सत्ता से दूरी, भूदान और सर्वोदय
आजादी के बाद सत्ता से दूरी — समाजवादी राजनीति से मोहभंग, विनोबा भावे, भूदान और सर्वोदय की ओर जयप्रकाश नारायण
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जयप्रकाश नारायण के जीवन में एक नया और अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ आया। ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जेल, भूमिगत संघर्ष और समाजवादी संगठन की राजनीति में अग्रिम पंक्ति का नेता रहने वाला व्यक्ति स्वतंत्र भारत में सत्ता का स्वाभाविक दावेदार बन सकता था। उसके पास राष्ट्रीय पहचान थी, कांग्रेस के भीतर पुराने संबंध थे, समाजवादी आंदोलन में स्वीकार्यता थी और स्वतंत्रता संग्राम की प्रतिष्ठा थी।
लेकिन जयप्रकाश नारायण ने धीरे-धीरे सत्ता से दूरी का रास्ता चुना।
यह निर्णय अचानक नहीं था। स्वतंत्रता के बाद लगभग एक दशक तक उनके भीतर यह प्रश्न गहराता गया कि क्या चुनाव, दल, सरकार और मंत्रीपद के माध्यम से वह सामाजिक क्रांति संभव है जिसकी कल्पना उन्होंने युवावस्था से की थी। 1950 से 1954 के बीच उनके राजनीतिक चिंतन में बड़ा परिवर्तन आया। प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय द्वारा प्रकाशित उनके दस्तावेजों का परिचय भी इस अवधि को उनके राजनीतिक जीवन का महत्वपूर्ण संक्रमणकाल मानता है—वे समाजवादी दल के सक्रिय नेता से धीरे-धीरे भूदान और सर्वोदय की ओर बढ़े।
स्वतंत्रता मिली, लेकिन सामाजिक क्रांति अधूरी रही
1947 में भारत स्वतंत्र हुआ, लेकिन जयप्रकाश के लिए प्रश्न केवल यह नहीं था कि अंग्रेज चले गए।
वे पूछ रहे थे—क्या गरीबी खत्म हुई? क्या भूमिहीन किसान को जमीन मिली? क्या सामाजिक और आर्थिक असमानता समाप्त हुई? क्या सत्ता वास्तव में जनता तक पहुंची?
उनका समाजवाद केवल शासन परिवर्तन का कार्यक्रम नहीं था। वे मानते थे कि आर्थिक और सामाजिक संरचना को भी बदलना आवश्यक है।
स्वतंत्रता के बाद उन्होंने देखा कि नई लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव, दल और सरकार तो बदल सकते हैं, लेकिन समाज की गहरी असमानताएं बहुत धीमी गति से बदल रही हैं।
यहीं से उनके मन में यह संदेह पैदा होने लगा कि केवल राज्य सत्ता पर अधिकार कर लेना सामाजिक परिवर्तन के लिए पर्याप्त नहीं है।
कांग्रेस से अलग समाजवादी राजनीति
स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी ने कांग्रेस से अलग होकर स्वतंत्र समाजवादी राजनीति का रास्ता अपनाया।
जयप्रकाश नारायण इस नई समाजवादी धारा के प्रमुख नेताओं में थे। राममनोहर लोहिया, आचार्य नरेंद्र देव, अशोक मेहता और अन्य समाजवादी नेताओं के साथ वे कांग्रेस के विकल्प के रूप में समाजवादी राजनीति खड़ी करना चाहते थे।
1948 के बाद समाजवादी संगठन ने स्वतंत्र राजनीतिक दल के रूप में काम शुरू किया।
जयप्रकाश का लक्ष्य सत्ता प्राप्त करना भर नहीं था। वे ऐसी लोकतांत्रिक समाजवादी व्यवस्था चाहते थे जिसमें आर्थिक असमानता कम हो, जमींदारी समाप्त हो, उत्पादन का उद्देश्य केवल निजी लाभ न रहे और राजनीतिक लोकतंत्र के साथ आर्थिक लोकतंत्र भी स्थापित हो।
लेकिन शीघ्र ही उन्हें महसूस हुआ कि स्वतंत्र दल की राजनीति भी उन्हीं समस्याओं में उलझ रही है जिनकी वे कांग्रेस में आलोचना करते थे।
चुनावी राजनीति से बढ़ता मोहभंग
स्वतंत्र भारत में लोकतंत्र की शुरुआत ने राजनीतिक दलों के सामने चुनाव जीतने की चुनौती रखी।
इसके साथ ही संगठन, उम्मीदवार, गठबंधन, टिकट, संसदीय सीट और सत्ता-साझेदारी जैसे प्रश्न केंद्रीय होने लगे।
जयप्रकाश को यह चिंता सताने लगी कि समाजवादी आंदोलन का मूल उद्देश्य—समाज का परिवर्तन—कहीं चुनाव जीतने की गणित में न खो जाए।
उनकी दृष्टि में राजनीतिक दलों का स्वभाव धीरे-धीरे सत्ता-केंद्रित होता जाता है।
दल चुनाव लड़ता है।
चुनाव जीतने के लिए संगठन बनाता है।
संगठन को चलाने के लिए संसाधन चाहिए।
फिर सत्ता और संगठन स्वयं उद्देश्य बनने लगते हैं।
जयप्रकाश को लगने लगा कि जिस राजनीति को समाज बदलने का साधन होना चाहिए, वह स्वयं सत्ता प्राप्त करने की प्रतिस्पर्धा बन रही है।
समाजवादी दल के भीतर भी मतभेद
समाजवादी आंदोलन स्वयं भी एकरूप नहीं था।
कुछ नेता संसदीय लोकतंत्र के भीतर मजबूत विपक्ष बनाकर धीरे-धीरे समाजवादी नीतियां लागू करना चाहते थे।
कुछ अधिक संघर्षशील जनआंदोलन के पक्ष में थे।
कुछ कांग्रेस के साथ सीमित सहयोग के पक्षधर थे।
कुछ कांग्रेस को मुख्य राजनीतिक विरोधी मानते थे।
जयप्रकाश के सामने यह प्रश्न गहराता गया कि यदि समाजवाद केवल एक और चुनावी दल बनकर रह गया, तो उसका मूल उद्देश्य क्या रह जाएगा?
उनके चिंतन में सत्ता की प्रकृति पर सवाल बढ़ रहे थे।
नेहरू सरकार और जयप्रकाश
जवाहरलाल नेहरू और जयप्रकाश नारायण के संबंध वैचारिक निकटता और राजनीतिक दूरी दोनों से बने थे।
दोनों समाजवादी आदर्शों से प्रभावित थे।
दोनों आर्थिक असमानता और सामंतवाद के आलोचक थे।
लेकिन स्वतंत्रता के बाद उनके रास्ते अलग हो गए।
नेहरू ने राज्यसत्ता के माध्यम से परिवर्तन का मार्ग चुना—योजना, सार्वजनिक क्षेत्र, औद्योगिकीकरण और संसदीय लोकतंत्र।
जयप्रकाश धीरे-धीरे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि ऊपर से राज्यसत्ता के जरिए परिवर्तन पर्याप्त नहीं है।
उनकी दृष्टि गांव, समुदाय और व्यक्ति के भीतर परिवर्तन की ओर बढ़ने लगी।
यह अंतर आगे बहुत महत्वपूर्ण हुआ।
नेहरू के लिए राज्य परिवर्तन का प्रमुख साधन था।
जयप्रकाश के लिए राज्य स्वयं समस्या का हिस्सा बनने लगा।
1951 — तेलंगाना की पृष्ठभूमि और भूदान का जन्म
इसी समय आचार्य विनोबा भावे ने एक ऐसी पहल शुरू की जिसने जयप्रकाश नारायण के जीवन की दिशा बदल दी।
1951 में विनोबा तेलंगाना के क्षेत्र में गए, जहां भूमि प्रश्न और हिंसक किसान संघर्ष गंभीर रूप ले चुका था।
तेलंगाना में कम्युनिस्ट आंदोलन और भूमि संघर्ष की पृष्ठभूमि में विनोबा ने भूमिहीन किसानों के लिए स्वैच्छिक भूमि दान का रास्ता प्रस्तुत किया।
पोचमपल्ली में जमीन दान की घटना से भूदान आंदोलन की शुरुआत हुई।
विनोबा गांव-गांव पैदल घूमकर भूमिधरों से कहते थे कि वे अपनी जमीन का कुछ हिस्सा भूमिहीनों को दान करें।
यह विचार पहली नजर में जयप्रकाश के पुराने मार्क्सवादी चिंतन से बिल्कुल अलग था।
मार्क्सवादी दृष्टि भूमि संबंधों में परिवर्तन को वर्ग संघर्ष और राज्य शक्ति के माध्यम से देखती थी।
विनोबा भूमि क्रांति को स्वैच्छिक त्याग और नैतिक परिवर्तन से संभव बनाना चाहते थे।
फिर भी जयप्रकाश इस प्रयोग से गहराई से प्रभावित हुए।
प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय के दस्तावेज बताते हैं कि वे भूदान को शांतिपूर्ण ढंग से मूलभूत सामाजिक परिवर्तन का प्रयोग मानने लगे और इसे “क्रांति को व्यवहार में उतारने” के प्रयास के रूप में देखने लगे।
विनोबा में जयप्रकाश ने क्या देखा?
जयप्रकाश की मूल बेचैनी थी कि सामाजिक क्रांति कैसे हो।
मार्क्सवाद ने उन्हें आर्थिक शोषण समझाया था।
लोकतांत्रिक समाजवाद ने उन्हें संवैधानिक रास्ता दिया था।
लेकिन दोनों में उन्हें एक समस्या दिखाई दे रही थी—परिवर्तन के केंद्र में राज्य सत्ता।
विनोबा का रास्ता अलग था।
भूमिधर स्वयं जमीन दे।
गांव स्वयं सामाजिक न्याय की दिशा में कदम उठाए।
राज्य पुलिस, कानून या हिंसा से परिवर्तन न कराए।
समाज अपने भीतर से बदले।
जयप्रकाश को लगा कि यह गांधी की अहिंसक क्रांति की वह व्यावहारिक संभावना है जिसकी उन्हें तलाश थी।
भूदान आंदोलन के इतिहास पर उपलब्ध गांधीवादी अभिलेख भी स्पष्ट रूप से कहते हैं कि जयप्रकाश दलगत समाजवाद और सत्ता राजनीति से दूरी बनाकर भूदान में इसलिए आए क्योंकि उन्हें इसमें अहिंसक सामाजिक क्रांति की व्यावहारिक पद्धति दिखाई दी।
1953–54 — निर्णायक परिवर्तन
1953 और 1954 के आसपास जयप्रकाश का परिवर्तन तेजी से स्पष्ट होने लगा।
अब वे केवल समाजवादी नेता नहीं थे जो भूदान का समर्थन कर रहे हों।
वे स्वयं अपनी राजनीतिक दिशा बदल रहे थे।
विनोबा भावे के आंदोलन ने उन्हें यह सोचने के लिए प्रेरित किया कि वास्तविक परिवर्तन चुनाव जीतकर सरकार बनाने से नहीं, बल्कि समाज की मानसिकता और सामाजिक संबंधों को बदलने से आएगा।
1954 में उन्होंने अपने जीवन को सर्वोदय कार्य के लिए समर्पित करने का निर्णय लिया।
यह उनके राजनीतिक जीवन का बड़ा मोड़ था।
एक ऐसा नेता जिसने समाजवादी दल की राष्ट्रीय राजनीति में शीर्ष स्थान हासिल किया था, अब स्वयं चुनावी सत्ता से पीछे हट रहा था।
प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से दूरी
1952 के पहले आम चुनाव के बाद समाजवादी दल और किसान मजदूर प्रजा पार्टी के विलय से प्रजा सोशलिस्ट पार्टी बनी।
जयप्रकाश इस व्यापक समाजवादी पुनर्गठन से जुड़े थे, लेकिन उनकी रुचि तेजी से दलगत राजनीति से हट रही थी।
1954 तक वे सक्रिय दलीय राजनीति छोड़ने की दिशा में स्पष्ट रूप से बढ़ चुके थे।
यह सत्ता के अवसर न मिलने की प्रतिक्रिया नहीं थी।
उनका राजनीतिक कद ऐसा था कि वे चाहते तो संसदीय राजनीति में लंबा करियर बना सकते थे।
लेकिन उनकी समस्या सत्ता प्राप्ति से अधिक उस पूरी व्यवस्था के साथ थी जिसमें परिवर्तन सत्ता के माध्यम से ही संभव माना जाता था।
समाजवाद से सर्वोदय — क्या यह विचारधारा छोड़ना था?
जयप्रकाश ने समाजवाद का उद्देश्य नहीं छोड़ा।
उन्होंने समाजवाद प्राप्त करने का रास्ता बदल दिया।
उनकी चिंता अभी भी वही थी—
गरीबी समाप्त हो।
शोषण समाप्त हो।
संपत्ति का अत्यधिक केंद्रीकरण न हो।
समानता बढ़े।
मनुष्य गरिमा के साथ जी सके।
लेकिन अब उन्हें लगता था कि राज्य नियंत्रित समाजवाद भी पर्याप्त नहीं है।
बाद में उन्होंने स्पष्ट रूप से लिखा कि यदि समाजवाद सर्वोदय में रूपांतरित नहीं होता तो स्वतंत्रता, समानता, भाईचारा और शांति के लक्ष्य अधूरे रह सकते हैं। गांधीवादी अभिलेखों में उनके इस वैचारिक परिवर्तन को मार्क्सवाद से लोकतांत्रिक समाजवाद और फिर सर्वोदय की ओर यात्रा के रूप में दर्ज किया गया है।
सर्वोदय क्या था?
“सर्वोदय” का सीधा अर्थ है—सबका उदय, सबका कल्याण।
गांधी ने इसे ऐसी सामाजिक व्यवस्था के रूप में देखा जिसमें समाज का विकास केवल बहुसंख्यक या किसी एक वर्ग के लिए नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के लिए हो।
जयप्रकाश के लिए सर्वोदय का आकर्षण यह था कि इसमें स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा केवल कानून के शब्द नहीं थे।
इसके केंद्र में था—
सत्ता का विकेंद्रीकरण,
ग्राम स्वराज,
सहकारिता,
अहिंसा,
स्वैच्छिक त्याग,
मानवीय संबंध और शोषण-मुक्त समाज।
वे उस व्यवस्था की कल्पना करने लगे जिसमें शासन ऊपर से नियंत्रित न हो, बल्कि गांव और स्थानीय समुदाय वास्तविक शक्ति के केंद्र बनें।
विनोबा के साथ पदयात्राएं
जयप्रकाश ने भूदान और ग्रामदान आंदोलन में सक्रिय भाग लिया।
वे गांवों में गए।
भूमिधरों से जमीन दान करने की अपील की।
भूमिहीनों के लिए जमीन प्राप्त करने के प्रयास किए।
सर्वोदय कार्यकर्ताओं को संगठित किया।
अब उनका राजनीतिक मंच संसद नहीं, गांव था।
उनका तरीका चुनावी भाषण नहीं, सामाजिक संवाद था।
भारत सरकार के आधिकारिक विवरण में भी स्वतंत्रता के बाद उनके जीवन की इस दिशा को रेखांकित किया गया है—उन्होंने विनोबा भावे के भूदान आंदोलन और सर्वोदय विचार को गांवों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
भूदान से ग्रामदान
भूदान आंदोलन का प्रारंभिक लक्ष्य था—भूमिधर अपनी जमीन का कुछ हिस्सा भूमिहीनों को दें।
लेकिन विनोबा और जयप्रकाश की कल्पना इससे आगे बढ़ी।
यदि पूरा गांव अपनी भूमि व्यवस्था को सामुदायिक आधार पर पुनर्गठित करे तो उसे ग्रामदान कहा गया।
विचार यह था कि गांव केवल प्रशासनिक इकाई न रहे।
वह आर्थिक और सामाजिक समुदाय बने।
भूमि, उत्पादन और निर्णय में समुदाय की भागीदारी हो।
जयप्रकाश को इसमें विकेंद्रीकृत समाजवाद का रूप दिखाई देता था।
यह उनकी पुरानी समाजवादी आकांक्षा और गांधी के ग्राम स्वराज के बीच पुल था।
सत्ता नहीं, “लोकशक्ति”
जयप्रकाश के चिंतन में इसी दौर में एक महत्वपूर्ण शब्द उभरता है—लोकशक्ति।
उनकी दृष्टि में समाज को केवल राज्यशक्ति पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।
राज्यशक्ति कानून बनाती है, पुलिस रखती है और आदेश देती है।
लोकशक्ति समाज की अपनी संगठित नैतिक और सामाजिक शक्ति है।
यदि जनता संगठित और आत्मनिर्भर हो तो राज्य के अत्यधिक केंद्रीकरण की आवश्यकता कम होगी।
यह विचार आगे 1974 की “संपूर्ण क्रांति” में फिर दिखाई देगा।
इसलिए भूदान और सर्वोदय को उनके जीवन का राजनीति से पलायन मानना गलत होगा।
वे राजनीति से बाहर नहीं जा रहे थे।
वे राजनीति की अपनी परिभाषा बदल रहे थे।
क्या भूदान सफल रहा?
भूदान आंदोलन ने बहुत बड़ी मात्रा में भूमि दान की घोषणाएं प्राप्त कीं।
विशेष रूप से बिहार इस आंदोलन का महत्वपूर्ण केंद्र बना। उपलब्ध गांधीवादी अभिलेखों के अनुसार बिहार में भूदान आंदोलन को बहुत व्यापक समर्थन मिला और आंदोलन को प्राप्त भूमि का बड़ा हिस्सा इसी राज्य से आया।
लेकिन समय के साथ गंभीर समस्याएं भी सामने आईं।
दान की गई सारी भूमि वास्तविक रूप से भूमिहीनों तक नहीं पहुंची।
कुछ भूमि विवादित थी।
कुछ अनुपजाऊ थी।
कुछ मामलों में दान केवल कागजी रहा।
स्थानीय प्रशासन और भू-अभिलेख व्यवस्था ने वितरण में बाधाएं पैदा कीं।
और सबसे महत्वपूर्ण—स्वैच्छिक दान पर आधारित व्यवस्था भूमि असमानता के पूरे ढांचे को बदलने में उतनी प्रभावी नहीं हुई जितनी अपेक्षा की गई थी।
जयप्रकाश ने बाद में सीमाएं स्वयं स्वीकार कीं
जयप्रकाश नारायण उन नेताओं में नहीं थे जो अपने प्रयोग की असफलताओं को छिपाते रहें।
बाद के वर्षों में उन्होंने स्वयं माना कि सर्वोदय आंदोलन ने शक्तिशाली और संपन्न वर्ग के हृदय परिवर्तन पर बहुत अधिक भरोसा किया, जबकि गरीब और शोषित जनता को परिवर्तन की सक्रिय शक्ति के रूप में पर्याप्त स्थान नहीं मिला।
गांधीवादी अभिलेख में उनके इस आत्ममंथन को दर्ज किया गया है कि सर्वोदय कार्य में प्रभावशाली और संपन्न लोगों को बदलने पर अधिक ध्यान रहा, जबकि गरीब और शोषित लोगों की सक्रिय भागीदारी सीमित रही।
यह स्वीकारोक्ति अत्यंत महत्वपूर्ण थी।
क्योंकि यहीं से जयप्रकाश की अगली वैचारिक यात्रा शुरू होती है।
सर्वोदय ने उन्हें निष्क्रिय नहीं बनाया
1950 और 1960 के दशक में वे दलीय राजनीति से दूर थे, लेकिन सार्वजनिक जीवन से नहीं।
वे नागालैंड शांति प्रयासों से जुड़े।
कश्मीर जैसे राष्ट्रीय प्रश्नों पर अपनी बात रखते रहे।
चंबल के डाकुओं के आत्मसमर्पण में उन्होंने मध्यस्थ की भूमिका निभाई।
गरीब, भूमिहीन और ग्रामीण समाज से जुड़े प्रश्नों पर काम करते रहे।
उनकी नैतिक प्रतिष्ठा लगातार बढ़ती गई।
वे किसी सरकार का हिस्सा नहीं थे।
किसी चुनावी दल के नेता नहीं थे।
फिर भी राष्ट्रीय जीवन में उनकी उपस्थिति बनी रही।
यही स्थिति उन्हें दूसरे नेताओं से अलग करती थी।
सत्ता से दूरी ने ही आगे उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति बनाई
विडंबना यह है कि जिस निर्णय ने जयप्रकाश को औपचारिक सत्ता से दूर किया, उसी ने आगे उन्हें असाधारण राजनीतिक प्रभाव दिया।
वे मंत्री नहीं थे।
सांसद नहीं थे।
मुख्यमंत्री नहीं थे।
किसी प्रमुख दल के अध्यक्ष भी नहीं थे।
इसलिए 1970 के दशक तक उनके पास एक ऐसी नैतिक विश्वसनीयता थी जो सक्रिय दलगत नेताओं के पास कम होती है।
जब वे बाद में भ्रष्टाचार, केंद्रीकरण और शासन की आलोचना करेंगे तो सत्ता पक्ष के लिए उन्हें केवल विपक्षी नेता कहकर खारिज करना आसान नहीं होगा।
वे लगभग दो दशक से स्वयं सत्ता से बाहर थे।
उन्होंने चुनावी पद नहीं मांगा था।
इसलिए उनकी आलोचना को व्यक्तिगत सत्ता-लालसा से जोड़ना कठिन था।
मार्क्सवाद से सर्वोदय तक—लेकिन मूल प्रश्न वही रहा
जयप्रकाश नारायण की विचारयात्रा को देखकर पहली नजर में वह विरोधाभासी लग सकती है।
अमेरिका में मार्क्सवाद।
1930 के दशक में क्रांतिकारी समाजवाद।
1942 में भूमिगत संघर्ष।
स्वतंत्रता के बाद लोकतांत्रिक समाजवाद।
फिर विनोबा और सर्वोदय।
लेकिन भीतर से देखें तो एक निरंतरता स्पष्ट है।
उनका मूल प्रश्न हमेशा था—
मनुष्य को शोषण, भय, गरीबी और सत्ता के दमन से कैसे मुक्त किया जाए?
मार्क्सवाद ने उन्हें आर्थिक शोषण का विश्लेषण दिया।
समाजवाद ने समानता का लक्ष्य दिया।
गांधी ने साधन और नैतिकता का प्रश्न खड़ा किया।
विनोबा ने अहिंसक सामाजिक परिवर्तन का प्रयोग दिया।
और जयप्रकाश ने इन सबको अपनी यात्रा में एक के बाद एक परखा।
1954 के बाद एक नया जयप्रकाश
1954 के बाद जयप्रकाश नारायण को पुराने अर्थ में दलगत राजनेता मानना कठिन था।
वे सर्वोदय कार्यकर्ता थे।
सत्ता के विकेंद्रीकरण के समर्थक थे।
ग्राम स्वराज की बात करते थे।
भूदान और ग्रामदान के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन खोज रहे थे।
और चुनावी राजनीति से दूरी बना चुके थे।
यह दूरी लगभग दो दशक चली।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं था कि वे हमेशा राजनीति से बाहर रहने वाले थे।
1960 के दशक के उत्तरार्ध और 1970 के शुरुआती वर्षों में उन्हें महसूस होने लगा कि केवल रचनात्मक सामाजिक कार्य पर्याप्त नहीं है।
भ्रष्टाचार बढ़ रहा था।
प्रशासन के प्रति असंतोष बढ़ रहा था।
युवाओं में बेचैनी थी।
लोकतांत्रिक संस्थाओं और राजनीतिक दलों के प्रति विश्वास कमजोर हो रहा था।
और बिहार में जल्द ही ऐसा छात्र आंदोलन खड़ा होने वाला था जो इस वृद्ध सर्वोदय नेता को फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ले आएगा।
इस बार वे किसी पार्टी का नेतृत्व करने नहीं लौटेंगे।
वे व्यवस्था परिवर्तन की मांग लेकर लौटेंगे।