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OCN Research Dossier–022 · अध्याय 04

सरकारें गिरने और मुख्यमंत्री बदलने का दौर

सरकारें गिरने और मुख्यमंत्री बदलने का दौर — प्रमुख राज्यों के निर्णायक उदाहरण

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskविस्तृत शोध संस्करण · 11 सितंबर 2026

1967 के चुनाव के बाद भारतीय राज्यों की राजनीति में जो अस्थिरता शुरू हुई, वह केवल दल-बदल तक सीमित नहीं रही। उसका सबसे प्रत्यक्ष परिणाम था—सरकारों का बार-बार गिरना, मुख्यमंत्रियों का बदलना और कई राज्यों में राष्ट्रपति शासन की नौबत आना।

कुछ राज्यों में सरकारें कुछ सप्ताह चलीं, कुछ कुछ महीने। कहीं सत्तारूढ़ दल के विधायक टूट गए, कहीं गठबंधन के साझेदार अलग हो गए, कहीं मुख्यमंत्री बहुमत खो बैठे और कहीं विधानसभा का गणित इतना उलझ गया कि कोई भी पक्ष स्थिर सरकार देने की स्थिति में नहीं रहा।

1967 से 1974 के बीच इस अस्थिरता के सबसे निर्णायक उदाहरण उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल में दिखाई दिए।

उत्तर प्रदेश — कुछ वर्षों में बार-बार मुख्यमंत्री और तीन बार राष्ट्रपति शासन

देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में 1967 के बाद राजनीतिक अस्थिरता का दौर बेहद स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

सुचेता कृपलानी के बाद 14 मार्च 1967 को चंद्रभानु गुप्त मुख्यमंत्री बने, लेकिन उनकी सरकार केवल कुछ सप्ताह चली। 3 अप्रैल 1967 को चौधरी चरण सिंह ने सत्ता संभाली। उत्तर प्रदेश विधानसभा के आधिकारिक अभिलेख के अनुसार चरण सिंह का पहला कार्यकाल 3 अप्रैल 1967 से 25 फरवरी 1968 तक चला। (Uttar Pradesh Legislative Assembly)

चरण सिंह की सरकार विभिन्न गैर-कांग्रेसी दलों और कांग्रेस से टूटे विधायकों के समर्थन पर टिकी थी। अंतर्विरोध बढ़े और अंततः सरकार गिर गई।

25 फरवरी 1968 को राज्य में पहली बार राष्ट्रपति शासन लगा। विधानसभा को पहले निलंबित रखा गया और 15 अप्रैल 1968 को भंग कर दिया गया। यह राष्ट्रपति शासन 26 फरवरी 1969 तक चला। (Uttar Pradesh Legislative Assembly)

1969 में नए चुनाव के बाद चंद्रभानु गुप्त फिर मुख्यमंत्री बने, लेकिन उनका दूसरा दौर भी स्थिर नहीं रहा। 26 फरवरी 1969 से 17 फरवरी 1970 तक वे पद पर रहे। इसके बाद चरण सिंह ने 18 फरवरी 1970 को दूसरी बार मुख्यमंत्री पद संभाला। उनकी दूसरी सरकार भी केवल 1 अक्टूबर 1970 तक चली। (Uttar Pradesh Legislative Assembly)

इसके बाद उत्तर प्रदेश फिर राष्ट्रपति शासन में चला गया। यह दूसरा राष्ट्रपति शासन 1 अक्टूबर से 18 अक्टूबर 1970 तक केवल 18 दिन चला। (Uttar Pradesh Legislative Assembly)

18 अक्टूबर 1970 को त्रिभुवन नारायण सिंह मुख्यमंत्री बने। उनका कार्यकाल भी अप्रैल 1971 तक ही चला। फिर कमलापति त्रिपाठी ने सत्ता संभाली। वे अपेक्षाकृत लंबा समय, अप्रैल 1971 से जून 1973 तक मुख्यमंत्री रहे। (Uttar Pradesh Legislative Assembly)

लेकिन 13 जून 1973 को उत्तर प्रदेश में फिर राष्ट्रपति शासन लग गया। यह 8 नवंबर 1973 तक चला। इसके बाद हेमवती नंदन बहुगुणा मुख्यमंत्री बने। (Uttar Pradesh Legislative Assembly)

अर्थात 1967 से 1974 के बीच उत्तर प्रदेश में केवल सत्ता परिवर्तन नहीं हुए; मुख्यमंत्री बार-बार बदले और तीन अलग अवसरों पर राष्ट्रपति शासन लगा।

यह राज्य उस दौर की राजनीतिक अस्थिरता का सबसे बड़ा उदाहरण था।

बिहार — एक वर्ष में तीन सरकारें

यदि उत्तर प्रदेश अस्थिरता का बड़ा उदाहरण था तो बिहार उसकी चरम अभिव्यक्ति था।

1967 में कांग्रेस सरकार सत्ता से बाहर हुई और महामाया प्रसाद सिन्हा के नेतृत्व में संयुक्त मोर्चा सरकार बनी। लेकिन यह गठबंधन शीघ्र ही आंतरिक संघर्ष का शिकार हो गया।

सर्वोच्च न्यायालय के एक समकालीन निर्णय में बिहार की अस्थिर स्थिति का विस्तार से उल्लेख मिलता है। न्यायालय ने दर्ज किया कि महामाया प्रसाद सिन्हा की संयुक्त मोर्चा सरकार 5 मार्च 1967 से चली, लेकिन उसने 25 जनवरी 1968 को इस्तीफा दे दिया। उसके बाद बी.पी. मंडल के नेतृत्व में शोषित दल की सरकार बनी। वह भी 22 मार्च 1968 तक ही टिक सकी। इसके बाद भोला पासवान शास्त्री मुख्यमंत्री बने। (Indian Kanoon)

यानी लगभग एक वर्ष के भीतर बिहार ने तीन अलग-अलग गैर-कांग्रेसी सरकारें देखीं।

यह केवल नेतृत्व परिवर्तन नहीं था। हर नई सरकार के पीछे विधानसभा में विधायकों का नया संयोजन बन रहा था।

महामाया प्रसाद सिन्हा की सरकार गई तो बी.पी. मंडल आए। मंडल सरकार गिरी तो भोला पासवान शास्त्री सामने आए। प्रत्येक परिवर्तन में छोटे विधायक समूह निर्णायक बन रहे थे।

बिहार की स्थिति इतनी अस्थिर हुई कि कोई भी गठबंधन दीर्घकालीन शासन देने में सफल नहीं हो पा रहा था।

यही वह राजनीति थी जिसमें मुख्यमंत्री का भविष्य विधानसभा के स्थायी बहुमत पर नहीं, बल्कि प्रतिदिन बदलती निष्ठाओं पर निर्भर होने लगा था।

हरियाणा — स्पष्ट बहुमत भी सरकार को नहीं बचा सका

हरियाणा की कहानी सबसे अलग थी।

यहां कांग्रेस को 1967 के चुनाव में स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ था। इसके बावजूद सरकार नहीं टिक सकी।

भगवत दयाल शर्मा मुख्यमंत्री बने, लेकिन कुछ ही दिनों में कांग्रेस विधायकों का एक समूह अलग हो गया। राव बीरेंद्र सिंह ने कांग्रेस-विरोधी विधायकों को साथ लेकर नया बहुमत तैयार किया और मार्च 1967 में मुख्यमंत्री बने।

यही वह दौर था जिसमें गया लाल जैसे विधायक बार-बार पाला बदलने लगे और “आया राम, गया राम” का मुहावरा जन्मा।

हरियाणा में स्थिति यह हो गई कि सरकार का बहुमत लगातार बदल रहा था। एक दिन जो विधायक सरकार के साथ था, अगले दिन विपक्ष में दिखाई दे सकता था।

राव बीरेंद्र सिंह की सरकार भी नवंबर 1967 तक ही चल सकी। इसके बाद विधानसभा भंग हुई और राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया।

हरियाणा का महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि यहां अस्थिरता का कारण त्रिशंकु जनादेश नहीं था। मतदाताओं ने कांग्रेस को बहुमत दिया था; सरकार विधानसभा के भीतर हुई टूट से गिरी।

इसने पूरे देश को दिखाया कि चुनाव में बहुमत जीत लेना भी अब पांच वर्ष की सरकार की गारंटी नहीं था।

पंजाब — गठबंधन टूटा, नया मुख्यमंत्री आया, फिर राष्ट्रपति शासन

पंजाब में 1967 के बाद गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। गुरनाम सिंह इसके मुख्यमंत्री बने।

लेकिन सरकार कई दलों के समर्थन पर निर्भर थी। गठबंधन के भीतर मतभेद बढ़े और लक्ष्मण सिंह गिल अपने समर्थक विधायकों के साथ अलग हो गए।

गुरनाम सिंह सरकार गिर गई और लक्ष्मण सिंह गिल ने नई सरकार बनाई। लेकिन महत्वपूर्ण तथ्य यह था कि जिस कांग्रेस को सत्ता से बाहर रखने के लिए गैर-कांग्रेसी मोर्चा बना था, उसी कांग्रेस के बाहरी समर्थन से गिल सरकार टिकी।

यह उस समय की राजनीति के बदलते स्वरूप का प्रतीक था—कल के विरोधी अगले दिन सत्ता बचाने के लिए सहयोगी बन सकते थे।

लेकिन गिल सरकार भी स्थिर नहीं रही। जब कांग्रेस ने समर्थन वापस लिया तो सरकार गिर गई।

अगस्त 1968 में पंजाब में राष्ट्रपति शासन लागू करना पड़ा।

इस प्रकार पंजाब में 1967 के चुनाव के बाद केवल डेढ़ वर्ष के भीतर गठबंधन सरकार टूटी, मुख्यमंत्री बदला और अंततः निर्वाचित सरकार की जगह राष्ट्रपति शासन आ गया।

मध्य प्रदेश — कांग्रेस सरकार के भीतर से ही निकला उसका विकल्प

मध्य प्रदेश में 1967 के चुनाव के बाद द्वारका प्रसाद मिश्र के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार बनी।

लेकिन यहां विपक्ष ने सीधे सरकार नहीं गिराई। निर्णायक घटना कांग्रेस के अंदर हुई।

गोविंद नारायण सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस विधायकों का बड़ा समूह अलग हो गया। इस टूट ने मिश्र सरकार का बहुमत समाप्त कर दिया और जुलाई 1967 में गोविंद नारायण सिंह मुख्यमंत्री बने।

मध्य प्रदेश विधानसभा के आधिकारिक अभिलेख के अनुसार गोविंद नारायण सिंह 30 जुलाई 1967 से 12 मार्च 1969 तक मुख्यमंत्री रहे। उनके बाद राजा नरेशचंद्र सिंह ने केवल 13 मार्च से 25 मार्च 1969 तक सरकार चलाई और फिर 26 मार्च 1969 को श्यामाचरण शुक्ल मुख्यमंत्री बने। (Madhya Pradesh Vidhan Sabha)

यह क्रम अपने-आप में बहुत कुछ बताता है।

एक निर्वाचित कांग्रेस सरकार पार्टी टूटने से गई। उसके स्थान पर कांग्रेस से अलग हुए नेता ने विपक्ष के साथ सरकार बनाई। वह सरकार टूटी तो कुछ ही दिनों के लिए एक और मुख्यमंत्री आया और फिर कांग्रेस सत्ता में लौट आई।

मध्य प्रदेश विधानसभा के अभिलेख यह भी दिखाते हैं कि गोविंद नारायण सिंह सरकार को 1968 में बार-बार अविश्वास प्रस्तावों का सामना करना पड़ा। मार्च और सितंबर 1968 में उसके विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव आए। (Madhya Pradesh Vidhan Sabha)

यह अस्थिरता केवल सरकार बदलने तक सीमित नहीं थी; सरकार निरंतर अपने बहुमत को बचाने की लड़ाई लड़ रही थी।

पश्चिम बंगाल — संयुक्त मोर्चे की बार-बार वापसी और पतन

पश्चिम बंगाल में 1967 के चुनाव के बाद अजय मुखर्जी के नेतृत्व में संयुक्त मोर्चा सरकार बनी। ज्योति बसु उपमुख्यमंत्री थे।

यह सरकार कांग्रेस-विरोधी दलों के व्यापक गठबंधन पर आधारित थी, लेकिन उसके भीतर विभिन्न वामपंथी और क्षेत्रीय घटकों के बीच गंभीर मतभेद थे।

कुछ ही महीनों में सरकार संकट में आ गई।

अजय मुखर्जी सरकार गिरने के बाद प्रफुल्ल चंद्र घोष के नेतृत्व में नई सरकार बनी। लेकिन वह भी स्थिर नहीं रह सकी।

इसके बाद राष्ट्रपति शासन लगाया गया।

1969 के चुनावों में फिर संयुक्त मोर्चा सत्ता में लौटा और अजय मुखर्जी दोबारा मुख्यमंत्री बने। लेकिन दूसरी संयुक्त मोर्चा सरकार भी आंतरिक संघर्ष से नहीं बच सकी।

1970 में वह सरकार भी गिर गई और राज्य फिर राष्ट्रपति शासन में चला गया।

1971 में पश्चिम बंगाल में पुनः राजनीतिक अस्थिरता उभरी। कुछ ही वर्षों में चुनाव, गठबंधन सरकार, सरकार का पतन और राष्ट्रपति शासन—यह क्रम बार-बार दोहराया गया।

पश्चिम बंगाल इस बात का उदाहरण था कि अस्थिरता हमेशा व्यक्तिगत दल-बदल से नहीं आती। गठबंधन के घटक दलों के बीच गहरे राजनीतिक और वैचारिक मतभेद भी सरकार गिरा सकते थे।

एक ही विधानसभा, कई मुख्यमंत्री

1967 के बाद की भारतीय राजनीति की एक नई विशेषता यह थी कि विधानसभा वही रहती थी, लेकिन उसके भीतर सरकार बदल जाती थी।

मतदाताओं के पास गए बिना मुख्यमंत्री बदल सकता था।

इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण मध्य प्रदेश, बिहार, पंजाब और उत्तर प्रदेश में दिखाई दिया।

एक विधानसभा पहले कांग्रेस सरकार बना सकती थी, फिर उसी सदन के कुछ विधायक टूटकर गैर-कांग्रेसी सरकार बना सकते थे और बाद में वही समीकरण फिर बदल सकता था।

यानी चुनाव परिणाम अब केवल आरंभिक स्थिति तय कर रहे थे।

अंतिम सत्ता-संतुलन विधानसभा के भीतर तय हो रहा था।

सबसे अस्थिर राज्यों में क्या समानता थी?

इन राज्यों के घटनाक्रम अलग थे, लेकिन उनमें कुछ समान तत्व दिखाई देते हैं।

पहला—अधिकांश मामलों में किसी एक दल का मजबूत और स्थायी बहुमत नहीं था, या बहुमत इतना कमजोर था कि कुछ विधायक टूटने पर सरकार गिर सकती थी।

दूसरा—गठबंधन में शामिल दल वैचारिक रूप से बहुत अलग थे।

तीसरा—दल-बदल पर कोई प्रभावी कानूनी रोक नहीं थी।

चौथा—छोटे विधायक समूहों का राजनीतिक महत्व असाधारण रूप से बढ़ गया था।

पांचवां—सरकार बनाने के लिए वैचारिक निकटता से अधिक अंकगणितीय बहुमत निर्णायक हो गया था।

मुख्यमंत्री का पद भी अस्थिर हो गया

1967 से पहले कई राज्यों में मुख्यमंत्री वर्षों तक पद पर बने रहते थे। 1967 के बाद कई राज्यों में मुख्यमंत्री का कार्यकाल महीनों में मापा जाने लगा।

उत्तर प्रदेश में चंद्रभानु गुप्त की 1967 की सरकार कुछ सप्ताह चली।

बिहार में बी.पी. मंडल की सरकार लगभग दो महीने भी पूरी नहीं कर सकी।

मध्य प्रदेश में राजा नरेशचंद्र सिंह का कार्यकाल मार्च 1969 में केवल लगभग दो सप्ताह रहा। (Madhya Pradesh Vidhan Sabha)

कई राज्यों में मुख्यमंत्री को प्रशासन चलाने से अधिक समय अपने विधायकों को साथ रखने और बहुमत बचाने में लगाना पड़ता था।

यही इस दौर की मूल राजनीतिक समस्या थी।

1967 के बाद सरकार गिराने का नया रास्ता

इस दौर में सरकार बदलने के तीन प्रमुख तरीके स्पष्ट हुए।

पहला, गठबंधन का कोई प्रमुख दल समर्थन वापस ले ले।

दूसरा, सत्तारूढ़ दल के पर्याप्त विधायक टूटकर विपक्ष से मिल जाएं।

तीसरा, छोटे दलों और निर्दलीयों का समर्थन बदल जाए।

इन तीनों स्थितियों में चुनाव कराने की आवश्यकता नहीं थी।

इससे एक नए प्रकार की राजनीतिक रणनीति विकसित हुई—सरकार को चुनाव में नहीं, विधानसभा के भीतर गिराओ।

यही रणनीति आगे राज्य राजनीति की स्थायी समस्या बनी।

1967–1974 का व्यापक अर्थ

इस दौर की सरकारों के पतन को केवल नेताओं की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से समझना पर्याप्त नहीं होगा।

1967 में भारतीय राजनीति एक-दलीय प्रभुत्व से बहुदलीय प्रतिस्पर्धा की ओर बढ़ रही थी। पुरानी व्यवस्था टूट चुकी थी, लेकिन नई गठबंधन संस्कृति अभी संस्थागत रूप नहीं ले पाई थी।

न तो दलों के बीच स्थायी गठबंधन की परंपरा थी, न साझा न्यूनतम कार्यक्रम जैसी विकसित व्यवस्था, न दल-बदल पर संवैधानिक रोक।

इसलिए सत्ता परिवर्तन तेजी से हुआ।

इन घटनाओं ने भारतीय संघीय राजनीति को यह भी दिखाया कि त्रिशंकु या अस्थिर विधानसभा में राज्यपाल की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण और विवादास्पद हो सकती है।

किसे मुख्यमंत्री बनाया जाए?

किसे बहुमत साबित करने का अवसर मिले?

कब माना जाए कि सरकार ने बहुमत खो दिया है?

क्या विधानसभा भंग की जाए या किसी दूसरे गठबंधन को अवसर दिया जाए?

और जब कोई विकल्प न बचे तो राष्ट्रपति शासन की सिफारिश किस आधार पर की जाए?

1967 से 1974 के बीच बार-बार सरकार गिरने के बाद यही प्रश्न अगली बड़ी संवैधानिक बहस बनकर सामने आए।