1985 से 1987: राजीव–लोंगोवाल समझौता, लोंगोवाल की हत्या और आतंकवाद का फिर उभार
ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद पंजाब में पहली बड़ी राजनीतिक कोशिश 24 जुलाई 1985 को हुई, जब प्रधानमंत्री राजीव गांधी और शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष संत हरचंद सिंह लोंगोवाल ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। उद्देश्य था—टकराव के दौर को समाप्त कर राजनीतिक प्रक्रिया बहाल करना, पंजाब की लंबित मांगों को संवैधानिक ढांचे में संबोधित करना और आतंकवाद के लिए बची राजनीतिक जमीन को कम करना।
समझौते से तत्काल उम्मीद जगी। लेकिन केवल 27 दिन बाद, 20 अगस्त 1985 को लोंगोवाल की आतंकवादियों ने हत्या कर दी। सितंबर में विधानसभा चुनाव हुए और सुरजीत सिंह बरनाला के नेतृत्व में अकाली सरकार बनी। फिर भी 1986 और 1987 में आतंकवादी हिंसा तेजी से बढ़ी। जनवरी 1986 के तथाकथित सरबत खालसा, अप्रैल में पंथिक कमेटी द्वारा खालिस्तान की घोषणा, स्वर्ण मंदिर परिसर में दोबारा हथियारबंद जमावड़ा और फिर सरकार की कार्रवाई ने स्पष्ट कर दिया कि ब्लू स्टार ने आतंकवाद की एक संरचना नष्ट की थी, लेकिन समस्या की राजनीतिक और संगठनात्मक जड़ें समाप्त नहीं हुई थीं।
पंजाब पुलिस के आंकड़ों पर आधारित एसएटीपी के संकलन में 1985 में आतंकवाद-संबंधी 73 मौतें दर्ज हैं; 1986 में यह संख्या बढ़कर 636 और 1987 में 1,333 हो गई। इसी डेटा में नागरिक मौतें 1985 में 63 से बढ़कर 1986 में 520 और 1987 में 910 बताई गई हैं। यह केवल दो वर्षों में हिंसा के बेहद तेज विस्तार को दिखाता है। SATP
1. ब्लू स्टार के बाद राजनीतिक रास्ता क्यों जरूरी था?
जून 1984 के बाद केंद्र सरकार के सामने यह स्पष्ट था कि पंजाब समस्या का केवल सैन्य समाधान पर्याप्त नहीं होगा। भिंडरांवाला और उसका तत्काल नेतृत्व समाप्त हो गया था, लेकिन अकाली दल की पुरानी राजनीतिक मांगें—चंडीगढ़, नदी जल, केंद्र–राज्य संबंध और अन्य प्रश्न—बने हुए थे।
यदि इन मुद्दों को आतंकवाद से अलग करके राजनीतिक प्रक्रिया में वापस नहीं लाया जाता, तो हथियारबंद संगठन स्वयं को पूरे सिख राजनीतिक असंतोष के प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत कर सकते थे।
राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद इसी दिशा में अकाली नेतृत्व से बातचीत शुरू की। संत हरचंद सिंह लोंगोवाल इस प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण थे क्योंकि वे धर्म युद्ध मोर्चे के नेता रहे थे, लेकिन आतंकवादी हिंसा के बजाय बातचीत के रास्ते पर लौटने को तैयार थे।
24 जुलाई 1985 को राजीव गांधी ने संसद में स्वयं बताया कि उन्होंने लोंगोवाल के साथ “Memorandum of Settlement” पर हस्ताक्षर किए हैं और इसे पंजाब में टकराव की अवधि समाप्त करने की दिशा में नया चरण बताया। संसद में उन्होंने समझौते का पूरा पाठ भी पढ़ा। E-Parliament
2. राजीव–लोंगोवाल समझौते में वास्तव में क्या था?
समझौते को कई बार केवल “चंडीगढ़ समझौता” कह दिया जाता है, जबकि उसके विषय काफी व्यापक थे।
मुख्य प्रावधानों में आंदोलन और कार्रवाई के दौरान मारे गए निर्दोष लोगों तथा संपत्ति के नुकसान के लिए मुआवजा, सेना से निकाले गए लोगों के पुनर्वास की कोशिश, अखिल भारतीय गुरुद्वारा कानून पर विचार, कुछ विशेष सुरक्षा प्रावधानों की समीक्षा, केंद्र–राज्य संबंधों का प्रश्न, नदी जल का न्यायाधिकरण और एसवाईएल नहर शामिल थे। E-Parliament
आनंदपुर साहिब प्रस्ताव से जुड़े केंद्र–राज्य संबंधों के हिस्से को सरकारिया आयोग के पास भेजने पर सहमति हुई। समझौते में अकाली पक्ष ने स्पष्ट किया कि वह अधिक राज्य स्वायत्तता की मांग को भारतीय संविधान के भीतर रखता है और उसे राष्ट्रीय एकता के प्रतिकूल नहीं मानता। SATP
यानी समझौते का घोषित राजनीतिक आधार अलगाव नहीं बल्कि संघीय पुनर्समायोजन था।
3. चंडीगढ़: समझौते का सबसे प्रतीकात्मक वादा
समझौते की सबसे चर्चित शर्त चंडीगढ़ से जुड़ी थी।
केंद्र ने सिद्धांततः चंडीगढ़ पंजाब को देने की दिशा स्वीकार की, जबकि हरियाणा को बदले में कुछ हिंदी भाषी क्षेत्र दिए जाने थे। समयबद्ध क्रियान्वयन का विचार समझौते की राजनीतिक विश्वसनीयता के लिए महत्वपूर्ण था।
यहीं सबसे बड़ी कठिनाई भी थी।
जो बात पंजाब में न्यायपूर्ण समाधान के रूप में प्रस्तुत की जा रही थी, वही हरियाणा में राजनीतिक नुकसान के रूप में देखी जा सकती थी।
इसी तरह नदी जल और क्षेत्रीय अदला-बदली ने समझौते को दो राज्यों की राजनीति से जोड़ दिया।
इसलिए हस्ताक्षर आसान थे; क्रियान्वयन कहीं अधिक कठिन।
4. नदी जल और एसवाईएल
समझौते ने यह तय किया कि पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के किसानों द्वारा 1 जुलाई 1985 तक इस्तेमाल किए जा रहे रावी-ब्यास जल को तत्काल प्रभावित नहीं किया जाएगा। पंजाब और हरियाणा के शेष दावों को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की अध्यक्षता वाले न्यायाधिकरण को भेजना था। साथ ही एसवाईएल नहर का निर्माण जारी रखने और उसे 15 अगस्त 1986 तक पूरा करने पर सहमति हुई। SATP
बाद में रावी-ब्यास जल न्यायाधिकरण, जिसे सामान्यतः एराडी ट्रिब्यूनल कहा गया, 2 अप्रैल 1986 को गठित हुआ और उसने जनवरी 1987 में अपनी रिपोर्ट दी। The Indian Express
लेकिन एसवाईएल का प्रश्न समाधान के बजाय आगे भी राजनीतिक और आतंकवादी हिंसा का विषय बना रहा।
5. समझौते पर पंजाब के भीतर विरोध
राजीव–लोंगोवाल समझौते को अकाली राजनीति में सर्वसम्मत समर्थन नहीं मिला।
लोंगोवाल इसे लंबे संघर्ष के बाद व्यवहारिक राजनीतिक रास्ता मानते थे। लेकिन अकाली नेतृत्व के अन्य प्रभावशाली हिस्सों को लगता था कि समझौते में पर्याप्त ठोस उपलब्धि सुनिश्चित नहीं की गई।
उग्रवादी संगठनों ने इसे और कठोर भाषा में “समर्पण” के रूप में प्रस्तुत किया।
यहीं लोंगोवाल की स्थिति बेहद जोखिमपूर्ण हो गई।
वे अब दो दिशाओं से दबाव में थे—
केंद्र को समझौते के वादे पूरे करने थे;
और दूसरी तरफ उन्हें अपने पंथक आधार को विश्वास दिलाना था कि उन्होंने पंजाब के हितों से समझौता नहीं किया।
6. 20 अगस्त 1985: लोंगोवाल की हत्या
समझौते के केवल 27 दिन बाद 20 अगस्त 1985 को संत हरचंद सिंह लोंगोवाल की संगऱूर जिले के शेरपुर क्षेत्र में गोली मारकर हत्या कर दी गई।
इंडियन एक्सप्रेस के ऐतिहासिक पुनर्निर्माण के अनुसार उन्हें आतंकवादी जरनैल सिंह हलवारा और ज्ञान सिंह लील ने गोली मारी। लोंगोवाल 53 वर्ष के थे। The Indian Express
उनकी हत्या का राजनीतिक संदेश सीधा था—
हथियारबंद उग्रवादी राजनीतिक समझौता स्वीकार करने वालों को भी लक्ष्य बना सकते थे।
यह आतंकवाद के अगले चरण की एक महत्वपूर्ण विशेषता बनी।
अब निशाना केवल केंद्र सरकार, पुलिस या हिंदू नागरिक नहीं थे।
वे सिख नेता भी निशाने पर आने लगे जो उग्रवादियों की राजनीतिक दिशा स्वीकार नहीं करते थे।
7. लोंगोवाल की हत्या क्यों निर्णायक थी?
लोंगोवाल उस समय केंद्र और मुख्यधारा अकाली राजनीति के बीच सबसे महत्वपूर्ण सेतु थे।
उनकी हत्या से तीन नुकसान हुए।
पहला, समझौते का सबसे बड़ा पंथक समर्थक समाप्त हो गया।
दूसरा, उग्रवादियों ने यह संदेश दिया कि राजनीतिक समझौता करने वाले सिख नेताओं की जान सुरक्षित नहीं है।
तीसरा, अकाली दल के भीतर पहले से मौजूद नेतृत्व-संघर्ष खुलने लगा।
आतंकवाद की रणनीति में ऐसी हत्या का उद्देश्य केवल एक व्यक्ति को खत्म करना नहीं होता। उसका उद्देश्य बाकी राजनीतिक नेतृत्व को भयभीत करना भी होता है।
लोंगोवाल की हत्या इसी अर्थ में एक राजनीतिक हत्या से अधिक—मध्यमार्ग पर हमला थी।
8. सितंबर 1985: चुनाव और लोकतांत्रिक प्रक्रिया की वापसी
लोंगोवाल की हत्या के बावजूद पंजाब में चुनाव कराए गए।
अकाली दल ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया और सुरजीत सिंह बरनाला मुख्यमंत्री बने। यह परिणाम इस दृष्टि से महत्वपूर्ण था कि मतदाताओं ने हिंसक समानांतर सत्ता के बजाय फिर से निर्वाचित सरकार को जनादेश दिया।
बरनाला लोंगोवाल के निकट सहयोगी थे और उनकी सरकार राजीव–लोंगोवाल समझौते के आधार पर राजनीतिक सामान्यीकरण की उम्मीद से बनी थी। इंडियन एक्सप्रेस के ऐतिहासिक विवरण में 29 सितंबर 1985 को उनके मुख्यमंत्री बनने का उल्लेख है। The Indian Express
यह अवसर पंजाब के लिए महत्वपूर्ण था।
लगभग दो वर्षों के राष्ट्रपति शासन और सैन्य कार्रवाई के बाद निर्वाचित सरकार वापस आई थी।
लेकिन राजनीतिक सामान्यीकरण और सुरक्षा सामान्यीकरण एक साथ नहीं हुए।
9. 1985 में हिंसा कुछ घटी—लेकिन इसका अर्थ आतंकवाद का अंत नहीं था
पंजाब पुलिस के आंकड़ों के अनुसार 1984 में आतंकवाद-संबंधी 456 मौतें दर्ज थीं। 1985 में संख्या घटकर 73 हो गई—63 नागरिक, आठ सुरक्षा बल कर्मी और दो आतंकवादी। SATP
यह गिरावट महत्वपूर्ण थी।
लेकिन इसे स्थायी शांति मान लेना गलत सिद्ध हुआ।
1985 में आतंकवादी अपराधों के कुल 455 मामले दर्ज हुए, जिनमें हत्या/गोलीबारी के 64 और हथियार कानून के 64 मामले थे। अगले ही वर्ष कुल आतंकवादी अपराधों की संख्या 1,666 हो गई। SATP
अर्थात 1985 एक अंतराल था, अंत नहीं।
10. अकाली सरकार के सामने सबसे कठिन प्रश्न
बरनाला सरकार की स्थिति असाधारण थी।
यदि वह आतंकवादियों पर कठोर कार्रवाई करती, तो कट्टरपंथी समूह उसे केंद्र का सहयोगी बताते।
यदि कार्रवाई नहीं करती, तो कानून-व्यवस्था टूटती।
यदि केंद्र के साथ समझौते को लागू करती, तो उसे चंडीगढ़ और नदी जल जैसे वादों का परिणाम चाहिए था।
यदि केंद्र देरी करता, तो अकाली सरकार की विश्वसनीयता घटती।
यही राजनीतिक जाल आने वाले डेढ़ वर्ष में सरकार को कमजोर करता गया।
11. जनवरी 1986: स्वर्ण मंदिर परिसर फिर उग्र राजनीति का केंद्र
ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद कुछ समय के लिए स्वर्ण मंदिर परिसर से हथियारबंद शक्ति हटा दी गई थी।
लेकिन 1985 के अंत और 1986 की शुरुआत में कट्टर पंथक संगठनों का प्रभाव फिर बढ़ने लगा।
जनवरी 1986 में उग्रवादी धाराओं से जुड़े आयोजकों ने स्वर्ण मंदिर परिसर में एक सरबत खालसा बुलाया। मुख्यधारा एसजीपीसी इस आयोजन की आयोजक नहीं थी। इंडियन एक्सप्रेस के ऐतिहासिक विवरण में 26 जनवरी के आयोजन और बाद में पंथिक कमेटी के गठन का उल्लेख है। The Indian Express
अकाली सरकार ने इस आयोजन को स्वीकार नहीं किया।
27–28 जनवरी के समकालीन राजनीतिक रिकॉर्ड में अकाली दल ने इसे सिख पंथ को कमजोर करने वाली साजिश तक कहा। The Indian Express
यह अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य है।
1986 तक संघर्ष को “सरकार बनाम सिख नेतृत्व” कहना वास्तविकता को गलत रूप देना होता।
अब निर्वाचित सिख-अकाली सरकार स्वयं उग्रवादी पंथक समूहों से टकरा रही थी।
12. पंथिक कमेटी का गठन
इस सरबत खालसा से पांच सदस्यीय पंथिक कमेटी उभरी।
इसमें गुरबचन सिंह मनोचहल जैसे उग्रवादी नेताओं की भूमिका थी।
यह समिति आगे अलगाववादी आंदोलन की राजनीतिक घोषणा करने वाली संरचना बनी।
इसी दौर में अकाल तख्त और एसजीपीसी की संस्थागत वैधता को लेकर समानांतर नियुक्तियां तथा अधिकार-संघर्ष भी पैदा हुए।
इससे धार्मिक संस्थानों पर नियंत्रण स्वयं आतंकवाद और मुख्यधारा राजनीति के बीच संघर्ष का हिस्सा बन गया।
13. 29 अप्रैल 1986: खालिस्तान की औपचारिक घोषणा
29 अप्रैल 1986 को पंथिक कमेटी ने स्वर्ण मंदिर परिसर से खालिस्तान की स्वतंत्रता की घोषणा की।
इंडियन एक्सप्रेस के 2026 के ऐतिहासिक पुनर्निर्माण के अनुसार पांच सदस्यीय पंथिक कमेटी ने परिसर में बैठक के बाद घोषणा की; अगले ही दिनों में सरकार ने कार्रवाई की। The Indian Express
आधुनिक ऐतिहासिक स्रोत इसे पंजाब के उग्रवादी दौर में पहली स्पष्ट संस्थागत खालिस्तान घोषणा के महत्वपूर्ण चरण के रूप में देखते हैं। The Indian Express
यहां एक अंतर फिर जरूरी है।
अकाली दल की सरकार की आधिकारिक नीति खालिस्तान नहीं थी।
पंथिक कमेटी की घोषणा अलगाववादी उग्रवादी धारा की थी।
14. बरनाला सरकार का निर्णायक फैसला
लोंगोवाल की हत्या के बाद बनी अकाली सरकार के लिए अब परीक्षा सामने थी।
क्या वह स्वर्ण मंदिर परिसर को फिर हथियारबंद अलगाववादी केंद्र बनने दे?
बरनाला ने कार्रवाई का फैसला किया।
29 अप्रैल की घोषणा के बाद पंजाब पुलिस और राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड को परिसर में भेजने की तैयारी हुई। इसे बाद में ऑपरेशन ब्लैक थंडर-I कहा गया।
महत्वपूर्ण अंतर यह था कि इस बार 1984 जैसा सेना-प्रधान भारी सैन्य आक्रमण नहीं किया गया।
एनएसजी और पुलिस को निर्देश दिया गया कि हरमंदिर साहिब के गर्भगृह में प्रवेश न हो और उसकी दिशा में गोली न चलाई जाए। The Indian Express
यह 1984 के अनुभव से सीखा गया एक स्पष्ट परिचालन सबक था।
15. ऑपरेशन ब्लैक थंडर-I
30 अप्रैल 1986 के आसपास कार्रवाई शुरू हुई।
इंडियन एक्सप्रेस के विस्तृत सैन्य पुनर्निर्माण के अनुसार अमृतसर के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने तैयारी के लिए समय मांगा और अंततः पंजाब पुलिस तथा एनएसजी ने अभियान चलाया। कार्रवाई का उद्देश्य स्वर्ण मंदिर परिसर, गुरुद्वारा बाबा दीप सिंह और तरनतारन के एक ऐतिहासिक गुरुद्वारे में मौजूद हथियारबंद लोगों को हटाना था। The Indian Express
यह ऑपरेशन 1984 से बहुत छोटा था।
सबसे महत्वपूर्ण बात—
हरमंदिर साहिब और अकाल तख्त को ब्लू स्टार जैसी भारी सैन्य क्षति नहीं हुई।
लेकिन राजनीतिक असर बहुत बड़ा था।
बरनाला सरकार ने यह सिद्ध करने की कोशिश की कि आतंकवाद के विरुद्ध कार्रवाई सिख धार्मिक पहचान के विरुद्ध कार्रवाई नहीं है।
16. कार्रवाई ने अकाली दल को तोड़ दिया
जो फैसला प्रशासनिक दृष्टि से आतंकवाद-विरोधी था, उसने अकाली दल में बड़ा विभाजन पैदा कर दिया।
इंडियन एक्सप्रेस के ऐतिहासिक विवरण के अनुसार कार्रवाई के विरोध में 28 अकाली विधायक, जिनमें अमरिंदर सिंह, सुखजिंदर सिंह और सुच्चा सिंह छोटेपुर जैसे नेता शामिल थे, बरनाला सरकार से अलग हो गए। प्रकाश सिंह बादल और गुरचरण सिंह टोहड़ा ने भी पार्टी पद छोड़े। The Indian Express
यह बरनाला के लिए गंभीर राजनीतिक नुकसान था।
उग्रवादियों के खिलाफ कार्रवाई करने पर उनकी सरकार मजबूत होने के बजाय अपने ही दल में कमजोर हो गई।
आतंकवाद के विरुद्ध मुख्यधारा सिख नेतृत्व की क्षमता पर इसका सीधा प्रभाव पड़ा।
17. 1986 में हिंसा का विस्फोट
1986 के आंकड़े बताते हैं कि राजनीतिक संघर्ष के साथ आतंकवादी हिंसा कितनी तेजी से फैल रही थी।
पंजाब पुलिस के आंकड़ों के अनुसार उस वर्ष—
520 नागरिक,
38 सुरक्षा बल कर्मी,
और 78 आतंकवादी
मारे गए।
कुल मृत्यु 636। SATP
1985 की कुल 73 मौतों की तुलना में यह लगभग नौ गुना वृद्धि थी।
हत्या और गोलीबारी के मामलों की संख्या भी 64 से बढ़कर 357 हो गई। हथियार कानून के मामले 64 से बढ़कर 441 और पुलिस मुठभेड़ें 20 से बढ़कर 109 दर्ज हुईं। SATP
यानी 1986 वास्तव में आतंकवाद की दूसरी लहर की शुरुआत था।
18. आतंकवाद का चरित्र भी बदल रहा था
1981–84 के दौर में हिंसा मुख्यतः कुछ विशिष्ट प्रतीकों के आसपास केंद्रित थी—
निरंकारी,
राजनीतिक विरोधी,
पुलिस,
पत्रकार,
और राज्य अधिकारी।
1986 के बाद आतंकवादी रणनीति अधिक व्यापक होती गई।
बसों,
बाजारों,
रेल यात्रियों,
सामान्य ग्रामीणों,
सरकारी कर्मचारियों
और समुदाय विशेष के नागरिकों को निशाना बनाने की घटनाएं बढ़ीं।
आतंक का उद्देश्य केवल राजनीतिक विरोधी को समाप्त करना नहीं रहा।
अब उद्देश्य बड़ी आबादी में भय पैदा करना और प्रशासन को असहाय दिखाना भी था।
19. एकीकृत नेतृत्व समाप्त, अनेक संगठन सक्रिय
भिंडरांवाले के समय भी पंजाब उग्रवाद पूरी तरह एकीकृत नहीं था, लेकिन उसके पास एक अत्यंत प्रभावशाली केंद्रीय प्रतीक था।
उसकी मृत्यु के बाद अलग-अलग समूह उभरे।
बब्बर खालसा,
खालिस्तान कमांडो फोर्स,
खालिस्तान लिबरेशन फोर्स,
और दूसरी छोटी संरचनाएं अलग-अलग क्षेत्रों में सक्रिय होने लगीं।
पंथिक कमेटियां भी एक नहीं रहीं; आगे समानांतर पंथिक कमेटियां बनेंगी।
पूर्व पंजाब अधिकारी रमेश इंदर सिंह से जुड़े आधुनिक विवरण के अनुसार आंदोलन कभी पूर्ण एकीकृत कमान में नहीं आया और अलग-अलग समूहों में विचारधारा, नेतृत्व और आपराधिक गतिविधियों का मिश्रण था। The Indian Express
यह विखंडन राज्य के लिए समस्या भी था और बाद में अवसर भी।
किसी एक नेता से समझौता करके पूरा आतंकवाद समाप्त करना संभव नहीं रहा।
20. राजीव–लोंगोवाल समझौते का क्रियान्वयन क्यों अटक गया?
समझौते की समस्या यह नहीं थी कि कुछ भी लागू नहीं हुआ।
कुछ प्रावधानों पर कार्रवाई हुई।
रावी-ब्यास जल न्यायाधिकरण बना। The Indian Express
विशेष कानूनों की समीक्षा हुई।
सेना से निकाले गए कुछ सैनिकों के पुनर्वास की प्रक्रिया चली।
लेकिन सबसे राजनीतिक रूप से दिखाई देने वाले मुद्दे—
चंडीगढ़
और
पानी/एसवाईएल
समाधान तक नहीं पहुंचे।
यही चीज उग्रवादी प्रचार के लिए उपयोगी थी।
वे कह सकते थे कि समझौता करके भी पंजाब को वादे नहीं मिले।
21. एसवाईएल स्वयं आतंकवाद का लक्ष्य बनता गया
समझौते में नहर को 15 अगस्त 1986 तक पूरा करने की स्पष्ट शर्त थी। Indian Kanoon
लेकिन काम समय पर पूरा नहीं हुआ।
उग्रवादी संगठनों ने एसवाईएल को केवल कृषि-विवाद नहीं बल्कि राजनीतिक प्रतीक बना लिया।
आने वाले वर्षों में नहर के इंजीनियरों और श्रमिकों तक को निशाना बनाया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने बाद के निर्णय में दर्ज किया कि पंजाब में उग्रवाद के कारण निर्माण रुका और आतंकवादियों ने परियोजना से जुड़े वरिष्ठ इंजीनियरों की हत्या की। Indian Kanoon
इस तरह एक संघीय जल विवाद सीधे आतंकवादी हिंसा के दायरे में आ गया।
22. 1987: आतंकवाद खुले संकट में
1987 में स्थिति और खराब हुई।
पंजाब पुलिस के आधिकारिक आंकड़ों पर आधारित संकलन के अनुसार—
910 नागरिक,
95 सुरक्षा बल कर्मी,
और 328 आतंकवादी
मारे गए।
कुल 1,333 मौतें। SATP
हत्या/गोलीबारी के 791 मामले, डकैती के 638, हथियार कानून के 1,378 और पुलिस मुठभेड़ों के 410 मामले दर्ज हुए। SATP
आंकड़े बताते हैं कि आतंकवाद अब किसी सीमित धार्मिक परिसर या कुछ जिलों की समस्या नहीं रहा था।
राज्यव्यापी कानून-व्यवस्था संकट बन चुका था।
23. आम नागरिक सबसे बड़ा निशाना
1987 के आंकड़ों में सबसे चिंताजनक संख्या 910 नागरिक मौतों की है।
सुरक्षा बलों से लगभग दस गुना अधिक नागरिक मारे गए।
इससे आतंकवाद के चरित्र का महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकलता है—
हिंसा का मुख्य बोझ सामान्य जनता उठा रही थी।
बस यात्रियों को चुनकर मारना,
मुखबिर समझे गए ग्रामीणों की हत्या,
सरकारी कर्मचारियों पर हमले,
समुदाय विशेष के नागरिकों को निशाना बनाना,
और आतंकवादी आदेश न मानने वाले सिखों की हत्या—
सभी इसके हिस्से थे।
इसलिए पंजाब आतंकवाद को केवल “अलगाववादी बनाम राज्य” संघर्ष कह देना नागरिक पीड़ा के सबसे बड़े हिस्से को छिपा देता है।
24. बरनाला सरकार और आतंकवादियों के बीच संघर्ष
बरनाला सरकार ने पुलिस कार्रवाई का समर्थन किया।
इससे उग्रवादी समूह उसे “पंथ विरोधी” बताते थे।
दूसरी तरफ केंद्र की नजर में सरकार आतंकवाद को पर्याप्त तेजी से नियंत्रित नहीं कर पा रही थी।
यानी मुख्यमंत्री दोनों ओर से दबाव में थे।
1986 के ब्लैक थंडर-I के बाद अकाली विभाजन ने विधानसभा में उनकी राजनीतिक स्थिति भी कमजोर कर दी थी। इंडियन एक्सप्रेस के विवरण के अनुसार 28 विधायकों के अलग होने के बाद उन्हें सरकार बचाने के लिए विपक्षी समर्थन तक लेना पड़ा। The Indian Express
इसके बावजूद निर्वाचित सरकार बनी रही—मई 1987 तक।
25. केंद्र का सर्वदलीय प्रयास
1987 के आरंभ में केंद्र सरकार ने पंजाब आतंकवाद को केवल कांग्रेस या अकाली प्रश्न के बजाय व्यापक राष्ट्रीय राजनीतिक मुद्दे के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की।
गृह मंत्रालय की 1987–88 वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार 16 फरवरी को प्रधानमंत्री ने संसद के राजनीतिक दलों के नेताओं से बैठक की और 19 फरवरी को गृह मंत्री ने विपक्षी नेताओं से चर्चा की। इसके बाद एक ऑल-पार्टी एक्शन प्लान बनाया गया। मार्च और अप्रैल में चंडीगढ़, लुधियाना, हुसैनीवाला, खटकड़ कलां और अमृतसर में सर्वदलीय कार्यक्रम हुए। Ministry of Home Affairs
उद्देश्य था आतंकवाद और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के विरुद्ध राजनीतिक मोर्चा बनाना।
लेकिन हिंसा पर इसका तत्काल निर्णायक असर नहीं पड़ा।
26. 11 मई 1987: बरनाला सरकार बर्खास्त
अंततः 11 मई 1987 को केंद्र सरकार ने पंजाब की सुरजीत सिंह बरनाला सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया।
बाद की न्यायिक कार्यवाही में राष्ट्रपति की 11 मई की उद्घोषणा का स्पष्ट उल्लेख है। बरनाला सरकार के समर्थकों ने अदालत में यह तर्क दिया कि केंद्र के वरिष्ठ नेता इससे पहले सरकार की आतंकवाद-विरोधी भूमिका की प्रशंसा करते रहे थे, फिर भी राज्यपाल की रिपोर्ट के आधार पर अनुच्छेद 356 लगाया गया। Indian Kanoon
समकालीन इंडिया टुडे ने इस फैसले को बड़ा राजनीतिक जोखिम बताया और दर्ज किया कि राज्यपाल सिद्धार्थ शंकर रे ने कानून-व्यवस्था नियंत्रित करने में विफलता के आधार पर सरकार हटाने की सिफारिश की थी। India Today
27. क्या बरनाला सरकार वास्तव में विफल हो गई थी?
इस पर तत्काल भी मतभेद थे और आज भी हैं।
केंद्र तथा राज्यपाल की दलील
आतंकवादी हिंसा तेजी से बढ़ रही थी।
बस हत्याएं और नागरिक मौतें गंभीर स्तर पर थीं।
राज्य सरकार की राजनीतिक कमजोरी ने सुरक्षा प्रशासन को प्रभावित किया।
बरनाला समर्थक दृष्टिकोण
सरकार ने आतंकवादियों के खिलाफ स्वर्ण मंदिर तक में पुलिस भेजी थी।
उसने भारत की संवैधानिक व्यवस्था का पक्ष लिया।
इसके बावजूद उसे हटाना मुख्यधारा अकाली राजनीति को कमजोर करता और उग्रवादियों के इस प्रचार को मजबूत करता कि दिल्ली किसी सिख राजनीतिक सरकार पर भरोसा नहीं करती।
समकालीन राजनीतिक विश्लेषण में दोनों दृष्टिकोण स्पष्ट दिखाई देते हैं। India Today
28. एक विडंबना
लोंगोवाल ने राजनीतिक समझौता किया—
वे आतंकवादियों द्वारा मारे गए।
बरनाला सरकार ने हथियारबंद अलगाववादियों के विरुद्ध स्वर्ण मंदिर में पुलिस भेजी—
उसकी अपनी पार्टी टूट गई।
फिर केंद्र ने उसी सरकार को कानून-व्यवस्था की विफलता के आधार पर हटा दिया।
इस क्रम का राजनीतिक असर गंभीर था।
मुख्यधारा अकाली नेतृत्व के लिए यह संदेश खतरनाक था—
हथियारबंद उग्रवाद से टकराने पर भी राजनीतिक स्थिरता की गारंटी नहीं है।
यह उग्रवादियों को राजनीतिक स्थान देने वाला परिणाम था, चाहे वह केंद्र का उद्देश्य न रहा हो।
29. समझौते का विफल होना आतंकवादियों की रणनीतिक जीत क्यों बना?
राजीव–लोंगोवाल समझौता यदि समयबद्ध ढंग से लागू होता और निर्वाचित अकाली सरकार स्थिर रहती, तो आतंकवादी संगठन उस दावे से कमजोर पड़ सकते थे कि संवैधानिक राजनीति से पंजाब को कुछ नहीं मिलेगा।
लेकिन हुआ उलटा—
लोंगोवाल मारे गए;
चंडीगढ़ हस्तांतरण अटका;
एसवाईएल विवाद जारी रहा;
अकाली दल टूट गया;
और बरनाला सरकार बर्खास्त हो गई।
इससे हथियारबंद समूहों को यह प्रचार करने का अवसर मिला कि समझौते और चुनावी राजनीति पर भरोसा करना व्यर्थ है।
यह राजनीतिक प्रभाव था; इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि समझौता केवल केंद्र की वजह से विफल हुआ। हरियाणा का विरोध, अकाली अंतर्विरोध, आतंकवादी हिंसा और संघीय विवाद सभी कारण थे।
30. आतंकवाद का केंद्र बदलता है
1984 से पहले स्वर्ण मंदिर और भिंडरांवाला आतंकवाद की सार्वजनिक छवि के केंद्र में थे।
1986–87 में व्यवस्था बदल गई।
अब आतंकवाद का मुख्य आधार था—
छोटे सेल,
जिला-स्तरीय कमांडर,
ग्रामीण सुरक्षित ठिकाने,
सीमा-पार संपर्क,
आपराधिक वित्त,
डकैती,
और लक्षित हत्या।
यह राज्य के लिए अधिक कठिन मॉडल था।
एक बड़े परिसर को घेरकर समस्या खत्म नहीं की जा सकती थी।
आतंकवादी नेटवर्क अब गांवों और सीमावर्ती जिलों में बिखर गया था।
31. किन क्षेत्रों में हिंसा अधिक दिखाई दी?
पंजाब पुलिस के जिला-स्तरीय आंकड़ों में 1986 और 1987 के दौरान अमृतसर, तरनतारन, मजीठा, जालंधर और दूसरे जिलों में बड़े हमले बढ़ते दिखाई देते हैं। उदाहरण के लिए 1987 में तरनतारन में दर्ज प्रमुख घटनाओं में 57 मौतें और मजीठा में 63 मौतें दर्ज की गईं। SATP
ये सीमावर्ती और धार्मिक-राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र आगे आतंकवाद के मुख्य गढ़ों में शामिल होंगे।
विशेषकर तरनतारन क्षेत्र आने वाले वर्षों में सुरक्षा बलों और उग्रवादी संगठनों के बीच तीव्र संघर्ष का केंद्र बनेगा।
32. 1985–87 के तीन वर्ष आंकड़ों में
पंजाब पुलिस के आंकड़ों को साथ रखें तो परिवर्तन बहुत स्पष्ट है:
केवल दो वर्षों में कुल वार्षिक मौतें 73 से बढ़कर 1,333 हो गईं।
यानी 1985 में दिखाई दी राजनीतिक राहत 1987 तक लगभग पूरी तरह समाप्त हो चुकी थी।
33. इन आंकड़ों में सबसे महत्वपूर्ण संकेत
1986 और 1987 में नागरिक मौतों की संख्या आतंकवादियों और सुरक्षा बलों—दोनों से कहीं अधिक थी।
यह बताता है कि आतंकवादी रणनीति अब केवल राज्य की सशस्त्र शक्ति के खिलाफ गुरिल्ला संघर्ष नहीं थी।
उसमें बड़े पैमाने पर असैनिक लक्ष्यों पर हमला शामिल था।
इसी तथ्य ने आने वाले वर्षों में आतंकवादी संगठनों की सामाजिक वैधता को भी नुकसान पहुंचाया।
क्योंकि सामान्य सिख और हिंदू दोनों बड़ी संख्या में मारे जाने लगे।
34. 1987 में राष्ट्रपति शासन का वास्तविक अर्थ
1983 में भी पंजाब में राष्ट्रपति शासन लगा था।
1987 का राष्ट्रपति शासन अलग वातावरण में आया।
अब—
भिंडरांवाला नहीं था;
निर्वाचित अकाली सरकार आतंकवाद से लड़ चुकी थी;
खालिस्तान की औपचारिक घोषणा करने वाली उग्रवादी संरचना सामने थी;
अलग-अलग आतंकवादी संगठन सक्रिय थे;
और वार्षिक मृत्यु संख्या हजार से ऊपर जा चुकी थी।
इसलिए मई 1987 के बाद पंजाब आतंकवाद-विरोधी नीति अधिक स्पष्ट रूप से केंद्र-नियंत्रित सुरक्षा अभियान में बदल गई।
गृह मंत्रालय की 1987–88 रिपोर्ट नवंबर 1987 में राष्ट्रपति शासन को और छह महीने बढ़ाने और आतंकवाद समाप्त होने तक अभियान जारी रखने की बात दर्ज करती है। Ministry of Home Affairs
35. लेकिन 1987 आतंकवाद का चरम नहीं था
1,333 मौतें भयावह थीं।
फिर भी पंजाब की सबसे हिंसक अवस्था अभी आगे थी।
1988 में सरकारी आंकड़ों के अनुसार कुल मौतें 2,432 हो जाएंगी।
1990 में 4,263।
और 1991 में 5,265—पूरे उग्रवाद काल का सर्वाधिक वार्षिक आंकड़ा। SATP
इसलिए 1985–87 को आतंकवाद के चरम के बजाय दूसरे और अधिक घातक चरण की स्थापना का काल कहना अधिक सही होगा।
निष्कर्ष: शांति का अवसर कैसे सिकुड़ता गया
1985 की शुरुआत और 1987 के अंत को साथ रखें तो पंजाब की दिशा में असाधारण परिवर्तन दिखाई देता है।
जुलाई 1985 में केंद्र और अकाली दल समझौता कर रहे थे।
अगस्त में समझौते के प्रमुख सिख हस्ताक्षरकर्ता की हत्या हो गई। The Indian Express
सितंबर में लोकतांत्रिक सरकार बनी।
जनवरी 1986 में उग्रवादी पंथक नेतृत्व फिर स्वर्ण मंदिर परिसर में संगठित हुआ।
अप्रैल में खालिस्तान की घोषणा की गई और बरनाला सरकार ने स्वयं सुरक्षा बल भेजे। The Indian Express
इसके बाद अकाली दल टूटता गया।
आतंकवादी मौतें तेजी से बढ़ीं।
और 11 मई 1987 को निर्वाचित सरकार हटाकर पंजाब फिर राष्ट्रपति शासन में चला गया। Indian Kanoon
इस दौर का सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक निष्कर्ष यह है कि ऑपरेशन ब्लू स्टार से भिंडरांवाले-केंद्रित उग्रवाद समाप्त हुआ था, पंजाब का आतंकवाद नहीं।
1986–87 में नया आतंकवाद अधिक बिखरा हुआ, अधिक हिंसक और कम केंद्रीकृत था।
अब कोई एक नेता नहीं था जिसे पकड़कर अथवा मारकर संकट समाप्त किया जा सके।
अलग-अलग आतंकवादी संगठन अपने कमांडर, हथियार, धन और क्षेत्रीय नेटवर्क बना रहे थे।
और सामान्य नागरिक सबसे अधिक मारे जा रहे थे।
राजीव–लोंगोवाल समझौता इस प्रक्रिया को उलटने का शायद सबसे महत्वपूर्ण शुरुआती राजनीतिक प्रयास था। उसकी कुछ धाराओं पर काम हुआ, लेकिन प्रमुख विवाद अटके रहे। लोंगोवाल की हत्या ने उसके सबसे प्रभावशाली पंथक समर्थक को समाप्त कर दिया। और बरनाला सरकार के पतन तक राजनीतिक समाधान की जगह फिर सुरक्षा-केंद्रित व्यवस्था ने ले ली।
अब अगला चरण उस व्यवस्था की पहली बड़ी परीक्षा था।