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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–022 · अध्याय 07

1969 का कांग्रेस विभाजन और राज्यों का सत्ता-संतुलन

1969 का कांग्रेस विभाजन — राज्यों में विधायकों की निष्ठा, सरकारों और सत्ता-संतुलन पर प्रभाव

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskविस्तृत शोध संस्करण · 11 सितंबर 2026

1967 के बाद राज्यों में चल रही राजनीतिक अस्थिरता को 1969 के कांग्रेस विभाजन ने और गहरा कर दिया। यह विभाजन केवल राष्ट्रीय नेतृत्व का संघर्ष नहीं था। इसका सीधा प्रभाव विधानसभाओं पर पड़ा, क्योंकि जिन राज्यों में कांग्रेस पहले से कमजोर बहुमत, आंतरिक गुटबाजी या विपक्षी दबाव से जूझ रही थी, वहां अब कांग्रेस के विधायक स्वयं दो खेमों में बंटने लगे।

इंदिरा गांधी और कांग्रेस संगठन के पुराने नेतृत्व के बीच राष्ट्रपति चुनाव को लेकर संघर्ष निर्णायक मोड़ पर पहुंचा। 12 नवंबर 1969 को इंदिरा गांधी को कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से निष्कासित कर दिया गया। इसके बाद पार्टी व्यावहारिक रूप से दो हिस्सों में बंट गई—एक धड़ा इंदिरा गांधी के साथ और दूसरा संगठन के पुराने नेतृत्व, जिसमें एस. निजलिंगप्पा और मोरारजी देसाई जैसे नेता प्रमुख थे, के साथ। बाद में इन्हें सामान्यतः कांग्रेस (आर) और कांग्रेस (ओ) के रूप में पहचाना गया। सर्वोच्च न्यायालय ने भी बाद के चुनाव-चिह्न विवाद में इस विभाजन और दोनों पक्षों द्वारा संगठन तथा विधायी समर्थन के दावों का विस्तार से उल्लेख किया। (Indian Kanoon)

इस अध्याय के संदर्भ में महत्वपूर्ण बात यह नहीं कि दोनों गुटों के बीच वैचारिक विवाद क्या था, बल्कि यह है कि अब प्रत्येक राज्य में कांग्रेस विधायक को यह तय करना था कि वह किस कांग्रेस के साथ है।

यहीं से सत्ता-संतुलन का नया दौर शुरू हुआ।

विभाजन ने राज्यों में कांग्रेस को एक साथ मजबूत भी किया और कमजोर भी

1969 के बाद पूरे देश में कांग्रेस का विभाजन एक समान नहीं था।

कुछ राज्यों में इंदिरा गांधी समर्थक धड़ा स्पष्ट रूप से मजबूत हो गया। कुछ राज्यों में पुराने संगठन का प्रभाव बना रहा। गुजरात और मैसूर इसका सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण बने, जहां कांग्रेस (ओ) का आधार अपेक्षाकृत मजबूत रहा। इसके विपरीत आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और कई दूसरे राज्यों में इंदिरा समर्थक धड़े को अधिक विधायक मिले। सर्वोच्च न्यायालय के सामने प्रस्तुत आंकड़ों में यह असमानता स्पष्ट दिखाई देती है। (CaseMine)

इसका परिणाम यह हुआ कि अब “कांग्रेस” शब्द अपने-आप में स्थिर राजनीतिक संख्या का संकेत नहीं रहा।

एक राज्य में कांग्रेस का मुख्यमंत्री संगठन कांग्रेस के साथ हो सकता था, जबकि बड़ी संख्या में विधायक इंदिरा गांधी के साथ जा सकते थे।

दूसरे राज्य में स्थिति उलटी हो सकती थी।

यानी 1967 में शुरू हुई विधायक-आधारित राजनीति को 1969 के विभाजन ने एक नया स्रोत दे दिया।

गुजरात — कांग्रेस विभाजन का सबसे स्पष्ट राज्यीय प्रभाव

गुजरात इस पूरे दौर का सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण है।

मुख्यमंत्री हितेंद्र देसाई मोरारजी देसाई के निकट माने जाते थे और कांग्रेस विभाजन के बाद कांग्रेस (ओ) के साथ रहे। शुरुआत में उनके पास पर्याप्त विधायक समर्थन था, लेकिन इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस के राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत होने के साथ गुजरात विधानसभा में भी निष्ठाएं बदलने लगीं।

मार्च 1971 में घटनाक्रम तेजी से बदला।

21 मार्च को कांग्रेस (ओ) के दो विधायक कांग्रेस (आर) में गए। 25 मार्च को एक और विधायक ने वही रास्ता अपनाया। 29 मार्च को सहकारिता मंत्री माधवलाल शाह सहित 17 विधायकों ने कांग्रेस (ओ) छोड़ दी। इससे सत्तारूढ़ दल की संख्या घटकर 78 रह गई, जबकि प्रभावी सदन में बहुमत के लिए 83 सदस्यों की आवश्यकता थी। 31 मार्च को हितेंद्र देसाई ने इस्तीफा दे दिया। संसद की आधिकारिक पत्रिका में यह पूरा घटनाक्रम दर्ज है। (E-Parliament)

लेकिन संकट यहीं समाप्त नहीं हुआ।

मई 1971 में 12 और विधायकों ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया—इनमें कांग्रेस (ओ), स्वतंत्र पार्टी और एक निर्दलीय सदस्य शामिल थे। उनमें से कई इंदिरा समर्थक कांग्रेस में चले गए। इसके बाद राज्यपाल ने रिपोर्ट भेजी कि लगातार दल-बदल के कारण स्थिर सरकार बनना संभव नहीं रह गया है। 13 मई 1971 को राष्ट्रपति शासन लगा और विधानसभा भंग कर दी गई। (E-Parliament)

गुजरात इस बात का प्रत्यक्ष उदाहरण है कि 1969 का कांग्रेस विभाजन कुछ ही वर्षों में विधानसभा बहुमत को कैसे बदल सकता था।

गुजरात में राजनीतिक विडंबना

गुजरात की स्थिति विशेष रूप से दिलचस्प थी।

यह मोरारजी देसाई का गृह राज्य था और कांग्रेस (ओ) का सबसे मजबूत आधार भी। 1971 के लोकसभा चुनाव में पूरे देश में इंदिरा गांधी की कांग्रेस ने भारी सफलता पाई, लेकिन गुजरात में कांग्रेस (ओ) अपेक्षाकृत मजबूत रही।

फिर भी लोकसभा चुनाव के बाद राज्य विधानसभा में कांग्रेस (ओ) के विधायक धीरे-धीरे टूटने लगे।

इससे यह स्पष्ट हुआ कि चुनावी समर्थन और विधायक निष्ठा हमेशा एक ही दिशा में नहीं चलते।

कुछ ही महीनों में कांग्रेस (ओ) सरकार का बहुमत समाप्त हो गया।

मैसूर — संगठन कांग्रेस का दूसरा प्रमुख गढ़

वर्तमान कर्नाटक उस समय मैसूर कहलाता था।

1969 में कांग्रेस का विभाजन यहां भी राष्ट्रीय ढांचे की तरह हुआ। मैसूर प्रदेश कांग्रेस कमेटी दो समूहों में बंट गई—एक इंदिरा गांधी समर्थक और दूसरा कांग्रेस (ओ) समर्थक। बाद के न्यायिक अभिलेखों में भी यह दर्ज है कि राज्य इकाई ठीक उसी तरह विभाजित हुई जैसे अखिल भारतीय कांग्रेस। (Indian Kanoon)

वीरेंद्र पाटिल कांग्रेस (ओ) के प्रमुख नेता बने।

जनवरी 1970 के आसपास उपलब्ध संख्या में मैसूर विधानसभा में कांग्रेस (ओ) की स्थिति इंदिरा समर्थक धड़े से बहुत मजबूत थी। बाद के महीनों में भी कांग्रेस (ओ) का बड़ा विधायक आधार बना रहा। (CaseMine)

लेकिन राष्ट्रीय राजनीतिक हवा बदल रही थी।

1971 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी की भारी जीत ने कांग्रेस (ओ) की राज्यीय स्थिति पर भी दबाव बढ़ाया। इसके बाद मैसूर की राजनीति अस्थिर हुई और मार्च 1971 में राष्ट्रपति शासन लगा।

यह कहना सही नहीं होगा कि मैसूर सरकार केवल कांग्रेस विभाजन के कारण गिरी, लेकिन विभाजन ने वहां सत्ता-संघर्ष की पृष्ठभूमि अवश्य तैयार की।

उत्तर प्रदेश — दोनों कांग्रेस गुटों की बड़ी उपस्थिति

उत्तर प्रदेश में 1969 के बाद स्थिति गुजरात से अलग थी।

यहां इंदिरा समर्थक कांग्रेस और कांग्रेस (ओ), दोनों के पास महत्वपूर्ण विधायक संख्या थी।

सर्वोच्च न्यायालय के सामने प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार जनवरी 1970 के आसपास उत्तर प्रदेश में इंदिरा समर्थक धड़े के लगभग 120 और कांग्रेस (ओ) के लगभग 102 विधायक थे। उसी वर्ष बाद में यह संतुलन बदलकर लगभग 150 बनाम 84 हो गया। (CaseMine)

यह बदलाव केवल संगठनात्मक विभाजन नहीं था।

उत्तर प्रदेश पहले ही चरण सिंह, संयुक्त विधायक दल और बार-बार बदलते गठबंधनों से अस्थिर था। कांग्रेस का दो हिस्सों में बंटना एक और राजनीतिक घटक जोड़ गया।

अब किसी सरकार को समर्थन देने या गिराने के लिए केवल “कांग्रेस” से समझौता पर्याप्त नहीं था। यह भी देखना पड़ता था कि कांग्रेस का कौन-सा गुट किसके साथ है।

इससे विधानसभा का अंकगणित और जटिल हो गया।

बिहार — पहले से अस्थिर राजनीति में एक और विभाजन

बिहार 1967 से ही लगातार सरकार परिवर्तन देख रहा था।

1969 के कांग्रेस विभाजन ने यहां भी कांग्रेस विधायकों को दो खेमों में बांट दिया।

सर्वोच्च न्यायालय के अभिलेख में जनवरी 1970 के आसपास बिहार में इंदिरा समर्थक धड़े के 81 और कांग्रेस (ओ) के 31 विधायक दर्ज हैं; बाद में यह अंतर लगभग 86 बनाम 28 हो गया। (CaseMine)

इसका अर्थ था कि कांग्रेस के भीतर शक्ति धीरे-धीरे इंदिरा गांधी की ओर जा रही थी।

लेकिन बिहार की राजनीतिक अस्थिरता इतनी गहरी थी कि केवल कांग्रेस विभाजन से उसका कारण नहीं समझा जा सकता। वहां पहले से छोटे दल, संयुक्त मोर्चे, दल-बदल और अल्पजीवी सरकारें मौजूद थीं।

1969 की टूट ने उस जटिलता को और बढ़ाया।

मध्य प्रदेश — इंदिरा समर्थक कांग्रेस का स्पष्ट प्रभुत्व

मध्य प्रदेश में तस्वीर अलग थी।

यहां कांग्रेस पहले ही 1967 में बड़े विभाजन का अनुभव कर चुकी थी, जब गोविंद नारायण सिंह कांग्रेस से अलग होकर विपक्ष के समर्थन से सरकार बना चुके थे।

1969 के राष्ट्रीय कांग्रेस विभाजन के बाद राज्य में इंदिरा समर्थक कांग्रेस ने बहुत मजबूत विधायक आधार बना लिया।

बाद में दर्ज आंकड़ों में मध्य प्रदेश में इंदिरा समर्थक कांग्रेस की संख्या 177 और फिर 192 तक दिखाई गई, जबकि कांग्रेस (ओ) की प्रभावी उपस्थिति नगण्य रही। (CaseMine)

अर्थात 1969 का विभाजन सभी राज्यों में सरकार गिराने वाला संकट नहीं बना।

कुछ राज्यों में उसने उलटे एक गुट को इतना मजबूत कर दिया कि सत्ता-संतुलन अधिक स्पष्ट हो गया।

यही इस विभाजन की राज्यवार असमान प्रकृति थी।

महाराष्ट्र और राजस्थान — संगठन कांग्रेस अपेक्षाकृत कमजोर

महाराष्ट्र में भी इंदिरा समर्थक कांग्रेस का भारी वर्चस्व बना रहा। उपलब्ध आंकड़ों में जनवरी 1970 के आसपास उसके पास 204 विधायक थे, जबकि बाद में कांग्रेस (ओ) की संख्या केवल 13 के आसपास दिखाई देती है। राजस्थान में भी इंदिरा समर्थक धड़ा स्पष्ट रूप से भारी पड़ा। (CaseMine)

इन राज्यों में कांग्रेस विभाजन ने गुजरात जैसी सरकार-पतन की स्थिति पैदा नहीं की।

यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है।

1969 का विभाजन राष्ट्रीय था, लेकिन उसका राजनीतिक परिणाम राज्यवार अलग था।

विधायकों की निष्ठा अब राष्ट्रीय नेतृत्व से भी जुड़ने लगी

1967 के बाद दल-बदल में स्थानीय कारण बहुत महत्वपूर्ण थे—मंत्रीपद, मुख्यमंत्री विरोध, क्षेत्रीय गुट या गठबंधन की राजनीति।

1969 के विभाजन ने इसमें एक नया तत्व जोड़ दिया।

अब विधायक का पक्ष परिवर्तन यह भी दिखाता था कि वह इंदिरा गांधी के नेतृत्व को स्वीकार करता है या पुराने संगठन नेतृत्व के साथ है।

इस कारण राज्य विधानसभाओं में होने वाली टूट सीधे राष्ट्रीय शक्ति-संघर्ष से जुड़ गई।

गुजरात इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है, लेकिन उत्तर प्रदेश, बिहार, मैसूर और दूसरे राज्यों में भी कांग्रेस विधायकों की निष्ठा का सवाल राज्य सरकारों के बहुमत से जुड़ गया।

केंद्र और राज्य कांग्रेस के संबंध बदले

इस विभाजन का एक दीर्घकालीन प्रभाव यह भी था कि कांग्रेस की राज्य इकाइयों और केंद्रीय नेतृत्व के संबंध बदलने लगे।

इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत होती गई और पार्टी की निर्णय प्रक्रिया अधिक केंद्रित होने लगी। इंदिरा समर्थक कांग्रेस के भीतर केंद्रीय नेतृत्व का प्रभाव मुख्यमंत्री चयन और राज्य नेतृत्व पर पहले की तुलना में अधिक हुआ। इस परिवर्तन को राजनीतिक अध्ययनों में कांग्रेस की संगठनात्मक संरचना के अधिक केंद्रीकृत होने से जोड़ा गया है। (eGyankosh)

लेकिन हमारे विषय के लिए इसका सबसे महत्वपूर्ण परिणाम यह था कि राज्य विधायक अब केवल अपने प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व से बंधे नहीं थे।

उनकी राजनीतिक निष्ठा सीधे दिल्ली के नेतृत्व से भी जुड़ने लगी।

1971 की विजय ने निष्ठाओं का संतुलन बदल दिया

1969 में विभाजन के तुरंत बाद यह स्पष्ट नहीं था कि अंततः कौन-सा कांग्रेस गुट जनता के बीच अधिक शक्तिशाली सिद्ध होगा।

लेकिन 1971 के लोकसभा चुनाव ने यह अनिश्चितता काफी हद तक समाप्त कर दी।

इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने भारी विजय प्राप्त की। इससे राज्य स्तर पर भी राजनीतिक संकेत गया कि राष्ट्रीय सत्ता और जनसमर्थन का केंद्र इंदिरा गांधी के पास है।

गुजरात में लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस (ओ) से विधायकों के टूटने की गति बढ़ी। मैसूर जैसे उसके दूसरे मजबूत आधार में भी संगठन कांग्रेस पर दबाव बढ़ा।

1972 के विधानसभा चुनावों में यह प्रवृत्ति और स्पष्ट हो गई। गुजरात और मैसूर जैसे राज्यों में भी इंदिरा समर्थक कांग्रेस ने बड़ी जीत दर्ज की और कांग्रेस (ओ) बहुत पीछे रह गई। (Wisdom Library)

इसलिए 1969 का विभाजन केवल पार्टी को दो हिस्सों में बांटने की घटना नहीं रहा।

1971–72 तक उसने राज्य राजनीति में यह तय कर दिया कि कांग्रेस की मुख्य धारा किसके नेतृत्व में रहेगी।

क्या 1969 का विभाजन 1967 की अस्थिरता को बढ़ाता है?

उत्तर स्पष्ट है—कुछ राज्यों में हां, लेकिन सभी में नहीं।

गुजरात में इसका सीधा संबंध सरकार के बहुमत टूटने और अंततः राष्ट्रपति शासन से था।

मैसूर में इसने सत्ता-संघर्ष को तीखा किया।

उत्तर प्रदेश और बिहार में पहले से जटिल विधानसभा समीकरणों में एक और विभाजन जुड़ गया।

मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान में इसके विपरीत इंदिरा समर्थक धड़ा इतना मजबूत हुआ कि कांग्रेस के अंदर सत्ता-संतुलन अधिक स्पष्ट हो गया।

इसलिए पूरे देश पर एक ही निष्कर्ष लागू नहीं किया जा सकता।

कांग्रेस का विभाजन और दल-बदल में अंतर

यहां एक ऐतिहासिक अंतर भी ध्यान में रखना चाहिए।

1969 में कांग्रेस का टूटना साधारण अर्थ में कुछ विधायकों का व्यक्तिगत दल-बदल नहीं था। यह राष्ट्रीय राजनीतिक दल का औपचारिक विभाजन था।

लेकिन राज्य विधानसभाओं में उसका परिणाम कई बार दल-बदल जैसा दिखाई दिया।

विधायक एक कांग्रेस गुट से दूसरे कांग्रेस गुट की ओर जाने लगे।

संख्या बदलने लगी।

सरकार का बहुमत प्रभावित हुआ।

मंत्री और विधायक राजनीतिक खेमे बदलने लगे।

इसलिए 1967–74 की राजनीतिक अस्थिरता का अध्ययन करते समय कांग्रेस विभाजन को सामान्य दल-बदल की गणना में सीधे जोड़ना उचित नहीं होगा, लेकिन सरकारों के बदलते बहुमत की व्याख्या में इसे अलग से दर्ज करना आवश्यक है।

सबसे बड़ा उदाहरण: गुजरात

यदि पूरे 1969 के विभाजन के राज्यीय प्रभाव को एक राज्य में समझना हो तो वह गुजरात है।

1969 में कांग्रेस विभाजित हुई।

हितेंद्र देसाई कांग्रेस (ओ) के साथ रहे।

1971 में उनके विधायक इंदिरा समर्थक कांग्रेस की ओर जाने लगे।

मार्च 1971 तक सरकार बहुमत खो बैठी।

मुख्यमंत्री ने इस्तीफा दिया।

मई में और टूट हुई।

राज्यपाल ने स्थिर सरकार की संभावना समाप्त मानते हुए केंद्र को रिपोर्ट भेजी।

13 मई 1971 को राष्ट्रपति शासन लगा।

और 1972 के चुनाव में इंदिरा समर्थक कांग्रेस भारी बहुमत से सत्ता में लौट आई।

यह क्रम दिखाता है कि राष्ट्रीय दल का विभाजन किस तरह राज्यीय विधायक निष्ठा → बहुमत संकट → सरकार का पतन → राष्ट्रपति शासन → नया चुनाव जैसी पूरी श्रृंखला उत्पन्न कर सकता था। (E-Parliament)

1969 ने कांग्रेस की राजनीति का स्वभाव बदल दिया

1967 में कांग्रेस की समस्या यह थी कि विपक्ष मजबूत हो रहा था और राज्यों में उसका बहुमत टूट रहा था।

1969 के बाद एक नई समस्या जुड़ गई—कांग्रेस स्वयं एक इकाई नहीं रही।

अब संघर्ष कांग्रेस बनाम विपक्ष ही नहीं था।

कई राज्यों में कांग्रेस बनाम कांग्रेस भी था।

और क्योंकि दोनों पक्षों के पास विधायक थे, यह संघर्ष विधानसभा के बहुमत से सीधे जुड़ गया।

इसी कारण 1969 का विभाजन हमारे इस अध्ययन में महत्वपूर्ण है।

यह अलग से कांग्रेस का इतिहास लिखने के लिए नहीं, बल्कि इसलिए आवश्यक है क्योंकि इसने 1967 से चल रही दल-बदल, सरकार-पतन और बदलते बहुमत की राजनीति को नई गति और नया स्वरूप दिया।

1971–72 तक इंदिरा गांधी का धड़ा निर्णायक रूप से मजबूत हो चुका था और संगठन कांग्रेस तेजी से सिकुड़ रही थी।

लेकिन 1967 से 1971 के बीच की इस संक्रमण अवधि ने राज्य राजनीति को जितना अस्थिर किया, उसने पूरे दौर को भारतीय लोकतंत्र के सबसे उथल-पुथल वाले चरणों में शामिल कर दिया।