इंदिरा गांधी: सत्ता, व्यक्तित्व, जोखिम और विरासत
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या (1984): विस्तृत शोध
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इंदिरा प्रियदर्शिनी गांधी भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की पुत्री थीं। जनवरी 1966 में लालबहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद वे प्रधानमंत्री बनीं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने आरंभ में उन्हें समझौता उम्मीदवार और अपेक्षाकृत नियंत्रित नेता माना, पर कुछ वर्षों में उन्होंने पार्टी तथा सरकार की शक्ति अपने हाथ में केंद्रित कर ली। 1969 में कांग्रेस विभाजन, बैंकों का राष्ट्रीयकरण, रियासतों के प्रिवी पर्स का अंत और 1971 का “गरीबी हटाओ” अभियान उनकी जननेता छवि के आधार बने।
1971 के भारत–पाकिस्तान युद्ध और बांग्लादेश निर्माण ने उन्हें असाधारण प्रतिष्ठा दी। लेकिन 1975 में चुनावी मुकदमे और विपक्षी आंदोलन के बाद लगाया गया आपातकाल उनकी लोकतांत्रिक विरासत पर सबसे गंभीर प्रश्न बना। प्रेस सेंसरशिप, गिरफ्तारियां, जबरन नसबंदी और संस्थागत केंद्रीकरण के कारण 1977 में कांग्रेस पराजित हुई। 1980 में सत्ता में वापसी के बाद भी उनकी राजनीति में मजबूत केंद्र और निर्णायक प्रधानमंत्री की प्रवृत्ति बनी रही।
1980 में पुत्र संजय गांधी की विमान दुर्घटना में मृत्यु ने निजी और राजनीतिक जीवन बदल दिया। राजीव गांधी को राजनीति में लाया गया। कांग्रेस संगठन, प्रधानमंत्री कार्यालय और परिवार के बीच शक्ति का नया विन्यास बना। असम, कश्मीर, आंध्र प्रदेश और पंजाब जैसे क्षेत्रों में केंद्र तथा प्रादेशिक आकांक्षाओं का तनाव बढ़ रहा था।
इंदिरा गांधी की कार्यशैली में व्यक्तिगत संपर्क, कुछ विश्वस्त सहायकों पर निर्भरता और औपचारिक संस्थाओं के ऊपर प्रधानमंत्री कार्यालय की शक्ति शामिल थी। यही व्यवस्था संकट में तेजी देती थी, लेकिन सुरक्षा और जवाबदेही में “कौन अंतिम निर्णय लेता है” की अस्पष्टता भी बना सकती थी। आर.के. धवन जैसे निजी स्टाफ सदस्य नियुक्ति, कार्यक्रम और पहुंच में अत्यंत प्रभावशाली थे, जबकि औपचारिक सुरक्षा एजेंसियां अलग कमान में थीं।
उनका सार्वजनिक व्यक्तित्व निर्भय था। वे भीड़ में जाना, पैदल चलना और नागरिकों से निकट संपर्क रखना पसंद करती थीं। सुरक्षा अधिकारी खतरे के बाद बुलेटप्रूफ जैकेट, मार्ग नियंत्रण या कर्मचारियों के पुनर्गठन की सलाह देते, पर लोकतांत्रिक नेता की सहज उपलब्धता और कठोर सुरक्षा में टकराव था। इंदिरा गांधी कभी-कभी व्यक्तिगत निर्णय से सुरक्षा प्रोटोकॉल नरम कर देती थीं। यह साहस था, लेकिन सुरक्षा व्यवस्था व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर हो तो संस्थागत जोखिम भी।
जीवनकाल में इंदिरा गांधी की विरासत गहराई से विवादित थी: 1971 की विजय और बांग्लादेश, गरीबी हटाओ और राज्य हस्तक्षेप, परमाणु परीक्षण, गुटनिरपेक्ष नेतृत्व; दूसरी ओर आपातकाल, संस्थागत केंद्रीकरण, नागरिक स्वतंत्रता हनन और पंजाब नीति। हिंसक मृत्यु ने कुछ समय के लिए आलोचनाओं को शोक के पीछे कर दिया।
कांग्रेस ने उन्हें राष्ट्र की एकता के लिए प्राण देने वाली नेता के रूप में स्मरण किया। “इंदिरा इज इंडिया” जैसी पूर्व व्यक्तिपूजक राजनीति को नया शहादत आधार मिला। स्मारक, डाक टिकट, योजनाएं और भाषण राष्ट्रीय स्मृति में उनकी छवि बनाते रहे।
इतिहास को हत्या के कारण आलोचना बंद नहीं करनी चाहिए। किसी नेता का अपराध का शिकार होना उसकी प्रत्येक नीति सही नहीं बनाता; किसी नीति की आलोचना हत्या को कम निंदनीय नहीं बनाती। लोकतांत्रिक स्मृति दोनों बातें साथ रखती है।