सत्ता हस्तांतरण और राष्ट्रीय शोक
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या (1984): विस्तृत शोध

भारत का संविधान प्रधानमंत्री की हत्या की स्थिति में स्वचालित उत्तराधिकारी का नाम तय नहीं करता। राष्ट्रपति उस व्यक्ति को प्रधानमंत्री नियुक्त करते हैं जो लोकसभा में बहुमत प्राप्त करने की संभावना रखता हो। 1984 में कांग्रेस को बड़ा बहुमत था, लेकिन औपचारिक संसदीय दल बैठक से पहले तत्काल नेतृत्व का प्रश्न उठा।
वरिष्ठ मंत्रियों की भूमिकाओं पर बाद के संस्मरणों में अलग कथाएं हैं। व्यापक सहमति तेजी से राजीव गांधी के पक्ष में बनी। तर्क था कि राष्ट्रीय संकट, संभावित हिंसा और सुरक्षा खतरे के बीच तुरंत पहचाना नेतृत्व चाहिए। आलोचक इसे वंशवादी स्वचालित उत्तराधिकार कहते हैं; समर्थक कांग्रेस बहुमत और परिस्थितिजन्य सर्वसम्मति का हवाला देते हैं।
राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह विदेश से लौटकर AIIMS पहुंचे और फिर राजीव को सरकार बनाने का आमंत्रण दिया। शाम को राष्ट्रपति भवन में शपथ हुई। संवैधानिक निरंतरता कुछ घंटों में बहाल हुई। कानूनी वैधता और दल के आंतरिक लोकतंत्र की गुणवत्ता फिर भी अलग प्रश्न हैं।
राजीव गांधी उस समय कांग्रेस के महासचिव और सांसद थे। वे सक्रिय राजनीति में केवल कुछ वर्ष पहले आए थे। संजय गांधी की मृत्यु के बाद परिवार तथा पार्टी ने उन्हें उत्तराधिकारी की तरह आगे बढ़ाया, लेकिन उनके पास मंत्री या प्रशासनिक प्रमुख का लंबा अनुभव नहीं था। हत्या ने क्रमिक तैयारी को तत्काल उत्तराधिकार में बदल दिया।
शपथ ग्रहण का उद्देश्य देश और दुनिया को संदेश देना था कि सरकार काम कर रही है। परमाणु शक्ति-संपन्न, पड़ोसी संघर्षों से घिरे और आंतरिक उग्रवाद झेलते देश में नेतृत्व-विहीनता गंभीर खतरा होती। विदेशी सरकारों, सैन्य कमान और राज्य मुख्यमंत्रियों को वैध निर्णयकर्ता चाहिए था।
राजीव के सामने प्रथम कर्तव्य शांति और नागरिक सुरक्षा था। उन्होंने राष्ट्र को संबोधित किया, लेकिन दिल्ली में हिंसा तेजी से फैली। इस डोसियर में केवल इतना दर्ज करना पर्याप्त है कि सत्ता का औपचारिक हस्तांतरण तेज और शांतिपूर्ण था, पर सड़कों पर राज्य निर्दोष सिख नागरिकों की रक्षा में विफल रहा। विस्तृत जिम्मेदारी अलग डोसियर का विषय होगी।
दिसंबर 1984 के आम चुनाव में सहानुभूति लहर और राष्ट्रीय एकता के संदेश के बीच कांग्रेस ने अभूतपूर्व बहुमत प्राप्त किया। राजीव की वैधता नियुक्ति से चुनावी जनादेश में बदली। लेकिन हत्या से उपजी भावना ने चुनाव को असमान संदर्भ दिया; विपक्ष के लिए सामान्य राजनीतिक बहस कठिन थी।
इंदिरा गांधी का पार्थिव शरीर जनता के दर्शन के लिए तीन मूर्ति भवन में रखा गया, जो जवाहरलाल नेहरू का पूर्व निवास था। देशभर से नागरिक, राजनीतिक नेता और विदेशी प्रतिनिधि दिल्ली आए। 3 नवंबर 1984 को यमुना के निकट शक्ति स्थल पर अंतिम संस्कार हुआ। राजीव गांधी ने मुखाग्नि दी।
शोक समारोह ने नेहरू–गांधी परिवार की राष्ट्रीय प्रतीकात्मकता को फिर केंद्र में रखा। जवाहरलाल नेहरू की पुत्री, 1971 की युद्ध नेता और लंबे समय तक प्रधानमंत्री रही इंदिरा की मृत्यु को कांग्रेस ने राष्ट्र के लिए बलिदान के रूप में प्रस्तुत किया। आपातकाल और अन्य राजनीतिक विवाद शोक के दिनों में पीछे चले गए।
विदेशी नेताओं की उपस्थिति ने भारत की वैश्विक स्थिति और इंदिरा के लंबे कूटनीतिक जीवन को दर्शाया। शीत युद्ध के बीच सोवियत संघ, पश्चिमी देशों, गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों और पड़ोसी देशों के प्रतिनिधि आए। सुरक्षा एजेंसियों के लिए इतने उच्च पदस्थ लोगों का एकत्र होना अतिरिक्त चुनौती थी।
लेकिन इसी अवधि में राजधानी और अन्य स्थानों पर सिख नागरिक मारे जा रहे थे। राष्ट्रीय शोक का आधिकारिक मंच और नागरिक भय की गलियां एक साथ मौजूद थीं। इतिहास में एक को दिखाकर दूसरे को छिपाना नैतिक रूप से अधूरा होगा, भले ही विस्तृत हिंसा अलग डोसियर में जाए।