केहर सिंह और बलबीर सिंह: अदालत ने अलग फैसला क्यों दिया?
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या (1984): विस्तृत शोध
केहर सिंह सरकारी कर्मचारी और बेअंत सिंह का रिश्तेदार था। अभियोजन ने उसे वह व्यक्ति बताया जिसने ब्लू स्टार के बाद बेअंत की धार्मिक-राजनीतिक भावना को हत्या के संकल्प में बदला। गवाहियों में दोनों की बातचीत, गुरुद्वारा प्रसंग, अमृतसर यात्रा और कथित रूप से प्रतिशोध के लिए प्रेरित करने वाली बातों का उल्लेख हुआ। प्रत्यक्ष गोलीबारी में वह उपस्थित नहीं था और उसके पास से हत्या का हथियार नहीं मिला।
षड्यंत्र प्रायः बंद कमरों में बनता है, इसलिए कानून परिस्थितिजन्य साक्ष्य से साझा उद्देश्य सिद्ध करने की अनुमति देता है। अदालत ने घटनाओं की श्रृंखला—निकट संबंध, बार-बार गुप्त बातचीत, धार्मिक संस्कार और हमला पूर्व व्यवहार—को इतना पूर्ण माना कि केहर को षड्यंत्र का दोषी ठहराया। विशेष अदालत और हाईकोर्ट ने मृत्युदंड दिया; सुप्रीम कोर्ट ने उसे कायम रखा।
फिर भी उसकी दोषसिद्धि इस मुकदमे का सबसे विवादित हिस्सा रही। अंतरराष्ट्रीय न्यायविदों और भारतीय वकीलों ने कहा कि बातचीत की सामग्री का प्रत्यक्ष प्रमाण बहुत कमजोर था; केवल मिलना या धार्मिक यात्रा हत्या की योजना नहीं सिद्ध करती। दया की अपील में “भयानक न्यायिक भूल” की आशंका जताई गई। सुप्रीम कोर्ट ने परिस्थितियों को अलग-अलग निर्दोष न देखकर समग्र षड्यंत्र श्रृंखला माना।
केहर सिंह की दया याचिका राष्ट्रपति ने खारिज की। इसके बाद राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति, सुनवाई का अधिकार और न्यायिक समीक्षा पर ऐतिहासिक संवैधानिक मुकदमा चला। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रपति मामले के गुण-दोष पर विचार कर सकते हैं, लेकिन दया याचिकाकर्ता को व्यक्तिगत मौखिक सुनवाई का स्वतः अधिकार नहीं। पुनर्विचार के बाद भी राहत नहीं मिली और 6 जनवरी 1989 को सतवंत के साथ उसे फांसी दी गई।
शोध में दो बातों को साथ रखना होगा: भारत की सर्वोच्च अदालत ने उसे दोषी ठहराया—इसलिए उसे कानूनी रूप से दोषसिद्ध षड्यंत्रकारी लिखा जाएगा; साथ ही साक्ष्य की परिस्थितिजन्य प्रकृति और न्यायविदों की आपत्ति इतिहास के लिए दर्ज रहेगी। न्यायिक अंतिमता आलोचनात्मक अध्ययन को समाप्त नहीं करती।
बलबीर सिंह प्रधानमंत्री सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ा पुलिस अधिकारी था। अभियोजन ने आरोप लगाया कि वह व्यापक साजिश का हिस्सा था, उसने प्रधानमंत्री के विरुद्ध भावना व्यक्त की और हमलावरों से संपर्क रखा। एक डायरी प्रविष्टि, कथित बातचीत और उसके व्यवहार को प्रमाण बताया गया। विशेष न्यायाधीश महेश चंद्र ने जनवरी 1986 में उसे सतवंत और केहर के साथ दोषी ठहराकर मृत्युदंड दिया। दिसंबर 1986 में दिल्ली हाईकोर्ट ने तीनों की सजा कायम रखी।
सुप्रीम कोर्ट ने 3 अगस्त 1988 को बलबीर के मामले का अलग मूल्यांकन किया। अदालत ने पाया कि उसके विरुद्ध परिस्थितियां संदेह पैदा कर सकती हैं, लेकिन आपराधिक दोषसिद्धि के लिए आवश्यक पूर्ण श्रृंखला नहीं बनातीं। जिस डायरी वाक्यांश को अभियोजन ने हत्या की इच्छा माना, उससे यह निश्चित नहीं होता था कि किसने किसे मारने की इच्छा व्यक्त की। अदालत ने उसे संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया।
यह बरी होना इस मुकदमे की निष्पक्ष समीक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। अदालत ने राष्ट्रीय आघात और असाधारण सुरक्षा दबाव के बावजूद सभी आरोपियों को एक साथ दोषी नहीं माना। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि “साजिश” का अभियोजन कभी-कभी संपर्क, विचार और अपराध में वास्तविक समझौते के बीच अंतर मिटा सकता है।
बलबीर की कहानी शोधकर्ता को भाषा की सावधानी सिखाती है। उसे “इंदिरा गांधी हत्या का षड्यंत्रकारी” लिखना सुप्रीम कोर्ट के अंतिम निर्णय के विरुद्ध होगा। सही परिचय है: “निचली अदालत और हाईकोर्ट से दोषी ठहराया गया, पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपर्याप्त साक्ष्य के कारण बरी पूर्व अभियुक्त।”