राष्ट्रपति शासन: 11 राज्यों में 20 अवसर
राष्ट्रपति शासन — 1967 से 1974 के बीच किन राज्यों में, कब, क्यों और कितनी बार
1967 के चुनावों के बाद सरकारों के गिरने, गठबंधनों के टूटने और विधायकों के लगातार पाला बदलने का सबसे गंभीर संवैधानिक परिणाम था—राष्ट्रपति शासन का बार-बार प्रयोग।
स्वतंत्रता के बाद अनुच्छेद 356 का प्रयोग पहले भी हो चुका था, लेकिन 1967 के बाद इसका राजनीतिक महत्व बदल गया। कई राज्यों में ऐसी परिस्थितियां बनने लगीं जिनमें कोई मुख्यमंत्री स्थायी बहुमत नहीं जुटा पा रहा था। कहीं गठबंधन टूट गया, कहीं सत्तारूढ़ दल विभाजित हो गया, कहीं कुछ विधायकों के पाला बदलने से सरकार अल्पमत में आ गई और कहीं विधानसभा में कोई वैकल्पिक सरकार भी संभव नहीं रही।
इस दौर में राष्ट्रपति शासन केवल असाधारण संवैधानिक व्यवस्था नहीं रहा; वह कई राज्यों की राजनीतिक अस्थिरता के क्रम का हिस्सा बन गया।
1967 से 1974 के बीच तत्कालीन राज्यों को आधार मानें तो कम से कम 11 राज्यों में लगभग 20 बार राष्ट्रपति शासन लगाया गया। इनमें उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में तीन-तीन बार; पंजाब, ओडिशा और गुजरात में दो-दो बार; तथा हरियाणा, केरल, मैसूर, आंध्र प्रदेश और मणिपुर में एक-एक बार ऐसी स्थिति बनी। केंद्रशासित प्रदेशों की घटनाओं को इसमें अलग रखा गया है।
यह संख्या अपने-आप में बताती है कि 1967 के बाद राज्य राजनीति कितनी अस्थिर हो चुकी थी।
हरियाणा — 2 नवंबर 1967 से मई 1968
1967 के चुनाव में हरियाणा में कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिला था, लेकिन विधायकों के लगातार दल-बदल ने कुछ ही महीनों में राजनीतिक समीकरण बदल दिया। भगवत दयाल शर्मा की कांग्रेस सरकार गिरी और राव बीरेंद्र सिंह के नेतृत्व में नई सरकार बनी।
लेकिन विधायक लगातार पक्ष बदल रहे थे। सरकार का बहुमत अत्यंत अस्थिर हो गया। राज्यपाल ने अपनी रिपोर्ट में तेजी से हो रहे दल-बदल और सरकार बनाए रखने के लिए मंत्री तथा संसदीय सचिव पद बांटने की प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त की थी।
2 नवंबर 1967 को राष्ट्रपति शासन लगाया गया। यह मई 1968 तक चला। इस घटना का महत्व इसलिए विशेष था क्योंकि यहां मतदाताओं ने किसी त्रिशंकु विधानसभा का जनादेश नहीं दिया था। कांग्रेस को बहुमत मिला था, लेकिन विधानसभा के भीतर हुई टूट ने जनादेश को राजनीतिक अस्थिरता में बदल दिया। (Cybernode Gateway)
हरियाणा 1967 के बाद की उस राजनीति का प्रारंभिक उदाहरण बना जिसमें दल-बदल अंततः अनुच्छेद 356 तक पहुंच सकता था।
उत्तर प्रदेश — तीन बार राष्ट्रपति शासन
1967 से 1974 के बीच उत्तर प्रदेश ने तीन बार राष्ट्रपति शासन देखा।
पहली बार 25 फरवरी 1968 को चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व वाली संयुक्त विधायक दल सरकार के पतन के बाद राष्ट्रपति शासन लगाया गया। विधानसभा को पहले निलंबित रखा गया और 15 अप्रैल 1968 को भंग कर दिया गया। यह व्यवस्था 26 फरवरी 1969 तक चली। उत्तर प्रदेश विधानसभा के आधिकारिक अभिलेख इसकी अवधि एक वर्ष और दो दिन बताते हैं। (Uttar Pradesh Legislative Assembly)
दूसरी बार 1 अक्टूबर 1970 को चरण सिंह की दूसरी सरकार गिरने के बाद राष्ट्रपति शासन लगा। यह बहुत छोटा दौर था और 18 अक्टूबर 1970 को समाप्त हो गया। इसके बाद त्रिभुवन नारायण सिंह मुख्यमंत्री बने। (Uttar Pradesh Legislative Assembly)
तीसरी बार 13 जून 1973 को कमलापति त्रिपाठी के इस्तीफे के बाद राष्ट्रपति शासन लगाया गया। यह 8 नवंबर 1973 तक चला और इसके बाद हेमवती नंदन बहुगुणा ने सरकार बनाई। उत्तर प्रदेश विधानसभा के आधिकारिक विवरण में इन तीनों अवधियों की पुष्टि होती है। (Uttar Pradesh Legislative Assembly)
इस तरह केवल छह वर्षों में देश के सबसे बड़े राज्य में तीन बार निर्वाचित सरकार और राष्ट्रपति शासन के बीच परिवर्तन हुआ।
बिहार — तीन बार, और लगभग हर बार पृष्ठभूमि में टूटता बहुमत
बिहार में राष्ट्रपति शासन की घटनाएं इस पूरे दौर की राजनीतिक अस्थिरता को सबसे स्पष्ट रूप से दिखाती हैं।
पहली बार 29 जून 1968 को राष्ट्रपति शासन लगाया गया। महामाया प्रसाद सिन्हा, बी.पी. मंडल और भोला पासवान शास्त्री की अल्पजीवी सरकारों के बाद ऐसी स्थिति बनी जिसमें कोई स्थिर बहुमत नहीं बचा। यह शासन 26 फरवरी 1969 तक चला।
दूसरी बार 4 जुलाई 1969 से 16 फरवरी 1970 तक राष्ट्रपति शासन रहा। इसकी पृष्ठभूमि में फिर सरकार का बहुमत टूटना और कांग्रेस सहित राजनीतिक दलों में विभाजन था।
तीसरी बार 9 जनवरी 1972 से 19 मार्च 1972 तक राष्ट्रपति शासन लगाया गया। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरण इन तीनों अवसरों में बदलते राजनीतिक समर्थन और बहुमत के संकट को प्रमुख कारण बताते हैं। (WikiZero)
बिहार इसलिए विशेष उदाहरण है क्योंकि यहां राष्ट्रपति शासन किसी एक असाधारण संकट का परिणाम नहीं था। सरकार बनना, विधायकों का टूटना, सरकार गिरना और फिर राष्ट्रपति शासन—यह एक आवर्ती चक्र बन गया था।
पंजाब — दो बार
पंजाब में पहली बार इस अवधि के भीतर 23 अगस्त 1968 को राष्ट्रपति शासन लगाया गया।
गुरनाम सिंह की संयुक्त सरकार टूटने के बाद लक्ष्मण सिंह गिल कांग्रेस के समर्थन से मुख्यमंत्री बने थे। लेकिन कांग्रेस ने समर्थन वापस लिया तो गिल ने इस्तीफा दे दिया। कोई दूसरी स्थिर सरकार संभव नहीं रही और राष्ट्रपति शासन लागू हुआ। यह 17 फरवरी 1969 तक चला। (Kiwix Server)
दूसरी बार प्रकाश सिंह बादल की सरकार के पतन के बाद जून 1971 में राष्ट्रपति शासन लगा और 17 मार्च 1972 तक चला। उसके बाद ज्ञानी जैल सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार बनी। (Elections Data)
पंजाब के दोनों मामलों में मूल समस्या थी—गठबंधन या समर्थन का टूट जाना और विधानसभा में स्थायी वैकल्पिक बहुमत का न रहना।
पश्चिम बंगाल — तीन बार राष्ट्रपति शासन
पश्चिम बंगाल 1967 के बाद राजनीतिक अस्थिरता के सबसे गंभीर राज्यों में रहा।
अजय मुखर्जी की पहली संयुक्त मोर्चा सरकार गिरने, प्रफुल्ल चंद्र घोष की अल्पजीवी सरकार बनने और उसके भी अस्थिर हो जाने के बाद 20 फरवरी 1968 से 25 फरवरी 1969 तक राष्ट्रपति शासन रहा। (News9live)
1969 के चुनाव के बाद संयुक्त मोर्चा फिर सत्ता में आया, लेकिन सरकार के घटक दलों में टकराव जारी रहा। दूसरी अजय मुखर्जी सरकार भी टूट गई और 19 मार्च 1970 से 2 अप्रैल 1971 तक राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा। (News9live)
1971 में राज्य में फिर सरकार बनी, लेकिन स्थिरता नहीं आई। 29 जून 1971 से 20 मार्च 1972 तक तीसरी बार राष्ट्रपति शासन लागू रहा। (News9live)
इस प्रकार चार वर्षों के आसपास की अवधि में पश्चिम बंगाल ने तीन बार राष्ट्रपति शासन देखा।
यहां समस्या केवल व्यक्तिगत दल-बदल नहीं थी। वामपंथी और अन्य गठबंधन दलों के बीच संघर्ष, नेतृत्व विवाद और अस्थिर बहुमत ने सरकारों को टिकने नहीं दिया।
केरल — 4 अगस्त से 3 अक्टूबर 1970
केरल में 1967 के बाद ई.एम.एस. नंबूदरीपाद की गठबंधन सरकार बनी थी। उसके पतन के बाद सी. अच्युत मेनन ने सरकार बनाई।
1970 में राजनीतिक परिस्थितियां फिर बदलीं और विधानसभा भंग कर चुनाव कराने का निर्णय हुआ। 4 अगस्त से 3 अक्टूबर 1970 तक राष्ट्रपति शासन लागू रहा। चुनाव के बाद अच्युत मेनन फिर मुख्यमंत्री बने और इसके बाद राज्य को अपेक्षाकृत लंबी राजनीतिक स्थिरता मिली। (Wikipedia)
केरल की यह घटना उत्तर प्रदेश, बिहार या हरियाणा जैसी लगातार विधायक खरीद-फरोख्त की स्थिति से कुछ भिन्न थी। यहां राष्ट्रपति शासन मुख्यतः विधानसभा भंग होने और नए चुनाव तक की अंतरिम संवैधानिक व्यवस्था बना।
ओडिशा — दो बार
ओडिशा में इस अवधि के दौरान राष्ट्रपति शासन पहली बार 11 जनवरी 1971 से 3 अप्रैल 1971 तक लागू रहा। कारण था स्वतंत्र पार्टी और उसके सहयोगियों की गठबंधन सरकार का टूटना। (WikiZero)
दूसरी बार 3 मार्च 1973 से 6 मार्च 1974 तक राष्ट्रपति शासन रहा। तत्कालीन सरकार के संभावित पतन की स्थिति में मुख्यमंत्री ने विधानसभा भंग कर नए चुनाव कराने की सिफारिश की थी। (WikiZero)
दूसरी अवधि लगभग एक वर्ष चली।
ओडिशा का मामला दिखाता है कि राष्ट्रपति शासन हमेशा केंद्र द्वारा अचानक सरकार हटाने का परिणाम नहीं था। कुछ अवसरों पर स्वयं राज्य सरकार ने अस्थिर विधानसभा के स्थान पर नए चुनाव को बेहतर विकल्प माना।
मैसूर — 27 मार्च 1971 से 20 मार्च 1972
वर्तमान कर्नाटक उस समय मैसूर राज्य कहलाता था।
वीरेंद्र पाटिल की सरकार राजनीतिक संकट में पड़ने के बाद 27 मार्च 1971 को राष्ट्रपति शासन लगाया गया। यह 20 मार्च 1972 तक चला।
संसद के आधिकारिक दस्तावेज में भी दर्ज है कि मैसूर राज्य 27 मार्च 1971 से 20 मार्च 1972 तक राष्ट्रपति शासन के अधीन था और इस अवधि में राज्य विधानमंडल की शक्तियां राष्ट्रपति को प्रदान करने के लिए अलग कानून बनाया गया था। (E-Parliament)
यह लगभग एक वर्ष का राष्ट्रपति शासन था।
गुजरात — 1971 में पहली बार
1969 में कांग्रेस का विभाजन गुजरात की राजनीति पर सीधे पड़ा। हितेंद्र देसाई कांग्रेस (ओ) के साथ रहे और विधानसभा का राजनीतिक संतुलन बदल गया।
सरकार बहुमत खोने लगी और अंततः 13 मई 1971 से 17 मार्च 1972 तक राष्ट्रपति शासन लगाया गया। उपलब्ध विवरण इसे कांग्रेस विभाजन के बाद सरकार के बहुमत समाप्त होने से जोड़ते हैं। (FutureLabz Library)
यह मामला हमारे अगले खंड—1969 के कांग्रेस विभाजन और राज्यों पर उसके प्रभाव—से सीधे जुड़ता है।
पंजाब और गुजरात ने एक और प्रवृत्ति दिखाई
इन दोनों राज्यों के अनुभव में एक समानता थी।
राजनीतिक अस्थिरता केवल 1967 के चुनाव में बने कमजोर गठबंधनों तक सीमित नहीं रही। कुछ वर्षों बाद भी पार्टी विभाजन और बदलते समर्थन के कारण सरकारें गिरती रहीं।
इसका अर्थ था कि 1967 के बाद शुरू हुआ संकट कोई कुछ महीनों की संक्रमणकालीन घटना नहीं था।
वह भारतीय राज्य राजनीति की संरचना में गहराई तक प्रवेश कर चुका था।
पश्चिम बंगाल के बाद 1971 में बार-बार अनुच्छेद 356
1971 विशेष रूप से महत्वपूर्ण वर्ष था।
उस वर्ष ओडिशा, मैसूर, गुजरात, पंजाब और पश्चिम बंगाल जैसे कई राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाया गया या लागू रहा।
यह उस दौर की अस्थिरता की व्यापकता बताता है।
1967 में जो संकट कुछ राज्यों में दल-बदल के रूप में दिखाई दिया था, चार वर्ष बाद वह केंद्र-राज्य संबंधों और अनुच्छेद 356 के बार-बार प्रयोग का प्रश्न बन चुका था।
बिहार — तीसरा राष्ट्रपति शासन, जनवरी 1972
9 जनवरी 1972 को बिहार एक बार फिर राष्ट्रपति शासन में चला गया।
इस बार भी बदलते बहुमत और दल-बदल की पृष्ठभूमि थी। राष्ट्रपति शासन 19 मार्च 1972 तक रहा, जब चुनाव के बाद नई सरकार बनी। (News9live)
इस घटना के साथ बिहार ने 1968 से 1972 के बीच तीन राष्ट्रपति शासन देख लिए थे।
किसी राज्य में इतनी कम अवधि में अनुच्छेद 356 का बार-बार प्रयोग यह दर्शाता है कि विधानसभा आधारित स्थायी बहुमत लगभग लगातार संकट में था।
आंध्र प्रदेश — 18 जनवरी से 10 दिसंबर 1973
आंध्र प्रदेश का मामला बाकी अनेक राज्यों से अलग था।
यहां राष्ट्रपति शासन का तत्काल कारण विधायक दल-बदल नहीं, बल्कि जय आंध्र आंदोलन से उत्पन्न गंभीर राजनीतिक और कानून-व्यवस्था संकट था।
पी.वी. नरसिंह राव के मुख्यमंत्री रहते क्षेत्रीय तनाव इतना बढ़ा कि उन्होंने इस्तीफा दिया और 18 जनवरी 1973 को राष्ट्रपति शासन लागू किया गया। यह 10 दिसंबर 1973 तक चला। (Kiwix Server)
इस घटना को इस अध्याय में इसलिए शामिल करना आवश्यक है क्योंकि यह 1967–74 के बीच राष्ट्रपति शासन की वास्तविक कुल संख्या का हिस्सा है, लेकिन इसे दल-बदल से उत्पन्न संकट के साथ मिलाना सही नहीं होगा।
यह राजनीतिक और क्षेत्रीय आंदोलन से पैदा हुआ संवैधानिक संकट था।
मणिपुर — 28 मार्च 1973 से 3 मार्च 1974
मणिपुर जनवरी 1972 में पूर्ण राज्य बना था। मोहम्मद अलीमुद्दीन के नेतृत्व वाली सरकार मार्च 1973 तक चली।
28 मार्च 1973 को राष्ट्रपति शासन लगाया गया और यह 3 मार्च 1974 तक रहा। उपलब्ध विवरणों में यह उल्लेख मिलता है कि विपक्ष के पास वैकल्पिक बहुमत का दावा होने के बावजूद राष्ट्रपति शासन लगाया गया, इसलिए यह निर्णय राजनीतिक विवाद का विषय भी बना। (Olps)
मार्च 1974 में राष्ट्रपति शासन समाप्त होने के बाद अलीमुद्दीन फिर मुख्यमंत्री बने।
यह उदाहरण राज्यपाल के विवेक और वैकल्पिक सरकार को अवसर देने के प्रश्न से सीधे जुड़ता है।
उत्तर प्रदेश — जून 1973 में तीसरी बार
13 जून 1973 को उत्तर प्रदेश में इस दौर का तीसरा राष्ट्रपति शासन शुरू हुआ।
कमलापति त्रिपाठी के इस्तीफे के बाद राज्य में प्रशासनिक और राजनीतिक संकट था। राष्ट्रपति शासन 8 नवंबर 1973 तक चला, जिसके बाद हेमवती नंदन बहुगुणा ने सरकार बनाई। (Uttar Pradesh Legislative Assembly)
उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल इस दौर में इसलिए अलग दिखाई देते हैं क्योंकि तीनों राज्यों ने तीन-तीन बार राष्ट्रपति शासन देखा।
ओडिशा — लगभग एक वर्ष तक राष्ट्रपति शासन
3 मार्च 1973 से शुरू हुआ ओडिशा का राष्ट्रपति शासन 6 मार्च 1974 तक चला।
अर्थात यह 1973 के पूरे शेष वर्ष और 1974 के शुरुआती महीनों तक कायम रहा। (WikiZero)
इसके बाद विधानसभा चुनाव हुए और निर्वाचित सरकार वापस आई।
गुजरात 1974 — नवनिर्माण आंदोलन और सरकार का पतन
9 फरवरी 1974 को गुजरात में दूसरी बार राष्ट्रपति शासन लगाया गया।
इस बार कारण 1969 का कांग्रेस विभाजन नहीं था।
मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल की सरकार के विरुद्ध भ्रष्टाचार, महंगाई और अन्य मुद्दों को लेकर नवनिर्माण आंदोलन तेजी से फैल चुका था। आंदोलन के दबाव में चिमनभाई पटेल ने इस्तीफा दिया और राष्ट्रपति शासन लागू हुआ। बाद में विधानसभा भी भंग कर दी गई। (Wikipedia)
यह राष्ट्रपति शासन 1974 समाप्त होने के बाद भी जारी रहा और जून 1975 में चुनाव के बाद खत्म हुआ।
इस अध्याय की समयसीमा में इसे शामिल करना आवश्यक है क्योंकि राष्ट्रपति शासन लगाए जाने की तारीख 9 फरवरी 1974 थी।
कुल तस्वीर — 11 राज्य, लगभग 20 अवसर
1967 से 1974 के अंत तक राज्यवार घटनाओं को समेकित करें तो तस्वीर इस प्रकार बनती है:
| राज्य | राष्ट्रपति शासन की संख्या |
|---|---|
| उत्तर प्रदेश | 3 |
| बिहार | 3 |
| पश्चिम बंगाल | 3 |
| पंजाब | 2 |
| ओडिशा | 2 |
| गुजरात | 2 |
| हरियाणा | 1 |
| केरल | 1 |
| मैसूर (वर्तमान कर्नाटक) | 1 |
| आंध्र प्रदेश | 1 |
| मणिपुर | 1 |
| कुल | 20 |
यह गणना राज्यों की है। केंद्रशासित प्रदेशों की समान घटनाओं को इसमें नहीं जोड़ा गया है।
केंद्रशासित प्रदेशों को जोड़ें तो संख्या और बढ़ती है
इस दौर की संपूर्ण राजनीतिक तस्वीर देखते समय मणिपुर के राज्य बनने से पहले की घटनाओं, त्रिपुरा के राज्य बनने से पहले की व्यवस्था और पुडुचेरी को भी अलग से ध्यान में रखना चाहिए।
पुडुचेरी में 18 सितंबर 1968 से 17 मार्च 1969 तक राष्ट्रपति शासन जैसी केंद्रीय व्यवस्था रही। 3 जनवरी से 6 मार्च 1974 तक फिर ऐसा हुआ और 28 मार्च 1974 से एक और लंबा केंद्रीय शासन शुरू हुआ। (Cybernode Gateway)
मणिपुर में भी पूर्ण राज्य बनने से पहले 1967, 1967–68 और 1969–72 में केंद्रीय शासन की अवधियां रहीं। (Kiwix Server)
त्रिपुरा में नवंबर 1971 से मार्च 1972 तक ऐसी व्यवस्था रही; इसी दौरान जनवरी 1972 में वह पूर्ण राज्य बना। (Jacaranda FM)
लेकिन इन्हें ऊपर दी गई 20 राज्य-स्तरीय घटनाओं में नहीं जोड़ा गया है, ताकि राज्य और तत्कालीन केंद्रशासित प्रदेशों के आंकड़े आपस में न मिलें।
राष्ट्रपति शासन के कारणों को चार श्रेणियों में समझा जा सकता है
इन 20 घटनाओं को एक ही कारण से नहीं समझा जा सकता।
सबसे बड़ी श्रेणी थी बहुमत का टूटना। बिहार, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और गुजरात के अनेक मामलों में यही केंद्रीय कारण था।
दूसरी श्रेणी थी गठबंधन का विघटन। ओडिशा, पश्चिम बंगाल तथा कुछ अन्य राज्यों में गठबंधन के घटक अलग हुए और कोई स्थायी विकल्प नहीं बचा।
तीसरी श्रेणी थी दल या सत्तारूढ़ संगठन का विभाजन। गुजरात में 1969 के कांग्रेस विभाजन का प्रभाव इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है।
चौथी श्रेणी उन घटनाओं की थी जहां व्यापक राजनीतिक या कानून-व्यवस्था संकट ने शासन असंभव बना दिया—जैसे 1973 का आंध्र प्रदेश।
इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि 1967–74 के सभी राष्ट्रपति शासन केवल केंद्र द्वारा विपक्षी सरकारों को गिराने के लिए लगाए गए। परिस्थितियां अलग-अलग थीं।
लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि राज्यपाल और केंद्र के निर्णयों पर राजनीतिक पक्षपात के आरोप इसी दौर में तेजी से बढ़े।
1967 से पहले अपवाद, उसके बाद राजनीतिक व्यवस्था का बार-बार सहारा
इस अवधि का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष राष्ट्रपति शासन की कुल संख्या से अधिक उसकी आवृत्ति है।
उत्तर प्रदेश तीन बार।
बिहार तीन बार।
पश्चिम बंगाल तीन बार।
पंजाब दो बार।
गुजरात दो बार।
ओडिशा दो बार।
यह सामान्य संवैधानिक स्थिति नहीं थी।
1967 के चुनाव ने राज्यों में कांग्रेस के एकछत्र प्रभुत्व को तोड़ा था, लेकिन उसके स्थान पर तुरंत स्थिर बहुदलीय व्यवस्था स्थापित नहीं हो सकी। नतीजा यह हुआ कि कई विधानसभाओं में चुनाव और अगले चुनाव के बीच राजनीतिक बहुमत लगातार बदलता रहा।
और जब विधानसभा स्वयं स्थिर सरकार देने में विफल रही, तब राजभवन और अंततः केंद्र सरकार निर्णायक हो गए।
इसी कारण 1967 से 1974 का दौर अनुच्छेद 356 के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
इस अवधि ने वह प्रश्न खड़ा किया जो बाद के दशकों में और तीखा हुआ—क्या राष्ट्रपति शासन वास्तव में केवल संवैधानिक तंत्र विफल होने पर अंतिम उपाय है, या उसे राजनीतिक सत्ता-संघर्ष में भी इस्तेमाल किया जा सकता है?
बाद में सरकारिया आयोग और सर्वोच्च न्यायालय को इसी समस्या के लिए कठोर संवैधानिक कसौटियां विकसित करनी पड़ीं।
लेकिन उस बहस की शुरुआती प्रयोगशाला यही दौर था—1967 से 1974 की अस्थिर राज्य राजनीति।