omkarchaudhary.comJOURNALIST · AUTHOR · RESEARCHEROCN Research Desk
दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण

5 जून 1974 को पटना के गांधी मैदान में जयप्रकाश नारायण ने जिस “संपूर्ण क्रांति” का आह्वान किया, वह केवल बिहार सरकार के विरुद्ध राजनीतिक नारा नहीं था। इसका आशय किसी एक मुख्यमंत्री, विधानसभा या सरकार को बदलना भी नहीं था। जयप्रकाश के लिए “संपूर्ण क्रांति” का अर्थ था—समाज, राजनीति, अर्थव्यवस्था, शिक्षा, विचार, संस्कृति और व्यक्ति के नैतिक जीवन में एक साथ परिवर्तन।

यही कारण है कि उन्होंने बार-बार स्पष्ट किया कि केवल सरकार बदलने से क्रांति पूरी नहीं होगी। बाद में अपने लेखन में उन्होंने कहा कि इस आंदोलन का उद्देश्य केवल सरकार परिवर्तन नहीं, बल्कि समाज और व्यक्ति दोनों में व्यापक परिवर्तन है; इसे एक लंबी, शांतिपूर्ण और रचनात्मक प्रक्रिया के रूप में देखना होगा।

यह विचार अचानक 1974 में पैदा नहीं हुआ था। इसके पीछे जयप्रकाश नारायण की लगभग पांच दशक लंबी वैचारिक यात्रा थी—मार्क्सवाद, लोकतांत्रिक समाजवाद, गांधी, सर्वोदय, भूदान और सत्ता के विकेंद्रीकरण के प्रयोगों से गुजरती हुई। 1974 में बिहार आंदोलन ने उन्हें वह राजनीतिक परिस्थिति दी जिसमें उनकी वर्षों पुरानी वैचारिक खोज एक जनआंदोलन के कार्यक्रम में बदल सकी।

5 जून 1974 — आंदोलन का लक्ष्य बदल गया

बिहार छात्र आंदोलन की शुरुआत महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और शैक्षिक अव्यवस्था के खिलाफ हुई थी। धीरे-धीरे विधानसभा भंग करने की मांग प्रमुख हुई।

लेकिन गांधी मैदान की सभा में जयप्रकाश ने आंदोलन को इससे आगे ले जाने की घोषणा की।

उनका तर्क था कि यदि वर्तमान विधानसभा भंग भी हो जाए और नई सरकार बन जाए, लेकिन वही भ्रष्ट राजनीतिक संस्कृति, वही प्रशासनिक ढांचा और वही सामाजिक अन्याय कायम रहे तो वास्तविक परिवर्तन नहीं होगा।

यही वह बिंदु था जहां “सरकार बदलो” की मांग “व्यवस्था बदलो” में बदल गई।

राष्ट्रीय शैक्षिक सामग्री भी 5 जून की सभा को इस परिवर्तन का निर्णायक क्षण मानती है—बिहार आंदोलन अब केवल छात्र मांगों या मंत्रिमंडल परिवर्तन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि व्यापक सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तन की मांग में बदल गया।

“संपूर्ण” शब्द का अर्थ

जयप्रकाश के लिए “संपूर्ण” का अर्थ था कि समाज के किसी एक हिस्से को बदलना पर्याप्त नहीं है।

राजनीति सुधरे लेकिन अर्थव्यवस्था अन्यायपूर्ण रहे—तो परिवर्तन अधूरा।

अर्थव्यवस्था बदले लेकिन जाति, अस्पृश्यता और सामाजिक भेदभाव बने रहें—तो परिवर्तन अधूरा।

शिक्षा बदले लेकिन राजनीति भ्रष्ट रहे—तो परिवर्तन अधूरा।

सरकार ईमानदार हो लेकिन व्यक्ति और समाज का नैतिक जीवन पतित हो—तो परिवर्तन फिर अधूरा।

इसीलिए उन्होंने सात व्यापक क्षेत्रों की बात की।

वे स्वयं इन सात की संख्या को कोई कठोर धार्मिक या दार्शनिक संख्या नहीं मानते थे। उनका कहना था कि इन्हें परिस्थिति के अनुसार जोड़ा या अलग किया जा सकता है। सांस्कृतिक क्रांति में शिक्षा और विचार की क्रांति को शामिल किया जा सकता है; आर्थिक क्रांति को कृषि, उद्योग और प्रौद्योगिकी में अलग-अलग समझा जा सकता है।

सात क्रांतियां

1. राजनीतिक क्रांति

राजनीतिक क्रांति जयप्रकाश के कार्यक्रम का सबसे दृश्यमान भाग थी, लेकिन वह अकेला भाग नहीं था।

उनकी राजनीति की मुख्य चिंता थी—सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण।

वे मानते थे कि लोकतंत्र केवल पांच वर्ष में एक बार वोट डालने का नाम नहीं होना चाहिए।

जनता को सरकार के गठन के बाद भी शासन में वास्तविक भूमिका मिलनी चाहिए।

राजनीतिक क्रांति के प्रमुख तत्व थे—

सत्ता का विकेंद्रीकरण,

ग्राम और स्थानीय संस्थाओं को वास्तविक अधिकार,

निर्वाचित प्रतिनिधियों की जवाबदेही,

भ्रष्टाचार पर नियंत्रण,

चुनाव सुधार,

राजनीतिक दलों की आंतरिक लोकतांत्रिकता,

और प्रशासन पर जनता की निगरानी।

उनकी लोकतंत्र की कल्पना ऊपर से नीचे आने वाली शक्ति की नहीं, नीचे से ऊपर जाने वाली शक्ति की थी। गांव और स्थानीय समुदाय वास्तविक लोकतंत्र की आधार इकाइयां हों और ऊपर की सरकार मुख्यतः समन्वयकारी भूमिका निभाए—यह विचार उनके गांधीवादी और सर्वोदय चरण से आया था।

इसलिए विधानसभा भंग करना उनके लिए राजनीतिक क्रांति का केवल तत्काल कदम था, लक्ष्य नहीं।

2. आर्थिक क्रांति

जयप्रकाश ने आर्थिक असमानता को युवावस्था से भारतीय समाज की मूल समस्याओं में माना था।

अमेरिका में मार्क्सवाद से प्रभावित होने के दिनों से लेकर सर्वोदय तक उनका यह मूल आग्रह नहीं बदला कि अत्यधिक संपत्ति और आर्थिक शक्ति का केंद्रीकरण सामाजिक न्याय के विरुद्ध है।

संपूर्ण क्रांति में आर्थिक परिवर्तन का अर्थ था—

भूमिहीनों को जमीन,

भूमि सुधारों का वास्तविक क्रियान्वयन,

किसानों और मजदूरों के हितों की रक्षा,

उत्पादन और वितरण में न्याय,

शोषण में कमी,

सहकारिता,

और आर्थिक शक्ति का विकेंद्रीकरण।

उनकी आर्थिक दृष्टि अब शास्त्रीय मार्क्सवादी राज्य-नियंत्रित अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं थी। सर्वोदय के प्रभाव के कारण वे स्थानीय स्वावलंबन, सहकारी ढांचे और छोटे समुदायों की आर्थिक शक्ति पर जोर देते थे।

इसलिए उनकी आर्थिक क्रांति कृषि, उद्योग और प्रौद्योगिकी—तीनों में संरचनात्मक परिवर्तन की बात करती थी।

3. सामाजिक क्रांति

जयप्रकाश समझ चुके थे कि भारत में केवल आर्थिक समानता से सामाजिक समानता नहीं आएगी।

भारतीय समाज में जाति, अस्पृश्यता, ऊंच-नीच, लैंगिक भेदभाव और सामाजिक रूढ़ियां इतनी गहरी थीं कि इनके विरुद्ध स्वतंत्र संघर्ष आवश्यक था।

सामाजिक क्रांति का अर्थ था—

जातिगत भेदभाव समाप्त करना,

अस्पृश्यता समाप्त करना,

कमजोर वर्गों को सम्मान और समान अवसर देना,

स्त्रियों के साथ समान व्यवहार,

दहेज जैसी सामाजिक कुरीतियों का विरोध,

और सामाजिक संबंधों में वास्तविक बराबरी स्थापित करना।

संपूर्ण क्रांति की यही विशेषता इसे केवल राजनीतिक आंदोलन से अलग करती थी। जयप्रकाश व्यवस्था परिवर्तन को संसद या सचिवालय से शुरू और समाप्त नहीं मानते थे; परिवार, गांव और समुदाय भी परिवर्तन के क्षेत्र थे।

4. सांस्कृतिक क्रांति

जयप्रकाश संस्कृति को केवल कला, साहित्य या परंपरा के अर्थ में नहीं देखते थे।

उनकी दृष्टि में संस्कृति व्यक्ति और समुदाय के व्यवहार, मूल्यों और जीवन-दृष्टि से जुड़ी थी।

यदि समाज में लालच, सत्ता-लिप्सा, जातीय अहंकार, हिंसा और भ्रष्टाचार सामान्य सामाजिक व्यवहार बन जाएं तो केवल कानून बनाकर लोकतंत्र स्वस्थ नहीं रह सकता।

इसलिए सांस्कृतिक क्रांति का उद्देश्य समाज के व्यवहार और मूल्यों में परिवर्तन था।

राष्ट्रीय एकता, सहिष्णुता, सेवा, सामाजिक उत्तरदायित्व और सार्वजनिक जीवन में नैतिकता उसके केंद्रीय तत्व थे।

5. वैचारिक या बौद्धिक क्रांति

जयप्रकाश चाहते थे कि नागरिक राजनीति के निष्क्रिय दर्शक न बने रहें।

वे स्वतंत्र विचार, आलोचनात्मक चेतना और प्रश्न पूछने की क्षमता विकसित करें।

उनकी दृष्टि में लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब जनता केवल नेताओं की बात सुनने वाली भीड़ न रहे, बल्कि सार्वजनिक नीतियों और सत्ता की आलोचनात्मक समीक्षा करने वाली जागरूक शक्ति बने।

इसलिए वैचारिक या बौद्धिक क्रांति का अर्थ था—

अंधानुकरण से मुक्ति,

स्वतंत्र चिंतन,

वैज्ञानिक दृष्टिकोण,

सार्वजनिक प्रश्नों पर विवेकपूर्ण बहस,

और नागरिक चेतना का विकास।

जयप्रकाश ने इसे भी व्यापक सांस्कृतिक परिवर्तन से जोड़ा था।

6. शैक्षिक क्रांति

1974 के आंदोलन में विद्यार्थियों की केंद्रीय भूमिका के कारण शिक्षा जयप्रकाश के कार्यक्रम का विशेष हिस्सा बनी।

वे मौजूदा शिक्षा व्यवस्था से असंतुष्ट थे।

उनका मानना था कि शिक्षा केवल डिग्री और नौकरी पाने की मशीन बनती जा रही है और समाज से उसका संबंध कमजोर हो गया है।

वे ऐसी शिक्षा चाहते थे जो—

जीवन और समाज से जुड़ी हो,

व्यावसायिक और उपयोगी कौशल दे,

युवाओं को सामाजिक उत्तरदायित्व सिखाए,

ग्रामीण भारत की वास्तविकताओं से परिचित कराए,

और नागरिक चेतना पैदा करे।

गांधी मैदान के आंदोलन के दौरान उन्होंने विद्यार्थियों से एक वर्ष तक पढ़ाई छोड़कर समाज में काम करने की अपील तक की थी। भारत सरकार के एक आधिकारिक जीवन-वृत्त में भी इस आह्वान का उल्लेख मिलता है।

उनकी दृष्टि में विद्यार्थी केवल भविष्य के नौकरी-प्रार्थी नहीं, समाज परिवर्तन के सक्रिय कार्यकर्ता भी हो सकते थे।

7. आध्यात्मिक और नैतिक क्रांति

संपूर्ण क्रांति का यह सबसे कम समझा जाने वाला लेकिन जयप्रकाश के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा था।

वे राजनीति को केवल संस्थाओं का प्रश्न नहीं मानते थे।

उनका तर्क था कि भ्रष्ट व्यवस्था भ्रष्ट मनुष्य भी पैदा करती है, लेकिन लोभ, स्वार्थ और सत्ता-लिप्सा से भरा व्यक्ति अच्छी संस्था को भी भ्रष्ट कर सकता है।

इसलिए व्यक्ति के भीतर परिवर्तन आवश्यक है।

आध्यात्मिक क्रांति से उनका आशय किसी विशेष धार्मिक मत को स्थापित करना नहीं था।

इसका अर्थ था—

सत्य,

अहिंसा,

आत्मसंयम,

सेवा,

नैतिक साहस,

सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी,

और सत्ता के प्रति अनासक्ति।

यही सर्वोदय काल का प्रभाव था।

वे समाज और व्यक्ति की क्रांति को एक-दूसरे से अलग नहीं करते थे।

सात क्रांतियां अलग-अलग नहीं थीं

जयप्रकाश का मूल आग्रह यही था कि इन सात क्षेत्रों को अलग-अलग विभागों की तरह न देखा जाए।

यदि आर्थिक व्यवस्था बेरोजगारी पैदा करती है तो उसका असर राजनीति पर पड़ेगा।

यदि शिक्षा व्यवस्था नागरिक चेतना नहीं देती तो भ्रष्ट राजनीति को चुनौती देने वाले नागरिक कमजोर होंगे।

यदि सामाजिक व्यवस्था जाति पर आधारित है तो राजनीतिक समानता केवल कागज पर रहेगी।

यदि व्यक्ति और सार्वजनिक जीवन में नैतिकता नहीं है तो भ्रष्टाचार किसी भी संवैधानिक ढांचे को खोखला कर सकता है।

इसलिए वे इसे “संपूर्ण” क्रांति कहते थे।

सरकार बदलना क्यों पर्याप्त नहीं था?

जयप्रकाश के जीवन का यह एक बड़ा निष्कर्ष था।

उन्होंने ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध संघर्ष किया था।

स्वतंत्र भारत में समाजवादी पार्टी बनाई थी।

फिर दलगत राजनीति छोड़ी थी।

भूदान और सर्वोदय का प्रयोग किया था।

इन अनुभवों के बाद वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि केवल सत्ता पर कब्जा करना सामाजिक क्रांति की गारंटी नहीं है।

एक दल जाएगा।

दूसरा आएगा।

मुख्यमंत्री बदलेगा।

प्रधानमंत्री बदलेगा।

लेकिन यदि राजनीतिक संस्कृति, प्रशासन, शिक्षा, सामाजिक संरचना और आर्थिक शक्ति का ढांचा वही रहे तो सामान्य नागरिक के जीवन में मूल परिवर्तन नहीं होगा।

इसलिए उनका संघर्ष किसी एक सरकार से बड़ा था।

बिहार में इसे व्यवहार में कैसे उतारना था?

संपूर्ण क्रांति केवल दार्शनिक घोषणा नहीं थी। बिहार आंदोलन के दौरान जयप्रकाश ने इसके लिए व्यावहारिक कार्यक्रम भी प्रस्तावित किए।

छात्र संघर्ष समितियों और जन संघर्ष समितियों को गांव, कस्बे और स्थानीय स्तर पर संगठित करने की योजना थी।

स्थानीय स्तर पर जनता की समितियां बनें।

वे भ्रष्टाचार, कालाबाजारी, राशन व्यवस्था और प्रशासनिक अनियमितताओं पर नजर रखें।

भूमिहीनों को भूदान भूमि दिलाने में सहायता करें।

जाति और दहेज जैसी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ अभियान चलाएं।

स्थानीय विवादों को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाने का प्रयास करें।

इस अवधारणा में आगे “जनता सरकार” और जनता की स्थानीय समितियों जैसी संरचनाएं भी सामने आईं। विचार यह था कि जनता केवल राज्य से शिकायत करने वाली शक्ति न रहे; वह स्थानीय सार्वजनिक जीवन में जिम्मेदारी भी ग्रहण करे।

संघर्ष और रचनात्मक कार्य साथ-साथ

जयप्रकाश के कार्यक्रम की महत्वपूर्ण विशेषता थी—सिर्फ विरोध नहीं।

वे आंदोलन के दो हिस्से चाहते थे।

एक, अन्यायपूर्ण सत्ता और भ्रष्ट व्यवस्था के विरुद्ध अहिंसक संघर्ष।

दूसरा, नई व्यवस्था बनाने के लिए रचनात्मक कार्य।

यही गांधीवादी प्रभाव था।

सत्याग्रह केवल रोकने के लिए नहीं, नया समाज बनाने के लिए भी हो।

इसलिए वे लगातार कहते रहे कि संपूर्ण क्रांति एक दिन, एक चुनाव या एक आंदोलन में पूरी नहीं हो सकती। इसे लंबे संघर्ष और रचनात्मक सामाजिक कार्य के साथ चलना होगा।

क्या यह संवैधानिक व्यवस्था के बाहर की राजनीति थी?

यहीं सबसे बड़ा विवाद पैदा हुआ।

जयप्रकाश के समर्थकों का तर्क था कि शांतिपूर्ण जनदबाव लोकतंत्र का वैध हिस्सा है। यदि जनता भ्रष्टाचार और शासन की विफलता के विरुद्ध अहिंसक आंदोलन करती है तो यह लोकतंत्र को मजबूत करता है।

लेकिन कांग्रेस और सरकार का दृष्टिकोण अलग था।

सरकार ने आरोप लगाया कि निर्वाचित विधानसभा को घेरना, विधायकों से इस्तीफा मांगना, सरकारी कार्यालयों को ठप करना, कर न देने का आह्वान और समानांतर जनसंस्थाएं बनाने की बात संसदीय लोकतंत्र को कमजोर करती है।

बाद में आपातकाल के पक्ष में जारी सरकारी दस्तावेजों में बिहार आंदोलन के कार्यक्रमों में शिक्षण संस्थानों के बहिष्कार, विधायकों के घेराव, सरकारी काम रोकने, कर न देने और समानांतर “जनता सरकार” जैसी गतिविधियों को विशेष रूप से रेखांकित किया गया।

यही विवाद आगे इंदिरा गांधी और जयप्रकाश के बीच टकराव का केंद्रीय प्रश्न बनने वाला था।

जयप्रकाश का उत्तर — अहिंसक जनशक्ति

जयप्रकाश का दावा था कि वे संसदीय लोकतंत्र समाप्त नहीं करना चाहते।

वे उसे अधिक उत्तरदायी और सहभागी बनाना चाहते थे।

उनका साधन सशस्त्र विद्रोह नहीं था।

उनकी राजनीति का आधार अब अहिंसक प्रत्यक्ष जनकार्रवाई थी।

यही उनके 1942 और 1974 के बीच सबसे बड़ा परिवर्तन था।

1942 में उन्होंने औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध भूमिगत क्रांतिकारी संघर्ष स्वीकार किया था।

1974 में वे लोकतांत्रिक भारत में अहिंसक जनदबाव के माध्यम से व्यवस्था परिवर्तन चाहते थे।

“लोकशक्ति” बनाम “राजशक्ति”

संपूर्ण क्रांति के पीछे जयप्रकाश की सबसे गहरी धारणा थी—लोकशक्ति।

उनका विश्वास था कि स्वस्थ लोकतंत्र में समाज को हर काम के लिए सरकार पर निर्भर नहीं होना चाहिए।

जनता स्वयं संगठित हो।

स्थानीय समस्याएं स्वयं हल करे।

सरकार की निगरानी करे।

भ्रष्टाचार का विरोध करे।

कमजोर वर्गों के अधिकारों की रक्षा करे।

और सत्ता को नीचे तक बांटे।

यदि नागरिक केवल चुनाव के दिन सक्रिय हों और शेष पांच वर्ष सरकार पर निर्भर रहें तो लोकतंत्र कमजोर होगा।

यही लोकशक्ति की अवधारणा थी।

आलोचना भी कम नहीं थी

संपूर्ण क्रांति की अवधारणा प्रेरक थी, लेकिन आलोचनाओं से मुक्त नहीं।

पहली आलोचना थी कि इसका कार्यक्रम अत्यंत व्यापक था।

राजनीति से अर्थव्यवस्था, शिक्षा, संस्कृति और आध्यात्मिकता तक सब कुछ बदलने का लक्ष्य व्यावहारिक रूप से कैसे पूरा होगा—इसकी स्पष्ट संस्थागत रूपरेखा हमेशा उपलब्ध नहीं थी।

दूसरी आलोचना थी कि निर्वाचित विधानसभा पर बाहर से दबाव डालकर उसे भंग कराने की मांग संसदीय लोकतंत्र की मर्यादा से टकराती है।

तीसरी आलोचना यह थी कि विभिन्न विचारधाराओं के विपक्षी दल—जनसंघ से लेकर समाजवादियों तक—एक ही आंदोलन में थे; इसलिए क्या सभी वास्तव में जयप्रकाश की सात क्रांतियों से सहमत थे, यह अलग प्रश्न था।

चौथी आलोचना थी कि व्यापक नैतिक परिवर्तन का लक्ष्य राज्य नीति में मापना कठिन है।

ये प्रश्न उस समय भी उठे और बाद में भी इतिहासकारों तथा राजनीतिक चिंतकों के बीच बहस का विषय बने। राष्ट्रीय शैक्षिक सामग्री भी आंदोलन के राष्ट्रीय राजनीतिक प्रभाव और विपक्षी दलों की बढ़ती भागीदारी को रेखांकित करती है।

लेकिन जयप्रकाश के लिए यह चुनावी घोषणापत्र नहीं था

संपूर्ण क्रांति को यदि किसी चुनावी पार्टी के घोषणापत्र की तरह पढ़ा जाए तो उसकी अवधारणा अधूरी समझ में आएगी।

यह एक दीर्घकालीन सामाजिक दर्शन था।

उसका तत्काल राजनीतिक मंच बिहार आंदोलन था, लेकिन लक्ष्य उससे बहुत आगे था।

जयप्रकाश स्वयं यह मानते थे कि ऐसी क्रांति एक-दो वर्षों में पूरी नहीं होगी। इसका अर्थ निरंतर परिवर्तन था—समाज और व्यक्ति दोनों का।

1974 में इसकी राजनीतिक शक्ति क्या थी?

संपूर्ण क्रांति की सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति इसकी व्यापकता थी।

छात्र इसमें शिक्षा सुधार देख सकता था।

बेरोजगार युवा रोजगार और व्यवस्था परिवर्तन।

किसान आर्थिक न्याय।

मध्यवर्ग भ्रष्टाचार-विरोध।

सर्वोदय कार्यकर्ता विकेंद्रीकरण।

विपक्षी दल कांग्रेस-विरोध।

और जयप्रकाश स्वयं इसे इन सबसे बड़ा नैतिक-सामाजिक परिवर्तन मानते थे।

यही कारण था कि यह नारा इतने अलग समूहों को जोड़ पाया।

और यहीं से इंदिरा गांधी से सीधा टकराव शुरू हुआ

जब तक आंदोलन बिहार सरकार तक सीमित था, वह मुख्यतः राज्य का संकट था।

लेकिन संपूर्ण क्रांति का आह्वान राष्ट्रीय व्यवस्था की आलोचना था।

अब जयप्रकाश केवल अब्दुल गफूर सरकार के विरोधी नहीं रहे।

वे केंद्रीय राजनीतिक व्यवस्था, भ्रष्टाचार, सत्ता के केंद्रीकरण और लोकतांत्रिक संस्थाओं के कामकाज पर प्रश्न उठा रहे थे।

आंदोलन बिहार से बाहर फैलाने की योजना थी। राष्ट्रीय विपक्ष उनसे जुड़ रहा था।

इस बिंदु से जयप्रकाश और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बीच संघर्ष व्यक्तिगत नहीं, बल्कि दो राजनीतिक दृष्टियों के संघर्ष में बदलने लगा।

एक तरफ निर्वाचित सरकार का तर्क था—लोकतांत्रिक वैधता चुनाव और संविधान से आती है।

दूसरी तरफ जयप्रकाश का तर्क था—लोकतंत्र केवल चुनाव नहीं है; जनता को भ्रष्ट और अनुत्तरदायी सत्ता के विरुद्ध शांतिपूर्ण जनआंदोलन का अधिकार भी है।

यही बहस 1974 से 1975 के बीच भारतीय लोकतंत्र के सबसे बड़े राजनीतिक टकराव में बदलने वाली थी।