1992 से 1995: आतंकवाद का पतन
के.पी.एस. गिल, पंजाब पुलिस की रणनीति, 1992 के चुनाव और बेअंत सिंह सरकार
1991 पंजाब आतंकवाद का सबसे रक्तरंजित वर्ष था। पंजाब पुलिस के आंकड़ों के अनुसार उस वर्ष आतंकवाद-संबंधी हिंसा में 5,265 लोग मारे गए थे। अगले वर्ष भी स्थिति भयावह रही—1992 में 3,883 मौतें दर्ज हुईं। लेकिन इसके बाद हिंसा जिस गति से गिरी, वह पंजाब संघर्ष के पूरे इतिहास में सबसे बड़ा मोड़ है।
1993 में कुल मौतें घटकर 871 रह गईं और 1994 में केवल 78। पंजाब पुलिस के इसी डेटा में 1992 के 1,518 नागरिक मृतकों की तुलना में 1993 में केवल 48 और 1994 में दो नागरिक मौतें दर्ज हैं।
इस असाधारण परिवर्तन के पीछे कोई एक घटना नहीं थी। कम मतदान के बावजूद फरवरी 1992 में निर्वाचित सरकार की वापसी, मुख्यमंत्री बेअंत सिंह का स्पष्ट राजनीतिक समर्थन, के.पी.एस. गिल के नेतृत्व में पंजाब पुलिस की आक्रामक और खुफिया-आधारित रणनीति, केंद्रीय बलों और सेना का सहयोग, सीमा-पार आपूर्ति पर दबाव, आतंकवादी संगठनों के शीर्ष नेतृत्व का लगातार टूटना, गांवों में सामाजिक समर्थन का घटना और आतंकवादियों की अत्यधिक नागरिक हिंसा—इन सभी ने मिलकर शक्ति-संतुलन बदल दिया।
लेकिन इसी दौर का एक दूसरा अभिलेख भी है।
फर्जी मुठभेड़ों, गैरकानूनी हिरासत, गायब किए गए व्यक्तियों और अज्ञात शवों के अंतिम संस्कार के गंभीर आरोप बाद में सुप्रीम कोर्ट, सीबीआई और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तक पहुंचे। पंजाब सामूहिक अंतिम संस्कार मामले में 2,097 शवों की जांच हुई और एनएचआरसी ने बड़ी संख्या में मानवाधिकार उल्लंघनों के लिए मुआवजा दिया।
इसलिए 1992–95 की कहानी को दो अतियों से बचाकर पढ़ना होगा—
पंजाब पुलिस ने आतंकवाद के वास्तविक और अत्यंत हिंसक नेटवर्क को निर्णायक रूप से तोड़ा।
और साथ ही—
इस आतंकवाद-विरोधी अभियान की कुछ कार्रवाइयों पर गंभीर तथा न्यायिक रूप से जांचे गए मानवाधिकार प्रश्न भी हैं।
दोनों तथ्य एक-दूसरे को रद्द नहीं करते।
1. दिसंबर 1991: के.पी.एस. गिल की वापसी
के.पी.एस. गिल इससे पहले भी पंजाब पुलिस के महानिदेशक रह चुके थे और 1988 के ऑपरेशन ब्लैक थंडर-II के समय पुलिस नेतृत्व के केंद्रीय चेहरे थे।
बाद में उनका पंजाब से तबादला हुआ। 1990–91 में आतंकवादी हिंसा अपने चरम पर पहुंची। दिसंबर 1991 में उन्हें फिर पंजाब पुलिस का महानिदेशक बनाया गया। गिल से जुड़े बाद के विश्लेषण का दावा है कि उनकी वापसी के समय आतंकवादी संख्या और हिंसा इतनी बढ़ चुकी थी कि सेना को भी पंजाब में दोबारा बड़े पैमाने पर लगाया गया था।
यह स्रोत स्वयं गिल की रणनीतिक परंपरा से जुड़ा है, इसलिए उनकी भूमिका के मूल्यांकन में इसकी सीमाएं ध्यान में रखनी चाहिए। लेकिन तथ्य निर्विवाद है कि 1992–93 की निर्णायक आतंकवाद-विरोधी कार्रवाई में पंजाब पुलिस का नेतृत्व उनके हाथ में था।
2. 1992 के चुनाव: लोकतंत्र की वापसी, लेकिन बहुत कम मतदान
19 फरवरी 1992 को पंजाब विधानसभा चुनाव हुए।
मुख्य अकाली गुटों ने चुनाव का बहिष्कार किया और आतंकवादी संगठनों ने भी मतदान के विरुद्ध धमकियां दीं। इसलिए चुनाव की प्रतिनिधित्व क्षमता शुरू से विवादित रही।
समकालीन अकादमिक अध्ययन Asian Survey के अनुसार विधानसभा चुनाव में मतदान लगभग 24.3 प्रतिशत रहा। दूसरे सांख्यिकीय संकलनों में लगभग 23 प्रतिशत के आसपास आंकड़ा मिलता है; यह अंतर कुल मतदाता/वैध मत गणना की पद्धति से जुड़ा है। कांग्रेस ने 117 में से 87 सीटें जीतीं और पड़े हुए मतों का लगभग 43.8 प्रतिशत प्राप्त किया।
इसलिए चुनाव परिणाम को दो स्तरों पर पढ़ना चाहिए।
कांग्रेस को विधानसभा में भारी बहुमत मिला।
लेकिन मतदान इतना कम था कि इसे पंजाब समाज का पूर्ण राजनीतिक जनादेश नहीं कहा जा सकता।
फिर भी पांच वर्ष के राष्ट्रपति शासन के बाद एक निर्वाचित सरकार की वापसी अपने आप में महत्वपूर्ण थी।
3. बेअंत सिंह सरकार का गठन
कांग्रेस नेता बेअंत सिंह मुख्यमंत्री बने।
उनके सामने सामान्य सरकार चलाने से कहीं कठिन कार्य था—
राज्य को आतंकवादियों के भय से निकालना और प्रशासन को फिर सामान्य बनाना।
नई सरकार ने आतंकवाद पर समझौते की बजाय कठोर कार्रवाई का समर्थन किया। कानून-व्यवस्था अब सीधे निर्वाचित राज्य सरकार की जिम्मेदारी बन गई और पुलिस को स्पष्ट राजनीतिक समर्थन मिला। गिल के बाद के विवरण में इसी राजनीतिक स्थिरता को निर्णायक माना गया है।
1985 की बरनाला सरकार और 1992 की बेअंत सिंह सरकार में यही बड़ा अंतर था।
बरनाला स्वयं अकाली राजनीतिक अंतर्विरोधों से घिरे थे।
बेअंत सिंह सरकार आतंकवाद के प्रश्न पर अपेक्षाकृत स्पष्ट और केंद्रीकृत नीति चला सकती थी।
4. कम मतदान के बावजूद चुनाव महत्वपूर्ण क्यों थे?
आतंकवादी रणनीति वर्षों से एक विचार पर आधारित थी—
राज्य में सामान्य लोकतांत्रिक शासन संभव नहीं है।
यदि चुनाव न हों, उम्मीदवार मारे जाएं और सरकार केवल राष्ट्रपति शासन तथा सुरक्षा बलों से चले, तो हथियारबंद संगठन स्वयं को राज्य के वास्तविक राजनीतिक विकल्प के रूप में प्रस्तुत कर सकते थे।
1992 के चुनाव ने यह संरचना तोड़ी।
मतदान कम था, लेकिन सरकार बन गई।
इसके बाद आतंकवादी हिंसा के बावजूद विधानसभा, मंत्रिमंडल और सामान्य प्रशासन काम करने लगे।
यह राजनीतिक सामान्यीकरण आतंकवाद-विरोधी अभियान को वह वैध प्रशासनिक ढांचा देता था जो केवल पुलिस या सेना नहीं दे सकती थी।
5. सितंबर 1992: नगरपालिका चुनावों में बिल्कुल अलग तस्वीर
फरवरी के कम मतदान को यदि पंजाब में लोकतंत्र की स्थायी अस्वीकृति मान लिया जाता, तो अगले चुनावों की व्याख्या कठिन होती।
सितंबर 1992 में 95 नगर समितियों के चुनाव हुए और मतदान 75 प्रतिशत से अधिक रहा। जनवरी 1993 में 12,342 गांवों के पंचायत चुनावों में मतदान लगभग 82 प्रतिशत तक पहुंचा। गिल के विवरण के अतिरिक्त गृह मंत्रालय की 1995–96 रिपोर्ट भी नगरपालिका चुनावों में लगभग 70 प्रतिशत और पंचायत चुनावों में 80 प्रतिशत से अधिक मतदान दर्ज करती है।
इन आंकड़ों का राजनीतिक महत्व बड़ा था।
फरवरी विधानसभा चुनाव का कम मतदान केवल मतदाता उदासीनता नहीं था; आतंकवादी धमकी और प्रमुख अकाली गुटों के बहिष्कार का प्रभाव भी था।
जैसे ही भय घटा, मतदाता बड़े पैमाने पर चुनाव प्रक्रिया में वापस आए।
6. पंजाब पुलिस की नई रणनीति: बड़े ऑपरेशन से स्थानीय खुफिया तक
1992 के बाद आतंकवाद-विरोधी अभियान का स्वरूप बदला।
ब्लू स्टार जैसी एक बड़ी सैन्य कार्रवाई से पूरे बिखरे नेटवर्क को समाप्त नहीं किया जा सकता था।
अब प्राथमिकता थी—
स्थानीय कमांडरों की पहचान,
उनके आश्रयस्थलों का पता,
धन और हथियार आपूर्ति की निगरानी,
समर्थक नेटवर्क का मानचित्रण,
और छोटे दस्तों को क्षेत्रीय स्तर पर तोड़ना।
इसके लिए पंजाब पुलिस को सबसे बड़ा लाभ था—
स्थानीय जानकारी।
पुलिस अधिकारी गांव, परिवार, सड़क, गुरुद्वारा, राजनीतिक संबंध और पुराने अपराध रिकॉर्ड जानते थे।
एक बाहरी सैन्य इकाई की तुलना में स्थानीय पुलिस आतंकवादी नेटवर्क की सामाजिक संरचना को अधिक गहराई से समझ सकती थी।
7. थाने को फिर राज्य का केंद्र बनाना
आतंकवाद के चरम दौर में कई क्षेत्रों में स्थानीय पुलिस रक्षात्मक हो गई थी।
पुलिसकर्मी स्वयं और उनके परिवार आतंकवादी हमलों के निशाने थे।
1992–93 में पुलिस थानों और स्थानीय इकाइयों को अधिक हथियार, वाहन, संचार और परिचालन स्वतंत्रता दी गई।
लक्ष्य था—
पुलिस केवल हमले के बाद घटनास्थल पर न पहुंचे बल्कि आतंकवादी नेटवर्क का पीछा करे।
पुलिस मुठभेड़ों की संख्या इसका पैमाना दिखाती है।
1991 में 1,282 पुलिस मुठभेड़ मामले दर्ज हुए थे।
1992 में यह संख्या 1,399 रही।
1993 में आतंकवाद तेजी से गिरने के बावजूद 571 और 1994 में 79 मुठभेड़ मामले दर्ज हुए।
यही आंकड़े अभियान की तीव्रता भी बताते हैं—और मानवाधिकार प्रश्न का कारण भी।
8. आतंकवादी नेतृत्व पर लगातार प्रहार
इस रणनीति का प्रमुख उद्देश्य शीर्ष तथा मध्य-स्तर कमांडरों को समाप्त करना था।
1992 में पुलिस रिकॉर्ड में 2,113 आतंकवादियों की मौत दर्ज है। 1993 में 798 और 1994 में 76।
इन संख्याओं का अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक मृत्यु की स्वतंत्र न्यायिक जांच हुई थी।
यह पंजाब पुलिस की आधिकारिक वर्गीकरण प्रणाली है।
लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि इसी अवधि में अनेक बड़े आतंकवादी कमांडर मारे गए या पकड़े गए और संगठनों की नेतृत्व संरचना तेजी से टूटी।
विशेष रूप से—
बब्बर खालसा,
खालिस्तान कमांडो फोर्स,
खालिस्तान लिबरेशन फोर्स
और भिंडरांवाले टाइगर फोर्स
के क्षेत्रीय नेटवर्क लगातार दबाव में आए।
9. आतंकवादी संगठनों की सबसे बड़ी कमजोरी: उनका विखंडन
1992 तक आतंकवाद का कोई एक केंद्रीय नेतृत्व नहीं था।
यह पहले उसकी ताकत था—
एक कमांडर मरता तो दूसरा गुट सक्रिय रहता।
लेकिन पुलिस खुफिया नेटवर्क मजबूत होने पर यही उसकी कमजोरी बन गया।
अलग-अलग गुटों के बीच—
क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा,
पैसे का विवाद,
नेतृत्व संघर्ष,
परस्पर हत्या
और व्यक्तिगत प्रतिद्वंद्विता—
बढ़ी।
सुरक्षा एजेंसियां इन विभाजनों का उपयोग कर सकती थीं।
एक समूह से मिली जानकारी दूसरे नेटवर्क तक पहुंचाती।
आत्मसमर्पित या पकड़े गए कार्यकर्ताओं से संगठन के अंदरूनी ढांचे की जानकारी मिलती।
आतंकवाद अब केवल राज्य से नहीं बल्कि अपने भीतर से भी टूट रहा था।
10. ग्रामीण समर्थन का क्षरण
पुलिस कार्रवाई अकेले इस गिरावट को नहीं समझाती।
1990–91 की अत्यधिक नागरिक हत्याओं ने आतंकवादी संगठनों के सामाजिक समर्थन को भारी नुकसान पहुंचाया था।
बस यात्रियों,
रेल यात्रियों,
पुलिस परिवारों,
पत्रकारों,
शिक्षकों,
राजनीतिक उम्मीदवारों,
सिख विरोधियों
और सामान्य ग्रामीणों की हत्या ने आतंकवादियों की उस प्रारंभिक कथा को कमजोर किया जिसमें वे स्वयं को केवल किसी राजनीतिक या धार्मिक अधिकार के लिए लड़ने वाली शक्ति बताते थे।
1992 के बाद बंद और अन्य आतंकवादी निर्देशों की सार्वजनिक स्वीकार्यता भी कम हुई—यह गिल का आकलन था। नगरपालिका और पंचायत चुनावों में भारी मतदान इस व्यापक राजनीतिक परिवर्तन का अधिक स्वतंत्र संकेत देता है।
11. पाकिस्तान सीमा पर बढ़ता दबाव
पाकिस्तान-आधारित नेटवर्क आतंकवादियों के लिए—
हथियार,
प्रशिक्षण,
संचार,
आश्रय
और नेतृत्व संपर्क—
का महत्वपूर्ण साधन बन चुके थे।
1992–93 में बीएसएफ, पंजाब पुलिस और अन्य सुरक्षा बलों ने सीमावर्ती क्षेत्रों पर दबाव बढ़ाया।
सीमा पार से प्रवेश कठिन होने का अर्थ था कि पंजाब के भीतर सक्रिय छोटे दलों के पास लगातार हथियार और प्रशिक्षित नए लोग पहुंचाना कठिन होता गया।
यह आतंकवाद के पतन का महत्वपूर्ण लेकिन अकेला कारण नहीं था।
12. 1992 का वर्ष अभी भी बहुत हिंसक था
क्योंकि वर्ष के अंत तक स्थिति तेजी से सुधरी, कभी-कभी 1992 को लगभग सामान्य वर्ष की तरह प्रस्तुत कर दिया जाता है।
आंकड़े ऐसा नहीं कहते।
1992 में—
1,518 नागरिक,
252 सुरक्षा बल कर्मी,
2,113 आतंकवादी
मारे गए।
कुल 3,883 मौतें।
यानी यह स्वयं पूरे पंजाब संघर्ष के सबसे रक्तरंजित वर्षों में से एक था।
वास्तविक परिवर्तन वर्ष के भीतर हुआ।
गिल के संकलन के अनुसार 1991 में नागरिक मौतों का मासिक औसत 216 था। 1992 में यह घटकर 127 हुआ; वर्ष के दूसरे हिस्से में लगभग 87 और अंतिम तिमाही में 60 प्रति माह रह गया। दिसंबर में 44 नागरिक मारे गए।
यहीं से गिरावट की दिशा स्पष्ट हो जाती है।
13. 1993: निर्णायक टूटन
1993 पंजाब आतंकवाद के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण सांख्यिकीय वर्ष है।
1992 में 3,883 कुल मौतों की तुलना में 1993 में केवल 871 मौतें दर्ज हुईं।
उनमें—
48 नागरिक,
25 सुरक्षा कर्मी,
और 798 आतंकवादी थे।
सबसे उल्लेखनीय आंकड़ा नागरिक मौत का है—
1,518 से 48।
केवल एक वर्ष में लगभग 97 प्रतिशत की गिरावट।
यह सामान्य उतार-चढ़ाव नहीं था।
आतंकवादी संगठनों की सामान्य नागरिकों पर हमला करने, क्षेत्रीय नियंत्रण बनाए रखने और भय का शासन चलाने की क्षमता टूट चुकी थी।
14. 1994: संगठित आतंकवाद लगभग समाप्त
1994 में आधिकारिक आंकड़े और भी नाटकीय हैं—
दो नागरिक,
कोई सुरक्षा बल मृत्यु नहीं,
76 आतंकवादी,
कुल 78 मौतें।
1991 में जहां 5,265 मौतें हुई थीं, वहां तीन वर्ष बाद कुल संख्या 78 रह गई।
यह लगभग 98.5 प्रतिशत की गिरावट थी।
किसी लंबे आतंकवादी संघर्ष में इतने कम समय में ऐसा परिवर्तन असाधारण है।
इसी अवधि में विभिन्न अकाली गुट फिर सामान्य चुनावी राजनीति में लौटने लगे। गृह मंत्रालय की 1995–96 रिपोर्ट के अनुसार 1993 के जालंधर लोकसभा उपचुनाव, मई 1994 के अजनाला और नकोदर विधानसभा उपचुनाव तथा सितंबर–अक्टूबर 1994 के पंचायत समिति और जिला परिषद चुनावों में विभिन्न राजनीतिक दलों ने भाग लिया।
15. आतंकवाद क्यों गिरा? एक कारण पर्याप्त नहीं
इस गिरावट को केवल “के.पी.एस. गिल ने आतंकवाद खत्म कर दिया” कहना अत्यधिक सरल होगा।
पुलिस नेतृत्व की भूमिका महत्वपूर्ण थी, लेकिन कम-से-कम छह कारक साथ काम कर रहे थे।
राजनीतिक सरकार की वापसी — राज्य आतंकवाद से लड़ रहा था, लेकिन उसके साथ विधानसभा और निर्वाचित मुख्यमंत्री भी थे।
पुलिस की स्थानीय खुफिया क्षमता — नेटवर्क की पहचान और क्षेत्रीय कमांडरों को लगातार निशाना बनाया गया।
केंद्रीय सुरक्षा सहयोग — सीआरपीएफ, बीएसएफ और आवश्यकता पड़ने पर सेना ने पुलिस को समर्थन दिया।
आतंकवादियों का सामाजिक अलगाव — नागरिक हत्याओं ने संभावित समर्थन घटाया।
संगठनात्मक विखंडन — अलग-अलग गुट आपस में विभाजित थे।
सीमा-पार आपूर्ति पर दबाव — पाकिस्तान से आने-जाने के रास्तों पर निगरानी बढ़ी।
इन सभी के संयुक्त प्रभाव से आतंकवादी नेटवर्क पुनर्भरण की गति से अधिक तेजी से टूटने लगे।
16. गिल की रणनीति: परिणाम निर्विवाद, साधन विवादित
के.पी.एस. गिल पंजाब आतंकवाद-विरोधी अभियान के सबसे चर्चित व्यक्ति बने।
उनके समर्थक उन्हें वह पुलिस अधिकारी मानते हैं जिसने स्थानीय पुलिस का मनोबल लौटाया, आतंकवादी कमांड संरचना तोड़ी और राजनीतिक सरकार को सामान्य शासन बहाल करने का अवसर दिया।
आलोचक कहते हैं कि उनकी रणनीति ने पुलिस को इतनी परिचालन स्वतंत्रता दी कि गिरफ्तारी, मुठभेड़ और हिरासत की संवैधानिक सीमाएं कई मामलों में कमजोर पड़ गईं।
इन दोनों पक्षों में एक तथ्य समान है—
1992–93 में पंजाब पुलिस अभूतपूर्व तीव्रता से कार्रवाई कर रही थी।
प्रश्न यह है कि उस कार्रवाई के प्रत्येक हिस्से ने कानून की सीमा का कितना पालन किया।
17. मुठभेड़ बनाम ‘फर्जी मुठभेड़’
यहां भाषा महत्वपूर्ण है।
किसी पुलिस रिकॉर्ड में किसी व्यक्ति की मृत्यु “मुठभेड़” में दर्ज होने से स्वयं सिद्ध नहीं होता कि घटना फर्जी थी।
लेकिन पुलिस संस्करण से स्वयं यह भी सिद्ध नहीं हो जाता कि हर मुठभेड़ वैध थी।
बाद के न्यायिक और मानवाधिकार रिकॉर्ड ने कुछ मामलों में हिरासत में मृत्यु, गैरकानूनी हत्या और शवों के नियम-विरुद्ध अंतिम संस्कार की पुष्टि की।
इसलिए पूरे 1992–93 अभियान को “फर्जी मुठभेड़ अभियान” कहना उतना ही गलत है जितना यह कहना कि सभी पुलिस कार्रवाइयों पर लगे आरोप निराधार थे।
18. पंजाब सामूहिक अंतिम संस्कार मामला
मानवाधिकार प्रश्न का सबसे ठोस संस्थागत रिकॉर्ड बाद में सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सामने आया।
मामला अमृतसर, तरनतारन और मजीठा के तीन श्मशानों में पुलिस द्वारा 2,097 शवों को अज्ञात या लावारिस बताकर अंतिम संस्कार करने से संबंधित था।
ध्यान रखना चाहिए—ये अंतिम संस्कार केवल 1992–95 के नहीं थे। जांच की अवधि 1984 से 1994 थी। इसलिए इन सभी मामलों को बेअंत सिंह–गिल शासन के खाते में डालना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा।
लेकिन इनमें इस अध्याय की समयावधि के मामले भी शामिल थे।
19. सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रिया
जसवंत सिंह खालड़ा और अन्य मानवाधिकार कार्यकर्ताओं द्वारा उठाए गए प्रश्नों के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
15 नवंबर 1995 को सुप्रीम कोर्ट ने आरोपों को इतना गंभीर माना कि सीबीआई जांच का आदेश दिया। अदालत ने कहा कि यदि आरोप आंशिक रूप से भी सही हैं तो वे गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन की कहानी प्रस्तुत करेंगे।
सीबीआई जांच के बाद मामला राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को भेजा गया।
यह महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके बाद मानवाधिकार विवाद केवल राजनीतिक आरोप नहीं रहा—
उसका एक हिस्सा औपचारिक न्यायिक और संस्थागत जांच का विषय बन चुका था।
20. एनएचआरसी ने क्या स्थापित किया?
लंबी जांच के बाद एनएचआरसी ने 2,097 शवों से जुड़े मामलों में पहचान और मुआवजे की प्रक्रिया चलाई।
2012 में आयोग ने बताया कि 1,513 मृतकों की पहचान हो चुकी थी जबकि 532 शव अब भी अज्ञात थे। आयोग ने इनमें 195 ऐसे मृतकों के परिजनों को मुआवजा देने की बात कही जो मृत्यु से पहले पुलिस की वास्तविक या मानी गई हिरासत में थे; शेष पहचाने गए लोगों के शव पुलिस द्वारा नियमों का पालन किए बिना अंतिम संस्कार किए जाने पर भी मुआवजा दिया गया।
इस निष्कर्ष की सीमा भी महत्वपूर्ण है।
एनएचआरसी ने यह नहीं कहा कि सभी 2,097 व्यक्तियों को पुलिस ने फर्जी मुठभेड़ में मारा था।
उसने मामलों को अलग-अलग श्रेणियों में देखा।
यही अंतर इस इतिहास में बनाए रखना आवश्यक है।
21. इसलिए पुलिस सफलता और मानवाधिकार प्रश्न दोनों कैसे साथ सत्य हो सकते हैं?
क्योंकि वे अलग प्रश्न हैं।
पहला प्रश्न:
क्या पंजाब पुलिस और राज्य सरकार ने 1992–94 में आतंकवादी हिंसा को निर्णायक रूप से कम किया?
आंकड़े स्पष्ट रूप से हां कहते हैं।
दूसरा प्रश्न:
क्या आतंकवाद-विरोधी अभियान के दौरान कुछ पुलिस कार्रवाइयों में गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन हुआ?
सुप्रीम कोर्ट और एनएचआरसी का रिकॉर्ड बताता है कि कम-से-कम कुछ मामलों में गंभीर उल्लंघनों की संस्थागत पुष्टि हुई।
पहले तथ्य को स्वीकार करने के लिए दूसरे को नकारना आवश्यक नहीं।
और दूसरे को स्वीकार करने के लिए पूरे आतंकवाद-विरोधी अभियान को अवैध बताना भी आवश्यक नहीं।
22. 1993–94 में सामान्य राजनीति की वापसी
आतंकवाद की वास्तविक पराजय केवल कम शवों से नहीं मापी जा सकती।
अधिक महत्वपूर्ण था—
क्या लोग सामान्य राजनीतिक जीवन में वापस आए?
1992 के नगरपालिका चुनावों में लगभग 70–75 प्रतिशत मतदान,
1993 के पंचायत चुनावों में 80 प्रतिशत से अधिक,
और 1994 के स्थानीय चुनावों में सभी प्रमुख दलों की भागीदारी इसका संकेत थी।
यह आतंकवादी समानांतर सत्ता के लिए गंभीर पराजय थी।
जिस आंदोलन ने कभी “खालसा पंचायत” जैसी वैकल्पिक संरचनाओं और चुनाव बहिष्कार को आगे बढ़ाया था, उसके प्रभाव वाले गांव अब सरकारी पंचायत चुनावों में मतदान कर रहे थे।
23. सामाजिक सामान्यीकरण
गृह मंत्रालय की 1995–96 रिपोर्ट उस समय पंजाब में “सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन” में सामान्यता लौटने की बात करती है और होला मोहल्ला, दशहरा और दीवाली जैसे त्योहारों के शांतिपूर्ण आयोजन का उल्लेख करती है।
यह सरकारी आकलन था और स्वाभाविक रूप से सरकार की उपलब्धि के दृष्टिकोण से लिखा गया था।
फिर भी हिंसा के स्वतंत्र आंकड़ों में हुई भारी गिरावट इस व्यापक सामान्यीकरण का समर्थन करती है।
1994 तक पंजाब फिर उस स्थिति में पहुंच चुका था जिसमें आतंकवादी संगठन राज्यव्यापी समानांतर भय-व्यवस्था बनाए रखने में सक्षम नहीं थे।
24. क्या 1994 में आतंकवाद पूरी तरह खत्म हो गया था?
नहीं।
संगठन पूरी तरह समाप्त नहीं हुए थे।
कुछ नेता पाकिस्तान या विदेशों में चले गए।
कुछ छोटे मॉड्यूल पंजाब में बचे रहे।
हथियार और संपर्क नेटवर्क भी समाप्त नहीं हुए।
लेकिन अंतर यह था—
वे राज्य की राजनीतिक दिशा तय करने की क्षमता खो चुके थे।
1991 में आतंकवादी चुनाव रुकवा सकते थे।
1994 में वे सामान्य चुनावी और सामाजिक जीवन को रोक नहीं पा रहे थे।
यही “आतंकवाद की पराजय” का अधिक सटीक अर्थ है।
25. और फिर 31 अगस्त 1995
जिस मुख्यमंत्री के कार्यकाल में पंजाब आतंकवाद का सबसे तेज पतन हुआ, वही अंततः आतंकवादी हमले में मारा गया।
31 अगस्त 1995 की शाम लगभग 5:10 बजे पंजाब एवं हरियाणा सिविल सचिवालय, चंडीगढ़ के वीआईपी द्वार के पास विस्फोट हुआ।
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के बाद के फैसले के अनुसार हमले में मुख्यमंत्री बेअंत सिंह सहित 17 लोग मारे गए। विस्फोटक हमला दिलावर सिंह ने मानव बम के रूप में किया।
यह पंजाब आतंकवाद के इतिहास की सबसे बड़ी राजनीतिक हत्याओं में थी।
26. बब्बर खालसा और हत्या की साजिश
बेअंत सिंह हत्या मामले की बाद की न्यायिक कार्यवाही ने इसे बब्बर खालसा इंटरनेशनल से जुड़ी साजिश के रूप में देखा।
2010 के पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट फैसले में अभियोजन के मामले का विस्तृत वर्णन है।
अदालत के अनुसार दिलावर सिंह मानव बम था; जगरतार सिंह हवारा साजिश के प्रमुख आयोजकों में था और उसने धन, स्थान, विस्फोटक तथा अन्य तैयारी में केंद्रीय भूमिका निभाई। फैसले में यह भी दर्ज है कि हत्या की जिम्मेदारी बब्बर खालसा इंटरनेशनल ने ली थी।
अदालत के रिकॉर्ड में पाकिस्तान-स्थित वधावा सिंह और महल सिंह के नाम भी अभियोजन की साजिश कथा में आते हैं। जिन व्यक्तियों को उस समय भगोड़ा बताया गया, उनके बारे में वही न्यायिक स्थिति अलग से ध्यान में रखनी चाहिए; अभियोजन आरोप और अंतिम दोषसिद्धि समान चीजें नहीं हैं।
27. मानव बम का प्रयोग
पंजाब आतंकवाद में अनेक बम विस्फोट हो चुके थे, लेकिन मुख्यमंत्री की हत्या के लिए मानव बम का प्रयोग एक अलग स्तर था।
दिलावर सिंह स्वयं पंजाब पुलिस से जुड़ा रहा था।
विस्फोट के लिए पुलिस जैसी वर्दी और सुरक्षा परिसर तक पहुंच का लाभ उठाया गया।
यह उस आतंकवादी नेटवर्क की बची हुई क्षमता दिखाता है जो 1994 तक राज्यव्यापी हिंसा करने में असमर्थ हो चुका था लेकिन अभी भी अत्यंत उच्च-मूल्य वाले लक्ष्य पर जटिल हमला कर सकता था।
यानी—
आतंकवाद की सामूहिक क्षमता टूट चुकी थी, आतंकवादी साजिश की क्षमता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी।
28. क्या बेअंत सिंह की हत्या से आतंकवाद फिर लौटा?
नहीं।
यह सबसे महत्वपूर्ण परिणाम था।
यदि 1980 के दशक में किसी बड़े राजनीतिक नेता की हत्या होती, तो उसके बाद हिंसा का नया चक्र शुरू हो सकता था।
1995 में ऐसा नहीं हुआ।
मुख्यमंत्री की हत्या के बावजूद पंजाब फिर 1990–91 जैसी स्थिति में नहीं लौटा।
गृह मंत्रालय की 1995–96 रिपोर्ट भी हत्या को गंभीर घटना बताते हुए व्यापक राज्य स्थिति को सामान्यीकरण की दिशा में दर्ज करती है।
यह प्रमाण था कि आतंकवादी संगठनों की सामाजिक और परिचालन क्षमता निर्णायक रूप से कमजोर हो चुकी थी।
29. 1991 से 1994: चार आंकड़े पूरी कहानी बताते हैं
स्रोत: पंजाब पुलिस आंकड़ों का SATP संकलन।
इस तालिका में आतंकवाद के पतन की पूरी दिशा दिखाई देती है।
1991 से 1992—गिरावट शुरू।
1992 से 1993—नेटवर्क का निर्णायक टूटना।
1994—संगठित आतंकवाद लगभग निष्प्रभावी।
30. आतंकवाद की हार के मुख्य कारण
1992–95 की पूरी अवधि का समेकित अध्ययन बताता है कि आतंकवाद छह प्रमुख कारणों से पराजित हुआ।
राजनीतिक शासन की वापसी: कम मतदान के बावजूद निर्वाचित सरकार ने सुरक्षा अभियान को स्थिर राजनीतिक ढांचा दिया।
पुलिस का स्थानीयकरण: आतंकवाद से लड़ाई सेना-केंद्रित मॉडल से हटकर पंजाब पुलिस की स्थानीय खुफिया क्षमता पर आधारित हुई।
शीर्ष नेतृत्व का क्षरण: लगातार कार्रवाई से संगठनों के कमांडर और मध्य-स्तर नेटवर्क टूटे।
ग्रामीण सामाजिक समर्थन का ह्रास: नागरिक हत्याओं और जबरन सामाजिक नियंत्रण से आतंकवादियों के प्रति प्रतिरोध बढ़ा।
सीमा-पार आपूर्ति पर दबाव: पाकिस्तान आधारित समर्थन के बावजूद पंजाब के भीतर नेटवर्क बनाए रखना कठिन हुआ।
लोकतांत्रिक संस्थाओं का पुनर्जीवन: नगरपालिका, पंचायत और उपचुनावों में बढ़ती भागीदारी ने आतंकवादी बहिष्कार की शक्ति तोड़ी।
इनमें किसी एक को अकेला निर्णायक कारण कहना इतिहास को सरल बना देगा।
निष्कर्ष: आतंकवाद पर विजय—और उसके साथ जुड़ा कठिन प्रश्न
1992 से 1995 के बीच पंजाब में जो परिवर्तन हुआ वह असाधारण था।
1991 में 5,265 आतंकवाद-संबंधी मौतें हुई थीं।
1994 में केवल 78।
बसों और ट्रेनों से यात्रियों को उतारकर मारने वाला आतंक,
चुनाव उम्मीदवारों की हत्या,
पुलिस परिवारों पर हमले,
ग्रामीण क्षेत्रों में समानांतर आदेश,
और चुनाव रोक देने की क्षमता—
तीन वर्षों में लगभग समाप्त हो गई।
बेअंत सिंह सरकार ने पुलिस को निरंतर राजनीतिक समर्थन दिया।
के.पी.एस. गिल के नेतृत्व में पंजाब पुलिस ने आतंकवादी संगठनों को स्थानीय स्तर पर तोड़ने, उनके नेतृत्व और आश्रय नेटवर्क पर लगातार प्रहार करने तथा पुलिस को रक्षात्मक अवस्था से बाहर निकालने की रणनीति अपनाई।
नगरपालिका और पंचायत चुनावों में जनता की भारी भागीदारी ने दिखाया कि आतंकवादी भय का सामाजिक नियंत्रण टूट रहा था।
लेकिन इस सफलता का इतिहास केवल विजय-कथा नहीं है।
1984–94 के सामूहिक अंतिम संस्कार मामलों की सुप्रीम कोर्ट और एनएचआरसी जांच ने साबित किया कि आतंकवाद-विरोधी दशक में पुलिस कार्रवाई से संबंधित गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन वास्तविक प्रश्न थे। एनएचआरसी ने 2,097 शवों वाले मामले में 1,513 मृतकों की पहचान के बाद परिजनों के लिए लगभग 28 करोड़ रुपये की राहत की सिफारिश की; इनमें ऐसे लोग भी थे जो मृत्यु से पहले पुलिस हिरासत में थे।
इसलिए पंजाब आतंकवाद की समाप्ति का दस्तावेजी निष्कर्ष दोनों तथ्यों को साथ लेकर ही लिखा जा सकता है—
राज्य ने एक वास्तविक, अत्यंत हिंसक और हजारों नागरिकों की हत्या करने वाले आतंकवादी आंदोलन को पराजित किया।
और उसी आतंकवाद-विरोधी संघर्ष में राज्य की कुछ एजेंसियों द्वारा कानून तथा मानवाधिकारों के उल्लंघन के गंभीर मामले भी सामने आए, जिनमें न्यायपालिका और एनएचआरसी को हस्तक्षेप करना पड़ा।
31 अगस्त 1995 को बेअंत सिंह की हत्या ने यह भी दिखाया कि किसी आतंकवादी आंदोलन की पराजय का अर्थ उसके प्रत्येक मॉड्यूल का तत्काल अंत नहीं होता। बब्बर खालसा से जुड़ी साजिश अभी मुख्यमंत्री तक पहुंच सकती थी।
लेकिन हत्या उस व्यवस्था को वापस नहीं पलट सकी।
पंजाब अब आतंकवाद के चरम से बाहर आ चुका था।
यहीं 1981 से शुरू हुई आतंकवाद की मुख्य ऐतिहासिक लहर समाप्त होती है।
इसके बाद कहानी बदलती है—
संगठित घरेलू विद्रोह के स्थान पर विदेश-आधारित खालिस्तानी नेटवर्क, पाकिस्तान में बचे नेतृत्व, छिटपुट बम हमले, गिरफ्तार मॉड्यूल और समय-समय पर पंजाब में आतंकवाद पुनर्जीवित करने के प्रयास सामने आते हैं।
इस अध्याय को 1995 से लगभग 2014 तक सीमित रखा है, ताकि इसके बाद 2015–26 के ड्रोन, गैंगस्टर-टेरर नेटवर्क और नई मॉड्यूल-आधारित हिंसा को अलग अध्याय में लिया जा सके।