omkarchaudhary.comJOURNALIST · AUTHOR · RESEARCHEROCN Research Desk
दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण

जयप्रकाश नारायण का ऐतिहासिक मूल्यांकन किसी एक घटना, एक आंदोलन या एक राजनीतिक विचारधारा के आधार पर नहीं किया जा सकता। उनका जीवन भारतीय राजनीति की लगभग पूरी बीसवीं शताब्दी को छूता है—औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष, समाजवाद का उदय, कांग्रेस के भीतर वैचारिक बहस, भारत छोड़ो आंदोलन, स्वतंत्रता के बाद समाजवादी राजनीति, सर्वोदय, भूदान, सत्ता से दूरी, 1974 का जनआंदोलन, आपातकाल का प्रतिरोध और 1977 में पहली गैर-कांग्रेसी केंद्रीय सरकार का गठन।

उन्हें “जननायक” इसलिए नहीं कहा गया कि उन्होंने सबसे अधिक चुनाव जीते। वे तो जीवन के सबसे प्रभावशाली चरण में चुनावी राजनीति से बाहर थे। उन्हें यह पहचान इसलिए मिली क्योंकि उन्होंने बार-बार सत्ता से ऊपर जनता की नैतिक और लोकतांत्रिक शक्ति को महत्व दिया।

उनका ऐतिहासिक स्थान इसी विशिष्टता से बनता है।

न सत्ता का मोह, न पद की राजनीति

जयप्रकाश नारायण के जीवन की सबसे असाधारण विशेषता यह है कि राष्ट्रीय राजनीति में अत्यंत प्रभावशाली होने के बावजूद उन्होंने सत्ता प्राप्त करने को अपना अंतिम लक्ष्य नहीं बनाया।

स्वतंत्रता के बाद वे चाहते तो संसद में लंबा करियर बना सकते थे।

केंद्रीय मंत्री बन सकते थे।

समाजवादी राजनीति के शीर्ष पदों पर बने रह सकते थे।

1977 की जनता विजय के बाद भी उनके पास राष्ट्रीय सत्ता पर असाधारण नैतिक प्रभाव था।

लेकिन उन्होंने न प्रधानमंत्री पद मांगा, न सरकार में कोई भूमिका।

यही उन्हें सामान्य अर्थों में राजनेता से अलग करता है।

उनकी राजनीति का प्रश्न था—सत्ता कौन ले, इससे पहले यह कि सत्ता का चरित्र कैसा हो।

विचार बदलने का साहस

जयप्रकाश का जीवन विचारों की लगातार यात्रा था।

युवावस्था में वे मार्क्सवाद से प्रभावित हुए।

फिर कांग्रेस समाजवाद के प्रमुख नेता बने।

1942 में भूमिगत क्रांतिकारी संघर्ष में सक्रिय हुए।

स्वतंत्रता के बाद लोकतांत्रिक समाजवाद की ओर बढ़े।

फिर विनोबा भावे, भूदान और सर्वोदय के रास्ते पर चले।

और अंततः “संपूर्ण क्रांति” की अवधारणा प्रस्तुत की।

सामान्यतः राजनीतिक नेता अपने पुराने विचारों को छोड़ने से बचते हैं, क्योंकि इससे उन पर असंगति का आरोप लग सकता है।

जयप्रकाश ने इस भय की परवाह नहीं की।

यदि अनुभव ने उन्हें यह विश्वास दिलाया कि पुराना रास्ता पर्याप्त नहीं है, तो उन्होंने नया रास्ता अपनाया।

यही बौद्धिक ईमानदारी उनकी विशेषता थी।

1942 का क्रांतिकारी, 1974 का अहिंसक जननेता

हजारीबाग जेल से पलायन करने वाला जयप्रकाश और 1974 में अहिंसक संपूर्ण क्रांति का आह्वान करने वाला जयप्रकाश एक ही व्यक्ति था, लेकिन विचारों में बड़ी दूरी तय कर चुका था।

1942 में औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध भूमिगत प्रतिरोध को वे आवश्यक मानते थे।

1974 में स्वतंत्र भारत की निर्वाचित सरकार से संघर्ष करते हुए उनका आग्रह अहिंसा, सत्याग्रह और जनदबाव पर था।

यह अंतर उनके लोकतांत्रिक विकास को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

वे यह मान चुके थे कि स्वतंत्र लोकतांत्रिक व्यवस्था में परिवर्तन का रास्ता हिंसक सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि संगठित और अहिंसक लोकशक्ति होना चाहिए।

“संपूर्ण क्रांति” की वास्तविक शक्ति और उसकी सीमा

जयप्रकाश का सबसे प्रसिद्ध विचार “संपूर्ण क्रांति” था।

इसकी शक्ति यह थी कि उसने राजनीति को समाज के बाकी हिस्सों से जोड़ दिया।

केवल चुनाव नहीं।

केवल सरकार नहीं।

केवल आर्थिक नीति नहीं।

बल्कि सामाजिक न्याय, शिक्षा, संस्कृति, विचार, नैतिकता और सत्ता-विकेंद्रीकरण भी।

लेकिन इसकी सीमा भी यही थी।

इतना व्यापक कार्यक्रम प्रेरक तो था, पर उसे एक सुस्पष्ट प्रशासनिक और संस्थागत संरचना में बदलना कठिन था।

जनता पार्टी सरकार इस वैचारिक कार्यक्रम को लागू नहीं कर सकी।

इसलिए “संपूर्ण क्रांति” इतिहास में पूर्ण राजनीतिक व्यवस्था के रूप में नहीं, बल्कि नैतिक-राजनीतिक आदर्श के रूप में अधिक प्रभावशाली रही।

जेपी आंदोलन की सबसे ठोस उपलब्धि क्या थी?

सबसे ठोस उपलब्धि थी—भारतीय लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन की वास्तविक संभावना स्थापित करना।

1967 ने राज्यों में कांग्रेस को हराना संभव बनाया था।

1977 ने केंद्र में भी यह साबित कर दिया।

यह परिवर्तन केवल चुनावी गणित से नहीं आया। जयप्रकाश ने विभिन्न विपक्षी दलों को एक मंच दिया और जनता को यह विश्वास दिलाया कि मौजूदा सरकार का विकल्प उपलब्ध है।

भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में यह अत्यंत महत्वपूर्ण क्षण था।

किसी भी लोकतंत्र की मजबूती केवल चुनाव कराने में नहीं, बल्कि वास्तविक सत्ता परिवर्तन संभव होने में होती है।

1977 ने यह कसौटी पूरी की।

आपातकाल के विरुद्ध उनका स्थान

जयप्रकाश नारायण को भारतीय इतिहास में सबसे अधिक जिस संदर्भ में याद किया जाएगा, वह आपातकाल है।

वे आपातकाल के पहले से सत्ता के केंद्रीकरण और भ्रष्टाचार की आलोचना कर रहे थे।

25–26 जून 1975 की रात उन्हें गिरफ्तार किया गया।

उनका स्वास्थ्य हिरासत के दौरान गंभीर रूप से बिगड़ा।

लेकिन उनकी गिरफ्तारी ने उनके आंदोलन की नैतिक शक्ति को समाप्त नहीं किया।

उलटे वे नागरिक स्वतंत्रताओं और लोकतंत्र की बहाली के प्रतीक बन गए।

यही कारण है कि आपातकाल की ऐतिहासिक स्मृति में उनका नाम किसी विपक्षी दल के नेता की तरह नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रतिरोध के केंद्रीय चेहरे के रूप में दर्ज है।

क्या जेपी निर्वाचित सरकार को गिराना चाहते थे?

यह उनके मूल्यांकन का सबसे विवादास्पद प्रश्न है।

उन्होंने बिहार विधानसभा भंग करने की मांग की।

विधायकों से इस्तीफे की अपील की।

सरकारी तंत्र पर जनदबाव बनाने की रणनीति अपनाई।

इसलिए आलोचक कहते हैं कि उनका आंदोलन संसदीय लोकतंत्र की सीमाओं को धक्का दे रहा था।

यह आलोचना पूरी तरह खारिज नहीं की जानी चाहिए।

लोकतंत्र में निर्वाचित सरकार को सड़क के दबाव से हटाने की परंपरा खतरनाक हो सकती है।

लेकिन दूसरी ओर जयप्रकाश ने सैन्य तख्तापलट, हिंसक क्रांति या संविधान समाप्त करने की वकालत नहीं की।

आखिरकार उन्होंने चुनाव और जनता के मत को निर्णायक माना।

इसलिए उनका संघर्ष संसदीय लोकतंत्र का अंत करने की दिशा में नहीं गया; वह लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर जनता की भूमिका बढ़ाने की कोशिश था, भले ही उसकी कुछ पद्धतियां विवादास्पद रहीं।

सेना और पुलिस के बारे में उनका विवादित आह्वान

25 जून 1975 की सभा में पुलिस और सशस्त्र बलों से “अवैध आदेश” न मानने की अपील उनके जीवन के सबसे विवादित वक्तव्यों में रही।

सरकार ने इसे अनुशासन भंग कराने का प्रयास बताया।

उनके समर्थकों ने इसे कानून और संविधान के प्रति सर्वोच्च निष्ठा की अपील माना।

इतिहास में इस घटना को बढ़ा-चढ़ाकर “विद्रोह का आह्वान” कहना भी गलत होगा, और इसे बिल्कुल महत्वहीन मानना भी।

यह उस तनाव का प्रतीक था जहां जनआंदोलन और संवैधानिक राज्य आमने-सामने पहुंच चुके थे।

जनता पार्टी की विफलता — जेपी की भी विफलता?

आंशिक रूप से, लेकिन पूरी तरह नहीं।

जनता पार्टी को एकजुट करने में जयप्रकाश की भूमिका निर्णायक थी।

इसलिए उसकी विफलता से उन्हें अलग नहीं किया जा सकता।

उन्होंने बहुत भिन्न विचारधाराओं को इस विश्वास से साथ लाया कि लोकतंत्र बचाने का साझा उद्देश्य स्थायी राजनीतिक एकता में बदल सकता है।

यह आकलन अंततः सही सिद्ध नहीं हुआ।

जनता पार्टी दो वर्षों में नेतृत्व संघर्ष, दोहरी सदस्यता विवाद और पुराने गुटों में टूट गई।

लेकिन जनता पार्टी का विफल होना 1977 के लोकतांत्रिक सत्ता परिवर्तन को विफल नहीं करता।

एक सरकार असफल हुई।

लेकिन व्यवस्था ने साबित किया कि वह शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन कर सकती है।

यही जयप्रकाश की स्थायी उपलब्धि है।

भ्रष्टाचार-विरोध की विरासत

1974 में जयप्रकाश ने भ्रष्टाचार को व्यवस्था की समस्या बताया था।

आज भी भारतीय राजनीति में भ्रष्टाचार सबसे प्रभावी राजनीतिक मुद्दों में से एक है।

लगभग हर बड़ी भ्रष्टाचार-विरोधी लहर में जयप्रकाश आंदोलन की तुलना सामने आती है।

लेकिन उनकी चिंता केवल घोटाले पकड़ना नहीं थी।

वे राजनीति की ऐसी संस्कृति चाहते थे जिसमें सत्ता को निजी लाभ का साधन न माना जाए।

इस कसौटी पर उनका सपना आज भी अधूरा है।

सामाजिक न्याय की दिशा

जेपी आंदोलन से निकली राजनीतिक पीढ़ी ने आगे उत्तर भारत में सत्ता के सामाजिक आधार को बदलने में भूमिका निभाई।

पिछड़े वर्गों, दलितों और ग्रामीण समूहों की राजनीतिक भागीदारी बढ़ी।

यह लोकतांत्रिक विस्तार उनके सामाजिक न्याय के आदर्श से कुछ हद तक मेल खाता है।

लेकिन जयप्रकाश जाति आधारित स्थायी राजनीतिक विभाजन के समर्थक नहीं थे।

वे सामाजिक असमानता समाप्त करना चाहते थे, नई जातीय सत्ता-संरचना स्थापित करना नहीं।

इसलिए आज की सामाजिक न्याय राजनीति का एक हिस्सा उनकी विरासत का विस्तार है, तो दूसरा हिस्सा उनके मूल आदर्श से अलग भी है।

लोकशक्ति का सबसे बड़ा संदेश

जयप्रकाश नारायण की पूरी राजनीति का सबसे स्थायी शब्द संभवतः “लोकशक्ति” है।

राज्य शक्तिशाली हो सकता है।

सरकार के पास बहुमत हो सकता है।

प्रधानमंत्री अत्यंत लोकप्रिय हो सकता है।

लेकिन लोकतंत्र में अंतिम सार्वभौम शक्ति जनता है।

यह बात साधारण लगती है, लेकिन 1975–77 के संदर्भ में इसका अर्थ असाधारण था।

आपातकाल के दौरान राज्य की शक्ति अपने चरम पर थी।

1977 के चुनाव ने दिखाया कि अंततः वही राज्य जनता के निर्णय के सामने झुक सकता है।

यही लोकशक्ति का सबसे ठोस प्रमाण बना।

“जननायक” शब्द का वास्तविक अर्थ

जयप्रकाश को “लोकनायक” या “जननायक” कहे जाने का अर्थ केवल लोकप्रिय नेता होना नहीं है।

उनकी लोकप्रियता जीवनभर समान नहीं रही।

वे लंबे समय तक दलगत राजनीति से बाहर थे।

उनके पास कोई विशाल स्थायी पार्टी संगठन भी नहीं था।

फिर भी संकट के समय जनता के विभिन्न हिस्सों ने उन पर विश्वास किया।

इसलिए “जननायक” की उपाधि उनके लिए चार कारणों से सार्थक प्रतीत होती है—

उन्होंने सत्ता नहीं मांगी।

उन्होंने जनता को राजनीतिक परिवर्तन की शक्ति माना।

उन्होंने सार्वजनिक जीवन में नैतिकता का प्रश्न उठाया।

और उन्होंने अपने विचारों की समीक्षा करते रहने का साहस दिखाया।

उनके जीवन की सबसे बड़ी विडंबना

जयप्रकाश का सपना था सत्ता का विकेंद्रीकरण।

लेकिन उनके आंदोलन के आसपास स्वयं उनका नैतिक व्यक्तित्व अत्यंत केंद्रीकृत हो गया।

वे दलविहीन राजनीति की कल्पना करते थे।

लेकिन लोकतंत्र बचाने के लिए अंततः राजनीतिक दलों के विलय को आगे बढ़ाना पड़ा।

वे सरकार परिवर्तन से आगे व्यवस्था परिवर्तन चाहते थे।

लेकिन उनकी सबसे दिखाई देने वाली सफलता सरकार परिवर्तन रही।

वे जनता पार्टी से नई राजनीतिक संस्कृति चाहते थे।

वही पार्टी पुरानी राजनीतिक बीमारियों से टूट गई।

इन विरोधाभासों से उनकी महानता कम नहीं होती।

बल्कि वे यह दिखाते हैं कि आदर्श और वास्तविक राजनीति के बीच दूरी कितनी कठिन होती है।

भारतीय इतिहास में उनका स्थान कहां है?

जयप्रकाश नारायण को गांधी, नेहरू, पटेल या सुभाष चंद्र बोस की तरह स्वतंत्र भारत की राज्य संरचना बनाने वाले नेता के रूप में नहीं रखा जा सकता।

वे नेहरू की तरह संस्थान निर्माता प्रधानमंत्री नहीं थे।

पटेल की तरह रियासतों के एकीकरण के प्रशासक नहीं।

अंबेडकर की तरह संविधान निर्माण के केंद्रीय शिल्पी नहीं।

लोहिया की तरह निरंतर चुनावी विपक्षी राजनीति के सिद्धांतकार भी नहीं।

उनका स्थान अलग है।

वे भारतीय इतिहास में सत्ता के विरुद्ध लोकतांत्रिक नैतिक प्रतिरोध के सबसे बड़े प्रतीकों में से एक हैं।

उनकी ऐतिहासिक भूमिका संकट के समय सबसे अधिक दिखाई देती है।

जब सत्ता और जनता के बीच दूरी बढ़ी, तब वे जनता की तरफ खड़े हुए।

उन्हें किसी एक राजनीतिक खेमे में रखना क्यों गलत होगा?

आज भाजपा, समाजवादी धाराएं, जनता परिवार और अनेक अन्य राजनीतिक समूह जयप्रकाश की विरासत से अपना संबंध बताते हैं।

इसका कुछ ऐतिहासिक आधार सभी के पास है।

जनसंघ उनके आंदोलन में था।

समाजवादी उनकी पुरानी राजनीतिक धारा थे।

बिहार की नई राजनीतिक पीढ़ी उनके आंदोलन से निकली।

लेकिन जयप्रकाश स्वयं इन सभी से बड़े थे।

उनकी विरासत को किसी एक दल का निजी स्वामित्व मानना उनके राजनीतिक जीवन की मूल प्रकृति के विपरीत होगा।

वे स्वयं सत्ता और दल की सीमाओं से बाहर निकलने की कोशिश करते रहे।

इसलिए उनकी विरासत का वास्तविक उत्तराधिकारी कोई दल नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक आचरण है।

उनकी कसौटी आज भी सरल है

किसी नेता या दल को जयप्रकाश की विरासत पर दावा करना हो तो उसे कुछ सरल प्रश्नों का उत्तर देना होगा—

क्या वह सत्ता के केंद्रीकरण को सीमित करता है?

क्या वह असहमति का सम्मान करता है?

क्या वह भ्रष्टाचार के विरुद्ध अपने लोगों पर भी समान कसौटी लागू करता है?

क्या उसके भीतर लोकतंत्र है?

क्या वह स्थानीय संस्थाओं को वास्तविक शक्ति देता है?

क्या चुनाव हारने पर शांतिपूर्वक सत्ता छोड़ता है?

क्या सत्ता उसके लिए लक्ष्य है या जनसेवा का साधन?

जेपी की विरासत का फैसला भाषण नहीं, इन प्रश्नों के उत्तर करेंगे।

उनका अंतिम ऐतिहासिक संदेश

जयप्रकाश नारायण का जीवन यह नहीं सिखाता कि हर जनआंदोलन सही होता है।

यह भी नहीं कि निर्वाचित सरकार को किसी भी समय सड़क के दबाव से हटा देना चाहिए।

और न ही यह कि नैतिक नेतृत्व अकेले संस्थागत राजनीति का विकल्प बन सकता है।

उनका जीवन इससे अधिक जटिल शिक्षा देता है।

लोकतंत्र को चुनाव चाहिए, लेकिन केवल चुनाव पर्याप्त नहीं।

उसे स्वतंत्र संस्थाएं चाहिए।

नागरिक स्वतंत्रता चाहिए।

जवाबदेह सरकार चाहिए।

सक्रिय नागरिक समाज चाहिए।

विकेंद्रित सत्ता चाहिए।

और सबसे बढ़कर ऐसा राजनीतिक संस्कार चाहिए जिसमें सरकार स्वयं को जनता से ऊपर न समझे।

यही जयप्रकाश नारायण के पूरे जीवन की सबसे स्थायी शिक्षा है।

इतिहास का फैसला

जयप्रकाश नारायण अपने सभी सपने पूरे नहीं कर सके।

“संपूर्ण क्रांति” पूर्ण नहीं हुई।

जनता पार्टी टूट गई।

राजनीति से भ्रष्टाचार समाप्त नहीं हुआ।

दल-बदल खत्म नहीं हुआ।

सत्ता का केंद्रीकरण भी समाप्त नहीं हुआ।

लेकिन इतिहास केवल उन लक्ष्यों से नेताओं को नहीं मापता जिन्हें वे पूरा कर पाए।

इतिहास यह भी देखता है कि उन्होंने अपने समय के सामने कौन-से प्रश्न खड़े किए।

जयप्रकाश ने भारतीय लोकतंत्र के सामने एक स्थायी प्रश्न रखा—

क्या जनता केवल शासक चुनती है, या सत्ता को नियंत्रित करने वाली अंतिम शक्ति भी वही है?

1977 में भारतीय मतदाता ने इसका उत्तर दिया।

और शायद इसी कारण जयप्रकाश नारायण का सबसे सही ऐतिहासिक परिचय किसी पद से नहीं, उसी नाम से होता है जो जनता ने उन्हें दिया—

जननायक।