जनता पार्टी का निर्माण और 1977 का चुनाव
जनता पार्टी का निर्माण और 1977 का चुनाव — जनसंघ, लोकदल, कांग्रेस (ओ) और समाजवादियों को एक मंच पर लाने में जयप्रकाश नारायण की निर्णायक भूमिका
1977 का आम चुनाव भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में केवल सत्ता परिवर्तन का चुनाव नहीं था। यह पहली बार था जब स्वतंत्र भारत में केंद्र की सत्ता से कांग्रेस को बाहर किया गया। लेकिन इस परिणाम के पीछे केवल आपातकाल-विरोधी जनभावना नहीं थी। उतना ही महत्वपूर्ण था वह राजनीतिक प्रयोग जिसमें लंबे समय तक एक-दूसरे के विरोधी रहे दल—भारतीय जनसंघ, भारतीय लोकदल, कांग्रेस (ओ) और समाजवादी—एक साझा दल के रूप में सामने आए।
इस एकीकरण में जयप्रकाश नारायण की भूमिका निर्णायक थी।
वे स्वयं चुनाव नहीं लड़ रहे थे। प्रधानमंत्री पद के दावेदार नहीं थे। किसी एक दल के अध्यक्ष भी नहीं थे। फिर भी वही व्यक्ति इन परस्पर विरोधी राजनीतिक धाराओं को यह समझाने में सफल हुआ कि यदि वे अलग-अलग चुनाव लड़ेंगे तो कांग्रेस का मुकाबला करना कठिन होगा, और यदि लोकतंत्र की बहाली को प्राथमिक लक्ष्य मानते हैं तो अपनी पुरानी पहचान और संगठनात्मक अहंकार से ऊपर उठना होगा।
राजनीतिक इतिहास के अध्ययन भी जनता पार्टी के निर्माण को भारतीय लोकदल, कांग्रेस (ओ), भारतीय जनसंघ और सोशलिस्ट पार्टी के बीच 1974 से चल रहे लंबे संवाद का परिणाम मानते हैं और इस प्रक्रिया में जयप्रकाश नारायण की भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हैं।
आपातकाल ने अलग-अलग विपक्षी दलों को एक साझा अनुभव दिया
1975 से पहले विपक्ष की सबसे बड़ी कमजोरी उसका विभाजन था।
भारतीय जनसंघ की अपनी वैचारिक पहचान थी।
चरण सिंह का भारतीय लोकदल मुख्यतः किसान राजनीति और ग्रामीण सामाजिक शक्तियों का प्रतिनिधित्व करता था।
कांग्रेस (ओ) में मोरारजी देसाई जैसे वे पुराने कांग्रेसी नेता थे जिन्होंने 1969 के विभाजन के बाद इंदिरा गांधी का विरोध किया था।
समाजवादी धारा स्वयं कई विभाजनों से गुजर चुकी थी।
इन दलों का कांग्रेस-विरोध साझा था, लेकिन एक-दूसरे के प्रति उनका अविश्वास भी कम नहीं था।
1974 में जयप्रकाश आंदोलन ने पहली बार उन्हें एक साझा जनमंच दिया।
और 1975 के आपातकाल ने उन्हें एक साझा अनुभव—गिरफ्तारी, सेंसरशिप और राजनीतिक दमन—दिया।
जनसंघ, समाजवादी, कांग्रेस (ओ) और लोकदल के नेताओं ने जेलों में एक-दूसरे के साथ लंबा समय बिताया। राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच पहली बार यह अनुभव मजबूत हुआ कि इंदिरा गांधी और कांग्रेस को चुनौती देने के लिए केवल चुनावी सीट-बंटवारा पर्याप्त नहीं होगा।
एक वास्तविक राष्ट्रीय विकल्प बनाना होगा।
जयप्रकाश की पुरानी चिंता — विपक्ष केवल जोड़ न बने
जयप्रकाश नारायण 1974 से ही विपक्षी एकता की बात कर रहे थे।
लेकिन वे केवल यह नहीं चाहते थे कि चुनाव आते ही चार दल आपस में सीटें बांट लें और चुनाव के बाद फिर अलग हो जाएं।
उनका आग्रह अधिक गहरा था।
वे चाहते थे कि लोकतंत्र बचाने के प्रश्न पर विपक्ष अपनी अलग-अलग संगठनात्मक पहचान तक छोड़ने के लिए तैयार हो।
इसके पीछे उनके पिछले अनुभव भी थे।
1967 में गैर-कांग्रेसी संयुक्त सरकारें बनी थीं, लेकिन अनेक राज्यों में वे इसलिए जल्दी टूट गईं क्योंकि उन्हें जोड़ने वाला आधार केवल कांग्रेस-विरोध था। जयप्रकाश नहीं चाहते थे कि राष्ट्रीय स्तर पर वही प्रयोग दोहराया जाए।
इसलिए उनका जोर गठबंधन से आगे जाकर विलय पर था।
18 जनवरी 1977 — इंदिरा गांधी ने चुनाव की घोषणा की
लगभग उन्नीस महीने के आपातकाल के बाद जनवरी 1977 में परिस्थितियां अचानक बदल गईं।
18 जनवरी को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लोकसभा चुनाव कराने की घोषणा की।
राजनीतिक बंदियों की रिहाई शुरू हुई और प्रेस पर लगी कई पाबंदियां ढीली की गईं। विपक्ष के सामने अब बहुत कम समय था।
अगला चुनाव मार्च में होना था।
यानी जिन नेताओं ने डेढ़ वर्ष से अधिक समय जेल में बिताया था, उन्हें कुछ ही सप्ताह में संगठन खड़ा करना, उम्मीदवार तय करना और देशव्यापी चुनाव अभियान शुरू करना था।
यहीं जयप्रकाश की पहले से चली आ रही विपक्षी एकता की कोशिश निर्णायक बनी।
चुनावी मोर्चा नहीं—एक पार्टी
चुनाव की घोषणा के तुरंत बाद विपक्षी नेताओं के बीच बातचीत तेज हुई।
भारतीय लोकदल।
भारतीय जनसंघ।
कांग्रेस (ओ)।
सोशलिस्ट पार्टी।
इन चार मुख्य दलों ने अपनी अलग पहचान समाप्त कर एक नया राजनीतिक दल बनाने का निर्णय किया।
23 जनवरी 1977 को नई जनता पार्टी का सार्वजनिक रूप सामने आया। मोरारजी देसाई इसके अध्यक्ष और चरण सिंह उपाध्यक्ष बने। संगठन में अलग-अलग घटक दलों के नेताओं को स्थान दिया गया। समकालीन अभिलेख जनता पार्टी को पुराने कांग्रेस संगठन, जनसंघ, भारतीय लोकदल और समाजवादियों के एकीकरण के रूप में दर्ज करते हैं।
यह भारतीय राजनीति की असाधारण घटना थी।
जनसंघ और समाजवादी एक पार्टी में।
चरण सिंह और मोरारजी देसाई एक संगठन में।
कांग्रेस से अलग हुए पुराने नेता और कट्टर कांग्रेस-विरोधी कार्यकर्ता एक साथ।
इनकी विचारधाराएं समाप्त नहीं हुई थीं।
लेकिन उन्होंने चुनाव के लिए केवल गठबंधन नहीं बनाया—कम से कम राजनीतिक रूप से अपनी पहचान एक नए दल में विलीन करने की घोषणा की।
एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सावधानी — जनता पार्टी कब “बनी”?
यहां तारीखों को स्पष्ट रखना आवश्यक है।
जनवरी 1977 में जनता पार्टी का गठन और चुनावी संगठन सामने आ गया था और उसने चुनाव एक संयुक्त शक्ति के रूप में लड़ा।
लेकिन पुराने दलों के संगठनात्मक विलय की पूर्ण औपचारिक प्रक्रिया चुनाव के बाद पूरी हुई। प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय के अभिलेख के अनुसार अखिल भारतीय स्तर पर विलय को 1 मई 1977 के सम्मेलन में औपचारिक रूप दिया गया।
इसलिए यह कहना अधिक सही है कि—
जनवरी 1977 में जनता पार्टी चुनावी और राजनीतिक इकाई के रूप में बनी; मई 1977 में उसके घटक संगठनों का औपचारिक विलय पूरा हुआ।
यह अंतर आगे चुनाव परिणामों के आधिकारिक आंकड़ों को समझने में भी महत्वपूर्ण है।
जयप्रकाश की शर्त — अलग झंडे नहीं, एक विकल्प
जयप्रकाश के प्रभाव का सबसे बड़ा प्रमाण यह था कि उन्होंने विपक्ष को केवल “इंदिरा हटाओ” के स्तर पर नहीं छोड़ा।
उनकी मांग थी कि जनता को यह भरोसा होना चाहिए कि सामने एक स्थायी वैकल्पिक सरकार उपलब्ध है।
यदि जनसंघ अलग चुनाव लड़े, लोकदल अलग, कांग्रेस (ओ) अलग और समाजवादी अलग, तो विपक्षी मत फिर बंट सकते थे।
इसके विपरीत एक पार्टी यह संदेश दे सकती थी कि मतदाता कांग्रेस के स्थान पर सीधे दूसरी राष्ट्रीय सरकार चुन सकता है।
यही 1977 की रणनीति की असली शक्ति बनी।
ऑक्सफोर्ड के राजनीतिक अध्ययन में भी जनता पार्टी को समाजवादी, भारतीय लोकदल, जनसंघ और कांग्रेस (ओ) के विलय से बनी उस राष्ट्रीय शक्ति के रूप में वर्णित किया गया है जिसने पहली गैर-कांग्रेसी केंद्र सरकार बनाई।
वैचारिक विरोध इतने बड़े थे कि एकता स्वाभाविक नहीं थी
बाद में यह धारणा बनी कि आपातकाल लगते ही विपक्ष का जनता पार्टी में मिल जाना लगभग स्वाभाविक था।
लेकिन राजनीतिक शोध इस धारणा को सही नहीं मानता।
1974 से 1977 के बीच लगातार वार्ता, अविश्वास, नेतृत्व संघर्ष और संगठनात्मक विवाद चलते रहे। जनसंघ, लोकदल, कांग्रेस (ओ) और समाजवादी दलों का एक पार्टी में आना न तो सहज था और न अपरिहार्य।
जनसंघ राष्ट्रवाद और अपने संगठनात्मक ढांचे के साथ आया था।
समाजवादियों की आर्थिक और सामाजिक दृष्टि उससे अलग थी।
चरण सिंह का आधार किसान राजनीति था और वे केंद्रीकृत औद्योगिक आर्थिक दृष्टि के आलोचक थे।
मोरारजी देसाई की राजनीतिक शैली और आर्थिक सोच अलग थी।
इन सबके बीच जयप्रकाश एक ऐसे व्यक्ति थे जो किसी एक धड़े से पूरी तरह नहीं जुड़े थे।
इसी कारण वे मध्यस्थ बन सके।
जनता पार्टी का सबसे बड़ा साझा कार्यक्रम क्या था?
उस समय विस्तृत आर्थिक या सामाजिक कार्यक्रम की तुलना में एक बात सबसे ऊपर थी—
लोकतंत्र की बहाली।
नागरिक स्वतंत्रताओं की पुनर्स्थापना।
प्रेस की स्वतंत्रता।
राजनीतिक बंदियों की रिहाई।
आपातकाल की समाप्ति।
संविधान और न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा।
सत्ता के अति-केंद्रीकरण का विरोध।
जनता पार्टी के चुनावी अभियान ने चुनाव को लगभग एक जनमत-संग्रह में बदल दिया—
क्या मतदाता आपातकालीन शासन को स्वीकार करते हैं या उसे अस्वीकार करते हैं?
जनवरी 1977 के समकालीन अमेरिकी राजनयिक अभिलेख में भी जनता पार्टी के चुनाव अभियान का मुख्य प्रश्न “लोकतंत्र बनाम तानाशाही” के रूप में दर्ज है।
जयप्रकाश ने स्वयं नेतृत्व क्यों नहीं लिया?
यह प्रश्न स्वाभाविक था।
जिस व्यक्ति के नाम पर विपक्ष एक हुआ, वह स्वयं जनता पार्टी का अध्यक्ष या प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार क्यों नहीं बना?
पहला कारण उनका स्वास्थ्य था।
उनकी दोनों किडनियां गंभीर रूप से प्रभावित थीं और वे नियमित डायलिसिस पर थे।
दूसरा कारण अधिक महत्वपूर्ण था—
जयप्रकाश स्वयं सत्ता प्राप्त करना नहीं चाहते थे।
उन्होंने 1950 के दशक में चुनावी राजनीति छोड़ी थी और 1974 में भी आंदोलन का नेतृत्व किसी पद के लिए नहीं किया था।
इसलिए जनता पार्टी में उनकी भूमिका सत्ता के दावेदार की नहीं, नैतिक संरक्षक की रही।
यही स्थिति उन्हें अलग-अलग नेताओं के बीच मध्यस्थ बनने की शक्ति देती थी।
फरवरी 1977 — जगजीवन राम ने कांग्रेस छोड़ी
जनता पार्टी बनने के कुछ ही दिनों बाद इंदिरा गांधी को एक और बड़ा राजनीतिक झटका लगा।
वरिष्ठ कांग्रेस नेता जगजीवन राम ने कांग्रेस छोड़ दी।
उनके साथ हेमवती नंदन बहुगुणा, नंदिनी सत्पथी तथा कुछ अन्य नेता भी अलग हुए और कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी बनाई। जगजीवन राम लंबे समय तक कांग्रेस के केंद्रीय नेता और केंद्रीय मंत्री रहे थे तथा अनुसूचित जाति समाज के सबसे प्रमुख राष्ट्रीय नेताओं में थे। सरकारी जीवन-वृत्त भी दर्ज करता है कि उन्होंने 1977 में कांग्रेस छोड़ी, कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी बनाई और जनता पार्टी के साथ चुनावी गठबंधन किया।
इस घटना का राजनीतिक असर बहुत बड़ा था।
अब आपातकाल-विरोध केवल पुराने विपक्ष की आवाज नहीं रहा।
इंदिरा गांधी की अपनी कांग्रेस के भीतर से भी वरिष्ठ नेता बाहर निकलकर विपक्ष से जुड़ चुके थे।
कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी अलग क्यों रही?
जगजीवन राम का दल तत्काल जनता पार्टी में पूरी तरह विलीन नहीं हुआ।
उसने चुनाव जनता गठबंधन के साथ मिलकर लड़ा लेकिन अपनी अलग पहचान बनाए रखी।
इसलिए 1977 के विपक्षी मोर्चे को समझने के लिए दो स्तर अलग रखने चाहिए—
जनता पार्टी — जनसंघ, लोकदल, कांग्रेस (ओ) और समाजवादियों का मुख्य एकीकृत दल।
कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी — जगजीवन राम का अलग दल, जिसने जनता के साथ मिलकर चुनाव लड़ा और चुनाव के बाद जनता पार्टी में शामिल हुआ।
इस गठजोड़ ने कांग्रेस-विरोधी सामाजिक आधार और विस्तृत कर दिया।
चुनाव प्रचार में जयप्रकाश — कमजोर शरीर, विशाल नैतिक प्रभाव
1977 तक जयप्रकाश का स्वास्थ्य बहुत खराब था।
उन्हें डायलिसिस की आवश्यकता थी।
वे पहले की तरह लगातार यात्राएं और लंबी सभाएं नहीं कर सकते थे।
फिर भी उनकी अपील चुनाव अभियान की सबसे बड़ी नैतिक शक्ति थी।
उनका संदेश था कि चुनाव किसी व्यक्ति से बदला लेने के लिए नहीं है।
यह लोकतंत्र की बहाली का अवसर है।
मतदाता यह तय करें कि नागरिक स्वतंत्रताओं, प्रेस की स्वतंत्रता और राजनीतिक असहमति का भारत में क्या स्थान होगा।
इस अर्थ में जयप्रकाश उम्मीदवार न होते हुए भी जनता अभियान के केंद्रीय नेता थे।
जनता पार्टी के सामने संगठनात्मक समस्या भी थी
नई पार्टी के पास बहुत कम समय था।
उम्मीदवारों का चयन करना था।
पुराने दलों की सीटें बांटनी थीं।
किस क्षेत्र में पूर्व जनसंघ उम्मीदवार लड़ेगा और कहां लोकदल या समाजवादी—यह तय करना था।
दशकों से एक-दूसरे के विरुद्ध चुनाव लड़ने वाले स्थानीय कार्यकर्ताओं को अब एक-दूसरे के लिए प्रचार करना था।
यही जनता पार्टी के प्रयोग की पहली वास्तविक परीक्षा थी।
आपातकाल-विरोध और जयप्रकाश की अपील ने इन अंतर्विरोधों को चुनाव तक दबाए रखा।
लेकिन वे समाप्त नहीं हुए थे।
आगे जनता सरकार के संकट में यही अंतर्विरोध फिर सामने आने वाले थे।
चुनाव परिणामों की एक तकनीकी विशेषता
1977 के चुनाव परिणाम पढ़ते समय एक महत्वपूर्ण तथ्य अक्सर भ्रम पैदा करता है।
निर्वाचन आयोग के आधिकारिक राष्ट्रीय सारांश में जनता गठबंधन की मुख्य पार्टी को उस समय के पंजीकृत चुनाव-चिह्न संबंधी कारणों से भारतीय लोकदल—BLD के अंतर्गत दर्ज किया गया है। आयोग के आंकड़ों में BLD ने 405 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए और 295 सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस ने 492 सीटों पर चुनाव लड़कर 154 सीटें जीतीं। BLD के खाते में राष्ट्रीय स्तर पर लगभग 41.32 प्रतिशत मत दर्ज हैं।
राजनीतिक इतिहास में यही 295 सीटें सामान्यतः जनता पार्टी की सीटें कही जाती हैं।
इसलिए दोनों आंकड़ों में कोई विरोधाभास नहीं है।
यह चुनावी पंजीकरण और उस समय विलय की प्रक्रिया की तकनीकी स्थिति का परिणाम था।
उत्तर भारत में कांग्रेस का अभूतपूर्व पतन
1977 का चुनाव पूरे भारत में समान नहीं था।
दक्षिण भारत में कांग्रेस ने कई राज्यों में अच्छा प्रदर्शन किया। आंध्र प्रदेश में उसने 42 में 41 सीटें जीत लीं।
लेकिन हिंदी पट्टी में परिणाम लगभग राजनीतिक भूचाल जैसा था।
बिहार में जनता गठबंधन ने 54 में 52 सीटें जीतीं।
हरियाणा की सभी 10 सीटें जनता के खाते में गईं।
हिमाचल प्रदेश की सभी चार सीटें जनता ने जीतीं।
उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा और दूसरे उत्तरी राज्यों में कांग्रेस का आधार लगभग ढह गया।
यही वे क्षेत्र थे जहां आपातकाल की कठोरता, नसबंदी अभियान, प्रशासनिक दबाव और विपक्षी गिरफ्तारी की राजनीतिक प्रतिक्रिया सबसे तीखी दिखाई दी।
इंदिरा गांधी स्वयं चुनाव हार गईं
1977 के चुनाव का सबसे प्रतीकात्मक परिणाम रायबरेली से आया।
वही सीट जहां 1971 के चुनाव को लेकर अदालत का विवाद शुरू हुआ था, वहां राज नारायण ने इंदिरा गांधी को पराजित कर दिया।
राज नारायण को 1,77,719 मत मिले और इंदिरा गांधी को 1,22,517। हार का अंतर 55,202 मत था।
इस परिणाम का राजनीतिक अर्थ असाधारण था।
1971 में भारी राष्ट्रीय विजय पाने वाली प्रधानमंत्री छह वर्ष बाद अपनी ही सीट हार चुकी थीं।
संजय गांधी भी अमेठी से चुनाव हार गए।
इससे चुनाव परिणाम को आपातकाल पर जनता के फैसले के रूप में देखने की धारणा और मजबूत हुई।
कांग्रेस की हार कितनी बड़ी थी?
निर्वाचन आयोग के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 542 लोकसभा सीटों के चुनाव में कांग्रेस केवल 154 सीटों पर जीत सकी।
जनता पक्ष—आयोग के आंकड़ों में BLD—ने 295 सीटें जीतीं।
यह पहली बार था जब कांग्रेस केंद्र में सरकार बनाने की स्थिति में नहीं थी।
स्वतंत्र भारत में लगभग तीस वर्ष की निरंतर केंद्रीय कांग्रेस सत्ता समाप्त होने वाली थी।
प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय इसे कांग्रेस के तीस वर्ष के निर्बाध केंद्रीय शासन के अंत और जनता पार्टी की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार के गठन के रूप में दर्ज करता है।
जयप्रकाश की रणनीति सफल हुई
इस चुनाव ने जयप्रकाश की विपक्षी एकता संबंधी मूल धारणा को सही सिद्ध किया।
1967 में विपक्ष ने कई राज्यों में कांग्रेस को हराया था, लेकिन केंद्र में उसके सामने कोई एक राष्ट्रीय विकल्प नहीं था।
1977 में स्थिति अलग थी।
मतदाता के सामने पहली बार व्यावहारिक प्रश्न था—
कांग्रेस या जनता?
अलग-अलग दलों में मत बंटने की संभावना बहुत कम हो गई थी।
और यह केवल सीट समझौते से संभव नहीं हुआ था।
जनता पार्टी ने मतदाता को एक राष्ट्रीय सरकार का विकल्प दिया।
सरकार बनने से पहले प्रधानमंत्री का प्रश्न
चुनाव जीतना एक समस्या का समाधान था।
अगली समस्या तुरंत सामने आ गई—
प्रधानमंत्री कौन बने?
तीन बड़े नाम थे।
मोरारजी देसाई।
चरण सिंह।
जगजीवन राम।
तीनों अनुभवी थे।
तीनों के अपने समर्थक थे।
और तीनों का राजनीतिक आधार अलग था।
यदि चुनाव जीतते ही नेतृत्व संघर्ष खुला युद्ध बन जाता तो जनता पार्टी की एकता गंभीर संकट में पड़ सकती थी।
फिर जयप्रकाश नारायण की मध्यस्थ भूमिका सामने आई।
जयप्रकाश और आचार्य कृपलानी की निर्णायक मध्यस्थता
24 मार्च 1977 को जनता संसदीय दल की बैठक संसद के केंद्रीय कक्ष में हुई।
संसद के आधिकारिक अभिलेख के अनुसार जयप्रकाश नारायण और आचार्य जे.बी. कृपलानी की उपस्थिति में मोरारजी देसाई के पक्ष में सहमति बनाई गई। इसके बाद उन्हें सर्वसम्मति से जनता संसदीय दल का नेता चुना गया। राज नारायण ने उनका नाम प्रस्तावित किया और अटल बिहारी वाजपेयी ने समर्थन किया। उसी दिन मोरारजी देसाई ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।
यह जयप्रकाश की भूमिका का एक और महत्वपूर्ण उदाहरण था।
उन्होंने स्वयं प्रधानमंत्री बनने से इनकार किया था।
लेकिन प्रधानमंत्री कौन बने, इस विवाद को सुलझाने में उनकी नैतिक सत्ता निर्णायक रही।
मोरारजी देसाई — पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री
24 मार्च 1977 को मोरारजी देसाई ने भारत के पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। प्रधानमंत्री कार्यालय भी उनका कार्यकाल 24 मार्च 1977 से दर्ज करता है।
यह केवल किसी एक व्यक्ति का सत्ता में आना नहीं था।
1947 के बाद पहली बार यह सिद्ध हुआ कि केंद्र में शांतिपूर्ण चुनाव के माध्यम से कांग्रेस को हटाकर दूसरी राजनीतिक शक्ति सरकार बना सकती है।
भारतीय लोकतंत्र के लिए इसका बहुत गहरा अर्थ था।
सत्ता परिवर्तन केवल सिद्धांत नहीं रहा।
वह व्यवहार में संभव सिद्ध हुआ।
1977 की विजय को केवल जनता पार्टी की जीत क्यों नहीं कहा जा सकता?
यह चुनाव परिणाम कई धाराओं का मेल था।
आपातकाल का विरोध।
प्रेस सेंसरशिप के प्रति असंतोष।
राजनीतिक गिरफ्तारियां।
कुछ क्षेत्रों में जबरन नसबंदी और प्रशासनिक ज्यादतियों की प्रतिक्रिया।
कांग्रेस-विरोधी दलों की एकता।
जगजीवन राम जैसे नेताओं का कांग्रेस से अलग होना।
और जयप्रकाश नारायण की नैतिक अपील।
इनमें किसी एक कारण से पूरा परिणाम समझना कठिन है।
लेकिन एक बात स्पष्ट है—
यदि विपक्ष अलग-अलग दलों में बंटा रहता तो उसी जनअसंतोष का चुनावी परिणाम इतना निर्णायक होना आवश्यक नहीं था।
यही जयप्रकाश के योगदान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा था।
उन्होंने विरोध को सत्ता का विकल्प बना दिया
जयप्रकाश नारायण की 1974–77 की भूमिका को तीन चरणों में समझा जा सकता है।
पहले उन्होंने जनअसंतोष को राजनीतिक भाषा दी।
फिर उन्होंने आपातकाल के बाद लोकतंत्र बहाली को साझा उद्देश्य बनाया।
और अंततः उन्होंने बिखरे विपक्ष को इस बात के लिए तैयार किया कि वह अपने अलग दलगत अस्तित्व तक को पीछे रखकर एक राष्ट्रीय विकल्प बनाए।
इसीलिए जनता पार्टी का निर्माण उनके जीवन की बड़ी राजनीतिक उपलब्धियों में गिना जाना चाहिए।
वे पार्टी के औपचारिक अध्यक्ष नहीं थे।
सरकार के सदस्य नहीं बने।
लेकिन उस पार्टी के बनने की राजनीतिक और नैतिक जमीन उन्होंने तैयार की थी।
फिर भी जनता पार्टी के भीतर संकट के बीज शुरू से मौजूद थे
1977 की जीत जितनी बड़ी थी, उसके भीतर भविष्य के संकट भी छिपे हुए थे।
जनसंघ की संगठनात्मक संस्कृति अलग थी।
समाजवादियों का राजनीतिक दृष्टिकोण अलग था।
चरण सिंह और लोकदल की प्राथमिकताएं अलग थीं।
मोरारजी देसाई का नेतृत्व और प्रशासनिक शैली अलग थी।
जगजीवन राम स्वयं प्रधानमंत्री पद के गंभीर दावेदार थे।
इन सबको आपातकाल-विरोध ने जोड़ा था।
लेकिन अब आपातकाल समाप्त होने वाला था और वे सरकार में थे।
अर्थात अब प्रश्न यह नहीं था कि किसका विरोध करना है।
अब प्रश्न था—
देश कैसे चलाना है?
और इसी प्रश्न पर वे अंतर्विरोध धीरे-धीरे खुलने लगे जिन्हें जयप्रकाश की नैतिक प्रतिष्ठा और आपातकाल-विरोधी संघर्ष ने चुनाव तक दबाकर रखा था।
1977 — जयप्रकाश के जीवन की सबसे बड़ी राजनीतिक विजय, लेकिन बिना पद के
यह उनके जीवन का असाधारण क्षण था।
जिस व्यक्ति ने 1950 के दशक में सत्ता की राजनीति छोड़ दी थी, उसी ने 1977 में केंद्र की सत्ता परिवर्तन में निर्णायक भूमिका निभाई।
जिसने स्वयं चुनाव नहीं लड़ा, उसके आह्वान पर करोड़ों मतदाताओं ने चुनाव को लोकतंत्र पर जनमत में बदल दिया।
जिसने प्रधानमंत्री पद नहीं मांगा, वही प्रधानमंत्री चयन में मध्यस्थ बना।
और जिस व्यक्ति ने “लोकशक्ति” को “राजशक्ति” से ऊपर रखने की बात की थी, उसने पहली बार स्वतंत्र भारत में यह दिखा दिया कि एक शक्तिशाली केंद्रीय सरकार को भी चुनाव के माध्यम से शांतिपूर्ण ढंग से हटाया जा सकता है।
लेकिन जयप्रकाश की परीक्षा अभी समाप्त नहीं हुई थी।
जनता पार्टी सत्ता में पहुंच गई थी।
अब उन्हें देखना था कि जिन नेताओं को उन्होंने लोकतंत्र की रक्षा के लिए एक मंच पर लाया था, क्या वे सत्ता मिलने के बाद भी उसी नैतिकता और एकता को बनाए रख पाएंगे।
उत्तर शीघ्र ही निराशाजनक होने वाला था।