इंदिरा गांधी सरकार से सीधा टकराव
इंदिरा गांधी सरकार से सीधा टकराव — भ्रष्टाचार, सत्ता के केंद्रीकरण, जनआंदोलन और लोकतांत्रिक वैधता को लेकर जयप्रकाश नारायण की चुनौती
1974 के मध्य तक जयप्रकाश नारायण और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बीच मतभेद केवल बिहार सरकार या छात्र आंदोलन तक सीमित नहीं रहे थे। संघर्ष अब इस मूल प्रश्न पर आ गया था कि लोकतंत्र की वैधता केवल चुनावी बहुमत से आती है या जनता को चुनावों के बीच भी सरकार के विरुद्ध व्यापक और अहिंसक जनदबाव बनाने का अधिकार है।
यहीं से जयप्रकाश नारायण और इंदिरा गांधी के बीच राजनीतिक टकराव राष्ट्रीय रूप लेने लगा।
बिहार आंदोलन की शुरुआत महंगाई, खाद्यान्न संकट, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के विरोध से हुई थी। जयप्रकाश के नेतृत्व में आंदोलन ने “संपूर्ण क्रांति” का स्वरूप ग्रहण किया और बिहार सरकार को हटाने से आगे बढ़कर पूरी राजनीतिक व्यवस्था की आलोचना करने लगा। राष्ट्रीय शैक्षिक सामग्री भी दर्ज करती है कि आंदोलन के राष्ट्रीय विस्तार के साथ जनसंघ, कांग्रेस (ओ), भारतीय लोकदल, सोशलिस्ट पार्टी और अन्य गैर-कांग्रेसी दल जयप्रकाश के साथ आने लगे तथा उन्हें इंदिरा गांधी के राजनीतिक विकल्प के रूप में प्रस्तुत करने लगे।
यही वह क्षण था जब बिहार का जनआंदोलन केंद्र सरकार के लिए प्रत्यक्ष राजनीतिक चुनौती बन गया।
भ्रष्टाचार — जयप्रकाश के आरोपों के केंद्र में
जयप्रकाश नारायण की सबसे तीखी आलोचना भ्रष्टाचार को लेकर थी।
उनके अनुसार बिहार में छात्र आंदोलन इसलिए व्यापक हुआ क्योंकि शासन ने प्रारंभिक शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया। बाद में इंदिरा गांधी को लिखे एक खुले पत्र में उन्होंने तर्क दिया कि छात्र नेताओं ने पहले बातचीत का रास्ता अपनाया था, लेकिन राज्य सरकार उनकी मांगों पर गंभीर नहीं हुई। जयप्रकाश ने लिखा कि उनकी दृष्टि में पूरे संघर्ष की केंद्रीय समस्या सरकारी और प्रशासनिक भ्रष्टाचार थी, विशेष रूप से उच्च स्तर पर भ्रष्टाचार।
उनका तर्क केवल यह नहीं था कि कुछ मंत्री या अधिकारी भ्रष्ट हैं।
वे भ्रष्टाचार को राजनीतिक व्यवस्था की संरचनात्मक समस्या मानने लगे थे।
चुनाव में धनबल।
सरकारी ठेकों में पक्षपात।
प्रशासनिक तंत्र का राजनीतिक उपयोग।
सत्ता और व्यापारिक हितों की निकटता।
राजनीतिक संरक्षण के आधार पर अवसर।
इन सबको वे लोकतंत्र की गुणवत्ता से जोड़ रहे थे।
उनके लिए भ्रष्टाचार केवल आर्थिक अपराध नहीं था। वह जनता और शासन के बीच विश्वास को नष्ट करने वाला राजनीतिक रोग था।
इंदिरा गांधी का उत्तर — निर्वाचित सरकार को सड़क से नहीं हटाया जा सकता
केंद्र सरकार का तर्क बिल्कुल अलग था।
इंदिरा गांधी और कांग्रेस नेतृत्व का कहना था कि बिहार की सरकार संवैधानिक रूप से निर्वाचित सरकार है। यदि विपक्ष उसे हटाना चाहता है तो चुनाव उसका लोकतांत्रिक रास्ता है।
आंदोलन के माध्यम से विधानसभा भंग कराने का दबाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर कर सकता था।
इस दृष्टि में समस्या केवल आंदोलन की मांगों की नहीं थी, बल्कि आंदोलन की पद्धति की थी।
यदि किसी भी निर्वाचित सरकार के विरुद्ध पर्याप्त भीड़ सड़क पर उतारकर विधानसभा भंग कराई जा सकती है, तो क्या पांच वर्ष के जनादेश का कोई अर्थ रह जाएगा?
यही कांग्रेस का सबसे मजबूत संवैधानिक तर्क था।
जयप्रकाश का उत्तर था कि लोकतंत्र में चुनाव अंतिम नहीं, बल्कि शुरुआत हैं। यदि सरकार जनविश्वास खो देती है, भ्रष्टाचार व्यापक हो जाता है और शांतिपूर्ण विरोध को दबाया जाता है, तो जनता को लोकतांत्रिक प्रतिरोध का अधिकार है।
इस प्रकार दोनों पक्ष लोकतंत्र की बात कर रहे थे, लेकिन लोकतंत्र की उनकी परिभाषा अलग थी।
बहुमत बनाम जनविश्वास
इंदिरा गांधी के पास संसद में मजबूत बहुमत था।
1971 का चुनाव उन्होंने भारी विजय से जीता था।
1972 के राज्य चुनावों में भी कांग्रेस का प्रदर्शन मजबूत रहा था।
कांग्रेस नेतृत्व इस जनादेश को अपनी वैधता का स्पष्ट प्रमाण मानता था।
जयप्रकाश का तर्क अलग था।
उनके अनुसार चुनाव में बहुमत प्राप्त करना सरकार को पांच वर्षों के लिए नैतिक रूप से असीमित अधिकार नहीं देता। यदि शासन भ्रष्ट, केंद्रीकृत या दमनकारी हो जाए तो जनता को संगठित होकर चुनौती देने का अधिकार बना रहता है।
यहीं टकराव का सबसे गहरा प्रश्न सामने आया—
क्या लोकतांत्रिक वैधता स्थिर है या निरंतर जनविश्वास पर निर्भर है?
यह विवाद बाद में भारतीय लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण बहसों में बदलने वाला था।
बिहार विधानसभा भंग करने की मांग क्यों निर्णायक बनी?
जयप्रकाश के नेतृत्व में आंदोलन ने बिहार विधानसभा भंग करने की मांग की।
सरकार ने इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
कांग्रेस का तर्क था कि विधानसभा कानूनी रूप से निर्वाचित है और उसे सड़क के दबाव में भंग करना खतरनाक परंपरा बनाएगा।
जयप्रकाश का कहना था कि बिहार में व्यापक असंतोष और सरकार की विफलता के कारण नए जनादेश की आवश्यकता है।
यहां एक महत्वपूर्ण बात ध्यान देने योग्य है।
जयप्रकाश तत्काल किसी विपक्षी सरकार को स्थापित करने की मांग नहीं कर रहे थे।
उनका आग्रह था कि विधानसभा भंग हो और जनता को फिर निर्णय करने का अवसर मिले।
लेकिन कांग्रेस नेतृत्व को आशंका थी कि यदि बिहार में यह मांग स्वीकार कर ली गई तो दूसरे राज्यों में भी समान आंदोलन शुरू हो सकते हैं।
समकालीन अमेरिकी राजनयिक आकलन में भी दर्ज किया गया कि इंदिरा गांधी को चिंता थी कि यदि बिहार में जयप्रकाश की मांगों के सामने झुका गया, तो इस प्रकार के आंदोलन अन्य राज्यों में फैल सकते हैं।
गुजरात ने सरकार की चिंता बढ़ाई
बिहार अकेला आंदोलन नहीं था।
उससे पहले गुजरात का नवनिर्माण आंदोलन कांग्रेस सरकार को गंभीर संकट में डाल चुका था। छात्र आंदोलन से शुरू हुए विरोध में विपक्षी दल शामिल हुए और अंततः राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हुआ। बाद में विधानसभा चुनाव हुए और कांग्रेस पराजित हुई।
केंद्र सरकार को आशंका थी कि बिहार भी गुजरात के रास्ते पर जा सकता है।
यदि बिहार विधानसभा भी आंदोलन के दबाव में भंग होती तो यह विपक्ष के लिए राष्ट्रीय रणनीति बन सकती थी—
छात्र असंतोष,
जनआंदोलन,
सरकार पर दबाव,
विधानसभा भंग,
फिर चुनाव।
इंदिरा गांधी इसलिए बिहार आंदोलन को केवल प्रांतीय संकट के रूप में नहीं देख रही थीं।
सत्ता के केंद्रीकरण पर जयप्रकाश की आलोचना
भ्रष्टाचार के साथ जयप्रकाश का दूसरा बड़ा आरोप सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण को लेकर था।
उनका सर्वोदय चिंतन पहले से ही विकेंद्रीकरण पर आधारित था।
वे गांव, पंचायत और स्थानीय समुदाय को वास्तविक राजनीतिक शक्ति देने के पक्षधर थे।
इसके विपरीत 1970 के दशक तक कांग्रेस और केंद्र सरकार में निर्णय लेने की प्रक्रिया अधिकाधिक प्रधानमंत्री और उनके निकट नेतृत्व के आसपास केंद्रित दिखाई देने लगी थी।
जयप्रकाश को लगता था कि मंत्रिमंडल, संसद, राज्यों और कांग्रेस संगठन की स्वतंत्र राजनीतिक भूमिका कमजोर हो रही है।
विपक्षी नेताओं ने भी इसी समय न्यायपालिका, प्रेस, प्रशासन और संसद जैसी संस्थाओं पर केंद्र के बढ़ते प्रभाव का प्रश्न उठाना शुरू किया। 1974 के विपक्षी विमर्श में यह आरोप बार-बार सामने आया कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता कम हो रही है।
हालांकि इन आरोपों की तीव्रता और राजनीतिक भाषा अलग-अलग दलों में भिन्न थी, जयप्रकाश ने इन्हें व्यापक लोकतांत्रिक संकट से जोड़ा।
“इंदिरा इज़ इंडिया” और व्यक्तिकेंद्रित राजनीति की बहस
1974 में कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ से जुड़ा प्रसिद्ध नारा सामने आया—“इंदिरा इज़ इंडिया, इंडिया इज़ इंदिरा।”
चाहे इसे राजनीतिक निष्ठा की अतिशयोक्तिपूर्ण अभिव्यक्ति माना जाए, विपक्ष ने इसे सत्ता के व्यक्तिकेंद्रित होने के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया। राष्ट्रीय शैक्षिक सामग्री भी इस नारे को उसी दौर की राजनीतिक परिस्थिति के संदर्भ में दर्ज करती है।
जयप्रकाश की राजनीति ठीक इसके विपरीत दिशा में थी।
वे व्यक्ति के हाथ में सत्ता के केंद्रीकरण के विरुद्ध लोकशक्ति और विकेंद्रीकरण की बात कर रहे थे।
इसलिए राजनीतिक संघर्ष धीरे-धीरे दो व्यक्तियों से अधिक दो राजनीतिक संस्कृतियों का प्रतीक बनने लगा।
विपक्षी दल जयप्रकाश के पीछे क्यों आए?
गैर-कांग्रेसी विपक्ष लंबे समय से बिखरा हुआ था।
जनसंघ और समाजवादी दलों की विचारधारा अलग थी।
कांग्रेस (ओ) पुराने कांग्रेस नेतृत्व का प्रतिनिधित्व करती थी।
भारतीय लोकदल की राजनीति किसानों और ग्रामीण हितों पर केंद्रित थी।
अलग-अलग दल चुनावों में कांग्रेस के विरुद्ध लड़ते थे, लेकिन कोई साझा राष्ट्रीय नेतृत्व नहीं था।
जयप्रकाश ने इस समस्या का अस्थायी समाधान दिया।
वे स्वयं किसी दल के उम्मीदवार नहीं थे।
उनकी स्वतंत्रता संग्राम की प्रतिष्ठा थी।
उन्होंने सत्ता छोड़ रखी थी।
उनका व्यक्तिगत जीवन अपेक्षाकृत सादा और सार्वजनिक पद से दूर था।
इसीलिए अलग-अलग विचारधाराओं के दल उनके नेतृत्व को स्वीकार कर सकते थे।
राष्ट्रीय शैक्षिक पाठ्यक्रम स्पष्ट रूप से दर्ज करता है कि जनसंघ, कांग्रेस (ओ), भारतीय लोकदल और सोशलिस्ट पार्टी सहित गैर-कांग्रेसी दल जयप्रकाश के साथ आए और उन्हें इंदिरा गांधी के विकल्प के रूप में प्रस्तुत करने लगे।
यहीं आंदोलन का चरित्र बदल गया।
अब यह केवल “जनआंदोलन” नहीं रहा।
इसके चारों ओर राष्ट्रीय विपक्षी गठबंधन का आधार बनने लगा।
क्या जयप्रकाश स्वयं सत्ता के दावेदार थे?
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर आवश्यक है।
विपक्षी दल उन्हें इंदिरा गांधी के राजनीतिक विकल्प के रूप में प्रस्तुत कर रहे थे, लेकिन जयप्रकाश स्वयं प्रधानमंत्री पद के दावेदार नहीं थे।
उन्होंने कोई चुनावी पद नहीं मांगा।
उन्होंने नया राजनीतिक दल अपने नेतृत्व में नहीं बनाया।
वे आंदोलन के नैतिक और राजनीतिक मार्गदर्शक बने रहे।
यही उनकी शक्ति थी।
यदि वे स्वयं सत्ता के उम्मीदवार होते तो कांग्रेस उन्हें सामान्य विपक्षी नेता के रूप में पेश कर सकती थी।
लेकिन सत्ता से उनकी लंबी दूरी ने उनके आरोपों को अलग नैतिक वजन दिया।
समकालीन विदेशी आकलन भी उन्हें उनकी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा, गांधीवादी अहिंसा और सक्रिय दलगत राजनीति से पूर्व दूरी के कारण इंदिरा गांधी और कांग्रेस के लिए असाधारण चुनौती मानता था।
लेकिन आंदोलन पूरी तरह गैर-दलीय नहीं रहा
जयप्रकाश इसे जनआंदोलन और गैर-दलीय परिवर्तन का आंदोलन मानते थे।
व्यवहार में स्थिति अधिक जटिल थी।
विपक्षी दल अपने संगठन, कार्यकर्ता और राजनीतिक हित लेकर आंदोलन में शामिल हुए।
जनसंघ के कार्यकर्ता सक्रिय थे।
समाजवादी पहले से आंदोलन के महत्वपूर्ण हिस्से थे।
कांग्रेस (ओ) और लोकदल भी खुलकर समर्थन कर रहे थे।
इससे कांग्रेस को यह आरोप लगाने का अवसर मिला कि “संपूर्ण क्रांति” वस्तुतः विपक्ष की कांग्रेस-विरोधी सत्ता रणनीति बन चुकी है।
यह आलोचना पूरी तरह निराधार नहीं थी।
आंदोलन का नैतिक नेतृत्व जयप्रकाश के पास था, लेकिन उसकी राजनीतिक शक्ति का बड़ा हिस्सा विपक्षी दलों के संगठन से भी आ रहा था।
यही विरोधाभास आगे जनता पार्टी के गठन तक बना रहेगा।
जनसंघ की भागीदारी पर विवाद
जयप्रकाश के आंदोलन में भारतीय जनसंघ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े कार्यकर्ताओं की भागीदारी विशेष विवाद का विषय बनी।
वामपंथी और कांग्रेस आलोचकों का आरोप था कि दक्षिणपंथी शक्तियां जयप्रकाश की नैतिक प्रतिष्ठा का उपयोग कर रही हैं।
जयप्रकाश का दृष्टिकोण अलग था।
वे मानते थे कि यदि कोई संगठन शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक आंदोलन और भ्रष्टाचार-विरोधी कार्यक्रम में भाग लेना चाहता है तो केवल वैचारिक लेबल के आधार पर उसे बाहर करना उचित नहीं।
इससे आंदोलन का आधार बढ़ा, लेकिन साथ ही उसकी वैचारिक एकरूपता और अधिक कमजोर हुई।
यह आगे जनता पार्टी के भीतर पैदा होने वाले अंतर्विरोधों का भी संकेत था।
1974 की रेलवे हड़ताल और व्यापक असंतोष
इसी दौर में मई 1974 में जॉर्ज फर्नांडिस के नेतृत्व में रेल कर्मचारियों की विशाल हड़ताल हुई।
रेलवे हड़ताल जयप्रकाश के बिहार आंदोलन का हिस्सा नहीं थी, लेकिन दोनों घटनाओं का लगभग एक ही समय पर होना केंद्र सरकार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था।
देश में एक ओर छात्र और राजनीतिक आंदोलन बढ़ रहा था।
दूसरी ओर रेलवे जैसे राष्ट्रीय ढांचे में विशाल औद्योगिक संघर्ष हुआ।
सरकार ने रेलवे हड़ताल के प्रति कठोर रुख अपनाया।
राष्ट्रीय शैक्षिक सामग्री भी बिहार आंदोलन के समानांतर इस हड़ताल को उस समय के व्यापक राजनीतिक और आर्थिक संकट के संकेत के रूप में रखती है।
इंदिरा गांधी सरकार के लिए यह अनुभव महत्वपूर्ण था—राज्य व्यवस्था को चुनौती केवल संसद में विपक्ष से नहीं, सड़क, विश्वविद्यालय और श्रमिक संगठनों से भी मिल रही थी।
आंदोलन का राष्ट्रीय विस्तार
जयप्रकाश चाहते थे कि बिहार आंदोलन की मूल चिंताएं देश के दूसरे हिस्सों में भी उठें।
1975 तक उन्होंने दिल्ली में संसद की ओर विशाल जनमार्च का नेतृत्व किया। राष्ट्रीय शैक्षिक सामग्री इसे राजधानी की उस समय की सबसे बड़ी राजनीतिक सभाओं में से एक बताती है।
अब जयप्रकाश की भाषा राष्ट्रीय थी।
भ्रष्टाचार केवल बिहार में नहीं।
सत्ता का केंद्रीकरण केवल पटना में नहीं।
चुनाव सुधार केवल एक विधानसभा का प्रश्न नहीं।
लोकतंत्र की जवाबदेही पूरे देश का प्रश्न है।
यहीं इंदिरा गांधी सरकार के साथ सीधा टकराव अपरिहार्य हो गया।
जयप्रकाश और इंदिरा के निजी संबंध भी टूटने लगे
जयप्रकाश नारायण और इंदिरा गांधी का संबंध हमेशा शत्रुतापूर्ण नहीं रहा था।
स्वतंत्रता आंदोलन और नेहरू परिवार से पुराने संबंधों के कारण उनके बीच संवाद का व्यक्तिगत आधार भी था।
लेकिन 1974 में पत्राचार और सार्वजनिक वक्तव्यों के बीच यह संबंध तेजी से बिगड़ा।
आधुनिक शोध में जयप्रकाश–इंदिरा पत्राचार के आधार पर दिखाया गया है कि जून–जुलाई 1974 तक दोनों के बीच अविश्वास गंभीर हो चुका था। बिहार में सरकारी कार्रवाई और एक-दूसरे पर सार्वजनिक टिप्पणियों ने व्यक्तिगत दूरी को राजनीतिक संघर्ष में बदल दिया।
यह तथ्य महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि संघर्ष केवल अचानक 1975 में पैदा नहीं हुआ।
1974 के मध्य तक दोनों पक्ष एक-दूसरे की राजनीतिक मंशा पर संदेह करने लगे थे।
कांग्रेस का आरोप — आंदोलन सरकार को पंगु करना चाहता है
सरकार की चिंता यह थी कि आंदोलन के कार्यक्रम धीरे-धीरे प्रशासन को असहयोग के माध्यम से निष्क्रिय करने की दिशा में जा रहे हैं।
सरकारी कार्यालयों का घेराव।
बंद और हड़ताल।
कर न देने की बात।
विधायकों पर इस्तीफे का दबाव।
स्थानीय “जनता सरकार” या जनसमितियों की अवधारणा।
इन कार्यक्रमों को कांग्रेस नेतृत्व संवैधानिक शासन के समानांतर शक्ति बनाने के प्रयास के रूप में देखता था।
जयप्रकाश इसे अहिंसक जनदबाव कहते थे।
सरकार इसे प्रशासनिक व्यवस्था को पंगु करने की रणनीति मानती थी।
यहीं विवाद सबसे तीखा था।
जयप्रकाश का उत्तर — नागरिक अवज्ञा लोकतंत्र-विरोधी नहीं
जयप्रकाश का तर्क गांधीवादी था।
यदि राज्य अन्यायपूर्ण व्यवहार करे तो नागरिकों के पास शांतिपूर्ण सत्याग्रह और असहयोग का अधिकार है।
उनके अनुसार लोकतंत्र में नागरिक अधिकार केवल मतदान तक सीमित नहीं हो सकते।
उन्होंने आंदोलन को अहिंसक रखने पर लगातार जोर दिया।
उनका लक्ष्य सशस्त्र विद्रोह या संविधान समाप्त करना नहीं था।
वे दावा करते थे कि जनदबाव का उद्देश्य लोकतंत्र को अधिक उत्तरदायी बनाना है।
बाद में इंदिरा गांधी को लिखे पत्रों में भी उन्होंने बिहार आंदोलन को भ्रष्टाचार और प्रशासनिक विफलता के विरुद्ध सीमित अहिंसक नागरिक प्रतिरोध के रूप में प्रस्तुत किया।
लोकतांत्रिक वैधता का मूल विवाद
1974–75 का संघर्ष अंततः एक गहरे संवैधानिक और राजनीतिक प्रश्न पर पहुंच गया।
इंदिरा गांधी का पक्ष:
उन्होंने चुनाव जीता था।
कांग्रेस के पास संसद में बहुमत था।
बिहार में भी निर्वाचित विधानसभा थी।
इसलिए सरकार बदलने का रास्ता अगला चुनाव था।
जयप्रकाश का पक्ष:
चुनावी बहुमत लोकतंत्र का आवश्यक आधार है, लेकिन पर्याप्त आधार नहीं।
सरकार जनता के प्रति निरंतर उत्तरदायी है।
यदि व्यापक भ्रष्टाचार, प्रशासनिक दमन और जनविश्वास का संकट हो तो अहिंसक आंदोलन लोकतंत्र के भीतर वैध है।
दोनों तर्कों के अपने लोकतांत्रिक आधार थे।
यही कारण है कि इस संघर्ष को केवल “सरकार बनाम विपक्ष” के रूप में समझना पर्याप्त नहीं है।
यह प्रतिनिधिक लोकतंत्र और सहभागी जनतंत्र की सीमाओं को लेकर टकराव भी था।
आंदोलन की आलोचना भी आवश्यक है
जयप्रकाश के आंदोलन को पूरी तरह निर्विवाद लोकतांत्रिक प्रयोग मानना भी ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं होगा।
निर्वाचित विधायकों पर इस्तीफे के लिए बाहरी दबाव डालना संवैधानिक दृष्टि से विवादास्पद था।
सरकारी संस्थानों को ठप करने की रणनीति सामान्य नागरिकों को भी प्रभावित करती थी।
“संपूर्ण क्रांति” की संस्थागत रूपरेखा पूरी तरह स्पष्ट नहीं थी।
और आंदोलन में शामिल सभी विपक्षी दल जयप्रकाश के गैर-दलीय, विकेंद्रीकृत और नैतिक समाज के आदर्श से सहमत नहीं थे।
राष्ट्रीय शैक्षिक सामग्री भी दर्ज करती है कि आंदोलन की विचारधारा और बड़े जनआंदोलनों की पद्धति दोनों की आलोचना हुई थी।
लेकिन इन आलोचनाओं के बावजूद 1974 के अंत तक एक तथ्य स्पष्ट हो चुका था—
जयप्रकाश नारायण इंदिरा गांधी के सामने सबसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय राजनीतिक चुनौती बन गए थे।
वह चुनौती इतनी बड़ी क्यों थी?
क्योंकि जयप्रकाश के पास वह संयोजन था जो किसी अन्य विपक्षी नेता के पास नहीं था।
स्वतंत्रता संग्राम की प्रतिष्ठा।
1942 के क्रांतिकारी संघर्ष का इतिहास।
दशकों तक सत्ता से दूरी।
गांधीवादी और सर्वोदय छवि।
भ्रष्टाचार-विरोधी राजनीतिक भाषा।
छात्र और मध्यवर्ग का समर्थन।
और अंततः बिखरे हुए विपक्ष को एक साझा मंच पर लाने की क्षमता।
समकालीन आकलन ने भी उन्हें कांग्रेस और इंदिरा गांधी के लिए अब तक की सबसे गंभीर चुनौती बताया था, हालांकि उसी आकलन ने यह भी ध्यान दिलाया कि उस समय उनका सामाजिक आधार अभी पूरे ग्रामीण भारत, अल्पसंख्यकों और अनुसूचित जातियों तक समान रूप से नहीं पहुंचा था।
यह सीमा महत्वपूर्ण थी।
लेकिन उनकी राजनीतिक क्षमता अब राष्ट्रीय थी।
1974 के अंत तक संघर्ष कहां पहुंच चुका था?
वर्ष के अंत तक स्थिति यह थी—
बिहार आंदोलन जारी था।
विपक्ष जयप्रकाश के आसपास संगठित हो रहा था।
कांग्रेस उन्हें निर्वाचित सरकारों को अस्थिर करने वाला नेता बताने लगी थी।
जयप्रकाश सरकार पर लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने और भ्रष्टाचार से लड़ने में विफल रहने का आरोप लगा रहे थे।
दोनों पक्ष एक-दूसरे की राजनीतिक वैधता पर प्रश्न उठा रहे थे।
लेकिन अभी निर्णायक संवैधानिक विस्फोट बाकी था।
वह 1975 में होने वाला था।
12 जून को इलाहाबाद उच्च न्यायालय इंदिरा गांधी के रायबरेली चुनाव पर ऐतिहासिक फैसला देगा।
24 जून को सर्वोच्च न्यायालय अंतरिम आदेश देगा।
25 जून को दिल्ली के रामलीला मैदान में जयप्रकाश नारायण विपक्षी आंदोलन की विशाल सभा को संबोधित करेंगे।
और उसी रात भारत की राजनीति एक ऐसे मोड़ पर पहुंचेगी जहां यह पूरा संघर्ष आपातकाल में बदल जाएगा।