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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–011 · अध्याय 11

छत्तीसिंहपोरा नरसंहार, 2000

सिख नागरिकों की सामूहिक हत्या, विवादित जिम्मेदारी और पथरीबल–ब्रकपोरा की त्रासदी

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskसंरचना संशोधित · 2 अगस्त 2026

सिख नागरिकों की सामूहिक हत्या, विवादित जिम्मेदारी और पथरीबल–ब्रकपोरा की त्रासदी

कश्मीरी सिख समुदाय और छत्तीसिंहपोरा

दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग जिले में स्थित छत्तीसिंहपोरा मुख्यतः सिख आबादी वाला गांव था। सिख परिवार पीढ़ियों से खेती, परिवहन और छोटे व्यवसायों से जुड़े हुए थे। कश्मीर में 1989 के बाद आतंकवाद फैलने और कश्मीरी पंडितों के बड़े पलायन के बावजूद अधिकांश स्थानीय सिखों ने घाटी नहीं छोड़ी।

सिख समुदाय को सामान्यतः कश्मीर के राजनीतिक-सांप्रदायिक संघर्ष से कुछ हद तक अलग माना जाता था। उनका बहुसंख्यक मुस्लिम समाज से स्थानीय स्तर पर संघर्षपूर्ण संबंधों का कोई व्यापक इतिहास नहीं था। जम्मू-कश्मीर में सेना तथा अर्द्धसैनिक बलों में सिखों की उल्लेखनीय उपस्थिति के बावजूद स्थानीय सिख नागरिकों को पहले संगठित रूप से निशाना नहीं बनाया गया था।

एमनेस्टी इंटरनेशनल की जून 2000 की रिपोर्ट के अनुसार उस समय जम्मू-कश्मीर में सिखों की संख्या लगभग 70 से 90 हजार थी और वे करीब 130 गांवों में रहते थे। छत्तीसिंहपोरा से पहले, कश्मीर में आतंकवाद के एक दशक के दौरान सिख समुदाय पर इस स्तर का कोई हमला दर्ज नहीं था। एमनेस्टी इंटरनेशनल की विस्तृत रिपोर्ट

इसीलिए 20 मार्च 2000 की घटना को केवल एक गांव पर हमला नहीं, बल्कि घाटी में रह रहे पूरे सिख अल्पसंख्यक समुदाय के विरुद्ध एक नए प्रकार की लक्षित हिंसा माना गया।

20 मार्च 2000 की रात क्या हुआ?

प्रत्यक्षदर्शी बयानों और समकालीन मानवाधिकार रिपोर्टों के अनुसार 20 मार्च की शाम लगभग 15 से 17 हथियारबंद लोग छत्तीसिंहपोरा में दाखिल हुए। उनमें से कई ने भारतीय सेना जैसी वर्दी पहन रखी थी। हमलावर अलग-अलग समूहों में गांव के दोनों सिरों की ओर बढ़े, जहां दो गुरुद्वारों के निकट सिख परिवारों के मकान स्थित थे।

बंदूकधारियों ने स्वयं को सुरक्षा बल का सदस्य बताया और ग्रामीणों से कहा कि क्षेत्र में तलाशी या सुरक्षा जांच की जानी है। घर-घर जाकर सिख पुरुषों को बाहर बुलाया गया। कुछ विवरणों में कहा गया कि होली के कारण कुछ हमलावरों के चेहरों पर रंग लगा था, ताकि उनकी गतिविधियां असामान्य न लगें और पहचान भी छिपी रहे। इन विवरणों की हर बात किसी न्यायिक जांच में पुष्ट नहीं हुई, लेकिन सैन्य वर्दी पहनने और सुरक्षा जांच के बहाने पुरुषों को बाहर निकालने की बात अनेक स्रोतों में समान रूप से आती है।

ग्रामीणों को दो अलग-अलग स्थानों पर गुरुद्वारों के पास पंक्तिबद्ध किया गया। इसके बाद हमलावरों ने नजदीक से स्वचालित हथियारों से गोलियां चला दीं। एमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार 34 सिख पुरुष घटनास्थल पर मारे गए और गोली लगने से घायल एक व्यक्ति ने बाद में दम तोड़ा। इस प्रकार व्यापक रूप से स्वीकृत मृतक संख्या 35 है।

कई ग्रामीण गोली लगने के बावजूद बच गए। नानक सिंह प्रमुख प्रत्यक्षदर्शियों में थे। उन्होंने हमले में अपने बेटे गुरमीत सिंह और भाई दलबीर सिंह को खोया। बाद में अदालत में उन्होंने कहा कि गोली लगने के बाद वे बेहोश हो गए थे और हमलावरों को स्पष्ट रूप से पहचान नहीं सके।

35 या 36—मृतकों की संख्या में अंतर क्यों?

कुछ प्रारंभिक सरकारी बयानों और मीडिया रिपोर्टों में मृतकों की संख्या 36 बताई गई थी। वाशिंगटन स्थित भारतीय दूतावास के एक पुराने वक्तव्य में भी 36 सिख ग्रामीणों की हत्या का उल्लेख है। दूसरी ओर एमनेस्टी इंटरनेशनल ने 34 लोगों की तत्काल मृत्यु और एक घायल की बाद में मृत्यु—कुल 35—दर्ज की।

बाद के न्यायिक अभिलेखों, अधिकांश शोध अध्ययनों और सितंबर 2025 में उपराज्यपाल से मिले पीड़ित परिवारों के प्रतिनिधिमंडल ने भी 35 मृतकों की संख्या अपनाई है। संगठन का नाम ही “35 शहीद सिंह वेलफेयर ऑर्गेनाइजेशन” है।

अतः शोध डेटाबेस के लिए मुख्य संख्या इस प्रकार दर्ज होनी चाहिए:

कुल पुष्ट मृतक: 35। प्रारंभिक स्रोतों में 36 का वैकल्पिक आंकड़ा मिलता है।

घायलों की निश्चित संख्या पर स्रोत एकमत नहीं हैं। एमनेस्टी ने “कई घायल” दर्ज किए, लेकिन कोई सर्वमान्य अंतिम संख्या नहीं दी।

हमला बिल क्लिंटन की भारत यात्रा से ठीक पहले क्यों किया गया?

छत्तीसिंहपोरा नरसंहार अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की भारत यात्रा शुरू होने से कुछ घंटे पहले हुआ। शीतयुद्ध समाप्त होने के बाद किसी अमेरिकी राष्ट्रपति की यह पहली महत्वपूर्ण भारत यात्रा थी। भारत-पाकिस्तान संबंध, परमाणु परीक्षण और कश्मीर इस यात्रा के प्रमुख कूटनीतिक विषयों में शामिल थे।

इस कारण हमले के समय को आकस्मिक नहीं माना गया। उसके संभावित उद्देश्य हो सकते थे:

कश्मीर की हिंसा को अंतरराष्ट्रीय मीडिया के केंद्र में लाना;

भारत सरकार के सुरक्षा और सामान्य स्थिति के दावों को चुनौती देना;

भारत-पाकिस्तान वार्ता के वातावरण को प्रभावित करना;

कश्मीर में सिख और मुस्लिम समुदायों के बीच अविश्वास उत्पन्न करना;

पंडितों के बाद एक अन्य अल्पसंख्यक समुदाय में पलायन का भय पैदा करना;

अमेरिकी राष्ट्रपति की यात्रा के दौरान बड़ा राजनीतिक और प्रचारात्मक प्रभाव उत्पन्न करना।

भारत सरकार ने हमले को पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद से जोड़ा। पाकिस्तान ने आरोप का खंडन किया और घटना की निंदा की। राष्ट्रपति क्लिंटन ने भी हत्याओं की निंदा की। लेकिन हमले की अंतरराष्ट्रीय गूंज इतनी व्यापक हुई कि कश्मीर का मुद्दा उनकी यात्रा से संबंधित समाचारों में प्रमुखता से शामिल हो गया।

किसने कराया नरसंहार?

छत्तीसिंहपोरा मामले का सबसे कठिन प्रश्न यही है। हमलावरों की पहचान पर अलग-अलग दावे किए गए, लेकिन कोई दावा अंतिम न्यायिक कसौटी पर सिद्ध नहीं हो सका।

1. भारत सरकार का आरोप

भारत और तत्कालीन जम्मू-कश्मीर सरकार ने लश्कर-ए-तैयबा तथा हिजबुल मुजाहिदीन से जुड़े आतंकवादियों को जिम्मेदार ठहराया। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार हमले का मकसद बिल क्लिंटन की यात्रा के समय सांप्रदायिक तनाव और अंतरराष्ट्रीय प्रचार पैदा करना था।

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने जून 2000 में कहा कि सरकारों ने लश्कर और हिजबुल को जिम्मेदार ठहराया था, लेकिन उस समय तक न तो किसी स्वतंत्र जांच का परिणाम सामने आया था और न किसी अपराधी की पहचान प्रमाणित हुई थी।

2. मोहम्मद सुहैल मलिक का कथित कबूलनामा

अगस्त 2000 में सुरक्षा एजेंसियों ने पाकिस्तान के सियालकोट निवासी मोहम्मद सुहैल मलिक और गुजरांवाला निवासी वसीम अहमद को गिरफ्तार किया। दोनों को कथित लश्कर आतंकवादी बताया गया। मलिक के बारे में दावा किया गया कि उसने हिरासत में छत्तीसिंहपोरा हमले में भाग लेने की बात स्वीकार की थी।

मलिक ने द न्यूयॉर्क टाइम्स के पत्रकार बैरी बियरक को दिए साक्षात्कार में भी कथित रूप से कहा कि उसने लश्कर के निर्देश पर गोली चलाई थी। लेकिन यह साक्षात्कार अधिकारियों की मौजूदगी में हुआ था। पत्रकार ने स्वयं स्वीकारोक्ति की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए, क्योंकि मलिक स्वतंत्र वातावरण में बात नहीं कर रहा था और उसके उत्तर पुलिस दस्तावेजों से मिलते-जुलते थे।

3. अदालत में सबूत विफल

मोहम्मद सुहैल मलिक और वसीम अहमद के खिलाफ मुकदमा अंततः दिल्ली की अदालत में चला। अभियोजन पक्ष ने 12 गवाह पेश किए, लेकिन कई गवाह मुकर गए अथवा आरोपियों की पहचान नहीं कर सके।

नानक सिंह ने अदालत को बताया कि वे गोली लगने के बाद बेहोश हो गए थे और हमलावरों को नहीं देख पाए। दूसरे गवाह करमजीत सिंह भी आरोपियों की पहचान नहीं कर सके। 10 अगस्त 2011 को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश कावेरी बावेजा ने पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में दोनों पाकिस्तानी नागरिकों को छत्तीसिंहपोरा हत्याकांड के आरोप से बरी कर दिया। इंडियन एक्सप्रेस—दो आरोपियों की दोषमुक्ति

दोषमुक्ति का अर्थ यह नहीं कि अदालत ने किसी वैकल्पिक संगठन या सुरक्षा बल को जिम्मेदार माना। इसका सीमित कानूनी अर्थ यह था कि अभियोजन मलिक और वसीम की संलिप्तता संदेह से परे सिद्ध नहीं कर सका।

4. डेविड हेडली का बयान

वर्ष 2010 में 26/11 मुंबई हमले से जुड़े लश्कर आतंकी डेविड कोलमैन हेडली से राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने पूछताछ की। मीडिया में आई रिपोर्टों के अनुसार हेडली ने छत्तीसिंहपोरा हत्याकांड को लश्कर-ए-तैयबा की कार्रवाई बताया और मुजम्मिल भट नामक लश्कर कमांडर को इससे जोड़ा।

हेडली का बयान जांच एजेंसी के लिए महत्वपूर्ण खुफिया सामग्री था, लेकिन छत्तीसिंहपोरा मामले में इसके आधार पर कोई अंतिम मुकदमा या दोषसिद्धि नहीं हुई। इसलिए इसे एजेंसी के समक्ष दिया गया आरोपात्मक बयान कहा जाना चाहिए, न्यायिक निष्कर्ष नहीं।

5. वैकल्पिक आरोप

पथरीबल में पांच निर्दोष नागरिकों की फर्जी मुठभेड़ और उसके बाद डीएनए नमूनों से छेड़छाड़ सामने आने से छत्तीसिंहपोरा के बारे में भी संदेह बढ़ा। कुछ मानवाधिकार समूहों तथा राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने आशंका जताई कि नरसंहार के पीछे आतंकवादी समूहों के अलावा आत्मसमर्पण कर चुके उग्रवादी या राज्य से जुड़े तत्व भी हो सकते हैं।

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने जून 2000 में लिखा था कि उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह निश्चित नहीं था कि हमला सशस्त्र उग्रवादियों, सरकार समर्थित पूर्व उग्रवादियों अथवा राज्य एजेंटों में से किसने किया।

लेकिन किसी न्यायालय, सीबीआई जांच या आधिकारिक आयोग ने छत्तीसिंहपोरा हत्याकांड के लिए भारतीय सेना अथवा किसी अन्य सरकारी बल को जिम्मेदार नहीं ठहराया। पथरीबल में सेना के लोगों पर लगे आरोप छत्तीसिंहपोरा नरसंहार में उनकी संलिप्तता का स्वतः प्रमाण नहीं हैं। दोनों घटनाएं जुड़ी हुई हैं, लेकिन उनके अपराध और साक्ष्य अलग हैं।

सैन्य वर्दी—विश्वास को हथियार बनाने की रणनीति

छत्तीसिंहपोरा में सैन्य वर्दी का इस्तेमाल वंधामा नरसंहार से मिलता-जुलता था। वर्दी के कारण ग्रामीणों ने दरवाजे खोले, पुरुष घरों से बाहर निकले और सुरक्षा जांच के नाम पर बताए गए स्थानों पर एकत्र हुए।

यह पद्धति तीन उद्देश्यों को पूरा करती थी:

पीड़ितों को बिना प्रतिरोध बाहर निकालना;

हमलावरों की असली पहचान छिपाना;

घटना के बाद सुरक्षा बलों पर संदेह पैदा करना।

इस प्रकार वर्दी केवल छद्मावरण नहीं थी; वह मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक हथियार भी थी। इससे जांच अधिक कठिन हुई और ऐसी परस्पर विरोधी धारणाएं पैदा हुईं जो दशकों बाद भी बनी हुई हैं।

सुरक्षा व्यवस्था की विफलता

एमनेस्टी की रिपोर्ट के अनुसार राष्ट्रीय राइफल्स की एक इकाई गांव के निकट तैनात थी, लेकिन हमले के समय हस्तक्षेप नहीं हुआ और सुरक्षा बल अगली सुबह घटनास्थल पर पहुंचे। यदि यह विवरण सही है तो यह गंभीर सुरक्षा और प्रतिक्रिया-विलंब का मामला था।

मुख्य अनुत्तरित प्रश्न हैं:

  • 15–17 हथियारबंद लोग गांव तक कैसे पहुंचे?
  • इतनी लंबी कार्रवाई के दौरान निकट सुरक्षा इकाई को सूचना क्यों नहीं मिली?
  • हमलावरों को गांव की भौगोलिक संरचना और दोनों गुरुद्वारों की जानकारी किसने दी?
  • उन्हें यह कैसे पता था कि किन घरों में सिख पुरुष मौजूद हैं?
  • हमले से पहले क्या गांव की रेकी की गई थी?
  • हमलावर किस मार्ग से लौटे?
  • घटनास्थल से मिले कारतूस, गोलियों और अन्य फॉरेंसिक सामग्री का क्या परिणाम निकला?
  • इन प्रश्नों पर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कोई समग्र जांच रिपोर्ट सामने नहीं आई
  • नरसंहार के बाद की दो घटनाएं

छत्तीसिंहपोरा को समझने के लिए उसके बाद हुई पथरीबल और ब्रकपोरा घटनाओं को संक्षेप में दर्ज करना आवश्यक है। हालांकि ये छत्तीसिंहपोरा के मृतकों की संख्या में शामिल नहीं हैं।

पथरीबल: पांच निर्दोष ग्रामीणों की हत्या

25 मार्च 2000 को सेना ने पथरीबल-पंचथन क्षेत्र में पांच लोगों को मारने और उन्हें छत्तीसिंहपोरा नरसंहार के जिम्मेदार “विदेशी आतंकवादी” बताने का दावा किया। शव बुरी तरह जले हुए थे।

स्थानीय परिवारों ने आरोप लगाया कि मारे गए लोग विदेशी आतंकवादी नहीं, बल्कि कुछ दिन पहले उठाए गए स्थानीय नागरिक थे। शवों को कब्र से निकालकर डीएनए जांच कराई गई। प्रारंभिक नमूनों में छेड़छाड़ और गलत नमूने भेजे जाने का मामला सामने आया। दोबारा परीक्षण से पुष्टि हुई कि पांचों शव लापता स्थानीय ग्रामीणों के ही थे।

सीबीआई ने मामले की जांच कर पांच सैन्य अधिकारियों के विरुद्ध अपहरण, हत्या और प्रमाण नष्ट करने की धाराओं में आरोपपत्र दाखिल किया। सीबीआई ने इसे वास्तविक मुठभेड़ नहीं माना। मामला एएफएसपीए के अंतर्गत मुकदमा चलाने की अनुमति और सैन्य न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में उलझ गया। सेना ने बाद में अपनी कार्यवाही बंद करते हुए पर्याप्त साक्ष्य न मिलने की बात कही। पथरीबल पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय, इंडियन एक्सप्रेस की विस्तृत पड़ताल

पथरीबल ने छत्तीसिंहपोरा जांच को गहरा नुकसान पहुंचाया। जिन पांच लोगों को सरकार ने पहले हत्यारा बताया, वे स्वयं निर्दोष नागरिक निकले। इससे वास्तविक हमलावरों के संबंध में आधिकारिक दावों की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न उठे।

ब्रकपोरा: जांच मांग रहे प्रदर्शनकारियों पर गोली

3 अप्रैल 2000 को पथरीबल में मारे गए लोगों की पहचान और शव निकालने की मांग को लेकर हजारों लोग अनंतनाग की ओर मार्च कर रहे थे। ब्रकपोरा में पुलिस और सीआरपीएफ ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई।

प्रारंभिक रिपोर्टों में सात मौतें दर्ज हुईं; बाद के स्रोतों और न्यायिक जांच में मृतकों की संख्या आठ या नौ तक बताई गई। कई लोग घायल हुए। सेवानिवृत्त सर्वोच्च न्यायालय न्यायाधीश एस.आर. पांडियन की अध्यक्षता वाले जांच आयोग ने पुलिस और सीआरपीएफ कर्मियों की भूमिका पर गंभीर निष्कर्ष दिए, लेकिन दोषियों के विरुद्ध प्रभावी आपराधिक कार्रवाई नहीं हुई।

इस प्रकार मात्र दो सप्ताह में दक्षिण कश्मीर ने हिंसा की तीन परतें देखीं:

सामाजिक प्रभाव—क्या सिखों का पलायन हुआ?

हमले के बाद कश्मीरी सिखों में भारी भय और असुरक्षा फैल गई। जम्मू सहित कई स्थानों पर विरोध प्रदर्शन हुए। आशंका थी कि पंडितों की तरह सिखों का भी सामूहिक पलायन शुरू हो सकता है।

तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने 26 मार्च को सिख बस्तियों के लिए विशेष सुरक्षा व्यवस्था का आश्वासन दिया। लेकिन कुछ स्थानीय सिख प्रतिनिधियों ने गांवों के सैन्यीकरण का विरोध करते हुए कहा कि उनका मुस्लिम पड़ोसियों से पहले कोई संघर्ष नहीं था।

हमले के बाद कई मुस्लिम संगठनों और स्थानीय ग्रामीणों ने सिखों से घाटी न छोड़ने की अपील की। बड़े पैमाने पर स्थायी पलायन नहीं हुआ, लेकिन सुरक्षा, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और अल्पसंख्यक दर्जे को लेकर कश्मीरी सिखों की चिंताएं बढ़ गईं।

सितंबर 2025 में नई जांच का आश्वासन

6 सितंबर 2025 को “35 शहीद सिंह वेलफेयर ऑर्गेनाइजेशन” के प्रतिनिधिमंडल ने जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा से मुलाकात कर मामले की नई और निष्पक्ष जांच की मांग की। प्रतिनिधिमंडल ने पीड़ित परिवारों को अनुकंपा नियुक्ति, शिक्षा में सहायता तथा छत्तीसिंहपोरा में स्मारक निर्माण की मांग भी रखी।

उपराज्यपाल ने व्यापक जांच और न्याय दिलाने का आश्वासन दिया। उपराज्यपाल के आश्वासन पर रिपोर्ट

हालांकि मार्च 2026 में ऑल पार्टी सिख कोऑर्डिनेशन कमेटी ने फिर नई पारदर्शी जांच की मांग की। इससे संकेत मिलता है कि सितंबर 2025 के आश्वासन के बाद भी किसी जांच का सार्वजनिक अंतिम परिणाम सामने नहीं आया था। मार्च 2026 की ताजा मांग

छत्तीसिंहपोरा का रणनीतिक महत्व

टारगेट किलिंग के इतिहास में छत्तीसिंहपोरा छह कारणों से महत्वपूर्ण है:

यह कश्मीरी सिखों पर पहला बड़ा सामूहिक हमला था।

पुरुषों को धार्मिक पहचान के आधार पर घरों से चुनकर निकाला गया।

सैन्य वर्दी और सुरक्षा जांच के बहाने का प्रयोग किया गया।

हमला एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय यात्रा के समय किया गया।

इसका उद्देश्य सिख-मुस्लिम संबंधों में अविश्वास और घाटी से नया पलायन पैदा करना हो सकता था।

इसके बाद हुई फर्जी मुठभेड़ और प्रदर्शनकारियों की हत्या ने मूल अपराध की जांच को और अधिक संदिग्ध तथा जटिल बना दिया।

शोध निष्कर्ष

छत्तीसिंहपोरा मामले में उपलब्ध तथ्यों को तीन श्रेणियों में विभाजित करना आवश्यक है।

व्यापक रूप से स्थापित तथ्य: 20 मार्च 2000 को सैन्य वर्दी पहने 15–17 अज्ञात बंदूकधारियों ने छत्तीसिंहपोरा में सिख पुरुषों को सुरक्षा जांच के बहाने बाहर बुलाया और नजदीक से गोलीबारी की। कुल 35 लोग मारे गए। हमला राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की भारत यात्रा शुरू होने से ठीक पहले हुआ।

एजेंसी संबंधी दावे: भारत सरकार और सुरक्षा एजेंसियों ने लश्कर-ए-तैयबा तथा हिजबुल मुजाहिदीन को जिम्मेदार बताया। मोहम्मद सुहैल मलिक ने कथित स्वीकारोक्ति की और डेविड हेडली ने बाद में लश्कर की भूमिका का दावा किया।

न्यायिक स्थिति: मलिक और वसीम अहमद को पर्याप्त साक्ष्य न होने के कारण बरी कर दिया गया। किसी अन्य आरोपी या संगठन को अदालत ने नरसंहार के लिए दोषी नहीं ठहराया। सुरक्षा बलों की भूमिका के वैकल्पिक आरोप भी न्यायालय में सिद्ध नहीं हुए।

छत्तीसिंहपोरा की त्रासदी इसलिए और गहरी है कि उसके पीड़ितों की पहचान और हत्या का तरीका स्पष्ट होने के बावजूद अपराधियों की कानूनी पहचान आज तक स्थापित नहीं हुई। पथरीबल के फर्जी दावे और ब्रकपोरा की गोलीबारी ने सरकार तथा जांच एजेंसियों में लोगों के विश्वास को और कमजोर किया।

न्याय का अर्थ किसी पूर्वनिर्धारित आरोप की पुष्टि करना नहीं, बल्कि प्रत्यक्षदर्शी बयानों, फॉरेंसिक प्रमाणों, हथियारों, संचार रिकॉर्ड, कथित विदेशी और स्थानीय नेटवर्क तथा बाद की स्वीकारोक्तियों की स्वतंत्र जांच करना है। जब तक यह प्रक्रिया सार्वजनिक और न्यायिक कसौटी पर पूरी नहीं होती, छत्तीसिंहपोरा कश्मीर के इतिहास में एक अनसुलझा नरसंहार और अधूरे न्याय का प्रतीक बना रहेगा।