1984 की शुरुआत: स्वर्ण मंदिर की किलेबंदी, शाबेग सिंह की रणनीति और ऑपरेशन ब्लू स्टार की ओर बढ़ते कदम
1984 की शुरुआत तक पंजाब संकट उस अवस्था में पहुंच चुका था जहां राजनीतिक आंदोलन, धार्मिक प्रतिष्ठान, हथियारबंद उग्रवाद और केंद्र सरकार की सुरक्षा रणनीति एक-दूसरे में उलझ चुके थे। अक्टूबर 1983 से पंजाब राष्ट्रपति शासन में था। जरनैल सिंह भिंडरांवाले दिसंबर में गुरु नानक निवास से अकाल तख्त की इमारत में जा चुके थे। धर्म युद्ध मोर्चा समाप्त नहीं हुआ था और अकाली नेतृत्व अब भी केंद्र से राजनीतिक समझौता चाहता था। लेकिन इसके समानांतर हत्याएं, हथियारों की आवाजाही और पुलिस तथा अन्य सरकारी लक्ष्यों पर हमले बढ़ रहे थे।
जनवरी से मई 1984 के केवल पांच महीनों में पंजाब की परिस्थितियां जिस गति से बिगड़ीं, उसने जून में हुई सैन्य कार्रवाई की जमीन तैयार की।
यहां एक बुनियादी सावधानी आवश्यक है।
भारत सरकार के जुलाई 1984 के श्वेतपत्र ने इस अवधि को ऐसे प्रस्तुत किया जैसे स्वर्ण मंदिर परिसर लगातार एक योजनाबद्ध आतंकवादी मुख्यालय में बदल रहा था और सैन्य कार्रवाई अंततः अपरिहार्य हो गई थी। श्वेतपत्र घटनाओं, हत्याओं, हथियार बरामदगी और परिसर की किलेबंदी की महत्वपूर्ण जानकारी देता है, लेकिन वह स्वयं ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद सरकार द्वारा प्रकाशित अपनी कार्रवाई के औचित्य का दस्तावेज था। इसलिए उसके दावों को स्वतंत्र पत्रकारिता, सैन्य संस्मरणों और अन्य स्रोतों के साथ पढ़ना जरूरी है।
इसी प्रकार दूसरी ओर यह मान लेना भी तथ्यसम्मत नहीं होगा कि मई 1984 तक स्वर्ण मंदिर परिसर में केवल सामान्य धार्मिक गतिविधियां चल रही थीं और सैन्य तैयारी का कोई प्रमाण नहीं था। स्वतंत्र पत्रकारों और बाद के सैन्य विवरणों में अकाल तख्त तथा आसपास की इमारतों में तैयार किए गए फायरिंग स्थानों, हथियारबंद लोगों और मेजर जनरल शाबेग सिंह द्वारा व्यवस्थित रक्षा-तैयारियों का पर्याप्त उल्लेख मिलता है।
1984 की त्रासदी समझने के लिए इन दोनों तथ्यों को साथ रखना होगा।
1. जनवरी 1984: पंजाब अभी पूर्ण युद्ध क्षेत्र नहीं था
नए वर्ष की शुरुआत में पंजाब सामान्य अर्थों में गृहयुद्धग्रस्त प्रदेश नहीं था।
सरकारी कार्यालय काम कर रहे थे।
ट्रेनें चल रही थीं।
खेती-बाड़ी जारी थी।
बाजार खुले थे।
अकाली दल राजनीतिक आंदोलन चला रहा था।
लेकिन समानांतर रूप से हिंसा का स्तर बढ़ चुका था।
1983 में डीआईजी ए.एस. अटवाल की हत्या और हिंदू बस यात्रियों की चुनकर हत्या जैसी घटनाएं हो चुकी थीं। राष्ट्रपति शासन लागू हो चुका था और सुरक्षा बलों की संख्या बढ़ाई जा रही थी।
अब पंजाब की सबसे बड़ी समस्या यह थी कि राजनीतिक संकट का समाधान नहीं निकला था जबकि हथियारबंद उग्रवादी गतिविधि लगातार अधिक संगठित होती जा रही थी।
इसका सबसे संवेदनशील केंद्र था—
अमृतसर का स्वर्ण मंदिर परिसर।
2. दिसंबर 1983 के स्थानांतरण का महत्व
15 दिसंबर 1983 के आसपास भिंडरांवाले गुरु नानक निवास से अकाल तख्त की इमारत में स्थानांतरित हुए थे। सरकारी श्वेतपत्र इस स्थानांतरण को 15 दिसंबर की घटना के रूप में दर्ज करता है।
गुरु नानक निवास एसजीपीसी का आवासीय परिसर था।
अकाल तख्त उससे बिल्कुल अलग धार्मिक और राजनीतिक महत्व रखता था।
सिख इतिहास में अकाल तख्त केवल इमारत नहीं बल्कि पंथ के लौकिक अधिकार और सामुदायिक निर्णय का सर्वोच्च प्रतीक है।
इसलिए भिंडरांवाले का वहां रहना उनकी सुरक्षा के साथ-साथ प्रतीकात्मक शक्ति भी बढ़ाता था।
अब उन्हें गिरफ्तार करने की किसी भी कार्रवाई में यह जोखिम था कि पुलिस को अकाल तख्त की दिशा में जाना पड़े।
यह परिवर्तन 1984 के संकट की केंद्रीय समस्या बन गया।
3. क्या उस समय अकाल तख्त ‘किला’ बन चुका था?
जनवरी 1984 में ही उसे पूर्ण विकसित सैन्य किला कहना अतिशयोक्ति होगी।
रक्षा-व्यवस्था धीरे-धीरे विकसित हुई।
इस संदर्भ में पूर्व भारतीय सेना कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा का बाद का विवरण विशेष महत्व रखता है।
अरोड़ा ने दिसंबर 1983 में परिसर का दौरा किया था और कहा कि उस समय उन्हें व्यापक सैन्य किलेबंदी दिखाई नहीं दी। 24 फरवरी 1984 के अपने अगले दौरे में उन्होंने कुछ स्थानों पर रेत की बोरियां देखीं, लेकिन उन्हें भी तत्काल बहुत मजबूत रक्षा-व्यवस्था नहीं माना। बाद में उनका आकलन था कि मार्च से जून के बीच किलेबंदी तेजी से विकसित हुई, और उसमें शाबेग सिंह का सैन्य अनुभव निर्णायक था।
यह विवरण अत्यंत महत्वपूर्ण है।
इससे स्पष्ट होता है कि परिसर की पेशेवर सैन्य तैयारी कोई वर्षों पुरानी स्थिर व्यवस्था नहीं थी।
उसका सबसे गंभीर विकास ऑपरेशन ब्लू स्टार से ठीक पहले के महीनों में हुआ।
4. शाबेग सिंह कौन थे?
इस पूरी कहानी में मेजर जनरल शाबेग सिंह की भूमिका अक्सर भिंडरांवाले से कम चर्चा में आती है, लेकिन सैन्य दृष्टि से वह अत्यंत महत्वपूर्ण व्यक्ति थे।
वे भारतीय सेना में मेजर जनरल के पद तक पहुंचे थे।
1971 के बांग्लादेश युद्ध के दौरान पूर्वी पाकिस्तान में मुक्ति वाहिनी के प्रशिक्षण और संगठन में उनकी भूमिका व्यापक रूप से दर्ज है। बाद में स्वयं शाबेग सिंह ने मई 1984 के एक साक्षात्कार में मुक्ति वाहिनी से अपने संबंध पर विस्तार देने से यह कहते हुए परहेज किया था कि उससे जुड़ी कई बातें गोपनीय थीं।
उनका सैन्य अनुभव सामान्य अधिकारी से कहीं अधिक व्यापक था।
गुरिल्ला युद्ध,
छोटे समूहों की लड़ाई,
किलेबंदी,
छद्म और असामान्य युद्ध
तथा कम संसाधनों से शक्तिशाली सेना का मुकाबला करने की रणनीति—
इन क्षेत्रों का उनका अनुभव आगे स्वर्ण मंदिर परिसर की रक्षा में महत्वपूर्ण साबित हुआ।
5. सेना से शाबेग सिंह का विवादित निष्कासन
शाबेग सिंह की सेना से विदाई सामान्य सेवानिवृत्ति नहीं थी।
उन पर भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के आरोप लगे और उन्हें सेवानिवृत्ति से ठीक पहले सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।
इस कार्रवाई को लेकर उनका भारत सरकार और सेना के वरिष्ठ तंत्र के प्रति गहरा असंतोष था।
शाबेग सिंह स्वयं दावा करते थे कि उनके साथ अन्याय हुआ। मई 1984 में दिए गए साक्षात्कार में उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें निशाना बनाया गया और उन्होंने इसे सिख अधिकारियों के साथ भेदभाव की व्यापक भावना से जोड़ा। यह उनका अपना पक्ष था, न कि किसी न्यायिक आयोग का स्थापित निष्कर्ष।
बाद के स्रोत उनके विरुद्ध मामलों और कुछ मामलों में मिली राहत को लेकर अलग-अलग विवरण देते हैं।
लेकिन राजनीतिक दृष्टि से निर्णायक तथ्य यह था—
भारतीय सेना का एक अत्यंत अनुभवी पूर्व मेजर जनरल अब भिंडरांवाले के शिविर में था।
6. धार्मिक आंदोलन को सैन्य विशेषज्ञ मिल गया
भिंडरांवाले के पास लोकप्रियता थी।
हथियारबंद समर्थक थे।
धार्मिक प्रभाव था।
लेकिन पेशेवर सैन्य अनुभव नहीं था।
शाबेग सिंह ने यह कमी पूरी की।
बाद में भारतीय सेना के अधिकारियों ने स्वीकार किया कि परिसर की रक्षा सामान्य हथियारबंद भीड़ की व्यवस्था नहीं थी।
उसके पीछे पेशेवर सैनिक सोच दिखाई देती थी।
इंडियन एक्सप्रेस के ऐतिहासिक पुनरावलोकन में वर्णित है कि शाबेग सिंह ने ऐसी रक्षात्मक व्यवस्था तैयार की जिसमें प्रवेश करने वाली टुकड़ियों पर विभिन्न दिशाओं से स्वतः हथियारों की क्रॉस-फायर हो सकती थी। सैनिक सीढ़ियों और खुले मार्गों की ओर बढ़ें तो छिपे हुए फायरिंग स्थान उन्हें रोक सकें।
यही व्यवस्था जून में भारतीय सेना को अपेक्षा से कहीं अधिक नुकसान पहुंचाने वाली थी।
7. किलेबंदी का मूल सैन्य सिद्धांत
स्वर्ण मंदिर परिसर का भूगोल रक्षकों को कुछ प्राकृतिक लाभ देता था।
संकरी गलियां।
बहुमंजिला इमारतें।
छतें।
अकाल तख्त और हरमंदिर साहिब के बीच खुला परिक्रमा क्षेत्र।
ऊंची बुर्जनुमा संरचनाएं।
आसपास की इमारतें।
यदि इनका सैन्य उपयोग किया जाए तो बाहर से आने वाली सेना को बहुत सीमित मार्गों से प्रवेश करना पड़ता।
शाबेग सिंह जैसे अधिकारी के लिए यह आदर्श रक्षात्मक भूगोल था।
ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार परिसर और आसपास की कुछ इमारतों को परस्पर सहयोगी फायरिंग पोजीशन में विकसित किया गया। कई स्थानों के बीच वायरलेस संपर्क भी बताया गया।
मूल रणनीति संभवतः शत्रु को पूर्णतः हराना नहीं थी।
एक छोटी सशस्त्र शक्ति भारतीय सेना को खुले युद्ध में नष्ट नहीं कर सकती थी।
रणनीतिक लक्ष्य अधिक यथार्थवादी हो सकता था—
आक्रमण को देर तक रोकना, अधिकतम राजनीतिक और सैन्य कीमत बढ़ाना, और इस बीच पंजाब के गांवों में प्रतिक्रिया पैदा करना।
8. परिसर से बाहर भी चौकियां
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि रक्षात्मक व्यवस्था केवल अकाल तख्त की चारदीवारी तक सीमित नहीं थी।
मार्क टली और सतीश जैकब के आधार पर प्रकाशित विवरणों में स्वर्ण मंदिर के आसपास की कई इमारतों पर हथियारबंद चौकियों का उल्लेख है।
इनमें—
टेंपल व्यू होटल,
ब्रह्म बूटा अखाड़ा,
कुछ ऊंची बुर्जनुमा इमारतें,
पानी की टंकी
और आसपास के कुछ निजी मकान शामिल थे।
बताया गया कि कुछ बाहरी स्थान शाबेग सिंह के कमांड केंद्र से वायरलेस संपर्क में थे।
इसका सैन्य अर्थ गंभीर था।
यदि सेना केवल धार्मिक परिसर को घेरती, तब भी बाहर की ऊंची इमारतों से उसके प्रवेश मार्गों पर गोली चलाई जा सकती थी।
9. आधुनिक हथियारों की बढ़ती उपस्थिति
सिख परंपरा में शस्त्र धारण का धार्मिक महत्व है।
इसलिए किसी कृपाण अथवा परंपरागत हथियार को सैन्यीकरण का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
1984 में चिंता अलग चीज को लेकर थी—
स्टेनगन,
स्वचालित राइफल,
हल्की मशीनगन,
हैंड ग्रेनेड,
गोला-बारूद
और प्रशिक्षित हथियारबंद लोगों की संख्या।
11 मई 1984 को सुरक्षा बलों ने एक “कार सेवा” ट्रक की तलाशी में स्टेनगन तथा हथियार और गोला-बारूद बरामद करने का दावा किया। सरकारी श्वेतपत्र के अनुसार वाहन भिंडरांवाले के नाम पर पंजीकृत था। यह सरकारी दावा है और उस समय की प्रशासनिक व्याख्या के रूप में दर्ज किया जाना चाहिए।
उस समय तक हथियारों की आवाजाही केंद्र सरकार की सुरक्षा चिंता का प्रमुख आधार बन चुकी थी।
10. जनवरी–फरवरी: तनाव केवल परिसर तक सीमित नहीं
स्वर्ण मंदिर की किलेबंदी के साथ पूरे पंजाब में हिंसा जारी थी।
पुलिस चौकियां,
निरंकारी,
सरकारी अधिकारी,
पत्रकार,
राजनीतिक कार्यकर्ता
और नागरिक—
विभिन्न हमलों के निशाने बन रहे थे।
एक तरफ सुरक्षा बलों की मौजूदगी बढ़ रही थी, दूसरी ओर धार्मिक परिसर के आसपास पुलिस की कार्रवाई अत्यंत सावधानी से होती थी।
इस विरोधाभास ने एक असामान्य स्थिति पैदा की—
राज्य पंजाब के बाकी हिस्सों में अधिक कठोर हो रहा था लेकिन स्वर्ण मंदिर के भीतर उसके कदम सीमित थे।
यही परिस्थिति परिसर को हथियारबंद समूहों के लिए रणनीतिक रूप से अधिक मूल्यवान बनाती गई।
11. फरवरी में सुरक्षा बल और मंदिर परिसर के बीच गोलीबारी
फरवरी 1984 तक परिस्थितियां इतनी तनावपूर्ण हो गईं कि स्वर्ण मंदिर परिसर और आसपास तैनात सुरक्षा बलों के बीच गोलीबारी की घटनाएं भी हुईं।
बाद के विवरणों के अनुसार 14 फरवरी को मंदिर के प्रवेश के पास एक पुलिस चौकी पर हमला हुआ और सुरक्षा बलों तथा हथियारबंद लोगों के बीच गोलीबारी हुई।
कुछ सिख स्रोतों में इस दौर की सीआरपीएफ कार्रवाई को धार्मिक परिसर पर हमला बताया गया, जबकि सरकारी पक्ष इसे परिसर से चल रही गोलीबारी की प्रतिक्रिया मानता था।
यह घटना महत्वपूर्ण इसलिए थी क्योंकि इसके बाद रक्षात्मक तैयारियों को और मजबूत करने के लिए सुरक्षा का तर्क दिया गया।
12. इसी समय हरियाणा में सांप्रदायिक तनाव
फरवरी 1984 में पंजाब के बाहर हरियाणा में भी हिंदू-सिख तनाव और हिंसा की घटनाएं हुईं।
इन घटनाओं ने पंजाब में यह धारणा बढ़ाई कि संकट केवल राज्य की सीमाओं तक सीमित नहीं है।
भिंडरांवाले जैसे नेताओं ने ऐसी घटनाओं को सिख समुदाय पर व्यापक खतरे के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया।
इस प्रकार हर नई हिंसक घटना अगली प्रतिक्रिया का राजनीतिक आधार बनने लगी।
यही दुष्चक्र 1984 की सबसे बड़ी समस्या था।
13. अकाली नेतृत्व अब कहां खड़ा था?
हरचंद सिंह लोंगोवाल अभी भी धर्म युद्ध मोर्चे के औपचारिक नेता थे।
उनका उद्देश्य राजनीतिक समझौता था।
गुरचरण सिंह टोहड़ा एसजीपीसी में प्रभावशाली थे।
प्रकाश सिंह बादल और सुरजीत सिंह बरनाला भी महत्वपूर्ण वार्ताकार थे।
लेकिन आंदोलन के भीतर शक्ति-संतुलन बदल चुका था।
अकाली नेतृत्व के पास संगठन था।
भिंडरांवाले के पास बढ़ती सशस्त्र और भावनात्मक शक्ति।
यह स्थिति दो स्तरों पर खतरनाक थी।
यदि अकाली नेतृत्व केंद्र से समझौता करता तो भिंडरांवाले उसे “कमजोर समझौता” कहकर चुनौती दे सकते थे।
और यदि वह समझौता नहीं करता तो हिंसा जारी रहने से उसका अपना नियंत्रण और कम होता।
14. क्या लोंगोवाल और भिंडरांवाले एक ही राजनीतिक कार्यक्रम पर थे?
नहीं।
दोनों के बीच कई साझा मुद्दे थे, विशेषतः सिख राजनीतिक अधिकार और केंद्र की नीतियों की आलोचना।
लेकिन रणनीति और अंतिम उद्देश्य समान नहीं थे।
लोंगोवाल संवैधानिक वार्ता के माध्यम से समाधान खोज रहे थे।
भिंडरांवाले अधिक कठोर भाषा बोलते थे और हथियारबंद समर्थकों से घिरे थे।
सरकार के श्वेतपत्र में मई 1984 तक दोनों समूहों के बीच परिसर के भीतर गंभीर तनाव और यहां तक कि टकराव की संभावना का उल्लेख मिलता है। श्वेतपत्र के अनुसार धार्मिक प्रमुखों ने मई में दोनों पक्षों के बीच समझौता कराने की कोशिश की।
चूंकि यह सरकारी स्रोत है, इसलिए उसमें प्रयुक्त प्रत्येक आरोप को स्वतंत्र प्रमाण नहीं माना जा सकता। लेकिन अकाली और भिंडरांवाला समूहों के बीच तनाव अन्य संस्मरणों में भी मिलता है।
15. हिंसा का बढ़ता ग्राफ
1984 की पहली छमाही में हत्याओं की रफ्तार बढ़ी।
बाद के संकलनों के अनुसार 1 जनवरी से 3 जून के बीच पंजाब में हिंसक घटनाओं में लगभग 298 लोग मारे गए। यह संख्या विभिन्न स्रोतों में थोड़ी भिन्न मिलती है, लेकिन इस बात पर सहमति है कि 1984 के पहले पांच महीनों में 1983 की तुलना में हिंसा बहुत तेजी से बढ़ी।
यह परिवर्तन केवल संख्या का नहीं था।
हिंसा अब अधिक विविध थी—
लक्षित हत्या,
गोलीबारी,
बम विस्फोट,
रेलवे पर हमले,
पुलिस पर हमला,
व्यापारियों और सरकारी कर्मचारियों पर हमला,
और सामुदायिक पहचान के आधार पर हत्या।
इससे सामान्य नागरिक के लिए खतरे की प्रकृति बदल गई।
16. अप्रैल 1984: सुरिंदर सिंह सोढ़ी की हत्या
14 अप्रैल 1984 को भिंडरांवाले के निकट सहयोगी सुरिंदर सिंह सोढ़ी की स्वर्ण मंदिर के बाहर एक चाय की दुकान पर गोली मारकर हत्या कर दी गई।
सोढ़ी उनके अत्यंत भरोसेमंद हथियारबंद समर्थकों में माना जाता था।
इसके बाद तेजी से प्रतिशोधात्मक हिंसा हुई।
15 अप्रैल को चाय की दुकान के मालिक जसजीत सिंह की हत्या हुई। अन्य संदिग्ध व्यक्तियों के भी मारे जाने की घटनाएं दर्ज हैं। अगले दिन सोढ़ी हत्या के संदिग्ध हमलावरों से जुड़े दो शव मिलने की खबर सामने आई।
इन घटनाओं ने एक और चिंताजनक प्रश्न उठाया—
क्या परिसर के भीतर अथवा उसके आसपास आरोपियों के विरुद्ध समानांतर न्याय चल रहा था?
17. ‘समानांतर न्याय’ का आरोप
भारत सरकार ने बाद में आरोप लगाया कि भिंडरांवाले अपने पास आने वाले जमीन, व्यापार और व्यक्तिगत विवादों तक में फैसला देने लगे थे। श्वेतपत्र में मई 1984 के संदर्भ में यह दावा किया गया कि उनके प्रभाव में कुछ विवाद औपचारिक अदालत के बाहर तय किए जा रहे थे।
सरकारी आरोपों को स्वतः न्यायिक तथ्य नहीं माना जाना चाहिए।
लेकिन इस प्रकार की खबरें उस समय व्यापक थीं कि लोग अपने विवाद लेकर भी भिंडरांवाले के पास पहुंचने लगे थे।
यदि ऐसा होता है तो यह किसी उग्रवादी नेतृत्व की शक्ति का महत्वपूर्ण चरण होता है—
जब वह केवल सरकार का विरोध नहीं करता बल्कि स्वयं वैकल्पिक प्राधिकार की भूमिका ग्रहण करने लगता है।
18. अप्रैल–मई: प्रेस भी लक्ष्य पर
1978 से पंजाब की कट्टर राजनीति और हिंद समाचार समूह के बीच तीखा संघर्ष था।
1981 में समूह के संस्थापक लाला जगत नारायण की हत्या हो चुकी थी।
अब उनके पुत्र और समूह के संपादक रमेश चंदर प्रमुख आलोचक थे।
12 मई 1984 को जालंधर में रमेश चंदर की गोली मारकर हत्या कर दी गई। उनके दो सुरक्षा कर्मी घायल हुए। सरकारी समयरेखा इसे 12 मई की घटना के रूप में दर्ज करती है।
वॉशिंगटन पोस्ट की उसी दिन की रिपोर्ट ने हत्या को पंजाब में आतंकवादी हिंसा की बड़ी घटना बताया और उसके बाद जालंधर में विरोध तथा आगजनी की सूचना दी।
19. एक ही परिवार के दो संपादक मारे गए
रमेश चंदर की हत्या का प्रतीकात्मक महत्व बहुत बड़ा था।
उनके पिता लाला जगत नारायण सितंबर 1981 में मारे गए थे।
अब लगभग ढाई वर्ष बाद पुत्र भी मारा गया।
हिंद समाचार समूह लगातार भिंडरांवाले और उग्रवाद की आलोचना करता रहा था।
इसलिए अखबार समूह के समर्थकों में यह धारणा बनी कि पत्रकारिता को बंदूक के बल पर चुप कराने की कोशिश हो रही है।
आगे पत्रकारों, वितरकों और समाचारपत्र एजेंटों पर भी हमले हुए।
आतंकवादी रणनीति में मीडिया को निशाना बनाना बहुत प्रभावी साधन होता है—
क्योंकि एक पत्रकार की हत्या सौ अन्य लोगों की भाषा बदल सकती है।
20. रमेश चंदर हत्या के बाद सांप्रदायिक तनाव
उनकी हत्या के बाद जालंधर और अन्य स्थानों पर हिंदू समुदाय में भारी आक्रोश हुआ।
वॉशिंगटन पोस्ट ने जालंधर में आगजनी और हिंसा की खबर दी।
यह आतंकवादी हिंसा के सबसे बड़े खतरों में से एक था—
एक पक्ष की लक्षित हत्या दूसरे समुदाय की सामूहिक प्रतिक्रिया पैदा कर सकती थी।
यदि यह सिलसिला पूरी तरह भड़क जाता, तो पंजाब आतंकवाद से आगे बढ़कर व्यापक हिंदू-सिख सांप्रदायिक संघर्ष में प्रवेश कर सकता था।
1984 के मई तक केंद्र की सबसे बड़ी चिंताओं में यह भी शामिल था।
21. 11 मई की हथियार बरामदगी का सरकारी दावा
रमेश चंदर की हत्या से एक दिन पहले 11 मई को सुरक्षा बलों ने एक कार सेवा ट्रक की जांच की।
सरकार के अनुसार ट्रक से स्टेनगन तथा अन्य हथियार और गोला-बारूद मिला और वाहन भिंडरांवाले के नाम पर दर्ज था।
यह घटना सरकारी श्वेतपत्र में इसलिए प्रमुखता से रखी गई क्योंकि केंद्र यह दिखाना चाहता था कि धार्मिक और सेवा-संबंधी वाहनों का उपयोग हथियार पहुंचाने के लिए हो रहा था।
इस आरोप पर तत्कालीन उग्रवादी पक्ष की व्याख्या अलग थी।
फिर भी मई तक यह निर्विवाद है कि परिसर में आधुनिक हथियारों की पर्याप्त मौजूदगी थी—जून की लड़ाई में उनका प्रयोग स्वयं इसकी पुष्टि करने वाला था।
22. स्वर्ण मंदिर के आसपास मकानों का रणनीतिक उपयोग
सरकार के अनुसार मई के अंत तक हथियारबंद लोगों ने स्वर्ण मंदिर के आसपास कुछ निजी मकानों में भी स्थान लेना शुरू कर दिया था ताकि बाहरी सुरक्षा बलों की गतिविधि पर नजर रखी जा सके।
स्वतंत्र सैन्य विवरण भी इस व्यापक बाहरी सुरक्षा घेरा संरचना की पुष्टि करते हैं।
टेंपल व्यू होटल और ब्रह्म बूटा अखाड़ा जैसे स्थान अत्यंत उपयोगी थे क्योंकि वहां से स्वर्ण मंदिर की ओर आने वाले मार्ग साफ दिखाई देते थे।
इससे स्पष्ट है कि मई 1984 तक रक्षा की योजना केवल “अकाल तख्त में बैठकर मुकाबला” करने की नहीं थी।
यह एक बहुस्तरीय परिधि-रक्षा बन रही थी।
23. शाबेग सिंह ने रक्षा कैसे व्यवस्थित की?
जून की लड़ाई से जो संरचना सामने आई, उसके आधार पर शाबेग सिंह की योजना के कुछ मूल तत्व पहचाने जा सकते हैं।
पहला—
मुख्य प्रवेश मार्गों को पहले से लक्षित करना।
दूसरा—
ऊंची जगहों से नीचे आने वाले सैनिकों पर फायर करना।
तीसरा—
अकाल तख्त के आसपास ऐसी स्थिति बनाना कि खुला परिक्रमा क्षेत्र सैनिकों के लिए अत्यंत खतरनाक हो।
चौथा—
सीढ़ियों, गलियारों और इमारतों के कोनों पर छिपे फायरिंग स्थान।
पांचवां—
एक स्थान गिर जाने पर दूसरे स्थान से रक्षा जारी रखना।
इंडियन एक्सप्रेस के सैन्य पुनरावलोकन में वर्णन है कि बाद में भारतीय सैनिकों ने कुछ सीढ़ियों के पास मैनहोल से अचानक फायरिंग का सामना किया।
यह सामान्य भीड़ की आकस्मिक रक्षा नहीं थी।
इसके पीछे सैन्य योजना थी।
24. लेकिन कितनी बड़ी ‘सेना’ अंदर थी?
इस बिंदु पर स्रोतों में भारी अंतर है।
सरकारी आंकड़े,
पत्रकारों के अनुमान,
सेना के बाद के विवरण
और सिख संगठनों के आंकड़े—
सभी अलग संख्या बताते हैं।
इसलिए ऑपरेशन से पहले परिसर में मौजूद कुल हथियारबंद लोगों की कोई निर्विवाद संख्या देना कठिन है।
कुछ सौ सक्रिय हथियारबंद लड़ाकों का अनुमान अधिकतर विवरणों में मिलता है, लेकिन परिसर में उनके अलावा—
अकाली कार्यकर्ता,
तीर्थयात्री,
एसजीपीसी कर्मचारी,
ग्रंथी,
महिलाएं,
बच्चे
और अन्य श्रद्धालु भी थे।
यही तथ्य बाद में ऑपरेशन की नागरिक मृत्यु संख्या को लेकर भारी विवाद का कारण बनेगा।
25. बैसाखी 1984 का महत्व
अप्रैल में बैसाखी के अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु अमृतसर पहुंचे।
भिंडरांवाले का धार्मिक प्रभाव उस समय तक चरम पर था।
समर्थक उन्हें ऐसे पंथक नेता के रूप में देखते थे जो केंद्र के सामने झुकने को तैयार नहीं था।
विरोधियों के लिए वे अब हिंसक उग्रवाद के प्रमुख राजनीतिक संरक्षक थे।
एक ही व्यक्ति के बारे में ये दोनों बिल्कुल विपरीत धारणाएं पंजाब के भीतर साथ-साथ मौजूद थीं।
इस गहरे विभाजन ने सरकार के लिए कार्रवाई की सामाजिक कीमत और बढ़ा दी।
26. अप्रैल के अंत में सुब्रमण्यम स्वामी का दौरा
तत्कालीन सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने 24 से 27 अप्रैल 1984 के बीच स्वर्ण मंदिर में कई दिन बिताए और भिंडरांवाले सहित सिख नेताओं से बातचीत की।
उन्होंने बाद में लिखा कि यदि सेना मंदिर पर हमला करती है और अकाल तख्त या हरमंदिर साहिब को गंभीर क्षति होती है तो उसके दीर्घकालिक परिणाम अत्यंत विनाशकारी होंगे।
साथ ही उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि यदि सरकार जिन लोगों को अपराधी मानती है वे परिसर से आते-जाते हैं, तो आसपास मौजूद सुरक्षा एजेंसियां उन्हें बाहर रहते हुए गिरफ्तार क्यों नहीं करतीं। इस विवरण का उद्धरण बाद की मानवाधिकार रिपोर्ट में संरक्षित है।
यह प्रश्न जून की कार्रवाई पर बाद की बहस का प्रमुख हिस्सा बना—
क्या सैन्य हमले से पहले कम जोखिम वाले विकल्प पर्याप्त रूप से आजमाए गए थे?
27. क्या भिंडरांवाले को बाहर गिरफ्तार किया जा सकता था?
सिद्धांततः संभव था।
लेकिन व्यवहार में कठिनाई बढ़ चुकी थी।
वे बहुत कम बाहर निकलते थे।
जब निकलते, हथियारबंद सुरक्षा साथ होती।
उनकी गिरफ्तारी का प्रयास बड़े टकराव में बदल सकता था।
इसके अलावा सरकार को आशंका थी कि गिरफ्तारी के बाद भी परिसर के भीतर मौजूद अन्य हथियारबंद संगठन सक्रिय रहेंगे।
फिर भी इतिहासकारों और पूर्व अधिकारियों के बीच यह प्रश्न विवादित है कि क्या सरकार ने किसी सीमित गिरफ्तारी अभियान का अवसर गंवाया।
इसी संदर्भ में कथित “ऑपरेशन सनडाउन” का उल्लेख किया जाता है—एक ऐसी योजना जिसमें विशेष बलों द्वारा भिंडरांवाले को सीमित कार्रवाई में पकड़ने की संभावना पर विचार हुआ था। इसकी तैयारी और उसे रद्द किए जाने के विवरण बाद में सामने आए, लेकिन इसके सभी परिचालन पहलू सार्वजनिक दस्तावेजों से स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं हैं।
28. राजनीतिक समाधान की कोशिश अभी समाप्त नहीं हुई थी
यह तथ्य अत्यंत महत्वपूर्ण है।
मई 1984 तक इंदिरा गांधी सरकार ने अकाली नेतृत्व से बातचीत बंद नहीं की थी।
केंद्र सरकार में वरिष्ठ नेताओं को समाधान तलाशने के लिए लगाया गया।
पी.वी. नरसिंह राव,
प्रणब मुखर्जी,
पी. शिवशंकर
और प्रधानमंत्री कार्यालय के अधिकारी इस प्रक्रिया में अलग-अलग समय पर शामिल हुए।
इसलिए यह कहना गलत होगा कि सरकार जनवरी 1984 में ही सैन्य कार्रवाई का अंतिम निर्णय लेकर केवल समय काट रही थी।
सैन्य विकल्प पर विचार हो सकता था, लेकिन राजनीतिक वार्ता समानांतर रूप से जारी थी।
29. बातचीत का सबसे कठिन प्रश्न—चंडीगढ़
अधिकांश राजनीतिक वार्ताओं में फिर वही पुराना प्रश्न आ जाता—
चंडीगढ़ किसे मिले?
अकाली दल चाहता था कि चंडीगढ़ पंजाब को दिया जाए।
हरियाणा उसके बदले क्षेत्र चाहता था अथवा साझा राजधानी की व्यवस्था समाप्त करने के लिए अपनी शर्तें रखता था।
पानी का विवाद भी इसी से जुड़ा हुआ था।
इसलिए एक समझौता केवल पंजाब और केंद्र की सहमति से नहीं हो सकता था।
हरियाणा की राजनीति को भी स्वीकार्य होना आवश्यक था।
यह संघीय जटिलता बार-बार वार्ता को रोकती रही।
30. पानी पर गतिरोध
रावी-ब्यास जल विवाद एक और बड़ी बाधा था।
अकाली दल पंजाब के किसानों और रिपेरियन सिद्धांत के आधार पर अधिक अधिकार चाहता था।
केंद्र पहले से हुए समझौतों तथा हरियाणा-राजस्थान के हिस्से को ध्यान में रख रहा था।
यह विषय केवल धार्मिक भावनाओं से हल नहीं हो सकता था।
इसमें—
नहरें,
कृषि अर्थव्यवस्था,
राज्य अधिकार,
ट्रिब्यूनल,
और पड़ोसी राज्यों के हित
जुड़े हुए थे।
इसलिए जिन मुद्दों पर तत्काल धार्मिक समझौता संभव था, उनसे कहीं अधिक कठिन राजनीतिक प्रश्न अंत तक बने रहे।
31. मई 1984 में हिंसा का विस्फोट
सरकारी श्वेतपत्र मई को अत्यंत हिंसक महीने के रूप में दर्ज करता है।
12 मई को रमेश चंदर की हत्या के अगले दो ही दिनों की समयरेखा में सुरक्षा बलों, गृह रक्षक, धार्मिक व्यक्तियों और सामान्य नागरिकों पर कई हमले दर्ज हैं।
सरकार के अनुसार कुछ दिनों में राज्य के अलग-अलग स्थानों से एक ही दिन अनेक हत्याएं आने लगी थीं।
सरकारी आकलन और राजनीतिक भाषा को अलग रखते हुए भी इतना स्पष्ट है—
मई 1984 में हिंसा की आवृत्ति बहुत तेजी से बढ़ी।
यह उस समय सरकार के निर्णय पर भारी प्रभाव डालने वाला कारक था।
32. नागरिकों में भय
हिंदू व्यापारियों और परिवारों के एक हिस्से में पंजाब छोड़ने की चर्चा बढ़ने लगी।
कुछ ऐतिहासिक विवरण बताते हैं कि अपनी धार्मिक पहचान छिपाने तक के प्रयासों की खबरें सामने आईं।
दूसरी तरफ सिख समाज में भी भय और रोष था—
पुलिस कार्रवाई,
हरियाणा में हुई हिंसा,
गिरफ्तारियां,
और संभावित सेना कार्रवाई को लेकर।
यानी दोनों प्रमुख समुदायों में एक-दूसरे से अलग प्रकार की असुरक्षा विकसित हो चुकी थी।
ऐसी परिस्थिति में छोटी घटना भी बड़े सांप्रदायिक विस्फोट का कारण बन सकती थी।
33. भिंडरांवाले का खालिस्तान पर रुख
इस चरण में भी भिंडरांवाले ने हमेशा सीधे औपचारिक शब्दों में “मैं खालिस्तान की मांग करता हूं” जैसी एकरूप राजनीतिक लाइन नहीं अपनाई।
उनके कई सार्वजनिक वक्तव्यों में यह भाव मिलता है कि यदि सरकार अलग राज्य देगी तो वह उसे अस्वीकार नहीं करेंगे।
उनके समर्थक इस बात को प्रमाण मानते हैं कि वे स्वयं स्वतंत्र राज्य की औपचारिक मांग नहीं कर रहे थे।
आलोचक कहते हैं कि उनकी पूरी राजनीति और सशस्त्र संरचना व्यवहार में अलगाववादी दिशा की ओर बढ़ रही थी।
इतिहास के लिए दोनों में अंतर रखना आवश्यक है—
घोषित राजनीतिक मांग और राजनीतिक व्यवहार की दिशा हमेशा एक ही चीज नहीं होती।
34. शाबेग सिंह का मई 1984 साक्षात्कार
ऑपरेशन से लगभग चार सप्ताह पहले शाबेग सिंह ने एक लंबा साक्षात्कार दिया।
उसमें उन्होंने सेना से अपने निष्कासन, सिखों के साथ कथित भेदभाव और पंजाब संकट पर अपना दृष्टिकोण रखा।
उनकी भाषा से स्पष्ट था कि वे अब स्वयं को केवल सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी नहीं बल्कि सिख राजनीतिक संघर्ष से जुड़े व्यक्ति के रूप में देखते थे।
सैन्य दृष्टि से और भी महत्वपूर्ण तथ्य यह था कि उन्हें भारतीय सेना की कार्यपद्धति का गहरा ज्ञान था।
वह जानते थे—
सेना किस प्रकार किसी इमारत में प्रवेश करेगी,
कमान संरचना कैसे काम करती है,
रात्रि अभियान की सीमाएं क्या होंगी,
और धार्मिक संरचनाओं को नुकसान से बचाने की बाध्यता सैनिकों की रणनीति को कैसे सीमित कर सकती है।
जून में यह अनुभव अत्यंत महंगा सिद्ध हुआ।
35. सरकार को क्या जानकारी थी?
मई तक खुफिया एजेंसियां परिसर की गतिविधियों पर लगातार नजर रख रही थीं।
सरकार को पता था कि आधुनिक हथियार मौजूद हैं।
यह भी जानकारी थी कि रक्षा-स्थान बनाए जा रहे हैं।
लेकिन हथियारों की सही संख्या,
गोला-बारूद,
रक्षकों की संख्या
और किलेबंदी की वास्तविक मजबूती—
इन सबका आकलन कितना सटीक था, यह बाद की कार्रवाई से विवादित हो गया।
भारतीय सेना ने जून की पहली रात जिस तीव्र प्रतिरोध का सामना किया, उससे संकेत मिलता है कि कम-से-कम कुछ परिचालन स्तरों पर प्रतिरोध क्षमता को कम आंका गया था। इंडियन एक्सप्रेस के सैन्य पुनरावलोकन में भी यही बात सामने आती है।
36. अकाली दल का अंतिम बड़ा दबाव—अनाज रोको
मई के तीसरे सप्ताह में हरचंद सिंह लोंगोवाल ने धर्म युद्ध मोर्चे को और तेज करने का निर्णय लिया।
23 मई के आसपास घोषणा की गई कि 3 जून 1984 से नया चरण शुरू होगा।
इसमें—
भूमि राजस्व न देना,
पानी और बिजली के बिल न देना,
और सबसे महत्वपूर्ण—
पंजाब से अनाज बाहर जाने से रोकना
शामिल था।
इसे बाद में “ग्रेन रोको” या “अनाज रोको” कार्यक्रम कहा गया। विभिन्न राजनीतिक संस्मरणों के आधार पर उपलब्ध विवरण 23 मई की घोषणा और 3 जून से प्रस्तावित कार्यक्रम की पुष्टि करते हैं।
यह सरकार के लिए नई चुनौती थी।
37. अनाज रोको इतना संवेदनशील क्यों था?
पंजाब उस समय देश की खाद्य खरीद व्यवस्था का केंद्रीय स्तंभ था।
हरित क्रांति के बाद भारतीय खाद्य निगम की केंद्रीय खरीद में पंजाब की भूमिका बहुत बड़ी थी।
यदि संगठित आंदोलन के माध्यम से अनाज राज्य से बाहर जाने से रोका जाता—
तो मामला केवल पंजाब की क्षेत्रीय राजनीति नहीं रहता।
उसका सीधा प्रभाव राष्ट्रीय खाद्य आपूर्ति और केंद्र सरकार की आर्थिक व्यवस्था पर पड़ सकता था।
प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव पी.सी. अलेक्जेंडर के बाद के विवरण में इस घोषणा को सरकार के निर्णय में अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ बताया गया है। अन्य इतिहासकारों में इस बात पर मतभेद है कि इसे वास्तव में “अंतिम कारण” कितना माना जाए, लेकिन यह स्पष्ट है कि 3 जून का घोषित कार्यक्रम केंद्र के दबाव को बहुत बढ़ा रहा था।
38. फिर भी इंदिरा गांधी ने आखिरी बातचीत की कोशिश की
लोंगोवाल की घोषणा के बाद भी सरकार ने वार्ता का एक और प्रयास किया।
26 मई 1984 के आसपास दिल्ली के वसंत विहार स्थित एक सरकारी अतिथि गृह में अकाली और केंद्रीय प्रतिनिधियों की गुप्त बैठक हुई।
अकाली पक्ष से प्रकाश सिंह बादल, गुरचरण सिंह टोहड़ा और सुरजीत सिंह बरनाला जैसे नेता शामिल हुए।
सरकार की ओर से पी.वी. नरसिंह राव, प्रणब मुखर्जी और पी. शिवशंकर सहित वरिष्ठ प्रतिनिधि बातचीत में थे। विभिन्न संस्मरणों में इस अंतिम दौर की तारीख 26 मई दर्ज है।
यह तथ्य महत्वपूर्ण है—
ऑपरेशन से लगभग एक सप्ताह पहले भी राजनीतिक समझौता खोजा जा रहा था।
39. अंतिम वार्ता क्यों विफल हुई?
फिर वही केंद्रीय प्रश्न सामने आए—
चंडीगढ़,
हरियाणा को बदले में दिए जाने वाले क्षेत्र,
और नदी जल।
सरकार चाहती थी कि यदि चंडीगढ़ पंजाब को दिया जाए तो हरियाणा को कुछ क्षेत्रीय समायोजन मिले।
अकाली नेतृत्व ऐसी रियायत देने की राजनीतिक स्थिति में नहीं था।
उनका अपना आधार पहले ही भिंडरांवाले की अधिक कठोर राजनीति के दबाव में था।
यदि उन्होंने विवादित पंजाबी क्षेत्र हरियाणा को देने की स्वीकृति दी होती तो इसे अकाली आंदोलन की हार के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता था।
इस प्रकार जिस समय समझौता सबसे आवश्यक था, मुख्यधारा नेतृत्व के पास समझौता करने का राजनीतिक स्थान सबसे कम था।
40. क्या भिंडरांवाला समझौते को रोक रहा था?
इस प्रश्न का सरल उत्तर नहीं है।
सरकारी और कुछ राजनीतिक संस्मरणों में भिंडरांवाले को समझौते के रास्ते की बड़ी बाधा बताया गया।
लेकिन औपचारिक केंद्र–अकाली वार्ता के हर मुद्दे पर वह पक्षकार नहीं था।
चंडीगढ़ और नदी जल जैसे विवाद उससे बहुत पहले के थे।
इसलिए वार्ता की विफलता का पूरा दोष उसे देना तथ्यसम्मत नहीं होगा।
हालांकि यह भी सही है कि भिंडरांवाले की बढ़ती शक्ति ने अकाली नेतृत्व के लिए समझौता कठिन बनाया।
लोंगोवाल को लगातार यह देखना पड़ रहा था कि कोई रियायत उन्हें पंथक राजनीति में कमजोर न कर दे।
41. परिसर के भीतर भी तनाव
मई के अंत तक अकाली नेताओं और भिंडरांवाले समर्थकों के बीच संबंध सहज नहीं थे।
सरकारी श्वेतपत्र में दावा किया गया कि परिसर के भीतर दोनों समूहों के बीच गंभीर तनाव था और धार्मिक नेताओं ने हत्या तथा प्रतिशोध रोकने की कोशिश की।
यह उल्लेख महत्वपूर्ण है क्योंकि यह लोकप्रिय धारणा को चुनौती देता है कि जून 1984 से पहले स्वर्ण मंदिर परिसर में उपस्थित सभी राजनीतिक और हथियारबंद समूह एक ही संयुक्त कमान के तहत थे।
ऐसा नहीं था।
लोंगोवाल का समूह,
भिंडरांवाले के समर्थक,
बब्बर खालसा,
और दूसरे हथियारबंद लोग—
इनके आपसी संबंध जटिल थे।
42. क्या अकाली नेता स्वयं भिंडरांवाले को निकाल सकते थे?
यही सबसे कठिन प्रश्नों में से एक है।
सैद्धांतिक रूप से एसजीपीसी परिसर का प्रबंधन धार्मिक संस्थाओं के पास था।
व्यवहार में भिंडरांवाले के पास हथियारबंद समर्थक और बड़ी धार्मिक प्रतिष्ठा थी।
उसे बलपूर्वक हटाने का प्रयास स्वयं सिख समूहों के बीच खूनी संघर्ष में बदल सकता था।
मई 1984 तक अकाली नेतृत्व की स्थिति इतनी कमजोर हो चुकी थी कि वह न तो भिंडरांवाले को नियंत्रित कर पा रहा था और न खुलकर उससे अलग हो पा रहा था।
बाद के कुछ अकाली नेताओं ने स्वीकार किया कि स्थिति उनके नियंत्रण से बाहर जा चुकी थी।
43. ‘अलगाववाद’ और ‘आतंकवाद’ में अंतर
इस चरण में तीन शब्द अलग रखने आवश्यक हैं—
अकाली आंदोलन — संघीय और राजनीतिक मांगों वाला संवैधानिक जनांदोलन।
खालिस्तानवाद — भारत से अलग सिख राज्य की राजनीतिक अवधारणा।
आतंकवाद — राजनीतिक उद्देश्य के लिए नागरिकों और असैनिक लक्ष्यों पर हिंसा तथा भय का व्यवस्थित प्रयोग।
1984 तक इन तीनों के बीच संपर्क और ओवरलैप बढ़ चुका था, लेकिन वे एक ही चीज नहीं थे।
हजारों अकाली सत्याग्रही खालिस्तान की मांग नहीं कर रहे थे।
सभी खालिस्तान समर्थक आतंकवादी कार्रवाई में शामिल नहीं थे।
और आतंकवादी हिंसा में सक्रिय सभी समूह भिंडरांवाले की प्रत्यक्ष कमान में भी नहीं थे।
यह अंतर पूरे शोध में बनाए रखना अत्यंत जरूरी है।
44. मई के अंतिम सप्ताह में दिल्ली की सोच
मई समाप्त होते-होते केंद्र सरकार के सामने विकल्प सिकुड़ रहे थे।
राजनीतिक वार्ता विफल।
हिंसा बढ़ रही थी।
ग्रेन रोको 3 जून से शुरू होना था।
स्वर्ण मंदिर परिसर की किलेबंदी मजबूत हो रही थी।
भिंडरांवाले को सामान्य पुलिस कार्रवाई से गिरफ्तार करना अत्यंत कठिन दिख रहा था।
और खुफिया जानकारी के अनुसार आसपास की इमारतों में भी हथियारबंद चौकियां तैयार थीं।
इसी पृष्ठभूमि में सेना का विकल्प निर्णायक रूप से आगे आया।
45. क्या सैन्य कार्रवाई महीनों पहले से तय थी?
इस पर इतिहासकारों और पूर्व अधिकारियों के विवरण पूरी तरह एक जैसे नहीं हैं।
यह स्पष्ट है कि सैन्य विकल्प और सीमित कमांडो विकल्प पर सरकार पहले से विचार कर चुकी थी।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि जून 1984 में जिस स्वरूप में ऑपरेशन ब्लू स्टार हुआ, वह महीनों पहले अपरिवर्तनीय रूप से तय कर लिया गया था।
अंतिम राजनीतिक वार्ताएं मई के अंत तक जारी थीं।
दूसरी ओर सेना को किसी गंभीर कार्रवाई के लिए बिना पूर्व तैयारी अचानक नहीं लगाया जा सकता।
इसलिए अधिक यथार्थवादी निष्कर्ष है—
सरकार राजनीतिक वार्ता के साथ सैन्य विकल्प भी तैयार रख रही थी; मई के अंतिम सप्ताह में राजनीतिक विकल्प सिकुड़ने और सुरक्षा संकट बढ़ने से सैन्य योजना निर्णायक दिशा में चली गई।
46. 31 मई: मेजर जनरल कुलदीप सिंह बराड़ को बुलावा
ऑपरेशन का एक उल्लेखनीय सैन्य विवरण यह है कि मेजर जनरल कुलदीप सिंह बराड़ को 31 मई के आसपास बुलाकर अमृतसर अभियान का परिचालन दायित्व दिया गया।
वे उस समय 9 इन्फैंट्री डिवीजन से जुड़े थे।
बराड़ स्वयं सिख थे और संयोग से शाबेग सिंह को सैन्य प्रशिक्षण के समय से जानते थे। बाद के विवरणों के अनुसार वे भारतीय सैन्य अकादमी में उनसे प्रशिक्षण पा चुके थे।
इस प्रकार जून में एक असाधारण सैन्य स्थिति बनने जा रही थी—
एक ओर भारतीय सेना का सिख मेजर जनरल,
दूसरी ओर भारतीय सेना का पूर्व सिख मेजर जनरल।
दोनों एक-दूसरे की सैन्य परंपरा और प्रशिक्षण प्रणाली से परिचित थे।
47. भारतीय सेना की मूल कठिनाई
किसी सामान्य सैन्य ठिकाने पर हमला और स्वर्ण मंदिर परिसर में कार्रवाई पूरी तरह अलग चीजें थीं।
सेना को कई सीमाओं के भीतर काम करना था।
हरमंदिर साहिब को यथासंभव नुकसान न हो।
अकाल तख्त का धार्मिक महत्व ध्यान में रखा जाए।
नागरिक और तीर्थयात्री मौजूद हो सकते हैं।
मीडिया और विश्वभर के सिख समुदाय की प्रतिक्रिया होगी।
सैनिकों में स्वयं बड़ी संख्या में सिख थे।
और सामने के रक्षकों को पता था कि भारतीय सेना इन्हीं सीमाओं से बंधी होगी।
शाबेग सिंह का सबसे बड़ा रणनीतिक लाभ यही था—
वह भारतीय सेना की ताकत भी जानता था और उसकी राजनीतिक-सांस्कृतिक सीमाएं भी।
48. भिंडरांवाले की रणनीतिक गणना
भिंडरांवाले की सोच के बारे में केवल अनुमान को तथ्य नहीं बनाया जाना चाहिए।
लेकिन उसके व्यवहार से इतना स्पष्ट था कि अकाल तख्त छोड़ने का कोई संकेत नहीं था।
वह खुले रूप से गिरफ्तारी स्वीकार करने को तैयार नहीं था।
समर्थकों के पास हथियार थे।
रक्षा मजबूत की जा रही थी।
संभावित सरकारी कार्रवाई पर सार्वजनिक वक्तव्य दिए जा रहे थे।
इससे सरकार के पास एक कठिन द्वंद्व था—
यदि कार्रवाई न करे तो हथियारबंद शक्ति और मजबूत हो सकती है।
यदि कार्रवाई करे तो सिख धर्म के सबसे पवित्र परिसर में हिंसक संघर्ष का जोखिम था।
49. क्या घेराबंदी बेहतर विकल्प हो सकती थी?
ऑपरेशन ब्लू स्टार की सबसे बड़ी ऐतिहासिक बहसों में से एक यही है।
एक विकल्प था—
परिसर को घेर देना,
बिजली-पानी और आवागमन नियंत्रित करना,
हथियारबंद लोगों को बाहर आने के लिए लंबा समय देना,
और सीधे आक्रमण से बचना।
आलोचकों का तर्क है कि इससे अकाल तख्त को होने वाली भारी क्षति और बड़ी संख्या में मौतें रोकी जा सकती थीं।
सैन्य पक्ष के कुछ विवरणों में तर्क दिया गया कि लंबी घेराबंदी से पंजाब के गांवों से हजारों समर्थकों के अमृतसर पहुंचने का जोखिम था और पूरे राज्य में व्यापक विद्रोह फैल सकता था।
दोनों तर्कों को अगले अध्याय में विस्तार से जांचना होगा क्योंकि वे ऑपरेशन की आवश्यकता और अनुपातिकता के प्रश्न से जुड़े हैं।
50. 3 जून की तारीख क्यों अत्यंत संवेदनशील थी?
दो अलग कारण एक ही तारीख पर मिल रहे थे।
पहला—
लोंगोवाल का अनाज रोको आंदोलन 3 जून से शुरू होना था।
दूसरा—
गुरु अर्जन देव के शहीदी दिवस के कारण बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के स्वर्ण मंदिर पहुंचने की संभावना थी।
यही तथ्य बाद में ऑपरेशन की तारीख को लेकर सबसे गंभीर आलोचनाओं में से एक बना।
यदि उस समय बड़ी संख्या में सामान्य श्रद्धालु परिसर में मौजूद थे तो सैन्य कार्रवाई की नागरिक कीमत स्वाभाविक रूप से अधिक हो सकती थी।
इस प्रश्न का विस्तृत परीक्षण ऑपरेशन के दिन-दर-दिन अध्याय में करना आवश्यक है।
51. मई समाप्त होते-होते पंजाब में क्या स्थिति थी?
31 मई 1984 तक पंजाब में निम्न परिस्थितियां एक साथ मौजूद थीं—
एक निर्वाचित राज्य सरकार नहीं थी; राष्ट्रपति शासन चल रहा था।
धर्म युद्ध मोर्चा जारी था।
3 जून से अनाज रोको आंदोलन घोषित था।
केंद्र–अकाली वार्ता अंतिम प्रयास के बावजूद किसी स्थायी समझौते तक नहीं पहुंची थी।
रमेश चंदर जैसे प्रमुख आलोचक की हत्या हो चुकी थी।
पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बल लगातार हमलों का सामना कर रहे थे।
स्वर्ण मंदिर परिसर में हथियारबंद लोगों की संख्या और सैन्य तैयारी बढ़ चुकी थी।
शाबेग सिंह रक्षा-व्यवस्था में केंद्रीय सैन्य भूमिका निभा रहे थे।
भिंडरांवाले अकाल तख्त में थे।
और सेना अब कार्रवाई के लिए तैयार की जा रही थी।
52. क्या मई के अंत तक सैन्य कार्रवाई अपरिहार्य हो गई थी?
“अपरिहार्य” शब्द इतिहास में सावधानी से इस्तेमाल करना चाहिए।
किसी भी राजनीतिक संकट में वैकल्पिक निर्णय संभव होते हैं।
सरकार और अधिक बातचीत कर सकती थी।
लंबी घेराबंदी कर सकती थी।
सीमित पुलिस या कमांडो कार्रवाई का विकल्प तलाश सकती थी।
अकाली नेतृत्व भिंडरांवाले से अधिक स्पष्ट दूरी बना सकता था।
एसजीपीसी परिसर में हथियारों के प्रवेश को पहले रोक सकती थी।
भिंडरांवाले स्वयं अकाल तख्त छोड़ सकते थे।
इनमें से कोई घटना अलग होती तो इतिहास भी अलग हो सकता था।
इसलिए जून 1984 को नियति की तरह प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
लेकिन यह भी उतना ही स्पष्ट है कि मई के अंत तक राजनीतिक और सुरक्षा विकल्पों की लागत बहुत बढ़ चुकी थी।
समस्या जितनी देर टली, उसका शांतिपूर्ण समाधान उतना कठिन हुआ।
53. जिम्मेदारी की कई परतें
इस संकट में जिम्मेदारी किसी एक पक्ष की एक घटना तक सीमित नहीं की जा सकती।
केंद्र सरकार राजनीतिक समझौते में पर्याप्त तेजी और निरंतरता क्यों नहीं ला सकी—यह प्रश्न है।
अकाली नेतृत्व ने धार्मिक परिसर में बढ़ती हथियारबंद शक्ति के खिलाफ समय रहते स्पष्ट सीमा क्यों नहीं खींची—यह प्रश्न है।
भिंडरांवाले और दूसरे हथियारबंद समूहों ने राजनीतिक विवाद को हत्या तथा सैन्य तैयारी की दिशा में क्यों जाने दिया—यह केंद्रीय प्रश्न है।
और यदि सरकार को परिसर के सैन्यीकरण की जानकारी थी तो उसने पहले कम विनाशकारी विकल्प क्यों नहीं अपनाया—यह भी प्रश्न है।
इन प्रश्नों का उत्तर किसी एक राजनीतिक कथा से नहीं मिलता।
54. जनवरी से मई की वास्तविक समयरेखा
इस अवधि को क्रम में रखने पर संकट की तेजी स्पष्ट होती है—
जनवरी 1984 — राष्ट्रपति शासन के बीच हिंसा और धर्म युद्ध मोर्चा जारी।
फरवरी — सुरक्षा बलों और परिसर के आसपास हथियारबंद लोगों के बीच तनाव तथा गोलीबारी; रक्षा तैयारियां बढ़ने लगीं।
मार्च — शाबेग सिंह के सैन्य कौशल के प्रभाव में अधिक व्यवस्थित रक्षा संरचना बनने के संकेत; आसपास की रणनीतिक इमारतों का इस्तेमाल बढ़ा।
14 अप्रैल — भिंडरांवाले के निकट सहयोगी सुरिंदर सिंह सोढ़ी की हत्या।
15–16 अप्रैल — प्रतिशोध से जुड़ी हत्याएं और संदिग्धों के शव मिलने की घटनाएं।
24–27 अप्रैल — सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने परिसर में रहकर भिंडरांवाले और अन्य नेताओं से बातचीत की तथा संभावित सैन्य कार्रवाई के गंभीर परिणामों की चेतावनी दी।
11 मई — कार सेवा ट्रक से हथियार मिलने का सरकारी दावा।
12 मई — हिंद समाचार समूह के संपादक रमेश चंदर की हत्या।
मध्य मई — पंजाब में हिंसक घटनाओं की आवृत्ति तेजी से बढ़ी।
23 मई के आसपास — लोंगोवाल ने 3 जून से अनाज रोको सहित आंदोलन तेज करने की घोषणा की।
26 मई — केंद्र और वरिष्ठ अकाली नेताओं के बीच अंतिम महत्वपूर्ण गुप्त वार्ता; समझौता नहीं हुआ।
27 मई — हिंसा जारी; फिरोजपुर क्षेत्र में एक हिंदू राजनीतिक व्यक्ति की हत्या की घटना दर्ज।
31 मई — सेना के उच्च स्तर पर कार्रवाई की परिचालन तैयारी निर्णायक चरण में; मेजर जनरल कुलदीप सिंह बराड़ को अभियान की कमान के लिए बुलाया गया।
अब केवल कुछ दिन शेष थे।
निष्कर्ष: जून 1984 से पहले आखिरी महीनों में क्या हुआ?
1984 की पहली पांच महीनों की सबसे बड़ी कहानी केवल “स्वर्ण मंदिर में हथियार जमा हो गए” नहीं है।
और न केवल “केंद्र और अकाली दल का राजनीतिक विवाद” है।
वास्तविक कहानी दोनों प्रक्रियाओं के एक-दूसरे को प्रभावित करने की है।
राजनीतिक समझौता नहीं हुआ।
हर असफल वार्ता से मध्यमार्ग कमजोर हुआ।
मध्यमार्ग कमजोर हुआ तो भिंडरांवाले की कठोर राजनीति मजबूत दिखाई दी।
हिंसा बढ़ी तो सरकार ने सुरक्षा बल बढ़ाए।
सुरक्षा कार्रवाई बढ़ी तो सिख समाज के एक हिस्से में राज्य के प्रति अविश्वास बढ़ा।
अविश्वास बढ़ा तो स्वर्ण मंदिर परिसर में हथियारबंद नेतृत्व की धार्मिक वैधता कुछ समर्थकों की नजर में बढ़ी।
और परिसर की सैन्य शक्ति बढ़ी तो सरकार सैन्य विकल्प की ओर और तेजी से गई।
इस प्रकार एक स्वयं को मजबूत करने वाला संकट-चक्र बन चुका था।
इसमें शाबेग सिंह की भूमिका विशिष्ट थी।
उन्होंने धार्मिक-राजनीतिक उग्रवाद को पेशेवर सैन्य रक्षा की क्षमता दी।
अकाल तख्त केवल भिंडरांवाले का निवास नहीं रहा; उसके आसपास ऐसी रक्षात्मक व्यवस्था बन गई जिसने बाद में भारतीय सेना के सबसे प्रशिक्षित सैनिकों तक को गंभीर चुनौती दी।
दूसरी ओर केंद्र सरकार भी निष्क्रिय नहीं थी।
वार्ता मई के अंतिम सप्ताह तक चली।
लेकिन वह हिंसा रोकने अथवा अकाली दल के साथ स्वीकार्य राजनीतिक समझौता बनाने में सफल नहीं हुई।
मई 1984 के अंत तक पंजाब ऐसी जगह खड़ा था जहां—
सरकार के पास शक्ति थी लेकिन राजनीतिक समाधान नहीं,
अकाली दल के पास आंदोलन था लेकिन पूरा नियंत्रण नहीं,
भिंडरांवाले के पास हथियारबंद प्रभाव था लेकिन संवैधानिक जनादेश नहीं,
और स्वर्ण मंदिर परिसर के भीतर धार्मिक श्रद्धा, राजनीतिक आंदोलन और सैन्य तैयारी एक ही भौगोलिक स्थान में केंद्रित हो चुके थे।
अब वह क्षण आने वाला था जिसके परिणाम पंजाब ही नहीं, पूरे भारत की राजनीति को दशकों तक प्रभावित करेंगे।