भुवनेश्वर का अंतिम भाषण और अंतिम सुबह
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या (1984): विस्तृत शोध
हत्या से एक दिन पहले 30 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी ओडिशा के भुवनेश्वर में सार्वजनिक सभा को संबोधित कर रही थीं। अपने तैयार भाषण से हटकर उन्होंने कहा कि यदि राष्ट्र की सेवा में उनकी मृत्यु भी हो जाए तो उन्हें गर्व होगा और उनके रक्त की प्रत्येक बूंद देश को मजबूत करेगी—इस भाव वाला अंश बाद में असाधारण भविष्यवाणी की तरह उद्धृत हुआ। शब्दों के अलग हिंदी-अंग्रेजी रूप मिलते हैं; वेबसाइट पर आधिकारिक रिकॉर्ड से सत्यापित पाठ ही उद्धरण चिह्नों में देना चाहिए।
भाषण से यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि उन्हें अगले दिन की विशिष्ट योजना मालूम थी। उच्च खतरे में जी रहे नेता का मृत्यु पर बोलना स्वाभाविक था। ब्लू स्टार के बाद धमकियां सार्वजनिक थीं; उनके परिवार और सहयोगियों के संस्मरण बताते हैं कि वे अपनी संभावित हिंसक मृत्यु के प्रति सजग थीं।
उस शाम वे दिल्ली लौटीं। यात्रा के बाद अगले दिन का कार्यक्रम सामान्य रखा गया—उस्तीनोव साक्षात्कार, विदेशी अतिथि से बैठक और सरकारी कार्य। यदि कोई विशिष्ट विश्वसनीय चेतावनी होती तो कार्यक्रम, मार्ग और निकट सुरक्षा बदलनी चाहिए थी। ऐसा न होना बताता है कि खतरा सामान्य उच्च स्तर पर माना गया, तत्काल परिचालन सूचना नहीं।
भुवनेश्वर भाषण भारतीय स्मृति में इंदिरा गांधी की शहादत-छवि का केंद्र बना। कांग्रेस ने चुनाव अभियान और राष्ट्रीय शोक में इसे बलिदान की भाषा से जोड़ा। इतिहासकार को भाषण के भावनात्मक महत्व और राजनीतिक उपयोग दोनों को दर्ज करना चाहिए।
प्रधानमंत्री की सुबह जल्दी शुरू होती थी। वे समाचारपत्र, आधिकारिक कागज और मुलाकात सूची देखती थीं। परिवार के संस्मरणों में उस सुबह राहुल और प्रियंका से उनकी आत्मीय बातचीत का उल्लेख है, पर निजी संवाद के कुछ लोकप्रिय संस्करण बाद की स्मृति से आए हैं। उन्हें प्रमाणित शब्दशः संवाद की तरह नहीं लिखना चाहिए।
उस्तीनोव आयरिश टेलीविजन के लिए विश्व नेताओं पर कार्यक्रम बना रहे थे। कैमरा दल 1 अकबर रोड की ओर तैयार था। साक्षात्कार के कारण प्रधानमंत्री को आवास के उद्यान से पैदल गुजरना था। कार्यक्रम का समय निजी स्टाफ, सुरक्षा और प्रोडक्शन दल को ज्ञात था; यह कोई अचानक निकला मार्ग नहीं था।
इंदिरा गांधी ने उस दिन बुलेटप्रूफ जैकेट नहीं पहनी थी। कुछ विवरण इसे उनकी साड़ी और कैमरा साक्षात्कार से जोड़ते हैं; अन्य कहते हैं कि वे नियमित रूप से जैकेट से असहज रहती थीं। निश्चित तथ्य यह है कि निकट दूरी की स्वचालित गोलीबारी में उस समय उपलब्ध जैकेट भी पूर्ण सुरक्षा की गारंटी नहीं देती। इसलिए “जैकेट पहनतीं तो बच जातीं” अनुमान है।
उनके साथ निजी सचिव आर.के. धवन, सुरक्षा अधिकारी और स्टाफ चल रहे थे। मार्ग खुले उद्यान से छोटे विकेट गेट की ओर जाता था। परिचित गार्डों को देखकर कोई बाहरी हमले जैसी चेतावनी नहीं हुई। यही विश्वास का क्षण हमले का अवसर बना।