प्रारंभिक जीवन और वैचारिक निर्माण
प्रारंभिक जीवन और वैचारिक निर्माण — सिताबदियारा से अमेरिका और समाजवादी विचारधारा तक
जयप्रकाश नारायण का जन्म 11 अक्टूबर 1902 को सिताबदियारा में हुआ। गंगा और घाघरा नदियों के बीच बसा यह क्षेत्र आज बिहार और उत्तर प्रदेश की सीमा से जुड़ा है। उस समय यह सारण जिले के अंतर्गत आता था। उनके पिता हरसूदयाल सरकारी नहर विभाग में कर्मचारी थे और माता फूलरानी देवी गृहिणी थीं। ग्रामीण परिवेश, नदी की बाढ़, बार-बार बदलती भौगोलिक परिस्थितियां और सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार का जीवन—ये सब उनके बचपन के अनुभवों का हिस्सा रहे।
आगे चलकर जिस व्यक्ति ने भारतीय राजनीति में सत्ता, असमानता और सामाजिक परिवर्तन के प्रश्नों को इतनी गंभीरता से उठाया, उसके वैचारिक निर्माण की शुरुआत किसी राजनीतिक परिवार की सत्ता परंपरा से नहीं हुई थी। यह प्रक्रिया धीरे-धीरे शिक्षा, राष्ट्रीय आंदोलन, व्यक्तिगत संघर्ष और विदेश में मजदूर जीवन के अनुभव से बनी।
सिताबदियारा से पटना
जयप्रकाश की प्रारंभिक शिक्षा गांव में हुई। आगे की पढ़ाई के लिए वे पटना आए और पटना कॉलेजिएट स्कूल में पढ़े। बाद में उन्होंने पटना कॉलेज में विज्ञान की पढ़ाई शुरू की। वे पढ़ाई में अच्छे थे और उनके सामने उस समय एक सामान्य उच्चशिक्षित भारतीय युवक की तरह सरकारी सेवा अथवा पेशेवर जीवन का रास्ता खुला था।
लेकिन इसी दौरान देश की राजनीति तेजी से बदल रही थी।
1919 का रॉलेट एक्ट, जलियांवाला बाग हत्याकांड, खिलाफत आंदोलन और महात्मा गांधी का असहयोग आंदोलन भारतीय युवाओं को औपनिवेशिक शासन से सीधे टकराव की ओर ले जा रहे थे।
जयप्रकाश भी इससे अछूते नहीं रहे।
1920 में उनका विवाह प्रभावती देवी से हुआ। प्रभावती बिहार के प्रसिद्ध राष्ट्रवादी नेता और वकील ब्रजकिशोर प्रसाद की पुत्री थीं। ब्रजकिशोर प्रसाद गांधीजी के निकट सहयोगियों में थे और चंपारण आंदोलन से भी जुड़े थे। विवाह ने जयप्रकाश को ऐसे परिवार से जोड़ दिया जिसका स्वतंत्रता आंदोलन से प्रत्यक्ष संबंध था।
मौलाना आजाद के भाषण ने बदल दिया रास्ता
जयप्रकाश के जीवन में निर्णायक मोड़ तब आया जब उन्होंने मौलाना अबुल कलाम आजाद का भाषण सुना।
आजाद युवाओं से अपील कर रहे थे कि वे अंग्रेज सरकार द्वारा संचालित और सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थानों का बहिष्कार करें तथा राष्ट्रीय शिक्षा संस्थानों से जुड़ें।
जयप्रकाश उस समय पटना कॉलेज में पढ़ रहे थे और परीक्षा बहुत निकट थी। फिर भी उन्होंने पढ़ाई बीच में छोड़ दी।
यह निर्णय उनके व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण संकेत था।
उन्होंने केवल राजनीतिक भाषण से प्रभावित होकर नारा नहीं लगाया; उन्होंने अपने व्यक्तिगत भविष्य को दांव पर लगाकर औपनिवेशिक शिक्षा व्यवस्था से अलग होने का निर्णय लिया।
उन्होंने पटना कॉलेज छोड़कर बिहार विद्यापीठ में प्रवेश लिया। यह संस्था डॉ. राजेंद्र प्रसाद और बिहार के अन्य राष्ट्रीय नेताओं द्वारा उन छात्रों के लिए स्थापित की गई थी जिन्होंने असहयोग आंदोलन के दौरान सरकारी शिक्षण संस्थान छोड़ दिए थे। भारत सरकार के एक आधिकारिक विवरण में भी दर्ज है कि जयप्रकाश ने परीक्षा से लगभग बीस दिन पहले पटना कॉलेज छोड़ दिया था।
यहीं उनके जीवन में दो धाराएं एक साथ चलने लगीं—राष्ट्रवाद और सामाजिक परिवर्तन की खोज।
लेकिन जयप्रकाश अभी गांधीवादी नहीं बने थे।
उनका वैचारिक सफर बहुत लंबा था और अगला बड़ा पड़ाव भारत नहीं, अमेरिका था।
प्रभावती गांधी आश्रम में, जयप्रकाश अमेरिका की ओर
विवाह के बाद प्रभावती देवी कुछ समय महात्मा गांधी के साबरमती आश्रम में रहीं। वहां उनका जीवन गांधीवादी अनुशासन, सेवा और सादगी से प्रभावित हुआ।
दूसरी ओर जयप्रकाश उच्च शिक्षा लेना चाहते थे।
ब्रिटिश सरकार से संचालित या सहायता प्राप्त संस्थान में वापस जाना उन्हें स्वीकार नहीं था। अमेरिका के बारे में उन्हें यह जानकारी मिली कि वहां छात्र काम करके अपनी पढ़ाई का खर्च निकाल सकते हैं।
1922 में उन्होंने अमेरिका जाने का निर्णय लिया।
उनके पास संपन्न परिवार की आर्थिक सुरक्षा नहीं थी। विदेश में उनके लिए कोई आरामदायक जीवन तैयार नहीं था।
वे 1922 में भारत से रवाना हुए और जापान होते हुए अक्टूबर में सैन फ्रांसिस्को पहुंचे। अमेरिका में उनका प्रवास लगभग सात वर्ष—1922 से 1929 तक—चला।
यही सात वर्ष जयप्रकाश नारायण के वैचारिक निर्माण के सबसे महत्वपूर्ण वर्ष बने।
अमेरिका में विद्यार्थी नहीं, मजदूर-विद्यार्थी
अमेरिका पहुंचने के बाद जयप्रकाश ने केवल विश्वविद्यालयों की कक्षाओं में समाज को नहीं समझा।
उन्होंने उसे मजदूर के रूप में भी देखा।
अपनी पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए उन्होंने खेतों, फलों के बागों, कारखानों, रेस्तरां और अन्य स्थानों पर छोटे-मोटे काम किए। कैलिफोर्निया में उन्होंने अंगूरों को सुखाकर किशमिश बनाने वाले खेतों में काम किया। अलग-अलग विवरणों में कारखानों, रेस्तरां और अन्य श्रम कार्यों का भी उल्लेख मिलता है।
यह अनुभव बहुत महत्वपूर्ण था।
भारत में वे औपनिवेशिक शासन और राष्ट्रीय स्वतंत्रता का प्रश्न लेकर अमेरिका गए थे।
अमेरिका में उन्हें एक दूसरा प्रश्न दिखाई दिया—
राजनीतिक स्वतंत्रता के बावजूद आर्थिक असमानता क्यों बनी रहती है?
अमेरिका लोकतांत्रिक देश था। वहां ब्रिटिश उपनिवेशवाद जैसा विदेशी शासन नहीं था। फिर भी मजदूर और संपन्न वर्ग के बीच भारी अंतर था।
यह प्रश्न जयप्रकाश के मन में गहराता गया।
यहीं उनका राष्ट्रवाद सामाजिक और आर्थिक समानता की खोज से जुड़ने लगा।
एक विश्वविद्यालय से दूसरे विश्वविद्यालय तक
जयप्रकाश ने अमेरिका में कई शिक्षण संस्थानों में अध्ययन किया। उन्होंने कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले से शुरुआत की। आर्थिक कठिनाइयों और शुल्क संबंधी समस्याओं के कारण उन्हें दूसरे विश्वविद्यालयों की ओर जाना पड़ा। आयोवा, विस्कॉन्सिन और ओहायो राज्य विश्वविद्यालय उनके अध्ययन-क्रम के महत्वपूर्ण पड़ाव बने।
आरंभ में उनकी रुचि विज्ञान में थी।
लेकिन धीरे-धीरे सामाजिक विज्ञान, समाजशास्त्र, अर्थव्यवस्था और सामाजिक असमानता के प्रश्नों ने उन्हें अधिक आकर्षित किया।
यह परिवर्तन केवल अकादमिक विषय बदलने का मामला नहीं था।
वास्तव में जयप्रकाश यह समझने का प्रयास कर रहे थे कि गरीबी और असमानता पैदा क्यों होती है, संपत्ति कुछ लोगों के हाथों में क्यों केंद्रित होती है और क्या समाज की आर्थिक संरचना बदले बिना राजनीतिक स्वतंत्रता पूर्ण हो सकती है।
यही प्रश्न उन्हें मार्क्सवादी विचारधारा की ओर ले गए।
विस्कॉन्सिन में मार्क्सवाद से गंभीर परिचय
विस्कॉन्सिन में जयप्रकाश समाजवादी और मार्क्सवादी विचारों से अधिक गंभीर रूप से जुड़े।
उन्होंने कार्ल मार्क्स, फ्रेडरिक एंगेल्स, लेनिन, ट्रॉट्स्की और अन्य समाजवादी चिंतकों का अध्ययन किया। भारतीय क्रांतिकारी और साम्यवादी चिंतक एम.एन. रॉय के लेखन का भी उन पर गहरा प्रभाव पड़ा।
यह समझना महत्वपूर्ण है कि जयप्रकाश का मार्क्सवाद केवल पुस्तकीय आकर्षण नहीं था।
अमेरिका में उन्होंने स्वयं मेहनत-मजदूरी की थी। उन्होंने देखा था कि औद्योगिक समाज में उत्पादन और संपत्ति की संरचना किस तरह वर्गीय अंतर पैदा करती है।
इसलिए जब उन्होंने मार्क्स का वर्ग-संघर्ष और पूंजीवादी शोषण का विश्लेषण पढ़ा तो उसे अपने अनुभवों से जोड़ सके।
विस्कॉन्सिन विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के इतिहास में भी उनके उस समय के वैचारिक परिवर्तन का उल्लेख है। वहां के समाजवादी विचारों से जुड़े अध्यापकों और विद्यार्थियों ने उनके मन में पहले से उपस्थित पूंजीवादी व्यवस्था संबंधी प्रश्नों को दिशा दी।
एम.एन. रॉय का प्रभाव
जयप्रकाश नारायण के वैचारिक विकास में एम.एन. रॉय का प्रभाव विशेष रूप से उल्लेखनीय था।
रॉय अंतरराष्ट्रीय साम्यवादी आंदोलन से जुड़े प्रमुख भारतीय चिंतक थे। उनके लेखन में औपनिवेशिक समाज, भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन और सामाजिक क्रांति के प्रश्नों का विश्लेषण था।
जयप्रकाश ने रॉय की रचनाओं को पढ़ा और भारतीय परिस्थितियों में समाजवादी परिवर्तन की संभावना पर गंभीरता से विचार किया। भारत सरकार के प्रकाशन में भी यह दर्ज है कि एम.एन. रॉय के लेखन ने उनके चिंतन पर गहरा प्रभाव डाला।
इस समय तक जयप्रकाश का विचार लगभग इस दिशा में पहुंच चुका था कि केवल अंग्रेजों को भारत से निकाल देना पर्याप्त नहीं होगा।
यदि आर्थिक सत्ता कुछ लोगों के हाथों में बनी रही, यदि किसान और मजदूर गरीब रहे और यदि अवसरों में असमानता बनी रही तो राजनीतिक स्वतंत्रता अधूरी होगी।
यही विचार आगे उनके समाजवाद की बुनियाद बना।
क्या जयप्रकाश उस समय कम्युनिस्ट हो गए थे?
यह प्रश्न महत्वपूर्ण है।
अमेरिका प्रवास के दौरान जयप्रकाश निश्चित रूप से मार्क्सवाद से गहरे प्रभावित हुए। उन्होंने पूंजीवाद की आलोचना और वर्गीय असमानता के मार्क्सवादी विश्लेषण को गंभीरता से स्वीकार किया।
लेकिन उनके पूरे जीवन को देखकर यह कहना सही नहीं होगा कि उनकी विचारयात्रा वहीं समाप्त हो गई थी।
जयप्रकाश की विशेषता यह थी कि वे किसी एक विचारधारा को अंतिम सत्य मानकर जीवनभर उससे बंधे नहीं रहे।
पहले मार्क्सवाद।
फिर लोकतांत्रिक समाजवाद।
इसके बाद गांधी, विनोबा और सर्वोदय।
और अंततः “संपूर्ण क्रांति।”
उनका राजनीतिक जीवन मूलतः लगातार वैचारिक खोज का जीवन था।
लेकिन 1920 के दशक के अंत में भारत लौटते समय वे स्पष्ट रूप से समाजवादी और मार्क्सवादी विचारों से प्रभावित युवा क्रांतिकारी थे।
सोवियत संघ जाने की इच्छा
मार्क्सवादी विचारों में रुचि इतनी बढ़ी कि जयप्रकाश सोवियत संघ जाकर वहां की व्यवस्था का अध्ययन करना चाहते थे।
रूसी क्रांति उस समय दुनिया के समाजवादी युवाओं के लिए अत्यंत आकर्षक घटना थी। यह पहली ऐसी बड़ी राजनीतिक क्रांति थी जिसने पूंजीवादी व्यवस्था के विकल्प के रूप में समाजवादी राज्य स्थापित करने का दावा किया था।
कुछ जीवन-वृत्तांतों में उल्लेख मिलता है कि जयप्रकाश आगे की पढ़ाई और अध्ययन के लिए सोवियत संघ जाने पर विचार कर रहे थे, लेकिन पारिवारिक परिस्थितियों और अन्य कारणों से यह संभव नहीं हुआ। विस्कॉन्सिन विश्वविद्यालय से संबंधित ऐतिहासिक विवरण में भी उनके सोवियत संघ जाने की इच्छा और परिवार की आशंकाओं का उल्लेख है।
यदि वे उस समय सोवियत संघ चले गए होते तो संभव है कि उनकी राजनीतिक दिशा कुछ और होती।
लेकिन वे भारत लौटे।
समाजशास्त्र ने राजनीतिक चिंतन को गहराई दी
अमेरिका में उनकी पढ़ाई केवल राजनीतिक विचारधारा तक सीमित नहीं थी।
उन्होंने समाजशास्त्र का गंभीर अध्ययन किया और ओहायो राज्य विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र में उच्च अध्ययन किया। उनकी शोध-रचना सामाजिक परिवर्तन और सामाजिक संरचना से संबंधित थी। जयप्रकाश नारायण से संबंधित संरक्षित शैक्षणिक सामग्री में उनकी शोध-रचना का उल्लेख मिलता है और विश्वविद्यालय के इतिहास में उनके स्नातक तथा स्नातकोत्तर अध्ययन की पुष्टि की गई है।
इस अध्ययन का प्रभाव आगे उनकी राजनीति पर स्पष्ट दिखाई देता है।
जयप्रकाश केवल सत्ता बदलने की राजनीति से संतुष्ट नहीं होते थे।
वे बार-बार व्यवस्था, सामाजिक संरचना, आर्थिक संबंध और व्यक्ति के नैतिक परिवर्तन की बात करते थे।
उनकी बहुत बाद की “संपूर्ण क्रांति” की अवधारणा को समझने के लिए अमेरिका के इन्हीं वर्षों को याद रखना आवश्यक है।
गांधी और मार्क्स — दो अलग धाराओं के बीच जयप्रकाश
इस समय उनके निजी जीवन में एक रोचक वैचारिक स्थिति भी बन चुकी थी।
उनकी पत्नी प्रभावती गांधी के आश्रम में रहकर गांधीवादी जीवन से गहराई से प्रभावित हो रही थीं।
जयप्रकाश अमेरिका में मार्क्सवाद की ओर बढ़ रहे थे।
एक तरफ गांधी का सत्य, अहिंसा और व्यक्तिगत नैतिक परिवर्तन।
दूसरी तरफ मार्क्स का वर्ग-संघर्ष, आर्थिक संरचना और सामाजिक क्रांति।
आगे चलकर जयप्रकाश के जीवन में इन दोनों धाराओं का विलक्षण मेल दिखाई देगा।
युवावस्था का जयप्रकाश मार्क्स से प्रभावित था।
जीवन के उत्तरार्ध का जयप्रकाश गांधी और सर्वोदय से।
लेकिन दोनों चरणों में एक बात समान रही—
सत्ता स्वयं उनका अंतिम लक्ष्य कभी नहीं बनी।
उनकी चिंता यह थी कि समाज में अन्याय और असमानता कैसे समाप्त हो।
अमेरिका ने उन्हें क्या दिया?
1922 में अमेरिका जाने वाला जयप्रकाश एक राष्ट्रवादी छात्र था।
1929 में भारत लौटने वाला जयप्रकाश उससे बहुत अलग था।
उसने मजदूरी की थी।
गरीबी देखी थी।
औद्योगिक पूंजीवाद को नजदीक से देखा था।
समाजशास्त्र पढ़ा था।
मार्क्स और अन्य समाजवादी चिंतकों का अध्ययन किया था।
एम.एन. रॉय से प्रभावित हुआ था।
और यह निष्कर्ष लेकर लौट रहा था कि भारत की स्वतंत्रता केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं हो सकती।
यदि अंग्रेज चले जाएं लेकिन आर्थिक और सामाजिक असमानता बनी रहे तो स्वतंत्रता अधूरी होगी।
भारत सरकार के आधिकारिक जीवन-वृत्त में भी कहा गया है कि 1929 में भारत लौटते समय उनके विचारों पर कार्ल मार्क्स का स्पष्ट प्रभाव था। वापसी के मार्ग में उन्होंने लंदन में साम्यवादी नेताओं से भी भारतीय स्वतंत्रता और क्रांति के प्रश्नों पर विचार-विमर्श किया।
1929 — भारत वापसी और एक नए राजनीतिक जीवन की शुरुआत
1929 में जयप्रकाश नारायण भारत लौटे।
अब उनके सामने प्रश्न था कि अमेरिका में सीखे समाजवादी विचारों को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से कैसे जोड़ा जाए।
भारत में महात्मा गांधी का नेतृत्व था।
जवाहरलाल नेहरू समाजवाद की ओर झुक रहे थे।
युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं में औपनिवेशिक शासन के साथ-साथ सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन की मांग बढ़ रही थी।
जयप्रकाश इसी समय भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में प्रवेश करते हैं।
आने वाले वर्षों में वे कांग्रेस के भीतर समाजवादी धारा के सबसे महत्वपूर्ण नेताओं में शामिल होने वाले थे।
आचार्य नरेंद्र देव, राममनोहर लोहिया, अच्युत पटवर्धन और दूसरे समाजवादियों के साथ उनका संबंध विकसित होगा।
और इसी प्रक्रिया से आगे कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का जन्म होगा।
इस प्रकार सिताबदियारा से अमेरिका तक की यात्रा केवल एक युवक की शिक्षा यात्रा नहीं थी।
यह उस राजनीतिक व्यक्तित्व की तैयारी थी जो आगे चलकर पहले क्रांतिकारी समाजवादी, फिर सर्वोदय कार्यकर्ता और अंततः भारतीय लोकतंत्र में सत्ता के विरुद्ध सबसे बड़े जनआंदोलनों में से एक का नेतृत्व करने वाला था।
जयप्रकाश नारायण के जीवन को समझने के लिए इसलिए उनके अमेरिका प्रवास को एक साधारण शैक्षणिक अध्याय के रूप में नहीं, बल्कि उनके वैचारिक जन्मकाल के रूप में देखना चाहिए।