ठक्कर आयोग और आर.के. धवन विवाद
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या (1984): विस्तृत शोध
केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति एम.पी. ठक्कर की अध्यक्षता में जांच आयोग बनाया। उसका उद्देश्य केवल शूटर की पहचान नहीं था; सुरक्षा व्यवस्थाओं की चूक, घटना की परिस्थितियां और संभावित व्यापक षड्यंत्र की जांच करना था। आयोग ने सैकड़ों गवाहों, अधिकारियों और दस्तावेज़ों का परीक्षण किया। रिपोर्ट और उसके परिशिष्ट अत्यंत विस्तृत थे।
आयोग का मूल प्रश्न था: खतरे की स्पष्ट जानकारी के बावजूद दो सिख सुरक्षाकर्मी एक साथ प्रधानमंत्री के निकट हथियारबंद ड्यूटी पर कैसे रहे? इसे धर्म-आधारित संदेह नहीं, ब्लू स्टार के बाद विशिष्ट खतरा निर्देश और अंदरूनी सुरक्षा नियम के संदर्भ में देखा गया। यदि नियम बना था तो किसने तोड़ा; यदि स्पष्ट नियम नहीं था तो किसने बनाने में देर की?
ठक्कर ने कई वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारियों में समन्वय की कमी, उदासीनता, निर्णयहीनता और लालफीताशाही की आलोचना की। रिपोर्ट से संबंधित समकालीन समाचारों में आर.एन. काव, दिल्ली पुलिस आयुक्त और इंटेलिजेंस ब्यूरो अधिकारियों सहित अनेक पदों का उल्लेख आया। आयोग का व्यापक निष्कर्ष था कि जिम्मेदार अधिकारियों ने अपेक्षित कार्य किया होता तो घटना टाली जा सकती थी।
रिपोर्ट मई 1986 के आसपास सरकार को दी गई, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा और जारी जांच के आधार पर लंबे समय तक पूर्ण रूप से सार्वजनिक नहीं की गई। 1989 में मीडिया लीक और संसद में भारी विवाद के बाद महत्वपूर्ण भाग रखे गए। हजारों पृष्ठ के परिशिष्ट और सुरक्षा विवरण व्यापक सार्वजनिक क्षेत्र में नहीं आए। गोपनीयता ने वैध सुरक्षा चिंता के साथ राजनीतिक संदेह भी पैदा किया।
आयोग और अदालत में अंतर
जांच आयोग तथ्य खोजने और प्रशासनिक सुझाव देने के लिए होता है। वह आपराधिक दोष या दंड तय नहीं करता। वह “संदेह के पर्याप्त आधार” लिख सकता है जहां अदालत को “संदेह से परे प्रमाण” चाहिए। इसलिए ठक्कर की किसी व्यक्ति पर टिप्पणी को न्यायिक दोषसिद्धि की तरह प्रस्तुत करना कानूनी रूप से गलत है।
आर.के. धवन इंदिरा गांधी के सबसे निकट और लंबे समय तक विश्वस्त निजी सहायकों में थे। उनके पास दैनिक कार्यक्रम, नियुक्तियों, आगंतुकों और प्रधानमंत्री तक पहुंच पर प्रभाव था। इसी निकटता के कारण आयोग ने उनकी भूमिका को विशेष रूप से जांचा। रिपोर्ट का बड़ा भाग उनसे जुड़े प्रश्नों पर केंद्रित बताया गया।
आयोग ने कथित रूप से निम्न परिस्थितियों को संदिग्ध माना:
- सुरक्षा कर्मियों की तैनाती या वापसी में उनकी भूमिका;
- उस्तीनोव साक्षात्कार के समय और पैदल मार्ग की जानकारी;
- हमले के समय उनकी स्थिति तथा बाद की गवाही में कथित असंगतियां;
- सुरक्षा निर्देशों पर प्रधानमंत्री कार्यालय और एजेंसियों के बीच व्यवहार;
- गोलीबारी से धवन का सुरक्षित बचना—जो अपने आप प्रमाण नहीं, पर आयोग ने परिस्थिति में देखा।
ठक्कर ने कठोर भाषा में कहा कि धवन की संभावित संलिप्तता पर गंभीर संदेह के कारण हैं और आगे आपराधिक जांच आवश्यक है। रिपोर्ट का अंश लीक होने पर राष्ट्रीय राजनीतिक तूफान आया। विपक्ष ने पूछा कि जिस व्यक्ति पर आयोग ने संदेह किया उसे सरकार और कांग्रेस में पुनः प्रभाव कैसे मिला। धवन तथा समर्थकों ने आरोपों को निराधार और व्यक्तिगत अन्याय कहा।
आगे जांच एजेंसियों ने उनके विरुद्ध अभियोजन योग्य प्रमाण नहीं पाया। कोई अदालत उन्हें हत्या या षड्यंत्र में दोषी नहीं ठहराती; कोई अंतिम आरोपपत्र दोषसिद्धि तक नहीं पहुंचा। इसलिए सही निष्कर्ष है: ठक्कर आयोग ने गंभीर संदेह व्यक्त किया, लेकिन बाद की आपराधिक जांच ने प्रमाण नहीं पाया और धवन कानूनी रूप से दोषी नहीं थे।
संदेह क्यों कायम रहा?
रिपोर्ट की देरी, परिशिष्टों की गोपनीयता, धवन की राजनीतिक वापसी और सार्वजनिक स्पष्टीकरण की कमी ने संदेह जीवित रखा। सरकार यदि आगे जांच की पद्धति और निष्कर्ष का विस्तृत गैर-गोपनीय सार जारी करती तो प्रश्न कम हो सकते थे। गोपनीयता ने दोष सिद्ध नहीं किया, लेकिन विश्वास कमजोर किया।
ठक्कर आयोग ने कथित रूप से संभावना जताई कि प्रत्यक्ष हत्यारे किसी अदृश्य बाहरी शक्ति के उपकरण हो सकते हैं। 1980 के दशक में पाकिस्तान के साथ भारत के तनाव, पंजाब उग्रवाद को सीमा-पार समर्थन और विदेशी धरती पर खालिस्तानी संगठनों की गतिविधियां वास्तविक सुरक्षा चिंता थीं। जून 1985 का एयर इंडिया फ्लाइट 182 विस्फोट बाद में प्रवासी चरमपंथ की घातक क्षमता दिखाता है।
लेकिन सामान्य भू-राजनीतिक संदर्भ विशिष्ट अपराध में आदेश का प्रमाण नहीं। इंदिरा गांधी हत्या मुकदमे में पाकिस्तान की एजेंसी, किसी पश्चिमी देश या किसी नामित विदेशी संगठन को षड्यंत्रकारी सिद्ध नहीं किया गया। कोई सार्वजनिक धन-लेनदेन, आदेश-पत्र या नियंत्रक–हमलावर संपर्क न्यायिक निष्कर्ष का हिस्सा नहीं।
विदेशी हाथ के दावे राजनीतिक रूप से उपयोगी भी होते हैं। वे राष्ट्रीय एकता की भाषा मजबूत, घरेलू सुरक्षा विफलता को बाहरी शत्रु पर स्थानांतरित और गोपनीयता को उचित ठहरा सकते हैं। दूसरी ओर, वास्तविक बाहरी समर्थन को केवल राजनीतिक बहाना मानना भी गलत होगा। उचित स्थिति है: व्यापक पंजाब उग्रवाद में सीमा-पार सहायता के प्रमाण हैं; 31 अक्टूबर की विशिष्ट हत्या में प्रत्यक्ष विदेशी निर्देशन सार्वजनिक न्यायिक प्रमाण से स्थापित नहीं।
ठक्कर आयोग ने अनेक अधिकारियों की उदासीनता, निर्णयहीनता और समन्वय की कमी की आलोचना की। पर प्रशासनिक जवाबदेही का प्रश्न केवल नामों तक सीमित नहीं। क्या स्पष्ट लिखित कमान थी? चेतावनी किस प्रारूप में आई? किसे उसे लागू करना था? उल्लंघन पर स्वतः अलार्म क्यों नहीं हुआ? ये प्रणालीगत प्रश्न हैं।
हत्या के बाद कुछ अधिकारियों का स्थानांतरण, विभागीय कार्रवाई या भूमिका परिवर्तन हुआ। लेकिन सार्वजनिक क्षेत्र में प्रत्येक दोष, उत्तर और दंड की समेकित सूची नहीं है। इससे धारणा बनी कि राष्ट्रीय असफलता का बोझ कुछ व्यक्तियों पर डालकर संरचना बचा ली गई।
सुरक्षा में जवाबदेही का उद्देश्य प्रतिशोध नहीं, पुनरावृत्ति रोकना है। यदि अधिकारी भय से हर निर्णय अत्यधिक प्रतिबंधित करे तो लोकतांत्रिक नेता जनता से कट जाएगा। इसलिए समीक्षा को यह बताना चाहिए कि कौन-सी गलती लापरवाही, कौन निर्णय-विवेक और कौन अस्पष्ट नीति थी।