2015 से 2026: पंजाब में आतंकवाद के नए मॉड्यूल
पाकिस्तान, ड्रोन, गैंगस्टर नेटवर्क और लक्ष्य-आधारित हमले
2015 के बाद पंजाब में आतंकवाद का जो नया रूप दिखाई देता है, उसकी तुलना 1980 और 1990 के दशक से करते समय सबसे पहले एक बुनियादी अंतर समझना आवश्यक है।
अब पंजाब में हजारों हथियारबंद लोगों वाला व्यापक विद्रोह नहीं था।
किसी संगठन का गांवों और कस्बों पर क्षेत्रीय नियंत्रण नहीं था।
सामान्य जनता पर रोजाना होने वाले बस और रेल नरसंहार नहीं थे।
और राज्य के भीतर भिंडरांवाले जैसा कोई केंद्रीय जनाधारित उग्रवादी नेतृत्व भी नहीं था।
इसके स्थान पर नया मॉडल विकसित हुआ—
विदेश में बैठा हैंडलर, पंजाब में दो-चार स्थानीय युवक, सोशल मीडिया या एन्क्रिप्टेड संदेशों से भर्ती, पाकिस्तान से ड्रोन या तस्करी के रास्ते हथियार, गैंगस्टर नेटवर्क से पैसा और लॉजिस्टिक्स, और किसी पुलिस चौकी, धार्मिक व्यक्ति अथवा चुने हुए लक्ष्य पर हमला।
2019 में ड्रोन से हथियार भेजने का बड़ा मामला सामने आया। 2022 में पंजाब पुलिस इंटेलिजेंस मुख्यालय पर रॉकेट-प्रोपेल्ड ग्रेनेड दागा गया। 2024 के अंतिम महीनों से पुलिस थानों और चौकियों पर ग्रेनेड हमलों की श्रृंखला शुरू हुई। 2025 में यही नेटवर्क पुलिस प्रतिष्ठानों से आगे नेताओं के घरों और धार्मिक स्थल तक पहुंचा। 2026 तक राष्ट्रीय जांच एजेंसी ऐसे मामलों में पाकिस्तान-स्थित अपराधी-आतंकी हैंडलरों, विदेश-आधारित खालिस्तानी कार्यकर्ताओं और स्थानीय गैंगस्टर मॉड्यूल की संयुक्त संरचना की जांच कर रही थी।
यानी पंजाब के लिए खतरा समाप्त नहीं हुआ था।
उसका आकार छोटा, तकनीक आधुनिक और कमान अधिक अंतरराष्ट्रीय हो गई थी।
1. 2015: दीनानगर हमला—पहला अंतर साफ करना जरूरी
27 जुलाई 2015 को गुरदासपुर जिले के दीनानगर में तीन भारी हथियारों से लैस आतंकवादियों ने हमला किया। पुलिस स्टेशन पर कब्जे की कोशिश हुई और सात लोग—तीन नागरिक तथा चार सुरक्षा कर्मी—मारे गए। तीनों हमलावर भी मारे गए।
गृह मंत्रालय ने बाद में संसद में कहा कि हमलावर पाकिस्तान से घुसपैठ करके आए थे। जांच में मिले जीपीएस उपकरणों से भी पाकिस्तान में उनके पहले स्थानों के संकेत मिले।
लेकिन इस घटना को 1980 के दशक के खालिस्तान आतंकवाद की सीधी वापसी मानना गलत होगा।
समकालीन जांच में हमलावरों को पाकिस्तान-आधारित जिहादी नेटवर्क से जोड़ा गया; स्थानीय खालिस्तानी मॉड्यूल का प्रमाण सामने नहीं आया। पंजाब पुलिस की बाद की जांच में स्थानीय मदद का कोई ठोस साक्ष्य भी नहीं मिला।
इसलिए दीनानगर पंजाब में आतंकवादी हमला था, लेकिन इसे खालिस्तानी आतंकवाद का पुनरुत्थान नहीं कहा जाना चाहिए।
2. जनवरी 2016: पठानकोट भी अलग श्रेणी
2 जनवरी 2016 को पठानकोट वायुसेना स्टेशन पर पाकिस्तान से आए आतंकवादियों ने हमला किया।
एनआईए ने अपनी जांच में इसे पाकिस्तान-आधारित प्रतिबंधित संगठन जैश-ए-मोहम्मद से जुड़ी साजिश बताया। एनआईए के अनुसार आठ लोग मारे गए और 38 घायल हुए तथा बाद में चार आरोपियों के विरुद्ध आरोपपत्र दाखिल किया गया।
इसलिए इस अध्याय में दीनानगर और पठानकोट का उल्लेख आवश्यक है, लेकिन उन्हें खालिस्तान नेटवर्क में शामिल नहीं किया जाएगा।
वे एक दूसरी सुरक्षा चुनौती बताते हैं—
पंजाब की पाकिस्तान से लगती सीमा का इस्तेमाल जिहादी घुसपैठ के लिए भी किया जा सकता था।
2015–26 के पंजाब सुरक्षा परिदृश्य में खालिस्तानी पुनर्जीवन और पाकिस्तान-स्थित जिहादी नेटवर्क—दोनों मौजूद रहे, लेकिन दोनों को एक ही संगठनात्मक धारा मानना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा।
3. 2016–17: नई रणनीति—बड़े विस्फोट नहीं, चुनिंदा हत्याएं
इसी अवधि में एक दूसरी श्रृंखला शुरू हुई जिसने आगे के पंजाब आतंकवाद का वास्तविक नया चेहरा दिखाया।
जनवरी 2016 से अक्टूबर 2017 के बीच—
आरएसएस कार्यकर्ता,
शिवसेना से जुड़े व्यक्ति,
हिंदू संगठनों के पदाधिकारी,
डेरा सच्चा सौदा अनुयायी
और ईसाई पादरी—
चुनकर गोली मारे गए।
इनमें जनवरी 2016 में लुधियाना की आरएसएस शाखा पर गोलीबारी, अप्रैल 2016 में दुर्गा दास गुप्ता की हत्या, जनवरी 2017 में अमित शर्मा की हत्या, फरवरी में डेरा अनुयायी सतपाल और उनके बेटे रमेश की हत्या, जुलाई में पादरी सुल्तान मसीह और अक्टूबर में आरएसएस नेता रविंदर गोसाईं की हत्या शामिल थीं।
एनआईए ने इन मामलों को अलग-अलग हत्याओं के बजाय एक बड़े षड्यंत्र के संदर्भ में देखा।
उसकी प्राथमिकी के अनुसार उद्देश्य विभिन्न धार्मिक और सामाजिक संगठनों से जुड़े लोगों की हत्या करके पंजाब में सार्वजनिक व्यवस्था और सांप्रदायिक शांति को अस्थिर करना था।
यहीं 1980 के दशक और नए आतंकवाद में बड़ा फर्क दिखाई देता है।
अब सौ लोगों की हत्या आवश्यक नहीं थी।
एक सावधानी से चुना गया व्यक्ति भी सामुदायिक प्रतिक्रिया पैदा करने के लिए पर्याप्त लक्ष्य हो सकता था।
4. विदेश में कमान, पंजाब में मोटरसाइकिल पर शूटर
2016–17 के हत्याकांडों की कार्यपद्धति लगभग एक जैसी थी।
दो हमलावर मोटरसाइकिल पर आते।
कम दूरी से गोली चलाते।
और कुछ मिनट में गायब हो जाते।
एनआईए ने जांच में विदेशी वित्तपोषण और विदेश स्थित व्यक्तियों के साथ संबंधों का आरोप लगाया। पंजाब पुलिस ने भी कहा कि गिरफ्तार संदिग्धों के संपर्क पाकिस्तान तथा ब्रिटेन, कनाडा और इटली में स्थित व्यक्तियों से थे और एन्क्रिप्टेड संचार माध्यम इस्तेमाल किए जाते थे।
यह पुराने आतंकवाद से बुनियादी परिवर्तन था।
स्थानीय मॉड्यूल को अब—
बड़ा शिविर,
भारी संगठन
या खुले ग्रामीण ठिकाने—
की आवश्यकता नहीं थी।
एक पिस्तौल, मोटरसाइकिल, लक्ष्य की जानकारी और विदेश बैठे हैंडलर का निर्देश पर्याप्त हो सकता था।
5. खालिस्तान लिबरेशन फोर्स का पुनरुद्धार
जांच एजेंसियों ने 2016–17 की लक्षित हत्याओं में खालिस्तान लिबरेशन फोर्स से जुड़े व्यक्तियों की भूमिका की जांच की।
इन मामलों में ब्रिटिश नागरिक जगतार सिंह जौहल सहित कई लोगों को आरोपी बनाया गया। इन मुकदमों की न्यायिक प्रक्रिया लंबी चली; इसलिए प्रत्येक आरोपी के संबंध में गिरफ्तारी, आरोपपत्र और अंतिम दोषसिद्धि के बीच अंतर बनाए रखना आवश्यक है। 2022 तक एनआईए कई मामलों में आरोप तय कराने की प्रक्रिया में थी।
लेकिन संगठनात्मक दृष्टि से यह दौर महत्वपूर्ण था।
करीब दो दशक बाद पहली बार पंजाब में एक संगठित श्रृंखला दिखाई दी जिसमें कथित विदेशी हैंडलर, स्थानीय शूटर, धार्मिक-सामुदायिक लक्ष्य और एन्क्रिप्टेड संपर्क एक ही नेटवर्क मॉडल में जुड़ते थे।
6. आतंकवाद और गैंगस्टर अपराध का मिलना
यहीं एक तीसरा तत्व सामने आया—
गैंगस्टर।
पुराने पंजाब आतंकवाद में संगठन पहले राजनीतिक-वैचारिक था और अपराध धन जुटाने का साधन बनता था।
नई संरचना में कई बार क्रम उलट गया।
पहले से सक्रिय—
शूटर,
गैंगस्टर,
जबरन वसूली करने वाले,
हथियार तस्कर
और जेल नेटवर्क—
को आतंकवादी संगठन किसी विशेष लक्ष्य के लिए इस्तेमाल कर सकते थे।
2017 में पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने लक्षित हत्याओं की जांच के बाद सार्वजनिक रूप से “radicals and gangsters” के बढ़ते गठजोड़ की बात कही थी।
आने वाले वर्षों में यही गठजोड़ पंजाब की प्रमुख सुरक्षा चुनौती बनने वाला था।
7. 2019: ड्रोन ने पाकिस्तान सीमा की पूरी गणित बदल दी
सितंबर 2019 में तरनतारन क्षेत्र में ऐसा मामला सामने आया जिसने पंजाब की सीमा सुरक्षा के लिए एक नई तकनीकी चुनौती पैदा की।
एनआईए की जांच के अनुसार अगस्त और सितंबर 2019 में पाकिस्तान से ड्रोन के माध्यम से पंजाब में कई बार—
हथियार,
गोला-बारूद,
विस्फोटक,
संचार उपकरण
और नकली भारतीय मुद्रा—
गिराई गई।
जर्मनी स्थित एक व्यक्ति और पाकिस्तान स्थित खालिस्तान जिंदाबाद फोर्स के नेता रंजीत सिंह नीटा को जांच में इस नेटवर्क से जोड़ा गया। मार्च 2025 में एनआईए अदालत ने इस मामले में छह आरोपियों को आजीवन कारावास और तीन को दस वर्ष कठोर कारावास की सजा दी।
यह अब केवल पुलिस का दावा नहीं था।
मामला न्यायिक दोषसिद्धियों तक पहुंच चुका था।
8. ड्रोन इतना बड़ा बदलाव क्यों था?
पाकिस्तान सीमा से हथियार तस्करी पुरानी थी।
लेकिन पुराने तरीके जोखिमपूर्ण थे—
सीमा पार व्यक्ति भेजना पड़ता,
तस्कर को तारबंदी पार करनी पड़ती,
बीएसएफ से मुठभेड़ का खतरा होता,
और बड़ी खेप पकड़ में आ सकती थी।
ड्रोन ने यह समीकरण बदल दिया।
कुछ किलो वजन का हथियार पैकेट रात में खेतों में गिराया जा सकता था।
स्थानीय रिसीवर केवल स्थान निर्देश लेकर उसे उठा सकता था।
यदि रिसीवर पकड़ा जाए तब भी पाकिस्तान स्थित ऑपरेटर भारतीय सीमा में आया ही नहीं।
यही तकनीक बाद में—
पिस्तौल,
AK-सीरीज हथियार,
ग्रेनेड,
विस्फोटक,
नकदी
और नशीले पदार्थ—
भेजने में इस्तेमाल होने लगी।
9. हथियार और नशा एक ही नेटवर्क से क्यों जुड़ने लगे?
पंजाब की सीमा पर तस्करी का स्थापित ढांचा पहले से मौजूद था।
हेरोइन और दूसरे नशीले पदार्थ भारत भेजने वाले नेटवर्क के पास—
सीमा क्षेत्र की जानकारी,
स्थानीय रिसीवर,
भुगतान व्यवस्था,
सुरक्षित संपर्क
और पुलिस से बचने की तकनीक—
पहले ही थी।
इसी आधारभूत ढांचे का कुछ हिस्सा हथियार भेजने में भी उपयोग किया जा सकता था।
यहीं से नार्को-टेरर शब्द अधिक महत्वपूर्ण हुआ।
हर नशा तस्कर आतंकवादी नहीं था और हर आतंकवादी नेटवर्क नशे से वित्तपोषित नहीं था। लेकिन जहां एक ही सीमा-पार लॉजिस्टिक चैनल हथियार और ड्रग्स दोनों के लिए इस्तेमाल हो, वहां संगठित अपराध और आतंकवाद के बीच की सीमा धुंधली होने लगती है।
10. मई 2022: मोहाली में पंजाब पुलिस इंटेलिजेंस मुख्यालय पर आरपीजी
9 मई 2022 को मोहाली के सेक्टर 77 में पंजाब पुलिस इंटेलिजेंस मुख्यालय पर रॉकेट-प्रोपेल्ड ग्रेनेड दागा गया।
हमला शाम लगभग 7:45 बजे हुआ। इमारत की एक मंजिल पर विस्फोट हुआ, लेकिन कोई बड़ा जनहानि नहीं हुई।
इस घटना का प्रतीकात्मक महत्व बहुत बड़ा था।
लक्ष्य कोई सामान्य पुलिस चौकी नहीं बल्कि पंजाब पुलिस की खुफिया प्रणाली का मुख्यालय था।
अर्थात संदेश था—
हम सुरक्षा तंत्र के केंद्र तक पहुंच सकते हैं।
जांच में विदेश-आधारित खालिस्तानी और गैंगस्टर नेटवर्क की भूमिका की पड़ताल हुई।
11. दिसंबर 2022: सरहाली पुलिस स्टेशन पर फिर आरपीजी
इसी वर्ष दिसंबर में तरनतारन जिले के सरहाली पुलिस स्टेशन पर आरपीजी हमला हुआ।
बाद की एनआईए जांच में गुरप्रीत सिंह नामक आरोपी को विदेश स्थित घोषित आतंकवादी हरविंदर सिंह उर्फ रिंदा और लखबीर सिंह उर्फ लांडा का सहयोगी बताया गया। एजेंसी के अनुसार वह बीकेआई नेटवर्क के लिए धन जुटाने, स्थानीय युवाओं को भर्ती करने और लक्ष्य की रेकी में भी शामिल था।
इससे नई प्रणाली अधिक स्पष्ट होने लगी—
विदेश स्थित नेता → स्थानीय भर्ती → गैंगस्टर संपर्क → हथियार → पुलिस प्रतिष्ठान।
12. लांडा और रिंदा: नए नेटवर्क के दो महत्वपूर्ण नाम
हरविंदर सिंह संधू उर्फ रिंदा और लखबीर सिंह संधू उर्फ लांडा 2020 के दशक में बार-बार सुरक्षा एजेंसियों के रिकॉर्ड में आए।
एनआईए ने दोनों को बब्बर खालसा इंटरनेशनल से जुड़े घोषित आतंकवादी बताया और पंजाब में आतंकवादी मॉड्यूल, हथियार आपूर्ति, जबरन वसूली तथा लक्षित हमलों की साजिशों से जोड़ा।
इस नेटवर्क की खासियत यह थी कि भारत में उसका स्थायी सार्वजनिक नेतृत्व नहीं था।
हैंडलर स्वयं विदेश में रह सकता था।
स्थानीय अपराधी केवल एक हिस्से का काम जानता था।
हथियार देने वाला व्यक्ति लक्ष्य तय करने वाले को जानता भी न हो।
यह “सेलुलर” व्यवस्था पुराने संगठनात्मक ढांचे से अधिक लचीली थी।
13. गैंगस्टर–आतंकवादी गठजोड़ कैसे काम करता है?
एनआईए की 2024–25 की जांचों से एक सामान्य मॉडल उभरता है।
विदेश स्थित आतंकवादी या गैंगस्टर—
किसी स्थानीय अपराधी को संपर्क करता है।
उसे पैसा, हथियार या किसी हत्या का अनुबंध दिया जाता है।
स्थानीय व्यक्ति आगे छोटे अपराधियों अथवा बेरोजगार युवकों की भर्ती करता है।
हथियार दूसरी तस्करी शृंखला से आता है।
भुगतान हवाला, डिजिटल माध्यम अथवा विदेश से तीसरे व्यक्ति के जरिए हो सकता है।
एनआईए ने जून 2025 में बीकेआई से जुड़े लांडा और गैंगस्टर पवित्तर बटाला के सहयोगी पर आरोपपत्र दाखिल करते हुए कहा कि मध्य प्रदेश से अवैध हथियार पंजाब के गैंगस्टरों तक पहुंचाए जा रहे थे और एन्क्रिप्टेड ऐप तथा वर्चुअल नंबर इस्तेमाल किए जा रहे थे।
इसीलिए नया आतंकवाद केवल विचारधारा से भर्ती पर निर्भर नहीं था।
पैसा और अपराध भी भर्ती का माध्यम बन सकते थे।
14. अर्श डल्ला और ‘टेरर–गैंगस्टर’ श्रेणी
अर्शदीप सिंह गिल उर्फ अर्श डल्ला इस नई श्रेणी का दूसरा प्रमुख नाम बना।
एनआईए ने उसे और उसके सहयोगियों को “pro-Khalistani terror-gangster nexus” मामले में आरोपी बनाया और दिसंबर 2024 में उससे जुड़े संदिग्ध नेटवर्कों पर चार राज्यों और एक केंद्रशासित प्रदेश में 30 स्थानों पर छापे मारे।
ऐसे मामलों में “गैंगस्टर” और “आतंकवादी” का अंतर पूरी तरह समाप्त नहीं होता।
अंतर उद्देश्य का है।
यदि कोई गिरोह हत्या या वसूली केवल अपराध से पैसा कमाने के लिए करता है तो वह संगठित अपराध है।
यदि उसी गिरोह की हिंसक क्षमता किसी प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन, अलगाववादी उद्देश्य या राजनीतिक भय पैदा करने के लिए उपयोग होती है, तब मामला आतंकवादी षड्यंत्र में प्रवेश कर सकता है।
2020 के दशक में पंजाब की सबसे बड़ी सुरक्षा चुनौती इसी दोनों श्रेणियों के मिलन से बनी।
15. 2024: पुलिस प्रतिष्ठानों पर ग्रेनेड हमलों की श्रृंखला
2024 के अंतिम महीनों में पंजाब में एक नया पैटर्न तेजी से उभरा।
नवंबर और दिसंबर के लगभग एक महीने में पुलिस थानों और चौकियों पर कम-से-कम आठ ग्रेनेड अथवा आईईडी हमले सामने आए। इनमें अमृतसर, गुरदासपुर और एसबीएस नगर सहित सीमावर्ती अथवा आसपास के क्षेत्र प्रमुख थे।
दिसंबर में—
मजीठा पुलिस स्टेशन,
अमृतसर का इस्लामाबाद पुलिस स्टेशन,
बक्शीवाला पुलिस चौकी,
एसबीएस नगर की आसरो पुलिस पोस्ट
और गुरदासपुर/बटाला क्षेत्र के दूसरे पुलिस प्रतिष्ठान—
हमलों या संदिग्ध विस्फोटों के निशाने बने।
इनमें अधिकतर हमलों में बड़ी जनहानि नहीं हुई।
लेकिन शायद उद्देश्य भी सामूहिक हत्या नहीं था।
उद्देश्य पुलिस को दिखाना था कि उसके अपने भवन सुरक्षित नहीं हैं।
16. स्थानीय शूटरों की प्रोफाइल में महत्वपूर्ण बदलाव
पंजाब पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने दिसंबर 2024 में इंडियन एक्सप्रेस से कहा कि कई हमलावरों के पास कोई स्पष्ट खालिस्तानी वैचारिक पृष्ठभूमि नहीं थी।
पुलिस के अनुसार विदेश और पाकिस्तान-स्थित हैंडलर—
किशोर,
नशे के आदी युवकों,
छोटे अपराधियों
और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों—
को पैसा और नशा देकर ग्रेनेड फेंकने जैसे काम करवा रहे थे।
यदि यह पुलिस आकलन सही है तो यह पुराने आतंकवाद से एक बहुत महत्वपूर्ण परिवर्तन है।
1980 के दशक में संगठन समर्थक को पहले विचारधारा से जोड़ता था।
अब किसी व्यक्ति को केवल काम करने वाले अपराधी के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता था।
इस मॉडल में वैचारिक समर्थन कम होने के बावजूद हिंसा संभव रहती है।
17. सोशल मीडिया और एन्क्रिप्टेड ऐप—नई भर्ती का केंद्र
नए मॉड्यूल का दूसरा प्रमुख उपकरण डिजिटल संचार था।
एनआईए ने जून 2025 में एसबीएस नगर की आसरो पुलिस पोस्ट पर दिसंबर 2024 के ग्रेनेड हमले में आरोपपत्र दाखिल करते हुए कहा कि विदेश स्थित केजेडएफ ऑपरेटिव ने एक युवक को ब्रिटेन में मौजूद परिचित के माध्यम से भर्ती किया, एन्क्रिप्टेड संदेश सेवा से संपर्क रखा और विदेश स्थित इकाइयों की जटिल श्रृंखला के जरिए 4.36 लाख रुपये से अधिक धन भेजा।
इसके बाद उस युवक ने दो अन्य स्थानीय व्यक्तियों को जोड़ा।
यानी पूरा आतंकवादी मॉड्यूल पंजाब में स्वतः विकसित नहीं हुआ—
उसे दूर से बनाया और संचालित किया गया।
18. 2025: हमले पुलिस स्टेशन से नेताओं और धार्मिक स्थल तक
नवंबर 2024 से मार्च 2025 तक पंजाब में कम-से-कम 12 ग्रेनेड हमले सामने आए। अप्रैल तक संख्या और बढ़ गई।
जनवरी 2025 में—
पुलिस पोस्ट,
शराब कारोबारी के घर,
और राजनीतिक व्यक्ति के घर—
निशाना बने।
मार्च में अमृतसर के खंडवाला स्थित एक मंदिर पर ग्रेनेड फेंका गया। इंडियन एक्सप्रेस ने इसे उस हमले-श्रृंखला में पहला स्पष्ट धार्मिक स्थल लक्ष्य बताया।
यह परिवर्तन चिंताजनक था।
पुलिस भवन पर हमला राज्य को चुनौती देता है।
धार्मिक स्थल पर हमला सामुदायिक प्रतिक्रिया पैदा कर सकता है।
2016–17 की लक्षित हत्याओं की तरह यहां भी सांप्रदायिक तनाव उत्पन्न करने की क्षमता अधिक थी।
19. बीकेआई, रिंदा और ‘हैप्पी पासिया’ नेटवर्क
2024–25 की कई घटनाओं की जांच में अमेरिकी-आधारित हरप्रीत सिंह उर्फ हैप्पी पासिया और पाकिस्तान-स्थित हरविंदर सिंह रिंदा के नाम सामने आए।
एनआईए ने जून 2025 में गुरदासपुर के घनीए के बांगर पुलिस स्टेशन ग्रेनेड हमले में सात लोगों के विरुद्ध आरोपपत्र दाखिल किया। एजेंसी के अनुसार बीकेआई के पासिया और रिंदा इस साजिश में विदेश से भूमिका निभा रहे थे।
पंजाब पुलिस के 2025 के डोजियर के अनुसार नवंबर 2024 से 2025 के शुरुआती महीनों के बीच बीकेआई से जुड़े नेटवर्क पर पुलिस प्रतिष्ठानों और अधिकारियों के घरों समेत लगभग 16 हमलों का आरोप था। यह पुलिस का जांच-आधारित आकलन है, अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं।
अप्रैल 2025 में अमेरिकी एजेंसियों ने हैप्पी पासिया को गिरफ्तार किया।
इससे स्पष्ट है कि पंजाब का आतंकवाद-विरोधी अभियान अब केवल पंजाब पुलिस का मामला नहीं रहा—
अंतरराष्ट्रीय कानून-प्रवर्तन सहयोग उसकी आवश्यकता बन चुका था।
20. पुलिस थाने किले क्यों बनने लगे?
फरवरी 2025 तक अमृतसर और गुरदासपुर के अनेक सीमावर्ती पुलिस थानों के बाहर—
कांटेदार तार,
धातु की चादरें,
बैरियर,
नए संतरी स्थान
और बख्तरबंद वाहन—
दिखाई देने लगे।
रात में मुख्य द्वार बंद किए जाने लगे।
यह दृश्य प्रतीकात्मक था।
1990 के दशक में पंजाब पुलिस आतंकवादी गांवों का पीछा करती थी।
2025 में छोटे ग्रेनेड मॉड्यूल पुलिस भवनों को रक्षात्मक संरचना अपनाने पर मजबूर कर रहे थे।
फिर भी दोनों दौर की तुलना सावधानी से करनी होगी।
तब पुलिसकर्मियों की सैकड़ों वार्षिक मौतें थीं।
अब अधिकांश हमले छोटे, कम-हानि वाले और प्रतीकात्मक थे।
21. ‘गैंगस्टर से आतंकवादी’—पाकिस्तान स्थित शाहजाद भट्टी का मामला
2025–26 में एक और प्रवृत्ति अधिक स्पष्ट हुई—
पाकिस्तान स्थित आपराधिक नेटवर्क का आतंकवादी हमलों में इस्तेमाल।
एनआईए ने अप्रैल 2026 में जालंधर के यूट्यूबर रोजर संधू के घर पर 16 मार्च 2025 को हुए ग्रेनेड हमले में पाकिस्तानी गैंगस्टर शाहजाद भट्टी सहित दो आरोपियों के विरुद्ध आरोपपत्र दाखिल किया।
एनआईए के अनुसार भट्टी ने विदेश से हमले का संचालन किया और व्यापक नेटवर्क—
लक्षित हत्याओं,
भर्ती,
हथियार तस्करी
और स्थानीय ऑपरेटिवों—
से जुड़ा था।
मई 2026 में एनआईए ने हरियाणा के सिरसा महिला पुलिस स्टेशन पर नवंबर 2025 के ग्रेनेड हमले में भी भट्टी सहित दो पाकिस्तानी नागरिकों और सात भारतीय आरोपियों पर आरोपपत्र दाखिल किया। एजेंसी के अनुसार आरोपियों की भर्ती सोशल मीडिया और एन्क्रिप्टेड चैनलों के माध्यम से हुई और ग्रेनेड पंजाब से प्राप्त किया गया।
यह मॉडल अब पंजाब की भौगोलिक सीमा से बाहर भी फैलने लगा था।
22. 2026 तक कनाडा और अन्य देशों की भूमिका पर भारतीय जांच
अप्रैल 2026 में इंडियन एक्सप्रेस ने पंजाब पुलिस के 65-पृष्ठीय गोपनीय डोजियर के आधार पर रिपोर्ट किया कि पुलिस कनाडा को कुछ अंतरराष्ट्रीय अपराधी-आतंकवादी नेटवर्कों के “proxy operational base” के रूप में देख रही है।
डोजियर में लांडा, अर्श डल्ला और अन्य व्यक्तियों से जुड़े नेटवर्कों पर—
धमकी,
वसूली,
लक्षित हत्या
और पंजाब में हिंसक मॉड्यूल संचालित करने—
के आरोप लगाए गए। इसमें पाकिस्तान की आईएसआई और प्रतिबंधित संगठनों से संपर्क का भी दावा था।
यह पंजाब पुलिस का सुरक्षा डोजियर है, इसलिए उसके आरोपों को स्वतः न्यायिक तथ्य नहीं माना जा सकता।
लेकिन इससे 2026 तक खतरे की संरचना स्पष्ट होती है—
पाकिस्तान में हथियार/हैंडलर, पश्चिमी देशों में कुछ ऑपरेटिव, और पंजाब में किराए या भर्ती किए गए स्थानीय मॉड्यूल।
23. 2026: खतरा समाप्त नहीं, लगातार नए मामले
2026 में भी राष्ट्रीय जांच एजेंसी पंजाब और उससे जुड़े सीमा-पार नेटवर्क की कई जांचें चला रही थी।
एनआईए की केस सूची में 2026 में पाकिस्तान की ओर से ड्रोन के माध्यम से अवैध हथियारों और गोला-बारूद की बड़ी खेप गिराए जाने से संबंधित नया मामला दर्ज है।
जून 2026 में एजेंसी ने पंजाब और हरियाणा में पाकिस्तान-स्थित शाहजाद भट्टी से जुड़े तीन अलग आतंक–गैंगस्टर मामलों में 18 स्थानों पर तलाशी की।
इसलिए 2026 में यह कहना कि पंजाब में आतंकवादी खतरा पूरी तरह समाप्त हो चुका है, तथ्यात्मक नहीं होगा।
लेकिन उतना ही गलत यह कहना होगा कि पंजाब फिर 1991 की स्थिति में पहुंच चुका है।
24. पुराने आतंकवाद और नए आतंकवाद में सबसे बड़ा अंतर
दोनों दौर को साथ रखें तो फर्क बहुत स्पष्ट है।
यही कारण है कि केवल ग्रेनेड हमलों की संख्या देखकर “1980 का आतंकवाद लौट आया” कहना उचित नहीं है।
संरचना बिल्कुल अलग है।
25. क्या पंजाब में फिर 1980–90 जैसा आतंकवाद लौट सकता है?
ऐतिहासिक तुलना से तीन बातें सामने आती हैं।
पहला—बाहरी क्षमता मौजूद है
पाकिस्तान से हथियार और ड्रोन भेजने के न्यायिक रूप से स्थापित मामले हैं।
विदेश स्थित आतंकवादी और गैंगस्टर नेटवर्क स्थानीय मॉड्यूल बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
इसलिए खतरे को केवल प्रचार कहकर खारिज नहीं किया जा सकता।
दूसरा—स्थानीय सामाजिक आधार अभी तुलनीय नहीं
1980 के दशक जैसा ग्रामीण हथियारबंद आंदोलन, हजारों सक्रिय कैडर और समानांतर राजनीतिक संरचना वर्तमान पंजाब में दिखाई नहीं देती।
2024 के हमलों की जांच में स्वयं वरिष्ठ पंजाब पुलिस अधिकारियों ने कहा कि कई स्थानीय हमलावरों के पास स्पष्ट वैचारिक पृष्ठभूमि नहीं थी और उन्हें पैसा या नशे के माध्यम से भर्ती किया गया।
यह खतरे की गंभीरता कम नहीं करता—
लेकिन उसका स्वरूप बताता है।
तीसरा—राज्य की निगरानी क्षमता कहीं अधिक है
पंजाब पुलिस, केंद्रीय एजेंसियां, इलेक्ट्रॉनिक निगरानी, ड्रोन-रोधी प्रणाली, सीमा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय कानून-प्रवर्तन सहयोग 1980 के दशक की तुलना में कहीं अधिक विकसित हैं।
इसीलिए अधिकांश मॉड्यूल बड़े संगठन में बदलने से पहले पकड़े जाते रहे हैं।
26. नशीले पदार्थ और आतंकवाद का मेल कितना वास्तविक है?
इसे भी अतिरंजित नहीं करना चाहिए।
पंजाब में हर नशीली दवा की खेप आतंकवाद के लिए नहीं आती।
नशीले पदार्थों का सबसे बड़ा हिस्सा संगठित अपराध और लाभ के लिए तस्करी है।
लेकिन सुरक्षा एजेंसियों ने ऐसे मामलों का दस्तावेजीकरण किया है जिनमें सीमा-पार नेटवर्क—
हेरोइन,
हथियार,
विस्फोटक
और नकदी—
एक ही लॉजिस्टिक चैनल से भेजते हैं।
इसलिए “नार्को-टेरर” को पूरे ड्रग व्यापार का पर्याय नहीं बल्कि उस विशिष्ट हिस्से के लिए इस्तेमाल करना चाहिए जहां मादक पदार्थों से प्राप्त धन या तस्करी ढांचा आतंकवादी गतिविधि से जुड़ता है।
27. आतंकवाद का नया ‘फ्रेंचाइजी मॉडल’
2015–26 के पूरे दौर को समझाने वाला सबसे उपयुक्त शब्द है—
फ्रेंचाइजी मॉडल।
विदेश स्थित संचालक को पंजाब में पूर्ण संगठन बनाने की आवश्यकता नहीं।
वह किसी युवक को—
ग्रेनेड फेंकने,
किसी की रेकी करने,
हथियार उठाकर दूसरी जगह पहुंचाने,
किसी व्यक्ति पर गोली चलाने
या धमकी का वीडियो बनाने—
के लिए अलग-अलग नियुक्त कर सकता है।
व्यक्ति अपने से ऊपर केवल एक संपर्क जानता है।
यदि वह पकड़ा जाए, तो पूरा नेटवर्क उजागर होना कठिन होता है।
दिसंबर 2024 के आसरो पुलिस पोस्ट मामले में एनआईए द्वारा बताई गई भर्ती, विदेशी धन और एन्क्रिप्टेड नियंत्रण की संरचना इसी मॉडल का स्पष्ट उदाहरण है।
28. इसलिए ग्रेनेड हमला छोटा होकर भी महत्वपूर्ण है
यदि खाली पुलिस चौकी पर ग्रेनेड फेंका जाए और कोई न मरे, तो केवल मृत्यु संख्या देखकर घटना मामूली लग सकती है।
लेकिन आतंकवाद का उद्देश्य हमेशा अधिकतम हत्या नहीं होता।
कभी उद्देश्य होता है—
पुलिस को भय दिखाना,
सोशल मीडिया प्रचार बनाना,
विदेशी हैंडलर को सफलता दिखाना,
स्थानीय भर्ती का मनोबल बढ़ाना
और राजनीतिक वातावरण में असुरक्षा का संदेश देना।
इसीलिए 2024–25 में कम हताहतों वाले हमले भी सुरक्षा दृष्टि से महत्वपूर्ण थे।
29. 2015 से 2026 की संक्षिप्त समयरेखा
जुलाई 2015: दीनानगर हमला; पाकिस्तान से आए तीन आतंकवादी, लेकिन खालिस्तानी मॉड्यूल से अलग जिहादी श्रेणी।
जनवरी 2016: पठानकोट वायुसेना स्टेशन हमला; एनआईए ने जैश-ए-मोहम्मद से जुड़ी पाकिस्तान-आधारित साजिश बताई।
2016–17: धार्मिक-सामाजिक संगठनों से जुड़े व्यक्तियों की लक्षित हत्याओं की श्रृंखला; एनआईए ने विदेशी वित्तपोषण और व्यापक षड्यंत्र की जांच की।
2019: तरनतारन में पाकिस्तान से ड्रोन द्वारा हथियार, विस्फोटक और संचार उपकरण गिराने का केजेडएफ मामला; 2025 में दोषसिद्धियां।
मई 2022: मोहाली पंजाब पुलिस इंटेलिजेंस मुख्यालय पर आरपीजी हमला।
दिसंबर 2022: सरहाली पुलिस स्टेशन पर आरपीजी; बाद की एनआईए जांच में बीकेआई से जुड़े लांडा–रिंदा नेटवर्क के आरोप।
2023–24: एनआईए द्वारा आतंक–गैंगस्टर गठजोड़ पर बड़े पैमाने की जांच और छापे; अर्श डल्ला और दूसरे विदेशी नेटवर्कों पर कार्रवाई।
नवंबर–दिसंबर 2024: पुलिस थानों और चौकियों पर तेजी से ग्रेनेड/आईईडी हमले।
जनवरी–मार्च 2025: हमले पुलिस प्रतिष्ठानों से निजी घरों और धार्मिक स्थल तक विस्तृत।
जून 2025: एनआईए द्वारा केजेडएफ के आसरो पुलिस पोस्ट और बीकेआई के गुरदासपुर पुलिस स्टेशन मामलों में आरोपपत्र।
2026: पाकिस्तान-स्थित अपराधी-आतंकी हैंडलर, सीमा-पार ड्रोन हथियार और अंतरराष्ट्रीय गैंगस्टर नेटवर्क संबंधी जांचें जारी।
निष्कर्ष: पंजाब में आतंकवाद लौटा नहीं—लेकिन उसने रूप बदल लिया है
2015 से 2026 तक की घटनाओं को यदि 1980–90 के इतिहास से जोड़कर देखा जाए तो सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यही है—
पंजाब में पुराना आतंकवादी विद्रोह वापस नहीं आया है।
न कोई हजारों कैडर वाला भूमिगत आंदोलन है,
न बड़े ग्रामीण क्षेत्र आतंकवादी नियंत्रण में हैं,
न चुनाव रोकने की क्षमता,
न रोजाना दर्जनों नागरिक हत्याएं,
और न ऐसा सामाजिक आधार जो 1980 के दशक की परिस्थितियों से तुलना योग्य हो।
लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
पाकिस्तान से ड्रोन द्वारा हथियार पहुंचाने का न्यायिक रूप से सिद्ध मामला मौजूद है।
विदेशी हैंडलरों द्वारा स्थानीय युवकों को एन्क्रिप्टेड ऐप से भर्ती और धन उपलब्ध कराने की एनआईए जांच सामने है।
बीकेआई, केजेडएफ और दूसरे नेटवर्कों को पुलिस प्रतिष्ठानों पर हमलों से जोड़ा गया है।
गैंगस्टर और आतंकवादी नेटवर्क के बीच हथियार, शूटर, जबरन वसूली और लॉजिस्टिक संबंधों पर एनआईए तथा पंजाब पुलिस की अनेक जांचें चल रही हैं।
और 2026 तक सीमा-पार ड्रोन हथियार गिराने से संबंधित नए मामले दर्ज हो रहे हैं।
इसलिए पंजाब की मौजूदा सुरक्षा चुनौती को सबसे सही रूप में इस प्रकार समझा जा सकता है—
यह जनाधारित अलगाववादी विद्रोह नहीं, बल्कि सीमा-पार समर्थित, विदेश-नियंत्रित, अपराधी नेटवर्कों से जुड़ा और छोटे स्थानीय मॉड्यूलों पर आधारित आतंकवादी खतरा है।
इस मॉडल की ताकत है—
कम लागत,
कम सदस्य,
दूर से नियंत्रण
और अचानक हमला।
उसकी कमजोरी है—
स्थायी स्थानीय जनाधार का अभाव।
यही सबसे बड़ा कारण है कि 2024–26 की चिंताजनक ग्रेनेड और हथियार घटनाओं के बावजूद पंजाब अभी 1988–91 जैसी आतंकवादी अवस्था में नहीं है।
लेकिन 1980 के दशक का इतिहास यह भी सिखाता है कि छोटे मॉड्यूलों और राजनीतिक हिंसा को केवल इसलिए नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि उनकी तत्काल मृत्यु संख्या कम है।
किसी आतंकवादी आंदोलन की शुरुआत प्रायः हजारों लोगों से नहीं होती।
वह—
चुनिंदा हत्याओं,
प्रतीकात्मक हमलों,
हथियारों की गुप्त आपूर्ति,
विदेशी वित्त,
और स्थानीय असंतोष को हिंसक दिशा देने—
से बढ़ता है।
इसलिए 2026 में पंजाब के लिए सबसे बड़ी चुनौती केवल आतंकवादियों को पकड़ना नहीं है।
वास्तविक चुनौती है—
विदेशी हैंडलर और स्थानीय अपराधी के बीच की कड़ी तोड़ना, ड्रोन और सीमा-पार हथियार नेटवर्क रोकना, गैंगस्टर भर्ती व्यवस्था ध्वस्त करना और यह सुनिश्चित करना कि किसी वास्तविक सामाजिक या राजनीतिक शिकायत को हथियारबंद अलगाववादी नेटवर्क अपने लिए भर्ती का आधार न बना सके।
यहीं इस शोध का अगला प्रश्न शुरू होता है।