इलाहाबाद उच्च न्यायालय से आपातकाल तक
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले से आपातकाल तक — 12 जून से 25–26 जून 1975 की निर्णायक घटनाएं और जयप्रकाश नारायण की गिरफ्तारी
जून 1975 के केवल चौदह दिन भारतीय लोकतंत्र की दिशा बदलने वाले सिद्ध हुए। 12 जून को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का 1971 का रायबरेली लोकसभा चुनाव अमान्य घोषित किया। 24 जून को सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें आंशिक अंतरिम राहत दी। 25 जून की शाम जयप्रकाश नारायण ने दिल्ली के रामलीला मैदान से प्रधानमंत्री के इस्तीफे और देशव्यापी शांतिपूर्ण आंदोलन का आह्वान किया। उसी रात राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत आंतरिक आपातकाल की उद्घोषणा पर हस्ताक्षर किए और 26 जून की भोर होते-होते जयप्रकाश नारायण सहित विपक्ष के प्रमुख नेता गिरफ्तार हो चुके थे।
इन घटनाओं को अलग-अलग करके समझना संभव नहीं है। अदालत का फैसला, विपक्ष का आंदोलन, प्रधानमंत्री की राजनीतिक स्थिति, सर्वोच्च न्यायालय का आदेश और जयप्रकाश का आंदोलन—सब एक-दूसरे से जुड़ते चले गए और अंततः स्वतंत्र भारत के सबसे विवादास्पद संवैधानिक अध्यायों में से एक की शुरुआत हुई।
12 जून 1975 — वह फैसला जिसने राजनीतिक संकट को संवैधानिक संकट बना दिया
1971 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी ने उत्तर प्रदेश की रायबरेली सीट से समाजवादी नेता राज नारायण को हराया था। राज नारायण ने चुनाव परिणाम को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चुनौती दी।
उनकी चुनाव याचिका में अनेक आरोप लगाए गए थे। न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हा ने अधिकांश आरोप अस्वीकार कर दिए, लेकिन दो मामलों में इंदिरा गांधी को जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 123(7) के अंतर्गत भ्रष्ट चुनावी आचरण का दोषी माना।
पहला मामला यशपाल कपूर से संबंधित था। वे प्रधानमंत्री सचिवालय में राजपत्रित अधिकारी थे। उच्च न्यायालय ने माना कि सरकारी सेवा से उनका त्यागपत्र प्रभावी होने से पहले ही उनकी सेवाएं इंदिरा गांधी के चुनाव अभियान में ली गईं।
दूसरा मामला उत्तर प्रदेश सरकार के अधिकारियों की सहायता से संबंधित था। न्यायालय ने पाया कि रायबरेली में चुनावी सभाओं के लिए मंच बनवाने, बिजली और ध्वनि व्यवस्था जैसी सुविधाओं में जिला प्रशासन और सरकारी अधिकारियों की सहायता ली गई थी। बाद में सर्वोच्च न्यायालय के अंतिम निर्णय ने भी उच्च न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि के इन दोनों आधारों का विस्तार से उल्लेख किया।
12 जून को न्यायमूर्ति सिन्हा ने इंदिरा गांधी का रायबरेली निर्वाचन अमान्य घोषित कर दिया और छह वर्ष की चुनावी अयोग्यता का आदेश दिया। हालांकि तत्काल अपील का अवसर उपलब्ध कराने के लिए आदेश के प्रभाव पर सीमित अवधि की रोक भी दी गई।
यहीं से प्रश्न केवल रायबरेली सीट का नहीं रहा।
देश की मौजूदा प्रधानमंत्री का अपना लोकसभा चुनाव अदालत ने निरस्त कर दिया था।
क्या फैसले का अर्थ था कि इंदिरा गांधी उसी क्षण प्रधानमंत्री नहीं रहीं?
नहीं। इस तथ्य को स्पष्ट रखना आवश्यक है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय उनके निर्वाचन और चुनावी अयोग्यता से संबंधित था। प्रधानमंत्री पद से तत्काल हटाने का कोई अलग न्यायिक आदेश नहीं था। इसके अलावा उच्च न्यायालय ने अपने आदेश के प्रभाव को अपील के लिए कुछ समय तक स्थगित रखा था।
लेकिन राजनीतिक समस्या गंभीर थी।
विपक्ष का तर्क था कि जिस प्रधानमंत्री का चुनाव भ्रष्ट आचरण के आधार पर अमान्य हो गया है, उसे नैतिक आधार पर पद छोड़ देना चाहिए और अपील का फैसला आने तक किसी अन्य नेता को प्रधानमंत्री बनाया जाना चाहिए।
इंदिरा गांधी ने इस्तीफा नहीं दिया।
यहीं न्यायिक विवाद एक बड़े राजनीतिक संघर्ष में बदल गया।
जयप्रकाश नारायण ने फैसले को किस रूप में देखा?
जयप्रकाश नारायण पहले से इंदिरा गांधी सरकार के विरुद्ध व्यापक आंदोलन चला रहे थे। इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला उनके लिए उस राजनीतिक तर्क की पुष्टि जैसा था जिसमें वे सत्ता की जवाबदेही और सार्वजनिक जीवन में नैतिकता की बात कर रहे थे।
जेपी और विपक्ष ने मांग की कि प्रधानमंत्री पद छोड़ें।
उनकी दलील केवल कानूनी नहीं थी।
वे इसे राजनीतिक नैतिकता का प्रश्न मान रहे थे।
उनका कहना था कि सर्वोच्च न्यायालय में अपील करना इंदिरा गांधी का कानूनी अधिकार है, लेकिन जब तक अंतिम निर्णय न हो, उन्हें प्रधानमंत्री पद से अलग हो जाना चाहिए।
कांग्रेस का जवाब था कि उच्च न्यायालय का निर्णय अंतिम नहीं है और प्रधानमंत्री को सर्वोच्च न्यायालय में अपील का पूरा अधिकार है।
इस प्रकार एक ही घटना की दो बिल्कुल अलग व्याख्याएं सामने थीं—
सरकार इसे न्यायिक प्रक्रिया का अधूरा चरण मान रही थी।
विपक्ष इसे प्रधानमंत्री की नैतिक वैधता का संकट मान रहा था।
कांग्रेस इंदिरा गांधी के पीछे खड़ी हुई
फैसले के बाद कांग्रेस नेतृत्व ने प्रधानमंत्री को इस्तीफा देने के बजाय संघर्ष जारी रखने की सलाह दी।
दिल्ली में उनके समर्थन में सभाएं आयोजित हुईं। पार्टी का संदेश था कि इंदिरा गांधी को 1971 में जनता का भारी जनादेश मिला था और एक उच्च न्यायालय के फैसले के बाद उन्हें तत्काल पद से हटने की आवश्यकता नहीं है, विशेषकर तब जबकि मामला सर्वोच्च न्यायालय जाना बाकी है।
दूसरी ओर विपक्षी दल जयप्रकाश के नेतृत्व में एकजुट होने लगे।
इस तरह अदालत के फैसले ने उन बिखरे हुए विपक्षी दलों को एक स्पष्ट और तत्काल राजनीतिक मुद्दा दे दिया जो पहले से बिहार आंदोलन और भ्रष्टाचार-विरोध के नाम पर साथ आ रहे थे।
सर्वोच्च न्यायालय में अपील
इंदिरा गांधी ने उच्च न्यायालय के फैसले के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील की।
मामला अवकाशकालीन न्यायाधीश न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर के सामने आया।
24 जून 1975 को न्यायमूर्ति कृष्ण अय्यर ने महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश दिया।
उन्होंने उच्च न्यायालय के निर्णय पर पूर्ण और बिना शर्त रोक नहीं लगाई, बल्कि सशर्त स्थगन दिया।
इस आदेश का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह था कि इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनी रह सकती थीं। उनके प्रधानमंत्री के रूप में काम करने पर कोई कानूनी रोक नहीं लगाई गई। लेकिन लोकसभा सदस्य के रूप में उनके अधिकार सीमित किए गए—वे सदन में उपस्थित रह सकती थीं और प्रधानमंत्री के रूप में बोल सकती थीं, लेकिन मतदान नहीं कर सकती थीं और सांसद के रूप में पारिश्रमिक प्राप्त करने पर भी रोक थी। सर्वोच्च न्यायालय का आदेश स्पष्ट करता है कि उनके प्रधानमंत्री पद पर बने रहने पर कोई कानूनी प्रतिबंध नहीं था।
इस आदेश ने दोनों पक्षों को कुछ दिया और कुछ नहीं दिया।
इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनी रह सकती थीं।
लेकिन उन्हें उच्च न्यायालय से पूर्ण राहत नहीं मिली थी।
विपक्ष ने इसे अपने आंदोलन को जारी रखने का आधार बनाया।
24 जून के बाद संकट कम होने के बजाय बढ़ गया
यदि सर्वोच्च न्यायालय पूर्ण स्थगन दे देता तो राजनीतिक दबाव कुछ कम हो सकता था।
यदि वह किसी प्रकार प्रधानमंत्री पद पर बने रहने पर रोक लगा देता तो स्थिति दूसरी होती।
लेकिन सशर्त आदेश के कारण एक बीच की अवस्था बनी।
कानून की दृष्टि से इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं।
राजनीति की दृष्टि से विपक्ष उन्हें पद छोड़ने के लिए मजबूर करने की तैयारी कर रहा था।
अगले ही दिन दिल्ली में विपक्ष की विशाल सभा तय थी।
25 जून 1975 — रामलीला मैदान
25 जून की शाम दिल्ली के रामलीला मैदान में विपक्ष की विशाल सभा हुई।
इस सभा का केंद्रीय चेहरा जयप्रकाश नारायण थे।
अब तक बिहार आंदोलन राष्ट्रीय आंदोलन में बदल चुका था। मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, चरण सिंह और विभिन्न विपक्षी दलों के नेता इस राजनीतिक मोर्चे से जुड़े हुए थे।
जयप्रकाश ने सभा में प्रधानमंत्री से इस्तीफा देने की मांग दोहराई।
उन्होंने घोषणा की कि संघर्ष अब आगे बढ़ेगा और 29 जून से व्यापक आंदोलन की योजना थी। समकालीन विवरणों के अनुसार विपक्ष प्रधानमंत्री के इस्तीफे के लिए अहिंसक नागरिक अवज्ञा का कार्यक्रम तैयार कर रहा था।
इसी सभा में जयप्रकाश नारायण ने रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की प्रसिद्ध पंक्ति दोहराई—
“सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।”
यह पंक्ति उस रात के राजनीतिक वातावरण का प्रतीक बन गई।
सेना और पुलिस से जयप्रकाश की अपील — सबसे विवादास्पद हिस्सा
रामलीला मैदान के भाषण का सबसे अधिक विवादित हिस्सा वह था जिसमें जयप्रकाश नारायण ने सेना और पुलिसकर्मियों से कहा कि वे अवैध या अनुचित आदेशों का पालन न करें।
इस बिंदु को ऐतिहासिक रूप से ठीक शब्दों में रखना बहुत आवश्यक है।
सरकार ने इस अपील को सेना और पुलिस में अवज्ञा भड़काने की कोशिश के रूप में प्रस्तुत किया।
जेपी समर्थकों का कहना था कि उन्होंने सुरक्षा बलों से सरकार के सभी आदेश न मानने या विद्रोह करने की अपील नहीं की थी; उनका जोर केवल गैर-कानूनी आदेशों को न मानने पर था।
राज्यसभा में जुलाई 1975 की बहस में भी उनके 25 जून के भाषण के संदर्भ में यही शब्द उद्धृत हुए कि उन्होंने सशस्त्र बलों और पुलिस से “illegal orders” न मानने की अपील की थी।
यह अंतर महत्वपूर्ण है।
फिर भी सरकार ने इसे अत्यंत गंभीर चुनौती माना।
प्रधानमंत्री और कांग्रेस का तर्क था कि किसी जननेता द्वारा पुलिस और सेना के अनुशासन को राजनीतिक आंदोलन से जोड़ना राज्य की स्थिरता के लिए खतरनाक है।
जयप्रकाश का तर्क था कि सरकारी कर्मचारी और सुरक्षा बल भी संविधान और कानून से ऊपर किसी व्यक्ति के आदेश के अधीन नहीं हो सकते।
इस एक मुद्दे पर दोनों पक्षों की व्याख्या बिल्कुल विपरीत थी।
क्या आपातकाल केवल रामलीला मैदान के भाषण के कारण लगा?
इतिहास को इतना सरल कर देना उचित नहीं होगा।
25 जून का भाषण तत्कालीन घटनाक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा था, लेकिन आपातकाल के पीछे कई स्तरों पर संकट पहले से बन चुका था—
बिहार आंदोलन,
गुजरात आंदोलन,
विपक्षी एकता,
महंगाई और आर्थिक संकट,
रेलवे हड़ताल,
इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला,
प्रधानमंत्री के इस्तीफे की बढ़ती मांग,
और 24 जून का सशर्त सर्वोच्च न्यायालय आदेश।
25 जून का रामलीला भाषण इस पहले से गंभीर संकट का अंतिम सार्वजनिक विस्फोट था।
सरकार ने जयप्रकाश की पुलिस और सशस्त्र बलों संबंधी अपील को तत्काल खतरे के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया। भारत सरकार के बाद के आधिकारिक विवरण में भी कहा गया है कि आपातकाल की घोषणा से पहले सरकार ने जयप्रकाश सहित कुछ नेताओं पर पुलिस और सशस्त्र बलों को आदेश न मानने के लिए उकसाने का आरोप लगाया था।
उसी रात प्रधानमंत्री निवास में निर्णय
25 जून की रात दिल्ली में राजनीतिक घटनाएं अत्यंत तेजी से आगे बढ़ीं।
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद को पत्र भेजकर अनुच्छेद 352(1) के अंतर्गत आपातकाल घोषित करने की सिफारिश की।
बाद में शाह आयोग के सामने आए दस्तावेजों में प्रधानमंत्री का वह पत्र दर्ज हुआ जिसमें उन्होंने कहा था कि देश की सुरक्षा को “आंतरिक अशांति” से आसन्न खतरा है और मामला इतना तात्कालिक है कि उसी रात उद्घोषणा की आवश्यकता है। पत्र में यह भी कहा गया कि मंत्रिमंडल के समक्ष विषय अगले दिन रखा जाएगा।
इस तथ्य का ऐतिहासिक महत्व बहुत बड़ा है।
इतने व्यापक संवैधानिक निर्णय से पहले मंत्रिमंडल की औपचारिक बैठक नहीं हुई थी; मंत्रिमंडल को अगली सुबह इसकी जानकारी और अनुमोदन की प्रक्रिया में शामिल किया गया।
यह पहलू बाद में आपातकाल की निर्णय प्रक्रिया पर गंभीर विवाद का कारण बना।
राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के हस्ताक्षर
राष्ट्रपति ने 25 जून 1975 को संविधान के तत्कालीन अनुच्छेद 352 के अंतर्गत आपातकाल की उद्घोषणा पर हस्ताक्षर किए।
उद्घोषणा में कहा गया कि भारत की सुरक्षा “आंतरिक अशांति” से खतरे में है।
सर्वोच्च न्यायालय के अभिलेख में उद्घोषणा का मूल पाठ दर्ज है और तारीख 25 जून 1975 दी गई है। इसे 26 जून के सरकारी राजपत्र में प्रकाशित किया गया।
उस समय संविधान में “आंतरिक अशांति” आपातकाल लगाने का आधार हो सकती थी।
बाद में 44वें संविधान संशोधन, 1978 के माध्यम से इस शब्द को हटाकर अधिक कठोर कसौटी “सशस्त्र विद्रोह” रखी गई।
रातों-रात गिरफ्तारियों की तैयारी
आपातकाल की उद्घोषणा केवल संवैधानिक दस्तावेज तक सीमित नहीं रही।
उसी रात विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी की कार्रवाई शुरू हो गई।
आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था कानून—मीसा—का उपयोग कर प्रमुख विपक्षी नेताओं को निरुद्ध किया गया।
जयप्रकाश नारायण।
मोरारजी देसाई।
चरण सिंह।
राज नारायण।
और विभिन्न दलों के अनेक राष्ट्रीय एवं प्रांतीय नेता।
गिरफ्तारी अभियान का उद्देश्य विपक्षी नेतृत्व को आंदोलन शुरू करने से पहले ही निष्क्रिय करना था।
26 जून, लगभग तीन बजे — जयप्रकाश नारायण गिरफ्तार
25 जून की सभा के बाद जयप्रकाश नारायण दिल्ली स्थित गांधी शांति प्रतिष्ठान लौटे।
26 जून की भोर लगभग तीन बजे पुलिस वहां पहुंची।
समकालीन संस्मरणों और बाद के विवरणों के अनुसार उन्हें नींद से जगाया गया और हिरासत में ले लिया गया।
इसी प्रतिष्ठान से पिछले महीनों में संपूर्ण क्रांति आंदोलन की अनेक रणनीतिक बैठकें हुई थीं।
अब वही स्थान जयप्रकाश की गिरफ्तारी का स्थल बना।
उनकी गिरफ्तारी का प्रतीकात्मक महत्व असाधारण था।
जिस व्यक्ति ने 1942 में ब्रिटिश शासन की हजारीबाग जेल से भागकर भूमिगत स्वतंत्रता संघर्ष चलाया था, उसे स्वतंत्र भारत की सरकार ने 33 वर्ष बाद राजनीतिक आंदोलन के दौरान फिर बंदी बना लिया।
गिरफ्तारी के बाद कहां ले जाया गया?
जयप्रकाश को गांधी शांति प्रतिष्ठान से पहले हरियाणा के सोहना स्थित विश्रामगृह ले जाया गया।
मोरारजी देसाई भी वहां निरुद्ध थे। दोनों को पास-पास रखा गया, लेकिन मिलने नहीं दिया गया।
बाद में जयप्रकाश को दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान और फिर चंडीगढ़ के स्नातकोत्तर चिकित्सा संस्थान ले जाया गया, जहां वे निरुद्ध अवस्था में रहे। उनके वकील से जुड़े संस्मरण इन स्थानांतरणों का विवरण देते हैं।
आगे उनकी गिरफ्तारी और बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति आपातकाल के दौरान एक अलग राष्ट्रीय मुद्दा बनने वाली थी।
26 जून की सुबह — देश को आपातकाल का पता चला
26 जून की सुबह प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आकाशवाणी से राष्ट्र को संबोधित किया।
सरकार का संदेश था कि देश की एकता और स्थिरता को चुनौती देने की साजिश चल रही है और व्यवस्था बनाए रखने के लिए आपातकाल आवश्यक हुआ है।
इस बीच विपक्ष के अनेक प्रमुख नेता पहले ही हिरासत में लिए जा चुके थे।
दिल्ली के कई समाचार-पत्रों के कार्यालयों की बिजली रात में बाधित हुई, जिससे अनेक अखबार 26 जून की सुबह अपने सामान्य संस्करण प्रकाशित नहीं कर सके। बाद के विवरणों में यह घटना प्रेस पर नियंत्रण शुरू होने के महत्वपूर्ण प्रतीक के रूप में दर्ज है।
इसके बाद सेंसर व्यवस्था लागू हुई और नागरिक स्वतंत्रताओं पर व्यापक प्रतिबंधों का दौर शुरू हुआ।
आपातकाल और मौलिक अधिकार
25 जून की उद्घोषणा अपने-आप सभी मौलिक अधिकार समाप्त करने वाला दस्तावेज नहीं थी।
यह अंतर महत्वपूर्ण है।
इसके बाद अलग-अलग राष्ट्रपति आदेशों के माध्यम से अधिकारों के प्रवर्तन पर प्रतिबंध लगाए गए।
27 जून 1975 के राष्ट्रपति आदेश ने अनुच्छेद 14, 21 और 22 से संबंधित अधिकारों को लागू कराने के लिए अदालत जाने के अधिकार को निलंबित कर दिया। सर्वोच्च न्यायालय के अभिलेख में उस आदेश का पूरा विवरण उपलब्ध है।
इस प्रकार कुछ ही दिनों में राजनीतिक संकट नागरिक स्वतंत्रताओं के व्यापक संवैधानिक संकट में बदल गया।
क्या जयप्रकाश ने सरकार गिराने के लिए सेना को विद्रोह का आदेश दिया था?
आपातकाल की बहस में यह दावा बार-बार सामने आया।
तथ्यात्मक रूप से अधिक सावधान निष्कर्ष यह है कि जयप्रकाश ने सेना और पुलिस को अवैध आदेशों का पालन न करने के लिए कहा था। उस समय की संसदीय बहस में उनके भाषण को इसी रूप में उद्धृत किया गया।
सरकार ने इसे सुरक्षा बलों के अनुशासन को तोड़ने वाला आह्वान माना।
जेपी और उनके समर्थकों ने इसे संविधान और कानून के प्रति सर्वोच्च निष्ठा की अपील कहा।
इतिहास में दोनों व्याख्याएं मौजूद हैं।
इसलिए इसे सीधे “सेना को विद्रोह का आदेश” कहना घटना को जरूरत से अधिक सरल कर देना होगा।
और क्या इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला ही आपातकाल का कारण था?
यह भी आधा सच होगा।
12 जून का फैसला तत्काल राजनीतिक उत्प्रेरक अवश्य था।
उसने प्रधानमंत्री के नेतृत्व को सीधा कानूनी झटका दिया और विपक्ष के आंदोलन को अचानक असाधारण राजनीतिक ऊर्जा दी।
लेकिन संकट पहले से मौजूद था।
जयप्रकाश का आंदोलन लगभग एक वर्ष से चल रहा था।
विपक्ष एकजुट हो रहा था।
गुजरात में कांग्रेस चुनावी पराजय देख चुकी थी।
सरकार और आंदोलन के बीच लोकतांत्रिक वैधता का विवाद लगातार बढ़ रहा था।
इसलिए अधिक सटीक निष्कर्ष यह है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले ने पहले से चल रहे राजनीतिक संघर्ष को निर्णायक संवैधानिक संकट में बदल दिया।
12 से 26 जून — चौदह दिनों की निर्णायक समयरेखा
12 जून को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द किया।
प्रधानमंत्री ने इस्तीफा नहीं दिया और सर्वोच्च न्यायालय जाने का निर्णय लिया।
विपक्ष ने इस्तीफे की मांग तेज की।
24 जून को न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर ने सशर्त स्थगन दिया—इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनी रह सकती थीं, लेकिन लोकसभा सदस्य के रूप में उनके अधिकार सीमित रहे।
25 जून की शाम रामलीला मैदान में जयप्रकाश नारायण ने प्रधानमंत्री से इस्तीफा मांगा, आंदोलन तेज करने की घोषणा की और पुलिस तथा सुरक्षा बलों से गैर-कानूनी आदेश न मानने की अपील की।
25 जून की रात प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति को आंतरिक आपातकाल की सिफारिश भेजी।
उसी रात राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने उद्घोषणा पर हस्ताक्षर किए।
26 जून की भोर जयप्रकाश और विपक्ष के अनेक नेता गिरफ्तार कर लिए गए।
और 26 जून की सुबह देश को बताया गया कि भारत आपातकाल के अधीन है।
जयप्रकाश के जीवन का सबसे बड़ा ऐतिहासिक विरोधाभास
जयप्रकाश नारायण के जीवन में शायद इससे बड़ा विरोधाभास दूसरा नहीं था।
1942 में उन्हें ब्रिटिश शासन ने बंदी बनाया था।
वे हजारीबाग जेल से भागे थे।
उन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ भूमिगत आंदोलन चलाया था।
1947 के बाद उन्होंने सत्ता की राजनीति छोड़ दी।
दो दशक तक चुनाव और पद से दूर रहे।
और 1975 में, 72 वर्ष की आयु में, उन्हें उसी स्वतंत्र भारतीय राज्य ने बंदी बनाया जिसकी स्वतंत्रता के लिए उन्होंने युवावस्था में जीवन जोखिम में डाला था।
यही तथ्य उनकी गिरफ्तारी को सामान्य विपक्षी नेता की गिरफ्तारी से अलग बनाता है।
सरकार के लिए वे राष्ट्रीय व्यवस्था को चुनौती देने वाले आंदोलन के नेता थे।
उनके समर्थकों के लिए वे नागरिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक प्रतिरोध के प्रतीक बन चुके थे।
25–26 जून ने जयप्रकाश के आंदोलन का अर्थ बदल दिया
25 जून तक जयप्रकाश सरकार के विरुद्ध आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे।
26 जून के बाद परिस्थितियां बदल गईं।
अब खुले जनआंदोलन की सामान्य लोकतांत्रिक जमीन ही समाप्त हो गई।
विपक्ष के नेता जेल में थे।
प्रेस सेंसरशिप के अधीन था।
सभाओं और राजनीतिक गतिविधियों पर नियंत्रण था।
निवारक निरोध के व्यापक अधिकार सरकार के पास थे।
न्यायालय में मौलिक अधिकार लागू कराने की क्षमता भी बाद के राष्ट्रपति आदेशों से गंभीर रूप से सीमित कर दी गई।
अब जयप्रकाश का संघर्ष किसी विधानसभा को भंग कराने या प्रधानमंत्री से इस्तीफा मांगने तक सीमित नहीं रहा।
वह लोकतंत्र और नागरिक स्वतंत्रता की बहाली का संघर्ष बन गया।
और इस संघर्ष का बड़ा हिस्सा उन्हें जेल और गंभीर बीमारी के बीच लड़ना था।