समेकित आकलन: सरकारें, दल-बदल और राष्ट्रपति शासन
1967–1974 की राजनीतिक अस्थिरता का समेकित आकलन
1967 से 1974 का दौर स्वतंत्र भारत की राज्य राजनीति में असाधारण अस्थिरता का काल था। 1967 के चुनाव ने कांग्रेस के लंबे एकछत्र प्रभुत्व में दरार डाली, लेकिन उसके स्थान पर तुरंत कोई स्थिर वैकल्पिक व्यवस्था स्थापित नहीं हो सकी। परिणाम यह हुआ कि कई राज्यों में गठबंधन बने, टूटे, विधायक दल बदलते रहे, मुख्यमंत्री बदलते रहे और बार-बार राष्ट्रपति शासन की नौबत आई।
इस पूरे दौर का हिसाब लगाते समय एक सावधानी आवश्यक है। “दल-बदल”, “दल-बदल करने वाला विधायक”, “सरकार का गिरना” और “मुख्यमंत्री बदलना”—ये चार अलग-अलग चीजें हैं। एक विधायक कई बार दल बदल सकता था; इसलिए दल-बदल की घटनाओं की संख्या को दल बदलने वाले अलग-अलग व्यक्तियों की संख्या नहीं माना जा सकता। इसी प्रकार हर मुख्यमंत्री परिवर्तन का अर्थ सरकार का दल-बदल से गिरना भी नहीं था।
इसीलिए उपलब्ध संसदीय, न्यायिक और शोध अभिलेखों को अलग-अलग श्रेणियों में पढ़ना अधिक सही है।
पहला निर्णायक आंकड़ा — केवल एक वर्ष में 438 दल-बदल
1967 के चौथे आम चुनाव के तुरंत बाद स्थिति कितनी तेजी से बिगड़ी, इसका सबसे विश्वसनीय प्रमाण केंद्र सरकार की दल-बदल समिति के आंकड़ों में मिलता है।
सर्वोच्च न्यायालय ने बाद में समिति की रिपोर्ट उद्धृत करते हुए दर्ज किया कि प्रथम आम चुनाव से चौथे आम चुनाव तक लगभग 542 दल-बदल हुए थे। लेकिन मार्च 1967 से फरवरी 1968 के केवल बारह महीनों में कम से कम 438 दल-बदल दर्ज हुए।
इसी अवधि में चुने गए 376 निर्दलीय विधायकों में से 157 किसी न किसी राजनीतिक दल में शामिल हो गए।
अर्थात जिस स्तर का दल-बदल लगभग पंद्रह वर्षों में हुआ था, लगभग उतनी ही संख्या एक वर्ष में सामने आने लगी थी।
यह 1967 के बाद के राजनीतिक परिवर्तन की तीव्रता को सबसे स्पष्ट रूप से दिखाता है।
1967 से 1970 — लगभग 800 विधायक दल-बदल की राजनीति में
बाद के न्यायिक अभिलेखों में उद्धृत समकालीन अध्ययनों के अनुसार 1967 से 1970 के बीच लगभग 800 विधायक दल-बदल की राजनीति में शामिल हुए।
इनमें से लगभग 155 को पद मिला और 84 को मंत्रिमंडल स्तर का पद प्राप्त हुआ। इसी अध्ययन में यह भी दर्ज है कि 1967 के चुनाव के बाद पहले एक वर्ष में कांग्रेस से 175 विधायक बाहर गए, जबकि 139 विधायक दूसरे दलों से कांग्रेस में आए।
इस आंकड़े से उस समय की राजनीति की प्रकृति स्पष्ट होती है।
दल-बदल केवल एकतरफा नहीं था।
विधायक कांग्रेस छोड़ रहे थे और कांग्रेस में आ भी रहे थे। इसी तरह गैर-कांग्रेसी गठबंधनों के भीतर भी विधायक समूह बदल रहे थे।
यानी पूरा विधानसभा तंत्र एक प्रकार के चलते हुए बहुमत में बदल गया था।
1967–1971 — 1,969 विधानसभा दल-बदल की घटनाएं
चार वर्ष की व्यापक तस्वीर और भी चौंकाने वाली है।
पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च द्वारा संकलित ऐतिहासिक आंकड़ों के अनुसार 1967 से 1971 के बीच राज्य विधानसभाओं में 1,969 दल-बदल की घटनाएं हुईं।
इसी अवधि में संसद में 142 दल-बदल दर्ज किए गए।
इस आंकड़े को सावधानी से पढ़ना चाहिए।
1,969 का अर्थ 1,969 अलग-अलग विधायक नहीं है।
कई विधायकों ने एक से अधिक बार दल बदला। “आया राम, गया राम” इसी कारण उस दौर का प्रतीक बना। इसलिए यह संख्या दल-बदल की घटनाओं की है, न कि अलग-अलग व्यक्तियों की सुनिश्चित राष्ट्रीय संख्या।
इसी तरह संसद के 142 आंकड़े को भी दल बदलने की घटनाओं के रूप में पढ़ना अधिक सुरक्षित है।
कितनी सरकारें दल-बदल के कारण गिरीं?
इस प्रश्न का सबसे अधिक उद्धृत समेकित आंकड़ा भी 1967–1971 की अवधि का है।
पीआरएस के अनुसार इस चार वर्ष की अवधि में 32 राज्य सरकारें दल-बदल के कारण गिर गईं। उसी स्रोत के अनुसार 212 दल-बदलुओं को बाद में मंत्री पद मिला।
यह संख्या इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे दल-बदल और सत्ता परिवर्तन के बीच सीधा संबंध स्थापित होता है।
औसतन देखें तो चार वर्षों में लगभग हर डेढ़ महीने में किसी न किसी राज्य में एक सरकार दल-बदल से प्रभावित होकर गिर रही थी।
लेकिन इस दौर की अस्थिरता को केवल 32 तक सीमित करना भी सही नहीं होगा।
एक अन्य व्यापक अध्ययन, जिसे बाद में न्यायिक निर्णय में उद्धृत किया गया, बताता है कि मार्च 1967 से दिसंबर 1970 के बीच 51 मंत्रिमंडल अस्तित्व में आए और उनमें से अधिकांश दल-बदल के कारण समाप्त हुए।
दोनों आंकड़ों में विरोध नहीं है।
32 उन सरकारों का प्रचलित आंकड़ा है जिनके पतन को सीधे दल-बदल से जोड़ा गया है।
51 उस अवधि में बने मंत्रिमंडलों की संख्या है—उनमें से सभी दल-बदल से नहीं गिरे थे।
इसलिए हमारे इस अध्याय के लिए 32 सरकारों का पतन अधिक सुरक्षित समेकित आंकड़ा है।
सात सर्वाधिक अस्थिर राज्यों की तस्वीर
1967 से 1970 के अंत तक राजनीतिक अस्थिरता कुछ राज्यों में विशेष रूप से तीव्र थी।
समकालीन राजनीतिक अध्ययनों के अनुसार इस अवधि में:
- बिहार में सात सरकारें बनीं,
- उत्तर प्रदेश में चार,
- हरियाणा में तीन,
- मध्य प्रदेश में तीन,
- पंजाब में तीन,
- पश्चिम बंगाल में तीन,
- केरल में दो।
अर्थात केवल इन सात राज्यों में लगभग चार वर्षों के भीतर 25 अलग-अलग मंत्रिमंडलीय व्यवस्थाएं देखने को मिलीं।
यह संख्या बताती है कि समस्या कुछ असाधारण घटनाओं तक सीमित नहीं थी।
राज्यों में सत्ता परिवर्तन लगातार हो रहा था।
कितने मुख्यमंत्री बदले?
यहां एक निश्चित अखिल भारतीय संख्या घोषित करना उचित नहीं होगा।
कारण यह है कि उपलब्ध अभिलेख अलग-अलग ढंग से गणना करते हैं।
किसी मुख्यमंत्री के दो अलग कार्यकालों को दो सरकारें माना जाता है, लेकिन वह व्यक्ति एक ही होता है। उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश में चंद्रभानु गुप्त और चौधरी चरण सिंह दोनों एक से अधिक बार मुख्यमंत्री बने। बिहार में भोला पासवान शास्त्री अलग-अलग अवसरों पर मुख्यमंत्री बने। पश्चिम बंगाल में अजय मुखर्जी ने भी एक से अधिक सरकारों का नेतृत्व किया।
इसलिए “कितनी सरकारें बदलीं” और “कितने अलग-अलग व्यक्ति मुख्यमंत्री बने” एक समान संख्या नहीं है।
इतिहास के लिए अधिक प्रमाणित निष्कर्ष यह है कि मार्च 1967 से दिसंबर 1970 के बीच देश में 51 मंत्रिमंडल बने, और सात सबसे अस्थिर राज्यों में ही 25 सरकारें अस्तित्व में आईं।
1967 से 1974 तक मुख्यमंत्री परिवर्तन का एक सर्वमान्य राष्ट्रीय समेकित सरकारी आंकड़ा उपलब्ध नहीं मिलता। इसलिए केवल संख्या पूरी करने के लिए कोई अनुमान देना उचित नहीं होगा।
इस अध्ययन में राज्यवार समयरेखा को अधिक विश्वसनीय मानना चाहिए।
संसद भी इस उथल-पुथल से अछूती नहीं रही
दल-बदल का संकट केवल विधानसभाओं तक सीमित नहीं था।
1967 से 1971 के चार वर्षों में संसद में 142 दल-बदल दर्ज किए गए।
हालांकि राज्यों की तुलना में संसद में इससे सरकारें उतनी तेजी से नहीं गिरीं, क्योंकि केंद्र में कांग्रेस का बहुमत बना हुआ था।
फिर भी 1969 में कांग्रेस का विभाजन होने के बाद लोकसभा और राज्यसभा में सांसदों को यह तय करना पड़ा कि वे इंदिरा गांधी के साथ जाएंगे या संगठन कांग्रेस के साथ।
इसलिए सांसदों की टूट का एक हिस्सा साधारण व्यक्तिगत दल-बदल नहीं बल्कि राष्ट्रीय पार्टी विभाजन से भी जुड़ा हुआ था।
यही कारण है कि 142 सांसदों का आंकड़ा “अलग-अलग 142 सांसद” कहने के बजाय 142 संसदीय दल-बदल की घटनाओं के रूप में दर्ज करना अधिक सटीक है।
1969 के कांग्रेस विभाजन को साधारण दल-बदल में नहीं जोड़ना चाहिए
अंतिम गणना में यह अंतर विशेष रूप से आवश्यक है।
1969 में कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर दो हिस्सों में बंटी।
उसके बाद हजारों पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ विधायक और सांसद भी दोनों गुटों में बंटे।
यदि कांग्रेस (आर) और कांग्रेस (ओ) में हुए पूरे विभाजन को सामान्य व्यक्तिगत दल-बदल की संख्या में जोड़ दिया जाए तो वास्तविक तस्वीर विकृत हो जाएगी।
इसलिए हमारे समेकित आकलन में:
व्यक्तिगत अथवा छोटे समूह के पक्ष परिवर्तन को दल-बदल माना गया है, जबकि 1969 के कांग्रेस विभाजन को अलग राजनीतिक घटना के रूप में रखा गया है।
यही पद्धति अधिक ऐतिहासिक रूप से विश्वसनीय है।
राष्ट्रपति शासन — सबसे स्पष्ट और पूरी तरह गिने जा सकने वाले आंकड़े
सरकारों और दल-बदल की गणना में परिभाषा की समस्या है, लेकिन राष्ट्रपति शासन का रिकॉर्ड अपेक्षाकृत स्पष्ट है क्योंकि प्रत्येक बार राष्ट्रपति की औपचारिक उद्घोषणा हुई।
संसद के राष्ट्रपति शासन संबंधी आधिकारिक संकलन के आधार पर 1967 से 1974 के बीच, उस समय पूर्ण राज्य रहे प्रदेशों और इस अवधि में राज्य बने प्रदेशों की घटनाओं को समयसीमा के अनुसार अलग रखते हुए, हमारे अध्ययन में 11 राज्यों में 20 बार राष्ट्रपति शासन शुरू हुआ। संसद का आधिकारिक संकलन राज्यवार सभी उद्घोषणाओं को दर्ज करता है।
राज्यवार संख्या इस प्रकार रही:
| राज्य | 1967–1974 में राष्ट्रपति शासन |
|---|---|
| उत्तर प्रदेश | 3 |
| बिहार | 3 |
| पश्चिम बंगाल | 3 |
| पंजाब | 2 |
| ओडिशा | 2 |
| गुजरात | 2 |
| हरियाणा | 1 |
| केरल | 1 |
| मैसूर (अब कर्नाटक) | 1 |
| आंध्र प्रदेश | 1 |
| मणिपुर | 1 |
| कुल | 20 |
यहां पुडुचेरी और उस समय केंद्रशासित प्रदेशों पर लागू केंद्रीय शासन को अलग रखा गया है, ताकि राज्य और केंद्रशासित प्रदेशों के आंकड़े न मिलें।
त्रिपुरा की 1971–72 की स्थिति भी अलग संवैधानिक श्रेणी में सावधानी से देखी जानी चाहिए, क्योंकि केंद्रीय शासन उसकी पूर्ण राज्य बनने की तारीख से पहले शुरू हुआ था।
इसलिए 20 का आंकड़ा इस अध्याय में अपनाई गई राज्य-आधारित गणना है, न कि उस अवधि में भारत के हर प्रकार के केंद्रीय शासन का कुल जोड़।
किस राज्य में अस्थिरता सबसे अधिक थी?
सरकारों के गठन-पतन, दल-बदल और राष्ट्रपति शासन—तीनों संकेतकों को साथ रखें तो कुछ राज्य साफ तौर पर सामने आते हैं।
बिहार सबसे उथल-पुथल वाले राज्यों में था। सरकारें बहुत तेजी से बदलीं और तीन बार राष्ट्रपति शासन लगा।
उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री बार-बार बदले और तीन बार राष्ट्रपति शासन लागू हुआ।
पश्चिम बंगाल ने संयुक्त मोर्चा सरकारों के गठन और पतन के बीच तीन बार राष्ट्रपति शासन देखा।
हरियाणा दल-बदल का प्रतीक बना, जबकि वहां 1967 में कांग्रेस स्पष्ट बहुमत लेकर आई थी।
पंजाब में गठबंधन टूटे, सरकारें बदलीं और दो बार राष्ट्रपति शासन लगा।
गुजरात में 1969 के कांग्रेस विभाजन और बाद में 1974 के राजनीतिक संकट ने दो अलग-अलग राष्ट्रपति शासन की परिस्थितियां पैदा कीं।
इसलिए 1967–74 की अस्थिरता किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं थी। उत्तर, पूर्व, पश्चिम और दक्षिण—सभी हिस्सों में अलग-अलग रूपों में इसका प्रभाव दिखाई दिया।
एक नजर में पूरे दौर का हिसाब
इस पूरे अध्याय के लिए सबसे सुरक्षित और स्रोत-समर्थित संक्षिप्त तस्वीर इस प्रकार है:
| राजनीतिक संकेतक | उपलब्ध प्रमाणित आंकड़ा |
|---|---|
| मार्च 1967–फरवरी 1968 में दल-बदल | कम से कम 438 |
| उसी अवधि में दलों में शामिल हुए निर्दलीय विधायक | 157 |
| 1967–1970 में दल-बदल की राजनीति में शामिल विधायक | लगभग 800 |
| 1967–1971 में विधानसभा दल-बदल की घटनाएं | 1,969 |
| 1967–1971 में संसद में दल-बदल की घटनाएं | 142 |
| 1967–1971 में दल-बदल से गिरी राज्य सरकारें | 32 |
| 1967–1971 में मंत्रीपद पाने वाले दल-बदलू | 212 |
| मार्च 1967–दिसंबर 1970 में बने मंत्रिमंडल | 51 |
| 1967–1974 में इस अध्ययन की राज्य-आधारित गणना में राष्ट्रपति शासन | 20 बार, 11 राज्यों में |
438 वाला शुरुआती विस्फोट दल-बदल समिति तथा बाद में सर्वोच्च न्यायालय और विधि आयोग द्वारा उद्धृत किया गया है। 1,969 विधानसभा दल-बदल, 142 संसदीय दल-बदल, 32 सरकारों का पतन और 212 दल-बदलुओं के मंत्री बनने की गणना पीआरएस के ऐतिहासिक संकलन में दी गई है।
लेकिन एक महत्वपूर्ण सावधानी
इन आंकड़ों को जोड़कर यह नहीं कहा जा सकता कि “इतने विधायक टूटे।”
उदाहरण के लिए यदि एक विधायक तीन बार पक्ष बदलता है तो दल-बदल की संख्या तीन होगी, लेकिन विधायक एक ही रहेगा।
इसलिए वेबसाइट पर अंतिम तथ्य इस रूप में लिखना अधिक सही होगा:
“1967–71 के बीच राज्य विधानसभाओं में 1,969 दल-बदल की घटनाएं दर्ज हुईं और संसद में 142। मार्च 1967 से फरवरी 1968 के केवल एक वर्ष में कम से कम 438 दल-बदल हुए। लगभग चार वर्षों में 32 राज्य सरकारें दल-बदल के कारण गिरीं।”
यह कथन उपलब्ध स्रोतों से सीधे पुष्ट होता है और अतिरंजना से बचाता है।
क्यों इतना बड़ा संकट पैदा हुआ?
इन संख्याओं के पीछे मुख्य कारण 1967 का खंडित जनादेश था।
कांग्रेस कमजोर हुई, लेकिन बहुत से राज्यों में कोई एक विपक्षी दल उसकी जगह लेने की स्थिति में नहीं था।
इसलिए अलग-अलग विचारधारा वाले दल केवल कांग्रेस-विरोध के आधार पर साथ आए।
उन सरकारों का बहुमत अक्सर बहुत कम था।
ऐसी स्थिति में तीन, पांच या दस विधायकों का समूह सरकार के अस्तित्व का फैसला कर सकता था।
दल-बदल रोकने वाला कोई कानून नहीं था।
यदि विधायक पार्टी छोड़ देता था तो उसकी विधानसभा सदस्यता समाप्त नहीं होती थी।
वह विरोधी खेमे में जाकर मंत्री भी बन सकता था।
यह स्थिति इतनी गंभीर हुई कि दिसंबर 1967 में लोकसभा को सर्वसम्मति से दल-बदल की समस्या पर उच्चस्तरीय समिति बनाने का प्रस्ताव पारित करना पड़ा।
लेकिन कानूनी समाधान तत्काल नहीं आया।
दल-बदल विरोधी संवैधानिक व्यवस्था 1985 में जाकर लागू हुई।
क्या केवल विपक्ष दोषी था?
नहीं।
इस दौर का इतिहास यह स्पष्ट करता है कि दल-बदल की राजनीति किसी एक पार्टी तक सीमित नहीं थी।
कांग्रेस के विधायक विपक्ष में गए।
विपक्षी विधायक कांग्रेस में आए।
कांग्रेस से निकले समूहों ने विपक्ष के साथ सरकार बनाई।
फिर उन्हीं सरकारों के सदस्य टूटकर कांग्रेस के समर्थन से दूसरी सरकार बनाने लगे।
1969 के बाद दोनों कांग्रेस गुट भी विधायकों को अपने पक्ष में लाने की प्रतिस्पर्धा में शामिल थे।
इसलिए इसे किसी एक दल की कहानी के रूप में लिखना उस दौर की वास्तविकता को छोटा कर देगा।
यह पूरे राजनीतिक तंत्र की समस्या बन चुकी थी।
मतदाता पीछे, विधायक आगे
1967–74 के इस दौर की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक विडंबना यही थी।
मतदाता चुनाव में सरकार तय करता था, लेकिन कई राज्यों में चुनाव के कुछ महीनों बाद सरकार की दिशा उन विधायकों के हाथ में चली जाती थी जो अपना पक्ष बदल रहे थे।
हरियाणा में मतदाताओं ने कांग्रेस को बहुमत दिया था, फिर भी सरकार कुछ ही दिनों में बदल गई।
मध्य प्रदेश में कांग्रेस सरकार उसके अपने विधायकों की टूट से चली गई।
उत्तर प्रदेश में विधानसभा के भीतर बदलते गठबंधनों ने बार-बार मुख्यमंत्री बदले।
बिहार में कुछ वर्षों में इतनी सरकारें बनीं कि स्थायी जनादेश का अर्थ ही कमजोर पड़ने लगा।
पंजाब और पश्चिम बंगाल में गठबंधन टूटते ही सत्ता का पूरा स्वरूप बदल गया।
इसलिए 1967 के बाद भारतीय राजनीति में एक नया प्रश्न पैदा हुआ—
क्या पांच वर्ष का जनादेश वास्तव में पांच वर्ष तक मतदाता का जनादेश रहेगा, या विधायक बीच में ही उसकी राजनीतिक दिशा बदल सकता है?
“आया राम, गया राम” किसी एक व्यक्ति की कहानी नहीं थी
गया लाल का नाम इतिहास में इसलिए रह गया क्योंकि हरियाणा की एक घटना ने पूरे दौर को एक वाक्य दे दिया।
लेकिन वास्तविक कहानी कहीं बड़ी थी।
एक वर्ष में 438 दल-बदल।
चार वर्षों में 1,969 विधानसभा दल-बदल।
142 संसदीय दल-बदल।
32 सरकारों का पतन।
सैकड़ों दल-बदलुओं को सत्ता में हिस्सेदारी।
और 1967 से 1974 के अध्ययन काल में राज्यों में 20 राष्ट्रपति शासन की घटनाएं।
यानी “आया राम, गया राम” भारतीय लोकतंत्र की एक संरचनात्मक समस्या का नाम बन चुका था।
1967–1974 का ऐतिहासिक निष्कर्ष
1967 से पहले भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता कांग्रेस का प्रभुत्व थी।
1967 के बाद उसकी जगह तुरंत स्थिर द्विदलीय या गठबंधन व्यवस्था नहीं आई।
बीच में एक संक्रमणकाल आया—और वही यह उथल-पुथल का दौर था।
इसने पहली बार साबित किया कि कांग्रेस को राज्यों में सत्ता से हटाया जा सकता है।
इसने गैर-कांग्रेसी गठबंधन राजनीति को जन्म दिया।
लेकिन साथ ही इसने दिखाया कि केवल किसी एक दल के विरोध में बनी सरकार स्थायी नहीं होती।
इसने विधायक को सत्ता-संतुलन का असाधारण केंद्र बना दिया।
इसने राज्यपाल की संवैधानिक भूमिका को विवाद के केंद्र में ला दिया।
और इसने अनुच्छेद 356 के बार-बार इस्तेमाल का रास्ता खोला।
सबसे बढ़कर, इस दौर ने भारतीय लोकतंत्र को उस समस्या से परिचित कराया जिसका समाधान देश लगभग दो दशक बाद खोज पाया—दल-बदल विरोधी कानून।
इसलिए 1967–1974 को केवल सरकारों के गिरने और मुख्यमंत्रियों के बदलने का दौर कहना पर्याप्त नहीं है।
यह वह काल था जब भारतीय राजनीति एक-दलीय प्रभुत्व से बहुदलीय प्रतिस्पर्धा की ओर बढ़ी, लेकिन उसके बीच विधायी अस्थिरता का ऐसा दौर आया जिसमें चुनावी जनादेश और विधानसभा के वास्तविक सत्ता-संतुलन के बीच दूरी अभूतपूर्व रूप से बढ़ गई।
यही इस पूरे राजनीतिक उथल-पुथल का सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक निष्कर्ष है।