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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण

जयप्रकाश नारायण की मृत्यु 8 अक्टूबर 1979 को हुई, लेकिन उनका नाम भारतीय राजनीति से कभी गायब नहीं हुआ। उलटे समय बीतने के साथ उनकी विरासत पर दावा करने वालों की संख्या बढ़ती गई। समाजवादी दल उन्हें अपना वैचारिक पूर्वज बताते हैं, बिहार की राजनीति में लगभग हर गैर-कांग्रेसी धारा उनसे किसी न किसी रूप में अपना संबंध जोड़ती है, भारतीय जनता पार्टी आपातकाल-विरोध और लोकतंत्र रक्षा के उनके संघर्ष को रेखांकित करती है, और राष्ट्रीय राजनीति में भी “संपूर्ण क्रांति”, भ्रष्टाचार-विरोध तथा लोकशक्ति जैसे उनके विचार बार-बार उद्धृत होते हैं।

2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जयप्रकाश नारायण को श्रद्धांजलि देते हुए उन्हें लोकतंत्र और सामाजिक न्याय की निर्भीक आवाज तथा सामान्य नागरिकों को सशक्त करने वाला नेता बताया। उसी वर्ष उपराष्ट्रपति ने सिताबदियारा में उन्हें ऐसे नेता के रूप में याद किया जिसने सत्ता से ऊपर मूल्यों और “राजशक्ति” से ऊपर “लोकशक्ति” को रखा। इससे स्पष्ट है कि चार दशक से अधिक समय बाद भी जेपी की विरासत राष्ट्रीय राजनीतिक स्मृति में सक्रिय है।

लेकिन यहां सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि जेपी का नाम कौन लेता है।

अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न है—

आज की राजनीति में जयप्रकाश नारायण के मूल आदर्श कितने बचे हैं?

जेपी आंदोलन से निकली पूरी राजनीतिक पीढ़ी

1974 का बिहार आंदोलन केवल एक आंदोलन नहीं था; उसने बिहार और उत्तर भारत की राजनीति की एक पूरी नई पीढ़ी तैयार की।

उस आंदोलन से जुड़े छात्र नेताओं में आगे चलकर अनेक ऐसे नाम सामने आए जिन्होंने बिहार और राष्ट्रीय राजनीति को दशकों तक प्रभावित किया।

लालू प्रसाद यादव छात्र राजनीति से उभरे और बाद में बिहार के मुख्यमंत्री तथा केंद्रीय मंत्री बने।

नीतीश कुमार समाजवादी और जेपी आंदोलन की धारा से आगे बढ़े और लंबे समय तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे। 2026 में वे मुख्यमंत्री पद छोड़कर राज्यसभा में चले गए, लेकिन बिहार की राजनीति पर उनका प्रभाव अब भी महत्वपूर्ण है।

सुशील कुमार मोदी जेपी आंदोलन से निकली उस धारा के प्रमुख नेता बने जो आगे भारतीय जनता पार्टी में गई।

रामविलास पासवान भी इसी व्यापक गैर-कांग्रेसी सामाजिक-राजनीतिक वातावरण से उभरे और आगे राष्ट्रीय राजनीति के प्रमुख नेताओं में शामिल हुए।

इस तरह एक ही आंदोलन से निकले नेता आगे जाकर अलग-अलग और कई बार परस्पर विरोधी राजनीतिक धाराओं के प्रतिनिधि बने।

यही जेपी आंदोलन की सबसे रोचक विरासतों में एक है।

उसने कोई स्थायी राजनीतिक पार्टी नहीं बनाई।

उसने राजनीतिक नेतृत्व की एक पीढ़ी पैदा की।

लालू प्रसाद यादव — सामाजिक न्याय और जेपी की विरासत

लालू प्रसाद यादव 1974 के आंदोलन में छात्र नेता के रूप में सक्रिय थे और बिहार की छात्र राजनीति के महत्वपूर्ण चेहरों में थे।

आगे उनकी राजनीति “सामाजिक न्याय”, पिछड़े वर्गों की राजनीतिक भागीदारी और कांग्रेस-विरोधी समाजवादी परंपरा पर आधारित हुई।

उन्होंने लंबे समय तक स्वयं को जेपी, लोहिया और कर्पूरी ठाकुर की राजनीति का उत्तराधिकारी बताया।

राजनीतिक अध्ययन यह भी रेखांकित करते हैं कि लालू प्रसाद ने अपने सार्वजनिक राजनीतिक भाषणों में जेपी आंदोलन और गरीब तथा वंचित समाज के सशक्तिकरण की भाषा का लगातार उपयोग किया।

लेकिन यहीं जेपी की विरासत का पहला विरोधाभास सामने आता है।

जयप्रकाश की राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण तत्व था—भ्रष्टाचार-विरोध और सार्वजनिक जीवन की नैतिकता।

लालू प्रसाद की राजनीतिक यात्रा बाद के वर्षों में गंभीर भ्रष्टाचार मामलों और न्यायिक विवादों से भी जुड़ी।

इसलिए केवल आंदोलन में भागीदारी किसी नेता को स्वतः जेपी की संपूर्ण राजनीतिक विरासत का प्रतिनिधि नहीं बना देती।

जेपी की विरासत की कसौटी केवल यह नहीं हो सकती कि कौन 1974 के आंदोलन में था।

कसौटी यह भी है कि उसने बाद में सत्ता का उपयोग किस प्रकार किया।

नीतीश कुमार — जेपी, लोहिया और शासन की राजनीति

नीतीश कुमार भी उस पीढ़ी से आते हैं जिसकी राजनीतिक चेतना जेपी आंदोलन और समाजवादी राजनीति में विकसित हुई।

उनकी राजनीति ने लंबे समय तक सुशासन, प्रशासनिक सुधार, सामाजिक प्रतिनिधित्व, महिला भागीदारी और आधारभूत संरचना जैसे प्रश्नों पर जोर दिया।

इस अर्थ में उनके समर्थक उन्हें जेपी की कुछ मूल चिंताओं—जवाबदेह शासन और सामाजिक भागीदारी—से जोड़ते हैं।

लेकिन उनकी लंबी राजनीतिक यात्रा गठबंधन बदलने और अलग-अलग राष्ट्रीय राजनीतिक शक्तियों के साथ जाने के कारण आलोचना का विषय भी रही।

यहीं फिर जेपी का प्रश्न सामने आता है—

क्या राजनीति केवल सत्ता-समीकरणों का प्रबंधन है या मूल्यों पर आधारित दीर्घकालीन प्रतिबद्धता?

जेपी की राजनीतिक कसौटी पर किसी भी नेता का मूल्यांकन इसी प्रश्न से करना होगा।

भारतीय जनता पार्टी और जेपी की लोकतांत्रिक विरासत

भारतीय जनता पार्टी का ऐतिहासिक संबंध जनता पार्टी के पूर्व जनसंघ घटक से आता है।

भारतीय जनसंघ 1974–77 के आंदोलन में जयप्रकाश नारायण के साथ था।

आपातकाल में उसके अनेक नेता गिरफ्तार हुए।

1977 में वह जनता पार्टी में विलीन हुआ।

जनता पार्टी टूटने के बाद 1980 में भारतीय जनता पार्टी अस्तित्व में आई।

इसलिए भाजपा स्वयं को आपातकाल-विरोधी लोकतांत्रिक संघर्ष की विरासत से जोड़ती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा जयप्रकाश की “प्रिजन डायरी” के पृष्ठ साझा करना और उन्हें लोकतंत्र तथा संवैधानिक मूल्यों का रक्षक बताना इसी राजनीतिक स्मृति का हिस्सा है।

लेकिन जेपी की विरासत की कसौटी यहां भी केवल आपातकाल-विरोध नहीं हो सकती।

जयप्रकाश सत्ता के केंद्रीकरण के आलोचक थे।

वे राजनीतिक दलों के भीतर भी लोकतंत्र चाहते थे।

वे सत्ता को समाज और स्थानीय समुदायों तक बांटने के समर्थक थे।

इसलिए किसी भी वर्तमान सत्तारूढ़ दल को यदि जेपी की विरासत का दावा करना है तो प्रश्न केवल यह नहीं होगा कि उसने आपातकाल का विरोध किया था।

प्रश्न यह भी होगा—

आज उसके भीतर सत्ता कितनी विकेंद्रित है?

आंतरिक लोकतंत्र कितना है?

विरोध और असहमति के प्रति उसका व्यवहार कैसा है?

यही जेपी की कसौटी होगी।

समाजवादी दलों का सबसे सीधा दावा

राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल (यूनाइटेड), समाजवादी परंपरा के दूसरे दल और पुराने जनता परिवार की विभिन्न शाखाएं जयप्रकाश की विरासत पर सबसे प्रत्यक्ष दावा करती रही हैं।

इसका ऐतिहासिक आधार भी है।

इनमें से अनेक नेताओं की राजनीतिक उत्पत्ति प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जेपी आंदोलन और लोहियावादी समाजवादी धारा से हुई।

लेकिन जनता परिवार का इतिहास स्वयं विभाजनों का इतिहास है।

जनता पार्टी।

जनता दल।

फिर जनता दल से अलग-अलग दल।

राष्ट्रीय जनता दल।

जनता दल (यूनाइटेड)।

समाजवादी पार्टी।

लोक जनशक्ति की अलग-अलग धाराएं।

अर्थात जिस आंदोलन ने विपक्षी एकता की ऐतिहासिक मिसाल बनाई, उसकी राजनीतिक संतति लगातार विभाजित होती रही।

यह भी जयप्रकाश की विरासत का बड़ा विरोधाभास है।

जेपी की तस्वीर सबके पास, लेकिन राजनीति किसके पास?

आज जयप्रकाश की जयंती पर लगभग सभी राजनीतिक दल श्रद्धांजलि देते हैं।

उनकी मूर्तियों पर माल्यार्पण होता है।

“लोकनायक” कहा जाता है।

“संपूर्ण क्रांति” उद्धृत की जाती है।

लेकिन जेपी की राजनीति को यदि कुछ मूल कसौटियों में बांटें तो तस्वीर कठिन हो जाती है।

उनकी मुख्य कसौटियां थीं—

भ्रष्टाचार-विरोध,

सत्ता से अनासक्ति,

लोकतांत्रिक स्वतंत्रता,

राजनीतिक दलों की जवाबदेही,

सत्ता का विकेंद्रीकरण,

सामाजिक न्याय,

अहिंसक जनभागीदारी,

और सार्वजनिक जीवन में नैतिकता।

इनमें से किसी भी कसौटी को आज किसी एक पार्टी की निजी संपत्ति नहीं कहा जा सकता।

कई दल इनमें से कुछ मूल्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं और उन्हीं दलों के व्यवहार में दूसरे मूल्यों से विचलन भी दिखाई देता है।

इसलिए जयप्रकाश की विरासत किसी पार्टी की विरासत कम और लोकतांत्रिक कसौटी अधिक है।

भ्रष्टाचार — क्या जेपी का सबसे बड़ा प्रश्न हल हुआ?

उत्तर स्पष्ट है—नहीं।

1974 में बिहार आंदोलन की मुख्य ऊर्जा भ्रष्टाचार-विरोध से आई थी।

आज भारत में संस्थागत पारदर्शिता, डिजिटल भुगतान, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण और कई प्रशासनिक सुधारों ने भ्रष्टाचार के कुछ पुराने रूपों को कम किया है।

सूचना का अधिकार, न्यायिक सक्रियता, चुनाव आयोग, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक और डिजिटल शासन जैसी व्यवस्थाओं ने सार्वजनिक निगरानी के साधन भी बढ़ाए हैं।

लेकिन राजनीति में धन का प्रभाव समाप्त नहीं हुआ।

चुनावी खर्च बढ़ा है।

दल वित्तपोषण पर बहस जारी है।

भ्रष्टाचार के आरोप राजनीति का स्थायी हिस्सा हैं।

और लगभग हर दल विपक्ष में रहते हुए भ्रष्टाचार को बड़ा प्रश्न बनाता है, लेकिन सत्ता में आने पर वही कसौटी बनाए रखना अधिक कठिन सिद्ध होता है।

इस दृष्टि से जेपी का भ्रष्टाचार-विरोधी कार्यक्रम आज भी अधूरा है।

सत्ता का विकेंद्रीकरण — कुछ प्रगति, लेकिन लंबा रास्ता

जयप्रकाश ग्राम स्तर तक सत्ता पहुंचाना चाहते थे।

इस क्षेत्र में स्वतंत्र भारत ने बाद में महत्वपूर्ण कदम उठाए।

73वें और 74वें संविधान संशोधनों ने पंचायतों और नगर निकायों को संवैधानिक आधार दिया।

महिलाओं और अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए स्थानीय निकायों में आरक्षण ने राजनीतिक प्रतिनिधित्व का सामाजिक आधार बढ़ाया।

यह विकास जयप्रकाश की विकेंद्रीकृत लोकतंत्र की कल्पना से पूरी तरह समान नहीं है, लेकिन उसकी दिशा से कुछ मेल अवश्य रखता है।

फिर भी वास्तविक वित्तीय और प्रशासनिक शक्ति आज भी बड़े पैमाने पर केंद्र और राज्य सरकारों के हाथ में रहती है।

अनेक पंचायतें और नगर निकाय वित्तीय रूप से उच्च सरकारों पर निर्भर हैं।

इसलिए ग्राम स्वराज और वास्तविक स्थानीय स्वायत्तता का जेपी का सपना आंशिक रूप से ही पूरा हुआ है।

सामाजिक न्याय — शायद सबसे बड़ा परिवर्तन

जयप्रकाश नारायण जिस भारत को 1950 और 1970 के दशक में देख रहे थे, उसकी तुलना में आज सामाजिक प्रतिनिधित्व का ढांचा बहुत बदला है।

पिछड़े वर्गों, दलितों और अन्य वंचित समुदायों की राजनीतिक भागीदारी कई गुना बढ़ी।

विशेषकर बिहार और उत्तर भारत में सत्ता का सामाजिक आधार बदला।

वे समुदाय जो लंबे समय तक राजनीतिक निर्णय प्रक्रिया के किनारे थे, मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद और विधायक बने।

जेपी आंदोलन से निकली समाजवादी राजनीति ने इस परिवर्तन में भूमिका निभाई।

इस अर्थ में भारतीय राजनीति उनके सामाजिक परिवर्तन के लक्ष्य के कुछ हिस्से के निकट आई।

लेकिन जाति समाप्त नहीं हुई।

बल्कि कई स्थानों पर जाति स्वयं चुनावी राजनीतिक संगठन का मुख्य आधार बन गई।

यह जेपी की कल्पना से भिन्न था।

वे सामाजिक न्याय चाहते थे, लेकिन स्थायी जातीय खेमेबंदी नहीं।

युवा राजनीति — जेपी का सबसे बड़ा विश्वास

जयप्रकाश को विश्वास था कि युवाओं में व्यवस्था बदलने की शक्ति होती है।

1974 का आंदोलन इसका प्रमाण था।

आज भारत की जनसंख्या में युवाओं का बड़ा हिस्सा है और सोशल मीडिया, विश्वविद्यालय, नागरिक अभियानों तथा चुनावी राजनीति के माध्यम से उनकी आवाज अधिक दृश्यमान है।

लेकिन छात्र राजनीति का स्वरूप बदल चुका है।

कई छात्र संगठन सीधे राष्ट्रीय दलों से जुड़े हैं।

स्वतंत्र छात्र आंदोलन अपेक्षाकृत कम दिखाई देते हैं।

राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ा है।

इसलिए जेपी की कल्पना का वह स्वायत्त युवा नागरिक आंदोलन, जो राजनीतिक दलों को भी चुनौती दे सके, आज उतना सशक्त दिखाई नहीं देता।

लोकशक्ति बनाम राजशक्ति — आज भी सबसे प्रासंगिक सवाल

2025 में उपराष्ट्रपति ने जयप्रकाश को याद करते हुए विशेष रूप से उनके उस विचार का उल्लेख किया कि वे “लोकशक्ति” को “राजशक्ति” से ऊपर रखते थे।

यही विचार आज भी शायद उनकी सबसे प्रासंगिक विरासत है।

आधुनिक राज्य 1970 के दशक की तुलना में कहीं अधिक शक्तिशाली है।

डिजिटल प्रशासन।

विशाल कल्याणकारी योजनाएं।

केंद्रीकृत आंकड़ा व्यवस्था।

तकनीकी निगरानी।

राष्ट्रीय सुरक्षा संरचना।

मीडिया और संचार का तेज विस्तार।

इन सबने राज्य की क्षमता बढ़ाई है।

इसीलिए नागरिक स्वतंत्रता, निजता, विरोध का अधिकार, स्वतंत्र संस्थाएं और विकेंद्रीकरण जैसे प्रश्न और महत्वपूर्ण हो गए हैं।

जेपी की चेतावनी यह थी कि शक्तिशाली राज्य तभी लोकतांत्रिक रह सकता है जब उसके सामने शक्तिशाली नागरिक समाज भी हो।

क्या आज कोई एक नेता जेपी का उत्तराधिकारी है?

ऐतिहासिक रूप से इसका उत्तर—नहीं।

लालू प्रसाद जेपी आंदोलन से आए, लेकिन उनकी राजनीति अलग दिशा में गई।

नीतीश कुमार उसी आंदोलन की पीढ़ी के हैं, लेकिन उनकी राजनीतिक शैली अलग है।

भाजपा आपातकाल-विरोध की विरासत का दावा करती है।

समाजवादी दल सामाजिक न्याय की विरासत का।

नागरिक अधिकार समूह लोकतांत्रिक स्वतंत्रता की विरासत का।

भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलनों ने “व्यवस्था परिवर्तन” की उनकी भाषा का उपयोग किया।

इसलिए जेपी का कोई एक राजनीतिक उत्तराधिकारी नहीं है।

उनकी विरासत कई धाराओं में बंट गई।

शायद यही स्वाभाविक भी था, क्योंकि जयप्रकाश स्वयं अंततः किसी एक दल की राजनीति से बड़े हो चुके थे।

2011 का भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन और जेपी की स्मृति

अन्ना हजारे के नेतृत्व में 2011 का भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन जब दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में फैला तो उसकी तुलना बार-बार जेपी आंदोलन से की गई।

दोनों में कुछ समानताएं थीं—

भ्रष्टाचार केंद्रीय मुद्दा।

दलीय राजनीति से दूरी का दावा।

मध्यवर्ग और युवाओं की बड़ी भागीदारी।

नैतिक नेतृत्व।

सड़क पर जनदबाव।

लेकिन परिणाम अलग थे।

जेपी आंदोलन ने अंततः पूरे विपक्षी राजनीतिक ढांचे को पुनर्गठित किया।

2011 के आंदोलन से बाद में एक नई राजनीतिक पार्टी भी निकली, लेकिन वह जेपी की “दलविहीन लोकतंत्र” की कल्पना से भिन्न राजनीतिक रास्ता था।

यह उदाहरण बताता है कि जयप्रकाश की राजनीतिक पद्धति आज भी आंदोलनों की तुलना का मानक बनी हुई है।

सबसे बड़ी विडंबना — जेपी के नाम पर सत्ता

जयप्रकाश स्वयं जीवन के बड़े हिस्से में सत्ता से दूर रहे।

आज उनकी राजनीतिक विरासत का दावा करने वाले लगभग सभी नेता और दल सत्ता प्राप्त करने की नियमित चुनावी राजनीति करते हैं।

इसमें कोई लोकतांत्रिक दोष नहीं है।

लोकतंत्र में दलों का उद्देश्य चुनाव जीतना और सरकार बनाना स्वाभाविक है।

लेकिन जयप्रकाश का प्रश्न अलग था—

सत्ता मिलने के बाद आप उसके साथ क्या करते हैं?

क्या सत्ता सेवा का माध्यम रहती है?

या स्वयं लक्ष्य बन जाती है?

यही प्रश्न उन्होंने कांग्रेस से पूछा था।

यही प्रश्न जनता पार्टी से पूछा।

और यही प्रश्न उनकी विरासत आज प्रत्येक राजनीतिक दल से पूछती है।

वर्तमान राजनीति जेपी के कितनी निकट है?

उत्तर मिश्रित है।

भारत में नियमित चुनाव होते हैं।

केंद्र और राज्यों में शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन होता है।

विपक्षी दल सरकारें बनाते हैं।

न्यायपालिका, चुनाव आयोग, संसद, मीडिया और नागरिक समाज मौजूद हैं।

पंचायती राज ने स्थानीय प्रतिनिधित्व बढ़ाया है।

सामाजिक रूप से वंचित समूहों की राजनीतिक भागीदारी पहले की तुलना में बहुत अधिक है।

इन अर्थों में भारतीय लोकतंत्र ने महत्वपूर्ण प्रगति की है।

लेकिन दूसरी ओर—

राजनीतिक दलों में नेतृत्व का केंद्रीकरण,

वंशवादी राजनीति,

चुनावी धन,

भ्रष्टाचार के आरोप,

दल-बदल,

आंतरिक लोकतंत्र की कमी,

राजनीतिक ध्रुवीकरण,

और सत्ता के अत्यधिक व्यक्तिकेंद्रित होने की शिकायतें लगातार मौजूद हैं।

इन कसौटियों पर जेपी की “संपूर्ण क्रांति” अभी दूर दिखाई देती है।

दल-बदल — वह समस्या जो जेपी के बाद भी खत्म नहीं हुई

1967–74 के अध्याय में हमने देखा कि दल-बदल ने सरकारों को अस्थिर कर दिया था।

1985 में दल-बदल विरोधी कानून आया।

लेकिन समस्या समाप्त नहीं हुई।

अब व्यक्तिगत विधायक का बार-बार पार्टी बदलना कठिन है, लेकिन सामूहिक टूट, इस्तीफे, उपचुनाव और विधानमंडलीय समूहों के पुनर्गठन जैसे नए रास्ते सामने आए।

अर्थात कानून ने समस्या का स्वरूप बदला, उसे पूरी तरह समाप्त नहीं किया।

यह भी जेपी की मूल चिंता को जीवित रखता है—

क्या निर्वाचित प्रतिनिधि मतदाता के जनादेश के प्रति उत्तरदायी है या सत्ता-समीकरण के प्रति?

राजनीति का नैतिक प्रश्न आज भी अनुत्तरित

जेपी की शायद सबसे कठिन मांग थी—नैतिक राजनीति।

कानून बनाया जा सकता है।

संस्था बनाई जा सकती है।

चुनाव कराया जा सकता है।

लेकिन राजनीतिक चरित्र को कानून से पैदा नहीं किया जा सकता।

यही कारण है कि उनकी “नैतिक क्रांति” सबसे कठिन हिस्सा रही।

आज राजनीतिक दल एक-दूसरे पर भ्रष्टाचार, परिवारवाद, अवसरवाद और सत्ता-लालसा के आरोप लगाते हैं।

लेकिन इन समस्याओं से कोई भी राजनीतिक धारा पूरी तरह मुक्त होने का दावा आसानी से नहीं कर सकती।

इस अर्थ में जयप्रकाश की विरासत आज भी अधूरी परियोजना है।

जेपी की विरासत किसी दल का प्रमाणपत्र नहीं

यह शायद इस पूरे प्रश्न का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष है।

जयप्रकाश नारायण की तस्वीर लगाना आसान है।

उनकी जयंती मनाना आसान है।

“संपूर्ण क्रांति” कहना आसान है।

उनके आंदोलन से अपने नेता का संबंध बताना भी आसान है।

कठिन है—

सत्ता मिलने पर स्वयं को सीमित करना।

विरोधी की स्वतंत्रता की रक्षा करना।

भ्रष्टाचार के खिलाफ अपने लोगों पर भी कार्रवाई करना।

दल के भीतर लोकतंत्र रखना।

जनता को केवल मतदाता नहीं, शासन का सहभागी मानना।

सत्ता का विकेंद्रीकरण करना।

और पद से अधिक मूल्य को महत्व देना।

यही वास्तविक जेपी कसौटी है।

जननायक की विरासत आज कहां है?

वह किसी एक राजनीतिक पार्टी के कार्यालय में नहीं है।

वह उस नागरिक में है जो सरकार से सवाल पूछता है।

उस विपक्ष में है जो लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता को चुनौती देता है।

उस सरकार में है जो विरोध को देशद्रोह नहीं मानती और आलोचना सुनती है।

उस स्थानीय संस्था में है जिसे वास्तविक अधिकार मिलते हैं।

उस युवा में है जो राजनीति को केवल नौकरी या करियर नहीं बल्कि सार्वजनिक सेवा मानता है।

और उस नेता में है जो सत्ता खोने के भय से लोकतांत्रिक नियम नहीं बदलता।

यही जयप्रकाश नारायण की जीवित राजनीतिक विरासत है।

वे किसी एक दल के नेता बनकर इतिहास में नहीं बचे।

वे सत्ता को लगातार कसौटी पर कसने वाली लोकतांत्रिक चेतना के रूप में बचे।

आज उनके नाम पर राजनीति करने वाले दल कितने भी हों, अंततः प्रश्न वही है जो जयप्रकाश स्वयं सत्ता के सामने रखते—

जनता के ऊपर कौन है?

उनका उत्तर जीवनभर एक ही रहा—

कोई नहीं।