विदेशों में खालिस्तान नेटवर्क: कनाडा, ब्रिटेन, अमेरिका और यूरोप में आंदोलन, फंडिंग और आतंकवाद से संबंध
पंजाब आतंकवाद की कहानी केवल पंजाब या पाकिस्तान की सीमा तक सीमित नहीं रही। 1980 के दशक से ही ब्रिटेन, कनाडा, अमेरिका और पश्चिमी यूरोप में बसे कुछ खालिस्तान समर्थक समूहों ने अलग सिख राज्य की मांग को राजनीतिक, प्रचारात्मक और कुछ मामलों में हिंसक संगठनात्मक रूप दिया।
लेकिन इस अध्याय की पहली और सबसे महत्वपूर्ण सीमा स्पष्ट है—
विदेशों में रहने वाला सिख समुदाय, खालिस्तान का शांतिपूर्ण राजनीतिक समर्थन और आतंकवादी गतिविधि—तीनों एक ही चीज नहीं हैं।
किसी व्यक्ति द्वारा खालिस्तान की राजनीतिक मांग का समर्थन करना अपने आप में आतंकवादी गतिविधि नहीं है। आतंकवाद का प्रश्न वहां शुरू होता है जहां संगठन या व्यक्ति—
हत्या,
बम विस्फोट,
हथियार जुटाने,
आतंकवादी वित्तपोषण,
भर्ती,
प्रशिक्षण
या हिंसक मॉड्यूल चलाने—
से जुड़ते हैं।
यही भेद पूरे अध्याय में बनाए रखना आवश्यक है।
1. प्रवासी सिख राजनीति इतनी महत्वपूर्ण कैसे बनी?
ब्रिटेन और कनाडा में सिख प्रवास स्वतंत्रता से पहले ही शुरू हो चुका था, लेकिन 1960 और 1970 के दशक के बाद इसकी संख्या तेजी से बढ़ी।
1984 ने इस प्रवासी राजनीति को निर्णायक रूप से बदल दिया।
ऑपरेशन ब्लू स्टार, अकाल तख्त को हुई क्षति और उसके बाद की घटनाओं ने भारत से बाहर बसे सिखों के एक हिस्से में तीव्र प्रतिक्रिया पैदा की। विदेशों में विरोध प्रदर्शन, संस्थाएं, धार्मिक मंच और खालिस्तान समर्थक संगठन अधिक सक्रिय हुए।
इसी समय पंजाब के भीतर आतंकवादी संगठनों को ऐसा बाहरी वातावरण मिला जहां—
धन जुटाया जा सकता था,
राजनीतिक प्रचार किया जा सकता था,
नेताओं को शरण मिल सकती थी,
और भारत से बाहर संगठनात्मक ढांचा बनाया जा सकता था।
अमेरिकी विदेश विभाग की 1999 की आतंकवाद रिपोर्ट ने भी सिख उग्रवादी संगठनों की गतिविधि का क्षेत्र भारत के अतिरिक्त पश्चिमी यूरोप और उत्तरी अमेरिका बताया और लिखा कि विदेशों से धन जुटाया जाता था।
2. लेकिन हर खालिस्तान समर्थक संस्था आतंकवादी संगठन नहीं
यह अंतर विशेष रूप से विदेशों में जरूरी है।
1980 के दशक से विभिन्न संस्थाएं—
सिख अधिकार,
1984 की घटनाओं की जांच,
अलग खालिस्तान,
धार्मिक पहचान
और मानवाधिकार—
पर अभियान चलाती रही हैं।
इनमें से कुछ पूरी तरह राजनीतिक या सामाजिक संगठन हैं।
दूसरी ओर कुछ संगठनों को भारत, कनाडा, ब्रिटेन अथवा अमेरिका ने आतंकवाद से संबंधित कानूनी श्रेणियों में रखा।
उदाहरण के लिए भारत की वर्तमान आतंकवादी संगठन सूची में बब्बर खालसा इंटरनेशनल, खालिस्तान कमांडो फोर्स, खालिस्तान जिंदाबाद फोर्स और इंटरनेशनल सिख यूथ फेडरेशन शामिल हैं।
कनाडा की वर्तमान सूची में भी बब्बर खालसा इंटरनेशनल और इंटरनेशनल सिख यूथ फेडरेशन सूचीबद्ध इकाइयां हैं।
इसलिए संगठन-दर-संगठन कानूनी स्थिति देखना आवश्यक है।
3. कनाडा: विदेश स्थित खालिस्तानी नेटवर्क का सबसे महत्वपूर्ण प्रारंभिक केंद्र
पंजाब आतंकवाद के इतिहास में कनाडा का नाम सबसे अधिक 1985 की एयर इंडिया फ्लाइट 182 की बमबारी से जुड़ता है।
कनाडा की आधिकारिक जांच और बाद की सरकारी सामग्री ने स्वीकार किया कि 1980 के दशक में देश के भीतर हिंसक सिख उग्रवाद का वास्तविक सुरक्षा खतरा मौजूद था।
आज भी कनाडा अपनी आधिकारिक आतंकवादी सूची में बब्बर खालसा इंटरनेशनल को रखता है और उसके बारे में कहता है कि संगठन के सदस्य पाकिस्तान, उत्तरी अमेरिका, यूरोप और स्कैंडिनेविया तक फैले रहे हैं तथा उसके इतिहास में सशस्त्र हमले, हत्या और बम विस्फोट शामिल रहे हैं।
यही तथ्य इस चर्चा को केवल भारत-कनाडा राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से अलग करता है।
कनाडा स्वयं भी कुछ खालिस्तानी संगठनों को आतंकवादी इकाइयों के रूप में वर्गीकृत करता है।
4. एयर इंडिया फ्लाइट 182: विदेश स्थित खालिस्तानी आतंकवाद की सबसे भयावह घटना
23 जून 1985 को एयर इंडिया की उड़ान 182, जिसे विमान के नाम से कनिष्क भी कहा जाता था, आयरलैंड के तट के निकट अटलांटिक महासागर के ऊपर विस्फोट से नष्ट हो गई।
सभी 329 यात्री और चालक दल के सदस्य मारे गए।
कनाडा सरकार इसे आज भी कनाडा के इतिहास का सबसे भीषण आतंकवादी हमला मानती है। उसी दिन जापान के नारिता हवाई अड्डे पर दूसरी संबंधित बम घटना में दो बैगेज कर्मचारियों की मौत हुई।
कनाडाई सरकारी सामग्री ने दोनों घटनाओं को कनाडा में सक्रिय सिख आतंकवादी नेटवर्क से जोड़ा है।
इस हमले ने पहली बार दुनिया को दिखाया कि पंजाब का आतंकवाद भारत से हजारों किलोमीटर दूर भी सामूहिक हत्या कर सकता है।
5. कनिष्क जांच ने क्या स्थापित किया?
कनाडा की जांच में तलविंदर सिंह परमार का नाम मुख्य संदिग्ध और साजिश के नेता के रूप में सामने आया।
ब्रिटिश कोलंबिया सुप्रीम कोर्ट के बाद के फैसले में भी अभियोजन और बचाव—दोनों ने सामान्य रूप से यह स्वीकार किया कि परमार साजिश का नेता था। लेकिन वह मुकदमे से पहले भारत में मारा जा चुका था।
इंदरजीत सिंह रेयत ने 2003 में फ्लाइट 182 में इस्तेमाल विस्फोटक उपकरण बनाने में सहायता और 329 लोगों की हत्या से संबंधित मानववध अपराध स्वीकार किया।
दूसरी ओर रिपुदमन सिंह मलिक और अजायब सिंह बागरी को 2005 में ब्रिटिश कोलंबिया सुप्रीम कोर्ट ने सभी आरोपों से बरी कर दिया क्योंकि अभियोजन आरोप उचित संदेह से परे सिद्ध नहीं कर सका।
यह अंतर महत्वपूर्ण है।
कनिष्क बम विस्फोट का आतंकवादी षड्यंत्र स्थापित है।
लेकिन हर नामित या गिरफ्तार व्यक्ति दोषी सिद्ध नहीं हुआ।
6. कनाडा ने बाद में इसे केवल ‘भारत की समस्या’ मानने की भूल स्वीकार की
एयर इंडिया त्रासदी की सबसे महत्वपूर्ण विरासत केवल हमला नहीं बल्कि कनाडाई सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा भी थी।
2006 में सार्वजनिक जांच की घोषणा करते समय कनाडा के प्रधानमंत्री स्टीफन हार्पर ने स्वीकार किया कि लंबे समय तक एयर इंडिया मामले को ऐसे देखा गया जैसे यह भारत की राजनीति से जुड़ी समस्या हो, जबकि मृतकों में बड़ी संख्या कनाडाई नागरिकों की थी।
इसके बाद न्यायमूर्ति जॉन मेजर के नेतृत्व में विस्तृत आयोग बना।
उसकी अंतिम रिपोर्ट कई खंडों में थी—
हमले से पहले की खुफिया जानकारी,
आरसीएमपी और सीएसआईएस समन्वय,
आतंकवादी वित्तपोषण,
विमानन सुरक्षा
और आतंकवादी मुकदमों की समस्याएं।
इसका अर्थ था कि कनाडा ने एयर इंडिया 182 को अंततः एक घरेलू कनाडाई आतंकवाद और सुरक्षा विफलता के रूप में भी स्वीकार किया।
7. बब्बर खालसा इंटरनेशनल: सबसे व्यापक अंतरराष्ट्रीय कानूनी पहचान
विदेशी खालिस्तानी संगठनों में बब्बर खालसा इंटरनेशनल की स्थिति सबसे स्पष्ट है।
भारत इसे आतंकवादी संगठन मानता है।
कनाडा ने इसे 18 जून 2003 से सूचीबद्ध आतंकवादी इकाई रखा है और जून 2024 में उसकी वैधानिक समीक्षा फिर पूरी की।
ब्रिटेन में बब्बर खालसा मार्च 2001 से प्रतिबंधित है। जुलाई 2026 में ब्रिटिश गृह मंत्रालय ने “Babbar Khalsa International” को उसी प्रतिबंधित संगठन का वैकल्पिक नाम स्पष्ट रूप से जोड़ दिया।
अमेरिका ने भी 2002 में बब्बर खालसा इंटरनेशनल को विशेष रूप से नामित वैश्विक आतंकवादी इकाई के रूप में सूचीबद्ध किया था और वह अमेरिकी Terrorist Exclusion List में भी दर्ज रहा है।
यानी बीकेआई की आतंकवादी पहचान केवल भारत सरकार का वर्गीकरण नहीं है।
8. इंटरनेशनल सिख यूथ फेडरेशन: देशों की कानूनी स्थिति अलग-अलग
इंटरनेशनल सिख यूथ फेडरेशन—आईएसवाईएफ—1984 में ब्रिटेन में स्थापित हुआ और विभिन्न देशों में उसके केंद्र बने।
कनाडा की वर्तमान सुरक्षा सूची के अनुसार आईएसवाईएफ पर बमबारी, हत्या और अपहरण जैसी गतिविधियों तथा बब्बर खालसा से सहयोग के आरोप रहे हैं। कनाडा ने इसे 2003 से आतंकवादी इकाई की सूची में रखा है।
भारत भी इसे अपनी आतंकवादी संगठन सूची में रखता है।
लेकिन ब्रिटेन ने आईएसवाईएफ को मार्च 2016 में प्रतिबंधित संगठनों की सूची से हटा दिया। ब्रिटिश गृह मंत्रालय स्वयं इस तथ्य को दर्ज करता है।
यह उदाहरण दिखाता है कि किसी संगठन की कानूनी स्थिति हर देश में हमेशा समान नहीं होती।
9. ब्रिटेन: राजनीति, गुरुद्वारे और हिंसक नेटवर्क—तीनों को अलग रखना होगा
ब्रिटेन में सिख आबादी पुरानी और बड़ी है।
खालिस्तान समर्थक राजनीतिक गतिविधि भी वहां दशकों से मौजूद है।
लेकिन ब्रिटिश कानून शांतिपूर्ण राजनीतिक अभिव्यक्ति और आतंकवादी संगठन के बीच स्पष्ट अंतर करता है।
2026 तक बब्बर खालसा प्रतिबंधित संगठन है।
दूसरी ओर आईएसवाईएफ का प्रतिबंध 2016 में हटा दिया गया।
इसलिए ब्रिटेन में किसी खालिस्तान रैली, झंडे या राजनीतिक संगठन की उपस्थिति को अपने आप बब्बर खालसा अथवा आतंकवादी नेटवर्क का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
जहां हिंसक षड्यंत्र, धन या हथियार का विशिष्ट प्रमाण हो, वहीं आतंकवादी श्रेणी लागू होती है।
10. अमेरिका: आतंकवादी संगठन और राजनीतिक अलगाववादी अभियान में अंतर
अमेरिका में भी यही अंतर महत्वपूर्ण है।
अमेरिकी सरकार ने बब्बर खालसा इंटरनेशनल और आईएसवाईएफ को 2002 में आतंकवाद से जुड़ी वित्तीय प्रतिबंध श्रेणी में रखा था।
लेकिन अमेरिका में सभी खालिस्तान समर्थक राजनीतिक समूह आतंकवादी संगठन घोषित नहीं हैं।
उदाहरण के लिए अमेरिका में सक्रिय सिख्स फॉर जस्टिस को भारत ने गैरकानूनी संगठन घोषित किया है और जुलाई 2024 से उसका प्रतिबंध अगले पांच वर्ष के लिए बढ़ाया गया; जनवरी 2025 में भारत के यूएपीए ट्रिब्यूनल ने इस विस्तार की पुष्टि की।
लेकिन यह भारत की कानूनी स्थिति है।
अमेरिका ने एसएफजे को बब्बर खालसा की तरह संघीय आतंकवादी संगठन सूची में नहीं रखा।
इसलिए दोनों को कानूनी रूप से एक ही श्रेणी में लिखना गलत होगा।
11. पन्नून प्रकरण: विदेश स्थित अलगाववादी राजनीति और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा विवाद
अमेरिका में गुरपतवंत सिंह पन्नून से जुड़े मामले ने एक अलग प्रकार का प्रश्न खड़ा किया।
अमेरिकी न्याय विभाग ने 2023–24 में आरोप लगाया कि अमेरिकी नागरिक और सिख अलगाववादी आंदोलन के नेता की हत्या की साजिश बनाई गई। निखिल गुप्ता को प्रत्यर्पित कर अमेरिका लाया गया और अक्टूबर 2024 में अमेरिकी अभियोजकों ने भारतीय सरकारी कर्मचारी विकास यादव पर कथित रूप से हत्या की साजिश निर्देशित करने का आरोप लगाया।
ये अमेरिकी अभियोग के आरोप हैं; अंतिम आपराधिक दोषसिद्धि नहीं।
यह प्रकरण इस अध्याय में इसलिए महत्वपूर्ण है कि इससे विदेश स्थित खालिस्तान समर्थक राजनीति अब केवल आतंकवादी वित्त या प्रचार का प्रश्न नहीं रही—
यह भारत और पश्चिमी देशों के बीच कानून, संप्रभुता और सुरक्षा का संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय विवाद भी बन गई।
लेकिन पन्नून की राजनीतिक गतिविधि और बीकेआई जैसे आतंकवादी संगठन की कानूनी स्थिति को एक-दूसरे में मिलाना उचित नहीं है।
12. विदेश से पैसा: क्या प्रमाण उपलब्ध हैं?
पंजाब आतंकवाद के दौरान विदेशी धन का उल्लेख कई स्रोतों में मिलता है।
अमेरिकी विदेश विभाग की 1999 की रिपोर्ट ने कहा था कि उग्रवादी सिख समूहों के सेल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय थे और विदेश स्थित सिख समुदायों से धन जुटाया जाता था।
लेकिन “विदेशों से धन आया” कहना पर्याप्त विश्लेषण नहीं है।
धन कई प्रकार का हो सकता है—
गुरुद्वारे के लिए धार्मिक दान,
मानवाधिकार अभियान,
राजनीतिक प्रचार,
1984 पीड़ित सहायता,
कानूनी सहायता,
या प्रतिबंधित संगठन की हिंसक गतिविधि के लिए धन।
इन सभी को एक श्रेणी में रखना गलत होगा।
आतंकवादी वित्त तभी कहा जाना चाहिए जब पैसा किसी हिंसक संगठन, हथियार, हत्या, प्रशिक्षण या आतंकी षड्यंत्र से प्रमाणित रूप से जुड़ा हो।
13. गुरुद्वारे: धार्मिक संस्थाएं या राजनीतिक मंच?
ब्रिटेन, कनाडा और अमेरिका में गुरुद्वारे स्वाभाविक रूप से सिख प्रवासी समाज के सामाजिक और धार्मिक केंद्र हैं।
1980 के दशक में कुछ गुरुद्वारों के प्रबंधन पर खालिस्तान समर्थक और विरोधी गुटों के बीच तीखे संघर्ष हुए।
कुछ स्थानों पर इन संस्थानों का उपयोग राजनीतिक धन-संग्रह और प्रचार के लिए हुआ।
लेकिन इस आधार पर विदेशी गुरुद्वारों को सामान्य रूप से आतंकवादी वित्तपोषण का केंद्र कहना प्रमाण से कहीं आगे जाना होगा।
कनिष्क जांच में आतंकवादी वित्तपोषण पर पूरा एक खंड रखा गया था, जो यह दिखाता है कि सरकार को धर्मार्थ और सामुदायिक धन के दुरुपयोग की वास्तविक चिंता थी; लेकिन आयोग ने भी व्यापक समुदाय और विशिष्ट आतंकवादी गतिविधि के बीच फर्क आवश्यक माना।
14. यूरोप: ब्रिटेन से आगे जर्मनी और अन्य केंद्र
खालिस्तानी नेटवर्क केवल ब्रिटेन और कनाडा तक सीमित नहीं रहे।
कनाडा की वर्तमान आतंकवादी सूची स्वयं बीकेआई के सदस्यों की उपस्थिति उत्तरी अमेरिका के साथ यूरोप और स्कैंडिनेविया में दर्ज करती है।
भारत की जांच एजेंसियों ने बाद के वर्षों में जर्मनी और यूरोप में बसे व्यक्तियों को पंजाब में मॉड्यूल, हथियार या धन पहुंचाने के मामलों से भी जोड़ा।
लेकिन यूरोप की स्थिति भी समान नहीं रही।
कुछ देश विशिष्ट संगठनों को प्रतिबंधित करते हैं,
कुछ केवल व्यक्तियों पर कार्रवाई करते हैं,
और कुछ राजनीतिक खालिस्तान प्रचार को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अंतर्गत अनुमति देते हैं जब तक वह हिंसा या आतंकवादी सहायता में न बदले।
इसलिए “यूरोप खालिस्तान आतंकवाद का केंद्र है” जैसा व्यापक वाक्य तथ्यात्मक रूप से अनुपयोगी होगा।
15. विदेश और पाकिस्तान के नेटवर्क कहां मिलते हैं?
पिछले अध्याय में देखा गया कि पाकिस्तान में बीकेआई, केसीएफ, केजेडएफ और अन्य संगठनों के नेतृत्व को लेकर भारत सरकार लंबे समय से आरोप लगाती रही है।
विदेशी नेटवर्क का महत्व वहां बढ़ता है जहां—
यूरोप या उत्तरी अमेरिका से पैसा,
पाकिस्तान स्थित हैंडलर,
और पंजाब स्थित स्थानीय मॉड्यूल—
एक ही परिचालन श्रृंखला में जुड़ते हैं।
यानी तीन-स्तरीय मॉडल बनता है:
विदेश में धन/संपर्क → पाकिस्तान में हथियार/हैंडलर → पंजाब में स्थानीय ऑपरेटिव।
ऐसे सभी दावों को प्रत्येक मामले के प्रमाण के आधार पर देखना आवश्यक है।
लेकिन 1995 के बाद पंजाब में आतंकवादी पुनर्जीवन के अनेक जांच मामलों का यही सामान्य ढांचा रहा है।
16. कनाडा में आज भी बीकेआई और आईएसवाईएफ सूचीबद्ध क्यों हैं?
कनाडा की वर्तमान सूची का महत्व विशेष है।
2024 की वैधानिक समीक्षा के बाद भी उसने बीकेआई और आईएसवाईएफ दोनों को सूचीबद्ध रखा।
बीकेआई के बारे में कनाडा कहता है कि उसके सदस्य भारत से बाहर पाकिस्तान, उत्तरी अमेरिका और यूरोप में हैं तथा संगठन का इतिहास हत्या और बम विस्फोटों से जुड़ा है।
आईएसवाईएफ के बारे में कनाडा का विवरण 1984 के बाद बमबारी, हत्या, अपहरण और बीकेआई से संबंध का उल्लेख करता है।
इसलिए कनाडा और भारत के बीच राजनीतिक मतभेदों के बावजूद यह कहना सही नहीं होगा कि कनाडा सभी खालिस्तानी हिंसक संगठनों को वैध राजनीतिक समूह मानता है।
17. 2023 के बाद भारत-कनाडा विवाद को कैसे समझें?
2023 के बाद खालिस्तान का प्रश्न भारत-कनाडा संबंधों के केंद्र में आ गया।
यहां दो अलग प्रश्न हैं—
पहला, कनाडा में भारत-विरोधी या खालिस्तान समर्थक राजनीतिक गतिविधि कितनी व्यापक स्वतंत्रता के अंतर्गत आती है।
दूसरा, क्या किसी विशिष्ट व्यक्ति या संगठन का आतंकवादी हिंसा से संबंध है।
इन दोनों का उत्तर एक जैसा नहीं हो सकता।
कनाडा की अपनी आतंकवादी सूची बीकेआई और आईएसवाईएफ को प्रतिबंधित रखती है।
लेकिन कनाडा में शांतिपूर्ण अलगाववादी अभियान या खालिस्तान के समर्थन को उसी आधार पर आतंकवादी गतिविधि नहीं माना जाता।
यही कानूनी और राजनीतिक अंतर भारत-कनाडा विवाद के मूल तनावों में से एक है।
18. कनिष्क से सबसे बड़ा सबक
विदेशी खालिस्तानी नेटवर्कों के पूरे इतिहास में एयर इंडिया 182 सबसे महत्वपूर्ण चेतावनी बनी रहती है।
329 लोगों की हत्या किसी भारतीय शहर में नहीं हुई।
बम कनाडा से शुरू हुई यात्रा से जुड़ा था।
अधिकांश मृतक कनाडाई नागरिक थे।
और कनाडा ने अंततः इसे अपने इतिहास का सबसे बड़ा आतंकवादी हमला माना।
कनाडा ने बाद में इसके नाम पर कनिष्क परियोजना शुरू की—आतंकवाद और हिंसक कट्टरपंथ पर अनुसंधान के लिए पांच वर्षों में दस मिलियन कनाडाई डॉलर का कार्यक्रम।
इससे एक व्यापक सिद्धांत निकलता है—
जब किसी दूसरे देश के राजनीतिक संघर्ष की हिंसक शाखा प्रवासी समाज में जड़ें बनाती है, तो वह केवल मूल देश की समस्या नहीं रहती।
वह मेजबान देश की आंतरिक सुरक्षा समस्या भी बन सकती है।
निष्कर्ष: विदेशों में विचारधारा जीवित रही, लेकिन हिंसक नेटवर्कों की पहचान अलग रखनी होगी
पंजाब में 1990 के दशक के मध्य तक संगठित आतंकवाद लगभग समाप्त हो गया था।
लेकिन खालिस्तान की विचारधारा भारत की सीमाओं के बाहर जीवित रही।
कनाडा,
ब्रिटेन,
अमेरिका
और यूरोप में—
राजनीतिक संगठन,
मानवाधिकार अभियान,
धार्मिक संस्थाएं,
प्रवासी समूह,
और कुछ हिंसक नेटवर्क—
समानांतर रूप से मौजूद रहे।
यही कारण है कि इस विषय पर व्यापक सामान्यीकरण सबसे बड़ी ऐतिहासिक गलती होगी।
किसी खालिस्तान समर्थक रैली को अपने आप बीकेआई की गतिविधि नहीं कहा जा सकता।
किसी गुरुद्वारे में राजनीतिक भाषण आतंकवादी वित्त का प्रमाण नहीं।
और पूरे कनाडाई या ब्रिटिश सिख समुदाय को हिंसक अलगाववाद से जोड़ना तथ्यात्मक रूप से गलत है।
लेकिन दूसरी तरफ आतंकवादी नेटवर्क का इतिहास भी वास्तविक है।
कनिष्क में 329 लोगों की हत्या हुई।
बब्बर खालसा आज भी भारत, कनाडा और ब्रिटेन में आतंकवाद से संबंधित कानूनी प्रतिबंध के अंतर्गत है और अमेरिका में भी उस पर आतंकवाद-संबंधी वित्तीय/प्रवेश प्रतिबंध लगाए गए थे।
आईएसवाईएफ को भारत और कनाडा अब भी आतंकवादी संगठन मानते हैं, जबकि ब्रिटेन ने उसे 2016 में अपनी प्रतिबंधित सूची से हटा दिया।
और 21वीं सदी में विदेश स्थित नेटवर्कों का सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन यह हुआ है कि बड़े संगठनात्मक ढांचे की जगह—
विदेशी हैंडलर, डिजिटल संपर्क, सीमित वित्त, गैंगस्टर शूटर और पंजाब के छोटे स्थानीय मॉड्यूल
अधिक उपयोगी हो गए हैं।
इसलिए विदेशों में खालिस्तान नेटवर्क की वास्तविक कहानी दो समानांतर धाराओं की है—
एक तरफ राजनीतिक अलगाववादी विचारधारा, जो कई लोकतांत्रिक देशों में कानून के भीतर व्यक्त की जाती है;
दूसरी ओर वे विशिष्ट संगठन और व्यक्ति जिनके संबंध बमबारी, हत्या, हथियार, आतंकवादी वित्त अथवा हिंसक मॉड्यूल से प्रमाणित या न्यायिक प्रक्रिया के तहत आरोपित रहे हैं।
इन दोनों के बीच अंतर बनाए बिना न पंजाब आतंकवाद का इतिहास सही लिखा जा सकता है, न वर्तमान अंतरराष्ट्रीय विवाद को सही समझा जा सकता है।
अब इस शोध के अंतिम दो मुख्य अध्याय शेष हैं।
इस अध्याय में मैंने सामग्री को कसकर लगभग 18 मुख्य खंडों में रखा है। उद्देश्य यह है कि मानवाधिकार आरोपों को न तो बढ़ा-चढ़ाकर लिखा जाए, न उन मामलों को हल्का किया जाए जिन्हें सुप्रीम कोर्ट, सीबीआई या एनएचआरसी ने गंभीर पाया अथवा जिनमें पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराया गया।