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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण

1929 में अमेरिका से लौटे जयप्रकाश नारायण केवल उच्च शिक्षा प्राप्त युवक नहीं थे। वे अब औपनिवेशिक शासन के विरोध को सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन से जोड़कर देख रहे थे। भारत की स्वतंत्रता उनके लिए केवल अंग्रेजों की विदाई नहीं थी; वे ऐसी व्यवस्था चाहते थे जिसमें किसान, मजदूर और गरीब समाज के केंद्र में हों। यही सोच उन्हें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर उभर रही समाजवादी धारा की ओर ले गई।

1930 के दशक में कांग्रेस के भीतर दो स्तरों पर बहस चल रही थी। पहला प्रश्न था—ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष किस प्रकार आगे बढ़े। दूसरा—स्वतंत्र भारत की सामाजिक और आर्थिक संरचना कैसी हो। कांग्रेस के भीतर जवाहरलाल नेहरू पहले ही समाजवाद की ओर स्पष्ट झुकाव दिखा चुके थे। दूसरी ओर युवाओं का एक समूह चाहता था कि कांग्रेस केवल राजनीतिक स्वतंत्रता पर न रुके, बल्कि आर्थिक असमानता, जमींदारी, मजदूर प्रश्न और उत्पादन के साधनों पर नियंत्रण जैसे विषयों को भी अपने कार्यक्रम का हिस्सा बनाए। इसी वातावरण से कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का जन्म हुआ।

जवाहरलाल नेहरू से संपर्क और कांग्रेस में प्रवेश

भारत लौटने के बाद जयप्रकाश नारायण कांग्रेस के राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय हुए। जवाहरलाल नेहरू उनके समाजवादी रुझान से परिचित थे और दोनों के बीच वैचारिक निकटता विकसित हुई।

नेहरू स्वयं मार्क्सवाद और सोवियत प्रयोग से प्रभावित थे, हालांकि वे किसी कम्युनिस्ट दल के अनुशासन में बंधने के पक्ष में नहीं थे। वे कांग्रेस के भीतर समाजवादी विचारों को बढ़ते देखना चाहते थे। दिसंबर 1929 के लाहौर अधिवेशन के समय वे स्वयं को समाजवादी और गणतंत्रवादी कह चुके थे। आगे उन्होंने कांग्रेस के भीतर समाजवादी समूह बनने का स्वागत भी किया।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर था।

नेहरू समाजवाद के समर्थक थे, फिर भी उन्होंने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की औपचारिक सदस्यता नहीं ली। वे कांग्रेस के सर्वोच्च नेतृत्व में रहते हुए पूरे संगठन को सामाजिक और आर्थिक रूप से अधिक वाम दिशा में ले जाना चाहते थे।

जयप्रकाश और उनके साथियों ने दूसरा रास्ता चुना।

उन्होंने कांग्रेस के भीतर ही एक संगठित समाजवादी समूह बनाने का निर्णय किया।

सविनय अवज्ञा आंदोलन के बाद बेचैनी

1930 से 1934 के बीच सविनय अवज्ञा आंदोलन ने पूरे देश को झकझोरा, लेकिन आंदोलन के उतार-चढ़ाव और उसके स्थगन से युवाओं के एक हिस्से में बेचैनी पैदा हुई।

प्रश्न यह था कि आगे क्या?

क्या केवल संवैधानिक संस्थाओं और विधानसभाओं में प्रवेश करके स्वतंत्रता प्राप्त की जा सकती है?

या जनता—विशेषकर किसान और मजदूर—को संगठित कर संघर्ष को अधिक गहरा करना होगा?

युवा समाजवादियों को लगता था कि कांग्रेस के भीतर एक हिस्सा संसदीय राजनीति और समझौते की ओर बहुत तेजी से बढ़ रहा है। वे चाहते थे कि स्वतंत्रता आंदोलन का सामाजिक आधार विस्तृत किया जाए और किसान-मजदूर को केवल समर्थक नहीं बल्कि परिवर्तन की मुख्य शक्ति बनाया जाए।

इसी विचार ने जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेंद्र देव, राममनोहर लोहिया, अच्युत पटवर्धन, अशोक मेहता, मीनू मसानी, युसुफ मेहरअली और अन्य नेताओं को एक मंच पर लाया।

जेल भी बनी समाजवादी विचार-विमर्श की जगह

1932 के दमन के दौरान कांग्रेस के अनेक नेता जेलों में थे। युवा समाजवादी नेताओं के बीच वहीं नए राजनीतिक संगठन पर गंभीर विचार-विमर्श हुआ।

यह समूह पूरी तरह एक विचार का नहीं था।

कुछ नेता मार्क्सवाद से अधिक प्रभावित थे।

कुछ लोकतांत्रिक समाजवाद की दिशा में थे।

कुछ गांधी की जन-संघर्ष की पद्धति को अस्वीकार नहीं करना चाहते थे।

लेकिन एक बात पर व्यापक सहमति थी—भारत की स्वतंत्रता को सामाजिक क्रांति से जोड़ना होगा।

इस वैचारिक समूह के निर्माण में जयप्रकाश की भूमिका लगातार बढ़ती गई।

आचार्य नरेंद्र देव — समाजवादी धारा के वैचारिक गुरु

कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के निर्माण में आचार्य नरेंद्र देव का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण था।

वे विद्वान, शिक्षक, बौद्ध चिंतन के गहरे अध्येता और समाजवादी विचारक थे। उनका समाजवाद केवल आर्थिक सिद्धांत नहीं था। वे लोकतंत्र, मानव स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय को भी समाजवाद का आवश्यक आधार मानते थे।

जयप्रकाश उनसे प्रभावित थे।

आचार्य नरेंद्र देव के कारण भारतीय समाजवादी आंदोलन को वह बौद्धिक आधार मिला जिसने उसे सीधे सोवियत साम्यवाद की नकल बनने से रोका।

वे मार्क्सवाद की वर्गीय समझ को महत्वपूर्ण मानते थे, लेकिन भारतीय परिस्थितियों में लोकतांत्रिक और राष्ट्रीय आंदोलन की भूमिका को भी स्वीकार करते थे। कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के भीतर उनकी प्रतिष्ठा इसीलिए एक वैचारिक मार्गदर्शक की थी।

जब 1934 में समाजवादियों का अखिल भारतीय सम्मेलन बुलाया गया तो उसकी अध्यक्षता आचार्य नरेंद्र देव ने ही की।

जयप्रकाश उस नई व्यवस्था के मुख्य संगठनकर्ता बने।

मई 1934 — पटना में निर्णायक बैठक

17 मई 1934 को पटना में समाजवादी विचार वाले कांग्रेस कार्यकर्ताओं का अखिल भारतीय सम्मेलन आयोजित हुआ।

जयप्रकाश नारायण ने बिहार के समाजवादी समूह की ओर से इसे बुलाने में मुख्य भूमिका निभाई। आचार्य नरेंद्र देव ने इसकी अध्यक्षता की।

सम्मेलन का उद्देश्य कांग्रेस से अलग कोई विरोधी दल बनाना नहीं था।

समाजवादियों का विचार था कि वे कांग्रेस के भीतर रहकर कांग्रेस की दिशा बदलेंगे।

सम्मेलन ने मांग की कि कांग्रेस ऐसा कार्यक्रम स्वीकार करे जिसका लक्ष्य केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि समाजवादी परिवर्तन भी हो। जयप्रकाश को नए संगठन की तैयारी और प्रांतीय इकाइयां खड़ी करने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिली।

यह कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के निर्माण की निर्णायक शुरुआत थी।

अक्टूबर 1934 — अखिल भारतीय संगठन

अक्टूबर 1934 में बंबई में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का पहला वार्षिक अधिवेशन हुआ।

इस अधिवेशन में अलग-अलग प्रांतों से प्रतिनिधि पहुंचे। संगठन का राष्ट्रीय ढांचा तैयार किया गया।

जयप्रकाश नारायण को महासचिव बनाया गया।

यह पद केवल औपचारिक नहीं था।

अब विभिन्न राज्यों के समाजवादी समूहों को एक राष्ट्रीय संगठन में बदलने की जिम्मेदारी उनके कंधों पर थी। वे विभिन्न प्रांतों में गए, कार्यकर्ताओं को संगठित किया और कांग्रेस के भीतर समाजवादी कार्यक्रम के लिए समर्थन बढ़ाने का प्रयास किया।

इस समय जयप्रकाश मात्र 32 वर्ष के थे।

लेकिन वे भारतीय समाजवादी आंदोलन के प्रमुख राष्ट्रीय नेताओं में शामिल हो चुके थे।

कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी क्या चाहती थी?

कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी ने प्रारंभ से स्पष्ट किया कि राजनीतिक स्वतंत्रता अंतिम लक्ष्य नहीं है।

उसके कार्यक्रम में किसान और मजदूरों को संगठित करना, आर्थिक सत्ता का पुनर्वितरण, प्रमुख उद्योगों का सामाजिक नियंत्रण, जमींदारी व्यवस्था समाप्त करना और उत्पादन के साधनों पर सीमित निजी नियंत्रण जैसे विचार शामिल थे।

पार्टी चाहती थी कि प्रमुख उद्योग, रेल, खदान, जहाजरानी, सार्वजनिक सेवाएं और वित्तीय संस्थाएं समाज के व्यापक हित में नियंत्रित हों। कृषि क्षेत्र में जमींदारी उन्मूलन और किसानों की स्थिति सुधारना उसकी प्राथमिकताओं में था।

उस समय के भारतीय संदर्भ में यह अत्यंत व्यापक कार्यक्रम था।

कांग्रेस का मुख्य उद्देश्य जहां स्वतंत्रता प्राप्त करना था, वहीं समाजवादी चाहते थे कि यह भी स्पष्ट हो कि स्वतंत्रता के बाद आर्थिक सत्ता किसके हाथ में होगी।

जयप्रकाश के लिए यही प्रश्न केंद्रीय था।

जयप्रकाश — संगठन के प्रमुख संचालक

आचार्य नरेंद्र देव वैचारिक प्रतिष्ठा के केंद्र थे, लेकिन संगठनात्मक स्तर पर जयप्रकाश नारायण तेजी से समाजवादी समूह की मुख्य शक्ति बन गए।

वे प्रांतों का दौरा करते।

युवा कार्यकर्ताओं को जोड़ते।

किसान और मजदूर संगठनों से संबंध बनाते।

कांग्रेस के भीतर समाजवादी कार्यक्रम के लिए समर्थन जुटाते।

उनका उद्देश्य कांग्रेस तोड़ना नहीं था।

वे मानते थे कि स्वतंत्रता आंदोलन का सबसे बड़ा राष्ट्रीय मंच कांग्रेस ही है। उससे बाहर जाकर छोटा वैचारिक संगठन बनाना ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष को कमजोर कर सकता था।

इसलिए उनकी रणनीति थी—

कांग्रेस के भीतर रहो, लेकिन कांग्रेस को समाजवादी दिशा में बदलो।

नेहरू और कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी — निकटता लेकिन दूरी भी

कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के युवा कार्यकर्ता जवाहरलाल नेहरू को अपने सबसे बड़े राष्ट्रीय सहानुभूति-समर्थकों में देखते थे।

नेहरू जमींदारी और आर्थिक असमानता की आलोचना करते थे। वे औद्योगिक विकास और आर्थिक नियोजन के समर्थक थे। साम्राज्यवाद और पूंजीवादी शोषण पर उनकी भाषा भी कांग्रेस के दक्षिणपंथी नेताओं की तुलना में अधिक तीखी थी।

दिसंबर 1934 में उन्होंने मीनू मसानी को लिखे पत्र में कांग्रेस के भीतर समाजवादी समूह बनने का स्वागत किया था।

फिर भी नेहरू कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी में शामिल नहीं हुए।

इसके पीछे राजनीतिक कारण भी थे।

नेहरू स्वयं को किसी एक आंतरिक गुट तक सीमित नहीं करना चाहते थे। वे कांग्रेस के व्यापक राष्ट्रीय नेतृत्व में बने रहना चाहते थे।

यही अंतर आगे कई बार जयप्रकाश और नेहरू के रास्तों को पास लाता और फिर अलग भी करता रहा।

राममनोहर लोहिया — नई समाजवादी पीढ़ी का प्रखर स्वर

राममनोहर लोहिया 1933 में जर्मनी से उच्च शिक्षा पूरी करके भारत लौटे थे।

उनमें बौद्धिक तीक्ष्णता, तीखी राजनीतिक भाषा और स्वतंत्र विचार की असाधारण क्षमता थी। वे कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के संस्थापक नेताओं में शामिल हुए और शीघ्र ही जयप्रकाश के सबसे महत्वपूर्ण सहयोगियों में गिने जाने लगे।

जयप्रकाश और लोहिया दोनों समाजवादी थे, लेकिन दोनों की प्रकृति अलग थी।

जयप्रकाश संगठन बनाने और विभिन्न धाराओं को साथ रखने में अधिक सक्षम थे।

लोहिया वैचारिक चुनौती देने वाले नेता थे। वे कांग्रेस नेतृत्व, ब्रिटिश साम्राज्यवाद और बाद में स्वतंत्र भारत की सत्ता—तीनों की कठोर आलोचना करने से नहीं हिचकते थे।

लेकिन 1930 के दशक में दोनों का साझा उद्देश्य स्पष्ट था—

राष्ट्रीय आंदोलन को अधिक संघर्षशील और सामाजिक रूप से क्रांतिकारी बनाना।

गांधी से मतभेद, लेकिन संघर्ष से अलगाव नहीं

कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के नेताओं और गांधी के बीच कई बुनियादी वैचारिक मतभेद थे।

गांधी का आर्थिक चिंतन नैतिकता, ग्राम व्यवस्था, न्यूनतम उपभोग और ट्रस्टीशिप जैसे विचारों से जुड़ा था।

युवा समाजवादी आर्थिक संरचना में अधिक मूलभूत परिवर्तन चाहते थे।

जयप्रकाश उस समय मार्क्सवादी विचारों से प्रभावित थे और मानते थे कि आर्थिक असमानता केवल व्यक्तिगत नैतिक परिवर्तन से समाप्त नहीं होगी।

फिर भी समाजवादियों ने गांधी के नेतृत्व में चल रहे राष्ट्रीय आंदोलन से स्वयं को अलग नहीं किया।

यही कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी को कम्युनिस्ट धारा से अलग करता था।

समाजवादियों का तर्क था कि कांग्रेस ही वह सबसे व्यापक राष्ट्रीय आंदोलन है जो करोड़ों भारतीयों को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जोड़ सकता है। इसलिए उसका साथ छोड़ना नहीं, बल्कि उसकी सामाजिक दिशा बदलना चाहिए।

कम्युनिस्टों से संबंध — सहयोग भी, मतभेद भी

समाजवादियों और भारतीय कम्युनिस्टों के बीच संबंध जटिल रहे।

दोनों साम्राज्यवाद, पूंजीवाद और जमींदारी के आलोचक थे।

दोनों किसान और मजदूरों को संगठित करना चाहते थे।

लेकिन कांग्रेस और राष्ट्रीय आंदोलन को लेकर दोनों की रणनीति लंबे समय तक अलग रही।

कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के नेताओं का विश्वास था कि भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को केवल “बुर्जुआ” आंदोलन कहकर उससे अलग रहना गलत होगा। कांग्रेस की व्यापक जनशक्ति को समाजवादी दिशा में ले जाना अधिक प्रभावी रणनीति होगी।

कुछ समय बाद कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं ने भी कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के भीतर काम किया। 1930 के दशक के उत्तरार्ध में दोनों धाराओं के बीच सहयोग बढ़ा, लेकिन संगठनात्मक नियंत्रण और अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट राजनीति को लेकर तनाव भी बना रहा।

किसान और मजदूर राजनीति की ओर बढ़ता समाजवाद

कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी ने यह समझ लिया था कि यदि समाजवाद केवल शिक्षित युवाओं की वैचारिक बहस बना रहा तो उसका कोई व्यापक राजनीतिक अर्थ नहीं होगा।

इसलिए किसान और मजदूर संगठनों पर जोर बढ़ा।

1930 के दशक में किसान आंदोलनों और अखिल भारतीय किसान सभा के विस्तार में समाजवादी तथा वामपंथी कार्यकर्ताओं की बड़ी भूमिका रही। मजदूर संघों से भी समाजवादियों के संबंध बढ़े।

जयप्रकाश चाहते थे कि राष्ट्रीय स्वतंत्रता संघर्ष और सामाजिक संघर्ष एक-दूसरे से अलग न रहें।

किसान अंग्रेजों के विरुद्ध भी लड़े और जमींदारी शोषण के विरुद्ध भी।

मजदूर साम्राज्यवाद का विरोध भी करे और अपने आर्थिक अधिकारों के लिए भी संगठित हो।

यही उनकी उस समय की समाजवादी राजनीति का सार था।

क्या कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी कांग्रेस तोड़ना चाहती थी?

नहीं।

कम से कम 1930 के दशक में उसकी मूल रणनीति कांग्रेस को तोड़ना नहीं थी।

वह कांग्रेस के भीतर एक दबाव समूह और वैचारिक धारा की तरह काम कर रही थी।

उसका लक्ष्य था—

कांग्रेस के कार्यक्रम को समाजवादी बनाना,

किसान-मजदूरों की भूमिका बढ़ाना,

पूर्ण स्वतंत्रता के संघर्ष को तेज करना,

और ब्रिटिश सरकार के साथ ऐसे समझौतों का विरोध करना जो राष्ट्रीय आंदोलन को कमजोर करें।

इसलिए कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का अस्तित्व स्वयं उस समय की कांग्रेस की व्यापकता का प्रमाण भी था।

एक ही संगठन में गांधीवादी, उदारवादी, समाजवादी और अन्य राजनीतिक धाराएं काम कर रही थीं।

जयप्रकाश का मार्क्सवाद भारतीय अनुभव से बदलने लगा

1930 के दशक के शुरुआती जयप्रकाश पर मार्क्सवाद का गहरा प्रभाव था।

लेकिन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय होने के साथ उनके विचारों में परिवर्तन भी शुरू हुआ।

भारत की सामाजिक संरचना यूरोप जैसी नहीं थी।

यहां जाति थी।

विशाल ग्रामीण समाज था।

किसानों की संख्या औद्योगिक मजदूरों से कहीं अधिक थी।

धर्म, समुदाय और स्थानीय सामाजिक संरचनाएं राजनीति को प्रभावित करती थीं।

और सबसे बढ़कर, गांधी के नेतृत्व में अहिंसक जनआंदोलन करोड़ों लोगों को राजनीतिक रूप से सक्रिय कर चुका था।

इस अनुभव ने जयप्रकाश को धीरे-धीरे यह सोचने के लिए मजबूर किया कि भारतीय समाजवाद को केवल यूरोपीय या सोवियत प्रतिरूप से नहीं बनाया जा सकता।

यह परिवर्तन तत्काल पूरा नहीं हुआ, लेकिन बीज इसी दौर में पड़ चुका था।

1936–37 — समाजवादी धारा का प्रभाव बढ़ा

1930 के दशक के मध्य तक कांग्रेस में समाजवाद चर्चा के केंद्र में आ चुका था।

1936 के लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू ने अध्यक्षीय भाषण में समाजवाद को भारत की समस्याओं के समाधान की दिशा के रूप में प्रस्तुत किया।

कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के नेताओं को लगा कि उनकी वैचारिक बहस अब कांग्रेस के मुख्य मंच तक पहुंच रही है।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं था कि कांग्रेस समाजवादी पार्टी बन गई थी।

सरदार पटेल, राजेंद्र प्रसाद, राजगोपालाचारी और अन्य अनेक नेता समाजवादी कार्यक्रम के कई हिस्सों से सहमत नहीं थे।

इसलिए कांग्रेस के भीतर संघर्ष जारी रहा।

जयप्रकाश और उनके साथी चाहते थे कि संगठन किसान-मजदूर आधारित अधिक क्रांतिकारी दिशा ले।

कांग्रेस नेतृत्व का बड़ा हिस्सा व्यापक राष्ट्रीय एकता को प्राथमिकता देता था।

1939 के बाद स्वतंत्रता संघर्ष फिर निर्णायक प्रश्न बना

सितंबर 1939 में दूसरा विश्वयुद्ध शुरू हुआ और ब्रिटिश सरकार ने भारतीय नेतृत्व से पूछे बिना भारत को युद्ध में शामिल घोषित कर दिया।

अब कांग्रेस के भीतर बहस फिर इस प्रश्न पर केंद्रित हो गई कि ब्रिटिश शासन के विरुद्ध क्या रणनीति अपनाई जाए।

समाजवादियों ने युद्ध को साम्राज्यवादी युद्ध माना और इसका उपयोग ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष तेज करने के लिए करना चाहा।

जयप्रकाश का रुख विशेष रूप से संघर्षशील था।

अब वे केवल कांग्रेस के भीतर समाजवादी कार्यक्रम बनाने वाले संगठनकर्ता नहीं रहे थे।

वे ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अधिक सक्रिय प्रतिरोध की तैयारी करने वाले नेता बन रहे थे।

उनकी राजनीतिक यात्रा का अगला चरण जेल, भूमिगत संगठन और प्रत्यक्ष विद्रोही गतिविधियों से जुड़ने वाला था।

समाजवादी नेता से क्रांतिकारी संघर्षकर्ता तक

1934 से 1941 के बीच जयप्रकाश नारायण की भूमिका तेजी से बदली।

अमेरिका से लौटे मार्क्सवादी विचारों वाले युवक से वे कांग्रेस के प्रमुख समाजवादी संगठनकर्ता बने।

आचार्य नरेंद्र देव ने उन्हें वैचारिक गहराई दी।

जवाहरलाल नेहरू ने समाजवादी विचारों को राष्ट्रीय राजनीतिक वैधता दी।

राममनोहर लोहिया जैसे साथियों ने आंदोलन को संघर्षशील युवा ऊर्जा दी।

और कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी ने जयप्रकाश को वह अखिल भारतीय मंच दिया जिसके माध्यम से वे मजदूर, किसान, युवा और स्वतंत्रता आंदोलन को एक राजनीतिक सूत्र में जोड़ने लगे।

इस दौर का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यही है कि जयप्रकाश नारायण ने समाजवाद को कांग्रेस से बाहर बैठकर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के भीतर से विकसित करने का प्रयास किया।

लेकिन आने वाले वर्षों में परिस्थितियां बदलने वाली थीं।

ब्रिटिश शासन का दमन बढ़ने वाला था।

दूसरा विश्वयुद्ध संघर्ष को और तीखा करने वाला था।

और अगस्त 1942 में जब कांग्रेस का लगभग पूरा शीर्ष नेतृत्व जेल में होगा, तब यही समाजवादी समूह स्वतंत्रता आंदोलन की भूमिगत कमान संभालने वाले सबसे महत्वपूर्ण नेटवर्कों में से एक बनेगा।

उस समय जयप्रकाश केवल विचारक या संगठनकर्ता नहीं रहेंगे।