OCN Networkओमकार चौधरी
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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
पंजाब में आतंकवाद और उसके पीछे की साज़िश · अध्याय 11

1988 का ऑपरेशन ब्लैक थंडर: स्वर्ण मंदिर से आतंकवादियों को निकालने की बदली रणनीति और ब्लू स्टार से उसका अंतर

ओमकार चौधरी / OCN Research Deskविस्तृत शोध संस्करण · 1 अक्टूबर 2026

मई 1988 में स्वर्ण मंदिर परिसर एक बार फिर हथियारबंद उग्रवादियों का आश्रयस्थल बन चुका था। लेकिन इस बार सरकार ने 1984 जैसी सैन्य कार्रवाई नहीं की। सेना और टैंकों के बजाय पंजाब पुलिस, राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड और केंद्रीय अर्धसैनिक बलों ने परिसर को घेरा, बाहर से दबाव बनाया, निशानेबाज तैनात किए और आत्मसमर्पण का रास्ता खुला रखा।

यही ऑपरेशन ब्लैक थंडर-II था।

राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड के आधिकारिक इतिहास के अनुसार कार्रवाई 10 से 19 मई 1988 तक चली; एनएसजी 11 मई की सुबह तैनात हुआ, ऊंचे स्थानों पर मौजूद हथियारबंद लोगों को निशानेबाजों ने निष्क्रिय किया, 13 मई को आत्मसमर्पण के लिए अस्थायी संघर्षविराम दिया गया और अंततः 146 उग्रवादियों ने आत्मसमर्पण किया।

ब्लैक थंडर का महत्व केवल इस बात में नहीं था कि स्वर्ण मंदिर परिसर खाली कराया गया। उसका बड़ा महत्व यह था कि उसने 1984 के ब्लू स्टार से बिल्कुल अलग आतंकवाद-विरोधी पद्धति दिखाई—धैर्यपूर्ण घेराबंदी, सीमित बल, पुलिस नेतृत्व, सार्वजनिक निगरानी और धार्मिक संरचना को अधिकतम क्षति से बचाने की कोशिश।

1. 1986 का ब्लैक थंडर-I: पृष्ठभूमि

“ब्लैक थंडर” नाम पहली बार 1986 में इस्तेमाल हुआ था।

एनएसजी के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार पहला ऑपरेशन 30 अप्रैल की रात शुरू होकर 1 मई 1986 की सुबह समाप्त हुआ। कमांडो सिर ढककर और नंगे पैर परिसर में गए; आधिकारिक विवरण के अनुसार मुख्य धार्मिक स्थल में प्रवेश नहीं किया गया, कोई सहायक क्षति नहीं हुई और 122 संदिग्धों को पकड़ा गया। एनएसजी का कोई जवान नहीं मारा गया।

लेकिन उसके दीर्घकालिक परिणाम सीमित रहे।

के.पी.एस. गिल ने बाद में इस 1986 कार्रवाई को आलोचनात्मक दृष्टि से लिखा और कहा कि महत्वपूर्ण उग्रवादी नेतृत्व पकड़ा नहीं गया तथा कुछ ही समय बाद हथियारबंद समूह फिर परिसर में लौट आए। यह गिल का अपना बाद का आकलन था, इसलिए इसे स्वतंत्र तटस्थ निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए।

1988 तक समस्या कहीं अधिक गंभीर हो चुकी थी।

2. 1988 में पंजाब कितना हिंसक हो चुका था?

1987 में पंजाब पुलिस के आंकड़ों के अनुसार आतंकवाद-संबंधी 1,333 मौतें हुई थीं। 1988 में यह संख्या बढ़कर 2,432 हो गई—

1,949 नागरिक,

110 सुरक्षा बल कर्मी,

और 373 आतंकवादी।

मार्च और अप्रैल 1988 विशेष रूप से हिंसक थे। के.पी.एस. गिल द्वारा बाद में प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार मार्च में 288 और अप्रैल में 259 लोग मारे गए, जिनमें दोनों महीनों में 25-25 पुलिसकर्मी शामिल थे।

यानी ब्लैक थंडर-II किसी शांत दौर में अचानक शुरू हुआ अभियान नहीं था। वह ऐसे समय हुआ जब पंजाब में नागरिकों, पुलिस और सरकारी लक्ष्यों पर हमले तीव्र गति से बढ़ चुके थे।

3. स्वर्ण मंदिर परिसर फिर क्यों महत्वपूर्ण बन गया?

1986 के बाद कुछ उग्रवादी समूह स्वर्ण मंदिर परिसर में फिर से प्रभाव स्थापित करने लगे।

परिसर का राजनीतिक महत्व कई कारणों से था—

धार्मिक प्रतिष्ठा,

श्रद्धालुओं की निरंतर आवाजाही,

पुलिस कार्रवाई की संवेदनशीलता,

और यह धारणा कि सरकार वहां भारी बल प्रयोग करने से हिचकेगी।

यही 1984 में भी हथियारबंद समूहों का बड़ा रणनीतिक लाभ था।

1988 तक सरकार यह मान चुकी थी कि यदि धार्मिक परिसर को फिर स्थायी सशस्त्र आश्रय बनने दिया गया, तो आतंकवादियों को प्रतीकात्मक और परिचालन—दोनों प्रकार का लाभ मिलेगा।

4. इस बार सेना क्यों नहीं?

यही 1988 और 1984 का सबसे बड़ा अंतर था।

ब्लू स्टार में भारतीय सेना ने पैदल सैनिक, कमांडो, बख्तरबंद वाहन और अंततः टैंक तक इस्तेमाल किए थे।

1988 में मुख्य नियंत्रण पंजाब पुलिस के हाथ में रहा। उसका साथ एनएसजी और केंद्रीय अर्धसैनिक बलों ने दिया। के.पी.एस. गिल कुछ सप्ताह पहले ही पंजाब के पुलिस महानिदेशक बने थे। उनके अपने बाद के विवरण में ब्लैक थंडर को पुलिस-नेतृत्व वाली कार्रवाई बताया गया है जिसमें सेना को प्रत्यक्ष हमले के लिए नहीं बुलाया गया।

इस बदलाव के पीछे 1984 का अनुभव स्पष्ट था।

सरकार ऐसी कार्रवाई चाहती थी जिसमें—

अकाल तख्त और हरमंदिर साहिब को भारी क्षति न पहुंचे,

सेना और धार्मिक स्थल का सीधा संघर्ष न हो,

नागरिक हताहत सीमित रहें,

और आतंकवादियों को आत्मसमर्पण के लिए समय मिले।

5. तत्काल कारण: पुलिस अधिकारी पर गोली

मई 1988 में परिसर के आसपास हथियारबंद उग्रवादियों की गतिविधि खुली चुनौती बन चुकी थी।

के.पी.एस. गिल के बाद के विवरण के अनुसार मंदिर से बाहर हथियारबंद लोगों ने मार्च किया था और बाहर बंकर जैसी संरचनाएं बनाई जा रही थीं। पुलिस अधिकारी एस.एस. विर्क इन संरचनाओं को हटाने की निगरानी कर रहे थे जब उन पर गोली चलाई गई और वे गंभीर रूप से घायल हुए। इसके बाद हथियारबंद लोग परिसर के भीतर चले गए।

9 मई की घटना का उल्लेख वॉशिंगटन पोस्ट की समकालीन रिपोर्ट में भी है, जिसमें एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को मंदिर के बाहर गोली लगने को उस घटनाक्रम की शुरुआत बताया गया जो दस दिन की घेराबंदी में बदल गया।

इसके बाद सरकार ने परिसर को व्यवस्थित रूप से अलग-थलग करने का निर्णय लिया।

6. रणनीति: हमला नहीं, घेराबंदी

ब्लैक थंडर-II की केंद्रीय रणनीति सरल लेकिन प्रभावी थी—

अंदर जाकर हर इमारत पर कब्जा करने के बजाय बाहर से रास्ते बंद करो और समय को हथियार बनाओ।

सुरक्षा बलों ने प्रवेश-निकास नियंत्रित किए।

ऊंचे स्थानों पर स्नाइपर तैनात किए गए।

जो हथियारबंद व्यक्ति खुले फायरिंग स्थान पर दिखाई देता, उसे निशाना बनाया जाता।

लेकिन मुख्य धार्मिक स्थल पर सीधा हमला नहीं किया गया।

एनएसजी के आधिकारिक विवरण में विशेष रूप से निशानेबाजों द्वारा ऊंची चौकियों पर मौजूद आतंकवादियों को निष्क्रिय करने और आत्मसमर्पण के लिए संघर्षविराम देने का उल्लेख है।

इस रणनीति में समय सुरक्षा बलों के पक्ष में था।

अंदर भोजन, पानी, चिकित्सा और गोला-बारूद सीमित थे।

बाहर पुलिस के पास धैर्य था।

7. हरमंदिर साहिब को ‘नो-फायर’ क्षेत्र बनाना

1984 का सबसे गहरा आघात धार्मिक संरचनाओं को हुई क्षति थी।

1988 में सुरक्षा बलों ने यह साफ रणनीतिक सीमा बनाई कि हरमंदिर साहिब पर गोली नहीं चलाई जाएगी।

समकालीन क्रिश्चियन साइंस मॉनिटर ने दर्ज किया कि लगभग 40 हथियारबंद लोग एक समय स्वर्ण-मंडित मुख्य धर्मस्थल के भीतर चले गए, लेकिन अधिकारियों ने वहां गोली चलाने या सरोवर के आसपास के पवित्र हिस्से में बलपूर्वक प्रवेश करने से परहेज किया। अंततः उन्हें बातचीत और मनोवैज्ञानिक दबाव से बाहर आने दिया गया।

यही धैर्य ब्लू स्टार से सबसे बड़ा परिचालन अंतर था।

8. मीडिया को इस बार बाहर नहीं रखा गया

1984 में मीडिया प्रतिबंध ने सरकार के आधिकारिक संस्करण और सिख प्रत्यक्षदर्शियों के बीच गहरा अविश्वास पैदा किया था।

1988 में नीति उलट दी गई।

राष्ट्रीय और विदेशी पत्रकारों को घटनाक्रम देखने की पर्याप्त स्वतंत्रता दी गई। गिल ने बाद में इसे जानबूझकर अपनाई गई रणनीति बताया—उनका तर्क था कि मीडिया की मौजूदगी से सुरक्षा बलों की कार्रवाई और परिसर के अंदर की स्थिति दोनों सार्वजनिक निगरानी में रहेंगी।

समकालीन विदेशी मीडिया पूरे घेराव के दौरान घटनास्थल से रिपोर्ट कर रहा था। वॉशिंगटन पोस्ट और UPI की दैनिक रिपोर्टें इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।

इससे सरकार को दूसरा लाभ मिला—

बाद में यह आरोप लगाना कठिन था कि परिसर के भीतर क्या हुआ, उसे पूरी तरह छिपाया गया।

9. 13 मई: आत्मसमर्पण का पहला बड़ा अवसर

एनएसजी रिकॉर्ड के अनुसार 13 मई को बीच में संघर्षविराम घोषित किया गया ताकि भीतर मौजूद लोग आत्मसमर्पण कर सकें।

15 मई तक इस रणनीति का असर स्पष्ट हो गया।

UPI की समकालीन रिपोर्ट के अनुसार एक दो घंटे के संघर्षविराम के दौरान 168 लोग परिसर से बाहर निकले। इनमें पुरुषों के अलावा सात बच्चे और 16 महिलाएं भी थीं। पुलिस ने कुछ लोगों को औपचारिक रूप से गिरफ्तार किया, कुछ को संदिग्ध के रूप में रखा और शेष को छोड़ दिया।

यह तथ्य महत्वपूर्ण है।

सुरक्षा बलों ने परिसर से निकलने वाले प्रत्येक व्यक्ति को स्वचालित रूप से आतंकवादी नहीं माना।

नागरिक और हथियारबंद व्यक्तियों के बीच पृथक्करण की कोशिश की गई।

10. 146 आत्मसमर्पण का आधिकारिक आंकड़ा क्या है?

एनएसजी की आधिकारिक ऑपरेशन हिस्ट्री ब्लैक थंडर-II में 146 उग्रवादियों के आत्मसमर्पण को अंतिम प्रमुख परिणाम के रूप में दर्ज करती है।

लेकिन समकालीन समाचार रिपोर्टों में अलग-अलग दिनों पर बाहर निकले सभी पुरुषों, महिलाओं, बच्चों, संदिग्धों और गिरफ्तार उग्रवादियों को जोड़ने से संख्या इससे बड़ी दिखाई देती है।

इसी कारण कुछ बाद के स्रोत “लगभग 200” आत्मसमर्पण लिखते हैं।

इस शोध में श्रेणी स्पष्ट रखी जाएगी—

146 — एनएसजी का आधिकारिक उग्रवादी आत्मसमर्पण आंकड़ा।

इससे अलग नागरिकों और अन्य व्यक्तियों की निकासी हुई थी।

11. अंतिम चरण: धार्मिक स्थल के भीतर चले गए हथियारबंद लोग

घेराबंदी के अंतिम चरण में कुछ हथियारबंद लोग हरमंदिर साहिब के भीतर चले गए।

यहीं 1984 और 1988 की रणनीति का सबसे साफ अंतर दिखा।

पुलिस ने वहां सीधा धावा नहीं बोला।

क्रिश्चियन साइंस मॉनिटर के अनुसार अधिकारियों ने उन्हें बाहर आने के लिए दबाव और बातचीत का रास्ता अपनाया। 18 मई को लगभग 46 अंतिम हथियारबंद लोग बाहर निकले; दो भागने की कोशिश में गोली से मारे गए और तीन ने कथित रूप से सायनाइड लेकर आत्महत्या की।

वॉशिंगटन पोस्ट ने भी 18 मई को 46 लोगों के अंतिम आत्मसमर्पण और तीन द्वारा सायनाइड लेने की सूचना दी।

मुख्य धार्मिक स्थल पर टैंक या भारी तोप चलाए बिना घेराबंदी समाप्त हुई।

12. कितने लोग मारे गए?

ब्लैक थंडर-II की मृत्यु संख्या पर स्रोतों में कुछ अंतर है।

15 मई की UPI रिपोर्ट में उस समय तक कम-से-कम 35 मौतें बताई गई थीं।

19 मई की UPI रिपोर्ट ने पूरी दस दिन की मुठभेड़ में 48 मौतें बताईं।

कुछ अन्य समकालीन रिपोर्टें लगभग 30 मौतें बताती हैं।

इसलिए किसी एक संख्या को पूरी तरह निर्विवाद नहीं कहा जा सकता।

लेकिन यह स्पष्ट है कि ब्लैक थंडर में मृत्यु और धार्मिक संरचनात्मक क्षति ब्लू स्टार की तुलना में बहुत कम थी।

एनएसजी की आधिकारिक एक-पृष्ठीय हिस्ट्री अपने कर्मियों के लिए ब्लैक थंडर-II में कोई मृत्यु संख्या नहीं देती; इसलिए “कोई सुरक्षा बल हताहत नहीं” जैसा व्यापक दावा बिना अतिरिक्त स्रोत के नहीं करना चाहिए।

13. बरामद हथियार और परिसर की तलाशी

समर्पण के बाद सुरक्षा कर्मियों ने परिसर की तलाशी ली।

19 मई की UPI रिपोर्ट के अनुसार कम-से-कम 12 असॉल्ट राइफलें, गोला-बारूद, ग्रेनेड और विस्फोटक विभिन्न कमरों से बरामद किए गए।

के.पी.एस. गिल ने बाद में दावा किया कि कुछ कमरों में यातना के उपकरण, खून के निशान और जबरन वसूली से जुड़े दस्तावेज भी मिले।

यह ध्यान रखना आवश्यक है कि यह दूसरा विवरण स्वयं गिल का बाद का वर्णन है। इसलिए इसे पुलिस नेतृत्व के दावे के रूप में रखना चाहिए, न कि स्वतंत्र न्यायिक निष्कर्ष के रूप में।

फिर भी मीडिया की उपस्थिति ने परिसर के भीतर मिली सामग्री पर 1984 जैसी पूर्ण सूचना-रिक्तता नहीं बनने दी।

14. ब्लू स्टार और ब्लैक थंडर: मूल अंतर

1988 का मुख्य सबक यह था कि आतंकवाद-विरोधी अभियान में तेजी हमेशा श्रेष्ठ रणनीति नहीं होती।

समय स्वयं हथियार बन सकता है।

15. 1988 में यह रणनीति संभव क्यों थी, जो 1984 में नहीं अपनाई गई?

दोनों परिस्थितियां पूरी तरह समान नहीं थीं।

1984 में—

शाबेग सिंह जैसे अनुभवी सैन्य अधिकारी ने मजबूत किलेबंदी की थी;

अकाल तख्त मुख्य प्रतिरोध केंद्र था;

भिंडरांवाला अत्यधिक प्रतीकात्मक नेतृत्व रखता था;

सरकार को पंजाब के गांवों से संभावित बड़ी लामबंदी का भय था;

और अंदर की रक्षा कहीं अधिक संगठित थी।

1988 में हथियारबंद समूह मौजूद थे, लेकिन उनका सैन्य संगठन 1984 जैसा नहीं था।

इसके अलावा सरकार 1984 के परिणामों से सीख चुकी थी।

इसलिए यह कहना कि “जो 1988 में हुआ वही 1984 में आसानी से हो सकता था” निश्चित निष्कर्ष नहीं है।

लेकिन 1988 ने इतना अवश्य सिद्ध किया कि धार्मिक परिसर से हथियारबंद समूहों को निकालने के लिए प्रत्यक्ष भारी सैन्य आक्रमण ही एकमात्र संभावित पद्धति नहीं है।

16. के.पी.एस. गिल की भूमिका

ब्लैक थंडर-II के समय के.पी.एस. गिल पंजाब पुलिस के नए महानिदेशक थे।

वे इस अभियान को बाद में अपनी आतंकवाद-विरोधी रणनीति का महत्वपूर्ण मोड़ मानते थे।

उनकी सोच थी कि पुलिस को स्वयं आतंकवाद का मुकाबला करना चाहिए और सेना को स्थायी आंतरिक कानून-व्यवस्था बल नहीं बनाया जाना चाहिए। ब्लैक थंडर के बाद उन्होंने पुलिस थानों की क्षमता, हथियार, संचार, गतिशील गश्त और खुफिया नेटवर्क मजबूत करने पर जोर दिया।

यहां स्रोत की प्रकृति महत्वपूर्ण है—

इस रणनीति का बड़ा हिस्सा स्वयं गिल के लेखन में मिलता है। उनका विवरण अत्यंत उपयोगी है, लेकिन वह उस अभियान के प्रमुख कमांडर की आत्मव्याख्या भी है।

आगे मानवाधिकार आरोपों की समीक्षा करते समय इसी कारण स्वतंत्र स्रोतों को साथ रखना आवश्यक होगा।

17. ब्लैक थंडर ने आतंकवाद समाप्त नहीं किया

ऑपरेशन की सफलता को उसके वास्तविक आकार से अधिक नहीं आंकना चाहिए।

1988 पंजाब आतंकवाद के सबसे हिंसक वर्षों में से था।

पंजाब पुलिस के आंकड़ों के अनुसार उसी वर्ष 2,432 लोग मारे गए, जिनमें 1,949 नागरिक थे।

ब्लैक थंडर के तुरंत बाद भी आतंकवादी हमले जारी रहे।

19 मई की UPI रिपोर्ट में उसी दिन पंजाब के दूसरे हिस्सों में 16 लोगों की आतंकवादी हमलों में हत्या दर्ज थी।

अर्थात स्वर्ण मंदिर खाली होने का अर्थ पंजाब में आतंकवाद का अंत नहीं था।

उस समय सक्रिय अधिकांश हथियारबंद नेटवर्क परिसर के बाहर थे।

18. फिर यह ऑपरेशन निर्णायक क्यों माना जाता है?

क्योंकि इसने तीन चीजें बदलीं।

पहला—धार्मिक आश्रय की धारणा

उग्रवादी अब यह नहीं मान सकते थे कि गुरुद्वारे के भीतर जाकर वे कानून से अनिश्चित काल तक सुरक्षित रहेंगे।

दूसरा—मनोवैज्ञानिक प्रभाव

1984 में भिंडरांवाला लड़ते हुए मारा गया और प्रतीक बन गया।

1988 में कैमरों के सामने हथियारबंद लोगों का हाथ उठाकर बाहर आना बिल्कुल अलग दृश्य था।

तीसरा—पंजाब पुलिस की भूमिका

यह अभियान सेना नहीं बल्कि राज्य पुलिस नेतृत्व के अंतर्गत हुआ।

इससे पंजाब पुलिस को अगले चरण के आतंकवाद-विरोधी अभियान की केंद्रीय संस्था बनने का अवसर मिला।

गिल ने बाद में दावा किया कि ब्लैक थंडर के बाद धार्मिक स्थल को सुरक्षा कवच की तरह इस्तेमाल करने की आतंकवादी रणनीति को गंभीर झटका लगा।

19. मीडिया क्यों रणनीति का हिस्सा था?

ब्लैक थंडर में मीडिया केवल दर्शक नहीं था।

वह आतंकवाद-विरोधी मनोवैज्ञानिक रणनीति का हिस्सा था।

यदि सुरक्षा बल आत्मसमर्पण करने वालों को जीवित बाहर लाते हैं,

मुख्य मंदिर सुरक्षित रहता है,

पत्रकार स्वयं कार्रवाई देखते हैं,

और हथियारों की बरामदगी कैमरों के सामने होती है—

तो सरकार अपने अभियान को धार्मिक आक्रमण के बजाय कानून-व्यवस्था कार्रवाई के रूप में प्रस्तुत कर सकती थी।

ब्लू स्टार में सूचना रिक्तता ने अफवाहों को बढ़ाया था।

ब्लैक थंडर में पुलिस ने उस रिक्तता को जानबूझकर नहीं बनने दिया।

आधुनिक आतंकवाद-विरोधी रणनीति में इसे सूचना-क्षेत्र पर नियंत्रण कहा जाएगा।

20. आत्मसमर्पण को सैन्य जीत से अधिक महत्व

ब्लैक थंडर की रणनीतिक सफलता का सबसे बड़ा संकेत मृत आतंकवादियों की संख्या नहीं बल्कि जीवित आत्मसमर्पण था।

एनएसजी का आधिकारिक आंकड़ा 146 है।

जीवित गिरफ्तारी से कई लाभ हुए—

पूछताछ और नेटवर्क संबंधी जानकारी मिली;

मृतकों को “शहीद” बनाने की संभावना कम हुई;

सरकार पर अत्यधिक बल प्रयोग का आरोप कमजोर हुआ;

और बाकी उग्रवादियों के सामने आत्मसमर्पण एक वास्तविक विकल्प के रूप में आया।

यही सिद्धांत आगे पंजाब पुलिस की व्यापक रणनीति में इस्तेमाल हुआ।

21. लेकिन पुलिस रणनीति का दूसरा पक्ष भी था

ब्लैक थंडर के बाद पंजाब पुलिस अधिक आक्रामक आतंकवाद-विरोधी शक्ति में बदलने लगी।

खुफिया नेटवर्क,

पूर्व आतंकवादियों को मुखबिर बनाना,

विशेष पुलिस अधिकारी,

गांव रक्षा समितियां,

और विशेष अभियान—

इन सबका विस्तार हुआ।

इनमें कुछ उपाय प्रभावी सिद्ध हुए।

लेकिन यही दौर आगे पुलिस हिरासत, फर्जी मुठभेड़, गायब किए गए व्यक्तियों और गुप्त अंतिम संस्कार के गंभीर मानवाधिकार आरोपों तक भी पहुंचेगा।

इसलिए ब्लैक थंडर की कम-हानि वाली सफलता को बाद की पूरी पंजाब पुलिस रणनीति पर स्वतः लागू नहीं किया जा सकता।

यह अगले चरण की अलग जांच का विषय है।

निष्कर्ष: 1984 से 1988 के बीच सबसे बड़ा बदलाव रणनीति का था

ब्लू स्टार और ब्लैक थंडर का लक्ष्य broadly समान था—

स्वर्ण मंदिर परिसर से हथियारबंद उग्रवादी नियंत्रण समाप्त करना।

लेकिन साधन बिल्कुल अलग थे।

1984 में राज्य ने—

सेना,

तेज हमला,

बख्तरबंद वाहन

और भारी हथियारों पर भरोसा किया।

1988 में—

पुलिस,

एनएसजी,

निशानेबाज,

घेराबंदी,

समय,

बातचीत

और आत्मसमर्पण के विकल्प पर।

एनएसजी के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार ब्लैक थंडर-II 10 से 19 मई तक चला और 146 उग्रवादियों ने आत्मसमर्पण किया।

समकालीन विदेशी रिपोर्टें पुष्टि करती हैं कि अंतिम हथियारबंद समूहों को हरमंदिर साहिब के भीतर से निकालने के लिए सुरक्षा बलों ने सीधा भारी हमला करने के बजाय प्रतीक्षा की और अंततः दर्जनों लोग हाथ उठाकर बाहर आए।

इससे धार्मिक स्थल को ब्लू स्टार जैसी क्षति नहीं हुई।

लेकिन आतंकवाद समाप्त भी नहीं हुआ।

1988 में पंजाब पुलिस के आंकड़ों के अनुसार 2,432 लोग आतंकवाद-संबंधी हिंसा में मारे गए—उस समय तक का सर्वाधिक वार्षिक आंकड़ा।

इसलिए ब्लैक थंडर को आतंकवाद की अंतिम पराजय कहना गलत होगा।

उसकी वास्तविक ऐतिहासिक भूमिका दूसरी थी—

इसने स्वर्ण मंदिर को हथियारबंद आंदोलन के सुरक्षित मुख्यालय के रूप में इस्तेमाल करने की रणनीति को तोड़ दिया और पंजाब की आतंकवाद-विरोधी लड़ाई का केंद्र सेना से हटाकर पुलिस की ओर स्थानांतरित कर दिया।

अब आतंकवाद धार्मिक परिसर से बाहर निकलकर गांवों, सीमा-पार ठिकानों और बिखरे हुए संगठनों के नेटवर्क में चला गया।

और यहीं से पंजाब संघर्ष का सबसे रक्तरंजित चरण शुरू होता है।