1974 का बिहार छात्र आंदोलन
1974 का बिहार छात्र आंदोलन और जयप्रकाश नारायण की सक्रिय राजनीति में वापसी — छात्रों ने उन्हें नेतृत्व के लिए क्यों बुलाया और आंदोलन कैसे राष्ट्रीय चुनौती बना
1974 का बिहार छात्र आंदोलन जयप्रकाश नारायण के जीवन का वह मोड़ था जिसने उन्हें लगभग दो दशकों की दलीय राजनीति से दूरी के बाद फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया। यह वापसी किसी चुनाव, दल या पद के लिए नहीं थी। वे एक ऐसे आंदोलन के नेतृत्व में आए जो शुरुआत में छात्रों की स्थानीय और शैक्षिक समस्याओं से उपजा, लेकिन बहुत जल्दी भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी, प्रशासनिक अक्षमता और राजनीतिक व्यवस्था के प्रश्नों से जुड़ गया।
बिहार आंदोलन की जड़ें अचानक मार्च 1974 में नहीं पड़ी थीं। 1973 से देश में महंगाई, खाद्यान्न संकट, बेरोजगारी और प्रशासन के प्रति असंतोष बढ़ रहा था। गुजरात में छात्र आंदोलन पहले ही व्यापक राजनीतिक आंदोलन का रूप ले चुका था। बिहार के छात्र नेताओं पर भी उसका प्रभाव पड़ा। फरवरी 1974 में पटना विश्वविद्यालय परिसर में हुए छात्र नेताओं के सम्मेलन में गुजरात जैसी व्यापक आंदोलनकारी रणनीति अपनाने की बात सामने आई। सर्वोच्च न्यायालय के एक समकालीन मामले में दर्ज सरकारी अभिलेख बताते हैं कि 17–18 फरवरी 1974 के छात्र सम्मेलन में बिहार में “गुजरात प्रकार” का आंदोलन शुरू करने, भूख हड़ताल और घेराव जैसे कार्यक्रमों पर विचार हुआ था।
छात्र असंतोष के पीछे क्या था?
बिहार के छात्र केवल कॉलेज फीस या छात्रावास की समस्याओं को लेकर सड़क पर नहीं आए थे।
उनकी शिकायतों में कई स्तर थे—
महंगाई तेजी से बढ़ रही थी।
बेरोजगारी युवाओं के सामने बड़ा संकट बन चुकी थी।
विश्वविद्यालयों में शैक्षिक अव्यवस्था थी।
परीक्षाओं और परिणामों में देरी होती थी।
छात्रावास, भोजन और अन्य सुविधाओं को लेकर शिकायतें थीं।
राज्य सरकार पर भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अक्षमता के आरोप लग रहे थे।
इसलिए छात्र असंतोष बहुत जल्दी विश्वविद्यालय परिसर की सीमाओं से बाहर निकलने लगा।
इग्नू के अध्ययन में भी 1970 के शुरुआती वर्षों को बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, औद्योगिक ठहराव और राजनीतिक असंतोष का दौर बताया गया है। गुजरात के बाद बिहार इसी व्यापक असंतोष का दूसरा बड़ा केंद्र बना।
मार्च 1974 — आंदोलन का संगठित रूप
1 मार्च 1974 को छात्र संचालन से संबंधित एक बैठक हुई जिसकी अध्यक्षता लालू प्रसाद यादव ने की। उसी दौर में आंदोलन को व्यवस्थित रूप देने के लिए संचालन समिति और बाद में बिहार राज्य छात्र संघर्ष समिति का ढांचा सामने आया।
सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष दर्ज अभिलेखों में मार्च 1974 की गतिविधियों का विस्तृत उल्लेख मिलता है। 4 मार्च को विधानसभा घेराव की योजना पर विचार हुआ और 12 मार्च की बैठक में 18 मार्च को विधानसभा घेरने का निर्णय सामने आया।
यानी मार्च के मध्य तक आंदोलन केवल छात्र मांगों का ज्ञापन नहीं रह गया था।
वह राज्य सरकार के खिलाफ सीधी राजनीतिक चुनौती बन चुका था।
18 मार्च 1974 — विधानसभा घेराव
18 मार्च को बिहार विधानसभा का सत्र शुरू होना था और राज्यपाल को संबोधित करना था।
छात्र संघर्ष समिति ने विधानसभा घेराव का आह्वान किया।
उद्देश्य था कि राज्य सरकार पर दबाव बढ़ाया जाए और छात्र आंदोलन को पूरे बिहार में व्यापक रूप दिया जाए।
उस दिन पटना में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव हुआ। हिंसा, आगजनी और पुलिस कार्रवाई की घटनाएं सामने आईं।
यहीं से आंदोलन ने नया मोड़ लिया।
अब सवाल केवल छात्रों का नहीं था।
राज्य सरकार की वैधता, प्रशासन की क्षमता और आंदोलन को नियंत्रित करने के तरीकों पर बहस शुरू हो गई।
सर्वोच्च न्यायालय के अभिलेख स्पष्ट करते हैं कि 18 मार्च की विधानसभा घेराव योजना पहले से तैयार थी और आंदोलनकारी नेताओं ने राज्य के प्रशासनिक ढांचे को दबाव में लाने के कार्यक्रम बनाए थे।
छात्रों को जयप्रकाश नारायण की जरूरत क्यों महसूस हुई?
छात्र आंदोलन तेजी से फैल रहा था, लेकिन उसके सामने सबसे बड़ी समस्या नेतृत्व की थी।
छात्र संगठन अनेक थे।
उनकी वैचारिक पृष्ठभूमि अलग-अलग थी।
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, समाजवादी युवजन संगठन, गैर-कांग्रेसी छात्र समूह और स्थानीय छात्र नेता आंदोलन में सक्रिय थे।
यदि आंदोलन केवल किसी एक राजनीतिक दल के नियंत्रण में चला जाता, तो उसकी व्यापक स्वीकार्यता कमजोर हो सकती थी।
छात्र नेताओं को ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता थी जो—
किसी सक्रिय राजनीतिक दल का पदाधिकारी न हो,
स्वतंत्रता संग्राम की प्रतिष्ठा रखता हो,
भ्रष्टाचार और सत्ता राजनीति की आलोचना करने की नैतिक स्थिति में हो,
और अलग-अलग विचारधाराओं के लोगों को एक मंच पर ला सके।
जयप्रकाश नारायण इस भूमिका के लिए लगभग स्वाभाविक विकल्प थे।
उन्होंने 1950 के दशक से दलीय राजनीति छोड़ रखी थी।
वे सर्वोदय आंदोलन से जुड़े थे।
उनका व्यक्तिगत जीवन सत्ता और पद से दूरी का उदाहरण माना जाता था।
और सबसे महत्वपूर्ण—वे बिहार के ही थे।
इसलिए छात्र नेताओं को लगा कि यदि जयप्रकाश आंदोलन का नेतृत्व स्वीकार कर लें तो आंदोलन को नैतिक वैधता और राष्ट्रीय पहचान दोनों मिल सकती हैं।
जयप्रकाश ने तुरंत नेतृत्व क्यों नहीं स्वीकार किया?
जयप्रकाश आंदोलन में तुरंत कूद नहीं पड़े।
वे छात्रों की समस्याओं से सहानुभूति रखते थे, लेकिन उन्हें दो बातों की चिंता थी।
पहली—आंदोलन हिंसक न हो।
दूसरी—यह किसी एक राजनीतिक दल का सत्ता संघर्ष न बन जाए।
उनका पूरा सर्वोदय जीवन अहिंसक सामाजिक परिवर्तन की खोज पर आधारित था। वे किसी ऐसे आंदोलन का नेतृत्व नहीं करना चाहते थे जो पुलिस से हिंसक टकराव, सार्वजनिक संपत्ति के विनाश या प्रतिशोध की राजनीति में बदल जाए।
इसलिए उन्होंने नेतृत्व स्वीकार करने से पहले आंदोलन को अहिंसक अनुशासन में रखने पर जोर दिया।
यही निर्णय आगे बिहार आंदोलन की दिशा बदलने वाला था।
छात्र आंदोलन से “जन आंदोलन” की ओर
जयप्रकाश के जुड़ने के बाद आंदोलन की भाषा बदलने लगी।
अब छात्रों की मांगों के साथ भ्रष्टाचार, शासन व्यवस्था, राजनीतिक उत्तरदायित्व और लोकतांत्रिक सुधार जैसे प्रश्न सामने आने लगे।
छात्र संघर्ष समिति ने विधानसभा भंग करने की मांग को भी प्रमुखता दी।
जयप्रकाश ने धीरे-धीरे यह तर्क रखा कि संकट केवल किसी एक मुख्यमंत्री या मंत्रिमंडल का नहीं है।
यदि व्यवस्था में भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, प्रशासनिक जड़ता और राजनीतिक अवसरवाद गहरे हैं, तो केवल सरकार बदल देने से समस्या समाप्त नहीं होगी।
यहीं उनकी पुरानी सर्वोदय राजनीति और नया छात्र आंदोलन आपस में जुड़ने लगे।
बिहार सरकार और आंदोलन के बीच टकराव
उस समय बिहार के मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर थे।
सरकार आंदोलन को केवल जन असंतोष नहीं, बल्कि राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था को चुनौती देने वाली गतिविधि के रूप में देख रही थी।
आंदोलनकारियों द्वारा कार्यालयों का घेराव, सरकारी कामकाज रोकने और विधानसभा को बाधित करने जैसे कार्यक्रमों से सरकार की चिंता बढ़ी।
9 अप्रैल 1974 को सरकारी कार्यालयों को ठप करने और सचिवालय सहित सरकारी संस्थानों के घेराव का कार्यक्रम भी सामने आया। इसी संदर्भ में छात्र नेता राम बहादुर राय को आंतरिक सुरक्षा कानून के तहत गिरफ्तार किया गया। सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष मामला पहुंचा, जहां मार्च और अप्रैल 1974 की आंदोलनकारी गतिविधियों का विस्तृत विवरण दर्ज हुआ।
इससे स्पष्ट होता है कि अप्रैल तक बिहार आंदोलन राज्यव्यापी राजनीतिक टकराव में बदल चुका था।
आंदोलन में राजनीतिक दलों की मौजूदगी
जयप्रकाश के नेतृत्व में आंदोलन का दावा था कि यह किसी दल विशेष का आंदोलन नहीं है।
लेकिन व्यावहारिक राजनीति में विभिन्न विपक्षी दलों के कार्यकर्ता इसमें सक्रिय थे।
जनसंघ, समाजवादी दल, कांग्रेस (ओ) और अन्य गैर-कांग्रेसी समूह आंदोलन के प्रति सहानुभूति रखते थे।
कम्युनिस्ट राजनीति की विभिन्न धाराओं का रुख एक समान नहीं था।
यही कारण था कि इंदिरा गांधी और कांग्रेस नेतृत्व ने आंदोलन पर विपक्षी दलों द्वारा लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार को अस्थिर करने का आरोप लगाया।
दूसरी ओर जयप्रकाश का तर्क था कि यदि जनता का असंतोष वास्तविक है तो उसे केवल विपक्षी षड्यंत्र कहकर खारिज नहीं किया जा सकता।
यहीं से बिहार आंदोलन का चरित्र राष्ट्रीय राजनीतिक संघर्ष की ओर बढ़ा।
जयप्रकाश का सबसे बड़ा परिवर्तन — सरकार बदलने से व्यवस्था बदलने तक
शुरुआत में छात्र आंदोलन की मांगें सीमित थीं।
लेकिन जयप्रकाश के नेतृत्व में आंदोलन का लक्ष्य विस्तृत होने लगा।
वे बार-बार कहते थे कि केवल विधानसभा भंग हो जाए या मुख्यमंत्री बदल जाए तो मूल समस्या समाप्त नहीं होगी।
उनकी नजर में बीमारी अधिक गहरी थी।
शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन चाहिए।
भ्रष्टाचार समाप्त होना चाहिए।
लोकतांत्रिक संस्थाओं को अधिक उत्तरदायी बनना चाहिए।
राजनीति में नैतिकता आवश्यक है।
सत्ता का विकेंद्रीकरण होना चाहिए।
युवाओं को रचनात्मक सामाजिक परिवर्तन में भूमिका निभानी चाहिए।
यही सोच आगे “संपूर्ण क्रांति” की अवधारणा में बदलने वाली थी।
5 जून 1974 — गांधी मैदान का निर्णायक क्षण
5 जून 1974 को पटना के गांधी मैदान में विशाल सभा हुई।
यही वह अवसर था जब जयप्रकाश नारायण ने आंदोलन को व्यापक वैचारिक दिशा देते हुए “संपूर्ण क्रांति” का आह्वान किया।
इग्नू के अध्ययन में इस घटना को स्पष्ट रूप से बिहार आंदोलन का निर्णायक मोड़ माना गया है। उसके अनुसार जयप्रकाश ने 5 जून 1974 को गांधी मैदान की सभा में कहा कि संघर्ष केवल छात्र मांगों या मंत्रिमंडल के इस्तीफे और विधानसभा भंग करने तक सीमित नहीं रहेगा; लक्ष्य व्यापक सामाजिक परिवर्तन होगा।
यही क्षण था जब छात्र आंदोलन जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में व्यवस्था परिवर्तन के आंदोलन में बदल गया।
“विधानसभा भंग करो” से आगे
जयप्रकाश ने बिहार विधानसभा भंग करने की मांग का समर्थन किया।
लेकिन वे इसे अंतिम लक्ष्य नहीं मानते थे।
उनकी दृष्टि में विधानसभा का विघटन केवल पहला राजनीतिक कदम हो सकता था।
यदि नई विधानसभा में वही राजनीतिक संस्कृति लौट आए, वही भ्रष्टाचार रहे, वही प्रशासनिक व्यवस्था रहे और समाज की असमानता जस की तस रहे तो वास्तविक परिवर्तन नहीं होगा।
यही कारण था कि उन्होंने आंदोलन को सात व्यापक क्षेत्रों में परिवर्तन की दिशा में देखने की बात की—राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक, बौद्धिक और नैतिक-आध्यात्मिक परिवर्तन।
इसका विस्तार अगले खंड में आवश्यक होगा, क्योंकि “संपूर्ण क्रांति” जयप्रकाश की पूरी राजनीतिक विरासत का केंद्रीय विचार बन गई।
अहिंसा की शर्त
जयप्रकाश ने आंदोलनकारियों से लगातार अहिंसा पर जोर दिया।
यह उनके लिए केवल रणनीति नहीं थी।
1942 के भूमिगत समाजवादी जयप्रकाश और 1974 के सर्वोदय जयप्रकाश के बीच यही सबसे बड़ा वैचारिक परिवर्तन था।
अब वे राज्य को हिंसा से पराजित करने की बात नहीं कर रहे थे।
वे जनशक्ति, सत्याग्रह, असहयोग और नैतिक दबाव के माध्यम से राजनीतिक परिवर्तन चाहते थे।
उनका प्रयास था कि छात्र आंदोलन अनुशासित रहे और हिंसा को आंदोलन की वैधता नष्ट करने का अवसर न दिया जाए।
लेकिन इतने व्यापक आंदोलन में हर स्तर पर पूर्ण नियंत्रण संभव नहीं था। विभिन्न स्थानों पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव भी हुए।
यही आंदोलन की एक निरंतर चुनौती रही।
जयप्रकाश के जुड़ने से क्या बदल गया?
सबसे पहले आंदोलन को राष्ट्रीय पहचान मिली।
दूसरे, छात्र आंदोलन के साथ समाज के दूसरे वर्ग जुड़ने लगे।
शिक्षक, कर्मचारी, सर्वोदय कार्यकर्ता, विपक्षी राजनीतिक कार्यकर्ता और मध्यवर्ग के हिस्से आंदोलन के साथ आए।
तीसरे, बिहार की समस्या अब दिल्ली की राष्ट्रीय राजनीति का मुद्दा बनने लगी।
चौथे, जयप्रकाश के कारण आंदोलन केवल छात्र आक्रोश नहीं रहा; उसे एक वैचारिक भाषा मिली।
और पांचवें, अब संघर्ष सीधे इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार की राजनीतिक व्यवस्था की आलोचना तक पहुंचने लगा।
इंदिरा गांधी के लिए चुनौती क्यों बढ़ी?
1971 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी को भारी बहुमत मिला था।
1972 के विधानसभा चुनावों में भी कांग्रेस ने कई राज्यों में मजबूत सफलता प्राप्त की थी।
लेकिन 1973–74 तक आर्थिक कठिनाइयों और महंगाई ने राजनीतिक माहौल बदलना शुरू कर दिया।
पहले गुजरात का नवनिर्माण आंदोलन और फिर बिहार आंदोलन ने यह संकेत दिया कि चुनावी बहुमत के बावजूद सड़कों पर व्यापक असंतोष पैदा हो सकता है।
और बिहार आंदोलन की सबसे बड़ी राजनीतिक विशेषता यह थी कि उसका नेतृत्व कोई महत्वाकांक्षी विपक्षी मुख्यमंत्री या दलाध्यक्ष नहीं कर रहा था।
नेतृत्व जयप्रकाश नारायण के हाथ में था—वह व्यक्ति जिसने वर्षों पहले चुनावी राजनीति छोड़ दी थी।
इससे सरकार के लिए आंदोलन को केवल सत्ता प्राप्ति की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा बताना कठिन हो गया।
आंदोलन बिहार से बाहर क्यों फैलने लगा?
जयप्रकाश स्वयं आंदोलन को केवल बिहार तक सीमित नहीं रखना चाहते थे।
उनकी दृष्टि में भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, प्रशासनिक केंद्रीकरण और राजनीतिक पतन केवल बिहार की समस्याएं नहीं थीं।
वे युवाओं से पूरे देश में संगठित होने की अपील करने लगे।
इग्नू का अध्ययन भी दर्ज करता है कि बिहार आंदोलन बहुत जल्दी बिहार की सीमा से बाहर राजनीतिक प्रभाव डालने लगा और उसे छात्रों, मध्यवर्ग तथा बुद्धिजीवियों के एक हिस्से का समर्थन मिला। गैर-कांग्रेसी राजनीतिक दलों ने भी आंदोलन का समर्थन किया।
प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय के जयप्रकाश नारायण अभिलेख भी उन्हें 1974–75 में गुजरात और बिहार के छात्र आंदोलनों तथा “टोटल रिवोल्यूशन” से सीधे जोड़ते हैं।
छात्रों ने उन्हें नेता बनाया, लेकिन आंदोलन ने उन्हें फिर राजनेता बना दिया
जयप्रकाश नारायण 1950 के दशक में राजनीति छोड़कर सर्वोदय की ओर गए थे।
1974 में वे पार्टी राजनीति में वापस नहीं आए।
उन्होंने कोई चुनाव नहीं लड़ा।
कोई राजनीतिक दल नहीं बनाया।
कोई पद नहीं मांगा।
फिर भी वे फिर राजनीति के केंद्र में आ गए।
यह विरोधाभास ही उनकी भूमिका को विशिष्ट बनाता है।
वे सत्ता से बाहर रहकर सत्ता व्यवस्था के सबसे बड़े आलोचकों में से एक बन गए।
छात्र उन्हें इसलिए लेकर आए थे कि आंदोलन को विश्वसनीय नेतृत्व मिल सके।
लेकिन कुछ ही महीनों में स्थिति यह हो गई कि राष्ट्रीय विपक्ष स्वयं जयप्रकाश की ओर देखने लगा।
अब प्रश्न केवल बिहार विधानसभा का नहीं रह गया था।
प्रश्न था—
क्या चुनावी लोकतंत्र में जनता को चुनावों के बीच भी सरकार और व्यवस्था के विरुद्ध व्यापक अहिंसक आंदोलन खड़ा करने का अधिकार है?
और दूसरा प्रश्न—
यदि सरकार के पास विधायी बहुमत है, तो क्या केवल वह तथ्य शासन की लोकतांत्रिक वैधता सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है?
यही बहस 1974 से 1975 के बीच और तीखी होने वाली थी।
बिहार आंदोलन की ऐतिहासिक भूमिका
बिहार छात्र आंदोलन का ऐतिहासिक महत्व इस बात में नहीं है कि उसने तत्काल बिहार सरकार गिरा दी।
उसका महत्व इससे कहीं बड़ा था।
उसने जयप्रकाश नारायण को फिर सक्रिय सार्वजनिक संघर्ष में लौटाया।
उसने भ्रष्टाचार और शासन व्यवस्था के प्रश्न को राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श में ला दिया।
उसने विपक्षी दलों को एक साझा नैतिक मंच उपलब्ध कराया।
उसने छात्र राजनीति और राष्ट्रीय राजनीति को सीधे जोड़ दिया।
और सबसे महत्वपूर्ण—यहीं से “संपूर्ण क्रांति” की अवधारणा राष्ट्रीय नारे में बदलने लगी।
1974 के शुरुआती महीनों में आंदोलन छात्र असंतोष था।
5 जून के बाद वह जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में व्यवस्था परिवर्तन की घोषणा बन चुका था।
आगे संघर्ष और तीखा होगा।
राज्य सरकार के खिलाफ आंदोलन केंद्र सरकार की आलोचना में बदलेगा।
जयप्रकाश और इंदिरा गांधी के बीच राजनीतिक तथा वैचारिक टकराव खुलकर सामने आएगा।
और “संपूर्ण क्रांति” अब केवल एक नारा नहीं, बल्कि जयप्रकाश की राजनीतिक दृष्टि की कसौटी बनने वाली थी।