने ट्रक में सेब लदवा रहे थे।
हमलावरों ने ट्रक में आग लगा दी और कथित रूप से बाग को भी जलाने की कोशिश की। बाग के मालिक शकील अहमद भट ने विरोध किया तो उनकी पिटाई की गई। खान का सहचालक किसी तरह बच निकला। उसके अनुसार हमलावरों ने बाहरी चालकों को सेब नहीं ले जाने की चेतावनी दी थी।
यह हमला उस दिन हुआ जब करीब 72 दिनों के बाद घाटी में पोस्टपेड मोबाइल सेवाएं बहाल की गई थीं। इसलिए इसे सरकार की “सामान्य स्थिति लौटने” की घोषणा को चुनौती देने की कोशिश के रूप में भी देखा गया।
पुलिस अधिकारियों ने प्रारंभिक जांच में दो आतंकवादियों की संलिप्तता की आशंका जताई थी। अलग-अलग अधिकारियों ने जैश-ए-मोहम्मद अथवा हिजबुल मुजाहिदीन से जुड़े आतंकवादियों पर संदेह व्यक्त किया, लेकिन किसी संगठन द्वारा पूरे घटनाक्रम की विश्वसनीय सार्वजनिक जिम्मेदारी लेने का स्पष्ट प्रमाण सामने नहीं आया। इंडियन एक्सप्रेस
16 अक्टूबर: दो जिलों में दो हमले
पुलवामा में ईंट-भट्ठा मजदूर की हत्या
छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले के निवासी सेठी कुमार सागर पुलवामा के काकापोरा क्षेत्र में एक ईंट-भट्ठे पर काम करते थे। 16 अक्टूबर को निहामा के पास आतंकवादियों ने उन्हें गोली मार दी। वह अपने एक रिश्तेदार या भतीजे के साथ जा रहे थे। हमलावरों ने साथी को छोड़ दिया, लेकिन सागर को गोली मार दी।
सागर अपने पीछे पत्नी और लगभग छह महीने की बच्ची छोड़ गए। उनकी हत्या के बाद आसपास काम करने वाले अनेक प्रवासी मजदूरों में भय फैल गया और कई लोगों ने घाटी छोड़ने का निर्णय लिया।
शोपियां में पंजाब के सेब कारोबारी पर हमला
उसी दिन शोपियां के त्रेंज क्षेत्र में पंजाब से आए चरनजीत सिंह और उनके कारोबारी साथी पर गोली चलाई गई। दोनों सेब खरीदने या उनकी पैकिंग और लोडिंग के काम से जुड़े थे। चरनजीत सिंह की मृत्यु हो गई, जबकि उनके साथी संजीव या संजय गंभीर रूप से घायल हुए।
एक ही दिन अलग-अलग स्थानों पर मजदूर और सेब कारोबार से जुड़े व्यक्ति पर हमला यह संकेत देता है कि निशाने का चयन केवल संयोग नहीं था। हमले उस पूरी शृंखला पर केंद्रित थे, जो उत्पादन क्षेत्र को बाहरी मंडियों से जोड़ती थी। इंडियन एक्सप्रेस
24 अक्टूबर: सेब से लदे ट्रकों पर हमला
शोपियां के चित्रगाम कलां क्षेत्र में आतंकवादियों ने तीन बाहरी ट्रक चालकों और सहायकों पर गोलीबारी की। दो लोगों—मोहम्मद इलियास और जाहिद खान—की मृत्यु हुई। पंजाब के होशियारपुर निवासी जीवन घायल हुए। हमलावरों ने सेब से भरे दो ट्रकों को आग के हवाले कर दिया।
मोहम्मद इलियास राजस्थान के अलवर क्षेत्र के निवासी थे। प्रारंभिक रिपोर्टों में दूसरे मृतक की पहचान को लेकर असंगति रही, जबकि बाद की पुलिस-स्रोत आधारित रिपोर्टों में उनका नाम जाहिद खान बताया गया।
इस घटना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू वाहनों को जलाना था। यदि उद्देश्य केवल व्यक्तिगत हत्या होता, तो माल और ट्रकों को नष्ट करना आवश्यक नहीं था। ट्रकों को जलाना परिवहन कंपनियों और चालकों के लिए सामूहिक चेतावनी थी कि कश्मीर के आंतरिक क्षेत्रों में जाकर सेब उठाना जानलेवा हो सकता है।
अधिकारियों ने कहा कि चालक सुरक्षा एजेंसियों को सूचना दिए बिना आंतरिक क्षेत्र में गए थे। लेकिन यह कथन सुरक्षा व्यवस्था की सीमा भी उजागर करता है। प्रत्येक बाग, गांव और संपर्क मार्ग पर सुरक्षा उपलब्ध कराना संभव नहीं था और बाहरी चालक स्थानीय भौगोलिक तथा सुरक्षा जोखिमों से पूरी तरह परिचित नहीं थे। एनडीटीवी की रिपोर्ट
28 अक्टूबर: अनंतनाग में नारायण दत्त की हत्या
28 अक्टूबर को अनंतनाग जिले के बिजबेहरा क्षेत्र में नारायण दत्त नामक ट्रक चालक की गोली मारकर हत्या कर दी गई। वह कटरा क्षेत्र के निवासी थे और ट्रक में सेब लोड करा रहे थे।
नारायण दत्त अंतरराज्यीय प्रवासी नहीं थे, क्योंकि वह जम्मू क्षेत्र के रहने वाले थे। लेकिन घाटी के स्थानीय सामाजिक परिवेश में वह गैर-कश्मीरी चालक के रूप में पहचाने जाते थे। इसलिए उनका चयन भी उसी व्यापक आतंकवादी रणनीति में दिखाई देता है, जिसके तहत बाहर से आए अथवा घाटी को देश की मंडियों से जोड़ने वाले लोगों को निशाना बनाया जा रहा था।
पुलिस ने बाद में कहा कि हिजबुल मुजाहिदीन से जुड़े आतंकवादी एजाज अहमद मलिक की दत्त की हत्या में भूमिका सामने आई थी। मलिक उसी दिन एक मुठभेड़ में मारा गया। यह पुलिस का जांच-निष्कर्ष था; इसे किसी न्यायालय में दोषसिद्धि के बराबर नहीं माना जाना चाहिए। एनडीटीवी, हिंदुस्तान टाइम्स
29 अक्टूबर: कुलगाम में पांच बंगाली मजदूरों की सामूहिक हत्या
इस श्रृंखला की सबसे भयावह घटना 29 अक्टूबर को कुलगाम जिले के कटरसू या कित्रसू गांव में हुई। हथियारबंद आतंकवादी पश्चिम बंगाल के छह मजदूरों को उनके अस्थायी निवास से बाहर ले गए अथवा एक स्थान पर इकट्ठा किया। उन्हें पंक्ति में खड़ा करके गोलियां चलाई गईं।
पांच मजदूर मारे गए और छठे को मृत समझकर छोड़ दिया गया। घायल मजदूर को अस्पताल पहुंचाया गया। मृतकों के नाम विभिन्न रिपोर्टों में अलग-अलग वर्तनी के साथ प्रकाशित हुए:
शेख मुर्सलीन या मुर्सलीम शेख
कमरुद्दीन शेख
मोहम्मद रफीक शेख
निजामुद्दीन या नईमुद्दीन
रफीकुल या रफीक शेख/आलम
घायल मजदूर का नाम जाहूरुद्दीन अथवा बहारुद्दीन प्रकाशित हुआ। सभी मजदूर पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के सागरदिघी क्षेत्र से आए थे।
महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि मारे गए पांचों मजदूर मुसलमान थे। इससे स्पष्ट होता है कि 2019 की इस श्रृंखला में निशाना केवल धार्मिक पहचान के आधार पर नहीं चुना गया। “बाहरी व्यक्ति”, स्थानीय अर्थव्यवस्था में भागीदारी और आतंकवादियों के बंद के आह्वान के बावजूद काम करते रहना भी लक्ष्य चयन के निर्णायक कारण थे।
हमला उस समय हुआ जब यूरोपीय सांसदों का एक प्रतिनिधिमंडल जम्मू-कश्मीर का दौरा कर रहा था। इसलिए इसके समय को अंतरराष्ट्रीय प्रचार और मीडिया का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश से जोड़कर भी देखा गया। हालांकि किसी घटना का समय अपने आप में उसके उद्देश्य का अंतिम न्यायिक प्रमाण नहीं होता। एनडीटीवी, टाइम्स ऑफ इंडिया
कितने लोग मारे गए और कितने घायल हुए?
14 से 29 अक्टूबर 2019 की प्रमाणित घटनाओं को जोड़ने पर तस्वीर इस प्रकार बनती है:
चार ट्रक चालक मारे गए।
एक सेब व्यापारी या लोडिंग से जुड़ा कारोबारी मारा गया।
एक ईंट-भट्ठा मजदूर मारा गया।
पश्चिम बंगाल के पांच प्रवासी मजदूर मारे गए।
कुल 11 नागरिकों की मृत्यु हुई।
कम-से-कम तीन लोग गोली लगने से घायल हुए।
एक स्थानीय बाग मालिक को पीटा गया।
कई वाहनों और उनमें लदे सेब को जला दिया गया।
यह संख्या केवल यहां वर्णित गैर-स्थानीय मजदूरों, व्यापारियों और चालकों पर केंद्रित हमलों की है। इसमें उसी अवधि की ग्रेनेड घटनाएं, सुरक्षाबलों पर हमले या दूसरे वर्गों के नागरिकों की हत्याएं शामिल नहीं हैं।
सेब कारोबार ही प्रमुख निशाना क्यों बना?
सेब कश्मीर की सबसे महत्वपूर्ण नकदी फसलों में से एक है। इसके व्यापार में बाग मालिक, पैकिंग मजदूर, स्थानीय आढ़ती, बाहरी खरीदार, ट्रक चालक, राजमार्ग नेटवर्क और देश की बड़ी फल मंडियां शामिल होती हैं।
यदि किसी ट्रक चालक की हत्या होती है, तो उसका प्रभाव केवल उसके परिवार तक सीमित नहीं रहता। उसके बाद दर्जनों चालक संवेदनशील गांवों में जाने से मना कर सकते हैं। ट्रकों की उपलब्धता घटने से माल बागों में रुकता है, फल खराब होता है और उत्पादक को कम कीमत पर बिक्री करनी पड़ सकती है।
इसी कारण कम संख्या में किए गए हमले भी बड़े आर्थिक क्षेत्र को प्रभावित कर सकते थे। आतंकवादी दृष्टि से यह कम संसाधनों में अधिक भय पैदा करने की रणनीति थी:
बाहरी चालकों और व्यापारियों को घाटी में आने से रोकना।
स्थानीय उत्पादकों को चेतावनी देना कि कारोबार जारी रखने की कीमत चुकानी पड़ सकती है।
सरकार के सामान्य स्थिति बहाल होने के दावे को चुनौती देना।
बाजार, परिवहन और श्रम उपलब्धता को बाधित करना।
घटनाओं को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रचार दिलाना।
स्थानीय सहयोग और सूचना का प्रश्न
हमलों में ऐसे स्थान चुने गए जहां बाहरी लोग सेब लोड कर रहे थे या अस्थायी मकानों में रह रहे थे। इससे यह अनुमान स्वाभाविक है कि हमलावरों को पीड़ितों की मौजूदगी, दिनचर्या और ठिकाने की जानकारी थी।
यह जानकारी प्रत्यक्ष निगरानी, स्थानीय मुखबिरी, धमकी तंत्र अथवा ओवर ग्राउंड वर्कर—OGW—नेटवर्क से मिली हो सकती थी। परंतु सार्वजनिक रिकॉर्ड में प्रत्येक घटना के लिए किसी विशिष्ट स्थानीय सहयोगी की भूमिका न्यायिक रूप से स्थापित नहीं हुई। इसलिए पूरी स्थानीय आबादी को संदेह के घेरे में रखना न तथ्यसम्मत होगा और न न्यायसंगत।
कई स्थानीय बाग मालिकों, मकान मालिकों और श्रमिक ठेकेदारों ने बाहरी लोगों को काम और आश्रय दिया था। शिरमाल में स्थानीय बाग मालिक ने हमलावरों का विरोध भी किया और पिटाई सहन की। अतः “स्थानीय सहयोग” और “स्थानीय समाज” को एक ही अर्थ में नहीं देखा जाना चाहिए।
किस संगठन की भूमिका थी?
पूरी अक्टूबर श्रृंखला की किसी एक आतंकवादी संगठन ने विश्वसनीय और सत्यापित सार्वजनिक जिम्मेदारी नहीं ली। अलग-अलग मामलों में पुलिस और खुफिया अधिकारियों ने हिजबुल मुजाहिदीन तथा जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े आतंकवादियों पर संदेह व्यक्त किया।
पुलिस ने नारायण दत्त की हत्या में हिजबुल आतंकवादी एजाज मलिक की भूमिका बताई। अधिकारियों ने कुलगाम के पांच मजदूरों की हत्या में भी हिजबुल की संभावित भूमिका की बात कही। लेकिन जांच एजेंसी का आरोप और न्यायालय की अंतिम दोषसिद्धि दो अलग स्थितियां हैं।
बाद के वर्षों में द रेजिस्टेंस फ्रंट—TRF—जैसे छद्म संगठनों ने गैर-स्थानीय मजदूरों और अल्पसंख्यकों पर हमलों की जिम्मेदारी ली। फिर भी बाद की घटनाओं के आधार पर अक्टूबर 2019 के प्रत्येक हमले को पूर्वव्यापी रूप से TRF के खाते में डालना उचित नहीं होगा।
भय, पलायन और सामाजिक परिणाम
कुलगाम हत्याकांड के बाद पश्चिम बंगाल सरकार ने घाटी में रह रहे अपने मजदूरों को वापस लाने की व्यवस्था शुरू की। लगभग 130 मजदूरों की पहचान किए जाने की रिपोर्ट सामने आई। अन्य राज्यों के श्रमिकों और चालकों में भी भय फैला।
इस पलायन का दोहरा प्रभाव पड़ा। एक ओर गरीब श्रमिकों की आय बंद हुई, दूसरी ओर कश्मीर के कृषि, निर्माण और ईंट-भट्ठा क्षेत्रों को मजदूरों की कमी का सामना करना पड़ा। अर्थात आतंकवादियों की गोली ने पीड़ित परिवारों के साथ स्थानीय कश्मीरी अर्थव्यवस्था को भी नुकसान पहुंचाया।
यह आतंक की मूल मनोवैज्ञानिक तकनीक है—कुछ लोगों को मारकर हजारों लोगों के व्यवहार को बदल देना।
राजनीतिक विमर्श
सरकार और उसके समर्थकों ने इन हमलों को आतंकवादियों की उस कोशिश के रूप में देखा, जिसका उद्देश्य संवैधानिक परिवर्तन के बाद शांति और सामान्य स्थिति को बाधित करना था।
आलोचकों ने प्रश्न उठाया कि व्यापक सुरक्षा बंदोबस्त और संचार प्रतिबंधों के बावजूद निहत्थे मजदूरों तथा चालकों की रक्षा क्यों नहीं की जा सकी। यह भी कहा गया कि सामान्य स्थिति की घोषणाएं वास्तविक सुरक्षा परिस्थितियों से आगे निकल रही थीं।
निष्पक्ष अध्ययन में दोनों पहलुओं को दर्ज करना आवश्यक है। संवैधानिक परिवर्तन इन हमलों की राजनीतिक पृष्ठभूमि अवश्य था, लेकिन किसी भी राजनीतिक असहमति से निहत्थे मजदूरों, चालकों और व्यापारियों की हत्या को वैधता नहीं मिलती। इसी प्रकार आतंकवादी हिंसा की निंदा करना सुरक्षा व्यवस्था की कमियों की समीक्षा को अनावश्यक नहीं बनाता।
स्थापित तथ्य, एजेंसी के आरोप और अनसुलझे प्रश्न
स्थापित तथ्य
अक्टूबर 2019 में गैर-स्थानीय नागरिकों पर सिलसिलेवार हमले हुए।
अधिकांश पीड़ित सेब कारोबार, परिवहन, ईंट-भट्ठे या मौसमी श्रम से जुड़े थे।
14 से 29 अक्टूबर की वर्णित घटनाओं में 11 लोग मारे गए।
पांच बंगाली मुस्लिम मजदूरों को सामूहिक रूप से गोली मारी गई।
ट्रकों और सेब की खेप को जलाया गया।
हमलों के बाद मजदूरों तथा चालकों में भय और वापसी की प्रवृत्ति बढ़ी।
पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों के आरोप
कुछ हमलों में हिजबुल मुजाहिदीन की भूमिका संदिग्ध बताई गई।
पहले ट्रक चालक की हत्या में जैश और हिजबुल से जुड़े आतंकवादियों पर संदेह व्यक्त किया गया।
नारायण दत्त की हत्या में एजाज अहमद मलिक का नाम लिया गया।
हमलों को सेब कारोबार रोकने और सामान्य स्थिति को बाधित करने की संगठित कोशिश बताया गया।
अनसुलझे प्रश्न
- क्या सभी हमले एक केंद्रीय योजना का हिस्सा थे या अलग-अलग आतंकवादी मॉड्यूल ने समान रणनीति अपनाई?
- पीड़ितों की पहचान और गतिविधियों की सूचना हमलावरों तक किस माध्यम से पहुंची?
- किन मामलों में स्थानीय OGW नेटवर्क का उपयोग हुआ?
- सभी हमलावरों, योजनाकारों और मददगारों के विरुद्ध अंतिम न्यायिक कार्रवाई कहां तक पहुंची?
- संवेदनशील क्षेत्रों में बाहरी मजदूरों और चालकों की सुरक्षा के लिए पहले से पर्याप्त व्यवस्था क्यों नहीं थी?
निष्कर्ष
2019 में प्रवासी मजदूरों, ट्रक चालकों और सेब कारोबारियों पर हुए हमले जम्मू-कश्मीर के लक्षित आतंकवाद में एक महत्वपूर्ण मोड़ थे। इनमें पीड़ितों का चयन उनकी व्यक्तिगत राजनीतिक भूमिका के कारण नहीं, बल्कि उनकी आर्थिक और सामाजिक उपयोगिता के कारण किया गया।
हमलावर जानते थे कि एक चालक की हत्या कई ट्रकों को रोक सकती है, एक व्यापारी पर गोलीबारी मंडियों तक संदेश पहुंचा सकती है और मजदूरों के सामूहिक नरसंहार से हजारों प्रवासी घाटी छोड़ सकते हैं। इसलिए ये हत्याएं व्यक्तियों के विरुद्ध अपराध होने के साथ-साथ कश्मीर की अर्थव्यवस्था, अंतरराज्यीय संपर्क और सामाजिक सह-अस्तित्व पर हमला थीं।
कुलगाम में पांच मुस्लिम मजदूरों की हत्या इस धारणा को भी गलत सिद्ध करती है कि उस दौर में केवल धार्मिक अल्पसंख्यक निशाने पर थे। आतंकवादी रणनीति में धर्म के साथ क्षेत्रीय पहचान, पेशा, “बाहरी” होने की पहचान और सामान्य आर्थिक गतिविधियों में भागीदारी भी लक्ष्य निर्धारित कर रही थी।
इस अध्याय का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यही है कि 2019 की हिंसा का उद्देश्य केवल जान लेना नहीं था—उसका उद्देश्य भय के माध्यम से बाजार बंद कराना, श्रमिकों को भगाना, परिवहन रोकना और यह संदेश देना था कि आतंकवादी तंत्र की इच्छा के विरुद्ध सामान्य जीवन चलाने वाला कोई भी व्यक्ति निशाना बन सकता है।