OCN Networkओमकार चौधरी
omkarchaudhary.comJOURNALIST · AUTHOR · RESEARCHEROCN Research Desk
दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
पंजाब में आतंकवाद और उसके पीछे की साज़िश · अध्याय 16

पाकिस्तान और आईएसआई की भूमिका: पंजाब आतंकवाद को हथियार, प्रशिक्षण, धन और सुरक्षित ठिकाने कैसे मिले?

ओमकार चौधरी / OCN Research Deskविस्तृत शोध संस्करण · 1 अक्टूबर 2026

पंजाब के आतंकवाद को केवल पाकिस्तान की साजिश कह देना इतिहास को अत्यधिक सरल बना देगा। पंजाब संकट की अपनी घरेलू राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक और प्रशासनिक जड़ें थीं। आनंदपुर साहिब प्रस्ताव, केंद्र–राज्य विवाद, निरंकारी-सिख संघर्ष, भिंडरांवाले का उदय, ऑपरेशन ब्लू स्टार, 1984 के बाद पैदा असंतोष और बाद के राजनीतिक घटनाक्रम पाकिस्तान ने पैदा नहीं किए थे।

लेकिन दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

जब पंजाब में हिंसक अलगाववादी आंदोलन खड़ा हो चुका था, पाकिस्तान ने उसके कुछ संगठनों और नेताओं को आश्रय, हथियार, प्रशिक्षण, सीमा-पार आवाजाही और बाद में संगठनात्मक सहायता उपलब्ध कराई—ऐसा भारत सरकार के रिकॉर्ड में लगातार कहा गया, कई गिरफ्तारियों और न्यायिक मामलों में पाकिस्तान-आधारित संपर्क सामने आए, और अमेरिकी खुफिया दस्तावेजों तथा स्वतंत्र अकादमिक अध्ययनों ने भी पाकिस्तान की भूमिका को पूरी तरह भारतीय प्रचार कहकर खारिज नहीं किया।

इसलिए सबसे सटीक निष्कर्ष यह है—

पंजाब आतंकवाद की उत्पत्ति मुख्यतः भारत के भीतर हुई, लेकिन उसके लंबे और अधिक घातक चरण को टिकाए रखने में पाकिस्तान स्थित नेटवर्क महत्वपूर्ण बाहरी सहायक बने।

1. पाकिस्तान की भूमिका कब महत्वपूर्ण होने लगी?

1978 से 1983 के प्रारंभिक उग्रवाद को सीधे आईएसआई द्वारा बनाया गया आंदोलन मानने के पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।

उस समय की हिंसा के मुख्य स्रोत पंजाब के भीतर थे—

निरंकारी विवाद,

अकाली राजनीति,

भिंडरांवाले का उदय,

स्थानीय हथियारबंद संगठन,

और केंद्र–राज्य संघर्ष।

लेकिन 1984 के बाद स्थिति तेजी से बदली।

ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद पंजाब से कुछ हथियारबंद कार्यकर्ता पाकिस्तान पहुंचे। भारत-पाकिस्तान सीमा के दोनों ओर सामाजिक और तस्करी के पुराने संपर्क मौजूद थे। पाकिस्तान के लिए भारतीय पंजाब में अस्थिरता को रणनीतिक अवसर के रूप में देखने की संभावना अब अधिक थी।

1987 के एक अमेरिकी खुफिया आकलन ने लिखा कि नई दिल्ली पाकिस्तान पर सिख उग्रवादियों को सहायता देने का आरोप लगा रही थी और उपलब्ध अमेरिकी जानकारी कुछ पाकिस्तानी सहायता की संभावना से इनकार नहीं करती थी; साथ ही उस समय सीआईए का आकलन था कि पंजाब अस्थिरता का मुख्य कारण स्वयं पंजाब के भीतर का सिख असंतोष था और पाकिस्तानी सहायता उसका प्रमुख स्रोत नहीं थी।

यह समकालीन दस्तावेज बहुत महत्वपूर्ण है।

वह दो अतियों को एक साथ रोकता है—

न तो पाकिस्तान की भूमिका को शून्य मानता है,

और न पंजाब संकट को पूरी तरह पाकिस्तान निर्मित बताता है।

2. अफगान युद्ध और आईएसआई का नया अनुभव

1979 के बाद सोवियत-अफगान युद्ध ने पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस को असाधारण संसाधन और अनुभव दिया।

अमेरिका, सऊदी अरब और अन्य देशों द्वारा अफगान मुजाहिदीन को दी जाने वाली सहायता के बड़े हिस्से का वितरण आईएसआई के माध्यम से होता था।

इससे पाकिस्तान की खुफिया व्यवस्था को—

गुप्त प्रशिक्षण शिविर चलाने,

हथियारों की आपूर्ति,

विदेशी धन प्रबंधन,

सुरक्षित मार्ग,

गोपनीय संचार,

और सीमापार गैर-राज्य सशस्त्र नेटवर्कों—

के संचालन का व्यापक अनुभव मिला।

पंजाब सीमा पर पाकिस्तान और हथियारबंद सिख नेटवर्कों के संबंधों का अध्ययन करने वाली कैंब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस की पुस्तक The Punjab Borderland भी पाकिस्तान राज्य और सीमाई तस्कर नेटवर्कों के बीच उन संबंधों का उल्लेख करती है जिनका उपयोग खालिस्तान आंदोलन से जुड़े लोगों के संपर्कों में हुआ।

यानी 1980 के दशक के मध्य तक पाकिस्तान के पास केवल राजनीतिक इच्छा होने का प्रश्न नहीं था—

उसके पास ऐसी गुप्त कार्रवाई की संस्थागत क्षमता भी मौजूद थी।

3. प्रशिक्षण शिविरों का प्रश्न

भारत सरकार का लगातार आरोप रहा कि पाकिस्तान में सिख आतंकवादियों को हथियार और विस्फोटक प्रशिक्षण दिया जाता था।

बाद में सार्वजनिक किए गए एक अमेरिकी खुफिया दस्तावेज में भी कहा गया कि भारतीय सिख उग्रवादियों के बारे में नई दिल्ली का आरोप था कि कुछ समूह पाकिस्तान में शरण और गुप्त सैन्य/सुरक्षा प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे थे। उसी दस्तावेज में भारतीय जांचों और स्वतंत्र प्रेस रिपोर्टों के आधार पर यह भी कहा गया कि पाकिस्तान जाने वाले कुछ सिख उग्रवादियों को वहां हथियार उपलब्ध कराए जाते थे और वे तस्करी मार्गों से वापस भारत आते थे।

काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस ने पूर्व भारतीय खुफिया अधिकारी बी. रमन के विवरण का उल्लेख करते हुए लिखा कि आईएसआई ने पाकिस्तान के पंजाब और तत्कालीन उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में खालिस्तानी रंगरूटों के प्रशिक्षण और हथियार उपलब्ध कराने के लिए गुप्त शिविर स्थापित किए थे।

भारत सरकार के बाद के आधिकारिक दस्तावेज भी प्रशिक्षण, हथियार और सुरक्षित आश्रय के इसी पैटर्न को दोहराते हैं।

4. कितने आतंकवादी पाकिस्तान में प्रशिक्षित हुए?

यही वह क्षेत्र है जहां अत्यधिक निश्चित संख्याओं से बचना चाहिए।

अलग-अलग भारतीय सुरक्षा स्रोतों और बाद के अध्ययनों में—

सैकड़ों,

हजारों,

या विशेष वर्षों में विशेष बैचों—

की संख्याएं दी गई हैं।

कुछ अध्ययनों में दिसंबर 1984 में प्रशिक्षित लोगों के बड़े समूह के पंजाब लौटने जैसे दावे भी हैं।

लेकिन व्यापक, नामवार और स्वतंत्र रूप से सत्यापित प्रशिक्षण सूची सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।

इसलिए यह लिखना अधिक उचित है—

पाकिस्तान में सिख आतंकवादियों को प्रशिक्षण मिलने के पर्याप्त सरकारी, खुफिया और अकादमिक संकेत उपलब्ध हैं; लेकिन पूरे आतंकवाद काल में प्रशिक्षित लोगों की एक सर्वमान्य संख्या उपलब्ध नहीं है।

5. पाकिस्तान से कौन-से हथियार आए?

1980 के दशक के उत्तरार्ध में पंजाब आतंकवादियों के हथियारों की प्रकृति तेजी से बदलती है।

स्थानीय पिस्तौल और बंदूक के साथ अब—

AK-47/AKM राइफलें,

रॉकेट-प्रोपेल्ड ग्रेनेड,

उन्नत विस्फोटक,

हैंड ग्रेनेड

और आधुनिक संचार उपकरण—

दिखने लगे।

1988 के एक अमेरिकी खुफिया आकलन ने नोट किया कि सिख आतंकवादी पहली बार बड़ी संख्या में AK-47, अधिक शक्तिशाली विस्फोटक और रॉकेट-प्रोपेल्ड ग्रेनेड इस्तेमाल कर रहे थे तथा नई दिल्ली इनके स्रोतों को लेकर पाकिस्तान पर आरोप लगा रही थी।

यह स्वयं अंतिम प्रमाण नहीं था कि हर हथियार पाकिस्तान सरकार ने दिया था।

कुछ हथियार—

तस्करी,

अफगान युद्ध के खुले बाजार,

अपराधी नेटवर्क,

और चोरी—

से भी आ सकते थे।

लेकिन पाकिस्तान सीमा उनकी आपूर्ति का प्रमुख मार्ग बन चुकी थी।

6. सीमा-पार आने-जाने का ढांचा

भारत-पाक पंजाब सीमा मैदानों, कृषि भूमि और परंपरागत तस्करी मार्गों वाली सीमा है।

1980 के दशक में पूर्ण बाड़बंदी नहीं थी।

सीमा के दोनों ओर अनेक गांव थे और लंबे समय से शराब, सोना, इलेक्ट्रॉनिक सामान तथा बाद में नशीले पदार्थों की तस्करी होती रही थी।

यही नेटवर्क हथियारों के लिए उपयोग किया जा सकता था।

भारत सरकार ने आरोप लगाया कि आईएसआई एजेंट आतंकवादियों की सीमा-पार आवाजाही में सहायता करते और पाकिस्तान में सुरक्षित ठिकाने तथा हथियार भंडार उपलब्ध कराते थे।

इसका मुकाबला करने के लिए भारत ने सीमा सुरक्षा में व्यापक परिवर्तन किए।

लैंड पोर्ट्स अथॉरिटी से जुड़ी एक सरकारी अध्ययन सामग्री के अनुसार पंजाब आतंकवाद के दौरान पाकिस्तान में उपलब्ध सुरक्षित ठिकानों और हथियारों तक पहुंच काटने के उद्देश्य से सीमा बाड़बंदी तेज हुई; 1993 तक पंजाब की पाकिस्तान सीमा को व्यापक रूप से बाड़ से सुरक्षित किया जा चुका था और बीएसएफ की क्षमता भी बढ़ाई गई।

यह आतंकवाद के पतन के महत्वपूर्ण कारणों में से एक था।

7. सुरक्षित ठिकाने: कौन-कौन से बड़े नेता पाकिस्तान में रहे?

1990 के दशक के बाद यह प्रश्न और स्पष्ट हो गया।

भारत सरकार ने लंबे समय तक पाकिस्तान में रहने वाले जिन प्रमुख खालिस्तान-सम्बंधित नेताओं का उल्लेख किया, उनमें—

वधावा सिंह — बब्बर खालसा इंटरनेशनल

परमजीत सिंह पंजवार — खालिस्तान कमांडो फोर्स

लखबीर सिंह रोडे — इंटरनेशनल सिख यूथ फेडरेशन

रंजीत सिंह नीटा — खालिस्तान जिंदाबाद फोर्स

गजिंदर सिंह — दल खालसा से जुड़ा पुराना अलगाववादी नेता

शामिल रहे।

भारत सरकार के 2002 के दस्तावेज में इन नेताओं को पाकिस्तान में आश्रय दिए जाने का स्पष्ट आरोप था।

गृह मंत्रालय की 2003–04 रिपोर्ट ने भी कहा कि पाकिस्तान में इन संगठनों के प्रमुख नेता मौजूद थे और आईएसआई उन पर पंजाब में आतंकवादी गतिविधि पुनर्जीवित करने का दबाव बना रही थी।

यह 1980 के दशक की तुलना में अधिक दस्तावेजीकृत चरण है।

8. पाकिस्तान की रणनीतिक गणना क्या हो सकती थी?

इस प्रश्न पर सरकारी दावों और विश्लेषण में तीन प्रमुख व्याख्याएं मिलती हैं।

पहली—1971 का प्रतिशोध।

भारत ने पूर्वी पाकिस्तान के अलग होकर बांग्लादेश बनने में निर्णायक सैन्य भूमिका निभाई थी। भारतीय सुरक्षा लेखन में अक्सर यह तर्क मिलता है कि पाकिस्तान ने इसके बाद भारत के भीतर अलगाववादी आंदोलनों को एक कम लागत वाले प्रतिशोध के साधन के रूप में देखा।

दूसरी—भारत की सैन्य शक्ति को आंतरिक सुरक्षा में बांधे रखना।

यदि भारतीय सेना और अर्धसैनिक बल पंजाब तथा कश्मीर में व्यस्त रहें तो पाकिस्तान पर पारंपरिक सैन्य दबाव कम होता है।

तीसरी—कम लागत वाला ‘प्रॉक्सी’ संघर्ष।

नियमित युद्ध की तुलना में सीमित धन, हथियार और प्रशिक्षण देकर गैर-राज्य समूहों के माध्यम से प्रतिद्वंद्वी को लगातार अस्थिर रखना सस्ता पड़ता है।

ये रणनीतिक व्याख्याएं भारतीय और कुछ स्वतंत्र सुरक्षा अध्ययनों में व्यापक रूप से मिलती हैं। लेकिन पाकिस्तान ने लगातार राज्य-प्रायोजित आतंकवाद के भारतीय आरोपों से इनकार किया है। 1998 की भारत-पाक वार्ता में भारत ने पंजाब और जम्मू-कश्मीर आतंकवाद के समर्थन का आरोप औपचारिक रूप से पाकिस्तान के सामने रखा, जबकि पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल ने राज्य-प्रायोजन से इनकार किया।

9. ‘ऑपरेशन टोपैक’—इतिहास या बाद में बना आख्यान?

पाकिस्तान की पंजाब और कश्मीर नीति की चर्चा में ऑपरेशन टोपैक/टोपाज का नाम बार-बार आता है।

लोकप्रिय कथा यह है कि जनरल जिया-उल-हक ने भारत को भीतर से अस्थिर करने के लिए विस्तृत गुप्त योजना बनाई थी।

इस कथित योजना के भाषण और चरण विभिन्न पुस्तकों और इंटरनेट स्रोतों में पुनर्प्रकाशित होते रहे हैं।

लेकिन इसे मूल पाकिस्तानी आधिकारिक दस्तावेज मान लेने में गंभीर समस्या है।

कश्मीर इतिहास पर शोध करने वाली लेखिका विक्टोरिया स्कोफील्ड ने लिखा कि जिस सामग्री को “ऑपरेशन टोपैक” के रूप में भारतीय रक्षा लेखन में लोकप्रिय बनाया गया, उसे पाकिस्तान ने खारिज किया था और भारतीय रणनीतिक विशेषज्ञ के. सुब्रह्मण्यम ने बाद में स्वीकार किया कि संबंधित पाठ वास्तविक पाकिस्तानी ऑपरेशन आदेश के बजाय एक काल्पनिक/परिकल्पित अभ्यास था।

इसलिए इस शोध में—

पाकिस्तान द्वारा पंजाब आतंकवाद को सहायता और

“ऑपरेशन टोपैक” नाम की किसी प्रमाणित आधिकारिक योजना

को एक ही बात नहीं माना जाएगा।

पहले के लिए पर्याप्त दस्तावेजी सामग्री है।

दूसरे के लिए वैसी प्रमाणिकता नहीं है।

10. धन कहां से आता था?

आतंकवादी संगठनों का पैसा केवल पाकिस्तान से नहीं आता था।

तीन मुख्य स्रोत थे—

पंजाब में डकैती और जबरन वसूली,

विदेशी समर्थकों से धन,

और कथित पाकिस्तानी सहायता।

अमेरिकी खुफिया आकलन ने 1987 में स्पष्ट रूप से कहा था कि सिख उग्रवादी संसाधनों का बड़ा हिस्सा प्रवासी सिख चंदे, नशीले पदार्थों से जुड़े लाभ और भारत के भीतर हथियारों की चोरी जैसे स्रोतों से आता था; उस समय उसने पाकिस्तान को उनका मुख्य वित्तीय स्रोत नहीं माना।

यही तथ्य संतुलन के लिए महत्वपूर्ण है।

पाकिस्तान की सहायता वास्तविक हो सकती थी—

लेकिन आतंकवाद की पूरी अर्थव्यवस्था आईएसआई द्वारा संचालित नहीं थी।

विदेशी सिख समर्थक नेटवर्कों का प्रश्न अगले अध्याय में अलग से आएगा।

11. नशीले पदार्थ और आतंकवाद

पंजाब की सीमा पर ड्रग तस्करी और आतंकवाद के बीच संबंध 1980 के दशक में ही दिखाई देने लगे थे।

लेकिन यहां भी सामान्यीकरण से बचना आवश्यक है।

1987 की अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट का आकलन था कि अंतरराष्ट्रीय ड्रग व्यापार में शामिल अधिकांश सिख व्यक्तियों की गतिविधि व्यक्तिगत लाभ के लिए थी; किसी एक खालिस्तानी संगठन द्वारा पूरे ड्रग व्यापार को नियंत्रित करने का प्रमाण नहीं था।

फिर भी रिपोर्ट ने माना कि कुछ उग्रवादी समूह—

ड्रग मार्गों पर कर लगाकर,

तस्करों से धन लेकर,

या अपने सदस्यों की तस्करी से प्राप्त आय—

का अप्रत्यक्ष लाभ उठा सकते थे।

यानी ड्रग व्यापार और आतंकवाद का संपर्क था, लेकिन दोनों एक ही संरचना नहीं थे।

12. 1990 के दशक में पाकिस्तान की भूमिका का महत्व

1990–91 पंजाब आतंकवाद का चरम था।

उसी समय भारत ने सीमा की निगरानी, तारबंदी और आतंकवादी मार्गों पर दबाव बढ़ाया।

1992–93 में पंजाब पुलिस के स्थानीय अभियान ने जब संगठनों की आंतरिक संरचना तोड़ी, तब पाकिस्तान में सुरक्षित ठिकाना उपलब्ध होना भी पंजाब के भीतर नेटवर्क को बचाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं रहा।

यह एक महत्वपूर्ण रणनीतिक सीमा थी।

बाहरी समर्थन किसी आंदोलन को हथियार और जीवनरेखा दे सकता है—

लेकिन स्थानीय सामाजिक आधार के बिना वह स्थायी विद्रोह बनाए नहीं रख सकता।

यही कारण है कि पाकिस्तान में नेतृत्व बचा रहने के बावजूद 1993–94 में पंजाब आतंकवाद तेजी से ढह गया।

13. 1995 के बाद पाकिस्तान स्थित नेतृत्व की भूमिका

संगठित घरेलू विद्रोह समाप्त होने के बाद पाकिस्तान की भूमिका बदल गई।

अब उद्देश्य बड़े गुरिल्ला संगठन को रोजाना हथियार देना नहीं था।

मॉडल था—

पुराने संगठन का नाम जीवित रखना,

विदेशी समर्थकों से संपर्क,

पंजाब में छोटे मॉड्यूल बनाना,

हथियार या विस्फोटक भेजना

और प्रतीकात्मक आतंकवादी हमला कराना।

गृह मंत्रालय की 2003–04 रिपोर्ट ने पंजाब में उस वर्ष कोई आतंकवादी घटना न होने के बावजूद लिखा कि पाकिस्तान-स्थित खालिस्तान समर्थक नेताओं पर आईएसआई आतंकवाद पुनर्जीवित करने के लिए दबाव बना रही थी।

यह पुरानी और नई रणनीति के बीच संक्रमण था।

14. 2019: ड्रोन नेटवर्क पर न्यायिक पुष्टि

21वीं सदी में पाकिस्तान सीमा का सबसे बड़ा तकनीकी परिवर्तन ड्रोन था।

2019 में पंजाब में पाकिस्तान से ड्रोन द्वारा हथियार और विस्फोटक गिराने का मामला सामने आया।

मार्च 2025 में मोहाली की एनआईए विशेष अदालत ने इस मामले में नौ आरोपियों को दोषी ठहराया। मामला प्रतिबंधित खालिस्तान जिंदाबाद फोर्स से जुड़ा था और ड्रोन से हथियार तथा विस्फोटक पहुंचाने की साजिश का न्यायिक परिणाम दोषसिद्धि के रूप में सामने आया।

यह पाकिस्तान से हथियार आपूर्ति के आधुनिक चरण में इसलिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है कि मामला केवल खुफिया आरोप तक सीमित नहीं रहा—

अदालत में दोषसिद्धि हुई।

15. हथियार और नशीले पदार्थ की एक ही सीमा-पार खेप

2026 के पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के एक मामले में एनआईए जांच का विवरण विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

एजेंसी के अनुसार पाकिस्तान स्थित लखबीर सिंह रोडे ने एक पाकिस्तान-स्थित ड्रग तस्कर के साथ मिलकर पंजाब में आतंकवादी मॉड्यूल बनाया। स्थानीय लोगों को भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों में टिफिन बम/आईईडी हमलों के लिए भर्ती किया गया और पाकिस्तान से हेरोइन, हथियार तथा गोला-बारूद की खेप भेजी गई।

यह अदालत में दर्ज एनआईए का जांच निष्कर्ष है; अंतिम दोषसिद्धि और अभियोजन आरोप का अंतर बनाए रखना जरूरी है।

फिर भी यह उस आधुनिक नार्को-टेरर लॉजिस्टिक मॉडल का स्पष्ट उदाहरण है जिसमें एक ही सीमा-पार संरचना ड्रग्स और हथियार दोनों भेज सकती है।

16. आईएसआई का नाम सीधे न्यायिक रिकॉर्ड में

आधुनिक मामलों में आईएसआई का उल्लेख अब केवल राजनीतिक भाषण तक सीमित नहीं है।

2024 में सुप्रीम कोर्ट के सामने आए एक एनआईए मामले में जांच एजेंसी ने कहा कि पंजाब में पकड़े गए मॉड्यूल को पाकिस्तान में स्थित जावेद खान नामक आईएसआई हैंडलर प्रेरित कर रहा था। आरोप था कि विदेश से हवाला के माध्यम से धन भेजा गया और हथियार प्राप्त करने तथा पाकिस्तान में प्रशिक्षण की कोशिशें हुईं।

2026 में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के एक अन्य मामले में पुलिस/राज्य जांच ने बीकेआई से जुड़े एक मॉड्यूल और पाकिस्तान स्थित हरविंदर सिंह रिंदा को आईएसआई सहयोग से जोड़ा; अदालत के सामने हथियार की बरामदगी सहित सामग्री पेश की गई।

ये मामले आरोप और न्यायिक प्रक्रिया के अलग-अलग चरणों में हैं।

इसलिए उचित भाषा यही है—

भारतीय जांच एजेंसियों ने अनेक मामलों में विशिष्ट आईएसआई हैंडलरों अथवा आईएसआई सहयोग का आरोप लगाया है; प्रत्येक मामले की अंतिम न्यायिक स्थिति अलग है।

17. 2024–26: पाकिस्तान-स्थित हैंडलर का नया मॉडल

पाकिस्तान से संबंध अब हमेशा पुराने खालिस्तानी संगठन के औपचारिक पदाधिकारी के रूप में नहीं आता।

नया मॉडल कई बार—

गैंगस्टर,

हथियार तस्कर,

सोशल मीडिया भर्ती करने वाला,

या स्वतंत्र हैंडलर—

का होता है।

सितंबर 2024 के चंडीगढ़ ग्रेनेड हमले में एनआईए ने मार्च 2025 के आरोपपत्र में पाकिस्तान-स्थित हरविंदर सिंह रिंदा को मुख्य हैंडलरों में शामिल किया और कहा कि भारत स्थित ऑपरेटिवों को लॉजिस्टिक्स, धन, हथियार और गोला-बारूद उपलब्ध कराया गया।

2026 में एनआईए ने पाकिस्तानी गैंगस्टर शाहजाद भट्टी पर जालंधर के एक घर पर ग्रेनेड हमला विदेश से संचालित करने का आरोप लगाया। एजेंसी के अनुसार उससे जुड़ा बड़ा नेटवर्क लक्षित हत्या, भर्ती और हथियार तस्करी में सक्रिय था।

मई 2026 के सिरसा महिला पुलिस स्टेशन हमले में एनआईए ने दो पाकिस्तानी नागरिकों सहित नौ लोगों पर आरोपपत्र दाखिल किया और सोशल मीडिया/एन्क्रिप्टेड संचार के जरिए भर्ती व निर्देश देने का आरोप लगाया।

इससे पता चलता है कि पाकिस्तान-आधारित समर्थन का संगठनात्मक रूप भी बदल चुका है।

18. ड्रोन: सीमा-पार समर्थन का सबसे आधुनिक साधन

पुराने दौर में प्रशिक्षित व्यक्ति को सीमा पार कराना पड़ता था।

बाद में तस्कर हथियार लाता था।

अब ड्रोन सीमा का बड़ा हिस्सा पार कर सकता है।

2023 के गुरदासपुर हथियार तस्करी मामले में एनआईए ने ड्रोन से सीमा पार भेजे गए पांच ऑस्ट्रियाई ग्लॉक पिस्तौल, मैगजीन और बड़ी मात्रा में कारतूस बरामद होने का उल्लेख किया।

2026 में एनआईए ने अलग से ऐसा नया मामला दर्ज किया जिसमें पाकिस्तान की ओर से ड्रोन द्वारा अवैध हथियार और गोला-बारूद की बड़ी खेप गिराए जाने की जांच की जा रही है।

इससे पाकिस्तान स्थित ऑपरेटर को तीन लाभ मिलते हैं—

सीमा में शारीरिक प्रवेश नहीं,

छोटी लेकिन उच्च-मूल्य हथियार खेप,

और स्थानीय रिसीवर तक सीधे डिलीवरी।

इसीलिए ड्रोन अब पंजाब की सीमा-सुरक्षा चुनौती का केंद्रीय हिस्सा है।

19. पाकिस्तान की सहायता के बावजूद आतंकवाद फिर क्यों नहीं खड़ा हो पाया?

यदि पाकिस्तान के पास—

आश्रय,

हथियार,

पैसा,

ड्रोन,

और विदेशी नेटवर्क—

उपलब्ध हैं, तो प्रश्न स्वाभाविक है:

1988–91 जैसा आतंकवाद फिर क्यों नहीं बना?

कारण है कि बाहरी सहायता किसी आंदोलन के केवल एक हिस्से को पूरा करती है।

स्थायी विद्रोह के लिए चाहिए—

स्थानीय जनाधार,

हजारों सक्रिय कार्यकर्ता,

ग्रामीण आश्रय,

राजनीतिक वैधता,

भर्ती का लगातार स्रोत,

और राज्य की कमजोर प्रशासनिक पहुंच।

वर्तमान पंजाब में यह संरचना दिखाई नहीं देती।

2018–20 के एक एनआईए मामले में भी कथित पाकिस्तान-आधारित आईएसआई हैंडलर और विदेश से धन का आरोप सामने आया, लेकिन मॉड्यूल स्थानीय स्तर पर सीमित रहा और जांच एजेंसियां उसे पकड़ सकीं।

यानी बाहरी क्षमता बनी रही—

आंतरिक ग्रहणशीलता वैसी नहीं रही।

20. पाकिस्तान की भूमिका कितनी निर्णायक थी?

पूरे इतिहास को तीन चरणों में बांटने पर उत्तर अधिक स्पष्ट होता है।

1978–84

पाकिस्तान मुख्य कारण नहीं था।

पंजाब संकट मूलतः आंतरिक राजनीतिक और धार्मिक घटनाक्रम से विकसित हुआ।

1984–93

पाकिस्तान महत्वपूर्ण सहायक कारक बन गया।

प्रशिक्षण, हथियार, सुरक्षित ठिकाने और सीमा-पार नेटवर्क ने आतंकवाद की परिचालन क्षमता बढ़ाई। अमेरिकी दस्तावेजों, भारतीय सरकारी रिकॉर्ड और स्वतंत्र शोध सभी किसी-न-किसी स्तर पर इस बाहरी सहायता को स्वीकार करते हैं, हालांकि उसके पैमाने को लेकर मतभेद रहे।

1995–2026

पाकिस्तान का महत्व सुरक्षित बाहरी आधार और पुनर्जीवन नेटवर्क के रूप में बढ़ा।

क्योंकि पंजाब में घरेलू विद्रोह समाप्त था, पाकिस्तान स्थित नेतृत्व अब छोटे मॉड्यूल, हथियार तस्करी, ड्रोन, नार्को नेटवर्क और गैंगस्टर संपर्कों पर अधिक निर्भर हुआ।

निष्कर्ष: पाकिस्तान ने पंजाब आतंकवाद पैदा नहीं किया—लेकिन उसने उसे लंबा और अधिक घातक बनाने में सहायता की

पंजाब आतंकवाद की जड़ों को केवल इस वाक्य में समेटना कि “यह सब आईएसआई ने कराया” उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्यों से मेल नहीं खाता।

1978 का निरंकारी संघर्ष पाकिस्तान ने नहीं पैदा किया।

आनंदपुर साहिब प्रस्ताव पाकिस्तान का दस्तावेज नहीं था।

धर्म युद्ध मोर्चा पंजाब के भीतर की राजनीति था।

भिंडरांवाले का उदय भी भारतीय राजनीतिक और धार्मिक परिस्थितियों में हुआ।

ऑपरेशन ब्लू स्टार और उसके बाद पैदा सामाजिक आघात भी भारत के भीतर की घटना थी।

लेकिन 1984 के बाद समीकरण बदल गया।

पाकिस्तान में—

सुरक्षित ठिकाने,

हथियार,

प्रशिक्षण

और सीमा-पार मार्ग—

उपलब्ध होने लगे। भारत सरकार ने दशकों तक अनेक प्रमुख खालिस्तानी आतंकवादी नेताओं की पाकिस्तान में मौजूदगी दर्ज की।

अमेरिकी खुफिया दस्तावेजों ने भी भारत के सभी दावों को स्वतः स्वीकार नहीं किया, लेकिन पाकिस्तान से प्रशिक्षण, हथियार या आश्रय मिलने की संभावना को वास्तविक माना। साथ ही उन्होंने महत्वपूर्ण चेतावनी दी कि पंजाब संकट की आंतरिक जड़ें बाहरी सहायता से अधिक गहरी थीं।

यही सबसे संतुलित ऐतिहासिक निष्कर्ष है।

पाकिस्तान आतंकवाद का निर्माता नहीं, लेकिन उसके सबसे महत्वपूर्ण बाहरी संरक्षकों और सुविधा प्रदाताओं में से एक बना।

और जब 1990 के दशक में पंजाब के भीतर आतंकवाद का सामाजिक आधार टूट गया, तब यही सीमा सामने आ गई—

बाहर से हथियार दिए जा सकते हैं,

धन भेजा जा सकता है,

सुरक्षित ठिकाना उपलब्ध कराया जा सकता है,

यहां तक कि ड्रोन से ग्रेनेड और पिस्तौल भी भेजे जा सकते हैं—

लेकिन पंजाब के भीतर व्यापक समर्थन पैदा नहीं किया जा सकता।

2019 के ड्रोन मामले में दोषसिद्धि, आधुनिक एनआईए मामलों में पाकिस्तान-स्थित हैंडलरों के आरोप और 2026 तक जारी सीमा-पार हथियार जांच यह दिखाती है कि यह चुनौती समाप्त नहीं हुई।

लेकिन वर्तमान मॉडल 1980–90 के आतंकवाद से अलग है।

अब पाकिस्तान की भूमिका किसी बड़े पंजाब-आधारित सशस्त्र विद्रोह को रसद देने की बजाय—

छोटे आतंकवादी मॉड्यूल, गैंगस्टर नेटवर्क, हथियार तस्करी, ड्रोन, नार्को-टेरर और विदेश-स्थित संचालकों को जोड़ने वाली बाहरी संरचना—

के रूप में अधिक दिखाई देती है।

और इसी बाहरी संरचना का दूसरा सिरा पाकिस्तान में नहीं, बल्कि ब्रिटेन, कनाडा, अमेरिका और यूरोप के कुछ नेटवर्कों में दिखाई देता है।

इस अध्याय को मैंने लगभग 18 ठोस खंडों में रखा है—इतना विस्तार कि शोध का वजन बना रहे, लेकिन एक ही बात कनाडा, ब्रिटेन, अमेरिका और यूरोप के नाम पर बार-बार न दोहराई जाए।