जांच, फॉरेंसिक और विशेष जांच दल
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या (1984): विस्तृत शोध
हत्या के तुरंत बाद दिल्ली पुलिस और केंद्रीय एजेंसियों ने घटनास्थल सील किया। दोनों सेवा हथियार, खाली कारतूस, गोलियां, रक्त और गवाहों के बयान मुख्य साक्ष्य थे। प्रत्यक्ष हमला प्रधानमंत्री के अपने सुरक्षा घेरे में हुआ था, इसलिए किसी अज्ञात शूटर की पहचान से अधिक कठिन प्रश्न था—अंदरूनी पहुंच का दुरुपयोग किसने और किसके साथ किया?
जांच को कई समानांतर धाराओं में चलना था:
- बेअंत और सतवंत की प्रत्यक्ष गोलीबारी का फॉरेंसिक प्रमाण;
- ड्यूटी रोस्टर तथा अंतिम क्षण के बदलाव;
- दोनों के पिछले महीनों के संपर्क, यात्राएं और संवाद;
- केहर और बलबीर जैसे कथित प्रेरकों की भूमिका;
- सुरक्षा चेतावनियों का अभिलेख और उनका क्रियान्वयन;
- हमलावरों पर बाद के जवाबी फायर की परिस्थिति;
- किसी उग्रवादी संगठन, विदेशी संपर्क या वित्तीय सहायता की संभावना।
देश शोक और हिंसा में था। राजनीतिक नेतृत्व तुरंत उत्तर चाहता था, पर पेशेवर षड्यंत्र जांच समय मांगती है। बेअंत की मृत्यु से पूछताछ का महत्वपूर्ण स्रोत चला गया और सतवंत अस्पताल में गंभीर स्थिति में था। इस रिक्तता में एजेंसियों ने रिश्तों और व्यवहार पर अधिक निर्भरता दिखाई।
जांच में यह जोखिम हमेशा रहता है कि राष्ट्रीय आघात के बाद “किसी बड़े हाथ” की अपेक्षा प्रमाण से पहले निष्कर्ष बना दे। छोटे समूह द्वारा सरल अंदरूनी हमला जनता को असंतोषजनक व्याख्या लगता है; वह मानती है कि इतनी बड़ी घटना के पीछे विशाल संगठन अवश्य होगा। लेकिन अपराध का महत्व षड्यंत्रकारियों की संख्या सिद्ध नहीं करता।
अभियोजन का सबसे मजबूत भाग प्रत्यक्ष हमलावरों से संबंधित था। घटनास्थल पर मौजूद कर्मियों ने बेअंत और सतवंत को गोली चलाते देखा। दोनों के हथियार तत्काल मिले। कारतूस और गोलियों का बैलिस्टिक मिलान, निकट दूरी की चोटें और हमले का क्रम गवाहियों के साथ संगत था।
सतवंत के बचाव ने उसके घायल होने, हिरासत और कथित बयान पर सवाल उठाए। यदि मामला केवल पुलिस स्वीकारोक्ति पर आधारित होता तो संदेह अधिक होता। लेकिन अदालत ने स्वतंत्र प्रत्यक्षदर्शी और भौतिक साक्ष्य को पर्याप्त माना। उसके हथियार से चली गोलियां और घटनास्थल पर उपस्थिति विवाद से परे थी।
बेअंत के विरुद्ध मुकदमा नहीं चल सका क्योंकि वह मर चुका था। फिर भी उसकी कार्रवाई को अदालत ने सह-अभियुक्तों के षड्यंत्र मूल्यांकन में तथ्य माना। भारतीय कानून में मृत व्यक्ति को औपचारिक रूप से दोषसिद्ध नहीं किया जाता, इसलिए तकनीकी भाषा में “प्रत्यक्ष हमलावर” कहना बेहतर है, “अदालत से दोषी” नहीं।
फॉरेंसिक रिकॉर्ड का सार्वजनिक प्रस्तुतीकरण सीमित रहा। गोलियों और घावों की अलग मीडिया संख्याएं इसी का परिणाम हैं। संवेदनशीलता के बावजूद एक गैर-ग्राफिक आधिकारिक तकनीकी सार सार्वजनिक होता तो लोकप्रिय भ्रम कम होते।
सरकार ने हत्या की आपराधिक जांच के लिए विशेष जांच व्यवस्था बनाई। पुलिस अधिकारियों और केंद्रीय एजेंसियों ने बड़ी संख्या में गवाहों, सुरक्षाकर्मियों, रिश्तेदारों और संभावित उग्रवादी संपर्कों से पूछताछ की। फोन और डिजिटल रिकॉर्ड का वह युग नहीं था; यात्रा, पत्र, प्रत्यक्ष गवाही और भौतिक दस्तावेज़ मुख्य साधन थे।
जांच ने केहर सिंह और बलबीर सिंह को कथित साजिश से जोड़ा। अभियोजन की कहानी में केहर वैचारिक प्रेरक तथा गोपनीय संपर्क था; बलबीर सुरक्षा प्रणाली से जुड़ा सह-षड्यंत्रकारी बताया गया। निचली अदालत ने दोनों कथाएं स्वीकार कीं, पर सुप्रीम कोर्ट ने बलबीर वाली श्रृंखला अपूर्ण पाई। यह अंतर जांच की सीमा दिखाता है।
ठक्कर आयोग की टिप्पणियों के बाद आर.के. धवन और अन्य व्यक्तियों पर आगे जांच हुई। सार्वजनिक रिपोर्टों के अनुसार जांच एजेंसियों ने धवन के विरुद्ध अभियोजन योग्य साक्ष्य नहीं पाया और उन्हें दोषमुक्त माना। इसका अर्थ आयोग के प्रश्न निरर्थक नहीं, बल्कि आपराधिक मानक—संदेह से परे प्रमाण—पूरा नहीं हुआ।
कुछ रिपोर्टों में बाद में अन्य व्यक्तियों पर आरोपपत्र की संभावना या विदेशी सहायता का उल्लेख आया, लेकिन हत्या के लिए अंतिम न्यायिक दोषसिद्धि सतवंत और केहर तक सीमित रही। इतिहास में संभावित और सिद्ध नेटवर्क को मिलाना अनुचित होगा।