पंजाब आतंकवाद और मानवाधिकार विवाद
फर्जी मुठभेड़, गुमशुदगी, जसवंत सिंह खालड़ा और अज्ञात अंतिम संस्कार
पंजाब में आतंकवाद के विरुद्ध राज्य की कार्रवाई का परिणाम असंदिग्ध था—1991 में 5,265 आतंकवाद-संबंधी मौतों वाला राज्य 1994 तक उस स्थिति से लगभग बाहर आ चुका था। खालिस्तानी आतंकवादी संगठनों की सैन्य और सामाजिक क्षमता टूट गई, सामान्य चुनावी राजनीति लौटी और नागरिक हत्याएं लगभग समाप्त हो गईं।
लेकिन आतंकवाद-विरोधी अभियान की दूसरी विरासत भी है।
गैरकानूनी हिरासत, यातना, कथित फर्जी मुठभेड़, हिरासत में हत्या, गायब किए गए व्यक्तियों और पुलिस द्वारा अज्ञात अथवा लावारिस बताकर शवों के अंतिम संस्कार के आरोप पंजाब के इतिहास का गंभीर हिस्सा बने।
इन आरोपों में सब कुछ समान स्तर पर प्रमाणित नहीं हुआ।
कुछ दावे मानवाधिकार संगठनों के अनुमानों और प्रत्यक्षदर्शी गवाहियों पर आधारित रहे।
कुछ मामलों में जांच निर्णायक निष्कर्ष तक नहीं पहुंची।
लेकिन दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब में कथित गुप्त अंतिम संस्कारों को इतना गंभीर माना कि सीबीआई जांच का आदेश दिया। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 2,097 शवों से जुड़े मामले में 1,513 मृतकों की पहचान के बाद लगभग 28 करोड़ रुपये मुआवजे की सिफारिश की। और मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के अपहरण और हत्या में पंजाब पुलिस के अधिकारियों को अदालतों ने दोषी ठहराया।
इसलिए इस अध्याय का प्रश्न यह नहीं है कि पंजाब पुलिस ने आतंकवाद को हराया या नहीं।
वह तथ्य पिछले अध्याय में स्पष्ट हो चुका है।
यहां प्रश्न केवल यह है—
आतंकवाद को हराने की प्रक्रिया में कानून की सीमाएं कहां टूटीं और उनका दस्तावेजी प्रमाण क्या है?
1. आतंकवाद-विरोधी कार्रवाई किस वातावरण में हुई?
मानवाधिकार विवाद को उस समय की सुरक्षा परिस्थिति से काटकर नहीं देखा जा सकता।
1988 से 1992 के बीच पंजाब में हजारों नागरिक, पुलिसकर्मी और आतंकवादी मारे गए। पुलिस अधिकारियों और उनके परिवारों की हत्या की गई, बस और ट्रेन यात्रियों का नरसंहार हुआ, पत्रकार, न्यायिक अधिकारी और राजनीतिक उम्मीदवार निशाना बने।
राज्य की पुलिस स्वयं युद्ध जैसी स्थिति में काम कर रही थी।
इसी वातावरण में पुलिस को असाधारण अधिकार, राजनीतिक समर्थन और परिचालन स्वतंत्रता मिली।
समस्या तब पैदा होती है जब आतंकवाद से लड़ने की यह आवश्यकता—
गिरफ्तारी के नियम,
न्यायिक प्रक्रिया,
हिरासत के रिकॉर्ड,
और जीवन के संवैधानिक अधिकार—
को पीछे छोड़ देती है।
Human Rights Watch और Physicians for Human Rights ने 1991–93 के मामलों की जांच के आधार पर मनमानी गिरफ्तारी, यातना, गायब किए जाने और कथित फर्जी मुठभेड़ों के अनेक आरोप दर्ज किए। भारत सरकार और पंजाब पुलिस ने इन आरोपों के व्यापक तथा व्यवस्थित स्वरूप को अस्वीकार किया और कहा कि शिकायतों की जांच की गई तथा अनेक आरोप बढ़ा-चढ़ाकर लगाए गए थे।
यही दोनों दृष्टिकोण इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि हैं।
2. ‘फर्जी मुठभेड़’ से क्या आशय है?
आतंकवाद के दौरान बड़ी संख्या में आतंकवादी वास्तविक पुलिस मुठभेड़ों में मारे गए।
इसलिए प्रत्येक मुठभेड़ को फर्जी मानना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा।
“फर्जी मुठभेड़” आरोप का अर्थ आम तौर पर वह स्थिति है जिसमें—
किसी व्यक्ति को पहले हिरासत में लिया गया,
उस गिरफ्तारी को आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज नहीं किया गया,
बाद में उसकी मृत्यु हुई,
और पुलिस ने दावा किया कि व्यक्ति हथियारबंद मुठभेड़ में मारा गया।
1991 की Human Rights Watch रिपोर्ट ने ऐसे अनेक मामलों का वर्णन किया जिनमें संगठन का आरोप था कि व्यक्ति को पुलिस हिरासत में देखने के बाद बाद में उसकी मौत “मुठभेड़” में दिखाई गई।
यह मानवाधिकार संगठन का निष्कर्ष था, प्रत्येक मामले की न्यायिक पुष्टि नहीं।
लेकिन बाद के न्यायिक मामलों से इतना अवश्य सिद्ध हुआ कि पंजाब पुलिस के कुछ अधिकारियों द्वारा हिरासत, हत्या और रिकॉर्ड में हेरफेर जैसी गंभीर आपराधिक कार्रवाइयां वास्तव में हुई थीं।
3. गुमशुदगी का प्रश्न
परिवारों के लिए सबसे कठिन श्रेणी उन लोगों की थी जिन्हें पुलिस उठाकर ले गई—ऐसा परिजनों या गवाहों का दावा था—लेकिन बाद में पुलिस ने हिरासत से इनकार कर दिया।
ऐसे मामलों में समस्या दोहरी थी।
व्यक्ति जीवित है या मर चुका है—यह पता नहीं चलता।
और यदि मृत्यु हुई, तो शव भी परिवार को नहीं मिलता।
Human Rights Watch ने 1990 के दशक में पंजाब में कथित जबरन गुमशुदगी के बड़े पैमाने के आरोप दर्ज किए और कहा कि कुछ मामलों में बाद में पता चला कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति को मुठभेड़ में मृत दिखाया गया था।
भारत सरकार ने संयुक्त राष्ट्र के समक्ष व्यवस्थित गुमशुदगियों के आरोपों को अस्वीकार करते हुए कहा था कि पुलिस ज्यादतियों की शिकायतों पर कार्रवाई हुई और बड़ी संख्या में शिकायतें गलत या अतिरंजित निकलीं।
इसलिए पंजाब में कुल “गायब” लोगों की कोई सर्वमान्य संख्या आज भी उपलब्ध नहीं है।
4. जसवंत सिंह खालड़ा कौन थे?
जसवंत सिंह खालड़ा अमृतसर के मानवाधिकार कार्यकर्ता थे और शिरोमणि अकाली दल के मानवाधिकार प्रकोष्ठ से जुड़े थे।
1994–95 में खालड़ा और जस्पाल सिंह ढिल्लों ने अमृतसर और आसपास के श्मशानों के रिकॉर्ड की जांच शुरू की।
उनका आरोप था कि आतंकवाद-विरोधी दौर में पुलिस ने बड़ी संख्या में व्यक्तियों के शव “अज्ञात” या “लावारिस” बताकर अंतिम संस्कार कर दिए, जबकि उनमें से कुछ की पहचान पुलिस को मालूम थी।
सुप्रीम कोर्ट के 15 नवंबर 1995 के आदेश में खालड़ा द्वारा जुटाए गए ऐसे रिकॉर्ड और प्रेस नोट का उल्लेख है। अदालत ने आरोपों को इतना गंभीर माना कि कहा—यदि वे आंशिक रूप से भी सही हैं तो यह गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन की भयावह कहानी होगी।
यही वह बिंदु था जहां स्थानीय मानवाधिकार आरोप राष्ट्रीय न्यायिक जांच में बदल गया।
5. खालड़ा का दावा और बाद में प्रमाणित संख्या एक नहीं
खालड़ा और उनके सहयोगियों से जुड़े बाद के मानवाधिकार साहित्य में छह हजार से अधिक गुप्त अंतिम संस्कारों का दावा मिलता है। Human Rights Watch ने भी उनके शोध के आधार पर इस संख्या का उल्लेख किया।
लेकिन इसे न्यायिक रूप से प्रमाणित संख्या नहीं लिखना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट और सीबीआई की जांच जिस औपचारिक मामले तक पहुंची, वह तीन पुलिस जिलों—
अमृतसर,
मजीठा
और तरनतारन—
के 2,097 शवों से संबंधित था।
इसलिए:
6,000+ — खालड़ा/मानवाधिकार शोध का व्यापक दावा।
2,097 — सुप्रीम कोर्ट से एनएचआरसी तक पहुंचे विशिष्ट सत्यापित जांच समूह की संख्या।
दोनों को मिलाना उचित नहीं होगा।
6. 6 सितंबर 1995: खालड़ा स्वयं गायब हो गए
6 सितंबर 1995 की सुबह जसवंत सिंह खालड़ा अपने अमृतसर स्थित घर के बाहर थे।
उनकी पत्नी परमजीत कौर के अनुसार पुलिसकर्मी उन्हें वाहन में बैठाकर ले गए।
जब स्थानीय जांच से कोई परिणाम नहीं निकला तो मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
11 सितंबर को अदालत ने प्राप्त एक टेलीग्राम को ही बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के रूप में लिया। बाद में परमजीत कौर ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत अलग याचिका दायर की।
पंजाब पुलिस ने प्रारंभ में आरोपों से इनकार किया और कहा कि जांच में संबंधित पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध कोई निष्कर्ष नहीं निकला।
यही बाद की न्यायिक कहानी को और महत्वपूर्ण बनाता है।
7. सुप्रीम कोर्ट ने जांच पंजाब पुलिस से लेकर सीबीआई को क्यों दी?
15 नवंबर 1995 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरोप इतने गंभीर हैं कि सार्वजनिक विश्वास और न्याय के हित में जांच पंजाब पुलिस के पास नहीं रहनी चाहिए।
अदालत ने दो अलग जांच सीबीआई को दीं—
पहली, जसवंत सिंह खालड़ा के अपहरण और उनका पता लगाने की।
दूसरी, उनके द्वारा उठाए गए अज्ञात शवों और अंतिम संस्कारों के आरोपों की।
यह निर्णय अपने आप में महत्वपूर्ण था।
जिस पुलिस बल के विरुद्ध आरोप थे, अदालत ने उसी से जांच लेकर स्वतंत्र केंद्रीय एजेंसी को सौंपी।
8. खालड़ा के साथ वास्तव में क्या हुआ?
सीबीआई जांच और बाद की गवाहियों से मामला बदल गया।
सुप्रीम कोर्ट के 2011 के फैसले में दर्ज रिकॉर्ड के अनुसार खालड़ा को 6 सितंबर 1995 को पुलिस ने उठाया, झबाल पुलिस स्टेशन में अवैध रूप से रखा गया और बाद में उनकी हत्या कर शव हरिके क्षेत्र में नहर में फेंक दिया गया।
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने भी साक्ष्यों की समीक्षा के बाद निष्कर्ष निकाला कि खालड़ा को उनके घर से उठाया गया, झबाल पुलिस स्टेशन में यातना दी गई, गोली मारकर हत्या की गई और शव सतलुज नदी क्षेत्र में नष्ट किया गया।
यह अब मानवाधिकार संगठन का केवल आरोप नहीं था।
यह न्यायिक रूप से स्थापित अपराध था।
9. पुलिस अधिकारियों को सजा
सीबीआई ने 1996 में नौ पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध आरोपपत्र दाखिल किया।
मुख्य आरोपियों में तत्कालीन तरनतारन एसएसपी अजित सिंह संधू का नाम भी था, लेकिन मुकदमे में आरोप तय होने से पहले उसकी मृत्यु हो गई।
2005 में निचली अदालत ने कई पुलिस अधिकारियों को दोषी ठहराया।
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने बाद में चार अन्य पुलिस अधिकारियों की सजा बढ़ाकर आजीवन कारावास कर दी।
4 नवंबर 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने दोषसिद्धि में हस्तक्षेप करने से इनकार किया और पुलिस अत्याचार को कानून के शासन के लिए गंभीर खतरा बताया।
खालड़ा हत्या मामला इसलिए पंजाब मानवाधिकार इतिहास का केंद्रीय मामला है—
यह पुलिस ज्यादती का आरोप नहीं, पुलिस अधिकारियों की न्यायिक रूप से प्रमाणित हत्या है।
10. अज्ञात शवों की जांच में सीबीआई को क्या मिला?
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सीबीआई ने अमृतसर, मजीठा और तरनतारन के तीन श्मशानों से जुड़े रिकॉर्ड की जांच की।
मामला अंततः 2,097 शवों पर केंद्रित हुआ जिन्हें 1984 से 1994 के बीच पुलिस द्वारा अज्ञात अथवा लावारिस के रूप में अंतिम संस्कार किए जाने का रिकॉर्ड था।
यहां एक महत्वपूर्ण सीमा फिर जरूरी है।
2,097 का अर्थ यह नहीं कि अदालत या एनएचआरसी ने यह घोषित किया कि सभी 2,097 लोगों की पुलिस ने हत्या की थी।
जांच का प्रश्न दो स्तरों पर था—
व्यक्ति की मृत्यु किन परिस्थितियों में हुई?
और शव का अंतिम संस्कार कानून और नियमों के अनुसार हुआ या नहीं?
11. सुप्रीम कोर्ट से मामला एनएचआरसी तक
12 दिसंबर 1996 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को भेज दिया।
अदालत ने यह भी कहा कि आयोग द्वारा दिया गया मुआवजा बाध्यकारी होगा।
इसके बाद प्रक्रिया कई वर्षों तक चली।
परिवारों से दावे मांगे गए।
श्मशान रिकॉर्ड, पुलिस रिकॉर्ड और पहचान संबंधी सामग्री की जांच की गई।
पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति के.एस. भल्ला सहित जांच तंत्र नियुक्त किए गए।
यह भारत के सबसे लंबे मानवाधिकार क्षतिपूर्ति मामलों में से एक बन गया।
12. 194/195 मामले: पुलिस हिरासत की संस्थागत पुष्टि
2006 में एनएचआरसी ने पाया कि जांच किए गए मामलों में 194 मृतक मृत्यु से ठीक पहले पुलिस की हिरासत अथवा मानी गई हिरासत में थे।
इन परिवारों के लिए आयोग ने प्रति परिवार 2.5 लाख रुपये मुआवजा निर्धारित किया और कहा कि पुलिस उन व्यक्तियों की सुरक्षा करने के अपने दायित्व में विफल रही।
बाद की पहचान प्रक्रिया के बाद 2012 की अंतिम प्रेस विज्ञप्ति में यह संख्या 195 बताई गई।
यह छोटी संख्या-अंतर अलग-अलग चरणों में अतिरिक्त पहचान से आया।
इस तथ्य को बहुत स्पष्ट रूप से पढ़ना चाहिए—
एनएचआरसी ने सभी शवों को हिरासत में हत्या नहीं माना।
लेकिन लगभग दो सौ मामलों में मृतक का मृत्यु से पहले पुलिस हिरासत में होना स्वीकार किया गया।
13. बाकी पहचाने गए शवों में उल्लंघन क्या था?
एनएचआरसी ने 1,051 अन्य पहचाने गए शवों के बारे में 2006 में कहा कि यह सिद्ध नहीं था कि सभी मृत्यु से पहले पुलिस हिरासत में थे।
फिर भी आयोग ने पाया कि पुलिस द्वारा शवों का अंतिम संस्कार निर्धारित पुलिस नियमों, प्रक्रिया और मानवीय गरिमा के अनुरूप नहीं हुआ था। इसलिए परिजनों को 1.75 लाख रुपये प्रति मामला मुआवजा दिया गया।
2012 तक आगे की पहचान के बाद कुल 1,513 परिवारों के लिए राहत की सिफारिश हुई—
195 हिरासत/मानी गई हिरासत वाले मामले,
और 1,318 अन्य पहचाने गए शव।
कुल मुआवजा लगभग 27.94 करोड़ रुपये था।
14. 532 शव अंत तक अज्ञात रहे
एनएचआरसी ने वर्षों की प्रक्रिया के बाद 2,097 में से 1,513 मृतकों की पहचान की।
532 शवों की पहचान नहीं हो सकी।
कुछ संख्याओं में शुरुआती रिकॉर्ड, डुप्लीकेट और पुनर्गणना के कारण मामूली अंतर मिलता है; आयोग की 2006 विज्ञप्ति ने पुनः परीक्षण में 2,059 का भी उल्लेख किया था।
इसलिए 2,097 को मामले की मूल संदर्भ संख्या और 1,513 को अंतिम पहचाने गए मृतकों की संख्या मानना सबसे साफ तरीका है।
15. क्या इससे ‘हजारों फर्जी मुठभेड़’ सिद्ध हो गईं?
नहीं।
यह अंतर सबसे अधिक महत्वपूर्ण है।
एनएचआरसी का मुआवजा आदेश स्वयं प्रत्येक व्यक्ति की हत्या के लिए किसी पुलिस अधिकारी की आपराधिक जिम्मेदारी तय नहीं करता था।
आयोग ने एक चरण में स्पष्ट किया कि मुआवजा आदेश देते समय वह संबंधित पुलिस अधिकारियों की व्यक्तिगत आपराधिक दोषिता पर निर्णय नहीं दे रहा था।
इसलिए यह लिखना कि—
“2,097 निर्दोष लोगों को पुलिस ने फर्जी मुठभेड़ में मार दिया”
एनएचआरसी रिकॉर्ड से प्रमाणित नहीं है।
सही निष्कर्ष है—
2,097 शवों के पुलिस-सम्बंधित अंतिम संस्कार की जांच हुई; बड़ी संख्या में शवों की पहचान बाद में हुई; लगभग दो सौ व्यक्ति मृत्यु से पहले पुलिस हिरासत/मानी गई हिरासत में पाए गए; और अन्य अनेक मामलों में अंतिम संस्कार की प्रक्रिया मानवाधिकार तथा नियमों के अनुरूप नहीं पाई गई।
16. फिर मानवाधिकार संगठनों के बड़े आंकड़े कहां से आते हैं?
Human Rights Watch, Amnesty और पंजाब-आधारित संगठनों ने आधिकारिक 2,097 मामलों से कहीं अधिक गुमशुदगी और कथित गैर-न्यायिक हत्याओं का दावा किया।
उनका तर्क था कि सुप्रीम कोर्ट–एनएचआरसी मामला केवल तीन पुलिस जिलों और तीन श्मशानों से जुड़ा था, जबकि आतंकवाद-विरोधी अभियान पूरे पंजाब में चला था।
यह तर्क भौगोलिक रूप से सही है—
2,097 पूरे पंजाब की अंतिम संख्या नहीं है।
लेकिन इससे व्यापक अनुमानों की प्रत्येक संख्या स्वतः सिद्ध नहीं हो जाती।
इसलिए पूरे पंजाब के लिए “दस हजार”, “पच्चीस हजार” या अन्य निश्चित आंकड़े लिखने के लिए ऐसी सर्वमान्य आधिकारिक या न्यायिक गणना उपलब्ध नहीं है।
सटीक इतिहास में यहां अज्ञात स्वीकार करना अधिक उचित है।
17. राज्य का पक्ष क्या था?
पंजाब पुलिस और भारत सरकार ने बार-बार इस धारणा का विरोध किया कि आतंकवाद-विरोधी अभियान एक व्यवस्थित गैरकानूनी हत्या नीति थी।
भारत सरकार ने संयुक्त राष्ट्र मंचों पर कहा कि मानवाधिकार आरोपों की जांच की जाती थी, अनेक आरोप गलत या अत्यधिक बढ़े हुए पाए गए और पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध जहां आवश्यक हुआ कार्रवाई भी की गई। एक सरकारी प्रतिक्रिया में 210 पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई का उल्लेख किया गया था।
राज्य का व्यापक तर्क यह था कि—
पुलिस अभूतपूर्व आतंकवादी हिंसा से लड़ रही थी,
हजारों वास्तविक मुठभेड़ें हुईं,
पुलिसकर्मी और उनके परिवार भी बड़ी संख्या में मारे गए,
और कुछ अधिकारियों की ज्यादती के आधार पर पूरे अभियान को गैरकानूनी नहीं कहा जा सकता।
यह तर्क उस समय की सुरक्षा परिस्थिति को समझने के लिए आवश्यक है।
लेकिन खालड़ा हत्या और एनएचआरसी के अंतिम संस्कार निष्कर्ष यह भी दिखाते हैं कि सभी शिकायतें कल्पित नहीं थीं।
18. के.पी.एस. गिल की जिम्मेदारी का प्रश्न
मानवाधिकार संगठनों ने पंजाब पुलिस के महानिदेशक के.पी.एस. गिल के नेतृत्व वाली रणनीति की कड़ी आलोचना की और पुरस्कार प्रणाली, पुलिस की परिचालन स्वतंत्रता तथा कथित गैर-न्यायिक तरीकों को उच्च स्तर की नीति से जोड़ा।
दूसरी ओर गिल और उनके समर्थकों का तर्क था कि आतंकवाद से लड़ने के दौरान पुलिस पर लगे अनेक आरोप आतंकवादी समर्थक प्रचार, गलत आंकड़ों और युद्ध जैसी स्थितियों की गलत व्याख्या पर आधारित थे।
न्यायिक रिकॉर्ड की सीमा यहां स्पष्ट है।
जसवंत सिंह खालड़ा हत्या मामले में कई पुलिस अधिकारी दोषी सिद्ध हुए, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने के.पी.एस. गिल को उस हत्या का दोषी नहीं ठहराया।
इसी प्रकार एनएचआरसी के 2,097 शव मामले से पूरे पंजाब पुलिस नेतृत्व की व्यक्तिगत आपराधिक जिम्मेदारी स्वतः स्थापित नहीं होती।
अतः संस्थागत जवाबदेही और व्यक्तिगत आपराधिक दोष—दो अलग प्रश्न हैं।
19. आतंकवाद की सफलता और कानून के शासन का प्रश्न
पंजाब का अनुभव एक कठिन लोकतांत्रिक प्रश्न सामने रखता है।
क्या आतंकवाद जैसी असाधारण हिंसा से लड़ते समय राज्य असाधारण उपाय कर सकता है?
निश्चित रूप से कर सकता है।
लेकिन क्या राज्य किसी व्यक्ति को हिरासत में लेकर बिना न्यायिक प्रक्रिया मार सकता है?
नहीं।
क्या मृत व्यक्ति की पहचान होते हुए भी उसे अज्ञात बताकर अंतिम संस्कार किया जा सकता है?
नहीं।
क्या आतंकवादी होने का संदेह जीवन के संवैधानिक अधिकार को समाप्त कर देता है?
नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने खालड़ा मामले में पुलिस अत्याचार को स्वीकार करना कानून के शासन को व्यवस्थित रूप से कमजोर करना बताया।
यही इस अध्याय का संवैधानिक केंद्र है।
20. इस विवाद से क्या निश्चित रूप से स्थापित होता है?
पूरे उपलब्ध रिकॉर्ड से कुछ निष्कर्ष पर्याप्त मजबूती से निकाले जा सकते हैं।
पहला: पंजाब में आतंकवादी हिंसा वास्तविक और असाधारण रूप से घातक थी। पुलिस किसी काल्पनिक खतरे से नहीं लड़ रही थी।
दूसरा: आतंकवाद-विरोधी अभियान के दौरान पुलिस ज्यादती के सभी आरोप झूठे नहीं थे। कुछ मामलों में पुलिसकर्मियों की आपराधिक दोषसिद्धि हुई।
तीसरा: जसवंत सिंह खालड़ा को पुलिस अधिकारियों ने अवैध रूप से हिरासत में लिया, उनकी हत्या की और शव नष्ट किया—यह न्यायिक रूप से स्थापित है।
चौथा: 2,097 शवों का पुलिस द्वारा अज्ञात/लावारिस रूप में अंतिम संस्कार जांच का विषय बना; 1,513 की पहचान हुई और एनएचआरसी ने लगभग 28 करोड़ रुपये राहत की सिफारिश की।
पांचवां: इन 2,097 सभी व्यक्तियों को पुलिस द्वारा फर्जी मुठभेड़ में मारा गया—ऐसा एनएचआरसी ने स्थापित नहीं किया।
छठा: पूरे पंजाब में गैर-न्यायिक हत्याओं और गुमशुदगी की कुल संख्या आज भी विवादित है।
निष्कर्ष: आतंकवाद की पराजय राज्य को कानून से ऊपर नहीं करती
पंजाब के आतंकवाद-विरोधी अभियान की उपलब्धि ऐतिहासिक है।
जिस राज्य में 1991 में आतंकवाद-संबंधी हिंसा में 5,265 लोग मारे गए थे, वहां तीन वर्षों में संगठित आतंकवाद लगभग समाप्त हो गया।
पुलिस ने हजारों हथियारबंद आतंकवादियों, संगठित गिरोहों, पाकिस्तान समर्थित नेटवर्कों और भय के समानांतर शासन को तोड़ा।
उस उपलब्धि को नकारना उपलब्ध आंकड़ों से मेल नहीं खाता।
लेकिन उसी इतिहास का दूसरा हिस्सा भी नकारा नहीं जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने जसवंत सिंह खालड़ा द्वारा उठाए गए अज्ञात शवों के आरोपों को गंभीर मानकर सीबीआई जांच कराई।
खालड़ा स्वयं पुलिस अधिकारियों द्वारा उठाए गए और मार दिए गए—अदालतों ने दोषसिद्धियां कायम रखीं।
एनएचआरसी ने 2,097 शवों वाले मामले में 1,513 मृतकों की पहचान के बाद लगभग 28 करोड़ रुपये मुआवजे की सिफारिश की और लगभग दो सौ मामलों में मृतकों को मृत्यु से पहले पुलिस हिरासत या मानी गई हिरासत में पाया।
इसलिए पंजाब का सबसे महत्वपूर्ण सबक यह नहीं है कि पुलिस कार्रवाई सही थी या गलत।
इतिहास इससे अधिक जटिल है।
सही प्रश्न है—
क्या आतंकवाद को निर्णायक रूप से पराजित करते हुए भी राज्य कानून के शासन, गिरफ्तारी की प्रक्रिया, न्यायिक समीक्षा और नागरिक अधिकारों की सीमाओं के भीतर रह सकता है?
लोकतांत्रिक राज्य के लिए उत्तर केवल हां हो सकता है।
क्योंकि आतंकवादी और राज्य के बीच सबसे मूल अंतर केवल यह नहीं है कि किसके पास अधिक शक्ति है।
अंतर यह है कि—
राज्य कानून से बंधा होता है।
पंजाब ने दिखाया कि आतंकवाद को हराया जा सकता है।
खालड़ा और अज्ञात अंतिम संस्कारों का रिकॉर्ड यह याद दिलाता है कि आतंकवाद की पराजय के बाद भी राज्य को अपने तरीकों का हिसाब देना पड़ता है।
और अब इसी के साथ इस शोध का अंतिम विश्लेषणात्मक प्रश्न सामने आता है—
यह अंतिम विश्लेषणात्मक अध्याय है, इसलिए इसमें घटनाओं की पुनरावृत्ति नहीं की गई है। जोर इस पर है कि आतंकवाद क्यों उभरा, किस कारण चरम पर पहुँचा, किन कारकों से टूटा, और 2026 में उसकी वापसी की वास्तविक संभावना किन परिस्थितियों पर निर्भर करती है।