OCN Networkओमकार चौधरी
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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
पंजाब में आतंकवाद और उसके पीछे की साज़िश · अध्याय 3

जरनैल सिंह भिंडरांवाले का उदय: दमदमी टकसाल से पंजाब की राजनीति के केंद्र तक, 1977–1981

ओमकार चौधरी / OCN Research Deskविस्तृत शोध संस्करण · 1 अक्टूबर 2026

पंजाब में आतंकवाद के इतिहास को समझने के लिए जरनैल सिंह भिंडरांवाले के उदय का अध्ययन अनिवार्य है। लेकिन शुरुआत में एक सावधानी जरूरी है। उन्हें केवल बाद के वर्षों—1983, 1984, स्वर्ण मंदिर परिसर और ऑपरेशन ब्लू स्टार—के संदर्भ से देखना इतिहास को उल्टा पढ़ना होगा।

1977 में जब वह दमदमी टकसाल के प्रमुख बने, तब उनकी मुख्य पहचान एक धार्मिक प्रचारक की थी। वे गांवों में घूमकर सिख युवाओं से अमृत ग्रहण करने, केश रखने, नशे से दूर रहने और धार्मिक मर्यादा अपनाने का आग्रह करते थे। चार वर्षों के भीतर वही व्यक्ति पंजाब की राजनीति के केंद्र में पहुंच गया। यह परिवर्तन अचानक नहीं हुआ। इसके पीछे 1978 का निरंकारी-सिख टकराव, धार्मिक पुनरुत्थान, अकाली दल की राजनीतिक सीमाएं, कांग्रेस और पंजाब कांग्रेस की आंतरिक राजनीति, दल खालसा जैसे संगठनों का उभार, निरंकारी प्रमुख गुरबचन सिंह की हत्या और अंततः सितंबर 1981 में लाला जगत नारायण की हत्या तथा भिंडरांवाले की गिरफ्तारी और रिहाई—इन सबकी संयुक्त भूमिका थी।

1981 के अंत तक परिस्थिति ऐसी हो चुकी थी कि भिंडरांवाले अब केवल एक प्रचारक नहीं रहे थे। वे राज्य सरकार, केंद्र सरकार, अकाली नेतृत्व, पुलिस और सिख धार्मिक संस्थाओं—सभी के लिए एक केंद्रीय राजनीतिक कारक बन चुके थे।

1. कौन थे जरनैल सिंह?

जरनैल सिंह का जन्म पंजाब के मोगा क्षेत्र के रोडे गांव में एक किसान परिवार में हुआ था। उनकी जन्मतिथि को लेकर कुछ स्रोतों में अंतर मिलता है, हालांकि सामान्यतः 1947 का वर्ष स्वीकार किया जाता है।

उनके पिता जोगिंदर सिंह धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। युवावस्था में जरनैल सिंह को दमदमी टकसाल से जोड़ा गया।

दमदमी टकसाल साधारण अर्थों में कोई राजनीतिक संस्था नहीं थी। यह गुरबाणी, सिख धर्मग्रंथों के उच्चारण, धार्मिक शिक्षा और प्रचार की परंपरा से जुड़ी संस्था थी।

यही तथ्य आगे महत्वपूर्ण हो जाता है।

भिंडरांवाले की राजनीतिक शक्ति का प्रारंभिक स्रोत चुनावी संगठन नहीं बल्कि धार्मिक वैधता और ग्रामीण प्रचार नेटवर्क था।

2. दमदमी टकसाल क्या थी?

दमदमी टकसाल की परंपरा स्वयं को सिख धार्मिक शिक्षा की पुरानी परंपरा से जोड़ती है।

बीसवीं सदी में संत सुंदर सिंह, संत गुरबचन सिंह खालसा और फिर संत करतार सिंह इसके प्रमुख धार्मिक नेताओं में रहे।

टकसाल के प्रचारक गांव-गांव जाकर गुरबाणी की व्याख्या करते, धार्मिक मर्यादा का प्रचार करते और युवाओं को अमृत ग्रहण करने के लिए प्रेरित करते थे।

संत करतार सिंह के समय तक यह संस्था पंजाब के ग्रामीण धार्मिक जीवन में अच्छी प्रतिष्ठा प्राप्त कर चुकी थी।

यही संगठन 1977 में जरनैल सिंह को असाधारण मंच देने वाला था।

3. संत करतार सिंह की मृत्यु और उत्तराधिकार

16 अगस्त 1977 को संत करतार सिंह एक सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हुए और उनकी मृत्यु हो गई।

उनके उत्तराधिकारी के प्रश्न पर जरनैल सिंह का नाम सामने आया।

उपलब्ध जीवनी स्रोतों के अनुसार करतार सिंह ने अपनी मृत्यु से पहले जरनैल सिंह को उत्तराधिकारी चुना था। 25 अगस्त 1977 को मेहता चौक में हुए धार्मिक समारोह में वे दमदमी टकसाल के प्रमुख बने। WikiZero

यह नियुक्ति महत्वपूर्ण थी।

क्योंकि करतार सिंह का अपना पुत्र अमरीक सिंह भी धार्मिक और राजनीतिक रूप से सक्रिय था। फिर भी टकसाल का नेतृत्व जरनैल सिंह को मिला।

बाद में अमरीक सिंह भिंडरांवाले के सबसे निकट सहयोगियों में से एक बना और ऑल इंडिया सिख स्टूडेंट्स फेडरेशन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

4. “भिंडरांवाले” नाम का अर्थ

टकसाल की एक प्रमुख शाखा भिंडर कलां से जुड़ी थी। इसी परंपरा के कारण इसके प्रमुखों के नाम के साथ “भिंडरांवाले” जुड़ता गया।

इस प्रकार “जरनैल सिंह भिंडरांवाले” कोई जन्मजात उपनाम नहीं बल्कि धार्मिक-संस्थागत पहचान थी।

1977 से पहले पंजाब की व्यापक राजनीति में उनका नाम बहुत बड़ा नहीं था।

लेकिन उनके प्रचार की शैली अलग थी।

वे साधारण धार्मिक व्याख्यान देने के बजाय सीधे और तीखे ढंग से बोलते थे।

5. उनका शुरुआती संदेश क्या था?

भिंडरांवाले का शुरुआती प्रचार मुख्यतः धार्मिक सुधार पर आधारित था।

उनके संदेश में बार-बार कुछ बातें आती थीं—

सिख अमृत ग्रहण करें।

केश और धार्मिक पहचान बनाए रखें।

तंबाकू, शराब और नशे से दूर रहें।

गुरु ग्रंथ साहिब और सिख मर्यादा का पालन करें।

धार्मिक रूप से निष्क्रिय या केवल नाममात्र के सिख होने के बजाय स्पष्ट खालसा पहचान अपनाएं।

समर्थक स्रोतों में उनके 1977 से 1982 के गांव-गांव प्रचार अभियान का विशेष उल्लेख मिलता है। Panthic.org

यह प्रचार उस पंजाब में चल रहा था जहां हरित क्रांति ने सामाजिक जीवन तेजी से बदला था।

ग्रामीण आय बढ़ी थी।

नई उपभोक्ता संस्कृति विकसित हो रही थी।

शराब और नशे को लेकर धार्मिक नेतृत्व की चिंता बढ़ रही थी।

विदेश जाने की आकांक्षा, आधुनिक शिक्षा और पारंपरिक धार्मिक पहचान के बीच भी नई सामाजिक खींचतान पैदा हो रही थी।

भिंडरांवाले इसी वातावरण में “मूल सिख पहचान की वापसी” का संदेश लेकर निकले।

6. उनके प्रभाव का पहला आधार राजनीति नहीं, धार्मिक पुनरुत्थान था

यह बिंदु बहुत महत्वपूर्ण है।

भिंडरांवाले की लोकप्रियता का प्रारंभ कांग्रेस या अकाली राजनीति से नहीं हुआ।

उनका पहला प्रभाव धार्मिक प्रचार से आया।

वे ग्रामीण पंजाब की उस सामाजिक संरचना से संवाद करते थे जहां गुरुद्वारा, परिवार, खेती और धार्मिक पहचान अभी भी अत्यंत महत्वपूर्ण थे।

उनकी भाषा विद्वत्तापूर्ण से अधिक जनसुलभ थी।

वे सीधे बोलते थे।

श्रोताओं से प्रश्न करते थे।

उदाहरण देते थे।

कई बार आक्रामक धार्मिक भाषा का प्रयोग करते थे।

युवाओं पर इसका विशेष प्रभाव पड़ा।

7. 13 अप्रैल 1978 ने सब कुछ बदल दिया

अमृतसर में संत निरंकारी सम्मेलन और उसका विरोध करने पहुंचे सिख समूहों के बीच हुई हिंसा में 13 सिख मारे गए।

अध्याय 2 में हमने देखा कि यह घटना भिंडरांवाले के उदय के लिए निर्णायक उत्प्रेरक बनी।

उसके बाद वे निरंकारियों के सबसे मुखर विरोधियों में शामिल हो गए।

अब उनका धार्मिक संदेश केवल नशा छोड़ने और अमृत ग्रहण करने तक सीमित नहीं रहा।

उसमें एक नया भाव जुड़ गया—

“पंथ की रक्षा।”

यहीं से धार्मिक सुधार और राजनीतिक आक्रोश एक-दूसरे के करीब आने लगे।

8. 1978 के बाद उनका भाषण अधिक राजनीतिक हुआ

निरंकारी प्रकरण ने भिंडरांवाले को ऐसी भाषा दी जिसमें वे तीन प्रकार के विरोधी पहचान सकते थे—

धार्मिक रूप से “पंथ-विरोधी” लोग,

उन्हें संरक्षण देने वाला राजनीतिक तंत्र,

और उन पर कार्रवाई न करने वाली सरकार।

यह संरचना आगे उनके भाषणों में बार-बार दिखाई देती है।

उन्होंने अभी कोई व्यवस्थित राजनीतिक घोषणापत्र जारी नहीं किया था।

लेकिन उनका धार्मिक प्रचार अब राज्य, सरकार और सिख नेतृत्व की आलोचना से जुड़ रहा था।

9. अकाली नेतृत्व के लिए नई चुनौती

प्रकाश सिंह बादल के नेतृत्व वाली अकाली सरकार के लिए यह स्थिति असहज थी।

एक ओर वह स्वयं को सिख समुदाय का मुख्य राजनीतिक प्रतिनिधि मानती थी।

दूसरी ओर एक धार्मिक प्रचारक यह दावा कर रहा था कि स्थापित राजनीतिक नेतृत्व “पंथ” की पर्याप्त रक्षा नहीं कर रहा।

यही प्रतियोगिता आगे बहुत महत्वपूर्ण सिद्ध हुई।

अकाली दल के पास चुनावी वैधता थी।

भिंडरांवाले के पास बढ़ती धार्मिक वैधता।

दोनों की राजनीति तुरंत एक जैसी नहीं थी, लेकिन दोनों एक ही सामाजिक आधार के कुछ हिस्सों पर प्रभाव चाहते थे।

10. एसजीपीसी चुनाव और पंथक प्रभाव की परीक्षा

1978 के दौर में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के चुनाव भी महत्वपूर्ण थे।

भिंडरांवाले ने कुछ प्रत्याशियों का समर्थन किया।

इन चुनावों में उनके समर्थित उम्मीदवारों को अपेक्षित सफलता नहीं मिली।

यह तथ्य एक महत्वपूर्ण सीमा दिखाता है।

1978 में भिंडरांवाले धार्मिक रूप से तेजी से उभर रहे थे, लेकिन उनके पास संगठित चुनावी जनाधार नहीं था।

इसलिए बाद के प्रभाव को देखकर यह मान लेना गलत होगा कि 1978 में ही वे पंजाब के सिखों के निर्विवाद नेता बन चुके थे।

ऐसा नहीं था।

11. दल खालसा का उदय

1978 में ही एक नया संगठन सामने आया—

दल खालसा।

यह मुख्यधारा अकाली राजनीति से अधिक कठोर पंथक राजनीति से जुड़ा संगठन था और आगे चलकर खालिस्तान के समर्थन से पहचाना गया।

इसके गठन को लेकर पंजाब के इतिहास में गंभीर विवाद है।

कई पत्रकारों, अधिकारियों और राजनीतिक नेताओं ने आरोप लगाया कि कांग्रेस के कुछ नेताओं ने अकाली दल को कमजोर करने और उसके पंथक आधार में विभाजन पैदा करने के लिए दल खालसा जैसे संगठनों को अप्रत्यक्ष सहायता दी।

विशेष रूप से ज्ञानी जैल सिंह का नाम इन आरोपों में आता है।

हालांकि उपलब्ध स्रोत इस दावे को समान रूप से सिद्ध नहीं करते। आधुनिक ऐतिहासिक साहित्य भी इसे एक विवादित राजनीतिक आरोप के रूप में प्रस्तुत करता है, निर्विवाद तथ्य के रूप में नहीं। Bliptext

इसलिए इस प्रश्न पर सावधानी जरूरी है।

12. कांग्रेस और भिंडरांवाले: सबसे विवादित प्रश्न

पंजाब आतंकवाद की पूरी कहानी में शायद ही कोई प्रश्न इससे ज्यादा विवादित हो—

क्या कांग्रेस ने भिंडरांवाले को खड़ा किया था?

इस दावे का एक लोकप्रिय संस्करण यह है कि कांग्रेस नेतृत्व अकाली दल का सिख वोट बैंक तोड़ना चाहता था और इसके लिए अधिक धार्मिक नेतृत्व को प्रोत्साहित किया गया।

दूसरा संस्करण कहता है कि ज्ञानी जैल सिंह और संजय गांधी से जुड़े कुछ राजनीतिक रणनीतिकार ऐसे धार्मिक नेताओं की तलाश में थे जो अकालियों के मुकाबले खड़े हो सकें।

इन दावों के समर्थन में बाद के संस्मरण, पत्रकारिता और कुछ नेताओं के बयान उपलब्ध हैं।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर है।

“राजनीतिक उपयोग की कोशिश” और “भिंडरांवाले को कांग्रेस ने बनाया” एक ही बात नहीं हैं।

भिंडरांवाले का धार्मिक नेटवर्क कांग्रेस से स्वतंत्र था।

दमदमी टकसाल उससे बहुत पहले से मौजूद थी।

निरंकारी विवाद भी कांग्रेस द्वारा निर्मित घटना नहीं था।

उनका ग्रामीण धार्मिक प्रभाव भी वास्तविक था।

इसलिए यदि कांग्रेस के कुछ नेताओं ने उन्हें अकालियों के विरुद्ध उपयोग करने की कोशिश की भी हो, तो इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि उनका पूरा प्रभाव कृत्रिम रूप से बनाया गया था।

13. ज्ञानी जैल सिंह और दरबारा सिंह की प्रतिद्वंद्विता

कांग्रेस के भीतर भी पंजाब राजनीति एकजुट नहीं थी।

ज्ञानी जैल सिंह पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री और बाद में केंद्रीय गृह मंत्री बने।

दरबारा सिंह पंजाब कांग्रेस के दूसरे महत्वपूर्ण नेता थे।

दोनों के बीच राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता लंबे समय तक चर्चा का विषय रही।

1980 में कांग्रेस के सत्ता में लौटने के बाद दरबारा सिंह पंजाब के मुख्यमंत्री बने, जबकि ज्ञानी जैल सिंह केंद्र में गृह मंत्री बने।

आगे 1981 में भिंडरांवाले की गिरफ्तारी के प्रश्न पर केंद्र और पंजाब सरकार के बीच दिखाई देने वाले मतभेदों को इसी आंतरिक राजनीतिक संदर्भ में भी देखा गया।

14. 1980: राजनीतिक परिस्थितियां बदलती हैं

जनवरी 1980 में इंदिरा गांधी की कांग्रेस केंद्र की सत्ता में वापस लौटी।

इसके बाद पंजाब की अकाली सरकार बर्खास्त कर दी गई और राज्य में बाद में विधानसभा चुनाव हुए।

कांग्रेस सत्ता में लौटी।

दरबारा सिंह मुख्यमंत्री बने।

यह परिवर्तन महत्वपूर्ण था।

अब 1978 की घटना के समय सत्ता में रही अकाली सरकार विपक्ष में थी और कांग्रेस राज्य और केंद्र दोनों स्तरों पर मजबूत स्थिति में थी।

लेकिन उसी समय भिंडरांवाले की लोकप्रियता भी बढ़ रही थी।

15. 4 जनवरी 1980: निरंकारी मामले में बरी होने का प्रभाव

अमृतसर के 1978 संघर्ष से संबंधित मुकदमे में निरंकारी प्रमुख गुरबचन सिंह सहित सभी आरोपियों को करनाल की अदालत ने बरी कर दिया।

यह फैसला उग्र सिख समूहों के लिए गहरे असंतोष का कारण बना।

भिंडरांवाले ने इसे पंथ के साथ अन्याय के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया।

अब उनके पास एक शक्तिशाली राजनीतिक कथा थी—

सिख मारे गए,

अभियुक्त बरी हुए,

और व्यवस्था न्याय दिलाने में विफल रही।

यह कथा आगे उग्रवाद के लिए भर्ती और समर्थन जुटाने में बहुत प्रभावी सिद्ध हुई।

16. 24 अप्रैल 1980: गुरबचन सिंह की हत्या

निरंकारी प्रमुख बाबा गुरबचन सिंह की दिल्ली में उनके निवास पर गोली मारकर हत्या कर दी गई।

इस हत्या को 1978 की घटना के प्रतिशोध से जोड़ा गया।

भिंडरांवाले का नाम राजनीतिक और पुलिस चर्चाओं में आया, लेकिन उस हत्या में उन्हें अदालत द्वारा दोषी नहीं ठहराया गया।

बाद में रणजीत सिंह सहित अन्य लोगों को इस मामले में दोषी ठहराया गया।

यह अंतर महत्वपूर्ण है।

राजनीतिक आरोप और न्यायिक दोषसिद्धि अलग-अलग चीजें हैं।

17. हिंसा की प्रशंसा और नई राजनीतिक भाषा

भिंडरांवाले के भाषणों में अब ऐसी भाषा अधिक दिखाई देने लगी जिसमें निरंकारियों के विरुद्ध हिंसा को खुली निंदा के बजाय कई बार प्रशंसात्मक संदर्भ में रखा जाता था।

बाद के पुलिस और राजनीतिक संस्मरणों में दावा किया गया कि उन्होंने गुरबचन सिंह की हत्या को उचित ठहराया और हत्यारों की प्रशंसा की।

हालांकि ऐसे कथनों के स्रोतों की विश्वसनीयता अलग-अलग है और इन्हें वक्तव्य-दर-वक्तव्य सत्यापित करना आवश्यक है।

फिर भी इतना स्पष्ट है कि उनके राजनीतिक व्यक्तित्व में धार्मिक प्रचारक और कठोर पंथक नेता का अंतर तेजी से मिट रहा था।

18. हथियार क्यों दिखाई देने लगे?

भिंडरांवाले और उनके समर्थकों की सार्वजनिक उपस्थिति में परंपरागत सिख शस्त्र—कृपाण—के साथ आधुनिक हथियारों की दृश्यता भी धीरे-धीरे बढ़ी।

यह केवल सुरक्षा का प्रश्न नहीं था।

इसका प्रतीकात्मक महत्व भी था।

उनकी राजनीति में “संत” और “सिपाही” की ऐतिहासिक सिख अवधारणा का प्रयोग होता था।

समर्थकों के लिए यह आत्मरक्षा और धार्मिक मर्यादा का प्रतीक था।

विरोधियों के लिए यह निजी सशस्त्र शक्ति के निर्माण का संकेत।

यही विवाद आगे 1982–84 में बहुत गंभीर होने वाला था।

19. प्रेस के साथ टकराव

भिंडरांवाले के बढ़ते प्रभाव की आलोचना करने वालों में पंजाब का हिंद समाचार समूह प्रमुख था।

इसके संस्थापक और संपादक लाला जगत नारायण पंजाब के वरिष्ठ पत्रकार और पूर्व कांग्रेस नेता थे।

वे निरंकारी विवाद में भी सक्रिय रहे थे और भिंडरांवाले की राजनीति के आलोचक थे।

उनके अखबारों—विशेष रूप से पंजाब केसरी और हिंद समाचार—में भिंडरांवाले तथा बढ़ते धार्मिक कट्टरवाद की आलोचना प्रकाशित होती थी।

भिंडरांवाले और उनके समर्थक इन समाचारपत्रों पर सिखों और सिख धार्मिक नेतृत्व को बदनाम करने का आरोप लगाते थे।

यहीं से प्रेस और उग्र धार्मिक राजनीति के बीच खुला संघर्ष शुरू हुआ।

20. लाला जगत नारायण कौन थे?

लाला जगत नारायण केवल अखबार मालिक नहीं थे।

उनका स्वतंत्रता आंदोलन और कांग्रेस राजनीति से पुराना संबंध था।

विभाजन के बाद उन्होंने पंजाब में हिंदी पत्रकारिता का बड़ा नेटवर्क बनाया।

वे पंजाब में हिंदी और पंजाबी भाषा विवाद में भी प्रभावशाली आवाज थे।

वे निरंकारी-सिख संघर्ष से संबंधित करनाल मुकदमे में गवाह भी रहे थे।

इसलिए भिंडरांवाले समर्थक उन्हें केवल पत्रकार नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखते थे।

यही पृष्ठभूमि 1981 में उनकी हत्या को और विस्फोटक बनाती है।

21. 9 सितंबर 1981: लाला जगत नारायण की हत्या

9 सितंबर 1981 को लाला जगत नारायण की गोली मारकर हत्या कर दी गई।

वे पटियाला की ओर से जालंधर लौट रहे थे।

हमलावर मोटरसाइकिल पर आए।

हत्या के बाद पंजाब सरकार ने मामले को अत्यंत गंभीरता से लिया।

भिंडरांवाले का नाम जांच में आया।

सरकार ने उनकी गिरफ्तारी का निर्णय लिया।

यही वह क्षण था जिसने उन्हें क्षेत्रीय धार्मिक नेता से राष्ट्रीय राजनीतिक समाचार का केंद्रीय पात्र बना दिया। The Statesman

22. क्या हत्या का आदेश भिंडरांवाले ने दिया था?

यही सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न था।

पंजाब पुलिस को उन पर संदेह था।

उनका और जगत नारायण का खुला वैचारिक संघर्ष था।

जगत नारायण उनके कटु आलोचक थे।

लेकिन संदेह और आपराधिक प्रमाण अलग-अलग बात हैं।

भिंडरांवाले को इस मामले में अंततः मुकदमे में दोषी नहीं ठहराया गया।

कुछ ही सप्ताह बाद केंद्रीय गृह मंत्री ज्ञानी जैल सिंह ने संसद में कहा कि उनके विरुद्ध हत्या से जोड़ने योग्य पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। इसके बाद उन्हें रिहा कर दिया गया। Sikh Philosophy Network Discussion Forum

अतः ऐतिहासिक रूप से सही भाषा यही होगी—

लाला जगत नारायण हत्या में भिंडरांवाले पर संदेह हुआ और उन्हें गिरफ्तार किया गया, लेकिन उनके विरुद्ध अभियोजन चलाने योग्य प्रमाण स्थापित नहीं हुए।

23. गिरफ्तारी की कोशिश और चंदो कलां विवाद

हत्या के बाद पुलिस भिंडरांवाले की तलाश में लगी।

वे उस समय पंजाब से बाहर हरियाणा के चंदो कलां क्षेत्र में धार्मिक कार्यक्रम में थे।

पंजाब पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने पहुंची।

इस दौरान तनाव और हिंसा हुई।

उनकी टकसाल से संबंधित बसों और सामग्री को नुकसान पहुंचने की घटना ने उनके समर्थकों में भारी आक्रोश पैदा किया।

बाद के विवरणों में विशेष रूप से उनके रिकॉर्ड किए गए प्रवचनों और धार्मिक सामग्री के जलने का उल्लेख मिलता है। Osmarks

भिंडरांवाले इसके बाद मेहता चौक लौट आए।

अब पुलिस और उनके समर्थकों के बीच सीधा टकराव संभव था।

24. मेहता चौक का घेराव

पंजाब पुलिस ने गुरुद्वारा गुरदर्शन प्रकाश, मेहता चौक को घेर लिया।

हजारों समर्थक वहां एकत्र होने लगे।

स्थिति अत्यंत संवेदनशील थी।

मुख्यमंत्री दरबारा सिंह गिरफ्तारी चाहते थे।

लेकिन केंद्र को आशंका थी कि बलपूर्वक प्रवेश से भारी रक्तपात हो सकता है।

अंततः बातचीत के माध्यम से आत्मसमर्पण की योजना बनी।

भिंडरांवाले ने शर्त रखी कि गिरफ्तारी से पहले वे संगत को संबोधित करेंगे।

पुलिस ने यह शर्त स्वीकार की। The Statesman

यही निर्णय आगे राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हुआ।

25. 20 सितंबर 1981: गिरफ्तारी से पहले शक्ति प्रदर्शन

20 सितंबर 1981 को भिंडरांवाले ने विशाल सभा को संबोधित किया।

वह केवल गिरफ्तारी नहीं रह गई।

वह सार्वजनिक राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन बन गई।

अकाली नेतृत्व के कई महत्वपूर्ण नेता भी वहां उपस्थित थे। उपलब्ध विवरणों में हरचंद सिंह लोंगोवाल और गुरचरण सिंह टोहड़ा सहित वरिष्ठ अकाली नेताओं की उपस्थिति दर्ज है। Arkanet

यह दृश्य अपने आप में प्रतीकात्मक था।

पुलिस एक आरोपी को गिरफ्तार करने आई थी।

लेकिन गिरफ्तारी के समय पंजाब के प्रमुख सिख राजनीतिक नेता उसके साथ खड़े दिखाई दे रहे थे।

यहीं से भिंडरांवाले का दर्जा बदल गया।

26. उन्होंने आत्मसमर्पण क्यों किया?

भिंडरांवाले ने सार्वजनिक रूप से कहा कि वे निर्दोष हैं।

उन्होंने गिरफ्तारी को अपने विरुद्ध राजनीतिक कार्रवाई बताया।

फिर स्वयं पुलिस के सामने चले गए।

इसका राजनीतिक लाभ उन्हें तुरंत मिला।

बलपूर्वक गिरफ्तार किए जाने के बजाय उन्होंने स्वयं को ऐसे नेता के रूप में प्रस्तुत किया जो गिरफ्तारी से नहीं डरता।

उनके समर्थकों के लिए यह धार्मिक साहस का प्रदर्शन था।

सरकार के लिए यह कानून लागू करने की कार्रवाई।

लेकिन सार्वजनिक प्रभाव भिंडरांवाले के पक्ष में गया।

27. गिरफ्तारी के बाद हिंसा

भिंडरांवाले की गिरफ्तारी के बाद पंजाब में कई हिंसक घटनाएं हुईं।

जालंधर में गोलीबारी हुई।

अन्य स्थानों पर हमले और विस्फोट हुए।

रेलवे तथा सार्वजनिक संपत्ति को भी निशाना बनाया गया।

इस अवधि में भिंडरांवाले समर्थक समूहों और सरकार के बीच तनाव तेजी से बढ़ा। The Statesman

यह हिंसा एक और महत्वपूर्ण संकेत थी।

अब किसी धार्मिक नेता की गिरफ्तारी राज्यव्यापी सुरक्षा समस्या पैदा कर सकती थी।

28. इंडियन एयरलाइंस विमान अपहरण

सितंबर 1981 में दल खालसा से जुड़े लोगों ने एक इंडियन एयरलाइंस विमान का अपहरण किया।

विमान को पाकिस्तान ले जाया गया।

अपहरणकर्ताओं की मांगों में भिंडरांवाले की रिहाई भी शामिल थी।

यह घटना बताती है कि पंजाब का उग्रवाद अब स्थानीय धार्मिक विवाद की सीमा पार कर चुका था।

अब उसका राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा आयाम सामने आने लगा।

29. अकाली दल ने उनका समर्थन क्यों किया?

अकाली नेतृत्व एक जटिल राजनीतिक स्थिति में था।

यदि वह भिंडरांवाले की गिरफ्तारी का समर्थन करता, तो अपने पंथक आधार के बड़े हिस्से में कमजोर पड़ सकता था।

यदि विरोध करता, तो वह ऐसे व्यक्ति के पक्ष में दिखाई देता जिस पर हत्या से जुड़े गंभीर आरोपों की जांच चल रही थी।

अकाली नेताओं ने अंततः उनकी रिहाई की मांग की।

इससे भिंडरांवाले को वह राजनीतिक वैधता मिली जो उनके पास पहले नहीं थी।

एक धार्मिक प्रचारक अब मुख्यधारा अकाली नेतृत्व के समानांतर पंथक प्रतीक बन चुका था।

30. ज्ञानी जैल सिंह का संसद में बयान

अक्टूबर 1981 में केंद्रीय गृह मंत्री ज्ञानी जैल सिंह ने संसद में कहा कि लाला जगत नारायण हत्या से भिंडरांवाले को जोड़ने वाला पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

15 अक्टूबर के आसपास उन्हें रिहा कर दिया गया। विभिन्न स्रोत तारीख में 14 और 15 अक्टूबर का मामूली अंतर बताते हैं, लेकिन यह निर्विवाद है कि गिरफ्तारी के लगभग तीन-चार सप्ताह के भीतर वे बिना मुकदमे के बाहर आ गए। Sikh Philosophy Network Discussion Forum

यही रिहाई उनके राजनीतिक उदय का शायद सबसे बड़ा मोड़ थी।

31. गिरफ्तारी से पहले और रिहाई के बाद का भिंडरांवाला

दो स्थितियों की तुलना कीजिए।

गिरफ्तारी से पहले

एक प्रभावशाली धार्मिक प्रचारक।

निरंकारी विरोधी नेता।

टकसाल का प्रमुख।

ग्रामीण युवाओं में लोकप्रिय।

रिहाई के बाद

ऐसा व्यक्ति जिसे पंजाब सरकार ने हत्या के संदेह में गिरफ्तार किया,

जिसके समर्थन में बड़े आंदोलन हुए,

जिसकी रिहाई की अकाली नेताओं ने मांग की,

और जिसके विरुद्ध केंद्र सरकार पर्याप्त प्रमाण नहीं जुटा सकी।

राजनीतिक प्रतीक बनाने के लिए इससे अधिक शक्तिशाली घटनाक्रम मुश्किल था।

भिंडरांवाले अब स्वयं को यह कहने की स्थिति में थे कि सरकार ने उन्हें झूठे आरोप में फंसाया और अंततः छोड़ना पड़ा।

32. क्या रिहाई ने उनकी प्रतिष्ठा बढ़ाई?

निस्संदेह।

उनके समर्थकों के लिए यह राज्य पर उनकी नैतिक विजय थी।

उनके आलोचकों के लिए यह राज्य की कमजोरी।

और राजनीतिक दलों के लिए यह संकेत था कि उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

यही कारण है कि कई ऐतिहासिक विवरण सितंबर-अक्टूबर 1981 को उनके उदय का निर्णायक चरण मानते हैं। Scribd

33. दरबारा सिंह बनाम ज्ञानी जैल सिंह का प्रश्न

भिंडरांवाले की गिरफ्तारी और रिहाई ने कांग्रेस की आंतरिक राजनीति पर भी सवाल खड़े किए।

पंजाब सरकार का नेतृत्व दरबारा सिंह कर रहे थे।

केंद्र में गृह मंत्री ज्ञानी जैल सिंह थे।

यह आरोप लंबे समय तक लगाया जाता रहा कि जैल सिंह भिंडरांवाले को दरबारा सिंह के विरुद्ध राजनीतिक संतुलन के रूप में देखते थे।

इस आरोप की पुष्टि के लिए प्रत्यक्ष सरकारी दस्तावेज सीमित हैं।

लेकिन दोनों नेताओं की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा अच्छी तरह दर्ज है।

इसीलिए भिंडरांवाले प्रकरण में केंद्र और राज्य के निर्णयों को केवल सुरक्षा नीति के रूप में नहीं बल्कि कांग्रेस की आंतरिक राजनीति के संदर्भ में भी देखा जाता है।

34. संजय गांधी की भूमिका का दावा

कई बाद के संस्मरणों में दावा किया गया कि संजय गांधी और कुछ कांग्रेस रणनीतिकार अकाली दल का मुकाबला करने के लिए किसी धार्मिक सिख नेता को आगे बढ़ाने के विचार से सहमत थे।

कुछ विवरणों में पूर्व केंद्रीय मंत्री कमलनाथ और अन्य नेताओं के हवाले से इस प्रकार की बातचीत का उल्लेख मिलता है।

लेकिन यह दावा कई समस्याओं से घिरा है।

पहली—अधिकांश विवरण घटना के वर्षों बाद लिखे गए।

दूसरी—उनमें आपसी विरोधाभास हैं।

तीसरी—किस स्तर की सहायता दी गई, इस पर स्पष्ट दस्तावेजी सहमति नहीं है।

इसलिए अभी सबसे संतुलित निष्कर्ष यही है—

कांग्रेस के कुछ तत्वों द्वारा अकालियों के मुकाबले भिंडरांवाले जैसे धार्मिक नेताओं की राजनीतिक उपयोगिता देखने के पर्याप्त ऐतिहासिक दावे हैं, लेकिन उन्हें कांग्रेस द्वारा पूरी तरह “निर्मित नेता” कहना उपलब्ध प्रमाणों से कहीं अधिक निश्चित कथन होगा।

35. भिंडरांवाले स्वयं कांग्रेस के आदमी थे?

इसका भी सरल उत्तर नहीं है।

उन्होंने कुछ चुनावों में कांग्रेस उम्मीदवारों के लिए समर्थन व्यक्त किया या प्रचार किया—ऐसे विवरण उपलब्ध हैं।

लेकिन वे कांग्रेस के औपचारिक सदस्य नहीं थे।

उनकी वैचारिक भाषा कांग्रेस संगठन के नियंत्रण में नहीं थी।

निरंकारी विवाद के बाद उनकी राजनीति तेजी से स्वतंत्र और अधिक आक्रामक होती गई।

1981 तक स्थिति यह थी कि जिसे कथित तौर पर अकालियों को कमजोर करने के लिए उपयोगी माना गया था, वही व्यक्ति कांग्रेस सरकार के लिए गंभीर चुनौती बन चुका था।

यही पंजाब संकट की सबसे बड़ी राजनीतिक विडंबनाओं में से एक है।

36. उनका मुख्य समर्थन आधार कौन था?

1981 तक उनके समर्थकों में मुख्यतः निम्न समूह दिखाई देते हैं—

ग्रामीण धार्मिक युवक,

दमदमी टकसाल से जुड़े लोग,

कुछ ऑल इंडिया सिख स्टूडेंट्स फेडरेशन कार्यकर्ता,

निरंकारी प्रकरण से आक्रोशित पंथक समूह,

और वे सिख जो पारंपरिक अकाली नेतृत्व को कमजोर या समझौतावादी मानने लगे थे।

यह आधार अभी पूरे पंजाब का प्रतिनिधि नहीं था।

शहरी सिख, दलित सिख, उदार धार्मिक समूह और मुख्यधारा अकाली समर्थक समान रूप से उनके साथ नहीं थे।

लेकिन समर्थकों की संख्या से ज्यादा महत्वपूर्ण था उनका उत्साह और संगठनात्मक सक्रियता।

37. युवाओं पर उनका प्रभाव इतना अधिक क्यों हुआ?

इसके कई कारण थे।

भिंडरांवाले की आयु अपेक्षाकृत कम थी।

उनकी भाषा अकाली नेतृत्व से अधिक सीधी थी।

वे पारंपरिक राजनीतिक शिष्टाचार नहीं बरतते थे।

वे गांवों में जाते थे।

युवाओं से व्यक्तिगत धार्मिक अनुशासन की बात करते थे।

वे पंथ के अपमान और सम्मान को भावनात्मक भाषा में प्रस्तुत करते थे।

सबसे महत्वपूर्ण—

उन्होंने युवाओं को यह एहसास कराया कि वे केवल मतदाता नहीं, एक धार्मिक समुदाय के “रक्षक” भी हैं।

यहीं से धार्मिक पहचान का राजनीतिक सैन्यीकरण शुरू होने की संभावना पैदा हुई।

38. मीडिया ने भी उनके उदय में भूमिका निभाई

भिंडरांवाले मीडिया के लिए असाधारण व्यक्तित्व थे।

लंबी दाढ़ी।

नीली या सफेद धार्मिक पोशाक।

हथियारबंद अनुयायी।

तीखी भाषा।

सरकार को खुली चुनौती।

उनकी तस्वीर और भाषण समाचार बनते थे।

इस मीडिया दृश्यता ने उनकी पहुंच बढ़ाई।

समर्थक अखबार उन्हें पंथक नेता के रूप में प्रस्तुत करते थे।

विरोधी अखबार उन्हें कट्टरपंथी या हिंसा प्रेरित करने वाला व्यक्ति बताते थे।

दोनों स्थितियों में उनका नाम लगातार सार्वजनिक विमर्श में बना रहा।

39. 1981 तक खालिस्तान पर उनका रुख क्या था?

यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है।

1981 तक भिंडरांवाले की राजनीति का मुख्य सार्वजनिक केंद्र स्वतंत्र खालिस्तान की स्पष्ट मांग नहीं थी।

उनकी भाषा सिख अधिकारों, धार्मिक सम्मान और पंथ की रक्षा पर केंद्रित थी।

बाद के वर्षों में जब उनसे खालिस्तान के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कई बार ऐसा रुख अपनाया कि वे स्वयं उसकी मांग नहीं कर रहे, लेकिन यदि सरकार दे तो मना नहीं करेंगे—इस प्रकार की भाषा उनके साथ व्यापक रूप से जोड़ी जाती है।

लेकिन 1977–81 के काल को सीधे खालिस्तान आंदोलन के रूप में प्रस्तुत करना गलत होगा।

इस समय उनका वास्तविक राजनीतिक आधार पंथक पुनरुत्थान था।

40. धार्मिक सुधार से राजनीतिक अस्मिता तक

उनके शुरुआती अभियान की यात्रा इस प्रकार देखी जा सकती है—

1977:

धार्मिक प्रचार।

1978:

निरंकारी विरोध।

1979–80:

न्याय और पंथ की रक्षा की भाषा।

1980:

निरंकारी प्रमुख की हत्या के बाद बढ़ी राजनीतिक जांच।

1981:

प्रेस से खुला संघर्ष, लाला जगत नारायण हत्या, गिरफ्तारी और रिहाई।

यानी केवल चार वर्षों में उनका विमर्श व्यक्तिगत धार्मिक अनुशासन से सामुदायिक राजनीतिक अधिकार तक पहुंच चुका था।

41. क्या राज्य ने खतरे को देर से समझा?

पीछे मुड़कर देखने पर ऐसा कहना आसान है कि सरकार को प्रारंभ से कठोर कार्रवाई करनी चाहिए थी।

लेकिन उस समय समस्या अधिक जटिल थी।

भिंडरांवाले चुनावी विद्रोही नहीं थे।

उन पर प्रारंभिक वर्षों में ऐसा सिद्ध आपराधिक मामला नहीं था जिसके आधार पर लंबी कैद की जा सके।

वे धार्मिक संस्था के प्रमुख थे।

उनके खिलाफ कोई भी कठोर कार्रवाई धार्मिक दमन के रूप में प्रस्तुत की जा सकती थी।

यही द्वंद्व आगे सरकार के हर कदम को कठिन बनाता गया।

लेकिन दूसरा पक्ष भी है।

राजनीतिक दलों द्वारा धार्मिक नेताओं को तात्कालिक चुनावी लाभ के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश, यदि हुई, तो उसने प्रशासनिक स्पष्टता को और कमजोर किया।

42. 1981 के अंत तक पंजाब की स्थिति

1981 के अंत तक पांच बड़े परिवर्तन हो चुके थे।

पहला: भिंडरांवाले ग्रामीण धार्मिक प्रचारक से प्रदेशव्यापी पंथक नेता बन चुके थे।

दूसरा: निरंकारी संघर्ष प्रतिशोध की हिंसा में बदल चुका था।

तीसरा: पत्रकार और सार्वजनिक आलोचक हिंसा का निशाना बनने लगे थे।

चौथा: विमान अपहरण जैसी कार्रवाइयों से उग्रवाद राष्ट्रीय सुरक्षा समस्या बन चुका था।

पांचवां: मुख्यधारा अकाली नेतृत्व भिंडरांवाले को न पूरी तरह अपना सकता था, न पूरी तरह अस्वीकार।

यही वह राजनीतिक गतिरोध था जिससे 1982 का बड़ा आंदोलन निकला।

43. भिंडरांवाले का उदय: चार मिथक और वास्तविकता

मिथक 1: कांग्रेस ने उन्हें शून्य से बनाया

पूरी तरह सही नहीं।

उनका धार्मिक आधार वास्तविक और स्वतंत्र था।

लेकिन कांग्रेस के कुछ नेताओं द्वारा उन्हें अकाली राजनीति के विरुद्ध उपयोग करने की कोशिश के गंभीर ऐतिहासिक आरोप मौजूद हैं।

मिथक 2: वे शुरू से खालिस्तान आंदोलन के नेता थे

गलत।

1977–81 में उनका प्रमुख सार्वजनिक एजेंडा धार्मिक पुनरुत्थान और पंथक अधिकार था।

मिथक 3: 1978 के बाद पूरा सिख समाज उनके साथ था

गलत।

उनका प्रभाव बढ़ रहा था, लेकिन पंजाब के सिख समाज में व्यापक राजनीतिक विविधता बनी हुई थी।

मिथक 4: लाला जगत नारायण हत्या में उनकी भूमिका अदालत से सिद्ध हो गई थी

गलत।

उन्हें संदेह के आधार पर गिरफ्तार किया गया, लेकिन केंद्र ने बाद में कहा कि पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं और उन्हें रिहा कर दिया गया। Sikh Philosophy Network Discussion Forum

44. असली परिवर्तन: भय से अधिक वैधता

भिंडरांवाले की वास्तविक शक्ति 1981 तक बंदूक से अधिक वैधता की धारणा में थी।

उनके समर्थक उन्हें मानते थे—

धर्म प्रचारक,

पंथ का रक्षक,

अन्याय के विरुद्ध बोलने वाला व्यक्ति,

और सरकार से न डरने वाला नेता।

उनके विरोधी उन्हें देखते थे—

धार्मिक कट्टरपंथी,

राजनीतिक रूप से खतरनाक व्यक्ति,

और हिंसा को बढ़ावा देने वाली शक्ति के रूप में।

यही द्वैत उनकी शक्ति बढ़ाता गया।

कोई भी उन्हें नजरअंदाज नहीं कर सकता था।

45. सितंबर 1981 क्यों निर्णायक मोड़ है?

यदि 13 अप्रैल 1978 ने भिंडरांवाले को पहचान दी, तो सितंबर-अक्टूबर 1981 ने उन्हें राजनीतिक शक्ति दी।

लाला जगत नारायण की हत्या,

पुलिस तलाश,

मेहता चौक का घेराव,

हजारों समर्थकों की मौजूदगी,

वरिष्ठ अकाली नेताओं का समर्थन,

सार्वजनिक आत्मसमर्पण,

गिरफ्तारी के बाद हिंसा,

विमान अपहरण,

और फिर पर्याप्त प्रमाण न होने पर रिहाई—

इन घटनाओं ने उनकी छवि असाधारण रूप से मजबूत की।

सरकार ने उन्हें गिरफ्तार किया था।

कुछ सप्ताह बाद सरकार को ही उन्हें छोड़ना पड़ा।

उनके समर्थकों ने इसे जीत के रूप में देखा।

46. इसी बिंदु पर मुख्यधारा राजनीति और उग्र राजनीति मिलने लगीं

1981 तक अकाली दल और भिंडरांवाले के लक्ष्य पूरी तरह समान नहीं थे।

अकाली दल संवैधानिक राजनीति और आनंदपुर साहिब प्रस्ताव से जुड़ी मांगों पर काम कर रहा था।

भिंडरांवाले की राजनीति धार्मिक पहचान के प्रश्न पर अधिक आक्रामक थी।

लेकिन केंद्र के विरुद्ध शिकायतें दोनों को एक-दूसरे के करीब लाने लगीं।

अगले वर्ष यही प्रक्रिया धर्म युद्ध मोर्चा में दिखाई देगी।

यहीं से परिस्थिति और जटिल हो जाएगी।

निष्कर्ष: चार वर्षों में एक प्रचारक कैसे पंजाब का केंद्रीय राजनीतिक पात्र बन गया

1977 में जरनैल सिंह भिंडरांवाले के पास न विधानसभा सीट थी, न संसद का पद, न कोई बड़ा चुनावी संगठन।

उनकी शक्ति का स्रोत था—

दमदमी टकसाल,

धार्मिक प्रचार,

ग्रामीण नेटवर्क,

और सिख पहचान की पुनर्स्थापना का संदेश।

1978 के अमृतसर संघर्ष ने उन्हें मुद्दा दिया।

निरंकारी मामले में आरोपियों के बरी होने ने उन्हें अन्याय की कथा दी।

गुरबचन सिंह की हत्या ने हिंसा को राजनीतिक वास्तविकता बना दिया।

कांग्रेस और अकाली दल की प्रतिस्पर्धा ने उन्हें राजनीतिक स्थान दिया।

लाला जगत नारायण की हत्या के बाद गिरफ्तारी ने उन्हें राष्ट्रीय पहचान दी।

और अक्टूबर 1981 में पर्याप्त प्रमाण न मिलने पर हुई रिहाई ने उनके समर्थकों के बीच उनकी प्रतिष्ठा कई गुना बढ़ा दी। Sikh Philosophy Network Discussion Forum

इसलिए भिंडरांवाले का उदय किसी एक षड्यंत्र, एक धार्मिक घटना या एक राजनीतिक दल से नहीं समझा जा सकता।

वह तीन प्रक्रियाओं के संगम से पैदा हुआ—

धार्मिक पुनरुत्थान,

राजनीतिक प्रतिस्पर्धा,

और बढ़ती हिंसा।

1981 के अंत तक ये तीनों धाराएं मिल चुकी थीं।

अब अगला चरण केवल किसी व्यक्ति के उदय की कहानी नहीं था।

अब पंजाब में एक बड़ा राजनीतिक आंदोलन शुरू होने जा रहा था जिसमें आनंदपुर साहिब प्रस्ताव, नदी जल, चंडीगढ़, धार्मिक मांगें और भिंडरांवाले की बढ़ती शक्ति एक ही मैदान में आ जाएंगी।