बेअंत सिंह और सतवंत सिंह: अंगरक्षक से हमलावर तक
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या (1984): विस्तृत शोध
बेअंत सिंह दिल्ली पुलिस में सब-इंस्पेक्टर और प्रधानमंत्री सुरक्षा में अनुभवी कर्मी था। वह कई वर्षों से आवास पर तैनात रहा और परिचित चेहरा था। उसकी पहुंच सामान्य नागरिक या बाहरी हमलावर से बिल्कुल अलग थी: वह मार्ग, समय, सुरक्षा प्रतिक्रिया और हथियार की स्थिति जानता था। यही अंदरूनी व्यक्ति किसी उच्च-सुरक्षा व्यवस्था का सबसे गंभीर जोखिम बनाता है।
ब्लू स्टार के बाद बेअंत के व्यवहार, धार्मिक झुकाव और संपर्कों के बारे में जांच में गवाहियां आईं। अभियोजन ने कहा कि वह गहरे आक्रोश में था और केहर सिंह ने उस भावना को प्रतिशोध की दिशा दी। अमृतसर यात्रा, धार्मिक संस्कार और दोनों के बीच बैठकों को षड्यंत्र की कड़ियों के रूप में पेश किया गया। बचाव पक्ष ने कहा कि धार्मिक यात्रा और पारिवारिक बातचीत स्वयं हत्या की साजिश सिद्ध नहीं करती।
प्रत्यक्ष हत्या में बेअंत की भूमिका पर कोई गंभीर न्यायिक संदेह नहीं रहा। प्रत्यक्षदर्शियों ने उसे रिवॉल्वर से गोली चलाते देखा। उसका हथियार और घटनास्थल साक्ष्य मेल खाते थे। उसने गोलीबारी के बाद हथियार छोड़ा और कथित शब्द कहे, जिनके संस्करण अलग स्रोतों में भिन्न हैं। बाद में सुरक्षा कर्मियों की गोली से उसकी मृत्यु हो गई, इसलिए उससे अदालत में जिरह या विस्तृत पूछताछ नहीं हो सकी।
बेअंत की तत्काल मृत्यु ने जांच की सबसे महत्वपूर्ण जीवित कड़ी समाप्त कर दी। उसने योजना कब बनाई, किनसे बात की, क्या किसी संगठन ने निर्देश दिया और सतवंत को किस क्रम में जोड़ा—इन प्रश्नों का उत्तर परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर निर्भर हुआ। इसी खाली जगह में बाद के षड्यंत्र सिद्धांत पनपे।
उसके परिवार का बाद का राजनीतिक जीवन भी 1984 की विभाजित स्मृति दिखाता है। उसकी पत्नी बिमल कौर और परिवार के सदस्य चुनावी राजनीति में आए; कुछ पंथक मंचों ने बेअंत को शहीद कहा। भारतीय न्यायिक और संवैधानिक दृष्टि में वह निर्वाचित प्रधानमंत्री का हत्यारा था। समुदाय के किसी हिस्से द्वारा सम्मान अपराध की कानूनी प्रकृति नहीं बदलता, लेकिन स्मृति-राजनीति समझने के लिए इसे दर्ज करना जरूरी है।
सतवंत सिंह अपेक्षाकृत युवा कांस्टेबल था। उसके पास उस सुबह स्टर्लिंग सब-मशीन गन थी। अभियोजन के अनुसार उसने बेअंत के साथ योजना बनाकर अपनी ड्यूटी ऐसी जगह लगवाई जहां प्रधानमंत्री पैदल गुजरने वाली थीं। बेअंत की प्रारंभिक गोलियों के बाद सतवंत ने स्वचालित बर्स्ट चलाया, जिससे इंदिरा गांधी को अनेक घातक चोटें आईं।
घटना के बाद अन्य गार्डों की गोली से सतवंत गंभीर घायल हुआ, पर बच गया। अस्पताल और हिरासत में उसके उपचार, बयान तथा स्वीकारोक्ति की वैधता मुकदमे में विवादित रही। बचाव पक्ष ने कहा कि उसे फंसाया गया और दबाव में बयान लिए गए। अदालत ने प्रत्यक्षदर्शी, हथियार, बैलिस्टिक और परिस्थितिजन्य साक्ष्य के संयुक्त आधार पर उसकी भूमिका सिद्ध मानी; दोषसिद्धि केवल कथित स्वीकारोक्ति पर निर्भर नहीं थी।
सतवंत का जीवित बचना जांच के लिए निर्णायक था, फिर भी उससे पूरी व्यापक साजिश का निर्विवाद नक्शा नहीं मिला। उसने कानूनी बचाव में निर्दोष होने का दावा किया और वैकल्पिक साजिश की बातें उठीं। अदालत ने इन दावों को प्रत्यक्ष भौतिक प्रमाण के सामने स्वीकार नहीं किया।
विशेष अदालत ने जनवरी 1986 में उसे हत्या और षड्यंत्र का दोषी ठहराकर मृत्युदंड दिया। दिल्ली हाईकोर्ट ने 1986 में सजा कायम रखी। सुप्रीम कोर्ट ने 3 अगस्त 1988 के निर्णय में सतवंत की दोषसिद्धि तथा मृत्यु-दंड बरकरार रखा। समीक्षा, दया याचिका और अन्य संवैधानिक याचिकाओं के बाद 6 जनवरी 1989 को तिहाड़ जेल में उसे फांसी दी गई।
मृत्युदंड की न्यायसंगतता पर अलग बहस हुई। अपराध असाधारण था और देश की निर्वाचित प्रधानमंत्री लक्ष्य थीं; अदालत ने इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था पर आक्रमण माना। मृत्युदंड-विरोधी विधिवेत्ताओं ने कहा कि राज्य को प्रतिशोध के बजाय आजीवन कारावास चुनना चाहिए। इस बहस से अपराध का प्रमाण नहीं बदलता, दंड के दर्शन पर प्रश्न उठता है।