भारत छोड़ो आंदोलन और हजारीबाग जेल से पलायन
भारत छोड़ो आंदोलन और हजारीबाग जेल से पलायन — भूमिगत संघर्ष, गिरफ्तारी और अंग्रेजी शासन से सीधी टक्कर
जयप्रकाश नारायण के जीवन में 1942 का वर्ष निर्णायक था। इससे पहले वे एक प्रमुख समाजवादी विचारक, कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के संगठनकर्ता और ब्रिटिश शासन के प्रखर विरोधी के रूप में स्थापित हो चुके थे। लेकिन भारत छोड़ो आंदोलन ने उन्हें सीधे उस भूमिगत संघर्ष के केंद्र में ला दिया जिसमें उद्देश्य केवल ब्रिटिश सरकार का विरोध करना नहीं, बल्कि औपनिवेशिक शासन को प्रशासनिक और राजनीतिक रूप से निष्क्रिय करना था।
अगस्त 1942 में महात्मा गांधी ने “भारत छोड़ो” का आह्वान किया। आंदोलन शुरू होते ही कांग्रेस के लगभग पूरे शीर्ष नेतृत्व को गिरफ्तार कर लिया गया। गांधी, नेहरू, पटेल, मौलाना आजाद और दूसरे बड़े नेता जेलों में डाल दिए गए। ऐसे समय में आंदोलन की जिम्मेदारी स्वाभाविक रूप से उन नेताओं पर आई जो या तो गिरफ्तारी से बाहर थे या भूमिगत होकर काम कर सकते थे। जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया और अरुणा आसफ अली इस दौर में भूमिगत प्रतिरोध के महत्वपूर्ण चेहरों में उभरे। भारत सरकार के आधिकारिक जीवन-वृत्त में भी दर्ज है कि शीर्ष नेताओं की गिरफ्तारी के बाद जयप्रकाश, लोहिया और अरुणा आसफ अली ने आंदोलन को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी संभाली।
गिरफ्तारी और हजारीबाग जेल
ब्रिटिश सरकार पहले से ही जयप्रकाश को एक खतरनाक राजनीतिक कार्यकर्ता मानती थी। उन्हें रक्षा-भारत नियमों के अंतर्गत गिरफ्तार किया गया। इस व्यवस्था के तहत बिना सामान्य मुकदमे की प्रक्रिया के भी किसी व्यक्ति को निरुद्ध किया जा सकता था।
उन्हें हजारीबाग केंद्रीय कारागार में रखा गया।
ब्रिटिश प्रशासन का उद्देश्य था कि कांग्रेस के अन्य प्रमुख नेताओं की तरह समाजवादी नेतृत्व को भी जेल में रखकर आंदोलन की रीढ़ तोड़ दी जाए।
लेकिन जयप्रकाश जेल में निष्क्रिय बैठने वालों में नहीं थे।
उनका विचार था कि यदि बाहर जाकर भूमिगत संगठन बनाया जा सके तो आंदोलन को नया जीवन दिया जा सकता है।
यहीं से जेल से पलायन की योजना बनी।
9 नवंबर 1942 — हजारीबाग जेल से ऐतिहासिक पलायन
दीपावली की रात, 9 नवंबर 1942, को जयप्रकाश नारायण और उनके साथियों ने हजारीबाग केंद्रीय कारागार से भागने की योजना को अंजाम दिया।
उनके साथ योगेंद्र शुक्ल, सूर्य नारायण सिंह, गुलाबचंद गुप्ता, रामनंदन मिश्र और शालिग्राम सिंह जैसे स्वतंत्रता सेनानी थे। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अभिलेख भी इन नेताओं के जेल की दीवार पार कर भूमिगत आंदोलन में उतरने की पुष्टि करते हैं।
उस समय दीपावली के कारण जेल की सामान्य दिनचर्या कुछ ढीली थी। इसी अवसर का उपयोग किया गया।
जेल से बाहर निकलना स्वयं में अत्यंत जोखिमपूर्ण था। ब्रिटिश शासन ऐसे राजनीतिक बंदियों के पलायन को विद्रोह मानता था और दोबारा पकड़े जाने पर कठोर दंड निश्चित था।
फिर भी उन्होंने यह जोखिम लिया।
इस पलायन का उद्देश्य व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्राप्त करना नहीं था।
यह एक राजनीतिक कार्रवाई थी।
जयप्रकाश का लक्ष्य साफ था—जेल से बाहर निकलकर भारत छोड़ो आंदोलन की भूमिगत कमान मजबूत करना।
जेल की दीवार पार करने का साहस
हजारीबाग जेल से भागने की घटना बाद में किंवदंती बन गई।
विभिन्न विवरणों में बताया गया है कि कैदियों ने कपड़ों और धोतियों को जोड़कर रस्सी जैसी व्यवस्था बनाई और जेल की ऊंची दीवार पार की। समकालीन और बाद के विवरण इस पलायन को अत्यंत साहसिक कार्रवाई बताते हैं। भारत सरकार के आधिकारिक जीवन-वृत्त में इसे वह घटना कहा गया जिसने जयप्रकाश को जनता के बीच लगभग लोकनायक जैसा साहसी प्रतिरोधकर्ता बना दिया।
यहां ऐतिहासिक सावधानी आवश्यक है।
धोतियों की सटीक संख्या अलग-अलग लोकप्रिय विवरणों में अलग मिलती है। इसलिए उस संख्या को निर्णायक तथ्य मानने के बजाय इतना कहना अधिक सुरक्षित है कि कपड़ों को जोड़कर जेल की दीवार पार करने की व्यवस्था बनाई गई थी।
मुख्य तथ्य निर्विवाद है—9 नवंबर 1942 की रात जयप्रकाश और उनके साथियों ने हजारीबाग केंद्रीय जेल की सुरक्षा तोड़कर सफलतापूर्वक पलायन किया।
योगेंद्र शुक्ल और साथियों की भूमिका
यह घटना केवल जयप्रकाश का अकेला साहसिक कारनामा नहीं थी।
योगेंद्र शुक्ल विशेष रूप से महत्वपूर्ण थे। वे अनुभवी क्रांतिकारी थे और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध लंबे संघर्ष का अनुभव रखते थे।
पलायन के बाद जयप्रकाश की तबीयत अच्छी नहीं थी। यात्रा कठिन थी और पुलिस से बचते हुए जंगलों तथा ग्रामीण रास्तों से आगे बढ़ना था। उपलब्ध विवरणों के अनुसार योगेंद्र शुक्ल ने कई अवसरों पर जयप्रकाश की शारीरिक सहायता की और उन्हें सुरक्षित क्षेत्र तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इसलिए हजारीबाग पलायन को सामूहिक भूमिगत कार्रवाई के रूप में देखना चाहिए।
जेल से निकलते ही सबसे बड़ी चुनौती — पहचान छिपाना
जेल से भागना केवल पहला चरण था।
अब ब्रिटिश पुलिस पूरे क्षेत्र में उनकी तलाश कर रही थी।
रेलवे स्टेशन, सड़कें, कस्बे और राजनीतिक संपर्क केंद्र निगरानी में थे।
जयप्रकाश को पहचान बदलकर, गुप्त संपर्कों और सुरक्षित ठिकानों के सहारे आगे बढ़ना पड़ा।
उनकी सबसे बड़ी समस्या यह थी कि वे पहले ही राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध नेता थे। पुलिस के पास उनका विवरण था। जिस व्यक्ति को सरकार पकड़ना चाहती हो, उसके लिए सामान्य यात्रा भी जोखिमपूर्ण थी।
इसलिए भूमिगत जीवन में गुप्त संदेश, विश्वासपात्र कार्यकर्ता, नकली पहचान और सुरक्षित मार्ग अत्यंत महत्वपूर्ण हो गए।
भारत छोड़ो आंदोलन का स्वरूप बदल चुका था
1942 का आंदोलन पहले के कई राष्ट्रीय आंदोलनों से अलग था।
शीर्ष नेतृत्व गिरफ्तार था।
कई स्थानों पर जनता ने सरकारी भवनों, रेलवे, तार व्यवस्था और प्रशासनिक ढांचे पर हमला किया।
कुछ क्षेत्रों में समानांतर स्थानीय शासन तक स्थापित हुआ।
समाजवादी नेताओं के सामने प्रश्न था—नेतृत्वविहीन आंदोलन को कैसे संगठित रखा जाए?
जयप्रकाश का उत्तर था—भूमिगत संगठन।
उनकी दृष्टि में ब्रिटिश शासन की संचार और प्रशासनिक व्यवस्था को बाधित करना आंदोलन की रणनीति का हिस्सा था।
यही कारण था कि सरकार उन्हें केवल भाषण देने वाला राजनीतिक नेता नहीं, बल्कि सक्रिय विद्रोही संगठनकर्ता मानने लगी।
भूमिगत पत्र और जनता के नाम संदेश
जेल से बाहर आने के बाद जयप्रकाश ने भूमिगत साहित्य और संदेशों के माध्यम से आंदोलन को दिशा देने का प्रयास किया।
उन्होंने आंदोलनकारियों से संपर्क स्थापित किया और राष्ट्रीय संघर्ष जारी रखने की अपील की।
उनके लेखन में यह आग्रह दिखाई देता है कि आंदोलन नेतृत्व की गिरफ्तारी से समाप्त नहीं हुआ है और स्वतंत्रता का संघर्ष जारी रहना चाहिए।
प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय द्वारा प्रकाशित उनके चयनित लेखन के तीसरे खंड की भूमिका भी इस दौर को जयप्रकाश की राजनीतिक भूमिका का अत्यंत महत्वपूर्ण चरण बताती है। उसमें स्पष्ट कहा गया है कि सितंबर 1939 से अप्रैल 1946 के दस्तावेज उनके भूमिगत संघर्ष, भारत छोड़ो आंदोलन में भूमिका और हजारीबाग से पलायन के बाद आंदोलन को नया जीवन देने के प्रयास को दिखाते हैं।
नेपाल की ओर — “आजाद दस्ता” का निर्माण
भूमिगत संघर्ष का अगला महत्वपूर्ण चरण नेपाल से जुड़ा।
जयप्रकाश नारायण ने नेपाल के सीमावर्ती इलाके में “आजाद दस्ता” संगठित किया। इसका उद्देश्य प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं का ऐसा समूह तैयार करना था जो भूमिगत आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभा सके।
भारत सरकार के आधिकारिक जीवन-वृत्त और अन्य स्रोत इस संगठन की पुष्टि करते हैं।
आजाद दस्ता सामान्य राजनीतिक सभा का संगठन नहीं था।
यह ब्रिटिश शासन के विरुद्ध भूमिगत प्रतिरोध की संरचना का हिस्सा था।
जयप्रकाश का विचार था कि यदि भूमिगत नेटवर्क को संगठित किया जाए तो आंदोलन केवल स्वतःस्फूर्त विद्रोह न रहकर अधिक व्यवस्थित प्रतिरोध में बदल सकता है।
क्या जयप्रकाश ने हिंसक संघर्ष को स्वीकार कर लिया था?
यह प्रश्न उनके वैचारिक विकास को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
इस दौर में जयप्रकाश का दृष्टिकोण उनके बाद के सर्वोदय और अहिंसावादी जीवन से काफी अलग था।
प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय द्वारा प्रकाशित उनके लेखन की भूमिका स्पष्ट रूप से दर्ज करती है कि इस समय वे मानते थे कि ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष का कुछ हिस्सा हिंसक प्रतिरोध और भूमिगत संगठन पर आधारित हो सकता है। यह दृष्टिकोण विवादास्पद था, लेकिन उनके उस समय के क्रांतिकारी समाजवादी चरण को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
इसलिए 1942 के जयप्रकाश को उनके 1970 के दशक के जयप्रकाश से अलग ऐतिहासिक संदर्भ में देखना होगा।
बाद में उन्होंने हिंसा से गहरी दूरी बनाई।
लेकिन भारत छोड़ो आंदोलन के समय वे औपनिवेशिक शासन को उखाड़ने के लिए अधिक उग्र संघर्ष की संभावना को अस्वीकार नहीं कर रहे थे।
अंग्रेजी शासन के लिए “खतरनाक” व्यक्ति
जयप्रकाश का भूमिगत रहना ब्रिटिश प्रशासन के लिए गंभीर चुनौती बन चुका था।
वे समाजवादी कार्यकर्ताओं से संपर्क कर रहे थे।
नेपाल सीमा का उपयोग कर रहे थे।
आजाद दस्ता बना चुके थे।
उनकी गिरफ्तारी सरकार की प्राथमिकता बन गई।
सरकार को आशंका थी कि यदि वे लंबे समय तक बाहर रहे तो भारत छोड़ो आंदोलन के बिखरे हुए भूमिगत समूहों को अधिक संगठित नेतृत्व मिल सकता है।
यही कारण था कि पुलिस और खुफिया तंत्र उनके पीछे लगा रहा।
सितंबर 1943 — आखिरकार गिरफ्तारी
हजारीबाग जेल से निकलने के लगभग दस महीने बाद जयप्रकाश पकड़े गए।
19 सितंबर 1943 को उन्हें गिरफ्तार किया गया। एक समकालीन विवरण के अनुसार उनकी गिरफ्तारी हजारीबाग जेल से पलायन के ठीक दस महीने और दस दिन बाद हुई।
गिरफ्तारी के बाद उनका व्यवहार सामान्य राजनीतिक बंदी की तरह नहीं हुआ।
उन्हें कड़ी निगरानी और पूछताछ में रखा गया।
यह बताता है कि ब्रिटिश सरकार अब उन्हें कांग्रेस के साधारण राजनीतिक नेता की श्रेणी में नहीं देख रही थी।
वह उन्हें भूमिगत विद्रोही नेटवर्क का प्रमुख संचालक मानती थी।
लाहौर किला — कठोर कारावास और पूछताछ
गिरफ्तारी के बाद जयप्रकाश को लाहौर किले में रखा गया।
लाहौर किला ब्रिटिश शासन के दौरान गंभीर राजनीतिक और सुरक्षा बंदियों से पूछताछ के लिए कुख्यात स्थानों में गिना जाता था।
जयप्रकाश को वहां कठोर परिस्थितियों में रखा गया और उनसे भूमिगत आंदोलन तथा सहयोगियों के बारे में जानकारी प्राप्त करने की कोशिश की गई।
उनके जीवन-वृत्तों में इस अवधि को शारीरिक और मानसिक यातना से जुड़ा कठिन चरण बताया गया है।
फिर भी उन्होंने अपने सहयोगियों के बारे में जानकारी देने से इनकार किया।
यह अनुभव आगे उनके राजनीतिक जीवन पर गहरा प्रभाव डालता है।
लोहिया और भूमिगत समाजवादी नेटवर्क
राममनोहर लोहिया भी भूमिगत भारत छोड़ो आंदोलन के प्रमुख नेताओं में थे।
जयप्रकाश और लोहिया की राजनीतिक जोड़ी इस दौर में विशेष रूप से महत्वपूर्ण बनी।
दोनों पहले कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी में साथ काम कर चुके थे।
लेकिन 1942 में उनका संबंध केवल वैचारिक नहीं रहा।
अब वे ब्रिटिश शासन के विरुद्ध भूमिगत आंदोलन के प्रमुख योजनाकारों में थे।
अरुणा आसफ अली, अच्युत पटवर्धन और दूसरे समाजवादी तथा राष्ट्रवादी कार्यकर्ता भी इसी व्यापक नेटवर्क का हिस्सा थे।
इससे भारत छोड़ो आंदोलन का एक महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है—
शीर्ष कांग्रेस नेतृत्व की गिरफ्तारी के बाद समाजवादी धारा ने भूमिगत प्रतिरोध को संगठित रखने में अनुपात से कहीं बड़ी भूमिका निभाई।
आंदोलन तुरंत सफल नहीं हुआ, लेकिन ब्रिटिश शासन बदल चुका था
भारत छोड़ो आंदोलन 1942 में ही ब्रिटिश सत्ता समाप्त नहीं कर सका।
भारी दमन हुआ।
हजारों गिरफ्तारियां हुईं।
भूमिगत संगठन तोड़े गए।
जयप्रकाश और लोहिया जैसे नेता भी अंततः पकड़े गए।
फिर भी इस आंदोलन का ऐतिहासिक महत्व बहुत बड़ा था।
ब्रिटिश शासन को पहली बार यह स्पष्ट संकेत मिला कि अब भारत को पुराने तरीके से लंबे समय तक नियंत्रित करना अत्यंत कठिन होगा।
युद्ध समाप्त होने के बाद सत्ता हस्तांतरण का प्रश्न टाला नहीं जा सका।
जयप्रकाश के लिए भी 1942 निर्णायक था।
वे अब केवल कांग्रेस के समाजवादी नेता नहीं थे।
वे देशभर में ऐसे व्यक्ति के रूप में पहचाने जाने लगे थे जिसने ब्रिटिश जेल की दीवार पार की, भूमिगत आंदोलन चलाया और गिरफ्तारी के जोखिम के बावजूद संघर्ष जारी रखा।
जेल से पलायन ने जयप्रकाश की छवि बदल दी
हजारीबाग से पहले जयप्रकाश को राजनीतिक कार्यकर्ता, समाजवादी विचारक और कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के नेता के रूप में जाना जाता था।
हजारीबाग के बाद उनकी छवि बदल गई।
अब उनके व्यक्तित्व के साथ साहस, जोखिम, भूमिगत संघर्ष और व्यक्तिगत त्याग की कथा जुड़ गई।
सरकारी जीवन-वृत्त इसे उनकी लोकप्रियता में निर्णायक घटना मानता है।
यह वही नैतिक और संघर्षशील प्रतिष्ठा थी जो दशकों बाद 1974 में काम आई।
जब बिहार के छात्रों ने उनसे आंदोलन का नेतृत्व करने का आग्रह किया, तब उनके सामने कोई सामान्य सेवानिवृत्त राजनेता नहीं था।
उनके सामने वह व्यक्ति था जिसने स्वतंत्रता आंदोलन में जेल काटी थी, जेल से भागा था और अंग्रेजी शासन के विरुद्ध भूमिगत संघर्ष किया था।
1946 — जेल से रिहाई
जयप्रकाश नारायण 1946 तक जेल में रहे।
ब्रिटिश शासन की राजनीतिक परिस्थितियां बदल चुकी थीं। दूसरा विश्वयुद्ध समाप्त हो चुका था। भारत में सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया पर बातचीत आगे बढ़ रही थी और राजनीतिक बंदियों की रिहाई का प्रश्न भी उठ रहा था।
1946 में जयप्रकाश रिहा हुए।
जेल से बाहर आने तक वे स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे प्रतिष्ठित समाजवादी नेताओं में शामिल हो चुके थे।
लेकिन उनके सामने अब नया प्रश्न था—
स्वतंत्र भारत में उनकी भूमिका क्या होगी?
क्या वे सत्ता और संसदीय राजनीति के रास्ते जाएंगे?
क्या कांग्रेस के भीतर रहेंगे?
क्या स्वतंत्र समाजवादी दल बनाएंगे?
या धीरे-धीरे राजनीति की उस पूरी संरचना से ही दूरी बनाने लगेंगे जिसके लिए उन्होंने युवावस्था में संघर्ष किया था?
1942–46 के संघर्ष ने उन्हें अंग्रेजी शासन से सीधे टकराने वाला क्रांतिकारी नेता बनाया।
लेकिन स्वतंत्रता के बाद उनकी सबसे बड़ी वैचारिक यात्रा सत्ता प्राप्त करने की नहीं, बल्कि सत्ता से दूरी बनाने की होने वाली थी।