गैर-कांग्रेसी और संयुक्त विधायक दल सरकारें
गैर-कांग्रेसी और संयुक्त विधायक दल सरकारों का उदय — किन राज्यों में बनीं और क्यों अस्थिर रहीं
1967 के चुनाव ने भारतीय राजनीति में केवल कांग्रेस की शक्ति कम नहीं की; उसने राज्यों में सरकार बनाने की पूरी पद्धति बदल दी। पहली बार इतने बड़े पैमाने पर ऐसी विधानसभाएं सामने आईं जिनमें कांग्रेस स्पष्ट बहुमत से वंचित थी और विपक्ष के अलग-अलग दल सत्ता के लिए एक साथ आने को तैयार थे। निर्वाचन आयोग ने भी 1967 के बाद की स्थिति का उल्लेख करते हुए दर्ज किया कि कई राज्यों में कांग्रेस बहुमत खो बैठी और किसी एक दल के पास स्पष्ट बहुमत न होने के कारण गैर-कांग्रेसी गठबंधन सरकारें बनीं।
1967 में कांग्रेस ने सात राज्यों में अपना बहुमत खोया, जबकि दो अन्य राज्यों में दल-बदल ने उसे सरकार से बाहर कर दिया। ये नौ राज्य थे—पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, मद्रास और केरल। मद्रास इसका अपवाद था, जहां द्रविड़ मुनेत्र कषगम ने अपने बल पर स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया। बाकी राज्यों में विभिन्न प्रकार के गैर-कांग्रेसी गठबंधन सत्ता में आए।
यहीं से भारतीय राजनीति में संयुक्त विधायक दल की अवधारणा प्रमुखता से सामने आई। इसका अर्थ किसी एक नए राजनीतिक दल से नहीं था। चुनाव के बाद अलग-अलग दलों के निर्वाचित विधायक एक साझा विधायक समूह बनाकर सरकार को समर्थन देते थे। इनका सबसे बड़ा साझा सूत्र था—कांग्रेस को सत्ता से बाहर रखना।
यह प्रयोग ऐतिहासिक था, लेकिन इसमें उसकी कमजोरी भी निहित थी।
उत्तर प्रदेश — विरोधी विचारधाराओं का सबसे बड़ा गठजोड़
उत्तर प्रदेश इस नए दौर का सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण बना। 1967 के चुनाव में कांग्रेस सबसे बड़ा दल तो रही, लेकिन स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं कर सकी। प्रारंभ में चंद्रभानु गुप्त के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार बनी, लेकिन कांग्रेस के भीतर टूट के बाद चौधरी चरण सिंह अलग हो गए और गैर-कांग्रेसी दलों के समर्थन से संयुक्त विधायक दल सरकार अस्तित्व में आई।
इस गठबंधन का आधार कोई साझा वैचारिक कार्यक्रम नहीं था। इसमें समाजवादी, भारतीय जनसंघ, वामपंथी, स्वतंत्र पार्टी से जुड़े तत्व और कांग्रेस से अलग हुए विधायक तक शामिल थे। राजनीतिक दृष्टि से यह एक अत्यंत व्यापक लेकिन अंतर्विरोधों से भरा गठबंधन था।
यहीं संयुक्त विधायक दल की मूल समस्या दिखाई दी। भारतीय जनसंघ और कम्युनिस्ट दल कई मूल प्रश्नों पर एक-दूसरे के विपरीत थे। समाजवादी दलों की आर्थिक और सामाजिक नीति अलग थी। कांग्रेस से टूटकर आए विधायकों की अपनी महत्वाकांक्षाएं थीं।
ऐसी स्थिति में सरकार चलाने का आधार नीति से अधिक संख्या-संतुलन बन गया।
बिहार — एक सरकार में वाम से दक्षिणपंथ तक
बिहार में संयुक्त विधायक दल का स्वरूप और भी असाधारण था। यहां समाजवादी दलों के साथ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और भारतीय जनसंघ जैसे परस्पर विरोधी विचारधाराओं वाले दल एक ही सत्ता-व्यवस्था का हिस्सा बने।
एनसीईआरटी के विवरण में बिहार के संयुक्त विधायक दल का उदाहरण विशेष रूप से दिया गया है—इसमें संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के साथ एक ओर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और दूसरी ओर भारतीय जनसंघ शामिल थे।
यह गठबंधन अपने जन्म से ही कमजोर था। कांग्रेस-विरोध सबको साथ ला सकता था, लेकिन शासन चलाने के प्रश्न पर मतभेद सामने आते ही एकता टूटने लगती थी।
बिहार में इसका परिणाम बहुत जल्दी दिखाई दिया। सत्ता परिवर्तन, विधायक टूटने और नए गठबंधनों का सिलसिला इतना तेज हुआ कि बाद के वर्षों में बिहार दल-बदल की राजनीति के सबसे अस्थिर उदाहरणों में गिना जाने लगा।
पंजाब — अकाली, कम्युनिस्ट, समाजवादी और जनसंघ एक साथ
पंजाब में गैर-कांग्रेसी गठबंधन को पॉपुलर यूनाइटेड फ्रंट कहा गया। इसमें उस समय के दोनों प्रतिद्वंद्वी अकाली गुट, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, रिपब्लिकन पार्टी और भारतीय जनसंघ तक शामिल थे।
यह गठबंधन इस बात का उत्कृष्ट उदाहरण था कि 1967 में कांग्रेस-विरोध ने किस सीमा तक वैचारिक विरोधियों को एक मंच पर ला दिया था।
लेकिन यही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बनी।
अकाली राजनीति के अपने क्षेत्रीय और धार्मिक प्रश्न थे। कम्युनिस्ट दलों की आर्थिक तथा वर्गीय राजनीति अलग थी। जनसंघ की वैचारिक दिशा उनसे बिल्कुल भिन्न थी। समाजवादी दल अपनी अलग प्राथमिकताएं लेकर चल रहे थे।
कुछ ही महीनों बाद लक्ष्मण सिंह गिल अपने समर्थक विधायकों के साथ अलग हुए। परिणामस्वरूप गुरनाम सिंह सरकार गिर गई। बाद में कांग्रेस के समर्थन से गिल सरकार बनी, लेकिन वह भी अधिक समय तक नहीं टिक सकी। पंजाब में अगस्त 1968 में राष्ट्रपति शासन लागू करना पड़ा। इस घटनाक्रम का उल्लेख बाद के न्यायिक अभिलेखों में भी मिलता है।
हरियाणा — बहुमत था, फिर भी सरकार टूट गई
हरियाणा का मामला और अधिक महत्वपूर्ण था, क्योंकि यहां कांग्रेस ने 1967 के विधानसभा चुनाव में स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया था। 81 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस ने 48 सीटें जीती थीं। लेकिन सत्ता संघर्ष और विधायकों के टूटने से वह बहुमत टिक नहीं सका।
कांग्रेस के 12 विधायक अलग हो गए। इसके बाद 22 मार्च 1967 को कांग्रेस मंत्रिमंडल ने इस्तीफा दिया और राव बीरेंद्र सिंह के नेतृत्व में हरियाणा संयुक्त दल ने सत्ता संभाली। न्यायिक अभिलेखों में भी दर्ज है कि कांग्रेस से 12 विधायकों के अलग होने के बाद राव बीरेंद्र सिंह ने 47 सदस्यों का समर्थन जुटाकर सरकार बनाई।
हरियाणा बहुत जल्दी दल-बदल की राजनीति का प्रतीक बन गया। विधायकों का एक पक्ष से दूसरे पक्ष में जाना इतनी तेजी से होने लगा कि इसी राज्य से आगे चलकर “आया राम, गया राम” का प्रसिद्ध राजनीतिक मुहावरा निकला।
हरियाणा का अनुभव यह साबित करता है कि 1967 के बाद अस्थिरता केवल त्रिशंकु विधानसभा वाले राज्यों की समस्या नहीं थी। जहां किसी दल को स्पष्ट बहुमत मिला था, वहां भी आंतरिक टूट सरकार गिरा सकती थी।
मध्य प्रदेश — कांग्रेस के भीतर से ही सत्ता परिवर्तन
मध्य प्रदेश में भी प्रारंभ में कांग्रेस सरकार बनी। लेकिन कांग्रेस के भीतर विभाजन के बाद गोविंद नारायण सिंह के नेतृत्व में बड़ी संख्या में विधायक अलग हुए और गैर-कांग्रेसी दलों के समर्थन से नई सरकार बनाई गई।
इस मामले का महत्व यह था कि विपक्ष स्वयं इतना शक्तिशाली नहीं था कि सीधे चुनाव में सरकार बना सके। सत्ता परिवर्तन की चाबी कांग्रेस से टूटकर निकले विधायकों के हाथ में आई।
यानी 1967 के बाद नई राजनीति केवल “कांग्रेस बनाम विपक्ष” नहीं रह गई थी।
तीसरी शक्ति उभरी—कांग्रेस से टूटे विधायक, जो किसी भी गठबंधन को बहुमत दिला सकते थे।
पश्चिम बंगाल — संयुक्त मोर्चा, लेकिन अंतर्विरोध गहरे
पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के विरुद्ध संयुक्त मोर्चा सरकार बनी। इसमें वामपंथी और अन्य कांग्रेस-विरोधी दल शामिल थे। यहां गैर-कांग्रेसी राजनीति अपेक्षाकृत संगठित थी, लेकिन गठबंधन के भीतर नेतृत्व, नीति और कानून-व्यवस्था जैसे प्रश्नों पर गंभीर मतभेद बने रहे।
पश्चिम बंगाल की विशेषता यह थी कि अस्थिरता केवल व्यक्तिगत दल-बदल से नहीं उपजी। यहां विभिन्न दलों के बीच नीति और सत्ता-साझेदारी को लेकर टकराव भी महत्वपूर्ण था।
इसलिए संयुक्त मोर्चा सरकार अधिक समय तक स्थिर नहीं रह सकी और राज्य शीघ्र ही बार-बार सरकार परिवर्तन के दौर में चला गया।
केरल — गठबंधन राजनीति पहले से थी, लेकिन 1967 ने उसे नया रूप दिया
केरल में गठबंधन राजनीति अन्य राज्यों की तुलना में पहले से विकसित थी। 1967 में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में सात-दलीय गठबंधन सत्ता में आया।
लेकिन यहां भी वैचारिक समीकरण सरल नहीं थे। विभिन्न वामपंथी दलों, मुस्लिम लीग और अन्य सहयोगी दलों के अपने-अपने सामाजिक और राजनीतिक आधार थे।
इस गठबंधन की शुरुआती सफलता के बावजूद आंतरिक मतभेद बढ़े और आगे चलकर सरकार अस्थिर हुई।
केरल का अनुभव यह बताता है कि केवल साझा चुनावी समझौता स्थिर सरकार की गारंटी नहीं था। गठबंधन को टिकाने के लिए साझा शासन-कार्यक्रम और नेतृत्व पर विश्वास भी आवश्यक था।
ओडिशा — कांग्रेस के विकल्प के रूप में गठबंधन
ओडिशा में स्वतंत्र पार्टी और जन कांग्रेस सहित गैर-कांग्रेसी शक्तियों ने मिलकर सरकार बनाई। यहां भी कांग्रेस-विरोधी राजनीति ने पहली बार स्थायी सत्ता विकल्प का रूप लिया।
ओडिशा का उदाहरण उत्तर भारत के संयुक्त विधायक दलों से थोड़ा अलग था, क्योंकि यहां कुछ प्रमुख गठबंधन दलों के बीच राजनीतिक समन्वय अपेक्षाकृत अधिक संगठित था। फिर भी सरकार अंततः आंतरिक मतभेद और शक्ति-संतुलन की समस्याओं से मुक्त नहीं रह सकी।
मद्रास — गठबंधन नहीं, स्पष्ट गैर-कांग्रेसी विकल्प
मद्रास राज्य को बाकी राज्यों से अलग समझना जरूरी है।
यहां द्रविड़ मुनेत्र कषगम ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया और सी.एन. अन्नादुरै के नेतृत्व में सरकार बनाई। यह उन आठ राज्यों जैसी संयुक्त विधायक दल सरकार नहीं थी जहां कई दलों को सत्ता के लिए साथ आना पड़ा।
इसलिए मद्रास का राजनीतिक संदेश अधिक गहरा था।
यहां कांग्रेस केवल सत्ता से बाहर नहीं हुई थी; उसकी जगह एक संगठित क्षेत्रीय दल ने सीधे मतदाताओं से बहुमत प्राप्त कर ली थी। एनसीईआरटी इसे उस समय किसी गैर-कांग्रेसी दल द्वारा किसी राज्य में अपने बल पर बहुमत हासिल करने का पहला उदाहरण बताता है।
इस कारण मद्रास की गैर-कांग्रेसी सरकार अपेक्षाकृत स्थिर आधार पर खड़ी थी, जबकि उत्तर भारत की कई संयुक्त सरकारें विधायकों के बदलते समर्थन पर निर्भर थीं।
आखिर ये सरकारें इतनी अस्थिर क्यों रहीं?
1967 के बाद बनी गैर-कांग्रेसी सरकारों की अस्थिरता के कई कारण थे, लेकिन उनमें सबसे महत्वपूर्ण था विरोध की एकता और शासन की एकता के बीच अंतर।
कांग्रेस को हराना एक साझा उद्देश्य था। लेकिन सरकार बनने के बाद प्रश्न बदल जाते थे—भूमि नीति क्या हो, उद्योगों पर नीति क्या हो, शिक्षा और भाषा के प्रश्न कैसे संभाले जाएं, केंद्र से संबंध कैसे हों, मुख्यमंत्री कौन रहे, कितने मंत्री किस दल को मिलें?
इन प्रश्नों पर गठबंधन सहयोगियों की राय अक्सर अलग-अलग होती थी।
दूसरा बड़ा कारण था कि कई सरकारों का बहुमत बहुत कम था। पांच-दस विधायक इधर-उधर होते ही सरकार गिर सकती थी। इसलिए छोटे दल और निर्दलीय विधायक अपनी वास्तविक संख्या से कहीं अधिक प्रभावशाली हो गए।
तीसरा कारण था दल-बदल पर किसी कानूनी रोक का न होना।
आज की तरह उस समय दल बदलने पर विधायक की सदस्यता स्वतः समाप्त होने की व्यवस्था नहीं थी। दसवीं अनुसूची और दल-बदल विरोधी कानून बहुत बाद में, 1985 में आया। 1967 में विधायक पार्टी छोड़कर दूसरी ओर जा सकता था और अपनी विधानसभा सदस्यता भी बनाए रख सकता था।
इसका परिणाम बहुत तेजी से सामने आया।
मार्च 1967 से फरवरी 1968 के केवल बारह महीनों में कम से कम 438 दल-बदल दर्ज किए गए। इससे पहले प्रथम से चौथे आम चुनाव तक पूरे काल में लगभग 542 ऐसे मामले दर्ज हुए थे। यानी जिस स्तर का दल-बदल लगभग पंद्रह वर्षों में हुआ था, उसके करीब पहुंचने वाली संख्या अकेले एक वर्ष में सामने आ गई। दल-बदल संबंधी संसदीय समिति के ये आंकड़े बाद में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों और विधि आयोग की रिपोर्ट में भी उद्धृत हुए।
और बात केवल पार्टी बदलने तक सीमित नहीं थी।
बिहार, हरियाणा, मध्य प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के 210 दल-बदलू विधायकों में से 116 को उन मंत्रिपरिषदों में जगह मिली जिन्हें बनाने में उनके दल-बदल ने भूमिका निभाई थी।
यह आंकड़ा समझाता है कि सरकारें इतनी अस्थिर क्यों थीं। विधायक केवल विचारधारा नहीं बदल रहे थे; सत्ता का पूरा गणित व्यक्तिगत राजनीतिक लाभ से जुड़ता जा रहा था।
संयुक्त विधायक दल की ऐतिहासिक उपलब्धि और उसकी सीमा
इन सरकारों को केवल विफल प्रयोग कहना उचित नहीं होगा।
उन्होंने पहली बार यह स्थापित किया कि राज्यों में कांग्रेस का विकल्प संभव है। उन्होंने विपक्षी दलों को शासन का अनुभव दिया। उन्होंने भारत की राजनीति को वास्तविक बहुदलीय प्रतिस्पर्धा की दिशा में आगे बढ़ाया।
लेकिन उन्होंने दूसरी वास्तविकता भी सामने रखी—केवल कांग्रेस-विरोध किसी स्थायी सरकार का पर्याप्त आधार नहीं था।
जहां राजनीतिक दलों के बीच साझा कार्यक्रम और मजबूत सामाजिक आधार था, वहां गैर-कांग्रेसी सरकारों के टिकने की संभावना अधिक रही। जहां सरकार केवल विधानसभा के अंकगणित और कांग्रेस से टूटे विधायकों पर आधारित थी, वहां उसका जीवन बहुत छोटा साबित हुआ।
इस दौर का सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन यही था।
1967 से पहले चुनाव मुख्यतः यह तय करते थे कि कांग्रेस कितने बहुमत से सरकार बनाएगी। 1967 के बाद कई राज्यों में चुनाव के बाद भी यह निश्चित नहीं होता था कि सरकार किसकी बनेगी—क्योंकि वास्तविक सत्ता-संघर्ष विधानसभा के भीतर जारी रहता था।
और इसी से भारतीय राजनीति उस अगले दौर में पहुंची जिसमें एक विधायक का पाला बदलना मुख्यमंत्री बदल सकता था, एक छोटे समूह का टूटना सरकार गिरा सकता था और कुछ महीनों के भीतर एक ही विधानसभा कई अलग-अलग सरकारें देख सकती थी।
यह खंड अब सीधे दल-बदल की राजनीति के विस्फोट, उसके पैमाने और सरकारों पर पड़े प्रभाव पर केंद्रित है। इसमें बाद के दल-बदल विरोधी कानून का केवल इतना उल्लेख है जितना इस दौर की गंभीरता समझाने के लिए आवश्यक है।