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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–016 · अध्याय 16

प्रमुख व्यक्तित्व और विस्तृत समयरेखा

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या (1984): विस्तृत शोध

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskविस्तृत शोध संस्करण · 3 अगस्त 2026
1984 में राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह
राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह, अप्रैल 1984—हत्या के बाद उसी शाम राजीव गांधी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाने वाले राष्ट्रपति।स्रोत: Wikimedia Commons · Rsamy2008 · CC0

इंदिरा गांधी

भारत की तीसरी और पहली महिला प्रधानमंत्री; 1966–77 और 1980–84 तक शासन। 1971 युद्ध की निर्णायक नेता, लेकिन 1975–77 आपातकाल और अत्यधिक केंद्रीकरण के लिए आलोचित। पंजाब में उनकी सरकार ने जून 1984 में ब्लू स्टार का आदेश दिया। 31 अक्टूबर को प्रतिशोधी राजनीतिक हत्या का लक्ष्य बनीं।

बेअंत सिंह

दिल्ली पुलिस सब-इंस्पेक्टर और लंबे समय का अंगरक्षक। .38 रिवॉल्वर से पहला फायर किया। हमले के बाद सुरक्षा कर्मियों की गोली से मारा गया; मुकदमा नहीं चल सका। न्यायिक रिकॉर्ड में प्रत्यक्ष हमलावर।

सतवंत सिंह

प्रधानमंत्री सुरक्षा का कांस्टेबल। स्टर्लिंग सब-मशीन गन से गोली चलाई। जवाबी फायर में घायल, जीवित गिरफ्तार। विशेष अदालत, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से दोषसिद्ध; 6 जनवरी 1989 को फांसी।

केहर सिंह

सरकारी कर्मचारी और बेअंत का रिश्तेदार। प्रत्यक्ष स्थल पर नहीं था; धार्मिक प्रेरणा और गुप्त बैठकों की परिस्थितिजन्य श्रृंखला पर षड्यंत्र का दोषी। साक्ष्य की पर्याप्तता विवादित रही। सतवंत के साथ फांसी।

बलबीर सिंह

सुरक्षा से जुड़ा अधिकारी जिसे विशेष अदालत और हाईकोर्ट ने दोषी ठहराया। सुप्रीम कोर्ट ने साक्ष्य अपूर्ण मानकर बरी किया। शोध में अंतिम बरी स्थिति अनिवार्य रूप से लिखी जाए।

आर.के. धवन

इंदिरा गांधी के प्रभावशाली निजी सचिव। ठक्कर आयोग ने संभावित भूमिका पर गंभीर संदेह व्यक्त किया; आगे जांच में अपराध का पर्याप्त प्रमाण नहीं मिला और कोई दोषसिद्धि नहीं। आयोग-संदेह और कानूनी स्थिति अलग रखी जाए।

न्यायमूर्ति एम.पी. ठक्कर

सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश और हत्या जांच आयोग के अध्यक्ष। सुरक्षा चूकों पर कठोर निष्कर्ष और धवन/विदेशी संभावना पर टिप्पणियों से रिपोर्ट विवादित हुई। आयोग का कार्य आपराधिक फैसला नहीं था।

आर.एन. काव

रॉ के संस्थापक और वरिष्ठ सुरक्षा सलाहकार। प्रधानमंत्री सुरक्षा पुनर्गठन में भूमिका; आयोग ने शीर्ष स्तर की समन्वय चूक की समीक्षा की। बाद की सुरक्षा संरचना के विकास में भी महत्वपूर्ण।

ज्ञानी जैल सिंह

भारत के राष्ट्रपति, सिख नेता और पूर्व गृह मंत्री। हत्या के समय विदेश यात्रा पर थे; लौटकर राजीव गांधी को प्रधानमंत्री नियुक्त किया। उनकी संवैधानिक भूमिका और सिख पहचान ने संकट को विशेष संवेदनशीलता दी।

राजीव गांधी

इंदिरा के पुत्र, कांग्रेस महासचिव और सांसद। 31 अक्टूबर की शाम प्रधानमंत्री बने; दिसंबर चुनाव में विशाल बहुमत। पंजाब समझौते की कोशिश की। 1991 में स्वयं राजनीतिक हत्या के शिकार हुए।

1966–1977 : प्रधानमंत्री और केंद्रीकृत सत्ता का निर्माण

24 जनवरी 1966: इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने उन्हें समझौता नेता माना, लेकिन उन्होंने शीघ्र स्वतंत्र शक्ति बनाई।

1969: कांग्रेस विभाजन और बैंक राष्ट्रीयकरण। प्रधानमंत्री कार्यालय तथा व्यक्तिगत नेतृत्व की शक्ति बढ़ी।

दिसंबर 1971: भारत–पाकिस्तान युद्ध के बाद बांग्लादेश का निर्माण। इंदिरा की राष्ट्रीय लोकप्रियता चरम पर।

जून 1975: चुनाव निर्णय और विपक्षी आंदोलन के बाद राष्ट्रीय आपातकाल घोषित। नागरिक अधिकार तथा प्रेस पर प्रतिबंध ने विरासत को विवादित किया।

मार्च 1977: आम चुनाव में कांग्रेस पराजित; इंदिरा सत्ता से बाहर।

1978–1983 : सत्ता में वापसी और पंजाब संकट

13 अप्रैल 1978: अमृतसर निरंकारी–सिख संघर्ष; जर्नैल सिंह भिंडरांवाले के उदय का निर्णायक बिंदु।

जनवरी 1980: कांग्रेस की सत्ता में वापसी; इंदिरा फिर प्रधानमंत्री।

24 अप्रैल 1980: निरंकारी प्रमुख गुरबचन सिंह की दिल्ली में हत्या; धार्मिक प्रतिशोध की राजनीति तेज।

23 जून 1980: संजय गांधी की विमान दुर्घटना में मृत्यु। राजीव गांधी के राजनीति में प्रवेश का रास्ता बना।

9 सितंबर 1981: लाला जगत नारायण की हत्या। भिंडरांवाले गिरफ्तार, बाद में पर्याप्त साक्ष्य न होने पर रिहा।

जुलाई 1982: भिंडरांवाले गुरु नानक निवास में आए।

4 अगस्त 1982: अकाली दल का धर्म युद्ध मोर्चा शुरू। संवैधानिक आंदोलन और बढ़ती हथियारबंद हिंसा समानांतर चले।

25 अप्रैल 1983: डीआईजी ए.एस. अटवाल की हरमंदिर साहिब से बाहर निकलते समय हत्या।

5 अक्टूबर 1983: ढिलवां बस हत्या में छह हिंदू यात्रियों की पहचान के आधार पर हत्या।

6 अक्टूबर 1983: पंजाब की दरबारा सिंह सरकार बर्खास्त; राष्ट्रपति शासन।

दिसंबर 1983: भिंडरांवाले अकाल तख्त में चले गए; परिसर की सशस्त्र किलेबंदी मजबूत।

जनवरी–जून 1984 : विफल वार्ता और ब्लू स्टार

जनवरी–मई 1984: केंद्र और अकाली नेतृत्व में वार्ता; चंडीगढ़, जल और संघीय प्रश्नों पर गतिरोध। पंजाब में हत्याएं बढ़ीं।

12 मई 1984: संपादक रमेश चंदर की हत्या।

23 मई 1984: अकाली दल ने 3 जून से अनाज रोको आंदोलन की घोषणा की।

अंतिम सप्ताह, मई: सेना को पंजाब में कार्रवाई की तैयारी का निर्देश।

1 जून: हरमंदिर साहिब परिसर और सुरक्षा बलों में गोलीबारी।

3 जून: पंजाब में कर्फ्यू और संचारबंदी; गुरु अर्जन देव शहीदी गुरुपर्व के कारण परिसर में श्रद्धालु।

5–6 जून: मुख्य सैन्य हमला; अकाल तख्त पर भारी फायर, भिंडरांवाले, शाबेग सिंह और अमरीक सिंह मारे गए।

7–10 जून: परिसर की तलाशी और पंजाब के अन्य धार्मिक स्थलों पर कार्रवाई। ऑपरेशन वुडरोज का ग्रामीण चरण।

10 जुलाई 1984: सरकार का पंजाब आंदोलन पर श्वेतपत्र संसद में।

जून–अक्टूबर 1984 : खतरे का विस्तार

जून के बाद: देश और विदेश से इंदिरा गांधी के विरुद्ध प्रतिशोधी धमकियां बढ़ीं। सुरक्षा एजेंसियों ने निकट सुरक्षा पर पुनर्विचार किया।

जून–सितंबर: बेअंत सिंह, सतवंत सिंह और केहर सिंह के संपर्क तथा धार्मिक गतिविधियों को बाद में अभियोजन ने षड्यंत्र की तैयारी से जोड़ा। ठीक तारीखों और बातचीत की सामग्री का पूरा प्रत्यक्ष रिकॉर्ड नहीं।

सितंबर–अक्टूबर: प्रधानमंत्री के कार्यक्रम जारी रहे। सिख सुरक्षाकर्मियों को हटाने और धर्मनिरपेक्षता संबंधी चर्चा के संस्मरण इसी अवधि से जुड़े हैं।

30 अक्टूबर: भुवनेश्वर में इंदिरा गांधी का भाषण—राष्ट्र सेवा में मृत्यु और रक्त की बूंदों से देश मजबूत होने का भाव। शाम को दिल्ली वापसी।

31 अक्टूबर 1984 : मिनट-दर-मिनट

सुबह: प्रधानमंत्री ने सामान्य कार्य आरंभ किया। पीटर उस्तीनोव के टेलीविजन साक्षात्कार का कार्यक्रम।

लगभग 9:20 बजे: इंदिरा गांधी 1 सफदरजंग रोड से 1 अकबर रोड की ओर उद्यान मार्ग पर चलीं। गेट पर बेअंत सिंह ने रिवॉल्वर और सतवंत सिंह ने सब-मशीन गन से फायर किया।

तुरंत बाद: अन्य सुरक्षाकर्मी पहुंचे। प्रधानमंत्री को वाहन से AIIMS ले जाया गया। बेअंत और सतवंत ने हथियार छोड़े; बाद के सुरक्षा फायर में बेअंत मारा और सतवंत घायल हुआ।

लगभग 9:30–10 बजे: AIIMS में वरिष्ठ चिकित्सकों ने उपचार और पुनर्जीवन शुरू किया। सरकारी तथा राजनीतिक नेतृत्व अस्पताल पहुंचा।

दोपहर: विदेशी प्रसारणों में मृत्यु की खबर आने लगी; भारतीय आधिकारिक घोषणा लंबित। राजीव गांधी पश्चिम बंगाल से दिल्ली के लिए रवाना। राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह विदेश से लौटे।

लगभग 2:20 बजे: आधिकारिक चिकित्सा रिकॉर्ड में मृत्यु घोषित। सार्वजनिक प्रसारण बाद में।

दोपहर–शाम: AIIMS और दिल्ली के कुछ हिस्सों में सिख-विरोधी नारे तथा हमले शुरू। राष्ट्रपति के काफिले पर भीड़ का हमला।

शाम: राजीव गांधी को राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई। देश को संबोधन और शांति अपील।

1–3 नवंबर 1984 : शोक और सामूहिक हिंसा

1 नवंबर: दिल्ली में सिखों के विरुद्ध संगठित हिंसा का व्यापक विस्तार। पुलिस की निष्क्रियता और राजनीतिक भूमिका के आरोप।

2 नवंबर: हत्याएं, आगजनी और विस्थापन चरम पर; सेना की प्रभावी तैनाती में देरी।

3 नवंबर: इंदिरा गांधी का अंतिम संस्कार। राजधानी के कई भागों में हिंसा धीरे-धीरे नियंत्रण में। विस्तृत घटनाक्रम अलग डोसियर में।

नवंबर 1984–जनवरी 1986 : जांच और निचली अदालत

नवंबर 1984: न्यायमूर्ति एम.पी. ठक्कर की अध्यक्षता में जांच आयोग गठित करने की प्रक्रिया।

दिसंबर 1984: आम चुनाव; कांग्रेस को 400 से अधिक सीटों का ऐतिहासिक बहुमत।

1985: सतवंत, केहर और बलबीर के विरुद्ध विशेष सुरक्षा में मुकदमा आरंभ। प्रत्यक्षदर्शी, फॉरेंसिक और परिस्थितिजन्य साक्ष्य पेश।

24 जुलाई 1985: राजीव–लोंगोवाल पंजाब समझौता।

20 अगस्त 1985: संत लोंगोवाल की उग्रवादियों द्वारा हत्या।

जनवरी 1986: विशेष न्यायाधीश महेश चंद्र ने सतवंत, केहर और बलबीर को दोषी ठहराकर मृत्युदंड दिया।

1986–1989 : आयोग, अपील और फांसी

मई 1986 के आसपास: ठक्कर आयोग ने सरकार को विस्तृत रिपोर्ट दी। राष्ट्रीय सुरक्षा और जारी जांच के कारण पूर्ण प्रकाशन रोका गया।

3 दिसंबर 1986: दिल्ली हाईकोर्ट ने तीनों की दोषसिद्धि और मृत्युदंड कायम रखा।

3 अगस्त 1988: सुप्रीम कोर्ट ने सतवंत और केहर की दोषसिद्धि तथा मृत्युदंड बरकरार रखा; बलबीर सिंह बरी।

1988 के अंत: समीक्षा और दया याचिकाओं पर संवैधानिक मुकदमे। राष्ट्रपति की अनुच्छेद 72 शक्ति पर सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण व्याख्या।

5 जनवरी 1989: अंतिम न्यायिक प्रयास असफल।

6 जनवरी 1989: सतवंत सिंह और केहर सिंह को तिहाड़ जेल में फांसी।

मार्च 1989: मीडिया लीक और राजनीतिक विवाद के बाद ठक्कर आयोग रिपोर्ट के महत्वपूर्ण हिस्से संसद के समक्ष आए। आर.के. धवन पर आयोग के संदेह से राष्ट्रीय बहस।

दीर्घकालीन घटनाएं

1985–1988: SPG की कार्यकारी स्थापना और बाद में कानूनी ढांचा विकसित।

1988: संसद ने SPG अधिनियम बनाया, प्रधानमंत्री सुरक्षा को विशेष एकीकृत व्यवस्था मिली।

21 मई 1991: राजीव गांधी की LTTE आत्मघाती हमले में हत्या; पूर्व प्रधानमंत्रियों की सुरक्षा पर नया पुनर्विचार।

बाद के दशक: बेअंत, सतवंत और केहर की स्मृति पर पंथक आयोजन तथा राजनीतिक विवाद; राज्य और समुदाय के आख्यान अलग बने रहे।