1995 के बाद: क्या खालिस्तान आतंकवाद खत्म हो गया?
पाकिस्तान में बचे संगठन, विदेशों के नेटवर्क और पंजाब में पुनर्जीवन की कोशिशें
31 अगस्त 1995 को मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या ने यह स्पष्ट कर दिया था कि पंजाब में बड़े पैमाने का आतंकवाद भले टूट चुका हो, उसके संगठन पूरी तरह समाप्त नहीं हुए थे। 1991 में जहां पंजाब आतंकवाद से जुड़ी 5,265 मौतें दर्ज हुई थीं, वहीं 1994 तक यह संख्या घटकर 78 रह गई थी। लेकिन 1995 में भी पंजाब पुलिस के आंकड़ों में 29 मौतें दर्ज हैं—12 नागरिक, पांच सुरक्षा कर्मी और 12 आतंकवादी। (satp.org)
इसके बाद पंजाब आतंकवाद की प्रकृति बदल गई।
अब राज्य के भीतर हजारों हथियारबंद लड़ाकों वाला विद्रोह नहीं था।
गांवों में समानांतर आदेश देने वाली आतंकवादी सत्ता नहीं थी।
बसों और ट्रेनों से रोजाना यात्रियों को उतारकर मारने वाला दौर समाप्त हो चुका था।
लेकिन पाकिस्तान में शरण लिए संगठनात्मक नेतृत्व, विदेशों में समर्थक नेटवर्क, छिटपुट बम विस्फोट, हथियारों की खेप और पंजाब में छोटे-छोटे मॉड्यूल खड़े करने की कोशिशें जारी रहीं।
यानी आतंकवाद पराजित हुआ था; उसकी पुनर्जीवन क्षमता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी।
1. 1995 के बाद सबसे बड़ा परिवर्तन: ‘आंतरिक विद्रोह’ से ‘बाहरी नेटवर्क’
1992–94 तक पंजाब पुलिस ने राज्य के भीतर सक्रिय अधिकांश बड़े आतंकवादी कमांड नेटवर्क तोड़ दिए थे।
पंजाब पुलिस के पुराने रिकॉर्ड में 1996 में केवल तीन आतंकवादी मौतें, 1998 और 1999 में शून्य आतंकवाद-संबंधी मौतें दर्ज हैं। (satp.org)
लेकिन जिन संगठनों का नेतृत्व पाकिस्तान या यूरोप–उत्तर अमेरिका पहुंच चुका था, वे समाप्त नहीं हुए।
भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने 2006–07 की वार्षिक रिपोर्ट में साफ लिखा कि पाकिस्तान में स्थित प्रमुख खालिस्तान समर्थक संगठनों में—
बब्बर खालसा इंटरनेशनल के वधावा सिंह,
खालिस्तान कमांडो फोर्स के परमजीत सिंह पंजवार,
इंटरनेशनल सिख यूथ फेडरेशन के लखबीर सिंह रोडे,
खालिस्तान जिंदाबाद फोर्स के रंजीत सिंह नीटा
और दल खालसा इंटरनेशनल के गजिंदर सिंह—
पाकिस्तान में आश्रय पाए हुए थे। मंत्रालय ने यह भी कहा कि विदेशों में मौजूद खालिस्तान समर्थक तत्व पाकिस्तान-आधारित आतंकवादी नेतृत्व से संपर्क बनाए हुए थे। (mha.gov.in)
यहीं 1995 के बाद की नई संरचना दिखाई देती है—
कमांड बाहर, मॉड्यूल भीतर।
2. कौन-कौन से संगठन बचे रहे?
भारत सरकार ने बाद में गैरकानूनी गतिविधियां (निवारण) अधिनियम के अंतर्गत कई पंजाब-सम्बंधित संगठनों को आतंकवादी संगठनों की सूची में रखा।
इनमें प्रमुख थे—
बब्बर खालसा इंटरनेशनल,
खालिस्तान कमांडो फोर्स,
खालिस्तान जिंदाबाद फोर्स,
और इंटरनेशनल सिख यूथ फेडरेशन। (mha.gov.in)
बाद के वर्षों में खालिस्तान लिबरेशन फोर्स भी सूचीबद्ध किया गया। गृह मंत्रालय की वर्तमान सूची में केएलएफ को आतंकवादी संगठन के रूप में शामिल किया गया है। (mha.gov.in)
1995 के बाद समस्या यह नहीं थी कि ये संगठन पंजाब के भीतर वैसा क्षेत्रीय नियंत्रण रखते थे जैसा 1988–91 में था।
समस्या यह थी कि उनका नेतृत्व, नाम, संपर्क और हथियार जुटाने की क्षमता जीवित रही।
3. पाकिस्तान क्यों महत्वपूर्ण रहा?
पंजाब आतंकवाद के चरम वर्षों में पाकिस्तान पर हथियार, प्रशिक्षण और सुरक्षित आश्रय उपलब्ध कराने के आरोप पहले ही सामने आ चुके थे।
1995 के बाद यह भूमिका और अधिक बाहरी-केंद्रित हो गई।
गृह मंत्रालय की 2006–07 रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान में खालिस्तान समर्थक नेतृत्व मौजूद था और पंजाब में आतंकवादी गतिविधियां पुनर्जीवित करने की कोशिशें जारी थीं। रिपोर्ट ने इसे स्पष्ट रूप से “Pak-based pro-Khalistan militants” की गतिविधि कहा। (mha.gov.in)
1997 के बाद और 2000 के दशक में पकड़े गए विभिन्न मॉड्यूलों में भी पुलिस ने पाकिस्तान से हथियार, विस्फोटक या प्रशिक्षण मिलने के आरोप लगाए।
हालांकि किसी अभियुक्त के विरुद्ध पुलिस आरोप और न्यायिक दोषसिद्धि को अलग रखना आवश्यक है, कई स्वतंत्र मामलों में एक ही पैटर्न का बार-बार सामने आना सुरक्षा एजेंसियों की दीर्घकालिक चिंता को समझाता है।
4. 1997: शांति के बीच बम धमाकों की वापसी
1996 अपेक्षाकृत शांत रहा।
लेकिन 1997 ने दिखाया कि बिखरे आतंकवादी नेटवर्क अभी भी बड़े नागरिक हमले कर सकते हैं।
पंजाब पुलिस के आंकड़ों के अनुसार 1997 में—
56 नागरिक,
दो सुरक्षा कर्मी
और एक आतंकवादी
मारा गया।
कुल 59 मौतें। (satp.org)
एसएटीपी के बाद के विश्लेषण के अनुसार मार्च से जुलाई 1997 के बीच बम विस्फोटों की श्रृंखला में अधिकांश मौतें हुईं और यह 1993 के बाद का सबसे हिंसक वर्ष बना। (satp.org)
इसमें रेल और बसों को निशाना बनाने की घटनाएं शामिल थीं।
5. जालंधर–अंबाला रेल विस्फोट और पठानकोट की बसें
भारत सरकार के बाद के राजपत्रीय दस्तावेजों में खालिस्तान जिंदाबाद फोर्स से जुड़े जिन पुराने हमलों का उल्लेख किया गया, उनमें दिसंबर 1996 में अंबाला के निकट झेलम एक्सप्रेस में विस्फोट और अप्रैल तथा जून 1997 में पठानकोट क्षेत्र की बसों में बम विस्फोट शामिल हैं। (spcommreports.ohchr.org)
इन घटनाओं ने यह स्पष्ट किया कि पुनर्जीवित नेटवर्क पुराने 1980 के दशक वाले क्षेत्रीय कब्जे के बजाय—
रेल,
बस,
बाजार
और भीड़भाड़ वाले नागरिक लक्ष्यों—
पर विस्फोटक हमलों की ओर जा रहे थे।
यह कम संसाधन में अधिक भय पैदा करने की रणनीति थी।
6. फिर 1998–99 लगभग शांत क्यों रहे?
पंजाब पुलिस के आंकड़ों में 1998 और 1999 दोनों में आतंकवाद-संबंधी मृत्यु शून्य दर्ज है। (satp.org)
इसका अर्थ यह नहीं था कि आतंकवादी गतिविधि समाप्त हो चुकी थी।
उसी अवधि में पुलिस और केंद्रीय एजेंसियां कई गिरफ्तारी और हथियार बरामदगी के मामले दर्ज कर रही थीं।
1999 में बब्बर खालसा से जुड़े संदिग्धों की गिरफ्तारियां, आरडीएक्स, पेटीएन, एके-56 और दूसरे हथियारों की बरामदगी के मामले दर्ज हुए। एसएटीपी के संगठनात्मक रिकॉर्ड में पंजाब, गुजरात और दिल्ली में ऐसी कई कार्रवाई दर्ज है। (satp.org)
यानी आतंकवाद अब अक्सर हमले से पहले पकड़े गए मॉड्यूल के रूप में दिखाई देने लगा।
7. 2000: सार्वजनिक परिवहन फिर निशाने पर
साल 2000 में पंजाब में आतंकवाद-संबंधी हिंसा में 18 नागरिक मारे गए।
एसएटीपी के समकालीन आकलन के अनुसार उस वर्ष छह बम विस्फोट हुए। सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में—
मार्च में फतेहगढ़ साहिब क्षेत्र में बस विस्फोट,
जुलाई में जालंधर क्षेत्र में बस विस्फोट,
और अक्टूबर में बठिंडा क्षेत्र में चलती यात्री ट्रेन में विस्फोट—
शामिल थे। (satp.org)
फतेहगढ़ साहिब में जम्मू से दिल्ली जा रही बस में 3 मार्च 2000 के विस्फोट में आठ लोग मारे गए थे। उस विशेष घटना की जिम्मेदारी को लेकर तत्काल स्पष्टता नहीं थी और विश्लेषकों ने खालिस्तानी और कश्मीर-आधारित नेटवर्क—दोनों संभावनाएं उठाईं। (satp.org)
इसीलिए प्रत्येक विस्फोट को स्वतः खालिस्तान आतंकवाद से जोड़ना उचित नहीं होगा।
8. नई चुनौती: आतंकवादी नेटवर्कों का आपसी सहयोग
1990 के दशक के बाद सुरक्षा एजेंसियों की चिंता केवल अलग-अलग खालिस्तानी संगठनों तक सीमित नहीं रही।
पाकिस्तान में मौजूद विभिन्न भारत-विरोधी नेटवर्कों के बीच हथियार, विस्फोटक, तस्करी और लॉजिस्टिक सहयोग की संभावना बढ़ी।
एसएटीपी के बाद के विश्लेषण में कहा गया कि पाकिस्तान-आधारित खालिस्तानी संगठनों और इस्लामवादी आतंकवादी संरचनाओं के बीच सहयोग कराने के प्रयास हुए, हालांकि पंजाब में कोई स्थायी संयुक्त परिचालन मॉडल विकसित नहीं हो सका। (satp.org)
यह अंतर महत्वपूर्ण है।
सहायता या लॉजिस्टिक संपर्क का प्रमाण होना और दो संगठनों का एकीकृत संगठन बन जाना एक ही चीज नहीं है।
9. पंजाब के भीतर जनाधार क्यों वापस नहीं आया?
1995 के बाद आतंकवाद पुनर्जीवित करने की सबसे बड़ी समस्या हथियार नहीं बल्कि सामाजिक आधार थी।
1980 के दशक की तुलना में परिस्थितियां बदल चुकी थीं।
पंजाब में चुनाव सामान्य हो चुके थे।
अकाली दल और कांग्रेस दोनों नियमित सत्ता-प्रतिस्पर्धा में लौट चुके थे।
स्वर्ण मंदिर आतंकवादी मुख्यालय नहीं था।
पुलिस और खुफिया नेटवर्क पहले से कहीं अधिक सक्षम थे।
और सबसे महत्वपूर्ण—
1988–91 की नागरिक हत्याओं की स्मृति अभी ताजा थी।
सिख समाज का बहुत बड़ा हिस्सा दोबारा उसी हिंसा में लौटना नहीं चाहता था।
एसएटीपी के 2005 के विश्लेषण ने भी पुनर्जीवन प्रयासों की विफलता का एक प्रमुख कारण पंजाब के भीतर जनसमर्थन की कमी को माना। (satp.org)
10. विदेशों में नेटवर्क क्यों टिके रहे?
पंजाब में आतंकवाद हार गया था, लेकिन विदेशों में उसकी राजनीतिक स्मृति समाप्त नहीं हुई।
ब्रिटेन,
कनाडा,
जर्मनी,
अमेरिका
और दूसरे देशों में कुछ खालिस्तान समर्थक संगठन सक्रिय रहे।
इनमें सभी समूह आतंकवादी हिंसा में शामिल नहीं थे—यह अंतर अत्यंत आवश्यक है।
विदेश में खालिस्तान की राजनीतिक मांग रखना और आतंकवादी संगठन के लिए धन, हथियार अथवा हिंसक कार्रवाई आयोजित करना अलग-अलग श्रेणियां हैं।
लेकिन गृह मंत्रालय ने बार-बार यह आरोप लगाया कि कुछ विदेशी समर्थक पाकिस्तान-आधारित आतंकवादी नेताओं से संपर्क में थे और पंजाब में हिंसक नेटवर्क सक्रिय करने के प्रयास करते थे। (mha.gov.in)
11. प्रवासी समुदाय: पूरा समुदाय नहीं, विशिष्ट नेटवर्क
इस बिंदु पर भाषा विशेष रूप से सावधानी की मांग करती है।
कनाडा, ब्रिटेन या अमेरिका में बड़ी सिख आबादी है।
उसे “खालिस्तानी नेटवर्क” कहना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा।
विदेशों में सक्रियता कई प्रकार की थी—
शांतिपूर्ण राजनीतिक अभियान,
मानवाधिकार प्रचार,
1984 स्मृति से जुड़े संगठन,
स्वतंत्र खालिस्तान समर्थक राजनीतिक समूह,
और अलग श्रेणी में हिंसक अथवा प्रतिबंधित संगठनों से जुड़े नेटवर्क।
इस शोध का विषय केवल अंतिम श्रेणी और उससे जुड़े आतंकवादी पुनर्जीवन प्रयास हैं।
12. कानून में संगठनात्मक पहचान
2004 में संशोधित गैरकानूनी गतिविधियां (निवारण) अधिनियम की अनुसूची में—
बब्बर खालसा इंटरनेशनल,
खालिस्तान कमांडो फोर्स,
खालिस्तान जिंदाबाद फोर्स
और इंटरनेशनल सिख यूथ फेडरेशन—
को आतंकवादी संगठनों में शामिल किया गया। (mha.gov.in)
इससे एक महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ।
अब संगठन केवल पुलिस की “उग्रवादी सूची” में नहीं थे।
उनकी गतिविधि राष्ट्रीय आतंकवाद-विरोधी कानून के औपचारिक ढांचे में आ गई।
इससे—
सदस्यता,
वित्त,
संपत्ति,
भर्ती
और अंतरराष्ट्रीय सहयोग—
की जांच का कानूनी आधार मजबूत हुआ।
13. 2005: पंजाब से बाहर भी नेटवर्क सक्रिय
2005 में दिल्ली के सिनेमा विस्फोट मामले से एक महत्वपूर्ण नेटवर्क सामने आया।
दिल्ली हाई कोर्ट के 2012 के एक फैसले में अभियोजन का मामला दर्ज है कि बब्बर खालसा से जुड़े आरोपी पाकिस्तान में प्रशिक्षण लेकर लौटे थे और विदेश स्थित नेतृत्व से निर्देश प्राप्त हुए थे। अदालत के रिकॉर्ड में जम्मू से हथियार और विस्फोटक लेने तथा पाकिस्तान में प्रशिक्षण के आरोप का उल्लेख है। (indiankanoon.org)
यहां फिर सावधानी आवश्यक है—
न्यायालय के किसी आदेश में अभियोजन कथा का उल्लेख स्वयं प्रत्येक आरोप की अंतिम दोषसिद्धि नहीं होता।
लेकिन यह मामला 2000 के दशक की उस सुरक्षा समस्या का अच्छा उदाहरण है जिसमें—
विदेशी नेतृत्व,
पाकिस्तान प्रशिक्षण,
छोटा भारतीय मॉड्यूल
और चुना हुआ प्रतीकात्मक लक्ष्य—
आपस में जुड़े दिखाई देते हैं।
14. पुराने संगठनों का नया तरीका
1980–90 के दशक में संगठन गांवों में खुले हथियारबंद दस्ते चलाते थे।
2000 के दशक में मॉडल बदल गया।
अब एक मॉड्यूल में कुछ ही सदस्य हो सकते थे।
उन्हें बाहर से पैसा, लक्ष्य या विस्फोटक दिया जाता।
स्थानीय संपर्क वाहन, आश्रय या फोन उपलब्ध कराता।
हमले के बाद संगठनात्मक संरचना पंजाब में दिखाई भी न दे।
इसीलिए 2000 के दशक में आतंकवाद का आकलन केवल “कितने लोग मारे गए” से नहीं किया जा सकता।
कई वर्ष बिना मौत के रहे, लेकिन गिरफ्तारी और विस्फोटक बरामदगी जारी रही।
15. 2006 तक स्थिति: शांत पंजाब, सक्रिय बाहरी प्रयास
गृह मंत्रालय की 2006–07 रिपोर्ट का निष्कर्ष बहुत स्पष्ट था—
पंजाब की सुरक्षा स्थिति शांतिपूर्ण थी।
लेकिन उसी अनुच्छेद में मंत्रालय ने यह भी कहा कि पाकिस्तान में स्थित खालिस्तान समर्थक आतंकवादी पंजाब में आतंकवादी गतिविधियां करने की कोशिश कर रहे थे। (mha.gov.in)
यही 1995 के बाद की स्थिति का सबसे सटीक वर्णन है।
पंजाब में आतंकवादी विद्रोह नहीं था।
लेकिन आतंकवाद पुनर्जीवित करने की कोशिशें थीं।
16. 2007: लुधियाना शिंगार सिनेमा विस्फोट
14 अक्टूबर 2007 को लुधियाना के शिंगार सिनेमा में एक शक्तिशाली विस्फोट हुआ।
सात लोगों की मौत हुई और 30 से अधिक घायल हुए। अधिकांश मृतक बिहार और उत्तर प्रदेश के प्रवासी श्रमिक थे जो भोजपुरी फिल्म देखने आए थे। (tribuneindia.com)
पुलिस ने मामले को बब्बर खालसा से जोड़ा और कई लोगों को गिरफ्तार किया।
लेकिन इस मामले का न्यायिक परिणाम इतिहास के लिए अधिक महत्वपूर्ण है।
दिसंबर 2014 में लुधियाना अदालत ने तीन जीवित आरोपियों को साक्ष्य अपर्याप्त होने के कारण बरी कर दिया। चौथा अभियुक्त जेल में मर चुका था। (tribuneindia.com)
इसलिए इस हमले को निश्चित रूप से “बब्बर खालसा द्वारा सिद्ध हमला” लिखना न्यायिक रिकॉर्ड से आगे जाना होगा।
सही भाषा होगी—
पुलिस ने बब्बर खालसा से संबंध का आरोप लगाया, लेकिन मुकदमे में आरोपी दोषसिद्ध नहीं हुए।
17. इसी वर्ष हथियारों की बड़ी खेप
2007 में सीमा पार हथियार आने की घटनाएं भी दर्ज हुईं।
सितंबर में बीएसएफ ने फिरोजपुर क्षेत्र में पाकिस्तान से लाई जा रही खेप पकड़ी जिसमें—
दो AK-56,
कई विदेशी पिस्तौलें
और गोला-बारूद
बरामद हुआ। (satp.org)
उसी वर्ष पुलिस ने बब्बर खालसा से जुड़े कथित मॉड्यूल से लगभग 10 किलो आरडीएक्स सहित विस्फोटक बरामद करने और धार्मिक नेताओं की हत्या की साजिश विफल करने का दावा किया। ये पुलिस दावे थे और प्रत्येक मामले की न्यायिक स्थिति अलग-अलग देखी जानी चाहिए। (satp.org)
18. सुरक्षा एजेंसियों की नई चिंता: पुनर्जीवन, न कि विद्रोह
इस समय तक पुलिस और खुफिया एजेंसियों की शब्दावली भी बदल गई।
अब “पंजाब आतंकवाद” के बजाय बार-बार शब्द आता था—
revival of militancy — आतंकवाद का पुनर्जीवन।
यह अंतर महत्वपूर्ण है।
यदि कोई आंदोलन सक्रिय विद्रोह हो तो सरकार क्षेत्रीय नियंत्रण वापस लेने की कोशिश करती है।
यदि खतरा पुनर्जीवन का हो तो प्राथमिकता होती है—
मॉड्यूल बनने से पहले पकड़ना,
विदेशी वित्त काटना,
हथियारों की खेप रोकना,
और कट्टरपंथी नेटवर्क को हिंसक संगठन में बदलने से रोकना।
2000 के दशक की पंजाब सुरक्षा नीति इसी मॉडल पर चली।
19. 2010: गतिविधियों में फिर बढ़ोतरी
एसएटीपी के आंकड़ों के अनुसार 2010 में पंजाब में आतंकवाद-संबंधी 22 घटनाएं दर्ज हुईं, जबकि 2009 में छह थीं। (satp.org)
मौतें बहुत कम रहीं, लेकिन मॉड्यूल, गिरफ्तारी और हथियार बरामदगी की घटनाएं बढ़ीं।
यह उस नई प्रवृत्ति को दिखाता है जिसमें हिंसा का स्तर 1980–90 के दशक से नगण्य था, लेकिन सुरक्षा एजेंसियां पुनर्गठन की कोशिशों से लगातार जूझ रही थीं।
20. 2010–14: मॉड्यूल पकड़े जाते रहे, बड़ा विद्रोह नहीं लौटा
एसएटीपी के बाद के संकलन के अनुसार 2010 से 2015 के बीच कम-से-कम 46 खालिस्तान-सम्बंधित आतंकवादी मॉड्यूल पकड़े या निष्क्रिय किए गए और 158 संदिग्ध आतंकवादी गिरफ्तार हुए। इनमें बीकेआई, केएलएफ, बीटीएफके, केजेडएफ और केसीएफ से जुड़े नेटवर्क शामिल बताए गए। (satp.org)
लेकिन 2012 से 2014 तक पंजाब में आतंकवाद-संबंधी मृत्यु दर्ज नहीं हुई। (satp.org)
यह विरोधाभास महत्वपूर्ण है—
मॉड्यूल पकड़े जा रहे थे,
पर आतंकवाद सामाजिक आंदोलन के रूप में पुनर्जीवित नहीं हो रहा था।
21. पुलिस इतनी जल्दी मॉड्यूल कैसे पकड़ पा रही थी?
1990 के दशक के अनुभव के बाद पंजाब पुलिस और केंद्रीय एजेंसियों के पास पुरानी संगठनों की विस्तृत जानकारी थी।
उन्हें पता था—
पुराने कमांडर कौन हैं,
किसके रिश्तेदार कहां हैं,
कौन विदेश में है,
पुराने हथियार मार्ग कौन-से हैं,
और कौन से सीमावर्ती क्षेत्र तस्करी के लिए उपयोग किए जाते रहे हैं।
टेलीफोन और इलेक्ट्रॉनिक निगरानी ने भी 1980 के दशक की तुलना में खुफिया क्षमता बढ़ाई।
ऐसे वातावरण में पंजाब के भीतर बड़े गुप्त संगठन का निर्माण पहले से कहीं कठिन था।
22. दूसरा कारण: पीढ़ी बदल चुकी थी
1984–92 में सक्रिय युवाओं की पीढ़ी 2000 के दशक तक मध्य आयु में पहुंच चुकी थी।
नई पीढ़ी का व्यक्तिगत अनुभव अलग था।
उसने 1980 के दशक जैसी प्रतिदिन की आतंकवादी हिंसा नहीं देखी थी।
पंजाब में आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक समस्याएं थीं, लेकिन मुख्यधारा चुनाव व्यवस्था स्थिर थी।
इसलिए पुराने उग्रवादी नेतृत्व के लिए केवल 1984 की स्मृति के आधार पर उसी स्तर का हथियारबंद जनसमर्थन पैदा करना आसान नहीं था।
23. तीसरा कारण: स्वयं आतंकवाद की स्मृति
खालिस्तान आतंकवाद का स्मृति-क्षेत्र केवल ऑपरेशन ब्लू स्टार या पुलिस कार्रवाई तक सीमित नहीं था।
पंजाब के लोगों ने—
बस नरसंहार,
रेल हमले,
पत्रकारों की हत्या,
पुलिस परिवारों की हत्या,
राजनीतिक हत्याएं
और गांवों में आतंकवादी आदेश—
भी देखे थे।
इसलिए हथियारबंद आंदोलन की वापसी के प्रति स्वयं पंजाब समाज में प्रतिरोध था।
यह सामाजिक स्मृति पुनर्जीवन की राह में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक बनी।
24. चौथा कारण: मुख्यधारा सिख राजनीति का सामान्यीकरण
1997 में शिरोमणि अकाली दल–भाजपा सरकार सत्ता में आई।
इसके बाद पंजाब की राजनीति फिर नियमित चुनावी प्रतिस्पर्धा में चलने लगी।
अकाली दल सिख हित और पंजाब के संघीय मुद्दों को चुनावी राजनीति के भीतर उठाता था।
यह अत्यंत महत्वपूर्ण था।
यदि धार्मिक और क्षेत्रीय मुद्दों के लिए प्रभावी संवैधानिक राजनीतिक मंच उपलब्ध हो, तो हथियारबंद संगठन का यह दावा कमजोर पड़ता है कि “बंदूक के अलावा कोई रास्ता नहीं।”
25. क्या विदेशों से धन आता रहा?
सुरक्षा एजेंसियों का जवाब हां था।
सरकारी रिपोर्टों में विदेशों में स्थित खालिस्तान समर्थक तत्वों और पाकिस्तान-आधारित नेताओं के संपर्क का उल्लेख मिलता है। (mha.gov.in)
लेकिन यहां भी श्रेणी अलग रखना आवश्यक है।
प्रवासी सिख संस्थाओं द्वारा धार्मिक या राजनीतिक उद्देश्यों के लिए भेजा गया सामान्य धन और किसी प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन को दिया गया वित्त एक ही चीज नहीं है।
आतंकवाद के संदर्भ में केवल वह वित्त प्रासंगिक है जिसके हिंसक नेटवर्क से जुड़ने का विशिष्ट प्रमाण हो।
26. ‘विदेशी खालिस्तानवाद’ और ‘पंजाब आतंकवाद’ एक ही चीज नहीं
1995 के बाद यह अंतर और महत्वपूर्ण हो गया।
पंजाब में आतंकवाद लगभग समाप्त था।
लेकिन विदेशों में खालिस्तान की राजनीतिक मांग जीवित रह सकती थी।
राजनीतिक प्रदर्शन,
जनमत संग्रह की मांग,
नारे,
पोस्टर
और अलग राष्ट्र की विचारधारा—
अपने आप में आतंकवादी कार्रवाई नहीं हैं।
आतंकवाद की श्रेणी में तभी आएंगे जब उनसे—
हत्या,
विस्फोट,
हथियार,
धन,
भर्ती,
प्रशिक्षण
या हिंसक षड्यंत्र—
का प्रमाणित संबंध हो।
इस शोध में आगे भी इसी भेद का पालन किया जाएगा।
27. इस दौर में संगठन कैसे जीवित रहे?
तीन संरचनाएं महत्वपूर्ण थीं।
नेतृत्व: पाकिस्तान या विदेशों में।
स्मृति और प्रचार: प्रवासी नेटवर्कों में।
ऑपरेशनल मॉड्यूल: भारत के भीतर छोटे और अस्थायी।
इस मॉडल में संगठन को हजारों कार्यकर्ताओं की आवश्यकता नहीं थी।
कुछ प्रशिक्षित व्यक्ति और विस्फोटक की एक खेप भी बड़ा हमला कर सकती थी।
लेकिन यही उसकी कमजोरी भी थी—
यदि मॉड्यूल पकड़ा गया तो पंजाब में संगठन का व्यापक स्थानीय ढांचा उसे तुरंत बदल नहीं सकता था।
28. बब्बर खालसा सबसे अधिक क्यों दिखाई देता रहा?
2000 के बाद के रिकॉर्ड में बब्बर खालसा इंटरनेशनल का नाम अपेक्षाकृत बार-बार आता है।
एसएटीपी के संगठनात्मक डेटा में 2000, 2001, 2002, 2004, 2005, 2007, 2008, 2010, 2012, 2013 और 2014 में उससे जुड़े गिरफ्तारी, आरोप या गतिविधि वाले मामले दर्ज हैं। (satp.org)
इसका अर्थ यह नहीं कि हर मामले में आरोपी दोषसिद्ध हुआ।
लेकिन संगठन की पुनर्जीवन क्षमता और अंतरराष्ट्रीय संपर्क सुरक्षा एजेंसियों की लगातार निगरानी में रहे।
29. क्या 1995 के बाद कोई दूसरा ‘भिंडरांवाला’ उभरा?
नहीं।
यही 1995–2014 की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक विशेषताओं में से एक है।
कई संगठन जीवित रहे।
विदेशी प्रचार जारी रहा।
कुछ आतंकवादी हमले हुए।
लेकिन पंजाब के भीतर ऐसा कोई व्यक्ति नहीं उभरा जिसने—
धार्मिक प्रतिष्ठा,
ग्रामीण जनाधार,
हथियारबंद नेटवर्क
और राजनीतिक प्रभाव—
चारों को उसी स्तर पर एक साथ जोड़ दिया हो जैसा 1982–84 में भिंडरांवाले ने किया था।
बिना ऐसे केंद्रीय सामाजिक-राजनीतिक नेतृत्व के आतंकवाद बिखरे मॉड्यूलों से आगे नहीं बढ़ सका।
30. 1995–2014 की समेकित तस्वीर
इस पूरी अवधि को तीन चरणों में समझना अधिक उपयोगी है।
1995–2000: हिंसा के अवशेष
बेअंत सिंह हत्या,
1997 के बम विस्फोट,
और 2000 के सार्वजनिक परिवहन हमले—
दिखाते हैं कि पुराने नेटवर्कों की कुछ मारक क्षमता बची हुई थी। (satp.org)
2001–07: बाहरी पुनर्जीवन प्रयास
पाकिस्तान स्थित नेतृत्व, विदेश संपर्क, विस्फोटक मॉड्यूल और सीमावर्ती हथियार खेप प्रमुख सुरक्षा चिंता बने। गृह मंत्रालय ने पंजाब को शांत बताते हुए भी इन्हीं प्रयासों का उल्लेख किया। (mha.gov.in)
2008–14: मॉड्यूल, गिरफ्तारी और लगभग शून्य मृत्यु
आतंकवाद पुनर्जीवित करने के प्रयास जारी रहे, लेकिन 2012–14 तक कोई आतंकवाद-संबंधी मृत्यु दर्ज नहीं हुई। (satp.org)
यह आतंकवाद के संगठनात्मक अस्तित्व और उसके सामाजिक प्रभाव के बीच बढ़ते अंतर का दौर था।
31. आंकड़े क्या बताते हैं?
1995 के बाद पंजाब पुलिस के आंकड़ों में यह तीखा अंतर दिखाई देता है—
1995 — 29 मौतें
1996 — 3
1997 — 59
1998 — 0
1999 — 0
2000 — 18
2001 — 1
2002 — 5
2003 — 0
2004 — 0
2005 — 0
2006 — 0
2007 — 7
2008 — 0
2009 — 0
2010 — 4
2011 — 0। (satp.org)
यह 1988–92 के हजारों वार्षिक मृतकों वाले दौर से पूरी तरह अलग सुरक्षा परिदृश्य है।
32. क्या आतंकवाद ‘खत्म’ कहना सही है?
यह इस बात पर निर्भर करता है कि “खत्म” से क्या अर्थ लिया जाए।
यदि अर्थ है—
पंजाब के भीतर व्यापक संगठित सशस्त्र विद्रोह—
तो 1993–94 तक वह निर्णायक रूप से पराजित हो चुका था।
यदि अर्थ है—
बब्बर खालसा, केसीएफ, केजेडएफ जैसे संगठनों तथा विदेश-आधारित हिंसक नेटवर्कों का पूर्ण अंत—
तो नहीं।
वे नाम, नेतृत्व और संपर्क के रूप में जीवित रहे।
इसलिए सबसे सटीक निष्कर्ष है—
1995 के बाद पंजाब आतंकवाद एक घरेलू जनाधारित विद्रोह से घटकर विदेश-आधारित, मॉड्यूल-निर्भर पुनर्जीवन प्रयास में बदल गया।
निष्कर्ष: आतंकवाद समाप्त हुआ, नेटवर्क नहीं
1995 के बाद पंजाब उस दौर में वापस नहीं गया जिसमें हर दिन लोग मारे जा रहे थे, बस और ट्रेनें रोकी जा रही थीं और आतंकवादी संगठन गांवों में समानांतर शासन चला रहे थे।
राज्य में लोकतांत्रिक राजनीति स्थिर हुई।
पुलिस और खुफिया तंत्र मजबूत था।
पुराने आतंकवादी संगठन पंजाब के भीतर व्यापक जनाधार हासिल नहीं कर सके।
1998 और 1999 जैसे वर्षों में एक भी आतंकवाद-संबंधी मृत्यु दर्ज नहीं हुई। (satp.org)
फिर भी कहानी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।
पाकिस्तान में पुराने आतंकवादी नेता मौजूद रहे। 2006–07 में भारत सरकार ने स्वयं वधावा सिंह, परमजीत सिंह पंजवार, लखबीर सिंह रोडे और रंजीत सिंह नीटा सहित अनेक प्रमुख व्यक्तियों को पाकिस्तान में मौजूद बताया। (mha.gov.in)
विदेशी नेटवर्कों से संपर्क जारी रहा।
समय-समय पर पंजाब में हथियार और विस्फोटक पहुंचे।
छोटे मॉड्यूल पकड़े गए।
1997 और 2000 में नागरिक बम विस्फोटों में मारे गए।
2007 में लुधियाना का शिंगार सिनेमा विस्फोट हुआ, हालांकि उस मामले में गिरफ्तार आरोपी बाद में अदालत से बरी हो गए। (tribuneindia.com)
2010–15 के बीच दर्जनों संदिग्ध मॉड्यूल पकड़े जाने के बावजूद 2012–14 में आतंकवाद से कोई मृत्यु दर्ज नहीं हुई। (satp.org)
यही इस चरण का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष है—
पंजाब में आतंकवाद की सैन्य और सामाजिक संरचना टूट चुकी थी, लेकिन उसे बाहर से फिर खड़ा करने की कोशिश बंद नहीं हुई थी।
अगले चरण में इस प्रयास की तकनीक फिर बदलेगी।
अब सीमा पार से केवल व्यक्ति और आरडीएक्स भेजना पर्याप्त नहीं रहेगा।
छोटे मॉड्यूल,
सोशल मीडिया,
विदेशी हैंडलर,
स्थानीय गैंगस्टर,
ड्रोन से हथियार और नशीले पदार्थ,
और लक्ष्य-विशिष्ट हत्याएं—
नई सुरक्षा चुनौती बनेंगी।