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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण

1977 में जनता पार्टी की विजय जयप्रकाश नारायण के जीवन की सबसे बड़ी राजनीतिक सफलताओं में से एक थी, लेकिन केवल दो वर्षों के भीतर वही प्रयोग उनकी सबसे गहरी निराशाओं में भी बदल गया।

जिस जनता पार्टी को उन्होंने लोकतंत्र की रक्षा, सत्ता के विकेंद्रीकरण, भ्रष्टाचार-विरोध और नैतिक राजनीति के आधार पर खड़ा होते देखना चाहा था, सत्ता में आने के बाद उसके भीतर नेतृत्व संघर्ष, पुराने दलगत अविश्वास और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं तेजी से उभरने लगीं। प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय के राजनीतिक अध्ययन भी जनता पार्टी को मूलतः भिन्न विचारधाराओं और कार्यशैलियों वाले दलों का ऐसा मेल बताते हैं जिसे आपातकाल-विरोध ने एकजुट किया था; सत्ता में आने के बाद इन्हीं अंतर्विरोधों ने उसे तोड़ दिया।

जयप्रकाश के लिए समस्या केवल यह नहीं थी कि जनता सरकार में मतभेद थे। लोकतांत्रिक सरकार में मतभेद स्वाभाविक होते हैं। उनकी निराशा इस बात से थी कि जिस आंदोलन ने सत्ता को साध्य नहीं बल्कि जनसेवा का माध्यम बताया था, उसी आंदोलन से निकली सरकार बहुत जल्दी इस प्रश्न में उलझ गई कि प्रधानमंत्री कौन रहे, किस नेता का प्रभाव कितना हो और किस गुट को सत्ता में कितनी हिस्सेदारी मिले।

जनता पार्टी की एकता शुरू से अधूरी थी

1977 के चुनाव के समय भारतीय जनसंघ, भारतीय लोकदल, कांग्रेस (ओ) और समाजवादी धारा ने जनता पार्टी के रूप में एक साझा विकल्प प्रस्तुत किया था। बाद में जगजीवन राम की कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी भी इससे जुड़ गई।

लेकिन इन दलों का केवल नाम बदल जाने से उनकी पुरानी पहचान समाप्त नहीं हुई।

पूर्व जनसंघ के पास मजबूत और अनुशासित संगठन था।

चरण सिंह के पीछे उत्तर भारत की किसान राजनीति और भारतीय लोकदल की शक्ति थी।

मोरारजी देसाई पुराने कांग्रेस संगठन तथा प्रशासनिक अनुभव का प्रतिनिधित्व करते थे।

समाजवादियों की अपनी अलग राजनीतिक संस्कृति थी।

जगजीवन राम स्वयं लंबे अनुभव और बड़े सामाजिक आधार वाले राष्ट्रीय नेता थे।

राजनीतिक अध्ययन ने जनता पार्टी के गठन को “वैचारिक समानता” की बजाय तत्कालीन आवश्यकता से पैदा हुआ समझौता माना है। अलग-अलग घटकों की विचारधारा, कार्यक्रम, प्राथमिकताएं और काम करने की शैली इतनी भिन्न थीं कि टूट का खतरा आरंभ से मौजूद था।

1977 के चुनाव तक आपातकाल-विरोध ने इन अंतर्विरोधों को दबा दिया था।

सत्ता मिलने के बाद साझा शत्रु कमजोर हुआ और पुरानी असहमतियां फिर सामने आने लगीं।

प्रधानमंत्री पद का प्रश्न समाप्त नहीं हुआ था

मार्च 1977 में जनता संसदीय दल ने मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री चुना, लेकिन नेतृत्व का प्रश्न वास्तव में पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था।

चरण सिंह स्वयं राष्ट्रीय नेतृत्व के गंभीर दावेदार थे।

जगजीवन राम भी प्रधानमंत्री पद के लिए अपना मजबूत दावा रखते थे।

चुनाव परिणाम के बाद जयप्रकाश नारायण और आचार्य कृपलानी की मध्यस्थता से मोरारजी देसाई पर सहमति बनी थी, लेकिन इससे राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं समाप्त नहीं हुईं।

यहीं जनता पार्टी की शुरुआती कमजोरी थी।

सरकार के शीर्ष पर तीन ऐसे बड़े नेता थे जिनमें से प्रत्येक स्वयं को राष्ट्रीय नेतृत्व के योग्य मानता था।

मोरारजी प्रधानमंत्री थे।

चरण सिंह गृहमंत्री बने।

जगजीवन राम रक्षा मंत्री।

यह संरचना अनुभव से भरपूर थी, लेकिन प्रतिस्पर्धा से भी।

चरण सिंह और मोरारजी देसाई का संघर्ष

जनता सरकार का सबसे गंभीर आंतरिक संघर्ष प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई और गृहमंत्री चरण सिंह के बीच हुआ।

दोनों की राजनीतिक शैली, सामाजिक आधार और आर्थिक दृष्टि अलग थी।

चरण सिंह का जोर किसानों, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कांग्रेस शासन के दौरान हुए कथित दुरुपयोगों की कठोर जांच पर था।

मोरारजी देसाई अधिक संस्थागत, प्रशासनिक और नियंत्रित ढंग से सरकार चलाना चाहते थे।

समय के साथ मतभेद व्यक्तिगत अविश्वास में बदलने लगे।

1978 के पहले छह महीनों में दोनों नेताओं के बीच कटु पत्राचार हुआ। जून 1978 में स्थिति इतनी बिगड़ी कि चरण सिंह और उनके निकट सहयोगी राज नारायण को मंत्रिमंडल से बाहर होना पड़ा। समकालीन अभिलेखों के अनुसार मोरारजी और चरण सिंह का टकराव महीनों तक चलता रहा और जनता पार्टी के दूसरे नेताओं की मध्यस्थता भी स्थायी समाधान नहीं निकाल सकी।

यह वही स्थिति थी जिससे जयप्रकाश सबसे अधिक बचना चाहते थे।

जेपी को फिर मध्यस्थ बनना पड़ा

जयप्रकाश नारायण गंभीर रूप से बीमार थे।

वे नियमित डायलिसिस पर थे।

सरकार में कोई पद नहीं था।

फिर भी जनता पार्टी का संकट इतना गहरा हुआ कि उसके नेता फिर उन्हीं की ओर देखने लगे।

जुलाई 1978 में पार्टी के भीतर समझौते की कोशिश में जयप्रकाश नारायण और आचार्य कृपलानी की सहायता लेने का निर्णय किया गया। समकालीन विवरण बताते हैं कि जनता पार्टी के घटकों ने संकट टालने के लिए जेपी और कृपलानी से मध्यस्थता कराने पर सहमति बनाई।

यह स्थिति अपने-आप में विडंबनापूर्ण थी।

जिस व्यक्ति ने इन दलों को लोकतंत्र बचाने के लिए एक किया था, उसे अब उनकी आपसी सत्ता-लड़ाई रोकने के लिए अस्पताल और बीमारी के बीच हस्तक्षेप करना पड़ रहा था।

किसान रैली और चरण सिंह की शक्ति-प्रदर्शन राजनीति

मंत्रिमंडल से बाहर होने के बाद चरण सिंह ने हार नहीं मानी।

दिसंबर 1978 में दिल्ली में विशाल किसान रैली हुई। लगभग दो लाख किसानों के इसमें पहुंचने का अनुमान लगाया गया। यह केवल किसान मुद्दों की सभा नहीं थी; इसे जनता पार्टी के भीतर चरण सिंह की राजनीतिक शक्ति के प्रदर्शन के रूप में भी देखा गया।

इस शक्ति-प्रदर्शन के बाद पार्टी नेतृत्व को उनसे समझौता करना पड़ा।

चरण सिंह सरकार में वापस आए।

फरवरी 1979 में उन्हें वित्तमंत्री बनाया गया और उपप्रधानमंत्री का दर्जा दिया गया।

साथ ही जगजीवन राम को भी उपप्रधानमंत्री बनाया गया।

अर्थात अब जनता सरकार में एक प्रधानमंत्री और दो उपप्रधानमंत्री, जिनमें दोनों भविष्य के प्रधानमंत्री पद के दावेदार थे।

यह समझौता समस्या का समाधान नहीं था।

उसने नेतृत्व संघर्ष को केवल अस्थायी रूप से स्थगित किया।

जगजीवन राम की महत्वाकांक्षा

जनता पार्टी के संकट की चर्चा अक्सर मोरारजी देसाई और चरण सिंह तक सीमित कर दी जाती है, लेकिन जगजीवन राम का स्थान भी महत्वपूर्ण था।

वे स्वतंत्रता-पूर्व राजनीति से सक्रिय थे।

लंबे समय तक कांग्रेस सरकारों में केंद्रीय मंत्री रहे।

1977 में आपातकाल के अंतिम चरण में कांग्रेस छोड़कर विपक्ष से जुड़े।

और जनता विजय के बाद प्रधानमंत्री पद के गंभीर दावेदार बने।

मोरारजी देसाई के चयन के बाद भी उनका राष्ट्रीय कद कम नहीं हुआ।

जब जनता सरकार संकट में आने लगी तो यह प्रश्न बार-बार उभरा कि यदि मोरारजी हटते हैं तो अगला प्रधानमंत्री चरण सिंह हों या जगजीवन राम।

अर्थात जनता पार्टी के भीतर संघर्ष केवल नीति पर नहीं था।

नेतृत्व का प्रश्न लगातार पृष्ठभूमि में मौजूद था।

जयप्रकाश के लिए यही निराशाजनक था—जिस जनता सरकार को वे सामूहिक और नैतिक नेतृत्व का प्रयोग मानना चाहते थे, वहां शीर्ष नेतृत्व स्वयं उत्तराधिकार की प्रतिस्पर्धा में फंसा हुआ था।

सत्ता परिवर्तन के बाद भी “संपूर्ण क्रांति” कहां गई?

जयप्रकाश की सबसे बड़ी निराशा शायद यही थी।

1974 में उन्होंने जिस संपूर्ण क्रांति की बात की थी, उसमें सात क्षेत्रों में परिवर्तन शामिल था।

राजनीति।

अर्थव्यवस्था।

समाज।

शिक्षा।

संस्कृति।

विचार।

नैतिक जीवन।

1977 में जनता पार्टी सत्ता में आई तो स्वाभाविक रूप से अपेक्षा थी कि कम से कम राजनीतिक क्षेत्र में व्यापक सुधार तेजी से आगे बढ़ेंगे।

कुछ महत्वपूर्ण संवैधानिक सुधार वास्तव में हुए।

आपातकालीन प्रावधानों की समीक्षा की गई।

44वां संविधान संशोधन लाया गया।

नागरिक स्वतंत्रताओं और न्यायिक सुरक्षा को मजबूत करने की कोशिश हुई।

प्रेस पर आपातकालीन नियंत्रण हटे।

राजनीतिक बंदियों को मुक्त किया गया।

इन उपलब्धियों को कम नहीं आंका जाना चाहिए।

लेकिन जयप्रकाश का सपना इससे कहीं व्यापक था।

वे सत्ता के विकेंद्रीकरण, ग्राम स्वराज, जनता की प्रत्यक्ष भागीदारी, राजनीतिक दलों के चरित्र परिवर्तन और भ्रष्टाचार-विरोध की गहरी संरचनात्मक व्यवस्था चाहते थे।

इन क्षेत्रों में जनता सरकार उनकी अपेक्षा के अनुरूप आगे नहीं बढ़ सकी।

जनता पार्टी भी “सत्ता की राजनीति” में बदल गई

जयप्रकाश की पूरी वैचारिक यात्रा का एक केंद्रीय निष्कर्ष था कि राजनीतिक दल बहुत जल्दी सत्ता को साधन से लक्ष्य बना लेते हैं।

जनता पार्टी उनके सामने इसी आशंका को सत्य करती दिखाई देने लगी।

कौन मुख्यमंत्री बने?

किस गुट को कितने मंत्री मिलें?

किस राज्य इकाई पर किसका नियंत्रण हो?

केंद्र में किस नेता की चले?

प्रधानमंत्री का उत्तराधिकारी कौन हो?

इन सवालों ने “संपूर्ण क्रांति” की भाषा को पीछे धकेल दिया।

सरकार चल रही थी, लेकिन आंदोलन का नैतिक कार्यक्रम फीका पड़ रहा था।

इंदिरा गांधी के विरुद्ध कार्रवाई भी विवाद का कारण बनी

जनता सरकार के सामने एक और कठिन प्रश्न था—आपातकाल के दौरान हुए दुरुपयोगों की जवाबदेही कैसे तय की जाए।

शाह आयोग बनाया गया।

आपातकालीन ज्यादतियों की जांच हुई।

इंदिरा गांधी की गिरफ्तारी भी हुई।

लेकिन कुछ कार्रवाइयां कानूनी और राजनीतिक रूप से उलटी पड़ गईं।

जनता सरकार की आलोचना होने लगी कि वह शासन सुधारने से अधिक इंदिरा गांधी और कांग्रेस के खिलाफ प्रतिशोध में रुचि ले रही है।

1978 के अंत में इंदिरा गांधी लोकसभा में वापस आईं, फिर विशेषाधिकार मामले में निष्कासित और गिरफ्तार हुईं। इससे उनके प्रति सहानुभूति का वातावरण भी बनने लगा। जनता सरकार के आंतरिक झगड़ों के साथ यह घटनाक्रम कांग्रेस की राजनीतिक वापसी में मददगार बना।

जयप्रकाश की राजनीति प्रतिशोध की राजनीति नहीं थी।

इसलिए जनता सरकार का ध्यान यदि नैतिक पुनर्निर्माण की जगह व्यक्तिगत या दलीय टकराव में जाता दिखाई दिया, तो वह उनकी मूल दृष्टि से अलग था।

राज्यों में भी जनता की एकता नहीं टिक पाई

केंद्र की समस्याएं राज्यों में और तीखी थीं।

जनता पार्टी के भीतर पुराने घटक दल कई प्रदेशों में अपनी अलग पहचान बनाए हुए थे।

उत्तर प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्यों में चरण सिंह समर्थक और दूसरे गुटों के बीच संघर्ष हुआ।

1978 में हरियाणा को लेकर विवाद इतना बढ़ा कि केंद्रीय जनता संकट से जुड़ गया। चरण सिंह ने आरोप लगाया कि पार्टी नेतृत्व राज्यों में उनके समर्थकों के खिलाफ गुटबाजी को बढ़ावा दे रहा है।

इससे यह स्पष्ट हुआ कि जनता पार्टी का विलय ऊपर से घोषित जरूर हो गया था, लेकिन जमीन पर पुराने दल पूरी तरह समाप्त नहीं हुए थे।

सबसे विस्फोटक प्रश्न — दोहरी सदस्यता

जनता पार्टी के अंतिम टूटने में सबसे विवादास्पद मुद्दा बना—पूर्व भारतीय जनसंघ नेताओं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का संबंध।

समाजवादी और चरण सिंह समर्थक नेताओं के एक हिस्से का तर्क था कि जनता पार्टी के सदस्य रहते हुए पूर्व जनसंघ नेताओं का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संगठनात्मक संबंध जारी नहीं रहना चाहिए।

पूर्व जनसंघ नेताओं का पक्ष था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कोई प्रतिस्पर्धी राजनीतिक दल नहीं है और उससे सामाजिक या वैचारिक संबंध को पार्टी-विरोधी गतिविधि नहीं माना जा सकता।

यह प्रश्न केवल संगठनात्मक नहीं रहा।

यह जनता पार्टी की पहचान का प्रश्न बन गया।

क्या वह वास्तव में एक नया राजनीतिक दल है?

या पुराने दल केवल एक नए नाम के नीचे मौजूद हैं?

1979 तक यह विवाद इतना गहरा हो गया कि जनता पार्टी के टूटने के प्रमुख कारणों में शामिल हो गया। समकालीन अभिलेख बताते हैं कि इस मुद्दे पर सौ से अधिक सांसदों के जनता संसदीय दल से अलग होने ने मोरारजी सरकार के पतन में भूमिका निभाई।

जेपी की मूल समस्या फिर सामने थी

जयप्रकाश चाहते थे कि पुराने दल अपनी पहचान सचमुच समाप्त करें।

लेकिन जनता पार्टी के भीतर लगभग हर घटक अपनी पुरानी संगठनात्मक शक्ति को बचाना चाहता था।

पूर्व जनसंघ अपना कैडर नेटवर्क छोड़ने को तैयार नहीं था।

चरण सिंह अपना किसान आधार अलग राजनीतिक शक्ति के रूप में बनाए रखना चाहते थे।

समाजवादियों की अपनी धारा थी।

पुराने कांग्रेसियों का अपना नेतृत्व था।

अर्थात जनता पार्टी बाहर से एक थी, भीतर से कई।

यही वही बीमारी थी जिससे जयप्रकाश ने 1967 के संयुक्त विधायक दलों से सीख लेने की कोशिश की थी।

1979 — संकट निर्णायक हो गया

1979 के पहले छह महीनों में जनता सरकार का आंतरिक संघर्ष फिर खुलकर सामने आया।

चरण सिंह और उनके समर्थकों ने मोरारजी नेतृत्व के खिलाफ मोर्चा लिया।

जनता संसदीय दल से सांसद टूटने लगे।

सरकार की लोकसभा संख्या तेजी से घटने लगी।

समकालीन आंकड़ों के अनुसार चरण सिंह के दूसरे बड़े अलगाव के बाद सरकार की शक्ति 298 से घटकर लगभग 246 सांसदों तक आ गई।

10 जुलाई 1979 को विपक्ष के नेता वाई.बी. चव्हाण ने लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पेश किया।

मोरारजी देसाई को समझ आ गया कि सरकार का बहुमत बचाना कठिन है।

15 जुलाई 1979 को उन्होंने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।

जनता सरकार, जिसे जयप्रकाश ने लोकतंत्र की नई शुरुआत के रूप में देखा था, केवल लगभग सवा दो वर्ष में गिर गई।

चरण सिंह प्रधानमंत्री बने — लेकिन कांग्रेस के समर्थन से

जनता पार्टी के टूटने के बाद चरण सिंह ने अलग राजनीतिक समूह के साथ सरकार बनाने का दावा किया।

इंदिरा गांधी की कांग्रेस ने बाहर से समर्थन देने का निर्णय किया।

28 जुलाई 1979 को चरण सिंह प्रधानमंत्री बने।

राजनीतिक विडंबना असाधारण थी।

जिस कांग्रेस के विरुद्ध 1974 से 1977 तक आंदोलन हुआ था और जिसे हराने के लिए जनता पार्टी बनाई गई थी, अब उसी कांग्रेस के समर्थन से जनता पार्टी से निकला नेता प्रधानमंत्री बना।

लेकिन यह व्यवस्था भी टिक नहीं सकी।

इंदिरा गांधी ने लोकसभा में विश्वास मत से पहले ही समर्थन वापस ले लिया।

चरण सिंह सदन में बहुमत सिद्ध किए बिना ही इस्तीफा देने को मजबूर हुए और चुनाव तक कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने रहे। प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय के अध्ययन में भी जनता प्रयोग के पतन को मोरारजी–चरण सिंह संघर्ष और फिर कांग्रेस समर्थन वापस लेने से जोड़कर देखा गया है।

जयप्रकाश जिस विपक्षी एकता को बनाने में वर्षों लगे थे, वह अब लगभग पूरी तरह बिखर चुकी थी।

1977 से 1979 — फिर दल-बदल

विडंबना यह थी कि जनता पार्टी स्वयं उस बीमारी का शिकार हो गई जिसके विरुद्ध जयप्रकाश ने राजनीति में नैतिकता की बात की थी।

1977 से 1979 के बीच जनता गठबंधन से 76 सांसदों के दल-बदल का आंकड़ा दर्ज मिलता है।

1967 के “आया राम, गया राम” के दौर पर जयप्रकाश ने व्यवस्था परिवर्तन की आवश्यकता महसूस की थी।

एक दशक बाद लोकतंत्र बहाली के नाम पर बनी उनकी समर्थित सरकार में फिर सांसदों की टूट सरकार गिराने का माध्यम बन गई।

यह उनके लिए एक गहरा राजनीतिक चक्र पूरा होने जैसा था।

क्या जयप्रकाश ने जनता सरकार को असफल घोषित कर दिया था?

उनके अंतिम वर्षों के विचारों में निराशा स्पष्ट दिखाई देती है, लेकिन इसे इस तरह नहीं समझना चाहिए कि उन्होंने जनता सरकार की हर उपलब्धि को नकार दिया।

आपातकाल समाप्त हुआ।

लोकतांत्रिक चुनाव हुए।

नागरिक स्वतंत्रताएं वापस आईं।

संविधान में ऐसे संशोधन हुए जिनसे भविष्य में आपातकाल लगाना कठिन बनाया गया।

सत्ता का शांतिपूर्ण परिवर्तन स्थापित हुआ।

ये बड़ी उपलब्धियां थीं।

लेकिन जयप्रकाश का सपना केवल कांग्रेस को हटाना नहीं था।

उनका सपना था राजनीतिक चरित्र बदलना।

और यही लक्ष्य अधूरा रह गया।

उनकी निराशा का सबसे बड़ा कारण — व्यक्ति बदल गए, राजनीति नहीं

जयप्रकाश ने 1974 में कहा था कि केवल सरकार बदलना पर्याप्त नहीं है।

1977 के बाद की घटनाओं ने मानो उनकी उसी चेतावनी को सही साबित कर दिया।

इंदिरा गांधी सरकार चली गई।

नई सरकार आ गई।

लेकिन सत्ता संघर्ष समाप्त नहीं हुआ।

गुटबाजी समाप्त नहीं हुई।

पद की महत्वाकांक्षा समाप्त नहीं हुई।

दल-बदल समाप्त नहीं हुआ।

केंद्रीय नेतृत्व के लिए संघर्ष समाप्त नहीं हुआ।

इसीलिए उनके लिए जनता सरकार का संकट केवल एक कमजोर गठबंधन की विफलता नहीं था।

वह इस प्रश्न का उत्तर भी था कि क्या केवल चुनावी सत्ता परिवर्तन से “संपूर्ण क्रांति” हो सकती है?

उत्तर स्पष्ट रूप से नहीं था।

बीमारी ने उन्हें असहाय दर्शक बना दिया

इस पूरे राजनीतिक संघर्ष के दौरान जयप्रकाश की शारीरिक स्थिति लगातार खराब होती जा रही थी।

वे नियमित डायलिसिस पर थे।

सार्वजनिक सक्रियता बहुत सीमित हो चुकी थी।

उनके पास नैतिक प्रभाव था, लेकिन पार्टी नेताओं पर संगठनात्मक अनुशासन लागू करने की शक्ति नहीं थी।

वे सलाह दे सकते थे।

समझा सकते थे।

अपील कर सकते थे।

लेकिन मोरारजी देसाई, चरण सिंह, जगजीवन राम, समाजवादी और पूर्व जनसंघ नेतृत्व के बीच शक्ति-संघर्ष को रोकना उनके अधिकार से बाहर था।

यही उनकी सबसे बड़ी व्यक्तिगत त्रासदी भी थी।

जिस पार्टी को उन्होंने बनने में मदद की, उसे टूटते हुए वे रोक नहीं सके।

8 अक्टूबर 1979 — जनता प्रयोग टूट चुका था, जेपी का जीवन भी समाप्ति पर

जनता पार्टी की सरकार जुलाई 1979 में गिर चुकी थी।

चरण सिंह की सरकार भी स्थायी नहीं हो सकी।

देश नए चुनाव की ओर बढ़ रहा था।

और इसी राजनीतिक अव्यवस्था के बीच 8 अक्टूबर 1979 को जयप्रकाश नारायण का निधन हो गया।

वे उस 1980 के चुनाव को देखने के लिए जीवित नहीं रहे जिसमें इंदिरा गांधी भारी बहुमत से सत्ता में वापस आईं।

लेकिन उनके जीवन के अंतिम महीनों में यह स्पष्ट हो चुका था कि 1977 का राजनीतिक प्रयोग उनकी अपेक्षा के अनुरूप व्यवस्था परिवर्तन नहीं कर पाया।

क्या इसका अर्थ था कि जेपी असफल रहे?

नहीं।

जनता पार्टी की विफलता और जयप्रकाश नारायण की ऐतिहासिक भूमिका अलग-अलग प्रश्न हैं।

उन्होंने भारतीय लोकतंत्र को पहली बार दिखाया कि केंद्र की शक्तिशाली सरकार को भी जनता चुनाव में हटा सकती है।

उन्होंने बिखरे विपक्ष को एकजुट किया।

उन्होंने लोकतांत्रिक सत्ता परिवर्तन को वास्तविक बनाया।

उन्होंने आपातकाल के बाद नागरिक स्वतंत्रताओं की पुनर्स्थापना के लिए नैतिक नेतृत्व दिया।

लेकिन वे राजनीतिक दलों के चरित्र को स्थायी रूप से बदल नहीं सके।

उनकी “संपूर्ण क्रांति” की सबसे बड़ी सीमा भी यही बनी—

नैतिक जनआंदोलन सत्ता परिवर्तन करा सकता है, लेकिन सत्ता प्राप्त करने वाले नेताओं के चरित्र और दलगत हितों को केवल नैतिक अपील से स्थायी रूप से नियंत्रित नहीं किया जा सकता।

जेपी के अधूरे सपने

जयप्रकाश नारायण के अनेक सपने अधूरे रहे।

दलविहीन लोकतंत्र व्यापक रूप नहीं ले सका।

ग्राम स्तर तक वास्तविक सत्ता-विकेंद्रीकरण नहीं हुआ।

भ्रष्टाचार राजनीति का केंद्रीय प्रश्न बना रहा।

दल-बदल जारी रहा।

राजनीतिक दलों के आंतरिक लोकतंत्र की समस्या बनी रही।

चुनावों में धन और संगठन की शक्ति बढ़ती गई।

जाति और सामाजिक पहचान की राजनीति भी समाप्त नहीं हुई।

और जिस जनता पार्टी से वे नई राजनीतिक संस्कृति की आशा कर रहे थे, वह स्वयं कुछ ही वर्षों में टूट गई।

लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है।

उनके आंदोलन ने एक स्थायी लोकतांत्रिक विरासत छोड़ी—

सरकार कितनी भी शक्तिशाली हो, जनता से ऊपर नहीं है।

1977 के चुनाव ने यह सिद्ध कर दिया।

और जनता पार्टी की विफलता ने उनकी दूसरी चेतावनी सिद्ध कर दी—

केवल सरकार बदलना पर्याप्त नहीं; राजनीति का चरित्र बदले बिना व्यवस्था परिवर्तन अधूरा रहेगा।

शायद यही जयप्रकाश नारायण की अंतिम राजनीतिक शिक्षा थी।

1977 उनकी विजय थी।

1979 उनकी निराशा।

और दोनों को साथ पढ़े बिना जननायक जयप्रकाश नारायण की राजनीतिक विरासत को पूरी तरह समझा नहीं जा सकता।