1947 से 1977: पंजाब की राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक पृष्ठभूमि
विभाजन के घाव, पंजाबी सूबा, हरित क्रांति और उन प्रश्नों की शुरुआत जो आगे चलकर संकट बने
पंजाब में 1980 के दशक में जिस आतंकवाद ने भयावह रूप धारण किया, उसकी कहानी 1980 से शुरू नहीं होती। जरनैल सिंह भिंडरांवाले का उदय, हथियारबंद संगठन, ऑपरेशन ब्लू स्टार या खालिस्तान की मांग उस लंबे घटनाक्रम के बाद आए जिसकी जड़ें स्वतंत्रता और विभाजन के साथ नए बने भारतीय पंजाब की राजनीति, समाज, भाषा, धर्म और अर्थव्यवस्था में थीं।
इसका अर्थ यह भी नहीं कि 1947 के बाद पंजाब में जो कुछ हुआ, उससे आतंकवाद का पैदा होना अनिवार्य था। इतिहास को पीछे से देखकर हर राजनीतिक संघर्ष को आतंकवाद की प्रस्तावना मान लेना गलत होगा। पंजाबी सूबा आंदोलन मुख्यतः संवैधानिक और राजनीतिक आंदोलन था; अकाली दल भारतीय चुनावी व्यवस्था का हिस्सा था; हरित क्रांति अभूतपूर्व आर्थिक उपलब्धि थी और राज्य पुनर्गठन भारतीय संघ के संवैधानिक ढांचे के भीतर हुआ। लेकिन इन्हीं दशकों में कुछ ऐसे प्रश्न भी जमा होते गए—सिख पहचान, भाषा, केंद्र और राज्य के अधिकार, चंडीगढ़, नदी जल, धार्मिक संस्थाओं पर नियंत्रण और पंजाब की राजनीतिक सत्ता—जो बाद के संकट में बार-बार सामने आए।
1947 से 1977 के तीन दशक इसलिए पंजाब आतंकवाद के इतिहास की पृष्ठभूमि नहीं बल्कि उसकी ऐतिहासिक कुंजी हैं।
1. 1947: भारत स्वतंत्र हुआ, लेकिन पंजाब दो हिस्सों में टूट गया
15 अगस्त 1947 भारत के लिए स्वतंत्रता का दिन था, लेकिन पंजाब के लिए स्वतंत्रता और विभाजन लगभग एक ही घटना के दो विपरीत अनुभव बनकर आए।
ब्रिटिश पंजाब कोई सामान्य प्रांत नहीं था। उसकी सामाजिक संरचना में मुसलमान, सिख और हिंदू तीनों बड़े समुदाय थे। पश्चिमी पंजाब में मुसलमानों का बहुमत था, जबकि पूर्वी जिलों में हिंदू और सिख आबादी अधिक थी। लाहौर केवल प्रशासनिक राजधानी नहीं था; वह पंजाबी संस्कृति, शिक्षा, व्यापार, पत्रकारिता और साहित्य का भी सबसे महत्वपूर्ण केंद्र था।
भारत के विभाजन ने पंजाब को भी विभाजित कर दिया। लाहौर, रावलपिंडी, मुल्तान, लायलपुर—आज का फैसलाबाद—और पश्चिमी पंजाब के बड़े क्षेत्र पाकिस्तान में चले गए। अमृतसर, जालंधर, लुधियाना, पटियाला और पूर्वी क्षेत्र भारत में रहे।
रेडक्लिफ सीमा केवल नक्शे पर खींची गई रेखा नहीं थी। उसने गांव, खेत, नहरें, परिवार, गुरुद्वारे, मंदिर, मस्जिद, बाजार और सदियों पुराने सामाजिक संबंध काट दिए।
विभाजन के दौरान पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में लगभग 1.45 करोड़ लोगों के सीमा पार करने का अनुमान मिलता है। इतिहासकार पिप्पा विरदी के अध्ययन के अनुसार इस विस्थापन का बहुत बड़ा हिस्सा पंजाब और उससे जुड़े उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों में हुआ। मृत्यु संख्या पर इतिहासकारों में सहमति नहीं है; अनुमान कुछ लाख से लेकर लगभग दस लाख अथवा उससे अधिक तक जाते हैं। इसलिए किसी एक निश्चित संख्या को अंतिम सत्य की तरह प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा। Cambridge University Press
पंजाब में यह विस्थापन दो दिशाओं में हुआ।
पश्चिमी पंजाब से हिंदू और सिख भारत आए। पूर्वी पंजाब से मुसलमान पाकिस्तान गए।
यह सामान्य प्रवास नहीं था। हत्या, लूट, आगजनी, अपहरण और महिलाओं के विरुद्ध अत्याचार इसके साथ जुड़े थे। पूरे गांव खाली हुए। शरणार्थी रेलगाड़ियां हिंसा का निशाना बनीं। कई इलाकों की धार्मिक संरचना कुछ ही महीनों में लगभग पूरी तरह बदल गई। इतिहासकारों ने पंजाब में हुए इस विस्थापन को बीसवीं सदी के सबसे तीव्र जनस्थानांतरणों में गिना है। Cambridge University Press
यही 1947 के बाद पंजाब की राजनीति समझने का पहला आधार है।
2. विभाजन ने पंजाब की धार्मिक जनसांख्यिकी बदल दी
विभाजन से पहले पंजाब की राजनीति त्रिकोणीय थी—मुस्लिम, हिंदू और सिख राजनीतिक हित एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते थे।
1947 के बाद भारतीय पंजाब में यह संतुलन बदल गया। मुसलमानों की आबादी बहुत कम रह गई और राजनीति मुख्यतः हिंदू तथा सिख समुदायों के बीच भाषा, पहचान और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के प्रश्नों से प्रभावित होने लगी।
1951 की जनगणना के आधार पर भारतीय पंजाब की उस समय की आबादी में लगभग 62 प्रतिशत हिंदू और लगभग 35 प्रतिशत सिख थे। बाद में 1966 के राज्य पुनर्गठन ने यह अनुपात फिर बदल दिया, क्योंकि हिंदी भाषी क्षेत्र अलग होकर हरियाणा बने और पहाड़ी इलाके हिमाचल प्रदेश की ओर चले गए। Cambridge University Press
यह परिवर्तन केवल संख्या का नहीं था।
पश्चिमी पंजाब से आए सिख शरणार्थियों की बड़ी संख्या ने भारतीय पंजाब में पुनर्वास किया। अनेक हिंदू शरणार्थी पंजाब के शहरों तथा दिल्ली और उत्तर भारत के अन्य हिस्सों में बसे।
उनके साथ व्यापारिक पूंजी, कृषि अनुभव, शहरी कौशल और विभाजन की स्मृतियां भी आईं।
लुधियाना जैसे शहरों के औद्योगिक विस्तार में शरणार्थी समुदायों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। अध्ययनों में बताया गया है कि विभाजन के बाद विस्थापित लोगों ने नए शहरी और औद्योगिक केंद्रों के निर्माण में उल्लेखनीय योगदान दिया। Cambridge University Press
इस प्रकार 1947 के बाद का पंजाब एक साथ दो काम कर रहा था—अपने घाव भर रहा था और स्वयं को आर्थिक तथा राजनीतिक रूप से फिर से बना रहा था।
3. सिख राजनीति का नया प्रश्न: स्वतंत्र भारत में राजनीतिक स्थान क्या हो?
आजादी से पहले सिख नेतृत्व के सामने पाकिस्तान की मांग और मुस्लिम बहुल पंजाब में अपने राजनीतिक भविष्य का प्रश्न था। विभाजन के बाद स्थिति बदल गई।
अब पाकिस्तान भारत से अलग देश था और भारतीय सिखों का भारी बहुमत भारत के भीतर था।
लेकिन सिख राजनीतिक नेतृत्व के भीतर एक नया प्रश्न उठा—
भारत की संघीय व्यवस्था में सिख समुदाय की विशिष्ट धार्मिक और राजनीतिक पहचान किस तरह सुरक्षित रहेगी?
शिरोमणि अकाली दल इस विमर्श का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक संगठन बना।
अकाली दल का इतिहास स्वतंत्रता से पहले गुरुद्वारा सुधार आंदोलन से जुड़ा था। वह केवल चुनावी पार्टी नहीं था; उसका आधार धार्मिक संस्थाओं और पंथक राजनीति में भी था। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी—एसजीपीसी—और अकाली राजनीति के बीच निकट संबंध पंजाब की राजनीति की विशेषता बन गया।
राजनीतिशास्त्री बलदेव राज नायर के अध्ययन में स्वतंत्रता के बाद अकाली राजनीति के पीछे चार प्रमुख कारकों की पहचान की गई—सिख समुदाय की विशिष्ट पहचान की राजनीतिक व्याख्या, विभाजन से पहले के राजनीतिक अनुभव, समुदाय के सांस्कृतिक क्षरण की आशंका और कथित राजनीतिक भेदभाव की भावना। JSTOR
यहां एक अंतर हमेशा ध्यान में रखना चाहिए।
सिख धार्मिक पहचान की रक्षा की राजनीति और भारत से अलग देश की मांग एक ही चीज नहीं थीं।
अकाली दल ने बाद के दशकों में केंद्र से अधिक राज्य स्वायत्तता मांगी, लेकिन उसका मुख्यधारा नेतृत्व लंबे समय तक चुनाव, विधानसभा, संसद और संवैधानिक आंदोलनों के भीतर काम करता रहा।
4. भाषा बनी राजनीति का केंद्र
आज यह सामान्य बात लगती है कि पंजाब की मुख्य भाषा पंजाबी है। लेकिन स्वतंत्रता के बाद यह प्रश्न अत्यंत विवादास्पद था।
भारत में भाषायी आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की मांग अलग-अलग क्षेत्रों में उठ रही थी। तेलुगु भाषियों के लिए आंध्र की मांग के बाद राष्ट्रीय स्तर पर भाषायी राज्यों का प्रश्न और मजबूत हुआ।
अकाली दल ने इसी संदर्भ में पंजाबी भाषी राज्य—पंजाबी सूबा—की मांग की।
लेकिन पंजाब में भाषा धार्मिक पहचान से जुड़ गई।
अनेक सिखों ने पंजाबी को अपनी मातृभाषा और गुरुमुखी को उसकी लिपि के रूप में देखा। दूसरी ओर पंजाब के अनेक हिंदुओं ने जनगणनाओं में हिंदी को अपनी मातृभाषा दर्ज कराया, जबकि दैनिक जीवन में वे पंजाबी बोलते थे।
इससे भाषा का प्रश्न शुद्ध भाषायी विषय नहीं रह गया।
पंजाबी = सिख
और
हिंदी = हिंदू
जैसी राजनीतिक धारणाएं मजबूत होने लगीं।
यही वह बिंदु था जहां पंजाब की भाषायी राजनीति धीरे-धीरे धार्मिक पहचान की राजनीति से जुड़ती चली गई।
5. पंजाबी सूबा आंदोलन: क्या यह सिख राज्य की मांग थी?
पंजाबी सूबा विवाद को समझने के लिए इस प्रश्न का उत्तर आवश्यक है।
अकाली दल का आधिकारिक तर्क था कि जब भारत में भाषायी आधार पर राज्यों का निर्माण किया जा रहा है, तो पंजाबी भाषा बोलने वालों के लिए भी एक राज्य होना चाहिए।
अकाली नेतृत्व इसे संविधान के भीतर भाषायी राज्य की मांग बताता था।
लेकिन कांग्रेस सहित इसके विरोधियों के एक हिस्से को आशंका थी कि पंजाबी सूबा वस्तुतः ऐसा राज्य बन जाएगा जिसमें सिख आबादी बहुमत में होगी और इस प्रकार वह राजनीतिक रूप से “सिख राज्य” का रूप ले सकता है।
यही संदेह आंदोलन को लंबा और कठिन बनाता गया।
अकाली दल ने आंदोलन, धरने और गिरफ्तारियां दीं। हजारों कार्यकर्ताओं ने सत्याग्रह में भाग लिया।
इस संघर्ष ने सिख राजनीति में एक स्थायी राजनीतिक मनोविज्ञान विकसित किया—
कि अपनी मांग मनवाने के लिए केंद्र के विरुद्ध लंबा आंदोलन करना आवश्यक है।
दूसरी ओर केंद्र में यह धारणा मजबूत हुई कि पंजाब से आने वाली धार्मिक पहचान से जुड़ी राजनीतिक मांगों को केवल उनकी घोषित संवैधानिक भाषा में नहीं, उनके संभावित दीर्घकालिक राजनीतिक परिणामों के आधार पर भी देखा जाना चाहिए।
यह परस्पर अविश्वास आगे चलकर बहुत महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ।
6. राज्य पुनर्गठन आयोग और पंजाब
1953 में केंद्र सरकार ने राज्यों के पुनर्गठन पर विचार करने के लिए राज्य पुनर्गठन आयोग बनाया।
आयोग ने अनेक भाषायी राज्यों के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया, लेकिन पंजाबी सूबा की मांग तुरंत स्वीकार नहीं हुई।
इसके बाद पंजाब में राजनीतिक आंदोलन जारी रहा।
1950 और 1960 के दशक में मास्टर तारा सिंह इस आंदोलन के प्रमुख चेहरों में रहे। बाद में संत फतेह सिंह ने भी नेतृत्व संभाला।
अकाली राजनीति में धार्मिक प्रतीकों और राजनीतिक मांगों का यह मिश्रण आगे भी दिखाई देता रहा।
लेकिन इस काल को बाद के आतंकवाद के चश्मे से नहीं देखना चाहिए।
आंदोलन की मुख्यधारा राजनीतिक थी।
इसका उद्देश्य भारतीय राज्य के विरुद्ध हथियारबंद विद्रोह नहीं बल्कि भारत के संघीय ढांचे के भीतर राज्य पुनर्गठन था।
7. 1966: पंजाब आखिरकार फिर विभाजित हुआ
लंबे आंदोलन के बाद केंद्र सरकार ने पंजाब को भाषायी आधार पर पुनर्गठित करने का निर्णय स्वीकार किया।
संसद ने Punjab Reorganisation Act, 1966 पारित किया। यह अधिनियम 18 सितंबर 1966 को बना और नई व्यवस्था 1 नवंबर 1966 से लागू हुई। India Code
पुराना पंजाब तीन प्रमुख प्रशासनिक हिस्सों में बंट गया—
पंजाबी भाषी क्षेत्र — पंजाब।
हिंदी भाषी क्षेत्र — नया राज्य हरियाणा।
पहाड़ी क्षेत्र — हिमाचल प्रदेश में स्थानांतरित।
लेकिन सबसे विवादास्पद प्रश्न था—
चंडीगढ़ किसका होगा?
शाह आयोग पंजाब और हरियाणा की सीमाओं पर विचार कर रहा था। गृह मंत्रालय की 1966-67 की रिपोर्ट बताती है कि आयोग के भीतर खरड़ तहसील और चंडीगढ़ क्षेत्र पर सर्वसम्मति नहीं थी। अंततः चंडीगढ़ को केंद्रशासित प्रदेश बनाने और उसे पंजाब तथा हरियाणा दोनों की राजधानी के रूप में इस्तेमाल करने का निर्णय हुआ। Ministry of Home Affairs
यहीं से पंजाब के लंबे राजनीतिक विवादों में एक नया स्थायी प्रश्न जुड़ गया—
चंडीगढ़ पंजाब को कब मिलेगा?
8. पंजाबी सूबा मिला, लेकिन विवाद समाप्त नहीं हुए
1966 का पुनर्गठन अकाली दल की लंबे समय की मांग की बड़ी राजनीतिक सफलता थी।
लेकिन उसी पुनर्गठन ने नए विवाद भी पैदा किए।
पहला — चंडीगढ़
पंजाब का दावा था कि चंडीगढ़ मूल रूप से पंजाब की राजधानी के रूप में बनाया गया था और पुनर्गठन के बाद उसे पंजाब में मिलना चाहिए।
हरियाणा अपने लिए राजधानी के प्रश्न और साझा प्रशासनिक हितों के कारण अलग दृष्टिकोण रखता था।
दूसरा — पंजाबी भाषी क्षेत्र
अकाली नेतृत्व का आरोप रहा कि कई पंजाबी भाषी क्षेत्र पंजाब से बाहर रह गए।
तीसरा — नदी जल
रावी और ब्यास के जल के बंटवारे का प्रश्न पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के बीच विवाद का कारण बना।
चौथा — नदी परियोजनाएं और हेडवर्क्स
भाखड़ा-ब्यास प्रणाली तथा संबंधित नियंत्रण को लेकर भी केंद्र और राज्यों के अधिकारों का प्रश्न उठा।
इनमें से कई विवाद आगे 1980 के दशक के आंदोलनों में पुनः प्रमुख मांगों के रूप में सामने आए।
इसलिए 1966 को केवल समाधान नहीं, समाधान और नए विवादों की एक साथ शुरुआत के रूप में समझना अधिक सही है।
9. पुनर्गठन के बाद पहली बार सिख बहुमत वाला पंजाब
1966 के पुनर्गठन के बाद पंजाब की जनसांख्यिकीय प्रकृति बदल गई।
हिंदी भाषी क्षेत्रों के हरियाणा और हिमाचल की ओर जाने के बाद नए पंजाब में सिख समुदाय बहुसंख्यक हो गया।
यह अकाली राजनीति के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि हो सकती थी।
लेकिन एक विरोधाभास सामने आया।
सिख बहुसंख्यक राज्य बन जाने के बावजूद अकाली दल पंजाब की सत्ता पर स्थायी राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित नहीं कर पाया।
कांग्रेस लगातार मजबूत रही।
इसका कारण पंजाब की सामाजिक संरचना थी।
सभी सिख अकाली मतदाता नहीं थे।
सिख समाज स्वयं जाति, वर्ग, क्षेत्र और राजनीतिक विचारों में विभाजित था।
दलित सिख, शहरी सिख, किसान, मजदूर और अलग-अलग धार्मिक परंपराओं से जुड़े समूह हमेशा एक ही राजनीतिक दिशा में नहीं जाते थे।
हिंदू मतदाता भी निर्णायक थे।
इसलिए पंजाब में “सिख बहुमत” का अर्थ “अकाली बहुमत” नहीं था।
यही तथ्य अकाली राजनीति के भविष्य पर गहरा प्रभाव डालता है।
10. 1967: कांग्रेस प्रभुत्व को पहली गंभीर चुनौती
पंजाब के पुनर्गठन के कुछ ही महीने बाद 1967 में विधानसभा चुनाव हुए।
देश के कई राज्यों की तरह पंजाब में भी कांग्रेस को चुनौती मिली।
गठबंधन राजनीति का दौर शुरू हुआ।
अकाली दल ने अन्य दलों के सहयोग से सरकार बनाई।
इस काल में गुरनाम सिंह मुख्यमंत्री बने।
लेकिन सरकार स्थिर नहीं रही।
दल-बदल और गठबंधन टूटने के कारण सरकारें बदलती रहीं।
1967 से 1972 के बीच पंजाब ने बार-बार राजनीतिक अस्थिरता देखी।
निर्वाचन आयोग के अभिलेखों में पंजाब के 1967, 1969, 1972 और 1977 के विधानसभा चुनावों की पूरी सांख्यिकीय रिपोर्ट उपलब्ध है। ये चुनाव कांग्रेस और अकाली दल के बीच बदलते राजनीतिक संतुलन को दिखाते हैं। Election Commission of India
यह राजनीतिक अस्थिरता एक और प्रश्न पैदा करती थी—
यदि पंजाबी सूबा अकाली आंदोलन की उपलब्धि था, तो अकाली दल उस राज्य में स्थायी सरकार क्यों नहीं बना पा रहा था?
यह प्रश्न बाद में अकाली नेतृत्व को अपने राजनीतिक आधार को और अधिक स्पष्ट “पंथक” मुद्दों के आसपास संगठित करने की ओर प्रेरित करने वाले कारकों में से एक माना जाता है। यह कारण अकेला नहीं था, लेकिन इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
राजनीतिक विज्ञान के अध्ययनों में भी अकाली दल को स्वतंत्रता के बाद पंजाब की राजनीति के प्रमुख संरचनात्मक बदलावों का उत्प्रेरक माना गया है। Cambridge University Press
11. इसी समय पंजाब में दूसरी क्रांति चल रही थी—हरित क्रांति
1960 के दशक के उत्तरार्ध से पंजाब भारतीय कृषि परिवर्तन का सबसे बड़ा प्रयोगस्थल बन गया।
नई उच्च उपज वाली गेहूं की किस्में, सिंचाई, रासायनिक खाद, कीटनाशक, ट्रैक्टर, ट्यूबवेल और सरकारी खरीद प्रणाली ने खेती की प्रकृति बदल दी।
विश्व बैंक के ऐतिहासिक अध्ययन के अनुसार पंजाब में पहली उच्च उपज वाली गेहूं किस्म 1966 में आई। केवल तीन वर्षों में दो-तिहाई से अधिक गेहूं क्षेत्र उच्च उपज वाली किस्मों के तहत आ गया। औसत गेहूं उपज लगभग 1.4 टन प्रति हेक्टेयर से बढ़कर 1969-70 में लगभग 2.2 टन प्रति हेक्टेयर पहुंच गई। 1966 से 1972 के बीच निजी ट्यूबवेलों की संख्या लगभग छह गुना और ट्रैक्टरों की संख्या लगभग चार गुना हुई। The World Bank
पंजाब भारत का अन्न भंडार बनने लगा।
देश की खाद्य सुरक्षा में पंजाब का योगदान असाधारण था।
किसान आय बढ़ी।
गांवों में पक्के मकान बने।
कृषि मशीनरी बढ़ी।
ग्रामीण बाजार विकसित हुए।
परिवहन और शिक्षा में निवेश बढ़ा।
पंजाब भारत के सबसे समृद्ध राज्यों में गिना जाने लगा।
यह कहानी पंजाब की ऐतिहासिक उपलब्धियों में से एक है।
लेकिन इसके भीतर कुछ सामाजिक असंतुलन भी पैदा हुए।
12. हरित क्रांति का दूसरा पक्ष
हरित क्रांति का लाभ सभी किसानों को समान रूप से नहीं मिला।
जिन किसानों के पास अधिक भूमि, सिंचाई और पूंजी थी, वे नई तकनीक जल्दी अपना सके।
छोटे किसानों के लिए बीज, खाद, मशीनरी और सिंचाई पर निवेश अपेक्षाकृत कठिन था।
कृषि का व्यावसायीकरण बढ़ा।
खेती धीरे-धीरे बाजार, सरकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य, बिजली, खाद और मशीनरी पर अधिक निर्भर होती गई।
यंत्रीकरण से श्रम की प्रकृति भी बदली।
बाद के अध्ययनों में पंजाब की कृषि व्यवस्था में रोजगार अवसरों के बदलाव तथा लागत बढ़ने की समस्याएं दर्ज की गई हैं। हालांकि इनमें से कई संकट 1980 और 1990 के दशकों में अधिक स्पष्ट हुए, उनकी संरचनात्मक शुरुआत हरित क्रांति मॉडल में देखी जाती है। FAOHome
इसका अर्थ यह नहीं कि हरित क्रांति ने आतंकवाद पैदा किया।
ऐसा सीधा निष्कर्ष ऐतिहासिक रूप से गलत होगा।
लेकिन हरित क्रांति ने एक नया पंजाब बनाया—
अधिक समृद्ध, अधिक शिक्षित, अधिक यंत्रीकृत, अधिक आकांक्षी और साथ ही सामाजिक तथा आर्थिक असमानताओं के नए रूपों वाला।
युवा पीढ़ी की अपेक्षाएं बदल रही थीं।
भूमि सीमित थी।
सरकारी नौकरी, सेना, विदेश प्रवास और उच्च शिक्षा नई आकांक्षाएं बन रही थीं।
आने वाले दशक में यही युवा वर्ग राजनीतिक और धार्मिक आंदोलनों का भी महत्वपूर्ण आधार बना।
13. सेना और सिख समाज
ब्रिटिश काल से पंजाब और विशेषतः सिख समुदाय की सेना में उल्लेखनीय उपस्थिति थी।
स्वतंत्र भारत में भी सेना पंजाब के ग्रामीण समाज में रोजगार और प्रतिष्ठा का महत्वपूर्ण माध्यम रही।
कई परिवारों की पीढ़ियां सेना में सेवा करती थीं।
1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्धों ने पंजाब को सीधे राष्ट्रीय सुरक्षा के अग्रिम क्षेत्र में रखा।
यह तथ्य महत्वपूर्ण है।
जिस पंजाब में बाद में अलगाववादी हिंसा फैली, वही पंजाब 1965 और 1971 में पाकिस्तान के विरुद्ध युद्ध के मोर्चे पर भारत की रक्षा का प्रमुख क्षेत्र था।
इसलिए 1980 के दशक के संकट को 1947 के बाद किसी निरंतर “भारत-विरोधी सिख राजनीति” की परिणति कहना इतिहास को अत्यधिक सरल बना देना होगा।
वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल थी।
14. 1965 और 1971: पाकिस्तान के साथ युद्ध का प्रभाव
भारत और पाकिस्तान के युद्धों का पंजाब पर गहरा प्रभाव पड़ा।
1965 में अमृतसर, फिरोजपुर और सीमा से जुड़े क्षेत्र युद्ध के सीधे दबाव में आए।
1971 में भी पंजाब रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण रहा।
इन युद्धों ने भारतीय पंजाब और पाकिस्तानी पंजाब को राजनीतिक और सुरक्षा दृष्टि से और दूर कर दिया।
लेकिन धार्मिक इतिहास और गुरुद्वारों के कारण सिख समाज के लिए पाकिस्तान केवल शत्रु राष्ट्र की भौगोलिक भूमि भी नहीं था।
सिख धर्म के अनेक अत्यंत महत्वपूर्ण तीर्थ—ननकाना साहिब, पंजा साहिब और करतारपुर सहित—पाकिस्तान में थे।
यह धार्मिक और राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधों का एक अनूठा विरोधाभास था।
एक तरफ पाकिस्तान भारत का सैन्य प्रतिद्वंद्वी था।
दूसरी ओर सिख धर्म की ऐतिहासिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा पाकिस्तान में था।
आगे चलकर पाकिस्तान की पंजाब संबंधी नीति का विश्लेषण करते समय इस धार्मिक भूगोल का महत्व सामने आएगा।
15. गुरुद्वारे और राजनीति
पंजाब की राजनीति को समझने में एक और संस्था अत्यंत महत्वपूर्ण है—
शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी।
एसजीपीसी केवल धार्मिक प्रबंधन संस्था नहीं रही। गुरुद्वारों का नेटवर्क, धार्मिक प्रचार, संस्थागत संसाधन और सिख समाज में नैतिक प्रभाव उसे असाधारण सामाजिक शक्ति देते थे।
अकाली दल और एसजीपीसी की राजनीति अक्सर परस्पर जुड़ी रही।
इससे पंजाब में एक ऐसी व्यवस्था बनी जिसमें—
धार्मिक नेतृत्व,
गुरुद्वारा प्रबंधन,
पंथक मुद्दे
और चुनावी राजनीति
एक-दूसरे से पूरी तरह अलग नहीं थे।
आगे चलकर यही संस्थागत संबंध उस समय महत्वपूर्ण हो गया जब सिख धार्मिक मंचों पर राजनीतिक और फिर उग्र राजनीतिक भाषा प्रवेश करने लगी।
लेकिन 1947 से 1977 के बीच इसका मुख्य स्वरूप चुनावी और संस्थागत ही था।
16. कांग्रेस बनाम अकाली दल: सिर्फ दो दलों की लड़ाई नहीं
पंजाब में कांग्रेस और अकाली दल की प्रतिस्पर्धा केवल सत्ता की सामान्य पार्टी राजनीति नहीं थी।
कांग्रेस स्वयं को व्यापक भारतीय राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्ष राजनीति और अनेक सामाजिक समूहों के गठबंधन की पार्टी के रूप में प्रस्तुत करती थी।
अकाली दल स्वयं को सिख समुदाय के राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक हितों का प्रमुख प्रतिनिधि मानता था।
इससे हर चुनाव का एक अतिरिक्त अर्थ बनता था।
यदि कांग्रेस पंजाब जीतती, तो अकाली दल के इस दावे को चुनौती मिलती कि वह सिख समाज का स्वाभाविक राजनीतिक प्रतिनिधि है।
यदि अकाली दल मजबूत होता, तो पंजाब की राजनीति में पंथक प्रश्न प्रमुख होते।
विद्वानों ने स्वतंत्रता के बाद पंजाब की राजनीति में अकाली और कांग्रेस नेतृत्व के इसी संरचनात्मक संघर्ष को केंद्रीय माना है। JSTOR
17. 1972: कांग्रेस की वापसी
1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध और बांग्लादेश निर्माण के बाद इंदिरा गांधी की राष्ट्रीय लोकप्रियता अपने चरम पर थी।
1972 के पंजाब विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने मजबूत वापसी की।
ज्ञानी जैल सिंह पंजाब के मुख्यमंत्री बने।
अकाली दल सत्ता से बाहर हो गया।
यह राजनीतिक पराजय अकाली दल के भीतर आत्ममंथन का कारण बनी।
अब पंजाबी सूबा बन चुका था।
फिर पार्टी की नई बड़ी राजनीतिक मांग क्या होगी?
यहीं से केंद्र-राज्य संबंध, अधिक स्वायत्तता, पंजाब की सीमाएं, चंडीगढ़ और धार्मिक-सांस्कृतिक मुद्दों को नए राजनीतिक दस्तावेज में समेटने की प्रक्रिया शुरू हुई।
उसका सबसे महत्वपूर्ण परिणाम था—
आनंदपुर साहिब प्रस्ताव।
18. 1973: आनंदपुर साहिब प्रस्ताव
16-17 अक्टूबर 1973 को शिरोमणि अकाली दल की कार्यसमिति ने आनंदपुर साहिब में एक प्रस्ताव अपनाया, जिसे बाद में आनंदपुर साहिब प्रस्ताव के नाम से जाना गया।
आगे चलकर यह दस्तावेज पंजाब संकट की राजनीति के सबसे विवादित दस्तावेजों में से एक बना।
इसके बारे में दो विपरीत राजनीतिक व्याख्याएं प्रचलित रहीं।
एक पक्ष ने इसे भारत के भीतर राज्यों के लिए अधिक स्वायत्तता की मांग बताया।
दूसरे पक्ष ने इसमें सिख राजनीतिक स्वायत्तता और केंद्र की शक्ति को अत्यधिक सीमित करने का कार्यक्रम देखा।
उपलब्ध पाठ में केंद्र के पास मुख्यतः रक्षा, विदेश संबंध, मुद्रा और संचार जैसे विषय रखने तथा बाकी अधिकार राज्यों को देने की मांग की गई थी। इसमें पंजाब से बाहर रह गए बताए गए पंजाबी भाषी क्षेत्रों और चंडीगढ़ का प्रश्न भी था। बाद में 1978 के लुधियाना अधिवेशन में इससे संबंधित प्रस्तावों को अधिक विस्तार दिया गया। SikhiWiki
आनंदपुर साहिब प्रस्ताव को सीधे “खालिस्तान की मांग” कहना दस्तावेज की जटिलता को कम कर देता है।
उसने भारत से स्वतंत्र देश की स्पष्ट मांग नहीं की।
लेकिन इसमें अत्यंत व्यापक राज्य स्वायत्तता, सिख राजनीतिक पहचान और केंद्र की शक्तियां सीमित करने की भाषा थी।
यही कारण है कि बाद के वर्षों में इसे अलग-अलग राजनीतिक शक्तियों ने अलग-अलग अर्थ में प्रस्तुत किया।
जब 1980 के दशक में पंजाब संकट तीव्र हुआ, यह प्रस्ताव फिर राजनीतिक संघर्ष के केंद्र में आ गया।
19. चंडीगढ़ और नदी जल: पहचान से आर्थिक अधिकार तक
1970 के दशक तक पंजाब की राजनीति में धार्मिक पहचान के साथ आर्थिक और संघीय विवाद भी जुड़ चुके थे।
सबसे महत्वपूर्ण थे—
चंडीगढ़,
पंजाबी भाषी क्षेत्रों का प्रश्न,
रावी-ब्यास नदी जल,
और नदी परियोजनाओं का प्रशासनिक नियंत्रण।
ये सभी विषय आगे चलकर अकाली आंदोलनों की मांगों में बार-बार आए।
इसलिए पंजाब संकट को केवल धर्म के आधार पर समझना अधूरा है।
इसके भीतर कम से कम चार परतें थीं—
धर्म और पहचान,
भाषा और क्षेत्र,
संघीय अधिकार,
और आर्थिक संसाधन।
बाद के उग्रवादी प्रचार ने इन्हीं वास्तविक राजनीतिक विवादों को कहीं अधिक कठोर और अलगाववादी भाषा में प्रस्तुत किया।
20. 1975: आपातकाल और पंजाब
25 जून 1975 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने देश में आपातकाल लागू किया।
विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियां हुईं।
नागरिक स्वतंत्रताएं सीमित हुईं।
प्रेस पर सेंसरशिप लगी।
अकाली दल उन राजनीतिक शक्तियों में था जिसने आपातकाल का संगठित विरोध किया।
अकाली नेतृत्व ने लोकतांत्रिक अधिकारों की बहाली की मांग को लेकर सत्याग्रह चलाया और बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं ने गिरफ्तारियां दीं।
इसका पंजाब की राजनीतिक मनोवृत्ति पर गहरा प्रभाव पड़ा।
अकाली दल के लिए केंद्र के विरुद्ध संघर्ष अब केवल पंजाबी सूबा या सिख मुद्दों तक सीमित नहीं रहा; पार्टी स्वयं को संघीय अधिकारों और लोकतांत्रिक स्वतंत्रताओं के पक्ष में भी प्रस्तुत करने लगी।
बाद में आनंदपुर साहिब प्रस्ताव के 1978 के पुनः अनुमोदित पाठ में भी आपातकाल के दौरान केंद्र में शक्ति के अत्यधिक केंद्रीकरण की आलोचना की गई। SikhiWiki
21. 1977: कांग्रेस पराजित, अकाली दल सत्ता में
मार्च 1977 में आपातकाल समाप्त होने के बाद हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की ऐतिहासिक पराजय हुई।
केंद्र में जनता पार्टी की सरकार बनी।
उसी वर्ष पंजाब विधानसभा चुनाव हुए।
अकाली दल और जनता पार्टी गठबंधन सत्ता में आया तथा प्रकाश सिंह बादल मुख्यमंत्री बने।
निर्वाचन आयोग के अभिलेख 1977 के पंजाब चुनाव को राज्य की चुनावी राजनीति के महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में दर्ज करते हैं। Election Commission of India
1977 के अंत तक ऐसा लग सकता था कि पंजाब की राजनीति ने स्थिर लोकतांत्रिक रास्ता पकड़ लिया है।
अकाली दल सत्ता में था।
केंद्र में कांग्रेस नहीं थी।
राज्य स्वायत्तता पर बातचीत की संभावनाएं थीं।
हरित क्रांति पंजाब को समृद्ध बना रही थी।
लेकिन अगले ही वर्ष एक ऐसी घटना हुई जिसने पंजाब की धार्मिक राजनीति को नई दिशा दे दी।
13 अप्रैल 1978—अमृतसर में निरंकारी-सिख टकराव।
यही हमारे अगले अध्याय का निर्णायक आरंभ होगा।
22. 1947–1977 में कौन-से बीज आगे संकट में दिखाई दिए?
इन तीस वर्षों की समीक्षा करने पर सात दीर्घकालिक तत्व सामने आते हैं।
पहला—विभाजन की स्मृति।
सिख समाज ने पश्चिमी पंजाब में अपनी ऐतिहासिक भूमि, संपत्ति और अनेक धार्मिक स्थलों से विस्थापन का अनुभव किया था।
दूसरा—विशिष्ट पहचान की चिंता।
स्वतंत्र भारत में सिख धर्म और राजनीतिक पहचान को किस प्रकार परिभाषित किया जाए, यह अकाली राजनीति का केंद्रीय प्रश्न बना।
तीसरा—भाषा का धार्मिक राजनीतिकरण।
पंजाबी और हिंदी का विवाद कई बार सिख और हिंदू पहचान के साथ जुड़ गया।
चौथा—केंद्र के प्रति अविश्वास।
पंजाबी सूबा की लंबी अस्वीकृति, चंडीगढ़ और अन्य विवादों ने अकाली राजनीति में यह धारणा मजबूत की कि केंद्र से अधिकार आंदोलन के माध्यम से ही हासिल होते हैं।
पांचवां—अधूरा राज्य पुनर्गठन।
1966 ने पंजाबी सूबा बनाया लेकिन चंडीगढ़, नदी जल और क्षेत्रीय विवाद छोड़ दिए।
छठा—धर्म और चुनावी राजनीति का घनिष्ठ संबंध।
अकाली दल और एसजीपीसी जैसी संस्थाओं की भूमिकाओं के कारण राजनीतिक प्रतिस्पर्धा धार्मिक प्रतिनिधित्व से जुड़ी रही।
सातवां—तेजी से बदलता ग्रामीण समाज।
हरित क्रांति ने समृद्धि पैदा की, लेकिन साथ ही आकांक्षाओं, वर्ग संरचना और सामाजिक संबंधों में तेज बदलाव लाया।
इनमें से कोई भी तत्व स्वयं आतंकवाद का कारण नहीं था।
लेकिन 1978 के बाद जब धार्मिक टकराव, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, हथियारबंद समूह और केंद्र-राज्य संघर्ष एक-दूसरे से जुड़ने लगे, तब इन्हीं पुराने प्रश्नों को नई और अधिक खतरनाक व्याख्या मिलने लगी।
निष्कर्ष: 1977 में पंजाब आतंकवादी राज्य नहीं, सफल लेकिन जटिल लोकतांत्रिक प्रदेश था
इतिहास का शायद सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यही है।
1977 तक पंजाब किसी आसन्न गृहयुद्ध में नहीं था।
वह भारत के सबसे समृद्ध राज्यों में था।
उसने हरित क्रांति का नेतृत्व किया था।
सिख बड़ी संख्या में सेना, प्रशासन, व्यापार, कृषि और राष्ट्रीय जीवन के दूसरे क्षेत्रों में सक्रिय थे।
अकाली दल संवैधानिक राजनीति में था और राज्य की सरकार चला रहा था।
खालिस्तान उस समय पंजाब की मुख्यधारा की चुनावी मांग नहीं था।
इसलिए केवल छह-सात वर्ष बाद 1983-84 में पंजाब जिस स्थिति तक पहुंचा, उसे समझने के लिए 1978 से 1984 की घटनाओं का बहुत सूक्ष्म अध्ययन आवश्यक है।
यही वह काल है जिसमें—
धार्मिक विवाद हिंसक हुआ,
जरनैल सिंह भिंडरांवाले का उदय हुआ,
अकाली-कांग्रेस प्रतिस्पर्धा बदली,
हत्याओं का सिलसिला शुरू हुआ,
पुलिस और उग्रवादियों के बीच संघर्ष बढ़ा,
पाकिस्तान का आयाम अधिक महत्वपूर्ण होने लगा,
और अंततः स्वर्ण मंदिर परिसर पंजाब संकट का केंद्र बन गया।
इसलिए अगला अध्याय इस पूरे शोध का पहला निर्णायक मोड़ होगा: