1967 का चुनाव: कांग्रेस के प्रभुत्व में पहली दरार
1967 से 1974 का उथल-पुथल भरा दौर
स्वतंत्र भारत की राजनीति में 1967 का आम चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन की सामान्य चुनावी प्रक्रिया नहीं था। इसने उस राजनीतिक व्यवस्था में पहली बड़ी दरार पैदा की, जिसमें स्वतंत्रता के बाद लगभग दो दशकों तक कांग्रेस केंद्र और अधिकांश राज्यों की निर्विवाद प्रमुख शक्ति बनी रही थी। केंद्र में कांग्रेस की सरकार बच गई, लेकिन उसकी शक्ति स्पष्ट रूप से कम हुई। उससे भी अधिक महत्वपूर्ण परिवर्तन राज्यों में दिखाई दिया, जहां पहली बार बड़ी संख्या में गैर-कांग्रेसी दल सत्ता के वास्तविक दावेदार बनकर सामने आए।
1952, 1957 और 1962 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस लगातार भारी बहुमत प्राप्त करती रही थी। 1962 में कांग्रेस ने लोकसभा की 361 सीटें जीती थीं और उसे लगभग 44.72 प्रतिशत मत मिले थे। पांच वर्ष बाद 1967 में उसकी सीटें घटकर 283 रह गईं और मत प्रतिशत भी गिरकर लगभग 40.78 प्रतिशत पर आ गया। यानी कांग्रेस केंद्र में बहुमत बनाए रखने में सफल रही, लेकिन लोकसभा में उसकी ताकत एक झटके में 78 सीट कम हो गई। निर्वाचन आयोग के आंकड़े इस चुनाव को कांग्रेस की केंद्रीय सत्ता के लिए पहली गंभीर चुनावी चेतावनी के रूप में सामने रखते हैं। (Election Commission of India)
यह गिरावट केवल संख्या की नहीं थी। 1967 से पहले यह धारणा मजबूत थी कि कांग्रेस ही वह राष्ट्रीय संगठन है जिसके सामने विपक्ष बिखरा हुआ और कमजोर है। समाजवादी, कम्युनिस्ट, स्वतंत्र पार्टी, जनसंघ और क्षेत्रीय दल अलग-अलग क्षेत्रों में प्रभाव रखते थे, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के सामने कोई एक मजबूत विकल्प नहीं था। 1967 ने इस समीकरण को बदला। विपक्ष ने पहली बार यह अनुभव किया कि यदि वह राज्य स्तर पर कांग्रेस-विरोधी मतों को जोड़ सके तो कांग्रेस को सत्ता से हटाया जा सकता है।
कांग्रेस की कमजोरी अचानक नहीं आई थी
1967 के चुनाव परिणामों की पृष्ठभूमि समझने के लिए यह ध्यान रखना आवश्यक है कि कांग्रेस की राजनीतिक शक्ति पहले ही दबाव में आ चुकी थी। जवाहरलाल नेहरू का 1964 में निधन हो चुका था। उनके बाद लालबहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने, लेकिन जनवरी 1966 में ताशकंद में उनका भी आकस्मिक निधन हो गया। इसके बाद इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री पद संभाला।
अर्थात 1967 का चुनाव उस कांग्रेस ने लड़ा जिसके पास नेहरू जैसा निर्विवाद राष्ट्रीय नेतृत्व नहीं था और जो बहुत कम समय में दो प्रधानमंत्रियों के निधन के बाद नेतृत्व परिवर्तन से गुजर चुकी थी।
इसके साथ आर्थिक परिस्थितियां भी प्रतिकूल थीं। 1965 और 1966 के सूखे, खाद्यान्न संकट, महंगाई और आर्थिक दबाव का प्रभाव आम मतदाता पर पड़ा। 1966 में रुपये का अवमूल्यन भी राजनीतिक विवाद का विषय बना। इसलिए कई राज्यों में कांग्रेस के विरुद्ध असंतोष केवल विपक्षी दलों की रणनीति का परिणाम नहीं था; शासन से जुड़ी शिकायतें भी बढ़ रही थीं।
लेकिन इस अध्याय के संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह असंतोष मतों से निकलकर सत्ता-समीकरण में बदल गया।
लोकसभा में बहुमत बचा, राजनीतिक प्रभुत्व घटा
1967 में लोकसभा के लिए मतदान में भागीदारी भी उल्लेखनीय थी। निर्वाचन आयोग के अनुसार कुल मतदान लगभग 61.04 प्रतिशत रहा। यह उस समय तक भारतीय लोकतंत्र के विस्तार का संकेत था। (Election Commission of India)
कांग्रेस 283 सीटों के साथ केंद्र में सरकार बनाने में सफल रही, लेकिन पहले जैसी स्थिति समाप्त हो चुकी थी। 1962 में जहां कांग्रेस के पास लोकसभा में बहुत आरामदायक बहुमत था, वहीं 1967 के बाद सरकार के भीतर और बाहर दोनों स्तरों पर राजनीतिक दबाव बढ़ा।
स्वतंत्र पार्टी ने 44 लोकसभा सीटें जीतकर महत्वपूर्ण विपक्षी शक्ति के रूप में स्थान बनाया। समाजवादी दलों, भारतीय जनसंघ, कम्युनिस्ट दलों और क्षेत्रीय शक्तियों की उपस्थिति भी बढ़ी। विपक्ष अभी एक संयुक्त राष्ट्रीय दल नहीं था, लेकिन उसका फैलाव कांग्रेस के लिए नई चुनौती था।
यहीं 1967 की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता थी—कांग्रेस केंद्र से बाहर नहीं हुई, लेकिन पहली बार यह स्पष्ट हो गया कि उसे हराया जा सकता है।
असली राजनीतिक विस्फोट राज्यों में हुआ
1967 के चुनाव की सबसे बड़ी राजनीतिक घटना लोकसभा में नहीं, बल्कि राज्य विधानसभाओं में हुई।
निर्वाचन आयोग ने बाद के अपने आधिकारिक विवरण में भी दर्ज किया कि 1967 में तत्कालीन प्रमुख राजनीतिक दल कांग्रेस ने कई राज्य विधानसभाओं में अपना बहुमत खो दिया। इसके बाद कई राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारें बनीं और ऐसी विधानसभाएं सामने आईं जहां किसी एक दल के पास स्पष्ट बहुमत नहीं था।
यहीं से उस राजनीतिक दौर की शुरुआत हुई जिसे आगे चलकर गठबंधन, संयुक्त विधायक दल, दल-बदल और अल्पजीवी सरकारों के लिए जाना गया।
कांग्रेस के लिए यह परिवर्तन इसलिए भी गंभीर था क्योंकि उसकी राष्ट्रीय शक्ति का बड़ा आधार राज्यों पर नियंत्रण था। स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक केंद्र और अधिकांश राज्यों में एक ही दल की सरकार होने से शासन और राजनीति का एक प्रकार का ऊर्ध्वाधर ढांचा बना हुआ था। राज्य नेतृत्व कांग्रेस संगठन का हिस्सा था और केंद्रीय नेतृत्व के साथ उसका सीधा संबंध था।
1967 में कई राज्यों में यह व्यवस्था टूट गई।
उत्तर भारत में कांग्रेस-विरोधी राजनीति का उभार
उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे बड़े राज्यों में कांग्रेस बहुमत से दूर हो गई। यह साधारण चुनावी पराजय नहीं थी। इन दोनों राज्यों का राष्ट्रीय राजनीति में अत्यंत बड़ा महत्व था। उत्तर प्रदेश लोकसभा की सबसे अधिक सीटों वाला राज्य था और कांग्रेस के अनेक राष्ट्रीय नेताओं का राजनीतिक आधार भी रहा था।
जब ऐसे राज्यों में कांग्रेस अपने बल पर स्थिर सरकार बनाने की स्थिति खोने लगी तो विपक्षी दलों को पहली बार वास्तविक सत्ता-साझेदारी का अवसर मिला।
समाजवादी, जनसंघ, कम्युनिस्ट, स्वतंत्र पार्टी और कांग्रेस से अलग हुए छोटे समूह कई जगह वैचारिक रूप से एक-दूसरे से बहुत भिन्न थे। फिर भी उनका एक साझा उद्देश्य था—कांग्रेस को सत्ता से हटाना।
इसी परिस्थिति से आगे चलकर संयुक्त विधायक दल की राजनीति जन्म लेने वाली थी।
मद्रास में परिवर्तन और क्षेत्रीय राजनीति की शक्ति
1967 का चुनाव क्षेत्रीय राजनीति के लिए भी निर्णायक साबित हुआ। मद्रास राज्य, जो बाद में तमिलनाडु कहलाया, में द्रविड़ मुनेत्र कषगम ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया। यह परिणाम विशेष महत्व रखता था, क्योंकि यहां केवल अस्थायी गठबंधन ने कांग्रेस को नहीं हराया था; एक संगठित क्षेत्रीय राजनीतिक शक्ति ने कांग्रेस की जगह ले ली थी।
इस घटना ने स्पष्ट किया कि भारत की राजनीति अब केवल कांग्रेस बनाम राष्ट्रीय विपक्ष तक सीमित नहीं रहने वाली थी। भाषा, क्षेत्रीय पहचान और राज्य-विशिष्ट राजनीतिक प्रश्नों के आधार पर बने दल भी स्थायी सत्ता विकल्प बन सकते थे।
इस परिवर्तन का प्रभाव आने वाले दशकों में बहुत व्यापक हुआ, लेकिन 1967 के तत्काल संदर्भ में इसका संदेश स्पष्ट था—कांग्रेस का राज्य स्तर पर स्वाभाविक सत्ता-अधिकार समाप्त हो रहा था।
पश्चिम बंगाल, केरल, पंजाब और अन्य राज्यों में भी चुनौती
पश्चिम बंगाल, केरल, पंजाब, ओडिशा और दूसरे राज्यों में भी कांग्रेस को गंभीर चुनौती मिली। कई जगह किसी एक विपक्षी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिला, इसलिए अलग-अलग दलों को साथ आकर सरकार बनानी पड़ी।
यहीं इस राजनीतिक परिवर्तन की शक्ति और कमजोरी दोनों छिपी थीं।
शक्ति यह थी कि पहली बार विभिन्न विपक्षी दल कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर सकते थे।
कमजोरी यह थी कि इन दलों में वैचारिक समानता बहुत कम थी। कहीं समाजवादी और जनसंघ एक साथ थे, कहीं वामपंथी दलों का गठबंधन था, कहीं क्षेत्रीय दल और कांग्रेस से टूटे हुए विधायक निर्णायक बन गए।
इसलिए 1967 ने एक ओर कांग्रेस के प्रभुत्व को तोड़ा, लेकिन दूसरी ओर स्थिर वैकल्पिक शासन तुरंत स्थापित नहीं किया।
स्पष्ट बहुमत का अभाव बना अस्थिरता का आधार
1967 के बाद कई विधानसभाओं में समस्या यह नहीं थी कि कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी नहीं थी। कई स्थानों पर वह अब भी सबसे बड़ा दल थी। समस्या यह थी कि उसके पास सरकार चलाने के लिए आवश्यक स्पष्ट बहुमत नहीं था।
इसके कारण छोटी पार्टियों और निर्दलीय विधायकों का महत्व अचानक बढ़ गया।
कुछ ही विधायक सरकार बनाने या गिराने की स्थिति में आ गए। एक विधायक का दल बदलना भी बहुमत के गणित को प्रभावित कर सकता था। राजनीतिक निष्ठा, पद, मंत्रीपद, नेतृत्व विवाद और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं सरकारों की स्थिरता से सीधे जुड़ गईं।
इसी स्थिति ने आगे उस दल-बदल संस्कृति को जन्म दिया जिसमें विधायक बार-बार दल और समर्थन बदलने लगे।
1967 का चुनाव इसलिए केवल कांग्रेस की पराजय की कहानी नहीं, बल्कि विधानसभा के अंकगणित के निर्णायक बन जाने की शुरुआत भी था।
राज्यों में सत्ता परिवर्तन ने केंद्र-राज्य संबंध भी बदले
पहली बार बड़ी संख्या में ऐसे राज्यों की सरकारें सामने आईं जिनकी राजनीतिक दिशा केंद्र में बैठी कांग्रेस सरकार से अलग थी।
इसने राज्यपाल की भूमिका को भी अधिक महत्वपूर्ण बना दिया। जब किसी विधानसभा में स्पष्ट बहुमत नहीं हो तो किसे सरकार बनाने के लिए बुलाया जाए? गठबंधन का दावा कितना विश्वसनीय माना जाए? यदि मुख्यमंत्री बहुमत खो दे तो क्या तत्काल सदन में परीक्षण कराया जाए? विधानसभा भंग की जाए या किसी दूसरे समूह को सरकार बनाने का अवसर दिया जाए?
1967 से पहले ये प्रश्न भारतीय राजनीति में इतने व्यापक स्तर पर सामने नहीं आए थे।
अब वे कई राज्यों में बार-बार उठने लगे।
यही कारण है कि 1967 का चुनाव आगे आने वाले राज्यपाल विवाद, बहुमत परीक्षण, सरकारों के पतन और राष्ट्रपति शासन की पृष्ठभूमि भी बन गया।
कांग्रेस के वर्चस्व का अंत नहीं, एकछत्र प्रभुत्व का अंत
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है।
1967 में कांग्रेस समाप्त नहीं हुई थी। वह केंद्र में सत्ता में रही। कई राज्यों में भी उसकी सरकारें बनी रहीं। उसके पास पूरे देश में मजबूत संगठन और व्यापक जनाधार था।
इसलिए 1967 को कांग्रेस के पतन की शुरुआत कहना अधूरा होगा।
अधिक सटीक बात यह है कि 1967 ने कांग्रेस के एकछत्र प्रभुत्व को पहली बार समाप्त किया।
अब भारतीय राजनीति में यह निश्चित नहीं रहा कि चुनाव के बाद कांग्रेस ही सरकार बनाएगी। विपक्ष के लिए सत्ता की संभावना वास्तविक हो गई और कांग्रेस के भीतर से टूटकर निकलने वाले नेताओं के लिए भी नई राजनीतिक जगह बनी।
यही परिवर्तन अगले कुछ वर्षों में राजनीतिक अस्थिरता को बहुत तेज करने वाला था।
1967 की दरार क्यों ऐतिहासिक थी
इस चुनाव के बाद तीन बातें स्थायी रूप से बदल गईं।
पहली, राज्यों में कांग्रेस को हराना संभव सिद्ध हो गया।
दूसरी, अलग-अलग विचारधारा वाले विपक्षी दल कांग्रेस-विरोध के आधार पर सरकार बनाने के लिए एक साथ आ सकते थे।
तीसरी, जहां किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं था वहां विधायकों की व्यक्तिगत निष्ठा सत्ता का निर्णायक आधार बनने लगी।
यही तीसरा परिवर्तन शीघ्र ही सबसे विस्फोटक साबित हुआ।
1967 में बनी कई गैर-कांग्रेसी और संयुक्त सरकारें शीघ्र ही अंतर्विरोधों से घिरने लगीं। गठबंधन टूटे, विधायक पक्ष बदलने लगे, मुख्यमंत्री हटे और नई सरकारें बनने लगीं।
इस प्रकार 1967 का चुनाव उस “उथल-पुथल के राजनीतिक दौर” का प्रवेश-द्वार था जिसमें भारतीय राज्यों ने कुछ ही वर्षों में अभूतपूर्व सरकार परिवर्तन और दल-बदल देखा।
निर्वाचन आयोग के अपने ऐतिहासिक विवरण में भी 1967 के बाद की स्थिति को इस रूप में रेखांकित किया गया है कि कई राज्यों में कांग्रेस का बहुमत समाप्त होने के बाद गैर-कांग्रेसी सरकारें बनीं और स्पष्ट बहुमत के अभाव ने अस्थिरता की परिस्थितियां पैदा कीं।
इसलिए 1967 का सबसे बड़ा राजनीतिक परिणाम केवल यह नहीं था कि कांग्रेस की सीटें कम हुईं। वास्तविक परिवर्तन यह था कि भारत की राज्य राजनीति पहली बार स्थायी एक-दलीय प्रभुत्व से निकलकर गठबंधन, जोड़-तोड़ और बदलते बहुमत के युग में प्रवेश कर गई।