दल-बदल का विस्फोट: ‘आया राम, गया राम’
दल-बदल का विस्फोट — “आया राम, गया राम”, विधायकों की टूट-फूट और सत्ता परिवर्तन
1967 के चुनावों ने राज्यों में कांग्रेस के लंबे प्रभुत्व को कमजोर किया तो उसके साथ एक ऐसी राजनीतिक प्रवृत्ति भी तेजी से उभरी जिसने भारतीय संसदीय लोकतंत्र को गंभीर संकट में डाल दिया—विधायकों का बार-बार दल बदलना।
दल-बदल भारतीय राजनीति में 1967 से पहले भी होता था, लेकिन चौथे आम चुनाव के बाद इसकी गति और उसका उद्देश्य दोनों बदल गए। अब किसी विधायक का दल बदलना केवल व्यक्तिगत राजनीतिक निर्णय नहीं रह गया था। कुछ विधायकों का पक्ष परिवर्तन मुख्यमंत्री बदल सकता था, मंत्रिमंडल गिरा सकता था और विपक्ष में बैठी पार्टी को रातों-रात सत्ता में पहुंचा सकता था।
इस दौर में विधानसभा का बहुमत कई राज्यों में मतदाताओं के फैसले से कम और चुनाव के बाद विधायकों की बदलती निष्ठाओं से अधिक निर्धारित होने लगा।
इसका सबसे प्रसिद्ध प्रतीक बना—“आया राम, गया राम।”
हरियाणा से निकला वह राजनीतिक मुहावरा जो पूरे देश पर लागू हो गया
1967 में हरियाणा में पहली विधानसभा के चुनाव हुए। कांग्रेस 81 सदस्यीय विधानसभा में 48 सीटों के साथ स्पष्ट बहुमत में थी। लेकिन चुनाव के कुछ ही समय बाद पार्टी के भीतर विद्रोह शुरू हो गया। कांग्रेस के 12 विधायक अलग हुए और मुख्यमंत्री भगवत दयाल शर्मा की सरकार गिर गई। राव बीरेंद्र सिंह के नेतृत्व में नया संयुक्त समूह उभरा और 24 मार्च 1967 को उन्होंने मुख्यमंत्री पद संभाला। (The Indian Express)
इसी राजनीतिक उठापटक के बीच हसनपुर से निर्वाचित विधायक गया लाल राष्ट्रीय राजनीति का प्रतीक बन गए।
गया लाल निर्दलीय विधायक चुने गए थे। सरकार बनाने के लिए कांग्रेस और संयुक्त मोर्चा दोनों को विधायकों की आवश्यकता थी। इस राजनीतिक खींचतान में गया लाल ने कुछ ही घंटों में बार-बार अपना पक्ष बदला। उपलब्ध विवरणों के अनुसार एक चरण में उन्होंने लगभग नौ घंटे के भीतर तीन बार राजनीतिक निष्ठा बदली—संयुक्त मोर्चे से कांग्रेस, फिर कांग्रेस से वापस संयुक्त मोर्चे की ओर। (Navbharat Times)
जब गया लाल दोबारा राव बीरेंद्र सिंह के खेमे में पहुंचे तो उन्हें पत्रकारों के सामने प्रस्तुत करते हुए वह प्रसिद्ध टिप्पणी की गई जिससे भारतीय राजनीति को स्थायी मुहावरा मिला—“गया राम अब आया राम हो गया।” इसके बाद “आया राम, गया राम” किसी एक विधायक का नाम नहीं रहा; यह अवसरवादी दल-बदल का पर्याय बन गया। (The Indian Express)
लेकिन गया लाल कोई अकेला अपवाद नहीं थे।
हरियाणा में जो दिखाई दे रहा था, वही अलग-अलग रूपों में उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, पंजाब, राजस्थान और पश्चिम बंगाल में भी हो रहा था।
आंकड़े बताते हैं कि समस्या कितनी भयावह हो चुकी थी
1967 के बाद दल-बदल की गति का सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेजी प्रमाण केंद्र सरकार द्वारा गठित दल-बदल समिति की रिपोर्ट में मिलता है।
8 दिसंबर 1967 को लोकसभा ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर एक उच्चस्तरीय समिति गठित करने का निर्णय लिया था, जिसका उद्देश्य विधायकों और सांसदों द्वारा बार-बार राजनीतिक निष्ठा बदलने की समस्या का अध्ययन करना था। समिति ने 7 जनवरी 1969 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। (Indian Kanoon)
रिपोर्ट में सामने आए आंकड़े असाधारण थे।
प्रथम आम चुनाव से लेकर चौथे आम चुनाव तक लगभग पंद्रह वर्षों में करीब 542 दल-बदल दर्ज किए गए थे।
इसके विपरीत मार्च 1967 से फरवरी 1968 के केवल बारह महीनों में कम से कम 438 दल-बदल हुए। यानी जितनी घटनाएं लगभग डेढ़ दशक में हुई थीं, उसके करीब पहुंचने वाली संख्या केवल एक वर्ष में सामने आ गई। (CaseMine)
यह संख्या केवल संगठित दलों के विधायकों की नहीं थी।
उस अवधि में निर्वाचित 376 निर्दलीय सदस्यों में से 157 अलग-अलग राजनीतिक दलों में शामिल हो गए। (CaseMine)
इसका अर्थ था कि निर्दलीय विधायक भी कई राज्यों में सत्ता निर्माण के महत्वपूर्ण साधन बन चुके थे।
मंत्रीपद और सत्ता — दल-बदल का सबसे गंभीर पक्ष
दल-बदल समिति ने एक और तथ्य दर्ज किया, जो इस पूरे दौर की प्रकृति समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
बिहार, हरियाणा, मध्य प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में दल बदलने वाले 210 विधायकों में से 116 उन मंत्रिपरिषदों में शामिल किए गए जिन्हें बनाने में उनके दल-बदल ने मदद की थी। (CaseMine)
अर्थात इन सात राज्यों में दर्ज दल-बदलुओं में आधे से अधिक को मंत्री पद मिला।
समिति ने इसी आधार पर कहा कि अनेक मामलों में पद प्राप्त करने का आकर्षण दल-बदल की प्रेरणा में प्रमुख दिखाई देता था। उसने बार-बार दल बदलने, विधानसभा सदस्यता से इस्तीफा न देने और सार्वजनिक राजनीतिक मर्यादा की उपेक्षा जैसी प्रवृत्तियों को भी गंभीर चिंता का विषय माना। (CaseMine)
यहीं 1967 के बाद की राजनीति का सबसे बड़ा संकट दिखाई देता है।
मतदाता किसी उम्मीदवार को एक राजनीतिक दल और उसके कार्यक्रम के आधार पर चुनते थे, लेकिन चुनाव के कुछ सप्ताह या महीने बाद वही विधायक दूसरे दल के साथ जाकर ऐसी सरकार बना सकता था जिसके विरुद्ध उसने चुनाव लड़ा था।
और इसके लिए उसे दोबारा मतदाताओं के पास जाना भी आवश्यक नहीं था।
उत्तर प्रदेश — कुछ विधायकों ने पूरा सत्ता-संतुलन बदल दिया
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस स्पष्ट बहुमत से वंचित थी। प्रारंभ में चंद्रभानु गुप्त ने सरकार बनाई, लेकिन कांग्रेस के भीतर टूट ने सरकार की नींव कमजोर कर दी।
चौधरी चरण सिंह और उनके साथ गए विधायकों ने कांग्रेस से अलग होकर विपक्षी दलों के साथ नया समीकरण बनाया। परिणामस्वरूप कांग्रेस सरकार गिर गई और संयुक्त विधायक दल की सरकार बनी।
यहां दल-बदल का महत्व केवल इतना नहीं था कि कुछ विधायक एक पार्टी से दूसरी पार्टी में चले गए। वास्तव में उसी टूट ने यह तय किया कि राज्य में मुख्यमंत्री कौन होगा और सरकार किस गठबंधन की बनेगी।
इसके बाद भी समर्थन स्थिर नहीं रहा। सरकार के भीतर शामिल दल और विधायक लगातार अपना राजनीतिक गणित देखते रहे।
इससे उत्तर प्रदेश उस नई व्यवस्था का बड़ा उदाहरण बन गया जिसमें चुनाव परिणाम अंतिम फैसला नहीं थे—सरकार का भविष्य विधानसभा के भीतर लगातार बदलते समर्थन पर निर्भर था।
बिहार — सरकारें बनीं, टूटीं और फिर नए समूह खड़े हुए
बिहार में स्थिति और अधिक अस्थिर थी।
1967 के बाद गैर-कांग्रेसी संयुक्त सरकार बनी, लेकिन उसके घटक दलों और विधायकों के बीच मतभेद बहुत जल्दी सामने आ गए। विधायक समूहों के टूटने से एक सरकार गिरती और नया राजनीतिक संयोजन सामने आता।
छोटे समूहों के नेताओं का महत्व उनकी वास्तविक संख्या से कहीं अधिक हो गया था।
यदि किसी गठबंधन के पास केवल कुछ सीटों का बहुमत हो तो चार-पांच विधायकों का पाला बदलना पर्याप्त था।
इस कारण विधायक दलों के भीतर असंतुष्ट समूह सत्ता के लिए निर्णायक बनने लगे। मंत्री पद, नेतृत्व और गठबंधन में हिस्सेदारी को लेकर होने वाला संघर्ष सीधे सरकारों के अस्तित्व से जुड़ गया।
मध्य प्रदेश — कांग्रेस की अपनी टूट से बनी नई सरकार
मध्य प्रदेश का उदाहरण दिखाता है कि दल-बदल केवल त्रिशंकु विधानसभाओं में नहीं हो रहा था।
यहां कांग्रेस के भीतर गोविंद नारायण सिंह के नेतृत्व में बड़ा विद्रोह हुआ। कांग्रेस से अलग हुए विधायक विपक्षी दलों के समर्थन से सत्ता परिवर्तन कराने में सफल हुए।
इसका राजनीतिक महत्व बहुत बड़ा था।
चुनाव में विपक्ष जिस शक्ति से सरकार नहीं बना पाया था, वही शक्ति उसे सत्तारूढ़ दल के विधायकों के टूटने से मिल गई।
इसने सभी दलों को नया राजनीतिक संदेश दिया—यदि प्रतिद्वंद्वी पार्टी के भीतर पर्याप्त संख्या में विधायक तोड़े जा सकें तो चुनाव परिणाम के बावजूद सरकार बदली जा सकती है।
पंजाब — समर्थक बदलते ही सरकार का आधार बदल गया
पंजाब में भी 1967 के बाद सत्ता का समीकरण लगातार बदलता रहा।
गुरनाम सिंह के नेतृत्व वाली गैर-कांग्रेसी सरकार कई दलों के समर्थन पर निर्भर थी। गठबंधन के भीतर टूट हुई और लक्ष्मण सिंह गिल अपने समर्थकों के साथ अलग हो गए।
इसके बाद राजनीतिक समर्थन की दिशा बदल गई और नई सरकार का रास्ता खुला।
इस तरह पंजाब में वही प्रवृत्ति सामने आई जो दूसरे राज्यों में दिखाई दे रही थी—सरकार बनाने और गिराने की शक्ति छोटे विधायक समूहों के हाथ में चली गई थी।
हरियाणा क्यों बना दल-बदल की प्रयोगशाला
हरियाणा में स्थिति अन्य राज्यों की तुलना में अधिक तीव्र थी।
यहां 1967 में कांग्रेस चुनाव जीत चुकी थी, फिर भी विधायकों की टूट ने कुछ ही दिनों में सरकार बदल दी। इसके बाद लगातार पाला बदलने की घटनाओं ने राजनीतिक स्थिरता लगभग समाप्त कर दी।
दल-बदल समिति ने बाद में हरियाणा का विशेष उल्लेख इसलिए किया क्योंकि यहां एक ही व्यक्ति या समूह द्वारा बार-बार राजनीतिक निष्ठा बदलने की घटनाएं असाधारण स्तर पर दिखाई दी थीं। (CaseMine)
राव बीरेंद्र सिंह की सरकार भी अधिक समय तक नहीं टिक सकी। नवंबर 1967 तक राज्य में ऐसी स्थिति बनी कि विधानसभा भंग करनी पड़ी और राष्ट्रपति शासन लागू हुआ। (The Indian Express)
इस अर्थ में “आया राम, गया राम” केवल मजाकिया राजनीतिक वाक्य नहीं था।
उसके पीछे एक वास्तविक संवैधानिक संकट था जिसमें निर्वाचित विधानसभा स्थिर सरकार देने में असमर्थ हो रही थी।
निर्दलीय विधायक अचानक इतने महत्वपूर्ण क्यों हो गए?
1967 के चुनावों के बाद कई विधानसभाओं में किसी एक दल के पास स्पष्ट बहुमत नहीं था।
ऐसी स्थिति में निर्दलीय और छोटे दलों के विधायक सत्ता की चाबी बन गए।
यदि सरकार को बहुमत के लिए पांच विधायक चाहिए और विधानसभा में दस या पंद्रह निर्दलीय हों, तो उनकी राजनीतिक शक्ति उनकी संख्या से कहीं अधिक हो जाती है।
इसी कारण दल-बदल समिति द्वारा दर्ज यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि 376 निर्वाचित निर्दलीयों में से 157 ने राजनीतिक दलों का दामन थाम लिया। (CaseMine)
अनेक निर्दलीय चुनाव तो स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में जीते थे, लेकिन विधानसभा बनने के तुरंत बाद किसी न किसी राजनीतिक समूह का हिस्सा बन गए।
इसने मतदाता के निर्णय और बाद की राजनीतिक वास्तविकता के बीच दूरी बढ़ा दी।
विचारधारा से अधिक महत्वपूर्ण होने लगा बहुमत का अंकगणित
इस दौर में दल-बदल की एक खास विशेषता थी—विधायक का नया राजनीतिक साथी जरूरी नहीं था कि उसकी पुरानी विचारधारा से मेल खाता हो।
कई राज्यों में ऐसे गठबंधन बने जिनमें वैचारिक रूप से एक-दूसरे के विरोधी दल शामिल थे।
ऐसे गठबंधनों में जब मतभेद उत्पन्न होते तो विधायक दूसरे समूह में जाने के लिए स्वतंत्र थे। उनकी सदस्यता समाप्त नहीं होती थी।
इसलिए विधानसभा में संख्या लगातार बदलती रहती थी।
आज किसी सरकार के पास 180 विधायक हों, कुछ सप्ताह बाद उनमें से दस अलग हो जाएं और सरकार अल्पमत में आ जाए—1967 के बाद यह राजनीतिक संभावना कई राज्यों में वास्तविकता बन चुकी थी।
मतदाता का जनादेश और विधायक की स्वतंत्रता — मूल टकराव
दल-बदल की बहस ने एक गहरा संवैधानिक प्रश्न भी पैदा किया।
विधायक किसका प्रतिनिधि है?
क्या वह अपने विवेक से स्वतंत्र निर्णय लेने वाला जनप्रतिनिधि है, या उस राजनीतिक दल और कार्यक्रम का प्रतिनिधि भी है जिसके नाम पर मतदाता ने उसे चुना?
यदि कोई विधायक चुनाव जीतने के तुरंत बाद विरोधी पक्ष में चला जाए तो क्या यह मतदाता के जनादेश का उल्लंघन है?
1967 के बाद यह केवल सैद्धांतिक प्रश्न नहीं रहा।
सैकड़ों दल-बदल की घटनाओं ने इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था की व्यावहारिक समस्या बना दिया।
इसी गंभीरता के कारण दिसंबर 1967 में लोकसभा को सर्वसम्मति से दल-बदल पर उच्चस्तरीय समिति गठित करनी पड़ी। समिति की 1969 की रिपोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि मामला कुछ राज्यों के कुछ असंतुष्ट विधायकों तक सीमित नहीं था; यह संसदीय व्यवस्था की स्थिरता से जुड़ा राष्ट्रीय प्रश्न बन चुका था। (Indian Kanoon)
दल-बदल ने राजनीति की भाषा भी बदल दी
1967 के बाद सरकार गठन से जुड़े नए शब्द सामान्य राजनीतिक चर्चा का हिस्सा बनने लगे—समर्थन वापसी, विधायक दल में टूट, नया समूह, संयुक्त विधायक दल, निर्दलीय समर्थन और बहुमत का दावा।
राजनीति चुनाव से विधानसभा के भीतर स्थानांतरित हो रही थी।
कई बार मतदाता ने जिन दलों को एक-दूसरे के विरुद्ध वोट दिया था, चुनाव के बाद वही दल साथ सरकार चला रहे थे।
कई बार सत्ता में बैठा दल टूटकर विपक्ष के साथ सरकार बना रहा था।
और कई बार वही विधायक कुछ समय बाद फिर पुरानी पार्टी या किसी तीसरे समूह के साथ दिखाई देता था।
यही कारण है कि गया लाल की घटना इतनी प्रतीकात्मक बन गई।
वह असाधारण जरूर थी, लेकिन उस समय की व्यापक राजनीतिक बीमारी से अलग नहीं थी।
एक वर्ष में 438 दल-बदल — इस दौर का सबसे कठोर तथ्य
यदि 1967 के बाद की पूरी स्थिति को एक आंकड़े में समझना हो तो वह 438 है।
मार्च 1967 से फरवरी 1968 के बीच कम से कम 438 बार विधायकों ने राजनीतिक निष्ठा बदली। (CaseMine)
इसके मुकाबले प्रथम से चौथे आम चुनाव तक लगभग 542 घटनाएं दर्ज हुई थीं।
इससे स्पष्ट है कि 1967 चुनाव ने राजनीतिक व्यवस्था में केवल परिवर्तन नहीं किया था; उसने सत्ता-संतुलन को इतना खुला बना दिया था कि विधायक स्वयं सरकार बनाने और गिराने की केंद्रीय इकाई बन गए।
इनमें से अनेक परिवर्तन विचारधारा की स्वाभाविक पुनर्समीक्षा हो सकते थे, इसलिए प्रत्येक दल-बदल को व्यक्तिगत लाभ या भ्रष्टाचार से जोड़ देना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं होगा। लेकिन संसदीय समिति ने स्वयं मंत्रीपद के आकर्षण, एक ही व्यक्ति द्वारा बार-बार पक्ष बदलने और भ्रष्टाचार अथवा प्रलोभन संबंधी व्यापक सार्वजनिक आशंकाओं को गंभीर समस्या के रूप में दर्ज किया था। (CaseMine)
यही वह बिंदु था जहां दल-बदल केवल राजनीतिक नैतिकता का प्रश्न नहीं रहा।
वह सरकारों की स्थिरता का प्रश्न बन चुका था।
1967 के बाद अगले कुछ वर्षों में इसका परिणाम बार-बार दिखाई दिया—सरकारें कुछ महीनों में गिरीं, मुख्यमंत्री बदले, नए गठबंधन बने और कई राज्यों में अंततः राष्ट्रपति शासन तक की नौबत आई।
इसलिए “आया राम, गया राम” उस दौर का कोई हल्का राजनीतिक व्यंग्य नहीं, बल्कि 1967 के बाद पैदा हुई उस अस्थिर सत्ता-व्यवस्था का सबसे संक्षिप्त प्रतीक था जिसमें कभी-कभी कुछ विधायकों के पाला बदलते ही एक निर्वाचित सरकार का भविष्य बदल जाता था।